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12 सितंबर 2013

14 सितम्बर हिन्दी दिवस पर विशेष लेख-राष्ट्रीय एकता में राष्ट्रभाषा का महत्व समझना होगा(14 september hindi diwas-ekta mein rashtrabhasha ka mahatva samjhna hoga)



          14 सितंबर 2014 को हिन्दी दिवस है यह बात मातृभाषा बोलने, लिखने तथा समझने वाले अधिकतर बुद्धिजीवियों को मालुम है।   इस लेखक ने अपने ब्लॉग पर अनेक लेख लिखे हैं इसलिये उन पर अनेक पाठक आ रहे है।  हिन्दी के महत्व शब्द से सर्च इंजिनों पर खोज अधिक होती दिखती है। हिन्दी के महत्व पर लिखे गये एक लेख पर अनेक प्रकार की प्रतिक्रियायें
प्राप्त हो रही हैं। उसमें पुराने लेख परक अक्सर एक शिकायत आती है कि उसमें आपने हिन्दी का महत्व तो बताया ही नहीं।  हमने उनको नजरअंदाज किया पर आज एक प्रतिक्रिंया मिली कि आप राष्ट्रीय एकता के परिप्रेक्ष्य में हिन्दी का महत्व बतायें तो अच्छा रहेगा।  उस पाठक की इस प्रतिकिया ने इस लेख को लिखने की प्रेरणा दी।
                        राष्ट्रीय एकता के संदर्भ में हिन्दी के महत्व का बखान बहुत लोगों ने किया है पर शायद ही कोई यह बता पाया हो कि आखिर राष्ट्रीय एकता की जरूरत किसे और क्यों है? इस एकता की जरूरत समाज को है या व्यक्ति को है? हमारा यह प्रश्न अटपटा जरूर लगता है पर चिंत्तन के संदर्भ में अत्यंत महतवपूर्ण है।  हमारे यह बुद्धिजीवियों का झुण्ड  अब राष्ट्र, प्रदेश, शहर, मोहल्ला, परिवार और व्यक्ति के क्रम में सोचता है और यही कारण है कि वह राजकीय संस्थाओं से ही हिन्दी के विकास का सपना देखता है।  हम व्यक्ति से राष्ट्र के क्रम में सोचते हैं। हमारा मानना है कि व्यक्ति मजबूत हो तो ही राष्ट्र मजबूत हो सकता है।  इस मजबूती को आधार  अपनी भूमि, भाव तथा भाषा के प्रति विश्वास दिखाने और उसे निभाने से ही मिल सकता है।  हम आज देश में अनेक प्रकार के राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक तथा धार्मिक संकटों के आक्रमण का सामना कर रहे हैं।  समाज डोलता दिख रहा है। यही स्थिति हमारी राष्ट्रभाषा की भी है।  हमारा मानना है कि इस संकट का कारण यही है कि हम अपनी भाषा के प्रति उदासीन रवैया अपनाये हुए हैं  हर कोई हिन्दी  के विकास की बात कर  रहा है पर पुरस्कारों तथा सम्मान का मोह ऐसा है कि लोग अपनी भाषा की सच्चाई के प्रति उदासीन है। आखिर हिन्दी के प्रति हमें सतर्क क्यों होना चाहिये। इसी उत्तर की खोज ही राष्ट्रीय एकता में हिन्दी का महत्व सिद्ध कर सकती है।
                        जब तक सरकारी नौकरी ही इस देश में मध्यम वर्ग का आधार था तब सरकारी कामकाज में अंग्रेजी भाषा का वर्चस्व था। उस समय इसकी आलोचना के जवाब में कहा जाता था कि हिन्दी को रोजगारमूलक बनाया जाना चाहिये।  कालांतर में  हिन्दी में कामकाज का प्रभाव बढ़ा। अब मध्यम वर्ग के लिये नोकरियां सरकारी क्षेत्र में कम हैं और निजी क्षेत्र इसके लिये आगे आता जा रहा है।  ले-देकर बात वहीं आकर अटकती है कि वहां हिन्दी वाले को कोई सफेद कॉलर वाली नौकरी नहंी मिल सकती।  यही कारण है कि आज की युवा पीढ़ी जो नौकरी का लक्ष्य लेकर पढ़ रही है वह अंगेजी के साथ आगे बढ़ रही है।  प्रश्न यह है कि क्या वह बिना हिन्दी के कितना आगे बढ़ पायेगी।  एक बात साफ कर दें कि नौकरी में योग्यता एक अलग मायने रखती है।  संभव है कि ग्यारहवीं पास अंग्रेजी न जानने वाला कहीं प्रबंधक बन जाये और उसके नीचे अंग्रेजीदां इंजीनियर काम करें।  प्रबंध कौशल अपने आप में एक अलग विधा है और जिनमें यह गुण है उनके लिये अंग्रेजी कोई मायने नहीं रखती। ऐसे में कहीं अगर किसी संस्थान में शक्ति का कें्रद्र किसी हिन्दी भाषी के पास रहा तो उसे अपनी भाषा में बातकर प्रभावित किया जा सकता हैं। सभी जानते हैं कि भारत में विकास के लिये कभी चाटुकारिता भी करनी होती है जो केवल हिन्दी में सहज हो सकती है।  ऐसे में व्यक्ति को अपनी विकास यात्रा के लिये हिन्दी भाषा न होने या अल्प होने से बाधा लगेगी तो वह क्या करेगा? अगर हिन्दी के सहारे कोई विकास करता है यकीनन वह राष्ट्र का ही कल्याण करेगा! उसका विकास अंततः कहीं न कहंी राष्ट्र के प्रति उसका आत्मविश्वास बढ़ाता है जिससे वह दूसरे लोगों के साथ एक होकर रहना चाहता है। 
                        दूसरी बात यह है कि हमारे देश में समय के साथ राष्ट्रीय स्तर पर इधर से उधर रोजगार के कारण पलायन बहुत  हुआ है। पहले हम अपने देश का मानसिक भूगोल समझें।  हमारा पूर्व क्षेत्र वन के साथ खनिज, पश्चिम उद्योग, उत्तर प्रकृति के साथ ही मनुष्य तथा दक्षिण बौद्धिक संपादा की दृष्टि अत्यंत संपन्न हैं। हम यहां उत्तर की  प्रकृति तथा मनुष्य संपदा की बात करेंगे। दरअसल हमारे उत्तरी मध्य क्षेत्र में कृषि संपदा है तो यहां जनसंख्या घनत्व भी अधिक है।  जहां जहां बौद्धिक रूप से श्रेष्ठता का प्रश्न हों वहां दक्षिणवासी लोगों का  कोई जवाब नहीं तो श्रम का प्रश्न हो तो उत्तर भारतीय लोगों को लोहा माना जाता है। खासतौर से बिहार, उत्तरप्रदेश, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान से श्रम शक्ति पूरे भारत में फैली है। जिस तरह भारत से बाहर गये श्रमशील मनुष्यों ने हिन्दी का विदेश में विस्तार किया वैसे ही इन हिन्दी भाषी श्रमिकों ने भारत के अंदर ही हिन्दी का विस्तार किया है।  यहां यह भी बता दें भारत के बाहर नौकरी के लिये ही अं्रेग्रेजी का महत्व है वरना व्यापार में केवल बुद्धि की ही आवश्यकता होती है।  भारत के अनेक लोग ऐसे भी हैं जो गुलामी के समय में  विदेशों में गये और अंग्रेजी न आने के बावजूद व्यापार किया।  वह सफल और बडे व्यापारी बने।  पंजाब से गये अनेक लोगों ने बिना अंग्रेजी के अपना काम किया। स्थिति यह है कि अनेक लोग तो यह कहने लगे हैं कि विदेशों में कई क्षेत्र ऐसे हैं जहां हिन्दी का प्रभाव साफ दिखता है।  इतना ही नहीं वहां आपसी संपर्क में हिन्दी का महत्वपूर्ण योगदान है।  हम भारत में भी यही देख सकते हैं।  अनेक गैर हिन्दी प्रदेशों में जाने पर वहां हिन्दी में वार्तालाप किया जा सकता है।  कहीं कहीं तो अंग्रेजी का ज्ञान न होने वालेे भी हैं पर हिन्दी में वहां भी काम हो जाता है। सबसे बड़ी बात यह है कि भले ही कोई हिन्दी न जानता हो पर उससे आप अपनी भाषा के कारण आत्मीय का व्यवहार तो पा ही सकते हो जो कि समय पड़ने पर अत्यंत आवश्यक होता है।
            हम देख रहे हैं कि भारत में कंपनियां अपना विस्तार सभी जगह कर रही है। वह चाहें या न चाहें उन्हें शारीरिक काम करने वाले लोगों  की आवश्यकता हो्रती है। तय बात है कि अंग्रेजी वालों में शारीरिक क्षमता अधिक नही हो्रती। अब सिथति यह भी हो सकती है कि कहीं प्रबंधक अंग्रेजीदां है तो बौद्धिक काम वालों को उसे प्रभावित करने के लिये अंग्रेजी का आवश्यकता पड़ सकती है पर अगर कहीं शारीरिक श्रम की बहुलता है तो  प्रबंधक को   भी श्रमिकों से काम लेने के लिये  हिन्दी पूर्णरूपेश आनी ही चाहिये। कहनें का मलब यही है कि पूंजी, श्रम और बुद्धि का तारतम्य अब इस देश में केवल हिन्दी भाषा से जम सकता है। औद्योगिक विकास के लिये तीनों की आवश्यकता होती है।  श्रम शक्ति पर निर्भर रहने वाले पढ़ाई नहीं करते या कम करते हैं उनसे काम लेने के लिये पूंजी और बौद्धिक वर्ग को उसकी भाषा आना चाहिये।
            हमारे कहने का अभिप्राय यह है कि हम जब कृषि पर निर्भर थे तब जितनी हिन्दी भाषा की आवश्यकता थी। उससे ज्यादा अब है।  पूजी, बुद्धि और श्रम का तारतम्य अब हिन्दी के बिना संभव नही है। तय बात है कि जब तीनों के बीच एकरूपता होगी तो उनसे जुड़े तीनों व्यक्तियों को भी उसका प्रतिफल मिलेगा।  तब उनमें स्वयमेव एकता होगी। अगर भाषा संबंधी परेशानी रही तो तो तीनों परेशान होंगे।  अतः उनमें हिन्दी भाषा ही एकता ला सकती है। यहां हम बता दें एकता से हमारा आशय व्यक्तियों की एकता से ही है। खालीपीली राष्ट्रीय एकता का नारा लगाने वालो  में हम नहीं है।  इससे ज्यादा हम राष्ट्रीय एकता पर हम क्या लिखें? वैसे हम लिख तो गये पर यह तय नहीं कर पाये कि हमने हिन्दी का महत्व पूरी तरह से बताया कि नहीं।

