18 मई 2013

मैच फिक्सिंग अब भद्र लोगों का काम नहीं रहा-हिन्दी व्यंग्य चिंत्तन (cricket match mein fixing ab bhadrajanon ka khke nahin -hindi satire thought,editorial and lekh)



          क्रिकेट मैचों में फिक्सिंग का मामला का कोई नया नहीं है। अनेक बार बहुत सारे प्रकरण सामने आये पर हुआ कुछ नहीं।  यथावत सब चलता रहा।  कहने को बीसीसीआई और आईसीसीआई की भ्रष्टाचार विरोधी इकाईयां सक्रिय रहती हैं पर फिक्सिंग रुकने का नाम नहीं ले रही।  इस बार मामला थोड़ा अलग है।  अभी तक फिक्सिंग का मामले मैदान से मैदान में रह जाते थे।  मैदान से अगर उठे तो ड्रांइग रूमों तक ही गये।  कभी कोई संवैधानिक जांच एजेंसी सक्रिय रूप से मैच फिक्सिंग रोकने के लिये अवसर नहीं तलाश पायी। यही कारण है कि फिक्सिंग करने वालों को लगा कि वह तो वह श्वेत पर्दे के पीछे ही रहेंगे।  अगर कोई दाग उछला भी तो श्वेत पर्दे पर ही आयेगा।  कभी कोई खाकी वर्दी वाला उनके दरवाजे तक आयेगा इसका डर किसी को नहीं था।  यही कारण है कि काली नीयत और श्वेतवस्त्र धारी बेखौफ मैच फिक्सिंग में लग रहे।  यह  कहना तो कठिन है कि दिल्ली पुलिस की कार्यवाही से आगे मैच फिक्सिंग रुक जायेगी पर इतना तय है कि अब यह कार्य केवल शातिर लोगों के बस का रह जायेगा।  जिस तरह दूसरे अपराधों में हम देखते हैं कि सामान्य मनुष्य अपराधी नहीं करता क्योंकि उसे पुलिस का डर रहता है जबकि शातिर आदमी बैखौफ कर जाता है।
       यह उन तीन युवा खिलाड़ियों को अपना दुर्भाग्य ही मानना चाहिये कि बैखौफ चल रहे मैच फिक्सिंग जैसे अपराध में किसी संवैधानिक जांच एजेंसी के हस्तक्षेप का पहला शिकार बने।  इन तीनों ने पहले किसी खिलाड़ी को इस अपराध में जेल जाते नहीं देखा। किसी खाकी वाले को किसी क्रिकेट खिलाड़ी के घर की चौखट पर डंडा बजाते हुए नहीं सुना। इनकी मासूमियत में कभी खाकी का खौफ नहीं था वरन् श्वेतवस्त्रधारियों का संरक्षण उन्हें देवता के आशीर्वाद की तरह लगता रहा था।  मासूम हमने इसलिये कहा क्योंकि इन तीनों खिलाड़ियों के खाकी वस्त्रधारी सुरक्षाप्रहरियों के सामने बिना किसी प्रयास के सारे राज खोल दिये।  शातिर अपराधियों से पुलिस इतनी आसानी से अपराध नहीं उगलवा पाती।
    इन तीनों खिलाड़ियों की वजह से तनाव झेल रही उनकी टीम के खिलाड़ियों को इनकी गिरफ्तारी के बाद खेले गये मैच में हार का सामना करना पड़ा। अनुभवी लोग उसके खिलाड़ियों के खेल पर इनकी गिरफ्तारी का तनाव साफ देख सकते थे।  बहरहाल इतना तय है कि मैच फिक्सिंग अब इतना आसान नहीं रहने वाला। दूसरी बात यह कि संविधान की सरंक्षक संस्था पुलिस का इसमें हस्तक्षेप हो गया है वह रुकने वाला नहीं है।  इससे मासूम दिल वाले नये  क्रिकेट खिलाड़ी जरूर डरेंगे।
      पुराने क्रिकेट खिलाड़ियों ने पुलिस को स्टेडियम में अपनी रक्षा करते हुए देखा है। उनके लिये वह न तो दर्शक होते हैं न प्रशंसक बल्कि केवल सरकार के वेतन भोगी उनकी सेवा में रत रक्षक होते हैं।  यही भावना नये खिलाड़ियों में घर कर गयी है। जब से देश में आंतकवाद बढ़ा है तब से क्रिकेट मैचों की रक्षा के लिये स्थानीय पुलिस प्राणप्रण से जुट जाती है।  यह अलग बात है कि इन मैचों से पैसा कमाने वाले कुछ लोगों पर आतंकवादियों को भी पैसा देने का संदेह होता है।  विदेशों में बैठे कुछ कथित अपराधियों पर मैच फिक्सिंग यानि सट्टे से पैसा कमाने के साथ ही आतंकवादियों की मदद का भी आरोप की चर्चा अनेक  प्रचार माध्यमोें पर होता रहा है। सच क्या है? यह तो कभी सामने नहीं आया पर इतना तय है कि फिक्सिंग का खेल कोई कमजोर लोगों का काम नहीं रहने वाला है। 
