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21 सितंबर 2013

गांवों में पहुंच गया बेदर्द शहर-हिन्दी व्यंग्य कविता (gaanvon mein pahunch gaya bedard shahar)



बंदर दे रहा था धर्म पर प्रवचन
उछलकूद करते हुए तमाशा भी
दिखा रहा था
यह सनसनीखेज खबर है
उसके मुखौटे के पीछे
इंसान का चेहरा है
आंखें देखती हैं पर पहचानती नहीं
कान सुनते है मगर समझ नहीं इतनी
बंदर के बोलों में इंसान का ही स्वर है।
कहें दीपक बापू
ज़माना बंटा है टुकड़ों में
कोई दौलत के नशे में मदहोश है,
कोई गरीबी के दर्द से बेहोश है,
जज़्बात सभी के घायल है,
ख्वाबी अफसानों के फिर भी कायल है
दिल के सौदागरों के अपनी चालाकी से
रोते को हंसाने के लिये
खुश इंसान के दिमाग में प्यास बढ़ाने के लिये
मचाया इस जहान  में विज्ञापनों का  कहर है।
देखते देखते
गांवों की खूबसूरती हो गयी लापता
नहीं रही वहां भी पुरानी अदा
घर घर पहुंच गया बेदर्द शहर है।
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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poet-Deepak raj kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर
poet, writer and editor-Deepak 'BharatDeep',Gwalior
‘दीपक भारतदीप की हिन्दी-पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
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29 जुलाई 2013

कौन दर्द दूर कर पायेगा-हिन्दी कविता (kaun dard door ka paayega-hindi kavita)



यकीन करो

तुम्हारे दर्द की दवा करने

कोई फरिश्ता आकाश से नहीं आयेगा,

जमीन पर भी इलाज का दावा करने वाला

कोई इंसान बिना पैसे मरहम नहीं लगायेगा।

कहें दीपक बापू

कान से नारे सुनकर अनुसना कर देना,

लिखे वादे से भी आंख फेर लेना,

नुस्खे बनाये है सौदागरों ने

केवल अपने घर भरने के लिये,

दूसरे के घर की

रौशनी चुराकर जलाते अपने दिये,

आर्त होकर मत गाओ उनके गीत,

मतलब के हैं जो मीत,

कहीं रिश्ते नाम के रह जाते,

कहीं नाम से रिश्ते लोग बढ़ाते,

अपने सहने की ताकत बढ़ाओ

मुस्कराकर अपने गम घटाओ,

कोई नहीं है इस दुनियां में

लोग खरीद रहे खुद अपने लिये जख्म

इस ज़माने में आपसी  होड़ लगाकर

कौन किसका दर्द दूर कर पायेगा।

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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poet-Deepak raj kukreja "Bharatdeep"
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11 मार्च 2013

वफा का बाज़ार-हिन्दी शायरी (vafa ka bazar-hindi shayari)


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चेहरे पर होती उनकी मुस्कान
जब वह सामने आते हैं,
यह अलग बात है
मुंह फेरते ही
उनके ख्याल बदल जाते हैं।
कहें दीपक बापू
गिरगिट का रंग बदलना
कुदरत का तोहफा है
क्यों करते हैं
बेवफा इंसानों से तुलना
जो अपनी वफा का सौदा करते हुए
अपनी नीयत बाज़ार में सजाते हैं।


लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poet-Deepak raj kukreja "Bharatdeep"
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18 जनवरी 2013

फेसबुक टु ठेसबुक-हिन्दी व्यंग्य (facebook to thesbook-hindi vyangya or hindi satire)