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poet-Deepak raj kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर
poet, writer and editor-Deepak 'BharatDeep',Gwalior
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16 जून 2013

रविवार कि व्यवसायिक प्रचार वार-हिन्दी व्यंग्य चिंत्तन (ravivar ki vyavasayik war-hindi vyangya chinttan)



       आधुनिक व्यापार और प्रचार जगत में रविवार एक तरह से व्यवसायिक वार बन गया है।  भले ही सरकारी और गैर सरकारी संस्थाओं के साथ ही अधिकतर संगठित व्यवसायिक तथा औद्योगिक  क्षेत्रों में रविवार को अवकाश रहता है पर उपभोक्ता वस्तुओं के विक्रय केंद्रों में इस दिन लोगों की भारी  भीड़ रहती है।  इसके साथ ही प्रचार माध्यमों पर भी दर्शकों का तांता लगा रहता है। घर में रखे टीवी हों या बाज़ार के फिल्म दर्शन केंद्र दर्शकों का समूह उनके पर्दों को निहारता है।  यही कारण है कि शनिवार शाम से लेकर रविवार रात्रि तक अपने व्यवसायिक  हित साधनो वाले व्यवसायी अपने उत्पादों तथा गतिविधियों को आम लोगों की आंखों में चमकाने के लिये प्रचार माध्यमों में अपने विज्ञापन प्रस्तुत करने के लिये आतुर रहते हैं। आम लोगोें की आंखों तथा कान के माध्यम से वह उनके दिमाग में प्रवेश कर उसकी जेब ढीली करने का प्रयास करते हैं।
     हमने यह भी देखा है कि यह काम केवल प्रत्यक्ष व्यवसायी ही नहीं करते बल्कि अप्रत्यक्ष रूप से आमलोगों की नज़रों में बने रखने के लिये ऐसे लोग भी करते हैं जिनका काम समाज सेवा करना है।  यह तो पता नहीं विदेशों में किस तरह इस रविवार का उपयोग प्रचार दिवस के रूप में होता है या नहीं पर भारत में इसका प्रयास अभी हाल ही में शुरु हुआ है।  राजनीतिक, आर्थिक, कला, पत्रकारिता तथा फिल्म के क्षेत्रों से जुड़े लोगों ने रविवार को आत्म प्रचार के लिये जिस तरह रविवार का दिन चुनना शुरु किया है वह अन्ना हजारे के आंदोलन के दौरान उनके प्रबंधकर्ताओं के कौशल से प्रेरित हुआ लगता है।  अन्ना हजारे ने लंबे समय तक अनशन किया पर शुक्रवार शाम से रविवार शाम तक उनके प्रबंधक इस तरह विषयों का संचालन करते थे कि उनका आंदोलन पूरे दो दिन तक टीवी के पर्दे पर छाया रहता था।  अन्ना हजारे साहब के आंदोलन का परिणाम क्या हुआ, यह अलग से विचार का विषय है पर प्रचार में बने रहने के लिये उनसे जुड़े प्रबंधकों ने जो कार्यशैली अपनाई उसका अनुकरण अब राजनीतिक, आर्थिक, तथा कला से जुड़े लोग कर रहे हैं।  आज का रविवार तो अत्यंत दिलचस्प निकला। एक साथ तीन तीन बड़े राजनीतिक दलों ने क्रम से पर्दे पर अपने अपने शिखर पुरुषों को इस तरह बनाये रखा कि उनके प्रसारण में आपसी टकराव न हो भले ही दलीय रूप से उनमें प्रतिद्वंद्वता हो। इस दौरान एक टीवी उद्घोषक ने इस बार पर हैरानी जताई कि आज रविवार के दिन ही क्या योजनापूर्वक यह सब किया जा रहा है?
  हमें उसके इस मासूम प्रश्न पर हंसी आ गयी। अभी यह प्रयास अधिक दिख रहे हों पर ऐसा पहले हो चुका है।  हालांकि लोकप्रियता के आधार पर अपना काम करने वाले सभी क्षेत्रों के लोगों के ऐसे  प्रयास भी पश्चिम से प्रेरित है।  हमने यह देखा है कि पश्चिमी देशों ने अनेक ऐसी घटनाओं को शनिवार और रविवार के दिन इस तरह प्रस्तुत किया जिससे उनका प्रचार अधिक हो।   भारत में संभवतः अन्ना हजारे के आंदोलन के बाद ही                                               
यह बड़ी शिद्दत के साथ शुरु हुआ। दरअसल जब अन्ना हजारे का आंदोलन थमता था तो प्रचार माध्यमों के प्रबंधकों के साथ समस्या आती थी कि इस तरह का कोई दूसरा घटनाक्रम कब आये जब उनके विज्ञापन का समय सहजता से लंबे समय तक बीत सके।  इधर यह भी देखने में आया कि कुछ संगठन अपने आंदोलनों का दिन भी शनिवार और रविवार को ही चुनते हैं। तय बात है कि जिन लोगों का स्वाभाविक कर्म ही प्रचार के सहारे हैं उन्हें भी यह प्रेरणा मिली होगी कि वह अपने घटनाक्रमों को शनिवार तथा रविवार के दिन योजनापूर्वक बनायें।  यह बुरा प्रयास नहीं है क्योंकि जागरुक लोगों को सामान्य दिनों में घर आकर टीवी खोलने से पहले आराम के दौर से निकलना पड़ता है।  अवकाश के दौरान वह निंरतर जुड़े रहते हैं जिससे उन्हें प्रभावित किया जा सकता है। 
      आज रविवार के दिन शिखर पुरुषों की तीन अलग अलग पत्रकार वार्ताओं के समय इस तरह चुने गये कि एक दूसरे के साथ टकरायें नहीं। देश में अभी लोकसभा चुनावों में एक वर्ष का समय है पर राजनीतिक वातावरण में गर्मी अभी से आ गयी है।  स्वाभाविक रूप से जिन लोगों को अगले चुनावों में सक्रिय भागीदारी करना है वह प्रचार में निरंतर बने रहने के लिये प्रयास करेंगे।  चुनाव लड़ना कोई सरल काम नहीं है।  अकेले पैसा खर्च कर भी चुनाव जीतना संभव नहीं है। इससे पहले आम लोगों में अपनी सक्रियता  दिखानी पड़ती है।  अपने आप को सभ्य तथा सतर्क व्यक्ति साबित करना होता है। यह काम प्रचार से ही संभव है। वह भी एक या दो दिन  बल्कि वर्ष दो वर्ष कभी तीन वर्ष भी इसमें लग सकते हैं।
          इधर हमने क्रिकेट मैचों में भी यह देखा है कि जब किसी प्रतियोगिता में बीसीसीआई की टीम तथा पाकिस्तान आमने सामने होते हैं तब दिन ऐसा ही चुना जाता है कि भारत में अवकाश हो।  यह माना जाता है बीसीसीआई की टीम तथा पाकिस्तान का मैच सबसे महंगा होता है।  अभी चैंपियन ट्राफी में दोनों का मैच शनिवार को हुआ।  इस मैच का महत्व एकदम खत्म हो चुका था। पाकिस्तान की टीम पहले ही अगले दौर से बाहर हो चुकी थी और बीसीसीआई की टीम सभी मैच जीतकर सेमीफायनल के लिये योग्यता प्राप्त कर चुकी थी।  टीवी चैनलों ने इसे महामुकाबला बताने का प्रयास भी नहीं किया।  इस पर बरसात के कारण टुकड़ो टुकड़ों में यह मैचा खेला गया।  मैच छोटा था बड़ा होता तो भी बीसीसीआई का दल ही  जीतता।  दरअसल पाकिस्तान की टीम जितने बुरे दौर में उतना ही आकर्षक रूप बीसीसीआई की टीम का है। बहरहाल मुकाबला आकर्षक नहीं था। खेल भी कोई आकर्षक नहीं हुआ।  जीत भी आकर्षक नहीं रही।  सच बात तो यह है कि पाकिस्तान की टीम का प्रदर्शन इस प्रतियोगिता में इतना निम्न स्तरीय रहा है कि बीसीसीआई की टीम अगर पाकिस्तान से हारती तो शक शुबहे में आ जाती।  वैसे इस प्रतियोगिता में जाने से पहले बीसीसीआई की टीम अत्यंत संदेहों के साथ लेकर गयी है जो निंरतर जीतों से दूर हो गया लगता है पर अगर पाकिस्तान से हारती तो फिर वहीं फिक्सिंग का भूत उसके सामने आ जाता। बहरहाल रविवार को व्यवसायिक वार बना दिया गया है तो उसे बुरा भी नहीं कहा जा सकता।

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
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Gwalior Madhyapradesh
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18 मई 2013

मैच फिक्सिंग अब भद्र लोगों का काम नहीं रहा-हिन्दी व्यंग्य चिंत्तन (cricket match mein fixing ab bhadrajanon ka khke nahin -hindi satire thought,editorial and lekh)