    पहले भी अनेक प्रकरण आये पर कभी उन पर संवैधानिक जांच एजेंसी की वक्र दृष्टि नहीं गयी।  इस बार दिल्ली पुलिस दलबल के साथ मैच फिक्सिंग पकड़ने के लिये जुट गयी। स्थिति यह कि दिल्ली की पुलिस मुंबई से कथित आरोपियों को उठा लायी।  पहले कहा जाता था कि पुलिस की बजाय किसी दूसरी एजेंसी से जांच करायी जाये क्योंकि कोई पुलिस दूसरे राज्य जाकर जांच नहीं कर सकती।  कभी कभी क्रिकेट को नियंत्रित संस्थाओं से ही कहा जाता था कि तुम कुछ करो।  फिर कहा जाता था कि मैच फिक्सिंग रोकने का कोई कानून नहंी है।  इन्हीं बातों से नये लोगों मेें मैच फिक्सिंग करने की प्रवृत्ति बढ़ी हो तो आश्चर्य नहीं समझना चाहिये। दिल्ली पुलिस ने अपने पराक्रम से यह तो बता ही दिया कि यह सब बातें गलत थी।  सट्टेबाजी रोकने के लिये पुलिस के पास कानून है। ठगी रोकने का कानून है।  हालांकि अनेक राज्यों में स्थानीय पुलिस ने मैचों पर सट्टा लगवाने वाले पकड़े हैं पर खिलाड़ियों को पहली बार पकड़ा गया है।  दूसरी बात यह भी थी अभी तक पुलिस अन्य परंपरागत अपराधों से जुझती रही है।  उसे यह मानने में बहुत समय लगा है कि इस तरह मैच फिक्सिंग भी सट्टे जैसा अपराध है जिसमें वह बिना किसी उपरी आदेश के अपना पराक्रम दिखा सकती है।
     अब एक बार अगर इस मामले में दिल्ली पुलिस ने हस्तक्षेप किया है तो उसका प्रभाव  अन्य राज्यों और शहरों की पुलिस की मानसिकता पर भी पड़ेगा।  इसलिये वह अपने रक्षित क्रिकेट खिलाड़ियों पर वह कभी भी वक्र दृष्टि डाल सकती हैं।  अभी तक मामले की जांच चल रही है।  अनेक लोग कह रहे हैं कि इससे मैच फिक्सिंग रुकने वाली नहीं है।  जिस तरह चोर और डकैत पकड़े जाते है और छूटने पर  फिर  उनका काम जारी रहता है पर हमारा सोचना है कि क्रिकेट में ऐसा नहीं होगा।  क्रिकेट भद्रजनों का खेल है। अभी तक मैच फिक्सिंग भी एक भद्र अपराध बना हुआ था मगर पुलिस के हस्तक्षेप ने इसकी परिभाषा बदल दी है।  संभव है कि सटोरिये न माने और नये खिलाड़िायों को अपने मोहरे बनाने का क्रम बनाये रखें। एक दिक्कत उनको आयेगी वह यह कि उन्हें इसके लिये शाातिर और अपराधी दिमाग के खिलाड़ियों को चुनना पड़ेगा।  हर सामान्य क्रिकेट खिलाड़ी इसके लिये तैयार नही होगा।  दूसरी समस्या उन खिलाड़ियों के साथ भी आयेगी जो मैच फिक्सिंग करते हैंे पर पकड़े नहीं जाते।  उनके पास पैसा तो खूब होगा पर चैन की नींद नहीं सो पायेंगे। पुलिस का डर अच्छे खासे की नींद हराम कर देता है।  मैच फिक्सिंग भी नहीं छोड़ पायेंगे क्योंकि उनके आका सटोरिये ऐसा करने नहीं देंगे।
  कुछ विद्वान कह रहे हैं कि कुंऐ में भांग नहीं है बल्कि कुंआ ही भांग वाला है। बहरहाल अब क्रिकेट खिलाड़ियों की मैदान पर हर गतिविधि पर नज़र रखी जायेगी। पुलिस के अनुसार खिलाड़ियों ने सट्टेबाजों के अनुरूप गेंदबाजी करने से पूर्व तौलिया पैंट पर लटकाने, शर्ट को ऊपर नीचे करने तथा हाथ पर हाथ फेरने के संकेत देने की बातें कही थीं।  इससे होगा यह कि कोई किकेट खिलाड़ी अगर कहीं छींक देगा, कभी नाक रगड़ेगा या अपने ही बालों पर हाथ फेरेगा  तो लोग समझेंगे कि अपने आका सटोरिये को संदेश दे रहा है।  पहले फिक्सिंग के आरोपों के कारण हमने क्रिकेट देखना बंद कर दिया था पर अब यह देखने के लिये कभी देखेंगे कि खिलाड़ी कैसे कैसे संकेत बनाता है।  पहले  यह जानकार दुःख हुआ कि हमने फिक्स मैचों को सच समझा पर अब फिक्स मैंचों को देखकर व्यंग्य का आनंद लेंगे।  वैसे भी क्रिकेट मैचों को अब फिल्म की तरह दिखाया जाने लगा है।  ऐसा लगता है कि मैचों के परिणाम की पटकथा लिखी जाती है।  किसी की लिखी पटकथा आनंद उठाने में हर्ज ही क्या है?

