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28 नवंबर 2013

मरम्मत की चिंताओं का ढेर-हिन्दी कविता(marmmat ki chinttanon ka dher-hindi poem or kavita)



तंग गलियों में गुजरते हुए
जिनको गम घेर लेता है,
उद्यानों में खिले हुए फूलों की सुंगध
उनको खुश नहीं कर सकती
बहारों से परे होकर
सुख उनसे मूंह फेर लेता है।
कहें दीपक बापू
मर गयी जिनकी संवेदनायें
मन उनका नहीं नाचता मयूर की तरह
उनकी अदायें कोई क्या समझेगा
खोया जिनका दिमाग,
शब्दों का जादू उन पर क्या चलेगा,
तसल्ली के लिये जुटाते सभी लोग
दुनियां का सामान
पल भर की खुशी के बाद
बिगड़े हालातों में
मरम्मत की चिंताओं का ढेर मिलता है।
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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poet-Deepak raj kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर
poet, writer and editor-Deepak 'BharatDeep',Gwalior
‘दीपक भारतदीप की हिन्दी-पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
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10 अक्टूबर 2013

दूसरे की निंदा सुनकर हम खून क्यों जलाते हैं-हिन्दी लेख(doosre ki ninda sunkar ham apna khoon kyon jalate hain-hindi lekh,editorial, article



