16 नवंबर 2008

कभी वह अच्छा लगा तो कभी बुरा-हिंदी शायरी

एक दिन घूमते हुए उसने
चाय पिलाई तब वह अच्छा लगा
कुछ दिन बाद वह मिला तो
उसने पैसे उधार मांगे तब वह बुरा लगा
फिर एक दिन उसने
बस में साथ सवारी करते हुए
दोनों के लिये टिकिट खरीदा तब अच्छा लगा
कुछ दिन बाद मिलने पर
फिर उधार मांगा
पहली बार उसको दिया उधार पर
फिर भी बहुत बुरा लगा
एक दिन वह घर आया और
सारा पैसा वापस कर गया तब अच्छा लगा
वह एक दिन घर पर
आकर स्कूटर मांग कर ले गया तब बुरा लगा
वापस करने आया तो अच्छा लगा

क्या यह सोचने वाली बात नहीं कि
आदमी कभी बुरा या अच्छा नहीं होता
इसलिये नहीं तय की जा सकती
किसी आदमी के बारे में एक राय
हालातों से चलता है मन
उससे ही उठता बैठता आदमी
कब अच्छा होगा कि बुरा
कहना कठिन है
चलाता है मन उसे जो बहुत चंचल है
जो रात को नींद में भी नहीं सोता
कभी यहां तो कभी वहां लगा

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3 टिप्‍पणियां:

"अर्श" ने कहा…

bahot khub likha hia aapne,umda lekhan hai bahot khub.. wah maza aagaya...dhero badhai aapko..

mehek ने कहा…

bahut sahi kaha ek hi insaan ke bare mein achhe aur bure khayal waqt par nirbhar karte hai,bahut sundar

musafir jat ने कहा…

दीपक जी, ठीक कह रहे हो। आदमी कभी अच्छा या बुरा नहीं होता। हालात ही उसे अच्छा या बुरा बना देते हैं।

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