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poet-Deepak raj kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर
poet, writer and editor-Deepak 'BharatDeep',Gwalior
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1 मई 2013

धनी लोग अपनी रक्षा का सार समाज की रक्षा में ढूंढें-मज़दूर दिवस पर विशेष हिन्दी लेख (mazddor diwal par special hindi article-dhayni log apni raksha ka saar samaj ke raksha mein hi dhoondhen)



         1 मई को मजदूर दिवस पूरे विश्व में बनाया जाता है। भारत में कार्ल मार्क्स के अनुयायी इससे सार्वजनिक समारोह में उल्लास के साथ मनाते है।  आमतौर से वामपंथी और जनवादी विचारधारा से जुड़े बुद्धिमान लोग आज देश के गरीबों के लिये अनेक प्रकार के आयोजन करते हुए विश्व के पूंजीवाद पर जमकर शाब्दिक हमले करते हैं। चूंकि भारत एक श्रमप्रधान देश है इसलिये यहां कार्लमार्क्स के अनुयायी बुद्धिमानों को बहुत भीड़ देखने और सुनने  मिल जाती है। मूलतः कार्ल मार्क्स विश्व में प्रचलित धर्मों का विरोधी था।  वह कभी भारत नहीं आया इसलिये उसका धार्मिक ज्ञान सीमित था। दूसरी बात यह कि वह अध्यात्मिक ज्ञान और धार्मिक विचारधाराओं के अंतर से वह इतना परिचित नहीं था जितना एक आम भारतीय अध्यात्मिक चिंतक होता है।  उसकी नज़र में धर्म एक अफीम की तरह है जो जमकर नशा देता है पर वह यहीं  जान पाया कि पैसा, पद तथा प्रतिष्ठा का नशा भी कम बुरा नहीं है।
      वैसे तो भारतीय अध्यात्मिक चिंत्तक कार्ल मार्क्स की विचाराधारा को भारत के लिये प्रभावहीन मानते हैं पर श्रमकार्य में रत लोगों के प्रति उनकी सहानुभूति होने के कारण मजदूर दिवस मनाना उनको बुरा नहीं लगता।  दरअसल इस अवसर पर भारतीय अध्यात्म में श्रमजीवी, दरिद्र तथा लाचार मनुष्यों को सहारा देने के जो संदेश दिये गये हैं  इस दिन चर्चा का अच्छा अवसर मिलता है।
        श्रीमद्भागवगत गीता में अकुशल श्रम को हेय मानने वालों को तामस बुद्धि का माना गया है।  अकुशल श्रम  हमेशा ही मजदूर के हिस्से में आता है और उसे हेय मानने का अर्थ है कि व्यक्ति की बुद्धि तामसी है।  श्रीमद्भागवत गीता में यह भी कहा गया है कि दूसरे के रोजगार का हरण करने वाला आसुरी प्रवृत्ति का है।  यह मजदूरों के रोजगार सुरक्षा कें लिये महत्वपूर्ण बात है।  समाज में आर्थिक, राजनीतिक तथा सामाजिक सद्भाव बना रहे इसलिये दान आदि की प्रवृत्ति भी विकसित करने की बात भारतीय अध्यात्मिक दर्शन में कही गयी है। मूल बात यह कही गयी है कि समाज की रक्षा गरीब तबका शारीरिक शक्ति तथा मध्यम वर्ग अपनी बुद्धि से करता है। उच्च वर्ग का यह दायित्व है कि वह इन दोनों वर्गों की रक्षा करे। 