        कम से कम आधुनिक तकनीकी से जुड़ने का सौभाग्य हमें मिला इसके लिये परमात्मा का धन्यवाद अवश्य अर्जित करना चाहिए। अंतर्जाल इंटरनेट अनेक बार गजब का अनुभव कराता है।  सभी अनुभवों की चर्चा करना तो संभव नहीं है पर फेसबुक के माध्यम से ऐसे लोगों को तलाशना अच्छा लगता है जिन्हें हमने बिसारा या उन्होंने ही याद करना छोड़ दिया है।  हम जैसे लेखकों के लिये फेसबुक केवल चंद मित्रों और प्रशंसकों से जुड़े होने का एक माध्यम भर है जबकि ब्लॉग पर लिखने के पर  ही असली आनंद मिलता है। यह ब्लॉग एक तरह से अपनी पत्रिका लगती है।  यहां लिखकर स्वयंभू लेखक, कवि और संपादक होने की अनुभूति होती है। यह आत्ममुग्धता की स्थिति है पर लिखने के लिये प्रेरणा मिलती है तो वह बुरी भी नहीं है।  शुरुआत में फेसबुक से जुड़ना ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं लगा।  अलबत्ता ब्लॉग मित्रों को देखकर अपना खाता बना लिया।  जान पहचान की बालक बालिकाओं ने अपनी फेसबुकीय रुचि के बारे में बताया फिर भी अधिक दिलचस्पी नहीं जागी।  एक बार दूसरे शहर गये तो वहां एक बालक ने लेपटॉप पर अपने फेसबुक से हमारा खाता जोड़ दिया।  तय बात है कि उसके संपर्क के अनेक लोगों में हमारी दिलचस्पी भी थी।  इनमें लेखक कोई नहीं है पर फेसबुक पर सक्रिय होने के लिये उसकी कोई आवश्यकता भी नहीं होती। इधर से उधर फोटो उठाकर अपने यहां लगाने के लिये बस एक बटन दबाना है।  लोग अपनी मनपसंद की सामग्री इसी तरह लगाकर खेल रहे हैं।  अपने फोटो एल्बम लगाकर एक दूसरे को प्रोत्साहित करते हैं।
    ऐसे में भूले बिसरे लोगों को ढूंढने का प्रयास करना हम जैसे लेखकों के लिये दिलचस्प होता है।  यह दिलचस्पी तब आनंददायक होती है जब आप ऐसे लोगों का खाता ढूंढ लेते हैं जिनके साथ कभी आपने अपने खूबसूरत पल गुजारे पर अब हालातों ने आपसे अलग कर दिया।  आम आदमी की याद्दाश्त कमजोर होती है इसलिये समय, हालत और स्वार्थों की पूर्ति के स्त्रोत बदलते ही वह अपनी आंखों में प्रिय लगने वाले चेहरों को भी बदल देता है।  कर्ण को प्रिय लगने वाले स्वर भी बदल जाते हैं।  लेखक होता तो आम आदमी है पर वह अपनी याद्दाश्त नहीं खोता।  दौर बदलने के साथ वह अपनी यादों को जिंदा रखता है।  यह उसकी स्वाभाविक प्रवृत्ति होती है।  वरना वह नित नयी रचनायें नहंी कर सकता।
