2 अगस्त 2016

सम्मान का रस-हिन्दी कविता(Samman Ka Ras-Hindi Kavita)


अच्छा ही हुआ कुदरत ने
इंसान की देह फूलों जैसी
सुुगंधित नहीं बनायी
वरना दुर्गंध बरसाने के लिये
तरसा होता।
जब लगाते होठों से जाम
गला तर करने के लिये
कोई पिलाता नहीं।

जब मांगते रोटी
पेट भरने के लिये
कोई खिलाता नहीं।

कहें दीपकबापू हाथ उठाकर
मांगने वाले कभी बड़े नहीं होते
बिना स्वार्थ के कोई
सम्मान में गर्दन हिलाता नहीं है।
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17 जुलाई 2016

विज्ञापन का झंडा- हिन्दी क्षणिकायें (Vigyapan ka Jahnda-Hindi Short Poem)


खामोश
उसके पीछे क्रांति आ रही है।
पता नहीं क्यों
बूढ़ी तस्वीर के
नई होने की भ्रांति छा रही है।
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उछलकूद करते हुए
पर्दे पर छाये
भ्रम यह कि हम नायक हैं।

पता नहीं उन्हें
वह तो विज्ञापन का
झंडा ढोले वाले सहायक हैं।
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तुम ख्वाब हो
हमेशा बने ही रहना।
मत करना यकीन
कभी हम पर
सच की धारा में
नहीं आता बहना।
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एक दूसरे की नीयत पर
सभी शक करते।
फिर भी अपने नाम
उम्मीद का हक भरते।
लोग वफा बोते नहीं
दूसरा उगाये
डूबने तक इंतजार करते
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अपनी जिद्द से
कभी दुनियां नहीं
बदल पाती।
जिद्द बदलकर देखो
दुनियां की चाल
बदली नज़र आती।
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भूखे का दर्द भूखा
प्यासे का दर्द प्यासा ही
समझ पाता है।

जिसे नहीं अहसास
वह मधुर स्वर में
दर्दीले गीत गाता है।
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अपना सबकुछ लुटाकर भी
किसी इंसान को
खुश नहीं कर पाये।

तब समझना अपनी औकात
उसकी जरूरत के
बराबर नहीं कर पाये।
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8 जुलाई 2016

प्रशंसा पाने की इच्छा-हिन्दी व्यंग्य कविता (Prashansa pane ki iChchha-HindiSatirePoem)


इंसान के हृदय में
प्रशंसा पाने की इच्छा
मसखरा बना देती है।

ज्ञानी दिखने की सोच
किताबों का कीड़ा
बना देती है।

कहें दीपकबापू साधना में
मौन से मिले आनंद
संपति संग्रह की कामना
बकरा बना देती है।
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22 जून 2016

भेड़िये की खाल में शेर-हिन्दी व्यंग्य कविता (Bhed ki Khal meih sher-Hindi Satire Poem)

अपने घर में शेर
शिकार पर बाहर निकले
ढेर हो गये।

पढ़ी चंद किताबे
वह अब मानने लगे कि
सवा सेर हो गये।

कहें दीपकबापू भाग्य का खेल
कहने से गुरेज क्यों करें
काबलियत के पैमाने
भूल गया ज़माना
भेड़िये की खाल में भी
कई शेर हो गये।
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11 जून 2016

किताब और अक्ल-हिन्दी व्यंग्य कविता (Kitab Aur Akla-Hindi Satire poem)

सड़क पर चलना
सीख नहीं पाये
चौपाये पर सवारी कर ली।

सोचना कभी आया नहीं
किताबें पढ़कर ही
अक्ल से यारी कर ली

कहें दीपकबापू अपना भार
जो कभी उठा नहीं सके
 ज़माने के उठाये बोझ से
गर्दन भारी कर ली।
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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

1 जून 2016

हर पल आदमी की नस्ल बदल जाती-दीपकबापूवाणी (aadmi ki Nasla-DeepakbapuWani)

कर्मकांड की गठरी सिर पर रखे हैं, धर्म के पाखंड में हर मिठाई चखे हैं।
‘दीपकबापू’ सर्वशक्तिमान का गायें भजन, मन में स्वाद के कांटे रखे हैं।।
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अपने हिस्से की खुशी उठा लेते हैं, फिर भी आगे के लिये जुटा लेते हैं।
‘दीपकबापू’ मुफ्त का चिराग ढूंढ रहे, अंधेरों में जो सब लुटा देते हैं।।
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मन विज्ञान न जाने भ्रम में अटके हैं, माया ज्ञान बिना लालच में भटके हैं।
‘दीपकबापू’ जुबान में भर लिये शब्द, अर्थ से बेखबर अपमान में लटके हैं।।
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मौके के मेलों में लोगों की भीड़ लगे, मन के बहलने में सब जाते ठगे।
‘दीपकबापू’ एकांत साधना करें नहीं, शोर में करें आशा शायद चेतना जगे।।
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हर पल आदमी की नस्ल बदल जाती, छोटी सोच से याद साथ नहीं आती।
ताकतवर डालें अपने पाप पर परदा, ‘दीपकबापू’ गरीब जुबां बोल नहीं पाती।।
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कोई काम न हो भलाई का व्यापार करें, सेवा का नाम लेकर घर में माल भरें।
‘दीपकबापू’ सजायें बाज़ार में अपनी छवि, विज्ञापन से चमके नाम चिंता न करें।।
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अपने ही मसलों के हल उन्हें नहीं सूझते, बेबसों के लिये वह कहीं भी जूझते।
‘दीपकबापू’ तख्त पाया गज़ब ढाया, अचंभित लोग विकास की पहेली नहीं बूझते।।
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बिना कालापीला किये अमीर नहीं बनते, धरा पर वार बिना शामियाने नहीं तनते।
‘दीपकबापू’ सभी को मान लेते ईमानदार, पकड़े गये चोर नहीं तो साहुकार बनते।।
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बड़े भाग्य माने अगर कोई पूछता नहीं, मुकुटहीन सिर से कोई विरोधी जूझता नहीं।
भीड़ से बेहतर लगे जिंदगी में एकांत, ‘दीपकबापू शोर में श्रेष्ठ विचार सूझता नहीं।।
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पुजते वही छवि जिनकी साफ दिखती, किसी की सोच पर नीयत नहीं टिकती।
‘दीपकबापू’ दौलत के गुलामों की मंडी में, औकात काबलियत से नहीं बिकती।।
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अपना कर्तव्य भूल अधिकार की बात करें, फल चाहें पर दायित्व लेने से डरें।
‘दीपकबापू’ मुख से शब्द बरसायें बेमौसम, दिल में कीचड़ जैसी नीयत धरें।।
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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

16 मई 2016

उनका वचन है-हिन्दी कविता (His Promissh-Poem)

खाली बर्तन में
अन्न भरने का
उनका वचन है।

खाली खजाने में
धन भरने का भी
उनका वचन है।

कहें दीपकबापू वचन से
कभी अमृत 
कभी विष बनता है
स्वार्थ की दृष्टि से
करते उगाही जहां निभाने का
उनका वचन है।
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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

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