          विदुर नीति में अनेक महत्वपूर्ण बातें कही गयी हैं
                                               ---------------------------
                    सम्पन्नतरमेवाचं दरिद्र भुंजते सदा।
                   क्षुत् स्वादुताँ जनपति सा वाद्वेषु सुदुर्लभा।
                 हिन्दी में भावार्थ-दरिद्र मनुष्य सदा ही स्वादिष्ट भोजन करते हैं क्योंकि भूख उनके भोजन में स्वाद पैदा करती है। ऐसी भूख धनियों के सर्वथा दुर्लभ है।
                    प्रावेण श्रीमतां लोके भोक्तुं शक्तिनं विद्यते।
                  जीर्येन्त्यपि हि काष्ठानि दरिद्राणां महीपते।
                 हिन्दी में भावार्थ- संसार में धनियों में प्रायः भोजन करने की शक्ति नहीं होती परंतु दरिद्र काष्ट तक पचा जाते हैं।
                        ऐश्वमदपापिष्ठा मदाः पानमदादयः।
                   ऐश्वर्यमदत्तो हि नावत्तिवा विबुभ्यते।
                 हिन्दी में भावार्थ-शराब तथा अन्य नशीले पदार्थों से भी नशा पैदा होता है पर उनसे बुरा ऐश्वर्य का नशा है। यह नशा आदमी को पथभ्रष्ट कर ही देता है।
      कहने का अभिप्राय यह है कि हमारा अध्यात्मिक दर्शन समाज के हर वर्ग का दायित्व वैज्ञानिक ढंग से तय करता है। किसी बाहरी विचाराधारा के अनुसरण की आवश्यकता नहीं है।  एक अध्यात्मिक लेखक के रूप में हम कार्ल मार्क्स के प्रयासों की सराहना करते हैं मगर यह मानते हैं कि कहीं न कहीं उनकी विचाराधारा अव्यवाहारिक है। वह मनुष्य की मनोदशा का अध्ययन नहीं करती।  यही कारण है कि उनकी विचाराधारा के कथित अनुसरण करने के नाम पर अनेक देशों में क्रांतियां हुईं पर वहां कोई बेहतर हालात नहीं बने।  जहां पहले धार्मिक ठेकेदार सक्रिय थे वहां कथित रूप से क्रांति के ठेकेदारों ने साम्यवाद का नारा देकर सत्ता हथियाई।  उनमें अनेक राष्ट्र कालांतर में बिखर गये।  सोवियत संघ में तो कार्ल मार्क्स के अनुयायी लेनिन को पहले देवता का दर्जा मिला पर बाद में उनकी मूर्तियां ही तोड़ डाली गयीं।  भारतीय अध्यात्मिक दर्शन के अनुसार मनुष्य देह में अनेक प्रकृतियां विराजमान हैं।  जिनमें अहंकार सबसे महत्वपूर्ण है।  गरीब हो या अमीर उसमें अहंकार होता है। गरीब को अगर कहीं से धन लेना है तो वह गरीब कहलाने को तैयार होता है पर जहां से कुछ न मिले वहां वह कभी गरीब नहीं कहलाना चाहता।  हर मनुष्य अपना  स्वाभिमान बनाये रखना चाहता है।  यही कारण है कि  मजदूरों और गरीबों के नाम पर सत्ता हथियाने वाले अपने पद का अहंकार नहीं छोड़ पाते। उल्टे तानाशाही के चलते उनके ठाटबाट राजाओं से अधिक हो जाते हैं। साम्यवादी विचारक  पारिवारिक संस्कृति के विरोधी माने जाते हैं पर जहां कार्ल मार्क्स के चेलों ने सत्ता हथियाई है वहां वह अपनी ंपारिवारिक  मोह से मुक्त नहीं हो पाये और जिन सार्वजनिक पदों पर स्वयं विराजे वहां अपने बच्चों लाने का प्रयास कर रहे  हैं।  यही इस बात का प्रमाण है कि कार्ल मार्क्स की बातें कहंी न कहीं  मनुष्य के लिये अव्यवहारिक है।  उनकी विचारधारा धरती पर स्वर्ग  लाने के स्वप्न से अधिक नहीं है।
       इसका अर्थ यह कदापि नहीं है कि हम समाज के उच्च वर्ग को अपने दायित्वों से मुक्त करना चाहते हैं। कम से कम कार्ल मार्क्स की इस बात के लिये  प्रशंसा करनी तो चाहिये कि उसे विश्व के मजदूरों और गरीबों में चेतना लाने का काम किया।  भारतीय अध्यात्मिक दर्शन स्पष्ट रूप से यह मानता है कि धर का  बंटवारा समाज में अलग अलग रहेगा तो वह यह भी कहता है कि धनिकों को अपनी रक्षा का सार समाज की रक्षा में ढूंढना चाहिये।  उनके हित श्रमवर्ग के हित में ही अंतर्निहित हैं।  भले ही उच्च वर्ग के लोग गरीब को दान न दें पर उसे अपने परिश्रम का उचित प्रतिफल तथा सम्मान देने के साथ ही उसके लिये रोजगार के अवसर बनाये रखने का प्रयास करें।  ऐसा नहीं करेंगे तो वह स्वतः नष्ट हो जायेंगे। 
       इस मजदूर दिवस के अवसर पर ब्लॉग लेखक मित्रों तथा पाठकोको बधाई।


लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poet-Deepak raj kukreja "Bharatdeep"
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6 अप्रैल 2013

ढहती इमारत लिखती इबारत-हिन्दी लेख (dhahate imarat likhte ibarat-hindi lekh or article)