              फेसबुक में हमने ऐसे अनेक खाते ढूंढे हैं जिनके स्वामी हमसे दूर हो गये। जब मिलते हैं तो तपाक से मिलते हैं।  नहीं मिलते तो पता नहीं उनको याद भी आती कि नहीं।  एक प्रियजन का खाता ढूंढ रहे थे पर उसने बनाया ही नहीं था।  तीन चार साल में तीन मुलाकतें हुई। आखिरी मुलाकात छह महीने पहले हुई थी।  वह पढ़े लिखे हैं  फेसबुक खाता कभी खोलेंगे यह सोचना मूर्खता थी। एक संभावना थी कि उनके परिवार के नयी पीढ़ी के सदस्य उन्हें इस काम के लिये प्रेरित कर सकते हैं।  हमने महीना भर पहले  एक दो बार ऐसे ही प्रयास किया कि शायद उनका खाता बन गया हो। कल अचानक फिर ख्याल आया तो उनका खाता फोटो सहित दिख गया।  हम कभी उनकी फोटो तो कभी उनकी गोदी में बैठी छह महीने की पोती की तरफ देखते थे।  उनके पूरे परिवार के सदस्यों के फेसबुक खाते देख लिये।  उनके फेसबुक से होते हुए हमने कई ऐसे करीबी लोगों के खाते भी देखे जिनको जानते हैं पर कोई औपचारिक संपर्क नहीं है।
       पहले विचार किया कि उनका फेसबुक मित्र बनने का संदेश भेजा जाये पर फिर लगा कि उनकी गतिविधियों पर हम नज़र रखे हुए हैं इससे वह खुलकर दूसरों से सपंर्क रखते समय प्रभावित हो सकते हैं।  सबसे बड़ी बात यह कि हम उनके फेसबुक पर उनके फोटो के साथ ही प्रोफाईल पर उनके मन का अध्ययन कर रहे थे।  पहली बार लगा कि फेसबुक एक तरह से वाईस स्टोरेज भी है।   हमने पहले भी कुछ ऐसे करीबी लोगों की फेसबुक देखी थी पर उस समय ऐसी बातें दिमाग में नहीं आयी अब  आने लगी थी।  सभी का फेसबुक कुछ बोल रहा था।  चेहरे की मुस्काने रहस्य छिपाती लग रही थीं।  वैसे भी हम नहीं चाहते कि हम किसी के व्यक्तिगत जीवन में हस्तक्षेप करें पर फेसबुक की मूक भाषा अगर कुछ कहती है तो उसे अनदेखा करना हमारे लिये संभव भी नहीं है।  फोटो एल्बम क्या कह रहे हैं?  जो नाम बार बार जुबान पर है वह फेसबुक पर क्यों नहीं है?  जिसका नाम दिल में होने का दावा है वह फेस कहीं करीब क्यों नहीं दिखाई देता?
              एक बात तय रही कि एक लेखक होने के नाते हम ब्लॉग का महत्व कभी कर ही नहीं सकते पर ऐसा भी लगने लगा है कि फेसबुक पर कुछ कहानियां हमारा इंतजार कर रही हैं। यहा कहानियां अंततः ब्लॉगों की शोभा बढ़ायेंगी।  यही कारण है कि फेसबुक पर उन लोगों को दूर ही रखना होगा क्योकि अंततः ब्लॉगों से रचनायें वहीं आयेंगी और वह हमारे नायक नायिकाऐं इसका हिस्सा होंगी।  फेस टु फेस यानि सामना होने पर फेसबुक की बात ही क्या इंटरनेट से अनजान होने का दावा भी प्रस्तुत करना होगा।  आखिरी बात फेसबुक पर जो संपर्क रखते हैं उनका प्रिय होना प्रमाणित है पर जो रोज नहीं मिलते पर उनमें से किसी के सामने खाताधारक अगर यह दावा करता है कि वह उसका प्रिय है तो प्रमाण स्वरूप उसका फेसबुक का पता जरूर मांगना चाहिये  यह देखने के लिये उसके एल्बम में कहीं स्वयं का फोटो है कि नहीं। यह अलग बात है कि जब दावा करने पर अपना फोटो न दिखे तो यह फेसबुक ठेसबुक भी बन सकती है।
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5 जनवरी 2013

