20 मई 2017

बेईमानों ने ईमान लाने की मुहिम चलाई-दीपकबापूवाणी (baiimono ne iman laane ki muhim chalai-DeepakBapuWani(

आंखें देखें दिल चाहे न क्या फायदा, एक राह प्रेम चले यह नहीं कायदा।
‘दीपकबापू’ जुबां से चाहे जो शब्द बोलें, यकीन से दूर ही समझें वायदा।।
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लक्ष्य सबका महल की सीढ़ियां चढ़ना है, कुचलकर पायदान आगे बढ़ना है।
‘दीपकबापू’ बादशाहों को देते सलामी, कौन उनकी नज़र में रोज पड़ना है।।
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महंगा है सोना जो पेट न भर सके, सजते नकली फूल जो सुगंध न कर सके।
‘दीपकबापू’ बेजान प्रतिमा पर चढ़ाते फूल, जज़्बात कभी दिल में जो भर न सके।।
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मिलावट से सामान पर भरोसा नहीं है, कौन कहे अशुद्ध खाना परोसा नहीं है।
‘दीपकबापू’ बीमारों की फौज में खड़े, किसने अपने पेट को कभी कोसा नहीं है।।
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गुणीजन भी पराये के ढेर दोष बताते, पर अपना गुण दिखाने में लजाते।
‘दीपकबापू’ अपनी बड़ी रेखा खींचते नहीं, पहले खींची पर थूक लगाते।।
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अपना काम निकालना सभी जाने, मतलब निकलते ही मुंह फेरें सयाने।
अनचाहे नेकी दरिया में ही जाती, ‘दीपकबापू’ लगते अपना पुण्य बताने।।
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इंतजार है कि वह शहर अपना सजायेंगे, वरना फिर कोई नया सपना बतायेंगे।
‘दीपकबापू’ सच से रोज होता सामना, वादों के सौदागर महल अपना बनायेंगे।।
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बेईमानों ने ईमान लाने की मुहिम चलाई, पानी का सौदा बेच चाटी मलाई।
‘दीपकबापू’ समाज सेवा का धंधा चलाते, मशाल जलाते लूटकर दियासलाई।।
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रंकों की भीड़ में राजा पाये सम्मान, भिखारी खुश जब पाये रुपये का दान।
‘दीपकबापू’ रखें श्रद्धा फलहीन बुत में, फूल कैसे आकर दें सुगंध का वरदान।।
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इंसान पटाने में उनके अपने गुणा भाग हैं, बोलने से अलग करने के राग हैं।
‘दीपकबापू’ चरित्रवान का लगाते हिसाब, वही जिस पर लगे काम दाग हैं।।
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पहले नतीजा लिखकर तय कर लेते हैं, नाम खेल या जंग धर लेते हैं।
‘दीपकबापू’ पर्दे पर लगाये बैठे आंखें, कभी डरते कभी हंसी भर लेते हैं।।
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ईंट पत्थर के शहर रंग से सजाये हैं, सड़क पर लोहे के पिंजरे भंग से चलाये हैं।
‘दीपकबापू’ चोर सेठ की पहचान खोकर, दोस्ती पाखंडियों के संग से सजाये हैं।।
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ढूंढते रोज गम से बचने के नये बहाने, पर्दे पर डाले आखें कभी जायें मयखाने।
‘दीपकबापू’ चाहतों के बेलगाम घोड़े पर सवार, निकले घर से मन की शांति पाने।।
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लोकतंत्र में लाश जिंदा भाव बिकती हैं, घृणा की आग पर चुपड़ी रोटी सिकती हैं।
‘दीपकबापू’ अंग्रेजी पढ़की हुई तंग बुद्धि, पर्दे का चलते दृश्य देखकर ही टिकती है।।
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ईमानदारी का दावा लोग सभी करते है, बेईमानों से रिश्ते का दंभ भी भरते हैं।
‘दीपकबापू’ खोई लालच में अपनी पहचान, अपना गरीब नाम अमीर भी धरते हैं।।
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चहुं ओर सौदागर सिंहासन पर सजे हैं, बैठने के लेते दाम बिना काम के मजे हैं।
‘दीपकबापू’ वाहन पर सवार खिलौने जैसे, नाम सेवक पर स्वामी जैसे स्वर बजे हैं।।
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मुंह में राम नाम हाथ में सेवा का काम, पाखंडी गुरु भक्तों से वसूल करते दाम।
‘दीपकबापू’ बौरा जाते हैं इर्दगिर्द भीड़ देख, पैसे बटोरते हुए बुद्धि भी होती जाम।।
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7 मई 2017