          क्रिकेट मैचों में फिक्सिंग का मामला का कोई नया नहीं है। अनेक बार बहुत सारे प्रकरण सामने आये पर हुआ कुछ नहीं।  यथावत सब चलता रहा।  कहने को बीसीसीआई और आईसीसीआई की भ्रष्टाचार विरोधी इकाईयां सक्रिय रहती हैं पर फिक्सिंग रुकने का नाम नहीं ले रही।  इस बार मामला थोड़ा अलग है।  अभी तक फिक्सिंग का मामले मैदान से मैदान में रह जाते थे।  मैदान से अगर उठे तो ड्रांइग रूमों तक ही गये।  कभी कोई संवैधानिक जांच एजेंसी सक्रिय रूप से मैच फिक्सिंग रोकने के लिये अवसर नहीं तलाश पायी। यही कारण है कि फिक्सिंग करने वालों को लगा कि वह तो वह श्वेत पर्दे के पीछे ही रहेंगे।  अगर कोई दाग उछला भी तो श्वेत पर्दे पर ही आयेगा।  कभी कोई खाकी वर्दी वाला उनके दरवाजे तक आयेगा इसका डर किसी को नहीं था।  यही कारण है कि काली नीयत और श्वेतवस्त्र धारी बेखौफ मैच फिक्सिंग में लग रहे।  यह  कहना तो कठिन है कि दिल्ली पुलिस की कार्यवाही से आगे मैच फिक्सिंग रुक जायेगी पर इतना तय है कि अब यह कार्य केवल शातिर लोगों के बस का रह जायेगा।  जिस तरह दूसरे अपराधों में हम देखते हैं कि सामान्य मनुष्य अपराधी नहीं करता क्योंकि उसे पुलिस का डर रहता है जबकि शातिर आदमी बैखौफ कर जाता है।
       यह उन तीन युवा खिलाड़ियों को अपना दुर्भाग्य ही मानना चाहिये कि बैखौफ चल रहे मैच फिक्सिंग जैसे अपराध में किसी संवैधानिक जांच एजेंसी के हस्तक्षेप का पहला शिकार बने।  इन तीनों ने पहले किसी खिलाड़ी को इस अपराध में जेल जाते नहीं देखा। किसी खाकी वाले को किसी क्रिकेट खिलाड़ी के घर की चौखट पर डंडा बजाते हुए नहीं सुना। इनकी मासूमियत में कभी खाकी का खौफ नहीं था वरन् श्वेतवस्त्रधारियों का संरक्षण उन्हें देवता के आशीर्वाद की तरह लगता रहा था।  मासूम हमने इसलिये कहा क्योंकि इन तीनों खिलाड़ियों के खाकी वस्त्रधारी सुरक्षाप्रहरियों के सामने बिना किसी प्रयास के सारे राज खोल दिये।  शातिर अपराधियों से पुलिस इतनी आसानी से अपराध नहीं उगलवा पाती।
    इन तीनों खिलाड़ियों की वजह से तनाव झेल रही उनकी टीम के खिलाड़ियों को इनकी गिरफ्तारी के बाद खेले गये मैच में हार का सामना करना पड़ा। अनुभवी लोग उसके खिलाड़ियों के खेल पर इनकी गिरफ्तारी का तनाव साफ देख सकते थे।  बहरहाल इतना तय है कि मैच फिक्सिंग अब इतना आसान नहीं रहने वाला। दूसरी बात यह कि संविधान की सरंक्षक संस्था पुलिस का इसमें हस्तक्षेप हो गया है वह रुकने वाला नहीं है।  इससे मासूम दिल वाले नये  क्रिकेट खिलाड़ी जरूर डरेंगे।
      पुराने क्रिकेट खिलाड़ियों ने पुलिस को स्टेडियम में अपनी रक्षा करते हुए देखा है। उनके लिये वह न तो दर्शक होते हैं न प्रशंसक बल्कि केवल सरकार के वेतन भोगी उनकी सेवा में रत रक्षक होते हैं।  यही भावना नये खिलाड़ियों में घर कर गयी है। जब से देश में आंतकवाद बढ़ा है तब से क्रिकेट मैचों की रक्षा के लिये स्थानीय पुलिस प्राणप्रण से जुट जाती है।  यह अलग बात है कि इन मैचों से पैसा कमाने वाले कुछ लोगों पर आतंकवादियों को भी पैसा देने का संदेह होता है।  विदेशों में बैठे कुछ कथित अपराधियों पर मैच फिक्सिंग यानि सट्टे से पैसा कमाने के साथ ही आतंकवादियों की मदद का भी आरोप की चर्चा अनेक  प्रचार माध्यमोें पर होता रहा है। सच क्या है? यह तो कभी सामने नहीं आया पर इतना तय है कि फिक्सिंग का खेल कोई कमजोर लोगों का काम नहीं रहने वाला है। 
    पहले भी अनेक प्रकरण आये पर कभी उन पर संवैधानिक जांच एजेंसी की वक्र दृष्टि नहीं गयी।  इस बार दिल्ली पुलिस दलबल के साथ मैच फिक्सिंग पकड़ने के लिये जुट गयी। स्थिति यह कि दिल्ली की पुलिस मुंबई से कथित आरोपियों को उठा लायी।  पहले कहा जाता था कि पुलिस की बजाय किसी दूसरी एजेंसी से जांच करायी जाये क्योंकि कोई पुलिस दूसरे राज्य जाकर जांच नहीं कर सकती।  कभी कभी क्रिकेट को नियंत्रित संस्थाओं से ही कहा जाता था कि तुम कुछ करो।  फिर कहा जाता था कि मैच फिक्सिंग रोकने का कोई कानून नहंी है।  इन्हीं बातों से नये लोगों मेें मैच फिक्सिंग करने की प्रवृत्ति बढ़ी हो तो आश्चर्य नहीं समझना चाहिये। दिल्ली पुलिस ने अपने पराक्रम से यह तो बता ही दिया कि यह सब बातें गलत थी।  सट्टेबाजी रोकने के लिये पुलिस के पास कानून है। ठगी रोकने का कानून है।  हालांकि अनेक राज्यों में स्थानीय पुलिस ने मैचों पर सट्टा लगवाने वाले पकड़े हैं पर खिलाड़ियों को पहली बार पकड़ा गया है।  दूसरी बात यह भी थी अभी तक पुलिस अन्य परंपरागत अपराधों से जुझती रही है।  उसे यह मानने में बहुत समय लगा है कि इस तरह मैच फिक्सिंग भी सट्टे जैसा अपराध है जिसमें वह बिना किसी उपरी आदेश के अपना पराक्रम दिखा सकती है।
     अब एक बार अगर इस मामले में दिल्ली पुलिस ने हस्तक्षेप किया है तो उसका प्रभाव  अन्य राज्यों और शहरों की पुलिस की मानसिकता पर भी पड़ेगा।  इसलिये वह अपने रक्षित क्रिकेट खिलाड़ियों पर वह कभी भी वक्र दृष्टि डाल सकती हैं।  अभी तक मामले की जांच चल रही है।  अनेक लोग कह रहे हैं कि इससे मैच फिक्सिंग रुकने वाली नहीं है।  जिस तरह चोर और डकैत पकड़े जाते है और छूटने पर  फिर  उनका काम जारी रहता है पर हमारा सोचना है कि क्रिकेट में ऐसा नहीं होगा।  क्रिकेट भद्रजनों का खेल है। अभी तक मैच फिक्सिंग भी एक भद्र अपराध बना हुआ था मगर पुलिस के हस्तक्षेप ने इसकी परिभाषा बदल दी है।  संभव है कि सटोरिये न माने और नये खिलाड़िायों को अपने मोहरे बनाने का क्रम बनाये रखें। एक दिक्कत उनको आयेगी वह यह कि उन्हें इसके लिये शाातिर और अपराधी दिमाग के खिलाड़ियों को चुनना पड़ेगा।  हर सामान्य क्रिकेट खिलाड़ी इसके लिये तैयार नही होगा।  दूसरी समस्या उन खिलाड़ियों के साथ भी आयेगी जो मैच फिक्सिंग करते हैंे पर पकड़े नहीं जाते।  उनके पास पैसा तो खूब होगा पर चैन की नींद नहीं सो पायेंगे। पुलिस का डर अच्छे खासे की नींद हराम कर देता है।  मैच फिक्सिंग भी नहीं छोड़ पायेंगे क्योंकि उनके आका सटोरिये ऐसा करने नहीं देंगे।
  कुछ विद्वान कह रहे हैं कि कुंऐ में भांग नहीं है बल्कि कुंआ ही भांग वाला है। बहरहाल अब क्रिकेट खिलाड़ियों की मैदान पर हर गतिविधि पर नज़र रखी जायेगी। पुलिस के अनुसार खिलाड़ियों ने सट्टेबाजों के अनुरूप गेंदबाजी करने से पूर्व तौलिया पैंट पर लटकाने, शर्ट को ऊपर नीचे करने तथा हाथ पर हाथ फेरने के संकेत देने की बातें कही थीं।  इससे होगा यह कि कोई किकेट खिलाड़ी अगर कहीं छींक देगा, कभी नाक रगड़ेगा या अपने ही बालों पर हाथ फेरेगा  तो लोग समझेंगे कि अपने आका सटोरिये को संदेश दे रहा है।  पहले फिक्सिंग के आरोपों के कारण हमने क्रिकेट देखना बंद कर दिया था पर अब यह देखने के लिये कभी देखेंगे कि खिलाड़ी कैसे कैसे संकेत बनाता है।  पहले  यह जानकार दुःख हुआ कि हमने फिक्स मैचों को सच समझा पर अब फिक्स मैंचों को देखकर व्यंग्य का आनंद लेंगे।  वैसे भी क्रिकेट मैचों को अब फिल्म की तरह दिखाया जाने लगा है।  ऐसा लगता है कि मैचों के परिणाम की पटकथा लिखी जाती है।  किसी की लिखी पटकथा आनंद उठाने में हर्ज ही क्या है?

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poet-Deepak raj kukreja "Bharatdeep"
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1 मई 2013

धनी लोग अपनी रक्षा का सार समाज की रक्षा में ढूंढें-मज़दूर दिवस पर विशेष हिन्दी लेख (mazddor diwal par special hindi article-dhayni log apni raksha ka saar samaj ke raksha mein hi dhoondhen)



         1 मई को मजदूर दिवस पूरे विश्व में बनाया जाता है। भारत में कार्ल मार्क्स के अनुयायी इससे सार्वजनिक समारोह में उल्लास के साथ मनाते है।  आमतौर से वामपंथी और जनवादी विचारधारा से जुड़े बुद्धिमान लोग आज देश के गरीबों के लिये अनेक प्रकार के आयोजन करते हुए विश्व के पूंजीवाद पर जमकर शाब्दिक हमले करते हैं। चूंकि भारत एक श्रमप्रधान देश है इसलिये यहां कार्लमार्क्स के अनुयायी बुद्धिमानों को बहुत भीड़ देखने और सुनने  मिल जाती है। मूलतः कार्ल मार्क्स विश्व में प्रचलित धर्मों का विरोधी था।  वह कभी भारत नहीं आया इसलिये उसका धार्मिक ज्ञान सीमित था। दूसरी बात यह कि वह अध्यात्मिक ज्ञान और धार्मिक विचारधाराओं के अंतर से वह इतना परिचित नहीं था जितना एक आम भारतीय अध्यात्मिक चिंतक होता है।  उसकी नज़र में धर्म एक अफीम की तरह है जो जमकर नशा देता है पर वह यहीं  जान पाया कि पैसा, पद तथा प्रतिष्ठा का नशा भी कम बुरा नहीं है।
      वैसे तो भारतीय अध्यात्मिक चिंत्तक कार्ल मार्क्स की विचाराधारा को भारत के लिये प्रभावहीन मानते हैं पर श्रमकार्य में रत लोगों के प्रति उनकी सहानुभूति होने के कारण मजदूर दिवस मनाना उनको बुरा नहीं लगता।  दरअसल इस अवसर पर भारतीय अध्यात्म में श्रमजीवी, दरिद्र तथा लाचार मनुष्यों को सहारा देने के जो संदेश दिये गये हैं  इस दिन चर्चा का अच्छा अवसर मिलता है।
        श्रीमद्भागवगत गीता में अकुशल श्रम को हेय मानने वालों को तामस बुद्धि का माना गया है।  अकुशल श्रम  हमेशा ही मजदूर के हिस्से में आता है और उसे हेय मानने का अर्थ है कि व्यक्ति की बुद्धि तामसी है।  श्रीमद्भागवत गीता में यह भी कहा गया है कि दूसरे के रोजगार का हरण करने वाला आसुरी प्रवृत्ति का है।  यह मजदूरों के रोजगार सुरक्षा कें लिये महत्वपूर्ण बात है।  समाज में आर्थिक, राजनीतिक तथा सामाजिक सद्भाव बना रहे इसलिये दान आदि की प्रवृत्ति भी विकसित करने की बात भारतीय अध्यात्मिक दर्शन में कही गयी है। मूल बात यह कही गयी है कि समाज की रक्षा गरीब तबका शारीरिक शक्ति तथा मध्यम वर्ग अपनी बुद्धि से करता है। उच्च वर्ग का यह दायित्व है कि वह इन दोनों वर्गों की रक्षा करे। 