मददगार लगाते मदद का नारा-हिन्दी कविता(mdadgaar lagate madad ke nare-hindi kavita or hindi poem)


लड़खड़ाये थे हमारे कदम
इसलिये रास्ते में गिरे पड़े थे
बेहोशी की हालत में
कौन सुध लेता
होश में चिल्लाये
तब भी आते जाते लोगों ने
कर दिया अनसुना
मानो उनकी आंखों और कानों पर
बड़े ताले जड़े थे।
कहें दीपक बापू
मर गये हैं ज़माने के जज़्बात,
अपनी जिंदगी बचाने के लिये
जहां लोग रख देते दूसरों के सीने पर लात,
सड़क पर दरिंदों के हमले पर क्या रोऐं
वहां फरिश्तों के वेश में दिखे लोग
बेजान बुतों की तरह खड़े थे।
मददगार बनना था जिनको
हमारे घावों पर हमदर्दी जताने के साथ
मदद का नारा लगाते हुए
इसी ज़माने के लोग अड़े थे।

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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
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27 दिसंबर 2012

महाबहस की शौहरत-हिन्दी कविता (mahabahas ke shauharat-hindi kavita)

कुछ लोग हर विषय पर बोलेंगे,
फिर अपने प्रचार की तराजु में
अपनी इज्जत का वजन तोलेंगे।
कहें दीपक बापू
हर जगह छाये हैं वह चेहरे
बाज़ार के सौदागरों से लेकर दाम,
प्रचारकों के साथी होकर करते काम,
अपने लफ्जों की कीमत लेकर ही
हर बार अपना मुंह खोलेंगे,
नाम वाले हो या बदनाम
पर्दे पर विज्ञापनों के बीच 
महाबहस के लिये
सामान जुटायेंगे वही लोग
जो पहले मशहुर होकर
शौहरत के लिये इधर उधर डोलेंगे।
लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
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17 दिसंबर 2012

दिल और दिमाग-हिन्दी शायरी (dil aur dimag-hindi shayari)

अब उदास होने को  हमारा मन नहीं करता,
तन्हा हो या भीड़ में अपना  सोच नहीं मरता।
असलियत आ गयी है सामने
पूरे जमाने की
ख्याली घोड़े पर सवार लोग
करते हैं दौड़ जीतने के दावे
सौदे के सम्मान से हर कोई झोली भरता।
कहें दीपक बापू
अपनी कलम चलती जब कागज पर,
या नाचती हैं  टंकित कर,
होठों पर हंसी खुद-ब-खुद आ जाती है
लोगों ने भर ली झोली सामानों से
हम शब्दों के भंडार से खुश हैं
मुश्किल है आज के दौर में
अपने दिल और दिमाग को जिंदा रखना
यह हर कोई जुटा है खुशियां ढूंढने में
जिंदा रहने के लिये हर पल आदमी मरता।


लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
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11 दिसंबर 2012

बिचारे शब्द-हिंदी कविता (bichare shaba-hindi kavita or poem)

उन घरों में पर क्या जायें
जहां मखमल के कालीन भी
कांटों की तरह चुभते हैं,
मालिक हैं भले ही जहान के वह लोग
मगर आम इंसान के लिये
उनकी जुबान पर बिचारे ष्षब्द उगते है।
कहें दीपक बापू
बेआसरों के नाम पर
कर रहे जो सरेआम सौदे
उनके दरों पर आसरा ढूंढना बेकार हैं
पत्थरों के दिल उनके
क्या बांटेंगे वह हमारे साथ अपनी रोटी
हर जगह खुद सोने और चांदी के दाने चुगते हैं।
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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
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2 सितंबर 2012

भीड़ में दर्द सुनाना-हिंदी कविता

भीड़ में जाकर
अपना दर्द कहना
अब  हमें नहीं सुहाता है,
अपने गमों से हारे
चीखते चिल्लाते लोग
कानों से सुनते नहीं
अपनी जुबां से
उनको अपना हाल  बयान करना ही  आता है।
कहें दीपक बापू
सर्वशक्तिमान का शुक्रिया
अपने दर्द और खुशी पर
कविता या गीत लिखने की कला दी है
दिल हर नजारे पर
यूं ही कुछ लफ्ज गुनागुनाता है।
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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा
ग्वालियर, मध्यप्रदेश
writer and poet-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeepk"
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16 अगस्त 2012

धोखे का सौदा-हिंदी कविता (dhokhe ka sauda -hindi poem or kavita)