   मुंबई की एक इमारत ढह गयी।  उसमें अनेक लोग हताहत हुए। आठ मंजिल वाली उस इमारत के ढहने से लोगों का इतनी बड़ी संख्या में हताहत होना हैरान करने वाला है। इस बारे में अनेक जानकारियां प्रचार माध्यमों में देखने को मिली।
     वह इमारत बिना मंजूरी के बनी थी।
     जमीन वन संपदा का भाग थी।
     निवासियों को मकान मुफ्त में इसलिये दिये गये ताकि कभी राज्य की वक्र दृष्टि पड़े तो रिहायशी कहकर उसके कदमों को रोका जा सके। मतलब बेघरों को वस्तु की तरह उपयोग में लाया गया।
    उसमें घटिया लोहा उपयोग में लाया गया।  बुनियाद की लंबाई कम रखी गयी थी।
     इस तरह की अनेक बातें सामने आ रही हैं।  आंकलन करने पर यह समझ में आ रहा है कि उसे जल्दबाजी में लोगों के भले की बजाय जमीन अपने हिस्से में लाने के प्रयास में बनाया गया। अनुमान तो यही किया जा सकता है कि   पहले रिहायशी बनाकर बाद में उसे नियमित कराकर फिर वहीं दूसरी बड़ी इमारत बनाकर अधिक धन बनाने की कोई योजना रही होगी। शायद यही कारण है कि सस्ता ढांचा बनाकर पहले उसमें मजबूर लोग रखे गये।  उन्हें जमीन हथियाने के लिये हथियार बनाया गया।  कुछ लोगों का कहना है कि भारत मनुष्य श्रम निर्यात करने वाला देश है। भारत में मनुष्य श्रम सस्ता तथा सहज सुलभ है। दूसरी बात यह कि यहां गरीबों की संख्या ज्यादा ही है। यही कारण है कि गरीबों के कल्याण का विषय  अत्यंत लोकप्रिय है।  लोग रोटी के लिये मजबूर हैं।  रोटी पाने की लाचारी मन मस्तिष्क कुंद कर देती है। यही कारण है कि गरीबों के कल्याण करने का नारा कहीं भी दिया जाये तो भीड़ खिंची चली आती है।  एक नारा देता है तो भीड़ उसके पास रोटी की तलाश में आ जाती है। वहां खड़े खड़े थक जाती है तो दूसरा नारा लगाता है। फिर वहां चली जाती है।  रोटी के बाद छत पाने की लाचारी भी कम नहीं है। वस्त्र पाना भी कम मजबूरी नहीं है।  ऐसे में अगर कोई मुफ्त रोटी, मकान और कपड़े का नारा दे तो फिर उसके पास लोगों का हुजूम आ ही जाता है।  मनुष्य ही मनुष्य को वस्तु और विषय बनाकर उपयोग करता है।  सीधी बात कहें तो जिसके पास माया है वह मनुष्य है जिसके पास नहीं है वह वस्तु या विषय ही हो सकता है।  वह मायापतियों के लिये क्रय विक्रय की वस्तु या चर्चा का विषय होता है।
          ढहने से पहले वह इमारत उस दृश्य पटल का भाग थी जो हमारे कथित विकास का समग्र रूप है।  जब भारत के विकास की तस्वीर दिखाई जाती है तो अनेक बड़ी इमारतों के दृश्य ही सामने आते हैं।  कोई नहीं देखता कि इन इमारतों में समूचित सामग्री लगायी गयी या नहीं। वह अनुमति प्राप्त है या अवैध!  अनेक बड़े शहर महाबड़े शहर हो गये।  छोटे शहर बड़े हो गये। सभी जगह इमारतों का जंगल बन गया है।  बहुमंजिला इमारतें विकास की ऊंचाई का प्रमाण है। हम यह नहीं कहते कि सारी बहुमंजिला इमारतों में बुरी सामग्री लगी है। न ही यह कहते कि सभी अवैध हैं। सवाल यह है कि यह सब देखने वाला कौन है?  हम उस इमारत को विकास का वास्तविक रूप माने तो देश के भविष्य की भयानक तस्वीर सामने आ रही है।  वह इमारत ढही तो लोग मर गये पर विकास के कथित रूप वाला ढांचा कहंी ढहा तो फिर क्या होगा?  मनुष्य अंततः मनुष्य है।  उसे पशु पक्षियों की तरह समझा जाये या श्रम की वस्तु माना जाये पर उसके आचरण का बहुत महत्व है। यह आचरण भी तब तक ठीक जब तक उसका आर्थिक स्तर ठीक है पर अगर वह बिगड़ा तो उसका मन विषाक्त हो सकता है। तब अपराधो ंका ग्राफ कितना ऊपर जायेग, यह अलग से चिंत्तन का विषय है।   मनुष्य की देह खत्म हो जाये तो ठीक है पर अगर उस देह में मौजूद मन अगर मर गया तो वह हिंसक हो उठता है।  मरे मन वाले मनुष्य और पागल हिंसक पशु में कोई अंतर नहीं रहता।
        तीन माह में बनी इमारत का गिरना केवल उस स्थान की चर्चा का विषय नहीं हो सकता।  प्रचार माध्यम बता रहे हैं कि ऐसे कई स्थान है। यह सारे स्थान हमारे विकास की तस्वीर का हिस्सा हैं।  ऐसे में यह विचार तो उठता ही है कि आखिर हमारे इस विकास का नैतिक आधार कितना मजबूत है? उसमें मनुष्य मन से पैदा कौनसी सामग्री लग रही है? उसके मजबूत होने की कितनी संभावना है?
   आखिरी बात यह कि भौतिक विकास अकेला कुछ नहीं होता। जब तक मनुष्य का अध्यात्मिक विकास न हो वह इस संसार में मजबूती से नहीं रह सकता।  विकास की इमारत की मजबूती का रूप उसके बाहरी आकर्षण से नहीं वरन् आंतरिक ढांचे से है जो किसी को दिखाई नहीं देता पर उसे संभाले रहता है।  उस इमारत के गिरने से हताहत लोगों के दिखाये गये दृश्य अत्यंत डरावने थे।  दिल में इतना दर्द पैदा होता है कि सहानुभूति के लिये शब्द ढंूढना कठिन हो जाता है। एक चार वर्षीय लड़की की आंखों में इतनी धूल थी कि वह उसे खोल नहीं पा रही थी।  तब भगवान से प्रार्थना करने का अलावा चारा भी क्या हो सकता था कि वह उसे जल्दी ठीक करे।  बहरहाल ढहती इमारत बिखरे की विकास की इबारत लिख गयी।     
लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
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11 मार्च 2013