लफ्जों से चल रहा व्यापार आरपार की जंग क्यों लड़ेंगे-छोटी हिन्दी मुक्त कवितायें (LaFzon se chal raha Vyapar-Hindi poem)

बाज़ार के खेल में
नये चेहरे और नारे के साथ
उत्पाद सजाते हैं।
ठगी पर क्या रोयें
हम भी पुराना
कहते हुए लजाते हैं।
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तख्त पर बैठकर
आम इंसान की
चिंता कौन करता है।
प्रहरी खड़े दर पर
सच के हमले से
कौन डरता है।
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लफ्जों से चल रहा व्यापार
आरपार की जंग क्यों लड़ेंगे।
आमइंसान के सिर से भी कमाते
टीवी पर ही सौदागर यों लड़ेंगे।
कहें दीपकबापू भक्ति से भी कमाते
रक्तचाप में भी अपना दही जमाते
दौलत के गुलाम योद्धा की तरह
कभी मैदान में आगे नहीं बढ़ेंगे।।
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चर्चे होते हमारे भी
अगर सबकी पसंद 
भाषा कहना आती।
भीड़ होती पीछे
अगर सबकी नीयत
ललचानी आती।
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हम नहीं बदले यार
तुमने जगह बदली है।
साथ थे सिर आंखों पर
अब दूरी ने नज़र बदली है।
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आंधियां कभी रास्ता नहीं पूछा करतीं
बस तबाही चस्पा कर चली जाती हैं।
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बदले ज़माने में
पसीना बहाने वाले
अजीब लगते हैं।
नजरिया यह भी कि
केवल गरीब ठगते हैं।
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कब पतंग कटे
लूटने वाले इंतजार में खड़े हैं।
मांझा कब साथ तोड़े
अनेक चक्षु उस पर पड़े हैं।
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सामानों का बोझ उठाये
समंदर पार कर गये।
खड़े अकेले दूसरे किनारे
अपने बेबस यार डर गये।
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दिल पर मत लेना यार
हमने मोहब्बत बंद कर दी है।
यकीन के साथ
अपनी सोहब्बत मंद कर दी है।
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अपनी स्वार्थ साधना में लगे
परमार्थ नाम जपते हैं।
दुर्जन पायें शीतल हवा
सज्जन धूप में तपते हैं।
....
रोटी बेचने के लिये कहीं ठेला लगे
कहीं बांटने के लिये मेला लगे।
भूख की बेचारगी दाम और दान दोनों ही ठगे।
.....
उधार पर मिली जिंदगी
फिर हाथ क्यों फैलायें।
बेचता नहीं कोई सांस
अपनी भूख से आंख क्यों फैलायें।

जब तक पर्दा है
ईमानदार पर आंच नहीं आती।
बेईमानों की भीड़ लगी
बिचारी जांच कहीं नहीं जाती।

22 अप्रैल 2017

महल में बाहर दरबान के हाथ राजा का असला है। यही उसकी अकड़ का मसला है-छोटी हिन्दी मुक्त कवितायें (Sum Short Hindi Poem)