दौलत के ढेर पर बैठे हैं जो लोग
शौहरत भी उनके पास है,
मतलबपरस्तों ने पा लिये बड़े ओहदे
दरियादिली दिखाने की उनसे बेकार आस है,
चर्चे आम है कातिलों के,
प्यार के सौदागर बादशाह बने दिलों के,
मजे के दीवाने जमाने की चाहत है
गंगा उल्टी तरफ बहती नजर आये।
कहें दीपक बापू
ख्वाबों को हकीकत में लाना आसान नहीं,
सपनों की सच में कोई शान नहीं,
कसूरवार किसे कहें
सभी बेकसूरी के दावे करते नजर आये।
धोखे का सौदा
दुकानदार और ग्राहक दोनों को ललचाये।
--------------------------------------------- 
लेखक एवं कवि- दीपक राज कुकरेजा,‘‘भारतदीप’’, ग्वालियर
लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर 
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15 अगस्त 2012

१५ अगस्त स्वतंत्रता दिवस पर कविता -आजाद तो पंछी हैं (azad to panchhi hain-a hindi poem kavita on 15 ogust swatantrata diwas par or 15 agust independent day)

आजाद तो पंछी हैं
चाहे जहां उड़ जाते हैं,
इंसान का मन उड़ता है
पर लाचार देह में पंख कहां
जुड़ पाते हैं।
कहें दीपक बापू
औकात से ज्यादा
कामयाबी पाने की ख्वाहिश
मतलबपरस्ती के साथ जीने की आदत
सपना इज्जतदार कहलाने का
हर आदमी इंसान गुलाम अपने दिल का
जुबां से उगलते लफ्ज जहर की तरह
प्यारे बोल का अब गुड़ कहां पाते हैं। 
---------------------------------------------
लेखक एवं कवि- दीपक राज कुकरेजा,‘‘भारतदीप’’, ग्वालियर
लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर 
poet, writer and editor-Deepak 'BharatDeep',Gwalior

writer aur editor-Deepak 'Bharatdeep' Gwalior



14 अप्रैल 2012

पर्दे के दृश्य-हिन्दी कविता

बड़ा हो या छोटा पर्दा
उन पर जो दृश्य दिख रहे हैं,
जमाने की नज़रों में आने पहले
कथाकार उनको कागज पर लिख रहे हैं।
कहें दीपक बापू
समाज सेवा हो या फिल्म
समाचार हो या कोई मैच
कुछ अभिनेता सड़क पर
कल्याण का झंडा हाथ में लेकर चल रहे हैं
कुछ मैदान परं अभिनय की
अदाओं में डंडा लेकर ढल रहे हैं,
तुम किसी की जीत पर ताली बजाओ,
या सनसनी पर सकपकाओ,
सच यह है कि
हर इलाके के अदाकार
अमीरों के हाथ बिक रहे हैं।
लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर 
poet, writer and editor-Deepak 'BharatDeep',Gwalior

writer aur editor-Deepak 'Bharatdeep' Gwalior

23 मार्च 2012

मैच फिक्सिंग की खबरें भी फिक्स-हिन्दी व्यंग्य (crickt match fixing ki khabre bhi fix-hindi vyangya or satire)