                       
                        समाचार सुनना बुरी बात नहीं है पर दूसरे के लिये निंदात्मक प्रचार से प्रभावित होना कभी मानसिक रूप से स्वस्थ होने का लक्षण नहीं है। हम देख रहे हैं कि भारतीय समाचार माध्यम-टीवी और समाचार पत्र पत्रिकायें-किसी भी क्षेत्र विशेष के शिखर पुरुष के प्रति जब आक्रामक होते हैं तो इस तरह की सामग्री प्रस्तुत करते हैं जैसे कि वह कोई समाज सुधार की महान भूमिका अदा कर रहे हैं। हम तो यह मानते हैं कि समाज पर नियंत्रण करने वाली जितने भी क्षेत्र हैं उनमें शिखर पर दो ही लोग पहुंचते हैं-एक तो वह जो केवल बुत होते हैं जिनको पूंजीपतियों, प्रचार प्रबंधकों और पदाभिमानी लोग अपनी अपनी स्थिति बनाये रखने के लिये आमजनों के सामने प्रस्तुत करते हैं, दूसरे वह जो आर्थिक, सामाजिक, राजकीय तथा धार्मिक क्षेत्रों में अपनी प्रतिष्ठा तथा धवल छवि बनाये रखने के लिये प्रयासरत रहते हुए शिखर का पद धारण करते हैं ताकि राजकीय संस्थाओं की वक्र दृष्टि उन पर न पड़े।  होनी होनहार है उसे कोई नहीं रोक सकता।  ऐसे में किसी भी क्षेत्र के शिखर पुरुष पर जब प्रकृति का डंडा चलता है तो प्रचार माध्यमों में उसकी छवि खराब होते देर नहीं लगती।  आमतौर से प्रचार माध्यमों के कार्यकर्ता अपने ही स्वामियों की हितों की रक्षा के लिये आर्थिक, सामाजिक, धार्मिक तथा राजकीय क्षेत्रों के अनेक ऐसे शिखर पुरुषों के कारनामों का विश्लेषण नहीं करते जिनके हाथ में पद, पैसे और प्रतिष्ठा का दंड है।  अपने ही स्वामी पर वह दंड न चले इसलिये वह उससे बचते हैं। सच तो यह है कि प्रचार माध्यमों के कार्यकर्ता स्वयं कोई समाचार खोज नहीं लाते। जब किसी शिखर पुरुष पर प्रकृति का दंड चलता है तो उस पर प्रचार माध्यमों के कार्यकर्ता भी हाथ साफ करने लगते हैं।
                        हमारे यहां अब राजनीति, समाज, धर्म, व्यापार, कला तथा साहित्य के क्षेत्र में अंग्रेजी व्यवस्था का पालन किया जाता है। इसी व्यवस्था के आधार पर प्रसिद्ध अंग्रेजी साहित्यकार जार्ज बर्नाड शॉ ने कहा था कि इस समाज में बिना गलत काम के कोई भी धनवान नहीं बन सकता।  हम यहां अपने देश के विद्वानों के कथन नहीं सुनायेंगे बल्कि जार्ज बर्नाड शा के कथन पर ही विचार करें तो यह बात तय है कि जिनके पास धन आया है उनकी भले ही प्रचार माध्यमों में छवि धवल हो पर उनके कारनामों के बारे में यही बात दावे से नहीं कही जा सकती।  बहरहाल भारत के समाचार चैनलों ने यह नीति बना रखी है कि जिसकी छवि खराब करनी हो उसे लेकर धारावाहिक रूप से समाचार चलायें जायें।
                        आजकल एक कथित व्यवसायिक संत की छवि को लेकर यह प्रचार माध्यम अत्यंत सक्रिय हैं।  हम जैसे अध्यात्मिक साधकों के लिये अब ऐसे समाचारों का कोई महत्व नहीं है पर जिन लोगों का धर्म के प्रति रुझान ज्यादा है वह इन समाचारों को देखते हैं और आह भरकर रह जाते हैं।
                        उस दिन हमारे एक मित्र कह रहे थे कि-‘‘यार, हमने तो अब समाचार चैनल देखना ही बंद कर दिये हैं। यह लोग उस संत के बारे में सुना सुनाकर बोर कर रहे हैं।’’
                        हमने कहा-‘‘यह समाचार चैनल वाले भी क्या करें? हमारे देश में निंदात्मक समाचारों के प्रति रुझान हो तो उसका वह आर्थिक दोहन तो करेंगे। वैसे तुम्हारी उस संत से हमदर्दी क्यों है?’’
                        वह बोला-‘‘नहीं, मैं उसका शिष्य नहीं हूं पर इस तरह हमारा हिन्दू धर्म बदनाम हो रहा है उसे देखकर दुःख होता है।  जब उस संत ने अपराध किये हैं तो उसकी सजा उसे मिलेगी पर उस पर इस तरह समाचार देखकर ऐसा लगता है कि हमारे धर्म का मजाक उड़ाया जा रहा है। यह सब देखा नहीं जाता।’’
                        हमने कहा-‘‘तुंम भावुक हो, इसलिये ऐसा सोचते हो, पर सामान्य लोग रुचि लेते होंगे इसलिये तो यह सब चल रहा है।’’
                        वह बोला-‘‘नहीं, तुम्हें यह लग रहा है मेरे अनेक मित्रों ने यही विचार दिया है।  अनेक लोग तो कहते हैं कि हमारे चैनलों में अपने ही धर्म के विरुद्ध कोई समूह सक्रिय है। वह संत एक प्रकरण में पकड़ा गया है और यह अब उस पर आठ और दस साल पूर्व के मामले उछाल रहे हैं। अगर यह चैनल वाले इतने ही दमदार हैं तो पहले कहां थे? दूसरी बात आरोप लगाने वाले चुप क्यों थे? तुम मानो या न मानो सच यह है कि इस प्रकरण में कोई फिक्सिंग लगती है।’’
                        हमने उससे कहा-नहीं यह बात नहीं है! तुम्हारे अंदर भी कहीं निंदा सुनने की प्रवृत्ति मौजूद है पर चूंकि धर्मभीरु और इससे  तुम्हारी भावना आहत हो रही है इसलिये ऐसा सोचते हो।
                        वह हमसे सहमत नहीं हुआ। सच बात तो यह हे कि हम विभिन्न समाचार सुनने के आदी हैं पर इस तरह की धारावाहिक प्रस्तुति हमें दुःखी नहीं वरन् बोर करती है।  एक व्यक्ति का दूसरे व्यक्ति पर आक्षेप हमेशा न्याय का विषय होता है उस समाचारों में इस तरह बहस चलाना यकीनन इस  संदेह को जन्म देता है कि कहीं न कहीं दाल में काला है।  इस देश में धर्म, कला, साहित्य, फिल्म, और समाजसेवा में अनेक काले कारनामे होते हैं और किसी एक का काला कारनामा जब इस तरह चलेगा तो यकीनन कुछ लोगों को यह शक तो होगा ही कहीं यह व्यक्ति विशेष  के विरुद्ध अभियान किसी अन्य कारण से तो नहीं है।
                        बहरहाल हमारी दिलचस्पी न इस तरह के समाचारों में अधिक देर तक रहती है और न ही हमें इस बात का दुःख है। हम तो घर्मभीरुओं और अध्यात्मिक साधकों से यही कहना चाहेगे कि हमेशा उस विषय से जुड़े जो हृदय में प्रसन्नता उत्पन्न करे।  दूसरे के प्रति ग्लानि का भाव आने पर यह नहीं समझना चाहिये कि वह कोई अच्छी बात है वरन् उससे हमारा स्वयं की खून जलता है।  हम दूसरे के दोषों को देखें यह अच्छी बात नहीं है वरन् हम उन समाचारों की तरफ देखें जो हृदय को अच्छे लगें। आजकल टीवी पर बाल बुद्धिमानों की प्रस्तुति भारी प्रसन्नता देती है।  इसे हम देखना  छोड़ते नहीं है अलबत्ता निंदात्मक धारावाहिक आने पर चैनल बदल लें और फिर ध्यान छूट जाये तो यह बात अलग है। श्रीमद्भागवत गीता पर एक बालिका का ज्ञान बहुत अच्छा लगा।  सच तो यह है कि एक ग्लानिपूर्ण प्रसंग के बाद प्रचार माध्यमों ने बाल बुद्धिमानों का प्रसारण कर एक तरह से प्रचार योग किया है।  यह लगभग ऐसा ही जैसा कि हम सूर्य नमस्कार के बाद शवासन करते हुए आनंद प्रांप्त करते हैं।