तस्वीर से दिल बहलाना

बुरा नहीं

गर दिल लगाते नहीं।

श्रृंगार रस में बहना बुरा नहीं

गर सपने जगाते नहीं।

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जगह बदल बदलकर

देख रहे हैं कहीं

अपना अस्तित्व मिल जाये।

शायद कोई 

नया शब्द फूल खिल जाये।

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महल में बाहर

दरबान के हाथ

राजा का असला है।

यही उसकी

अकड़ का मसला है।

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दिल पर लगे घाव

मजबूरी में

दर्द पीना था।

हाथ में कलम थी

कविता से ही जीना था।

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जब कातिलों के कसीदे

रिसालों में चाव से पढ़े जाते हैं।

तब शिकारों के कसूर

बड़े ताव से गढ़े जाते हैं।


हर चेहरे पर नकाब

किसे बेनकाब कर पहचाने।

नीयत बद मिलने का डर

 इसलिये रहते अनजाने।


मृफ्त में खाना है

तौंद भी महल में बसाना है।

बस एक बार

चुनाव जीत जाना है।

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अमन की बहस

जंग में बदल जाती है।

शब्दों से धवल पट्टिका

काले रंग में बदल जाती है।

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हम नहीं जानते

कौन पीठ पर वार करेगा।

यह भी मानते

कोई तो है

जो हमारी नाव पार करेगा।

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दोस्तों से वफा की

नाउम्मीदी से डरे हुए हम।

यह कम नहीं

टूटे हौंसलों से

इतना भी लड़ जाते हम

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बोलें तो बवाल मचेगा

मौन से सवाल बचेगा।

ढूंढते मसले का मंच

जहां शब्द ताल नचेगा।

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नट के हाथ में डोर

इंसानी पुतलों को 

अपना खेल दिखाना है।

अपनी अदाओं से

गुलामी ही सिखाना है।

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चेहरा उनका सुंदर 

पर हम नीयत नहीं पढ़ पाते।

शब्द भी अद्भुत

पर उनके अर्थ नहीं गढ़ पाते।

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तस्वीर से ही

उनकी आंखें झांक लेती हैं।

तसल्ली है

दिल में प्रेमभाव हांक देती हैं।

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मंडी में बड़े पैमाने की

चीज का दाम कम होता है।

इंसानों की भी भीड़ जमा

भेड़ जैसा मोल देख

दिल क्यों नम होतो है।

पुराने काम

नये नारों के साथ

बदस्तूर जारी है।

बदलाव से डरें नहीं

बस नये चेहरे की बारी है।

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हंसी पलों में भी

अब लोग साथ

नहीं निभाते हैं।

दूसरे के दर्द ही

अब सभी को भाते हैं।

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गिरेबान में झांककर

नहीं देखते 

अपने काम का किस्सा।

बाज़ार में सजाते नसीहतें

मांगते दाम का हिस्सा।

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अभी लोगों के सामने

सेवक की तरह

हाथ फैलाना है।

फिर तो स्वामी के सामने

लोगों को ही हाथ फैलाना है।

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दिखाने के लिये

दबंगों के बीच

कायदे की जंग है।

सच यह कि

सभी की नीयत में

फायदे के अलग रंग हैं।

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24 फ़रवरी 2017

सिंहासन पर एक नहीं तो दूजा चढ़ेगा-दीपकबापूवाणी (Singhasan par Ek nahin to dooja chadhega-DeepakBapuWani

कलम अब तो चाटुकारों के हाथ में है, गुलाम अर्थ मालिक के साथ में है।
दाम में हंसी न मिले आंसु बिके नहीं, ‘दीपकबापू’ दिल अपने हाथ में है।।

पाने की चाह नहीं थी मोती कहां पाते, लोभ न था दौड़कर कहां जाते।
‘दीपकबापू’ पा लिया मौन का समंदर, जली हुई प्यास लेकर कहां जाते।।
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मौन सदा गूढ़ वक्तव्य नहीं होता, भय से बंद शब्द भव्य नहीं होता।
‘दीपकबापू’ कलुषित भाव छिपे नहीं, शुद्ध हृदय दृश्यव्य नहीं होता।।
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युद्ध देखना है या हाथ से करना है, ढूंढते कहां रक्त का झरना है।
‘दीपकबापू’ बुद्धि ने पाया हिंसक स्वाद, दूसरे के घाव से मन भरना है।।
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सिंहासन पर एक नहीं तो दूजा चढ़ेगा, लालची मान का त्यागी शब्द पढ़ेगा।
‘दीपकबापू’ बिसात पर खेल रहे शतरंज, पिटा वजीर एक कदम नहीं बढ़ेगा।।
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कभी यायावर होने का स्वांग रचते, फिर कभी मायावी महल में नचते।
‘दीपकबापू’ बहुरुपियों के बीच खड़े, अपने ही वास्तविक रूप से बचते।
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अपने स्वाद के लिये लोग बहाने ढूंढते हैं, मन ऊबा नये तराने ढूंढते हैं।
‘दीपकबापू’ खिलौने जैसे सपने संभाले हैं, ज़माने के लिये ताने ढूंढते हैं।।
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दिल बिक जाये तो इंसान क्या चीज है, सभी में कम दौलत की खीज है।
‘दीपकबापू’ छोटा बड़ा नहीं देखते कभी, स्वार्थ का सभी में लगा बीज है।
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बीते बिसारें नहीं आगे की बुहारें नहीं, सुधारक बने अपना चरित्र सुधारें नहीं।
‘दीपकबापू’ किताबों के शीर्षक रटे बैठे, नकली शब्दवीर रोयें कभी हुंकारें नहीं।।
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18 जनवरी 2017

