10 दिसंबर 2008

वह विनाश था-लघु कथा

गरीब किसान अपने खेत में हल जोत रहा था. उसी समय एक खूबसूरत चेहरे वाला सूट-बूट पहने एक शख्स उसके सामने आकर खडा हो गया और बोला-''मैं विकास हूँ और तुम्हें भी विकसित करना चाहता हूँ. यह लो कुछ पैसे और अपनी जमीन मुझे दे दो.
किसान ने कहा-''नहीं, यह मेरे बाप-दादों की जमीन है और मैं इसे किसी को नहीं दे सकता.
विकास ने कहा-''देखो मैं पूरे विश्व में फ़ैल रहा हूँ तुम अपने इलाके को पिछडा क्यों रखा चाहते हो, तुम यह जमीन मुझे दे दो. यहाँ तमाम तरह के कारखाने, इमारत, मनोरंजनालय और तरणताल खुलने वाले हैं. तुम और तुम्हारे बच्चों का भविष्य सुधर जायेगा. उनको नौकरी मिलेगी और उनकी जवानी बहुत ऐसे मजे लेते हुए गुजरेगी जैसी तुमने सोची भी नहीं होगी.

किसान सोच में पढ़ गया तो वह बोला-''सृष्टि का नियम है मैं हर जगह जाता हूँ. अभी तुमसे बडे प्यार से कह रहा हूँ, पैसे भी दे रहा हूँ और नहीं मानोगे तो इससे भी जाओगे और तुम्हारे बच्चों का भविष्य भी नहीं बन पाएगा.यहाँ मेरा आना तय है और उसे तुम रोक नहीं सकते.

किसान ने इधर-उधर देखा और पैसे लेते हुए बोला-अब मैं फिर कब आऊँ आपसे मिलने?''
वह कुटिलता से बोला-''एक साल बाद. अभी तो यह पैसा तुम्हारे पास है, जब यह ख़त्म हो जाये तब आना. यह लो और भी पैसा तुम अपना मकान भी खाली कर दो. मैं तुम्हें एक साल बाद अच्छा मकान भी दूंगा.''

एक साल बाद जब अपने पैसे ख़त्म होने के बाद लौटा तो उसने देखा वहाँ सब बदला हुआ था. वह सब वहाँ वह सब था जो विकास ने उसे बताया था. वह पता करता हुआ उसकी कोठी के पास पहुंचा और दरबान से कहा'-मुझे साहब से मिलना है.''

दरबान ने कहा-साहब से क्या तुम्हारी मुलाक़ात तय है तो दिखाओ कोई कागज़, ऐसे अन्दर नहीं जाने दिया जा सकता.''
इतने में उसने देखा कि कार में वही विकास बैठकर बाहर आ रहा है. जैसे ही कर बाहर आयी वह उसके सामने खडा हो गया. विकास बाहर निकला और चिल्लाया-''तुम्हें मरना है?"
किसान बोला-''आपने मुझे नहीं पहचाना. मैं हूँ किसान. आपको यह जमीन दी थी.''
विकास बोला-तो? मैंने तुम्हें पैसे दिए थे. हट जाओ यहाँ से.'
विकास कार में बैठ गया तो किसान उसकी कार के सामने आने की करने लगा पर वह उसे धकियाते हुए निकला गया. कार के पहिये की चोट खाकर वह किसान गिर पडा. एक आदमी ने आकर उसे उठाया. वह आदमी पायजामा कुर्ता पहने हुए था. उसने रोते हुए किसान को उठाया. किसान ने पूछा-''आप कौन?

उसने कहा-''विकास?'
किसान ने पूछा-'' वह कौन था"
आदमी ने कहा-'विनाश! पर अपना नाम विकास बताता है. मैं तुम्हें अपने घर पहुंचा दूं. तुम्हारी मरहम पट्टी करवा दूं. चिंता न करो मैं पैसे खर्च करूंगा.''
किसान ने कहा-''नहीं मैं खुद चला जाऊंगा.'
किसान वहाँ से चला और कहता जा रहा था''विनाश और विकास'
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1 टिप्पणी:

रवीन्द्र प्रभात ने कहा…

सुंदर अभिव्यक्ति .

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