7 अप्रैल 2018

शांत शहर खौफ के अंदेश में बंद हैं-दीपकबापूवाणी (Shant shahar Khauf ke andeshe mein band hai-DeepakBapuwani)

शांत शहर खौफ के अंदेश में बंद हैं, सब कांप रहे चाहे पत्थरबाज़ संख्या में चंद हैं।
‘दीपकबापू’ अजायबघर जैसी बस्ती बसायी, इंसान खड़े जैसे मूर्ति सोच अब बंद है।।
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हृदय में कलुषित भाव साधु वेश धर लेते, जहां मिले मलाई वहीं मुंह कर लेते।
‘दीपकबापू’ ज्ञान सुनाकर वर्षों तक जग ठगते, कभी महल की घास भी चर लेते।।
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बेजुबान का गोली से शिकार करते हैं, पर्दे पर नायक रूप में डर का विकार भरते हैं।
‘दीपकबापू’ वाणी होते भी लोग रहते मौन, नकली सितारे नियम का धिक्कार करते हैं।।
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सामने चलाई गोली अपने पीछे भी लग जाती, शाप की वाणी भी भाग्य ठग जाती।
‘दीपकबापू’ बरसों पहले कत्ल कर भूल गये, याद दिलाती कुदरत जब जग जाती।।
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25 मार्च 2018

बहीखाते कौन देखे पहरेदार अपनी नाकामी दर्द से छिपाने में जुटे हैं- दीपकबापूवाणी (BahiKhate Kuan dekhe-DeepakBapuWani)


दिखाने के लिये नाटक बहुत हैं,
सिखाने के लिये दाव बहुत हैं।
कहें दीपकबापू कमअक्लों से की यारी
लिखाने के लिये दर्द बहुत हैं।
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भूत के भय से भीड़ बुला लेते,
झाड़फूंक का मंत्र बेचकर सुला देते।
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आओ उनके इंतजाम पर तालियां बजायें,
डरकर हंसिये मन में चाहे गालियां सजायें।
अपनी पहचान से लुटे हैं-हिन्दी व्यंग्य कविता
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इतिहास गवाह कि
आमजनों के खजाने
ताकत की दम पर लुटे हैं।
बहीखाते कौन देखे
पहरेदार अपनी नाकामी
दर्द से छिपाने में जुटे हैं।
कहें दीपकबापू 
बंद तहखानों में झांकने की
कोशिश बेकार
अंधेरों में स्वर्णिम सिक्के
अपनी पहचान से लुटे हैं।
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सपने हसीन बहुत दिखाते,
सबका भला करना सिखाते।
कहें दीपकबापू स्वयं होता कुछ
भीड़ की उंगली पर आसरा टिकाते।
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नारों का पुलिंदा हुआ लोकतंत्र,
खोखले वादों का सजा हर मंत्र।
दीपकबापूतांत्रिक हुए आधुनिक
हवन के बदल चले विद्युतीय यंत्र।
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सिंह खत्म हुए राजा अब सियार हैं।
रक्षक नाम पर कातिलों का यार है।
कहें दीपकबापू पत्थरों के वन में
दिल नहीं अब दौलत हथियार हैं।
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बेबसों को रोज बेचो वह भरोसा लेंगे,
टूटा तो भाग्य कोसा करेंगे।
कहें दीपकबापू सेवा में जुटे मारीचि
आलू होगा समोसा भरेंगे।
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शहीदों की याद अपने नाम दीप जलायें।
श्रद्धांजलि में अपने शब्द चलायें।
कहें दीपकबापू हमदर्द बने व्यापारी
दर्द की दवा में दुआ रस चलायें।
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गरीब के सपने पर महल खड़े,
मिली मदद पर कागजों के ताले जड़े।
कहें दीपकबापू मूर्ख हैं वह
बाज़ार में ढूढें ईमानदार खड़े।
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भलाई का वादा कर साथ मांगा था,
अब भूली यादों में उसे टांगा था।
कहें दीपकबापू हमारा जिस्म घोड़ा
उनका इरादा अपना तांगा था।
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11 फ़रवरी 2018

सिंहासन पर बैठे उनकी हर बात मानो-दीपकबापूवाणी (Sinhasan par Baithe unki baat mano-DeepakBapuwani)


