25 फ़रवरी 2009

झूठे सपने ही बाजार में बिकते-व्यंग्य शायरी

जंगल में ढूंढने पर कहां मिलते
शहरों में कई जगह अब तो
बड़ी इमारतों के बाहर पत्थर के शेर दिखते।
पत्थरों के शहर अब भला फूल कहां खिलते
इसलिये ही बंद कमरों में कैक्टस पर लिखते।
बंद है लोगों की सोच के दरवाजे
कड़वा हो मीठा सच के पारखी नहीं मिलते
इसलिये कभी पूरे न हो सकें वह ख्वाब
और झूठे सपने ही बाजार में बिकते
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सच और ख्वाब में
बहुत फर्क नजर आता है
सच के साथ होने का अहसास
दिल को नहीं होता
ख्वाब कभी सच न भी हो
सोच कर ही दिल बहल जाता है

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1 टिप्पणी:

परमजीत बाली ने कहा…

दीपक जी,दोनों रचनाएं बहुत अच्छी लगी।

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