            अब तो यह लगता है कि क्रिकेट मैचों की फिक्सिंग की खबरें भी फिक्स हो सकती हैं। वजह साफ है कि जिस तरह फिक्स करने वाले और कराने वालों की बदनामी नहीं बल्कि प्रचार माध्यमों में इतनी प्रसिद्धि होती है कि वह हर जगह अपनी नाक फंसाकर नाम और नामा कमाने लगते हैं।
               अभी हाल ही में एक भारतीय अभिनेत्री पर पहले पाकिस्तानी और अब फिर श्रीलंका के क्रिकेट खिलाड़ियों से    संबंध बनाकर उनसे मैच फिक्स कराने का आरोप लगा। इसके बाद लगा कि जैसे वह बदनाम होकर मुंह छिपा लेगी पर हुआ उल्टा ही। वह तो रोज टीवी चैनलों पर साक्षात्कार देती नजर आ रही है। पहले तो उसने किसी भी देश के क्रिकेट खिलाड़ी को पहचानने से इंकार कर अपने को पाक साफ बताया। जिस मैच को फिक्स करने का आरोप उस पर लगा था जब उसे ही उसे ही क्रिकेट के भाग्यविधताओं ने पवित्र ढंग से खेला गया घोषित किया गया तो फिर दूसरे मैच की बात सामने आई। वह अभिनेत्री समझ गयी कि इस तरह की फिक्सिंग के सबूत मिलना संभव नहीं है। इधर प्रचार माध्यमों को अपने विज्ञापन कार्यक्रमों के लिये समाचार सामग्री प्रसारित करने के लिये एक नया चेहरा मिल गया। उसकी हिम्मत बढ़ी और वह दनादन बयान दे रही है। एक श्रीलंकाई खिलाड़ी से उसने डेट पर जाने की बात स्वीकारी है। इस तरह वह प्रचार पा रही है। संभव है कुछ दिनों में उसे कोई बड़ी फिल्म मिल जाये। यह भी संभव है कि उसे कोई फिल्म दी जाने वाली हो और उसके सफलता के लिये पहले इस अभिनेत्री का नाम चमकाया जा रहा हो। संभव है कि बिग बॉस के छठे संस्करण की यह तैयारी हो।
             उस अभिनेत्री ने मात्र एक असफल फिल्म की है। उसके नाम का यह हाल है कि नियमित फिल्म देखने वालों को भी उसका नाम याद नहीं है। बहरहाल मैच फिक्स की खबरों को फिक्स मानने के पीछे सबसे बड़ा कारण यह है कि कम से कम हमारे देश में किसी को भी मैच फिक्स करने के आरोप में कोई सजा नहीं मिली। इसके विपरीत कईयों को इतनी प्रसिद्धि मिली कि वह उसे नकद में भुनाने लगे। कुछ समय पहले एक पाकिस्तानी फिल्म अभिनेत्री पर भी पाकिस्तानी क्रिकेटरों से संपर्क कर मैच फिक्सिंग से जुड़े होने के आरोप लगे। उसके तो जैसे भाग्य खुले। भारत में उसको भारी शौहरत मिली। वह बिग बॉस में आयी और अब उसका नाम फीका पड़ने लगा। अब यह तो भारत की अभिनेत्री है। हम यह मानते हैं कि क्रिकेट अब बाज़ार के सौदागरों का विषय है। इसमें सट्टा वगैरह भी लगता है। संभव है कि मैच फिक्स भी होता हो। बाज़ार से प्रायोजित प्रचार समूह गाहे बगाहे मैच फिक्सिंग के समाचार देता है। उन पर बहस होती है। विशेषज्ञ आते हैं। इससे विज्ञापनों के लिये अच्छा खासा समय मिल जाता है। क्रिकेट का खेल यथावत चलता है। रोज रोज मैच हो रहे हैं। बाज़ार के सौदागर और प्रचार प्रबंधक दोनों हाथों से पैसा कमा रहे हैं। प्रचार माध्यमों के लिये खेल की खबरें जहां दिल बहलाने वालों का ध्यान पकड़े रहती हैं वहीं उनका विज्ञापन प्रसारण बेहतर ढंग से पास हो जाता है। जिनको केवल सनसनी से मतलब है उनके लिये मैच फिक्सिंग की खबरें हैं। एक समय हम क्रिकेट के दीवाने थे, पर जब फिक्सिंग की बात सामने आयी तो विरक्त हो गये। इधर ब्लॉग पर लिखना शुरु किया तो फिर क्रिकेट में फिक्सिंग पर भी बहुत लिखा। हमें हैरानी होती थी कि इस तरह मैच फिक्सिंग की खबरें देकर प्रचार प्रबंधक अपने पैरों पर कुल्हारी क्यों मारते हैं? जिस तरह मैच फिक्सिंग के आरोपों से घिरे लोग प्रतिष्ठत होकर प्रचार माध्यमों में नाम और नामा कमाने के साथ ही अपनी नाक की प्रतिष्ठा भी बढ़ा रहे हैं उससे तो लगता है कि यह खबरें भी फिक्स ही रही होंगी  ताकि क्रिकेट से बोर हो चुके लोग को सनसनी के रंग में रंगा जाये।
            ऐसे में तो हमें लगता है कि क्रिकेट मैच में न तो कोई फिक्सर है न मैच फिक्स होते हैं। अब तो स्थिति यह है कि कोई क्रिकेट खिलाड़ी अगर हमारे सामने आकर यह दावा करे कि वह मैच फिक्स करता है तो हम उसे फटकार देंगे। कह देंगे-‘भाग यहां से तू झूट बोलता है। तुझे किसी टीवी सीरीयल में काम चाहिये या फिल्म में, इसलिये इस तरह की बकवास कर रहा है।’
            फिर इधर बिग बॉस का कार्यक्रम भी अपने यहां चलता है। पिछला फ्लाप हो गया था। लगता है कि अब नये की तैयारी है। ऐसा लगता है कि उसमें शामिल होने के लिये जहां कुछ लोग ऐसे आरोप अपने सिर लेना चाहते हैं। जिनको उसमें शामिल करना है उनके लिये प्रचार प्रबंधक पहले से ही भूमिका बनाते हैं जिसमें उस पर मैच फिक्सिंग करने का आरोप लगाना अधिक सरल होता है। इसमें न तो किसी कानून का डर है न जनता का। इसलिये हमें नहीं लगता कि जितनी फिक्सिंग की खबरें आती हैं वह मैच फिक्स भी होते हैं।
लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर 
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11 फ़रवरी 2012