          विदुर नीति में अनेक महत्वपूर्ण बातें कही गयी हैं
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                    सम्पन्नतरमेवाचं दरिद्र भुंजते सदा।
                   क्षुत् स्वादुताँ जनपति सा वाद्वेषु सुदुर्लभा।
                 हिन्दी में भावार्थ-दरिद्र मनुष्य सदा ही स्वादिष्ट भोजन करते हैं क्योंकि भूख उनके भोजन में स्वाद पैदा करती है। ऐसी भूख धनियों के सर्वथा दुर्लभ है।
                    प्रावेण श्रीमतां लोके भोक्तुं शक्तिनं विद्यते।
                  जीर्येन्त्यपि हि काष्ठानि दरिद्राणां महीपते।
                 हिन्दी में भावार्थ- संसार में धनियों में प्रायः भोजन करने की शक्ति नहीं होती परंतु दरिद्र काष्ट तक पचा जाते हैं।
                        ऐश्वमदपापिष्ठा मदाः पानमदादयः।
                   ऐश्वर्यमदत्तो हि नावत्तिवा विबुभ्यते।
                 हिन्दी में भावार्थ-शराब तथा अन्य नशीले पदार्थों से भी नशा पैदा होता है पर उनसे बुरा ऐश्वर्य का नशा है। यह नशा आदमी को पथभ्रष्ट कर ही देता है।
      कहने का अभिप्राय यह है कि हमारा अध्यात्मिक दर्शन समाज के हर वर्ग का दायित्व वैज्ञानिक ढंग से तय करता है। किसी बाहरी विचाराधारा के अनुसरण की आवश्यकता नहीं है।  एक अध्यात्मिक लेखक के रूप में हम कार्ल मार्क्स के प्रयासों की सराहना करते हैं मगर यह मानते हैं कि कहीं न कहीं उनकी विचाराधारा अव्यवाहारिक है। वह मनुष्य की मनोदशा का अध्ययन नहीं करती।  यही कारण है कि उनकी विचाराधारा के कथित अनुसरण करने के नाम पर अनेक देशों में क्रांतियां हुईं पर वहां कोई बेहतर हालात नहीं बने।  जहां पहले धार्मिक ठेकेदार सक्रिय थे वहां कथित रूप से क्रांति के ठेकेदारों ने साम्यवाद का नारा देकर सत्ता हथियाई।  उनमें अनेक राष्ट्र कालांतर में बिखर गये।  सोवियत संघ में तो कार्ल मार्क्स के अनुयायी लेनिन को पहले देवता का दर्जा मिला पर बाद में उनकी मूर्तियां ही तोड़ डाली गयीं।  भारतीय अध्यात्मिक दर्शन के अनुसार मनुष्य देह में अनेक प्रकृतियां विराजमान हैं।  जिनमें अहंकार सबसे महत्वपूर्ण है।  गरीब हो या अमीर उसमें अहंकार होता है। गरीब को अगर कहीं से धन लेना है तो वह गरीब कहलाने को तैयार होता है पर जहां से कुछ न मिले वहां वह कभी गरीब नहीं कहलाना चाहता।  हर मनुष्य अपना  स्वाभिमान बनाये रखना चाहता है।  यही कारण है कि  मजदूरों और गरीबों के नाम पर सत्ता हथियाने वाले अपने पद का अहंकार नहीं छोड़ पाते। उल्टे तानाशाही के चलते उनके ठाटबाट राजाओं से अधिक हो जाते हैं। साम्यवादी विचारक  पारिवारिक संस्कृति के विरोधी माने जाते हैं पर जहां कार्ल मार्क्स के चेलों ने सत्ता हथियाई है वहां वह अपनी ंपारिवारिक  मोह से मुक्त नहीं हो पाये और जिन सार्वजनिक पदों पर स्वयं विराजे वहां अपने बच्चों लाने का प्रयास कर रहे  हैं।  यही इस बात का प्रमाण है कि कार्ल मार्क्स की बातें कहंी न कहीं  मनुष्य के लिये अव्यवहारिक है।  उनकी विचारधारा धरती पर स्वर्ग  लाने के स्वप्न से अधिक नहीं है।
       इसका अर्थ यह कदापि नहीं है कि हम समाज के उच्च वर्ग को अपने दायित्वों से मुक्त करना चाहते हैं। कम से कम कार्ल मार्क्स की इस बात के लिये  प्रशंसा करनी तो चाहिये कि उसे विश्व के मजदूरों और गरीबों में चेतना लाने का काम किया।  भारतीय अध्यात्मिक दर्शन स्पष्ट रूप से यह मानता है कि धर का  बंटवारा समाज में अलग अलग रहेगा तो वह यह भी कहता है कि धनिकों को अपनी रक्षा का सार समाज की रक्षा में ढूंढना चाहिये।  उनके हित श्रमवर्ग के हित में ही अंतर्निहित हैं।  भले ही उच्च वर्ग के लोग गरीब को दान न दें पर उसे अपने परिश्रम का उचित प्रतिफल तथा सम्मान देने के साथ ही उसके लिये रोजगार के अवसर बनाये रखने का प्रयास करें।  ऐसा नहीं करेंगे तो वह स्वतः नष्ट हो जायेंगे। 
       इस मजदूर दिवस के अवसर पर ब्लॉग लेखक मित्रों तथा पाठकोको बधाई।


लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poet-Deepak raj kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर
poet, writer and editor-Deepak 'BharatDeep',Gwalior
‘दीपक भारतदीप की हिन्दी-पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
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13 सितंबर 2012

हिन्दी दिवस पर लेख-हिन्दी लेखन में चांटाकार और चाटुकारों का वर्चस्व,hindi diwas par lekh-hindi lekhan mein chantakar aur chutakar ka varchasva)