धोखा की कला चालाकी कहते,
मजाक के दौर गाली में बहते।
‘कहें दीपकबापू’ बेकार व्यंग या कविता
चिंतित लोग बिचारे तस्वीरों में रहते।
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‘दीपकबापू’ भावनाओं का व्यापार करते, 
भक्त करें इष्ट के दूत होने का दावा, 
भक्तों को पाखंड पर इष्ट करे पछतावा।
‘दीपकबापू’ परोपकार में भी चले व्यापार,
सबके कल्याण क है बड़ा छलावा।।
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क्या हुआ सड़कों पर गड्ढे पड़े हैं,
दोनों ओर सुंदर भवन भी तो खड़े हैं।
‘दीपकबापू’ ताजा हवा ढूंढते 
कई ठूंठ बरगद भी नाम के बड़े हैं।
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सिंहासन पर बैठे उनकी हर बात मानो,
जब बोलें तब ही सुबह रात मानो।
कहें दीपकबापू वीर रस हुआ फीका
आनंद तो भक्ति रस के साथ मानो।
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जिंदादिल अब मिलते नहीं है,
अपने दर्द पर भी हिलते नहीं है।
‘दीपकबापू’ फूल अब भी दे सुगंध
फिर भी लोगों के प्राण खिलते नहीं है।
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घर भरे पर शहर में सन्नाटा-हिन्दी व्यंग्य कविता
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शहर के सुंदर घर भरे 
मगर सड़कों पर सन्नाटा है।
ताकतवर दीवारों ने चीखों को
बाहर आने से पहले ही काटा है।
कहें दीपकबापू आओ गर्व करें
अपनी सभ्यता में पलते संस्कारों पर
अंधविश्वास में छिपाते डर
जहां बेहरमी से
नयी तकदीर को बूढ़ी सोच से पाटा है।।
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30 सितंबर 2017

असल हो या सपना है, जिंदगी का हर पल अपना है-दीपकबापूवाणी (asal ho ya sapn hai zindagi ka har pal apna nai-DeepakBapuwani)

बस कुछ ख्वाहिशें ही तो थीं
जिन्हें हमने मरने दिया,
अपनी जिंदगी में
आजादी से यूं ही चलने दिया।
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असल हो या सपना है,
जिंदगी का हर पल अपना है।
हर दर्द मिटाकर ‘दीपकबापू
हसीन पल दिल पर छपना है।
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देशभक्ति का पेशा कर लेते हैं,
भावना से अपनी जेब भर देते हैं।
‘दीपकबापू’ राम पर ही रखें भरोसा
स्वार्थी इंसान नाम भक्त धर लेते हैं।
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अपने हिस्से के पल सभी जी लेते हैं,
खुशी चखते गम भी पी लेते हैं।
‘दीपकबापू’ हिसाब लगाते बेकार
सच के डर से झूठा मूंह सी लेते हैं।
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आपने दिल में चाहत की आग जगाते,
मजबूरियों के स्वयं पर दाग लगाते।
‘दीपकबापू’ रंग लगा कचड़ा घर में
सजाकर शान से प्रशस्ति राग गाते।
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धोखा किसी से नहीं किया
इसलिये मशहूर भी नहीं हुए।
‘दीपकबापू’ हाथ पाप की तरफ बढ़ा नहीं
जिंदगी से दूर भी नहीं हुए।
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19 सितंबर 2017

गुनाहगारों के घर पर अब पहरेदार खड़े हैं-दीपकबापूवाणी (gunahagaron ke ghar par ab Pahredar Khade Hain-DeepakBapuWani)

गुनाहगारों के घर पर अब पहरेदार खड़े हैं, बदनाम होने से उनके नाम भी बड़े हैं।
‘दीपकबापू’ जितनी भी दूर तक डालते नज़र, अब नहीं टूटते जो भरे पाप के घड़े हैं।।
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चंदन का टीका सिर पर लगा लिया, पैसे प्रतिष्ठा के लिये ज्ञान से दगा किया।
‘दीपकबापू’ पाप की चमक में खोये रहे, दंड में मिली हथकड़ी ने जगा दिया।।
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वादे लेकर बाज़ार में वह हमेशा आते, हर बार बेबसों में लालच का यकीन जगाते।
‘दीपकबापू’ अमल करने की शक्ति नहीं, बाज़ार में पुराने इरादे में नये नारे सजाते।।
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रोज उधार का घी पिये जा रहे हैं, ब्याज की सांसों से जिये जा रहे हैं।
‘दीपकबापू’ बहीखाते जांचने से डरते, मौन आंकड़े हैरान किये जा रहे हैं।।
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नारों के साथ अब ऊबने लगे हैं, बद से बदतर हालातों में डूबने लगे हैं।
‘दीपकबापू’ थके कान रखना समझें अच्छा, भक्तिरस में हम कूदने लगे हैं।।
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कर लगाकर महंगा हर सामान करेंगे, पीड़हरण के लिये देशभक्ति गान करेंगे।
‘दीपकबापू’ अर्थशास्त्र कभी पढ़े नहीं, परायी जेब काटकर अपनी जेब ही भरेंगे।।
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भलाई के व्यापारी किसी के नहीं सगे, ग्राहक को हर बार नये ढंग से ठगे।
‘दीपकबापू’ पहरेदारी का जिम्मा लेकर खड़े, चोरों से साझेदारी करने लगे।।
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16 अगस्त 2017