बड़े बोल बड़ा जाल -हिन्दी कविता (bade bol bada jaal-hindi kavita or poem)

बड़े बोल
अपने ही जाल में फंसा देते हैं,
जो बोले वह रोए
बाकी जग को हंसा देते हैं।
कहें दीपक बापू
प्राण शक्ति अधिक नहीं है जिनमें
वही बड़े सपने दिखते हैं,
चमकदार ख्वाबों से
अपनी किस्मत लिखते हैं,
मगर ज़मीन पर बिखरे कांटो के सच
उनको गर्दिश में धंसा देते हैं।
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लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर 
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8 जनवरी 2012

रस्में निभाना महंगा हो गया-हिन्दी शायरी (rasmen nibhana mahanga ho gaya-hindi shayri, kavita or poem)

तंग रास्तों से निकलते हुए
ख्यालों के दायरे भी सिमट जाते हैं,
कहें दीपक बापू
अपनी तरक्की चाहने वालों
पहले खुली हवा में
सांस लेना सीख लो
बंद कमरे हों या सोच
उनमें जो रहते हैं
उनकी किस्मत के दाव
सस्ते में निपट जाते हैं।
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रस्में निभाना
महंगा हो गया
फिर भी लोग निभा रहे हैं,
देखते कोई नहीं
एक दूसरे की तरफ
फिर भी दिखा रहे है।
कहें दीपक बापू
बुद्धिमान लोग भी बहुत हैं
मगर मौके पर लाचार होकर
अंधों में अपना नाम लिखा रहे हैं।
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19 दिसंबर 2011

खास लोगों का फैसला-हिन्दी कविता (khas logon ka faisla-hindi kavita or poemor shayari))

वह चाहते हैं कि
हम सच के घोड़े पर सवारी करें,
स्वयं झूठ के महल में ऐश करते रहें,
जंग में मैदान में हम अपना खून बहायें
वह वातानुकूलित कक्ष में बैठकर
अपने पसीने से बचते रहें।
कहें दीपक बापू
जहान के दस्तूर अपने मतलब के लिये
बार बार बदल जाते है,
चतुर करें राज
सज्जन स्वार्थ की बलि चढ़ जाते हैं,
दौलत मंदों की हुकुमत रोज बढ़ती है,
ओहदेदारों की तकदीर हर कदम चढ़ती है,
इसलिये खास लोगों का फैसला है
आम इंसान हमेशा सस्ता रहे।
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15 नवंबर 2011