         14 सितम्बर को हिन्दी दिवस है पर  इसके लिये मनाने वालों को तैयारी करने के लिये विषय सामग्री चाहिये इसलिये उनकी इंटरनेट पर उनकी  सक्रियता 11 से 13 सितम्बर तक बढ़ जाती है। इस ब्लॉग ने पहले के वर्षों में अनेक रचनायें हिन्दी दिवस पर लिखी  इसलिये सर्च इंजिनों से उन पर पाठक आते हैे।  13 सितम्बर को करीब करीब सारे ब्लॉग जमकर पाठक जुटाते हैं।  इस बार चार  ब्लॉग राजलेख की हिन्दी पत्रिका,  दीपक बापू कहिन, हिन्दी पत्रिका तथा अभिव्यक्ति पत्रिका ने जमकर पाठक जुटायें हैं। यह चारों शाइनी स्टेटस के साहित्य वर्ग में अंग्रेजी ब्लॉगों को पछाड़कर क्रमशः एक, तीन, छह जैसे  ऊंचे पायदान पर पहुंच गये हैं।  इस लेखक के ब्लॉग अपने जन्मकाल के बाद 13 सितम्बर 2012 को सर्वोच्च स्तर पर हैं।  इन चारों ब्लॉग के अलावा अन्य 16 ब्लॉग भी अपने पुराने कीर्तिमानों से आगे निकले हैं पर यह चारों ब्लॉग उल्लेखनीय हैं।  तीन ब्लॉग तीन हजार तथा दो ब्लॉग दो हजार के पास जाते दिखते रहे हैं।  इस लेखक के बीस ब्लॉगों पर यह संख्या बीस हजार पार सकती है।
      हम जैसे लेखक के लिये यह स्थिति अब आत्ममुग्धता नहीं लाती।  बल्कि कभी नहीं लाती। आज जो लिखा कल उससे बेहतर लिखने का प्रयास होता है।  पिछले लिखा लेखक उसे दिखातें फिरे यह शुद्ध लेखक का स्वभाव नहीं होता। फिर अनुभव के साथ लिखने के लिये विषय, शैली तथा प्रस्तुति के आयाम बदलते हैं।  इतने सारे पाठकों को देखकर अपने मन में निराशा उत्पन्न होती है कि अपनी ही  रचनायें बेदम नजर आ रही है।  ऐसा लगता नहीं है कि हमारी रचनायें पाठकों को प्रभावित कर सकीं। जब लिखा तब पता नहीं था कि अंतर्जाल पर हिन्दी दिवस के अवसर पर इतने सारे पाठक हमारे ब्लॉग पर आयेंगे।  एक शौकिया लेखक होने के नाते व्यवसायिक कौशल न तो जानते है न ही यह प्रयास रहता है कि कोई सम्मान आदि मिले।
     हमारा मानना है कि अंतर्जाल पर हिन्दी दिवस के अवसर पर इससे ज्यादा बेहतर लिखा जा सकता था।  मुश्किल यह है कि जिन लोगों को अंतर्जाल से आर्थिक लाभ है उनके पास प्रबंधन नहीं है।  यह अकुशल प्रबंधन अर्थशास्त्र की दृष्टि से हमारे देश की बहुत बड़ी समस्या है और हिन्दी लेखन इससे अछूता नहीं है। हमारे देश में कमाने वाले बहुत लोग हैं पर व्यवसायिक प्रवत्तियों का उनमें अभाव है जो कि अकुशल प्रबंधन की समस्या  बने रहने का कारण है।  हिन्दी लेखन में  स्वतंत्रता पूर्वक लिखना एकाकी यात्रा का कारण बनता है हालांकि उच्च कोटि की रचनायें ऐसे ही वातावरण में उत्पन्न  होती हैं।  हिन्दी प्रकाशन संस्थायें, प्रतिष्ठान और समितियां सरकारी पैसे के अनुदान की अपेक्षा करती हैं पर जहां देने की बात आती है वहां चाटुकार लेखक उनके लिये प्रिय होते हैं।  जहां चाटुकारिता है वहां रचनायें व्यक्ति से प्रतिबद्ध हो जाती हैं उस समय लेखक के दृष्टिपथ से आम पाठक गायब हो जाता है।  कुल मिलाकर हिन्दी लेखन जगत चांटाकार और चाटुकार जमात का बंधुआ हो गया है।  चांटाकार से सीधा आशय यह है कि जिसके पास पैसे, पद और प्रतिष्ठा का शिखर है वह किसी को भी लेखक को अपना चाटुकार बनाकर उसे सम्मनित करता है और जो उपेक्षा करे उसे अपमान या उपेक्षा का चांटा मारता है।  समस्या दूसरी यह है कि शुद्ध हिन्दी लेखक अध्यात्मिक रूप से परिपक्व होता है और वह किसी भी शिखर पुरुष का चाटुकार बनने की बजाय उस देव को पूजता है जो सबका दाता है।
       अक्सर लोग इस लेखक से सवाल पूछते हैं कि ‘तुम क्यों लिखते हो? इसका तुम्हें पैसा नहीं मिलता तो क्यों हाथ घिसते हो?
        इसके उत्तर में हम श्रीमद्भागवत गीता का  यह संदेश बताते हैं कि हमारा स्वभाव इसमें हमें लगाये रहता है। हम यह भी कहते हैं कि ‘‘शराब पीने से क्या मिलता है? सिगरेट का धुंआ उड़ाने से क्या मिलता है।  हम व्यसन नहीं पालते इसलिये कुछ न कुछ तो करना ही है। लिखने से बढ़िया और कौनसा ऐसा फालतु काम है जिसमें न पैसा खर्च हो न देह बीमार हो।’’
           इस हिन्दी दिवस पर अनेक बातें मन में आयीं पर उनको लिखने का अवसर तथा समय नहीं मिला।  इसका अफसोस है।  कमबख्त एक बात हमारे दिमाग में आती जाती है कि आखिर हिन्दी का क्या महत्व है इसे कैसे समझायें।  अनेक टिप्पणीकारों ने ‘‘समाज को हिन्दी का महत्व समझना चाहिये’’ इस शीर्षक में लिखी गयी विषय सामग्री से अंसतुष्ट हैं।  वह कहते हैं कि आपने महत्व तो बताया ही नहीं।  एक हास्य कविता पर एक टिप्पणीकार तो लिख गया कि यह बोरियत भरी है।  इन सब पर हमारा आश्वासन है कि अवसर मिला तो अगले हिन्दी दिवस पर कुछ अच्छा लिख कर बतायेंगे।  इधर कंप्यूटर कर रखरखाव और इंटरनेट का खर्च अब असहनीय होता जा रहा है। ऐसे में यह संकट हमारे सामने हैं कि कैसे एक ब्लॉग लेखक के रूप में अपना असितत्व बचायें।  लोग कहते है कि लेपटॉप खरीद लो।  अब इतनी बड़ी रकम इस पुराने शौक पर खर्च कर नहीं सकते।  एक बात तय रही कि अगर हमने ब्लॉग लिखना बंद किया तो सब डीलिट कर देंगे। हम अपना पैसा और श्रम खर्च कर इंटरनेट कंपनियों के ग्राहकों को अपनी मुफ्त सामग्री दे रहे हैं। यह सब टीवी पर विज्ञापनों और कार्यक्रमों पर इतना खर्च कर सकती हैं पर उन हिन्दी लेखकों के लिये उनके पास कुछ नहीं है जो अंततः उनके ग्राहकों को पठनीय सामग्री प्रदान करते हैं।
   फिलहाल हमारी लेखन जारी रखने की योजना है।  अपने प्रायोजक स्वयं हैं।  आगे प्रयास करेंगे कि बेहतर रचनायें हों।  इस हिन्दी दिवस पर समस्त पाठकों को बधाई।  कम से कम उन्होंने आज यह साबित कर दी है कि उनके अंदर भी अपनी मातृभाषा के लिये उमंग हैं यह अलग बात है कि उनके दिल की बात कोई समझा नहीं।  हम जैसे लेखक के लिये एक दिन में बीस हजार से अधिक पाठक कम नहीं होते।  बड़ी बड़ी वेबसाईटें इस आंकड़े को तरसती होंगी। यह अलग बात है कि प्रायोजित वेबसाईटें किसी न किसी तरह से अपने लिये पाठक जुटा लेती हैं पर उनके लिये भी यह आंकड़ा कोई आसान नहीं रहता होगा।  हिन्दी के पाठकों ने हिन्दी दिवस के अवसर पर हमें उनके समकक्ष खड़ा कर दिया यह हमारी नहीं हिन्दी भाषा की ताकत है।  एक दृष्टा होने के नाते हमें यह खेल देखने में भी मजा आता है। यह संदेश भी नोट कर लें कि हिन्दी का महत्व इसलिये है क्योकि इसमें लिखने में मजा आता है। जय श्रीराम जय श्रीकृष्ण।

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
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Gwalior Madhyapradesh

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26 फ़रवरी 2012

भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन रेल की तरह यार्ड में खड़ा है-हिन्दी लेख (bhrashtachar viodhi andolan, anti corrupiton movement a train rail stay in yard-hindi lekh or article)

          अन्ना हज़ारे का आंदोलन बाज़ार और प्रचार प्रबंधकों की सोची समझी योजना का एक भाग है-यह संदेह हमेशा ही अनेक असंगठित स्वतंत्र लेखकों को रहा है। जिस तरह यह आंदोलन केवल अन्ना हजारे जी की गतिविधियों के इर्दगिर्द सिमट गया और कभी धीमे तो कभी तीव्र गति से प्रचार के पर्दे पर दिखता है उससे तो ऐसा लगता है कि जब देश में किसी अन्य चर्चित मुद्दे पर प्रचार माध्यम भुनाने में असफल हो रहे थे तब इस भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन की रूपरेखा इस तरह बनाई कि परेशान हाल लोग कहीं आज के आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक, कला, टीवी तथा फिल्म के शिखर पुरुषों की गतिविधियों से विरक्त न हो जायेे इसलिये उनके सामने एक जननायक प्रस्तुत हो जो वस्तुओं की बिक्री बढ़ाने वाले विज्ञापनों के बीच में रुचिकर सामग्री निर्माण में सहायक हो। हालांकि अब अन्ना हज़ारे साहब का भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन अब जनमानस में अपनी छबि खो चुका है पर देखने वाली बात यह है कि प्रचार माध्यम अब किस तरह इसे नई साज सज्जा के साथ दृश्य पटल पटल पर लाते हैं।
           जब अन्ना हजारे का आंदोलन चरम पर था तब भी हम जैसे स्वतंत्र आम लेखकों के लिये वह संदेह के दायरे में था। यह अलग बात है कि तब शब्दों को दबाकर भाव इस तरह हल्के ढंग से लिखे गये कि उनको समर्थन की आंधी का सामना न करना पड़े। इसके बावजूद कुछ अत्यंत तीक्ष्ण बुद्धि वालों लोगों ने उसे भारी ढंग से लिया और आक्रामक टिप्पणी दी। इससे एक बात तो समझ में आयी कि हिन्दी में गूढ़ विषय को हल्के ढंग से लिखने पर भी यह संतोष मन में नहीं पालना चाहिए कि बच निकले क्योंकि अभी भी कुछ लोग हिन्दी पढ़ने में महारत रखते हैं। अभी अन्ना साहब को कहीं सम्मान मिलने की बात सामने आयी। सम्मान देने वाले कौन है? तय बात है कि बाज़ार और प्रचार शिखर पुरुषों के बिना यह संभव नहीं है। इसे लेकर कुछ लोग अन्ना हजारे के आंदोलन के प्रायोजित होने का प्रमाण मान रहे तो उनके समर्थकों का मानना है कि इससे- क्या फर्क पड़ता है कि उनके आंदोलन और अब सम्मान के लिये पैसा कहां से आया? मूल बात तो यह है कि हम उनके विचारों से सहमत हैं।
             हमारी बात यहीं से शुरु होती है। कार्ल मार्क्स सारे संसार को स्वर्ग बनाना चाहते थे तो गांधी जी सारे विश्व में अहिंसक मनुष्य देखना चाहते थे-यह दोनों अच्छे विचार है पर उनसे सहमत होने का कोई अर्थ नहीं है क्योंकि इन विचारों को वास्तविक धरातल क्रियाशील होते नहीं देखा गया। भ्रष्टाचार पर इंटरनेट पर हम जैसे लेखकों ने कड़ी हास्य कवितायें तो अन्ना हजारे के आंदोलन से पहले ही लिख ली थीं पर उनसे कोई इसलिये सहमत नहीं हो सकता था क्योंकि संगठित बाज़ार और प्रचार समूहों के लिये फोकटिया लेखक और समाजसेवक के प्रयास कोई मायने नहीं रखते। उनके लिये वही लेखक और समाजसेवक विषय वस्तु बन सकता है जिसे धनोपार्जन करना आता हो। सम्म्मान के रूप में भारी धनराशि देकर कोई किसी लेखक को धनी नहीं बनाता न समाज सेवक को सक्रिय कर सकता है। वैसे भी कहा जाता है कि जिस तरह हम लोग कूड़े के डिब्बे में कूड़ा डालते हैं वैसे ही सर्वशक्तिमान भी धनियों के यहां धन बरसाता है। स्वांत सुखाय लेखकों और समाजसेवकों को यह कहावत गांठ बांधकर रखना चाहिए ताकि कभी मानसिक तनाव न हो।
           उत्तर प्रदेश में चुनाव चल रहे हैं। विज्ञापनों के बीच में प्रसारण के लिये समाचार और चर्चा प्रसारित करने के लिये बहुत सारी सामग्री है। ऐसे में प्रचार समूहों को किसी ऐसे विषय की आवश्यकता नही है जो उनको कमाई करा सके। यही कारण है कि अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन को वैसे ही यार्ड में सफाई आदि के लिये डालकर रखा गया है कि जब प्लेटफार्म पर कोइ गाड़ी नहीं होगी तब इसे रवाना किया जायेगा। यह गाड़ी प्लेटफार्म पर आयेगी इसकी यदाकदा घोषणा होती रहती है ताकि उसमें यात्रा करने वाले यात्री आशा बांधे रहें-यदा कदा अन्ना हजारे साहब के इस अस्पताल से उस अस्पताल जाने अथवा उनकी अपने चेलों से मुलाकात प्रसारित इसी अंदाज में किये जाते हैं। ऐसा जवाब हमने अपने उस मित्र को दिया था जो अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन की स्थिति का आंकलन प्रस्तुत करने को कह रहा था।
लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर 
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25 जनवरी 2012

