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10 अक्टूबर 2010

हमदर्दी के लिये सभी प्यासे-हिन्दी शायरी (hamdardi ke liye sabhi pyase-hindi shayri)

अपनी तन्हाई दूर करने के लिये
कई दरवाजे हमने खटखटाये,
बांटने चले थे अपने ग़म हम जिनके साथ
उनके दर्द अपने साथ और ले आये।
दिल को बहलाने के सामानों में
लोग हो गये मशगूल
शिकायत करो तो
खिलौने खरीदने पर
अपनी चुकाई कीमतों के पैमाने बताते हैं,
मुलाकाती ढूंढते हैं रुतवा दिखने के लिये
भले ही अकेलेपन के अहसास उनको भी सताते हैं,
जहां भी जज़्बातों का समंदर ढूंढा हमने
तन्हा लगा पूरा ज़माना
हमदर्दी के लिये सभी प्यासे नज़र आये।
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कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
http://anant-shabd.blogspot.com

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24 मार्च 2010

उतने ही देखो सपने-हिन्दी शायरी (utne hi dekho sapne-hindi shayri)

इतना तेज मत दौड़ो कि
खुद ही हांफने लगें।
हवस और ख्वाबों की भूख कभी नहीं मिटती,
दौलतमंदों की चालें कभी नहीं पिटती,
अपनी औकात पहचानकर
खुली आंखों से उतने ही देखो सपने
जो पूरे होते लगें।
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बाजार में सजे हैं ढेर सारे ख्वाब
पैसे से ही खरीदे जायेंगे।
एक के साथ एक मुफ्त के दावे
हर शय के दाम में ही छिपे पायेंगे।
एक बार जेब से पैसा निकला
तब ख्वाब हकीकत बनेंगे
शयों के कबाड़ हो जाने पर
दर्द दुगुना बढ़ायेंगे।

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कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
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