हर इंसान खड़ा है हाथ में लिए ताज
कोई आकर पहना दे
इस इंतजार में।
विरला ही कोई बेताज बादशाह होता
जो रखता सभी के सिर पर ताज
बिना सौदा किये निकल जाता
हाथ उठाकर कुछ नहीं मांगता
चलता है मस्त हाथी की तरह
इस बाजार में।
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सजे संवरे चेहरे
हाथ में पकड़े हैं ताज।
अपने ही सिर पर पहन लेते हैं
या कर लेते हैं
एक दूसरे के साथ सौदा
चमकाते हैं एक दूसरे का चरित्र
बना लेते हैं कामयाबी का
काल्पनिक चित्र
यही है उनकी मशहूरी का राज।
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धर्म बन गयी है शय-हिंदी व्यंग्य कविता (dharam ban gaye hai shay- vynayga kavita)
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धर्म बन गयी है शय
बेचा जाता है इसे बाज़ार में,
सबसे बड़े सौदागर
पीर कहलाते हैं.
भूख, गरीबी, बेकारी और बीमारी को
सर्वशक्तिमान के तोहफे बताकर
ज़माने को भर...
2 days ago

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