गणतंत्र एक भ्रम-हिन्दी लेख (gantantra or republic or democracy a confusion-hindi article on republic day or 26 janwary or 26 january)

         गणतंत्र एक शब्द है जिसका आशय लिया जाये तो मनुष्यों के एक ऐसे समूह का दृश्य सामने आता है जो उनको नियमबद्ध होकर चलने के लिये प्रेरित करता है। न चलने पर वह उनको दंड देने का अधिकार भी वही रखता है। इसी गणतंत्र को लोकतंत्र भी कहा जाता है। आधुनिक लोकतंत्र में लोगों पर शासन उनके चुने हुए प्रतिनिधि ही करते हैं। पहले राजशाही प्रचलन में थी। उस समय राजा के व्यक्तिगत रूप से बेहतर होने या न होने का परिणाम और दुष्परिणाम जनता को भोगना पड़ता था। विश्व इतिहास में ऐसे अनेक राजा महाराज हुए जिन्होंने बेहतर होने की वजह से देवत्व का दर्जा पाया तो अनेक ऐसे भी हुए जिनकी तुलना राक्षसों से की जाती है। कुछ सामान्य राजा भी हुए। आधुनिक लेाकतंत्र का जनक ब्रिटेन माना जाता है यह अलग बात है कि वहां प्रतीक रूप से राजशाही आज भी बरकरार है।
          मूल बात यह है कि हम गणतंत्र में मनुष्य समुदाय पर एक नियमबद्ध संस्था शासन के रूप में रखते हैं। विश्व के जीवों में एक मनुष्य ही ऐसा है जिसे राज्य व्यवस्था की आवश्यकता है। इसकी वजह साफ है कि सबसे अधिक बुद्धिमान होने के कारण उसके ही अनियंत्रित होने की संभावना भी अधिक रहती है। माना जाता है कि राज्य ही मनुष्य का नियंता है जिसके बिना वह पशु की तरह व्यवहार कर सकता है। राज्य करना मनुष्य की प्रवृत्ति भी है। उसमें अहंकार का भाव विद्यमान रहता है। सभी मनुष्य एक दूसरे से श्रेष्ठ दिखना चाहते हैं और राज्य व्यवस्था के प्रमुख होने पर उनको यह सुखद अनुभूति स्वतः प्राप्त होती है। जिन लोगों को प्रमुख पद नहीं मिलता वह छोटे पद पर बैठकर बाकी छोटे लोगों को अपने दंड से शासित करते है। इस तरह यह क्रम नीचे तक चला आता है। वहां तक जहां से आम इंसान की पंक्ति प्रारंभ होती है। इस पंक्ति के ऊपर बैठा हर शख्स अपने श्रेष्ठ होने की अनुभूति से प्रसन्न है पर साथ ही अपने से ऊपर बैठे आदमी की श्रेष्ठता पाने का सपना भी उसमें रहता है। इस तरह यह चक्र चलता है। जो राज्य व्यवस्था से नहीं जुड़े वह भी कहीं न कहीं अपनी श्रेष्ठता दिखाने के व्यसन में लिप्त हैं।
          राज्य कर्म अंततः राजस भाव की उपज है। उसमें सात्विकता बस इतनी ही हो सकती है जितना आटे में नमक! इससे अधिक की अपेक्षा अज्ञान का प्रमाण है। राज्य कर्म में ईमानदारी एक शर्त है पर उसे न मानना भी एक कूटनीति है। प्रजा हित आवश्यक है पर अपनी सत्ता बने रहने की शर्त उसमें जोड़ना आवश्यक है। अकुशल राज्य प्रबंधकों के के लिये ईमानदारी और प्रजा हित अंततः गौण हो जाते हैं। राज्य कर्म में एक सीमा तक ही सत्य भाषण, धर्म के प्रति निष्ठा और दयाभाव दिखाया जा सकता है। छल, कपट, प्रपंच तथा क्रूर प्रदर्शन राज्य कर्म करने वालों की शक्ति का प्रमाण बनता है। वह ऐसा न करें तो उनको सम्मान नहीं मिल सकता। न्याय के सिद्धांत सुविधानुसार चाहे जब बदले जा सकते हैं।
         सभी राजस कर्म करने वाले असात्विक हैं यह मानना ठीक नहीं है पर इतना तय है कि उनमें एक बहुत वर्ग ऐसे लोगों का रहता है जो अपने लाभ के लिये इसमें लिप्त होते हैं जिसे राजस भाव माना जाता है। आज के समय में तो राजनीति एक व्यवसाय बन गया है। यह अलग बात है कि भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान से परे बुद्धिमान लोग उसमें सत्य, अहिंसा तथा दया के भाव ढूंढना चाहते है।
           विश्व में अधिकतर लोग चाहते हैं कि उन्हें राजसुख न मिल पाये तो उनकी संतान को प्राप्त हो। राजसुख क्या है? यह सभी जानते हैं। दूसरे पर हमारा नियम चले पर हम पर कोई नियम बंधन न हो! लोग हमारी माने पर हम किसी की न सुने। किसी में हमारी आलोचना की हिम्मत न हो। बस हमारी पूजा भगवान की तरह हो। इसी भाव ने राज्य व्यवस्था को महत्वपूर्ण बना दिया है।
           राज्य संकट पड़ने पर प्रजा की मदद करता है। गणतंत्र का मूल सिद्धांत है पर यह एक तरह का भ्रम भी है। प्रजा कोई इकाई नहीं बल्कि कई मनुष्य इकाईयेां का समूह है। मनुष्य अपने कर्म के अनुसार फल भोगता है। वह इंद्रियों से जैसे दृश्य चक्षुओं से, सुर कर्णों से, भोजन मुख से तथा सुगंध नासिका से ग्रहण करने के साथ ही अपने हाथ से जिन वस्तुओं का स्पर्श करता है वैसी ही अभिव्यक्ति उसकी इन्हीं इद्रियों से प्रकट होती है। विषैले विषयों से संपर्क करने वालों से अमृतमय व्यवहार की अपेक्षा केवल अपने दिल को दिलासा देने के लिये ही है। मनुष्य को अपना जीवन संघर्ष अकेले ही करना है। ऐसे में वह अपने साथ गणसमूह और उसके तंत्र के साथ होने का भ्रम पाल सकता है पर वास्तव में ऐसा होता नहीं है।
       उससे बड़ा भ्रम तो यह है कि गणतंत्र हम चला रहे हैं। धन, पद और अर्थ के शिखर पुरुषों का समूह गणतंत्र को अपने अनुसार प्रभावितकरते हैं जबकि आम इंसान केवल शासित है। वह इस गणतंत्र का प्रयोक्ता है न कि स्वामी। स्वामित्व का भ्रम है जिसमें जिंदा रहना भी आवश्यक है। अगर आदमी को अकेले होने के सत्य का अहसास हो तो वह कभी इस भ्रामक गणतंत्र की संगत न करे। जिनको पता है वह सात्विक भाव से रहते हैं क्योंकि जानते हैं कि सहनशीलता, सरलता और कर्तव्यनिष्ठ से ही वह अपना जीवन संवार सकते हैं। जिनको नहीं है वह आक्रामक ढंग से अभिव्यक्त होते है। वह अनावश्यक रूप से बहसें करते है। वाद विवाद करते हैं। निरर्थक संवादों से गणतंत्र को स्वयं से संचालित होने का यह भ्रम हम अनेक लोगों में देख सकते है।
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1 जनवरी 2012

सन् 2011 में छाये रहे अन्ना हजारे और भ्रष्टाचार, नववर्ष में क्या होगा-हिन्दी लेख (varsh 2011 mein anna aur bhrashtacha chhaya raha, naye varsh mein kya hoga-hindi lekh or article)

             इस वर्ष अगर राजनीतिक और खबरों का आंकलन किया जाये तो यकीनन अन्ना हजारे और उनका भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन टीवी चैनलों, समाचार पत्रों तथा इंटरनेट पर छाया रहा। चूंकि प्रचार माध्यमों के प्रकाशनों और प्रसारणों में सब तरह का मसाला बनाकर प्रस्तुत किया जाता है। इसलिये कभी गंभीर चिंत्तन तो कभी तनाव पूर्ण विवाद तो कभी हास्य व्यंग्य का मिश्रण भी शामिल रहा। हालांकि ऐसे में हम लोगों के लिये केवल देश में व्याप्त भ्रष्टाचार ही चिंत्तन का विषय रहा। यह अलग बात है कि जो बहसें देखी उनमें केवल सतही सोच दिखाई दी। आक्षेपों और हास्य टिप्पणियों ने एक तरह से हमारा मन ही खट्टा किया। हम चाहते थे कि देश में व्याप्त भ्रष्टाचार पर गंभीर मंथन हो न कि व्यक्तिगत आक्षेपों या मजाक में समय बरबाद हो। मगर यह हम जैसे फोकटिया लेखकों के सोचने से क्या होता है? व्यवसायिक लोग जहां चाहे सार्वजनिक बहसों को ले जा सकते हैं।
                    वर्ष के आखिर में हमने इस पर दो लेख लिखे पर लगता नहीं है कि हम अपनी बात पूरी कह पाये। लोकपाल और जनलोकपाल के मध्य द्वंद्व भले ही चलता रहा हो पर हमारी नज़र इस बात पर अधिक रही है कि क्या वाकई समाज इस बात के लिये तैयार है कि वह भ्रष्टाचार व्यवस्था चाहता है। हमें लगता नहीं है कि समाज में कोई गंभीर हलचल है। राज्य व्यवस्था का हर कोई उपयोग अपने हित में करना चाहता है और यही भ्रष्टाचार की जड़ है और इससे आम जनमानस अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकता। जिस तरह पर बहस चल रही है उसमें हम जैसे चिंत्तक फिट भी नहीं बैठ सकते क्योंकि व्यवसायिक बुद्धिजीवियों का वर्ग केवल अपने तयशुदा विचार पर ही निर्णय करना चाहता है। नयी बात उसे मूर्खतापूर्ण या अप्रासंगिक लगती है। बहरहाल हमारे दोनों लेख यहां प्रस्तुत हैं।