वफा का बाज़ार-हिन्दी शायरी (vafa ka bazar-hindi shayari)


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चेहरे पर होती उनकी मुस्कान
जब वह सामने आते हैं,
यह अलग बात है
मुंह फेरते ही
उनके ख्याल बदल जाते हैं।
कहें दीपक बापू
गिरगिट का रंग बदलना
कुदरत का तोहफा है
क्यों करते हैं
बेवफा इंसानों से तुलना
जो अपनी वफा का सौदा करते हुए
अपनी नीयत बाज़ार में सजाते हैं।


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14 फरवरी 2013

बसंत पंचमी और वेलेंटाईन डे का संगम-हिन्दी सामाजिक लेख (basant panchami aur velantiey day-hindi social article or samajik lekh)

             आज बसंत पंचमी और वेलंटाईन डे एक ही दिन हमारे सामने उपस्थित हैं।  देखा जाये तो दोनों का भाव एक जैसा दिखता है पर यह एक भ्रम है। वेलंटाईन डे यहां दो देहों के आपसी सहृदयता का प्रतीक है वहीं बसंत पंचमी के साथ सामाजिक और अध्यात्मिक भाव भी जुड़े हैं।  देखा जाये तो हमारे देश में कोई पर्व, दिन या दूसरा विषय अध्यात्म से जुड़ा नहीं है तो वह रसहीन है। अध्यात्म का मतलब होता है हमारी देह धारण करने वाला आत्मा।  अब यह कहना कठिन है कि यह हमारी भारतीय भूमि का अन्न, जल और वातावरण की देन है या लोगों के अंदर बरसों से रक्त में प्रवाहित संस्कार का प्रभाव कि यहां अभी भी बिना अध्यात्मिक रस के कोई भी विषय न शोभायमान होता है न स्वादिष्ट।  वेलेंटाईन डे के मनाने वालों को उसका कारण भी नहीं होता। उसकी वह जरूरत भी अनुभव नहीं करते क्योकि शुद्ध रूप से उपभोग पर जब इंद्रियां केंद्रित होती हैं तो आदमी की बुद्धि अध्यात्म से परे हो जाती है।  हमारे बाज़ार तथा प्रचार समूह के प्रबंधकों का मुख्य लक्ष्य युवा पीढ़ी होती है।  फिर जब हमारे देश में  नयी शिक्षा पद्धति में भारत के प्राचीन अध्यात्म ज्ञान शामिल न होने से आधुनिक लोग वैसे भी अपने पुराने इतिहास से दूर हो गये हैं तब उनसे यह आशा करना कि वह बसंत पंचमी के अवसर पर उपभोग के लिये प्रेरित होंगे बेकार है।
      फेसबुक, ट्विटर और ब्लॉग पर वेलेंटाईन डे की धूम है।  कुछ लोग हैं जो उसे नकारते हैं तो कुछ उसे नारियों की रक्षा जैसे विषय से जोड़ते हुए झूमते हैं।  कुछ लोग वेलेंटाईन डे के विरोध में प्रदर्शन करते हुए यह जताते हैं कि वह प्राचीन भारतीय संस्कृति के उपासक हैं।  इससे भी वेलेंटाईन डे को प्रचार में जगह मिलती है।  हमने देखा है कि अगर यह विरोध  न हो तो यह दिन प्रचार माध्यमों में फ्लाप हो जाये।  कभी कभी तो लगता है कि इस दिन के समर्थक और विरोधी सामाजिक कार्यकर्ता आमजन का ध्यान अपनी तरफ खींचने के लिये सड़कों पर आते हैं। खास बात यह है कि वेलेंटाईन डे को बाज़ार और प्रचार समूहों से प्रेरणा की आवश्यकता होती है जबकि बसंत पंचमी का दिन स्वयं ही जनमानस में स्फूर्ति पैदा होती है।  शरद ऋतु के प्रस्थान और ग्रीष्म ऋतु के आगमन के बीच का यह समय बिना प्रयास किये ही देह को आनंद देता है।  सामान्य लोगों के लिये यह दिन जहां खुशी का होता वहीं योग, ध्यान, और ज्ञान साधकों के लिये अपने अभ्यास में सहजता प्रदान करने वाला होता है।  जहां सामान्य व्यक्ति परंपरागत भौतिक साधनों से बसंत पंचमी मनाता है वहीं अध्यात्मिक साधक  अपनी विद्या से मन से मन में ही रमकर आनंद उठाता है।  सच बात तो यह है कि जब इसका अभ्यास हो जाता है तो आनंद हर दिन मिलता है पर किसी खास अवसर पर वह दूना हो जाता है।  हमारी तरफ से बसंत पंचमी की पाठकों और ब्लॉग लेखकों और मित्रों को बधाई।
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26 जनवरी 2013