कच्ची बस्तियां और महल-दो हिन्दी हास्य कवितायें (Slum And Palace-Two Hindi comedy Poem)

कच्ची बस्तियों का उजड़ना
महलों का बसना
विकास कहलाता है।

मदारी करता समाजसेवा
बंदरों की जंगह
इंसान नचाकर
दिल बहलाता है।
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विज्ञापन महिमा-हिन्दी व्यंग्य कविता
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विज्ञापन से मूर्ख भी
विद्वान कहलाते हैं।

बिना जंग के
सिंहासन पास लाते हैं।

कहें दीपकबापू
पैसा कमाने के अलावा
किया नहीं जिन्होंने
चंद सिक्के बांटकर 
वह भी महान बन जाते हैं।
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18 नवंबर 2016

अपने घाव कभी दिखाये नहीं-हिन्दी कविता (apne Ghave kaBhi dikhay nahin-Hindi Kavita)

किसी ने सही कहा है-हिन्दी कविता
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अपनी जिंदगी में
जीने का अंदाज
हमारा अलग रहा है।

ज़माना चला जिसके पीछे
हमने बनाई दूरी उससे
तानों को बहुत सहा है।

कहें दीपकबापू पर्यटन में
दिल बहलाकर देखा
अपने घाव कभी दिखाये नहीं
परायों के दर्द को भी
सहलाकर देखा
पाया यही कि
मन चंगा कठौती में गंगा
कवि रैदास ने सही कहा है।
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गरीबों का मसीहा-हिन्दी व्यंग्य कविता
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अपने कपड़े उतरने का
जिनको सता रहा है
वही निर्वस्त्रों का
डर बता रहा है।

कहें दीपकबापू भ्रम में
मत रहना यारों
अमीरों का दलाल है वह
गरीबों का मसीहा होने का
दावा जो जता रहा है।
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29 अक्तूबर 2016

पाकिस्तान के साथ संक्षिप्त युद्ध लंबे समय तक चल सकता है-हिन्दी लेख (Mini War Can till Lenthi Time with Pakistan-Hindi Article