                ईसवी संवत 2011 समाप्त  होकर  ही 2012 प्रारंभ हो गया  है। आमतौर से आधुनिक शिक्षा पद्धति से परे रहने वाले आम भारतीय जनमानस के लिये 31 दिसम्बर तथा 1 जनवरी यह पुराना साल समाप्त तथा नया साल प्रारंभ होने का समय नहीं होता। भारतीय संवत अप्रैल या मार्च में प्रारंभ होता है। इतना ही नही भारत के बजट का वर्ष भी 1 अप्रैल से 31 मार्च को होता है। अलबत्ता बाज़ार तथा प्रचार समूहो  ने अपनी कमाई के लिये 1 जनवरी से नववर्ष प्रारंभ होने के तिथि को इस तरह समाज में स्थापित कर लिया है कि पुरानी, मध्यम तथा नयी पीढ़ी की शहरी पीढ़ी इसके जाल में फंसी हुई है। पहले होता था ‘नववर्ष की बधाई’ और अब हो गया ‘हैप्पी न्यू ईयर’।
       बहरहाल पिछले साल की खबरें, फिल्में, गीत, और समाचारों का पुलिंदा लेकर प्रचार माध्यम हाजिर हैं। हमें यह सब नहीं दिखाई देता। हमें दिखाई देता है भ्रष्टाचार का भूत! इस भूत ने हमारे समाज का वर्ष में से नौ महीने तक पीछा किया है। लग रहा है कि अगले वर्ष का प्रारंभ भी नायक अन्ना हजारे और खलनायक भ्रष्टाचार ही करेगा। आखिर हमने यह दावा किस आधार पर किया। दरअसल हमारे बीस ब्लॉग पिछले छह वर्ष से चल रहे हैं पर भ्रष्टाचार शब्द से इस बार सर्च इंजिनों में जितने ढूंढे गये उतना पिछले सालों में नहीं दिखाई दिया। इतना ही नहीं अन्ना हजारे के नाम से लिखे गये शीर्षक वाले पाठों के ब्लॉगों ने भी अधिक से अधिक पाठक जुटाये। अप्रैल 2011 से पहले भ्रष्टाचार पर लिखी गयी कविताओं तथा लेखों ने इसयिल लोकप्रियता पायी। हम अगर अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन को एक वाक्य में सफल बताना चाहें तो वह यह कि उन्होंने भारत में फैले भ्रष्टाचार का अंतर्राष्ट्रीयकरण करने में योगदान दिया।
           अन्ना हजारे 74 वर्ष के हैं। आयु की दृष्टि से उनका सम्मान होना चाहिए पर अपने आंदोलन की वजह से उनको अपमान भी झेलना पड़ा। इसके लिये उनके विरोधियों को नहीं बल्कि उनके समर्थकों को भी कम दोषी नहीं माना जा सकता जिन्होंने उनकी आयु की आड़ में अपने स्वार्थों के तीर चलाने के प्रयास किये।
वर्ष के पूरे नौ महीने तक जो आदमी भारतीय जनमानस पर छाया रहा वह वास्तव में नायक कहने योग्य है। यह अलग बात है कि कह कोई नहीं रहा। वर्ष के सबसे बुरी तरह से फ्लाप फिल्म रावन का नायक रहा। यह बात भी कोई नहीं कह नहीं रहा।
           उस दिन हमारे हम अपने एक मित्र से पहुंचने उसके घर पहुंचे। हमारे मित्र का लड़का रावन पिक्चर देखने मॉल में जा रहा था। हमारे मित्र ने उससे कहा ‘‘तुम्हारे यह अंकल कह रहे हैं कि रावन फिल्म फ्लॉप हो गयी है। हमने भी अपनी जवानी में फिल्में देखी हैं पर वही जो हिट होती थीं। तुम क्यो फ्लॉप रावन फिल्म देखने जाकर अपने घर की परंपरा और इज्जत का फालूदा बना रहे हो?
         पुत्र ने पूछा-‘‘अभी फिल्म आये तीन दिन हुए है तो उसे फ्लाप कैसे कह सकते है?’’
हमारे मित्र ने कहा-’’अंकल इंटरनेट पर सक्रिय रहते हैं और वहां ऐसा ही आंकलन प्रस्तुत किया गया होगा। तभी तो कह रहे हैं!’’
        पुत्र ने उनकी बात नहीं सुनी। तीन दिन बार हमारे मित्र बता रहा था कि उसके पुत्र को हमारी बात न मानने का मलाल था।
        देश की आज़ादी से पहले से यहां ऐसा तंत्र विकसित हो गया था जो यहां के जनमानस को बहलाफुसला कर बाज़ार के अनुकूल चलाने का अभ्यस्त था और उसने प्रचारतंत्र को भी वैसा ही बनाया। इस तरह भारतीय जनमानस भले ही अंग्रेजों के राजतंत्र से मुक्त हो गया पर उनके स्थापित व्यवस्था तंत्र के पंजों में अभी तक है। इतना ही नहीं आधुनिक शिक्षा से प्रशिक्षित अनेक लोग संस्कार और ंसस्कृति के नाम पर समाज को बचाने की बात तो करते हैं पर व्यवस्था की कार्यशैली बदलने की बात वह भी नहीं सोच पाते।         
            देश में भ्रष्टाचार आजादी के बाद से तेजी से पनपा है। अनेक लोग इससे जूड़ते हुए तो अनेक शिकार होते हुए अपना जीवन गंवा चुके हैं। जिनके पास राज्य की हल्दी सी गांठ है वह चूहा भी अपने आपको राजा से कम नहीं समझता। जहां जनता को सुविधा देने की बात आती है वहां राज्य के अधिकारों की बात चली आती है। प्रजा के लिये सुविधा पाना अधिकार नहीं बल्कि वह दे या न दे राज्य के अधिकार की बात हो गयी है। आम आदमी की भ्रष्टाचार से जो पीड़ा है उसका बयान सभी करते हैं पर हल कोई नहीं जानता। भ्रष्टाचार की पीड़ा को अन्ना साहेब के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन पूरे विश्व के सामने जाहिर किया पर इससे वह कम नहीं हो गयी। यही कारण है कि इस वर्ष भ्रष्टाचार और अन्ना साहेब ने इंटरनेट पर ढेर सारी खोज पायी। रावन फिल्म फ्लाप हो गयी इसलिये उसे खोज में जगह अधिक नहीं मिली पर दीवाली पर रावन शब्द भी खूब खोजा जाता है। पुराने ईसवी संवत् की विदाई पर बस इतना ही।
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अन्ना हजारे (अण्णा हज़ारे) के लिये आत्ममंथन का समय-हिन्दी लेख (anna hazare ke liye atmamanthan sa samay-hindi lekh or article)

           अन्ना हज़ारे ने अपना अनशन तथा जेलभरो आंदोलन फिलहाल स्थगित कर अच्छा ही किया है। जब हम अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन की बात करते हैं तो उसके राजनीतिक पक्ष की चर्चा अधिक होती है और सामाजिक पक्ष पीछे रह जाता है। हमने जब भी इस पर लिखा है सामाजिक पक्ष को अधिक छूने का प्रयास किया है। एक बात के लिये यह आंदोलन हमेशा याद रखा जायेगा कि इसने संपूर्ण देश के समस्त समाजों के सभी लोगों को चिंत्तन और मनन के विवश किया। मूल प्रश्न भ्रष्टाचार से जुड़ा होने के बावजूद ऐसे अनेक विषय हैं-जिनका संबंध कहीं न कहीं उससे है-जिन पर चर्चा हुई। जब हम भ्रष्टाचार की बात करते हैं तो आमतौर से सरकारी क्षेत्र के भ्रष्टाचार की बात होती है पर उद्योग, व्यापार, कला, तथा धर्म के क्षेत्र के कदाचार छिप जाता है। संभव है हम जैसे चिंतकों के इस मत से कम ही लोग सहमत होंगे कि हमारे समाज का यह सामान्य दृष्टिकोण ही ऐसे भ्रष्टाचार के लिये जिम्मेदार हैं जिसमें धन को सर्वाधिक महिमामय माना जाता है। सिद्धांतों की बात करना सभी को अच्छी लगती है पर जहां धन का मामला आये वहां सभी की आंख बंद हो जाती है।
             अपने आंदोलन के अकेले शीर्षक अन्ना साहेब हैं पर उनके विस्तार में अनेक प्रश्न चिन्ह थे। किसी पाठ में फड़कते शीर्षक के साथ बहुत सारे शब्द होते हैं जिनमें विषय से जुड़े सार का सार्थक होना आवश्यक है। इसके अभाव में शीर्षक एक नारा होकर रह जाता है। हम जैसे गीता साधकों के लिये यह आंदोलन अध्ययन और अनुसंधान के लिये बहुत महत्वपूर्ण रहा है। इस दौरान हमने केवल अन्ना के वाक्यों के साथ ही उनकी पर्दे पर दिख रही गतिविधियों को बहुत ध्यान से देखा। अन्ना के बारे में दूसरे लोग और दूसरे लोगों के बारे मे अन्ना क्या कह रहे हैं इसमें हमने दिलचस्पी नहीं रखी बल्कि अन्ना अपने इस आंदोलन से इस समाज के लिये क्या नया ढूंढ रहे हैं यह प्रश्न हमेशा हमारे लिये महत्वपूर्ण रहा है। अन्ना के स्वास्थ्य की चिंता हमेशा रही और हमारा मानना है कि ज्ञानी और ध्यानी अनशन जैसी हल्की गतिविधि से तब तक दूर रहें जब तक यह आवश्यक न हो। आंदोलनों और अभियानों का शांतितिपूर्ण प्रदर्शन करना ठीक है पर अनशन जैसी गतिविधि विचलित कर देती है।
               अन्ना ने जब अपना अनशन स्थगित किया तो प्रचार माध्यम उनका मखौल उड़ा रहे हैं। इन्हीं प्रचार माध्यमों ने उनके इसी आंदोलन पर अपने विज्ञापनों का समय पास कर कमाई की। टीवी चैनलों को इतने सारे दर्शक मिले होंगे कि वह कल्पनातीत होगा। हमारा मानना तो यह है कि यह आंदोलन ही आम जनमानस को भरमाने के लिये आर्थिक, सामाजिक तथा धार्मिक शिखर पुरुषों का एक योजनाबद्ध प्रयास था। टीवी चैनलों में शामिल हुए जिन बुद्धिजीवियों ने उनके मुंबई में कम भीड़ होने की जो बात कही है वह इसी का ही परिणाम है। लोकपाल या जनलोकपाल से इतर बहस इस पर चल रही है कि क्या अन्ना साहेब का जादू खत्म हो गया है। तो क्या यह जादू चल रहा था?
          अन्ना मूलतः अकेले थे पर उनके पीछे अनेक ज्ञात अज्ञात संगठन आये जिनके अपने अपने लक्ष्य थे। जनलोकपाल उनका नारा था जो संसद में लोकपाल का बिल पास होते ही फ्लाप हो गया। अन्ना के अनेक साथियों को लगा कि उनका नारा अब चलने वाला नहीं है। यकीनन अन्ना ने यह सब देखा होगा। अन्ना ने बहुत कुछ कहा पर हमें लगता है कि उन्होंने बहुत कुछ नहीं भी कहा। उनके सामने अनेक ऐसे सत्य अदृश्य रूप में प्रकट हुए होंगे जिनको देखकर वह आश्चर्यचकित हुए होंगे। वह उनको देखते होंगे पर उनका बयान करना उनके लिये कठिन रहा होगा। वह ऐसे सात्विक पुरुष हैं जो राजस पुरुषो के क्षेत्र में घुसकर उनको त्रास देता है। अभी तक उन्होंने राजस पुरुषों से जो द्वंद्व किया था उसमें भी उनके विरोधी राजस पुरुषों की सहायता लेते रहे होंगे। एक को परास्त किया तो दूसरा विजेता बना होगा। इस बार वह राजस पुरुषों के विशाल समूह से लोह लेने निकले थे और धीरे धीरे उनके इर्दगिर्द अपने राजसी वृत्ति के लोगों का आंकड़ा कम होता जा रहा था। राजस पुरुष पराक्रमी होते हैं जबकि सात्विक पुरुषों को पराक्रम की आवश्यकता नहीं होती। यदि राजस पुरुषों के विशाल समूह से सामना करना हो तो पहले अपने पराक्रम का भी परीक्षण करना चाहिए। अन्ना ने यह बात अब जाकर अनुभव की होगी। हम नहीं मानते कि अन्ना हारकर बैठ जायेंगे। दूसरी बात यह भी लगती है कि वह अपने वर्तमान राजस पुरुषों के साथ लेकर अपना अभियान चलने वाले भी नहीं है।
        हम जब अन्ना हजारे के अभियान से राजनीतिक पक्ष से हटकर उसका सामाजिक पक्ष देखते हैं तो लगता है कि अन्ना हजारे की त्यागी छवि जनमानस में है। इसलिये भविष्य में उनको समर्थन नहीं मिलेगा यह सोचना बेकार है। मुश्किल यह है कि अन्ना हजारे को बौद्धिक वर्ग का समर्थन अधिक नहीं मिला। इसका कारण यह है कि इस देश ने कई आंदोलन और उसके परिणाम देखे हैं जिससे निराशावादी दृष्टिकोण उभरता है। अन्ना हजारे के आंदोलन से जुड़े स्वयं सेवी और उनके संगठनों की निष्ठा को लेकर लोगों के मन में अनेक संदेह थे। देश के बौद्धिक समाज से जुड़े अनेक लोगों के लिये वह किसी भी दृष्टि से स्वयंसेवक नहीं थे। समाज सेवा में उनकी भूमिका धनपतियों और आमजनमानस के बीच उनकी भूमिका मध्यस्थ की थी। वैसे हमारा मानना है कि अन्ना को अपना अभियान राजनीति से जुड़े विषय से हटकर समाज में फैले अंधविश्वास, रूढ़िवादिता और भेदभाव मिटाने के लिये प्रारंभ करना चाहिए। हालांकि यह कहना कठिन है कि इसके लिये उनको प्रायोजक मिलेगा या नहीं। एक बात तय रही कि बिना प्रायोजन के ऐसे आंदोलन चल नहीं सकते।
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लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर 
poet, writer and editor-Deepak 'BharatDeep',Gwalior