विचार नहीं विवाद से प्रसिद्ध होता जयपुर का साहित्य सम्मेलन-हिन्दी लेख (vichar nahin vivad se prasiddh hota jaypur ka sahitya sammelan-hindi lekh or article)

        जयपुर में कोई साहित्य सम्मेलन हो रहा है।  यह सम्मेलन पिछली बार भी हुआ था।  आमतौर से हमारे देश में साहित्य सम्मेलन हुआ ही करते हैं।  ऐसे साहित्य सम्मेलन हिन्दी साहित्यकारों की ही देन हैं।  ऐसा लगता है कि साहित्य और कवि सम्मेलन की  पंरपरा हिन्दी भाषा से पनपी है। एक तरह से यह विश्व को हिन्दी भाषी साहित्यकारों और कवियों की ऐसी देन है जिस पर अन्य भाषा के लोग भी चलना चाहेंगे।  हमने हिन्दी के अलावा किसी अन्य भाषा के कवि सम्मेलन या साहित्यकार सम्मेलन नहीं सुने हैं इसलिये ऐसा लिख रहे हैं।  हालांकि हिन्दी भाषा में भी वही साहित्यकार माने जाते हैं,  जिनकी किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं या फिर समाचार पत्र पत्रिका  वगैरह में काम करते हैं।  जो लोग कभी कभार प्रकाशित होते हैं फिल्म में काम करने वाला ऐसे  अतिरिक्त कलाकार की तरह माना जाता है जिसे कहीं बुलाया नहीं जाता। 
       इधर इंटरनेट पर ब्लॉग आ गया है तो हमें अपने बीस ब्लॉग पत्रिका की तरह लगते हैं।  प्रत्येक ब्लॉग में इतनी रचनायें है कि वह एक किताब ही बन गयी है।  यह अलग बात है कि किसी प्रकाशक के अधीन नहीं है। हम जैसे स्वांत लेखक के लिये जहां यह अच्छी बात है वहीं प्रशंसक पाठकों को यह जानकर निराशा भी होती है कि हमारी एक साहित्यकार के रूप में कोई छवि नहीं है।  हम यहां अपने लिये कोई मान्यता नहीं मांग रहे हैं हम तो हिन्दी के कथित कर्णधारों को स्पष्ट बता रहे हैं कि अब इंटरनेट की वजह से अपनी सोच में बदलाव लायें।   हमें न मानो पर ब्लॉग लेखकों को साहित्यकार की तरह समझो।  उन्हें साहित्यकार सम्मेलनों में बुलाओ वरना तुम्हारे साहित्यकार सम्मेलन उपस्थित दर्शक और श्रोताओं के सामने पुरातनपंथी कार्यक्रम लगते हैं।  इंटरनेट पर स्वयं लिखने वाले लोगों को जब आम लोगों के सामने खड़ा करोगे तभी तुम्हारे कार्यक्रमों की छवि बनेगी।
     जयपुर के जिस सम्मेलन की बात हम कर रहे हैं उसमें किसी ब्लॉग साहित्यकार का नाम न देखकर ऐसा लगता है जैसे कि यह कोई भूले बिसरे साहित्यकारों की आपसी उठक बैठक है।  दूसरी बात यह भी पता नहीं चलती कि इस सम्मेलन की प्रमुख भाषा क्या है?  शायद अंग्रेजी  है तभी इंटरनेट के हिन्दी ब्लॉग इस पर कुछ नहीं लिख रहे।  प्रचार माध्यम भी इसकी खबर तभी देते हैं जब वहां से कोई विवादास्पद विषय उठकर सामने आता है।  जहां तक हम समझ पाये हैं वह यह कि यह कुंठित   उलटपंथी साहित्यकारों का सम्मेलन है।  पिछली बार इसमें सलमान रुशदी को बुलाकर विवाद खड़ा किया गया।  इस बार एक  बंगाली साहित्यकारा ने नक्सलादियों के सपने देखने के हक पर बयान देकर सनसनी खेज खबर बनायी तो अब एक महानुभाव ने भ्रष्टाचार में कुछ खास वर्गों के लोगों को जिम्मेदार बताकर बवाल खड़ा कर दिया।  एक महारथी ने तो भारतीय धर्मों को ही कटघरे में खड़ा किया।   ऐसे अजीबोगरीब बयान देखकर लगता नहीं कि ऐसे साहित्यकार कोई विचारवान भी हैं।