इंसानों के वादे -हिन्दी शायरी (insano ke vaade-hindi shayari or poem)

आम इंसान हो या खास
चाहे जब वादे कर चले जाते हैं।
सबकी याद्दाश्त सिमटी है अपने मतलब तक,
फरिश्ता बनने कि ख्वाहिशें पाले सभी हैं
अपने पेट भरने के बाद सभी हैं जाते हैं थक,
फिर भी ताकत कोई है इस धरती पर
जो मझधार में फंसे लाचारों की नाव
वादा न करने वाले
अजनबी पार लगा जाते हैं।
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21 सितंबर 2011

दिल की दरार-हिन्दी कवितायें (dil ke darar or hurt of heart-hindi kavita or poem)

कितनी बार भी भूख लगी
खाने पर मिट गयी,
कितनी पर प्यास भी लगी
पानी मिलने पर मिट गयी,
मगर पड़ी जो दिल में दरारें
बनी रहीं चाहे पीढ़ी दर पीढ़ी मिट गयी।
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वह लोगों में
धरती पर जन्नत लाने का
सपना सजाते हैं,
वादों को बड़ी खूबसूरती से सजाते हैं,
एक बार जो चढ़ गये सिंहासन की सीढ़ी
फिर महलों से बाहर नहीं आते हैं।
दिल मिलाने की बातें भले ही करते
मगर दरारें चौड़ी ही किये जाते हैं।
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15 अगस्त 2011

मजबूरी और बदलाव-हिन्दी शायरियां (mazboori aur badlav-hindi shayriyan)

जमाना बदल जाये
इस ख्वाहिश में
पूरी जिंदगी बीत जायेगी,
अगर खुद को बदल सको
बेहतर रहेगा,
नजरिया बदला तो
दुनियां बदली नजर आयेगी।
-------
तूफानों की ताकत बहुत है
मगर वह पेड़ उजाड़ते हैं
लगा नहीं सकते,
जिनके पास ताकत है जमाना बदलने की
पहले खुद बदलकर दिखाते हैं,
जिनमें कुब्बत नहीं है
वह मजबूरियों के नाम लिखाते हैं,
कमजोर लोग खाली शोर मचाकर नहीं थकते।
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8 अगस्त 2011

जहां अमेरिका का नाम है-हिन्दी काव्य रचना

भारत आजाद देश
पर अर्थव्यवस्था गुलाम है,
कांपता है अमेरिका का डॉलर
बिगड़ता अपने रुपये का काम है,
जिनके हाथों में है दौलत की ताकत
उनकी आंखें ताक रहीं न्यूयार्क की तरफ
वाशिंगटन का बसा
उनके दिल में नाम है।
कहें दीपक बापू
अपनी आजादी अब भ्रम लगती है
जब धरती देती अन्न सोने की तरह,
आकाश बिखेरता जल मोती की तरह,
फिर भी गरीब और भूख मिटी नहीं
लॉस एंजिल्स के पर्दे पर
ऑस्कर लेकर भी पिटी नहीं,
भर गयी तिजोरियां
गरीबों की मदद करने वालों की
रुपया चेहरा बदलकर डॉलर हो गया,
रोटी से भरे पेट है जिनके
उनके हाथ में ही रहते व्हिस्की के जाम हैं,
सिगरेट के धूंए सरीखी हो गयी है
उनकी देशभक्ति,
देह यहां
पर बाहर बसी आसक्ति,
जुबान पर भारत का नाम
दिल की उड़ती दुआऐं बहती उस तरफ
जहां अमेरिका का नाम है।
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