writer aur editor-Deepak 'Bharatdeep' Gwalior

21 नवंबर 2011

जब उत्तर प्रदेश का नाम गुम हो जायेगा-हिन्दी लेख (divisan aur partision of uttarprades,uttarpradesh ka nam gum jayega-hindi lekh or article)

             हमारे देश के राज्य पच्चीस हों या पचास यह महत्वपूर्ण नहीं है जितना यह कि यहां समाज कितना मजबूत और आत्मनिर्भर हो। पिछले कुछ समय देश में एक राज्य को दो भागों में बांटकर विकास करने का सपना दिखाया जा रहा है। उत्तर प्रदेश को तो चार भागों में बांटना प्रस्तावित किया गया है। सवाल यह है कि क्या हमारे देश के किसी प्रदेश का विकास केवल क्या इसी कारण अवरुद्ध हो रहा है यहां राज्य बड़े हैं? एक अर्थशास्त्र का विद्यार्थी शायद ही कभी इस बात को माने। जब हम देश में गरीबी, बेरोजगारी और भुखमरी की समस्यायें देखते हैं तो यह बात समझना चाहिए कि यह अर्थशास्त्र का विषय है। ऐसे में हम जब लोगों को आर्थिक विकास का सपना देख रहे हैं तो यह भी देखना चाहिए कि हमारी देश के संकटों और समस्याओं पर अर्थशास्त्रियों का क्या नजरिया है?
              देश में बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, सामाजिक विद्वेष और गरीबी बढ़ रही है। हम यह दावा करते रहते हैं कि भारत में शिक्षा अगर पूर्ण स्तर पहुंच जाये तो विकास सभी जगह परिलक्षित होगा मगर हम देख रहे हैं कि हमारे यहां शिक्षित वर्ग में बेरोजगारी का संकट सबसे अधिक भयावह है। सच से सभी ने मुंह फेर रखा है। अनेक अर्थशास्त्री और समाजशास्त्री हैं पर चलते है जो विचार तो पश्चिम के सिद्धांतों के आधार पर करते हैं पर जब देश की बात आती है तो उनका नजरिया एकदम जड़ हो जाता है। देश में सबसे बड़ी समस्या गरीबी है और जिसका सीधा संबंध अर्थशास्त्र से है। अगर हम अर्थशास्त्र की दृष्टि से देखें भारत के पिछड़ेपन का मुख्य कारण, अधिक जनसंख्या, खेती और उद्योगों के परंपरागत ढंग से करना, सामाजिक रूढ़िवादिता आर्थिक असमानता के साथ अकुशल प्रबंध है। अगर हम यह चाहते हैं कि हमारा देश सर्वांगीण विकास करे तो हमें इन्हीं समस्याओं से निजात पाना होगा।
            अधिक जनंसख्या, खेती और उद्योगों को परंपरागत ढंग से करना तथा सामाजिक रूढ़िवादिता का संबंध जहां आम जनमानस से है वहीं अकुशल प्रबंध के दायरे में राज्य भी आता है। यह अकुशल प्रबंध लापरवाही और भ्रष्टाचार के कारण है। राज्य चाहे छोटे हों या बड़े अगर उनका आर्थिक और प्रशासनिक प्रबंधन कुशल नहीं है तो चाहे जितना प्रयास किया जाये विकास नहीं हो सकता। उस पर भ्रष्टाचार जहां नस नस में समा गया हो वहां तो कहना ही क्या?
        हम यह भी देखें कि जिन राज्य को विभाजित किया गया तो उनका विकास कितना हुआ? यह सही है कि नवगठित राज्यों की राजधानी बने शहरों में उजाला हो गया पर बाकी हिस्से तो अंधेरे में ही डूबे हुए हैं। एक दिन फिर उन्हीं राज्यों में पुनः विभाजन की मांग उठेगी। तब उसे माना जाता है तो फिर कोई नया शहर राजधानी बनेगा तब वह भी रौशन हो उठेगा मगर बाकी हिस्से में अंधियारा राज्य करेगा। इस तरह तो हर बड़े शहर को राज्य बनाना पड़ेगा। तब हम फिर उसी रियासती युग में पहुंच जायेंगे। ऐसे में सवाल उठता है कि आजादी के बाद रियासते बनी रहने दी जाती और राजाओं की जगह सरकारी नुमाइंदे रखे जाते या फिर हर राज्य का प्रमुख जनता से चुना जाता है। हालांकि तब भी यह सुनने का अवसर पुराने लोगों से मिलता कि इससे तो राजशाही ठीक थी। आज भी अनेक पुराने लोग अंग्रेज राज्य को श्रेयस्कर मानते हैं।
       कहने का अभिप्राय यह है कि जब तब हम अपने यहां कुशल प्रबंधन का गुण विकसित नहीं करते तब तक देश के किसी भी हिस्से को विकास का सपना दिखाना अपने आप को ही धोखा देना है। हैरानी तब होती है जब आम जनमानस इस तरह सपने दिखाने पर ही खुश हो जाता है। आखिरी बात यह कि उत्तर प्रदेश राजनीतिक रूप से बड़ा प्रदेश रहा है पर जैसा कि राजनीतिक स्थितियां सदैव समान नहीं रहती। अगर उत्तरप्रदेश का बंटावारे वाला प्रस्ताव साकार रूप लेता है तो भारतीय नक्शे से उसका नाम गायब हो जायेगा। उत्तर प्रदेश के करीब करीब सारे शहर बड़े और एतिहासिक हैं-जैसे आगरा, इलाहाबाद, वाराणसी, लखनऊ, गोरखपुर, मथुरा, कानपुर आदि। यह नक्शे में रहेंगे पर उत्तरप्रदेश गायब हो जायेगा। हम इसे अध्यात्मिक दृष्टि से देखें तो जमीन और लोग वहीं हैं और रहेंगे पर उन पर नियंत्रण करने वाला राजकीय स्वरूप बदल जायेगा। न कहीं से हमला न न क्रांति होगी पर उत्तर प्रदेश शब्द का पतन हो जायेगा। इंसानों के हाथ से बनाये नक्शे बदलते रहते हैं पर मानवीय प्रकृतियां यथावत रहती हैं। इन्हीं प्रकृतियों को जानना और समझना तत्व ज्ञान है। मथुरा के जन्मे और वृंदावन पले भगवान श्रीकृष्ण का तत्वज्ञान आज विश्व भर में फैला है। इस मथुरा और वृंदावन ने कई शासक देखे पर उनका अध्यात्मिक स्वरूप भगवान श्री कृष्ण की जन्म तथा बाललीलाओं के कारण हमेशा बना रहा। उत्तरप्रदेश के अनेक शहरों का भारतीय अध्यात्मिक दृष्टि से महत्व है और रहेगा। भले ही भारतीय नक्शे से उत्तर प्रदेश गायब हो जाये। एक आम लेखक और नागरिक के रूप में राज्य के छोटे या बड़े होने से हमारा कोई सरोकार नहीं है पर इतना जरूर कह सकते हैं कि उत्तरप्रदेश के नाम के पीछे उसके अनेक बड़े शहरों का एतिहासिक तथा अध्यात्मिक स्वरूप दब गया है और संभव है कि विभाजन के बाद उनकी प्रतिष्ठा अधिक बढ़े। यह कहना कठिन है कि यह बंटवारा कब तक होगा पर एक बार प्रस्ताव स्थापित हो गया है तो वह कभी न कभी प्रकट रूप लेगा ऐसी संभावना तो लगती है।
लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर 
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