अज्ञात के भय से अभयदान बिकता है-दीपकबापूवाणी (Agyat Bhay se abhaydan bikta hai-DeepakBapuWani)

मशहूर से ज्यादा बदनाम चलता है,
भले से ज्यादा बेईमान पलता है।
जवान सूरज जंग लड़ता है
शाम चमके जब सूरज ढलता है।
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जिंदगी का आंनद रस
कभी ग्लास में भरकर
पीया नहीं जाता।
टुकड़ों में बंटा इंसान
एक लय में जिया नहीं जाता।
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तुम पसंद करो या नहीं
हम कहने से बाज नहीं आयेंगे।
हमारी खामोशी में भी ताकत है
दिल्लगी का राज नहीं बतायेंगे।
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अमीर अपनी दौलत
गरीब कौड़ी बचाने के लिये
जूझ रहा है।
वह कौन है जो 
ज़माने की पहेली बूझ रहा है।
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तरक्की अकेला बना देती है,
इज्जत भी भय घना देती है।
आमों से लदा पेड़ अदब से झुका
एक मणि विषधर बना देती है।
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अज्ञात के भय से अभयदान बिकता है,
पर्दे का शेर धरा पर नहीं टिकता है।
‘दीपकबापू’ कागज पर स्याही फैलाकर
कोई सिक्कों के लिये भ्रम लिखता है।।
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क्या करें मन की बात
कान होते हुए लोग बहरे हैं।
किसे अपना दर्द बया करें
हमदर्दों के भी रोग गहरे हैं।
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उनकी आंख कान पर क्या भरोसा
जो स्वयं विश्वास से टूटे हैं।
उनके साथ से क्या उम्मीद
जो अपनी स्वयं अपनी आस से रूठे हैं।
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सड़क पर इंसान को
राम कृष्ण का नाम याद आता है।
महल में बैठते ही चिंत्तन से
भक्ति का काम बाद आता है।
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पुराने यारों की अंतर्मन में
बहुत सारी यादें पाले हैं।
ज़माने के शोर में फंसा दिल
उनपर उदासीन जाले हैं।
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24 जुलाई 2017

खुद से बेजार ज़माने की चिंता करते हैं-दीपकबापूवाणी (Khue se Bezar Zamane ki chinta karate hain-DeepakBapuwani)

ऊंचे पायदान से गिरने के बहुत खतरे हैं, फिर भी चढ़े जो लोग उनके बहुत नखरे हैं।
‘दीपकबापू’ आम कभी आकाश नहीं छूते, खासों ने मासूम मन के पर बहुत कतरे हैं।।
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कपास से की परहेज रबड़ के वस्त्र पहने हैं, विकसित नये रूप में लोहे के गहने हैं।
‘दीपकबापू’ बिना चिंत्तन नारे ही निष्कर्ष कहें, बेकार बहस में अभद्र शब्द सहने हैं।।
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व्यस्तता का दिखावा फुर्सत के यार करने लगे, लुट के दीवाने अब व्यापार करने लगे।
विश्वास से पहले धोखे की तेयारी जरूरी, ‘दीपकबापू’ दिल सुखाकर प्यार करने लगे।।
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वह युद्ध का शंख बजायें डरना नहीं, उनके खूंखार चेहरे पर ध्यान धरना नहीं है।
‘दीपकबापू’ हंसोड़ों के हाथ हथौड़े देखें, पेट के लिये जूड़ते उन्हें अभी मरना नहीं है।।
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अपने मुख से ही करते भलाई का बखान, परमार्थ का दिखावा स्वार्थ की होते खान।
‘दीपकबापू’ नैतिकता के जोरदार नारे लगाते, बेईमानों के हाथ में पकड़ाये अपना कान।।
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बाज़ार के सौदागर ढूंढते अपने फायदे, मुनाफे लुटने के भी बना देते ढेर कायदे।
‘दीपकबापू’ दौलत के गुलाम बने बादशाह बुत, लाचार पर लुटाते बेहिसाब वायदे।।
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खुद से बेजार ज़माने की चिंता करते हैं, सोच से लाचार कागजों पर राय भरते हैं।
मिलावट खाकर ठग बन गये अक्लमंद, चालाकी के चित्र में भलाई का रंग भरते हैं।।
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अपनी कमी छिपाकर सीना तान सभी खड़े हैं, वरना तो लाचारियों से भरे सभी घड़े हैं।
‘दीपकबापू’ विज्ञापन से बन गये वीर नायक, पर्दे पर चमके पर जमीन पर नहीं कभी लड़े है।।
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कमजोर शख्स पर ज़माना तंज कसता है, जहरीला शब्द हर जुबान पर बसता है।
‘दीपकबापू’ चाहतों में बंधक रखी जिंदगी, आवारगी का शौक दिल को डसता है।।
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