           इससे हमें साफ लग रहा है कि पश्चिम बंगाल से अब परायापन अनुभव कर रहे कुछ बुद्धिमान लोगों ने अपना ठिकाना अब जयपुर बना लिया है।   दावा तो यह हो रहा है कि महान साहित्यकारों को वहां बुलाया गया है पर उनके विचार कहीं भी उसका प्रमाण नहीं देते।  आजादी के बाद धनपतियों, पदवानों और प्रचार प्रबंधकों की कृपा से अनेक लिपिकीय नुमा लोग भी प्रतिष्ठित साहित्यकार कहलाने लगे हैं। लिपिकीयनुमा हमने इसलिये कहा क्योंकि किसी कहानी को  जस का तस उठाकर कागज पर रख देना या फुरसत हो तो  उपन्यास ही लिख डालना हमें सहज लगता है।  निष्कर्ष प्रस्तुत करना या कोई संदेश डालने की कला वाला ही हमें लेखक लगता है।
       दूसरी बात हमें यह लगती है कि अगर हम कोई रचना करते हैं तो इस बात का ध्यान रखें कि जो कहें वह अपना मौलिक हो। दूसरे के संदेशों का संवाहक बनने वाला लेखक एक तरह से लिपिक ही होता है। हम अपनी सोच को स्पष्ट रूप से रखें न कि अपने शब्द दूसरे की सोच में खोट निकालने पर खर्च करें।   इतना ही नहीं जिस विषय पर लिखें उसके बारे में हमारी स्वयं की राय स्पष्ट होना चाहिये।  अपने विषय के मूलतत्वों को समझे बिना अपनी राय नहीं रखी जा सकती।  जिन उलटपंथियों ने इस साहित्यकार सम्मेलन में भाग लिया है वह स्पष्ट रूप से भारतीय अध्यात्म के विरोधी हैं।  खासतौर से मनुस्मृति के बारे में उनकी राय अत्यंत नकारात्मक है।  उनका मानना है कि मनुस्मृति निम्न वर्ग और नारियों की विरोधी है।  हम उनकी बात थोड़ी के देर के लिये मान भी लेते हैं पर इससे क्या समूची मनुस्मृति को विस्मृत किया जाये?  उसमें भ्रष्टाचार, धर्म के नाम पर पाखंड और नारियों के प्रति अनाचार की जो निंदा की गयी उस पर यह लोग कभी ध्यान क्यों नहीं देते?
        जयपुर में साहित्य सम्मेलन हो रहा है पर उत्तर भारत में उसको कोई महत्व नहीं दे रहा। यह इस आयोजन का नकारात्मक पक्ष है।  एक आम लेखक के रूप में हम जैसे लेखक अगर इस साहित्य सम्मेलन में अरुचि दिखा रहे हैं तो कहीं न कहीं इसके पीछे आयोजन की पृष्ठभूमि और क्रियाकलाप ही हैं।  आखिरी बात यह है कि भारतीय समाज को समझने के लिये लंबी चौड़ी बहस की आवश्यकता नहीं है।  केवल सांसरिक विषयों की बात करेंगे तो यहां कई कहानियां मिलेंगी। इन कहानियों के पात्रों के चरित्र पर बहस करने से कोई निष्कर्ष नहीं निकलता।  भारतीय समाज को वही समझ सकता है जो यहां के अध्यात्म को जानता है।  देश में गरीबी है पर सारे गरीब भीख नहीं मांगते।  स्त्रियों से अन्याय होता है पर सभी सरेआम रोने नहीं आती।  अमीर अनाचार करते हैं पर सभी क्रूरतम नहीं होते।  भारत में जब तक साहित्य अध्यात्म के पक्ष से नहीं जुड़ेगा तब जनप्रिय नहीं बन पायेगा। ऐसे में जयपुर जैसे साहित्यकार सम्मेलन में भाग ले रहे साहित्यकार  विदेशी विचाराधाराओं से  प्रतिबद्धता के कारण कोई अनोखी  बात नहीं कह पाते।  यही कारण है कि   अपनी किसी सकारात्मक पहल करने की नाकामी के चलते  विवादों की वजह से सम्मेलन को प्रचार दिलाने का एक सोचा समझा प्रयास करते हैं।  बाद में माफी मांगें य मुकरें यह अलग बात है।  यह सोचा समझा रवैया अपनाना साहित्यकार की छवि के प्रतिकूल है।
लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poet-Deepak raj kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर
poet, writer and editor-Deepak 'BharatDeep',Gwalior
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