दोस्ती जैसा कोई रिश्ता नहीं,
मिल सकती है बस वफा यहीं।
तुम प्यार भरी बातें यूं ही करते रहो
हम सबूत ढूंढने नहीं जायेंगे कहीं।
कभी मौके पर खरे उतरो या मुंह फेर लो
कभी मतलब तुममें फंसाकर आजमायेंगे नहीं।
देखा है वक्त बदल देता है इंसानों को
तुम बदलोंगे तो कभी शिकायत करेंगे नहीं।
दोस्त के पराये होने पर क्या रोयेंगे
जब दगा भी किसी का सगा हुआ नहीं।
बेवफाईयां भी हमारी जिंदगी डुबो नहीं सकीं
वफा कर गये अनजाने लोग, जो मिले न थे कहीं।
कभी उठे आकाश में, कभी गिरे जमीन पर
चले अपने आसरे, मिले या न हमराह कहीं।
___________________________
कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
http://anant-shabd.blogspot.com
-----------------------------
‘दीपक भारतदीप की हिन्दी-पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
दादू दयाल के दोहे -मनुष्य में सच झूठ की पहचान का गुण होना जरूरी (dadu daya ke dohe-sach jhooth ke pahachan ka gun mansuhya mein hona jaroori(
-
हम देख रहे हैं कि समाज में अब बुराई और भलाई की पहचान के साथ पाप
पुण्य के कर्म के चयन का लोगों में ज्ञान नहीं रहा। अक्सर क्रिकेट में
फिक्सिंग की...
1 दिन पहले