                                     भारत पाकिस्तान सीमा पर चल रहा तनाव लंबा चलने वाला है।  जिस पाकिस्तान का अस्तित्व सत्तर वर्ष से बना हुआ है वह चार पांच दिन में खत्म करना खतरे से खाली भी नहीं है। हमारे यहां एक नेता ने कहा ‘पड़ौसी बदले नहीं जाते। इसका प्रतिवाद तक किसी ने नहीं किया था कि पड़ोसी का मकान खरीद लें तो फिर उसका पड़ौसी खरीददार का पड़ौसी हो जाता है-मतलब पड़ौसी भी बदले जाते हैं।  अब इसका इस्तेमाल अनेक विद्वान भी करने लगे हैं। ऐसा लगता है कि पड़ौसी न बदलने की बात कहने वाले अपने देश को की आर्थिक ताकत को नहीं समझ रहे। अगर पाकिस्तान का पतन हुआ तो हमारे पड़ौसी अफगानितस्तान और ईरान हो जायेंगे।
                पाकिस्तान का निर्माण दो कौमे तो दो राष्ट्र के सिद्धांत पर आधारित है। इा  विचाराधारा का विकास आजादी के बहुत पहले ही हो गया था। विभाजन हुआ पर इस विचाराधारा के पोषक अब भी  भारत में बहुत हैं जो देश के सदियों पुराने निरपेक्ष संस्कृति का दावा तो करते हैं पर पाकिस्तान जो कभी हमारा हिस्सा था यह भूल जाने का नाटक करते हैं-क्योंकि अगर  उन्हें पाकिस्तान की हिन्दूओं के प्रति सहिष्णुता देखने और उस पर बोलने में डर लगता है।  वह अंग्रेजों की खींची गयी लकीर में भारत दर्शन करते हैं और भ्रमित करते हैं।  जैसा कि समाचारों से पता चला है कि पाकिस्तान भारत में ही अनेक बुद्धिजीवियों का प्रायोजन करता है।  हम देखते भी रहे हैं कि कहींे न कहीं पाकिस्तान के शुभचिंत्तक यहां कम नहीं है-जो कभी कभी धमकाते हैं कि यह भारत भी खंड खंड हो सकता है। हम उनको बता देते हैं कि जिस समय 1947 में राष्ट्र बंटा तब भारत की अपनी सेना नहीं थी।  अब भारत दुनियां का एक ताकतवर देश है।  जब तक भारत के रणनीतिकार पाकपरस्तों को लोकतंत्र के नाम पर झेल रहे हैं।  जब सहनशीलता से बाहर हो जायेगा तो वह अन्य उपचार भी कर सकते हैं। अब कोई इंग्लैंड की महारानी या उस समय के सत्तालोलूप नेताओं का समय नहीं है जो देश के टुकड़े कर देगा।  अधिक छोडि़ये कश्मीर का एक इंच जमीन कोई नहीं ले सकता। सब देश लड़ने आ जायें तब भी नहीं-ऐसा तो अब होने से भी रहा।
        इधर हम देख रहे हैं कि कुछ चैनल वाले शहीदों पर विलाप करते हुए लगातार  यह पूछ रहे हैं कि इसका बदला कब लिया जायेगा।  उनका प्रसारण मजाक लगता है।  शहीदों पर बहस करते हैं पर हर मिनट विज्ञापन के लिये अवरोध भी लाते हैं।  अपनी व्यवसायिक लाचारी को वह देशभक्ति तथा जनभावना की आड़ में छिपाने की उनकी चालाकी सभी को दिख रही है। जहां तक पाकिस्तान से निपटने का प्रश्न है। हमारा अनुमान है कि अभी यह संक्षिप्त युद्ध चलता रहेगा।  ईरान और इराक के बीच दस वर्ष तक युद्ध चला था।  अतः ऐसे युद्धों की समय सीमा नहीं होती।  अलबत्ता यह सीमित युद्ध जब तक चलेगा तब तक प्रचार माध्यमों में मुख्य समाचारों में रहेगा। इससे अनेक प्रतिष्ठित लोगों को यह परेशानी आयेगी कि अभी तक जो प्रचार माध्यम उनके हल्के बयानों को भारी महत्व देते हैं वह नहीं हो पायेगा।  इसी बीच भारतीय रणनीतिकार पाक पर विजय या उसके विभाजन से पूर्व यहां उस विचारधारा का प्रवाह भी अवरुद्ध करना चाहेंगेे जिससे आगे कोई खतरा नहीं रहे। हम देख भी रहे हैं कि एक एक कर पाकिस्तान समर्थक उसी तरह सामने आ रहे हैं जैसे राजा जन्मेजय के यज्ञ मेें सांप भस्म होने आ रहे थे। यह देखना दिलचस्प भी है।  हमारा मानना है कि यह निरपेक्ष विचारधारा के नाम पर जो नाटक चलता आया है उसके भारम में खत्म होते ही पाकिस्तान खत्म हो जायेगा। 
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                    दीपावली को देशभक्ति के भाव से जोड़कर रोचक बनाने का प्रयास शायद इसलिये हो रहा है क्योंकि पारिवारिक, सामाजिक तथ आर्थिक दबावों के कारण जनसमुदाय उत्साह से नहीं मना रहा है। मतलब हमें विदेश में अपनी प्रतिष्ठा बढ़ाने के साथ ही आंतरिक राज्य प्रबंध पर भी ध्यान देना होगा जिसमें आर्थिक नीतियां भी शामिल हैं।  क्या दिलचस्प नहंी है एक सड़क पर लगे टोलटेक्स को न्यायालय समाप्त करता है तो प्रचार माध्यम उसे जनता के लिये दिवाली का तोहफा बताते हैं।  यह तोहफा तो सरकारी की तरफ से आना चाहिये था।
मौसम के बदलने, खेतों में आग लगाने तथा दिपावली पर शहरों में सामूहिक रूप से साफ सफाई की वजह से वैसे भी सभी जगह पर्यावरण प्रदूषण बढ़ता है। ऐसे में पटाखों को ही जिम्मेदार मानना क्या ठीक है? जबकि अनेक वाहन तो वैसे भी प्रदूषण फैलाते रहते हैं।

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