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poet-Deepak raj kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर
poet, writer and editor-Deepak 'BharatDeep',Gwalior
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1 अक्टूबर 2013

भलमानस-हिन्दी व्यंग्य कविता (bhalmanas-hindi vyangya kavita)



अपनी घर की छत के नीचे
उदास मन रहता है जिनका
वही खिड़कियों से बाहर
दूसरों के घर में झांकते हैं,
हम ज्यादा दुःखी है या पड़ौसी
दिल ही दिल में आंकते हैं।
कहें दीपक बापू
अपनी अमीरी पर इतराते लोग
एकदम झूठे हैं,
जेब हैं भरी पर दिल टूटे हैं,
पैसा खर्च कर श्रद्धा दिखाते हैं,
दौलतमंद के साथ दरियादिल के रूप में
अपना नाम लिखाते हैं,
अपने बदचलनी पर उनकी सफाई यही होती
हमसे तो बड़ी और बुरी दूसरे की भूल होती,
अपने घर से उकताये लोग
बाहर व्याकुलता फैलते  देखने को तैयार हैं,
दूसरों की खुशी के रस में
गम की बूंद डालने वाले यार हैं,
कभी न की किसी की भलाई
अपने भलमानस की बात खुद ही हांकते हैं
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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poet-Deepak raj kukreja "Bharatdeep"
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21 सितंबर 2013

गांवों में पहुंच गया बेदर्द शहर-हिन्दी व्यंग्य कविता (gaanvon mein pahunch gaya bedard shahar)



बंदर दे रहा था धर्म पर प्रवचन
उछलकूद करते हुए तमाशा भी
दिखा रहा था
यह सनसनीखेज खबर है
उसके मुखौटे के पीछे
इंसान का चेहरा है
आंखें देखती हैं पर पहचानती नहीं
कान सुनते है मगर समझ नहीं इतनी
बंदर के बोलों में इंसान का ही स्वर है।
कहें दीपक बापू
ज़माना बंटा है टुकड़ों में
कोई दौलत के नशे में मदहोश है,
कोई गरीबी के दर्द से बेहोश है,
जज़्बात सभी के घायल है,
ख्वाबी अफसानों के फिर भी कायल है
दिल के सौदागरों के अपनी चालाकी से
रोते को हंसाने के लिये
खुश इंसान के दिमाग में प्यास बढ़ाने के लिये
मचाया इस जहान  में विज्ञापनों का  कहर है।
देखते देखते
गांवों की खूबसूरती हो गयी लापता
नहीं रही वहां भी पुरानी अदा
घर घर पहुंच गया बेदर्द शहर है।
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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poet-Deepak raj kukreja "Bharatdeep"
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15 अगस्त 2013

अथर्ववेद से संदेश-मातृभूमि हमें बुद्धि बल प्रदान करे (atharvvede se sandesh-matrabhoomi hamen buddhibal pradan karen)



         हमारे देश में मातृभूमि का अत्यंत महत्व दिया जाता है।  हमारा अध्यात्मिक दर्शन का स्पष्ट मानना है कि देहधारी मनुष्य की इस संसार में उपस्थिति माता पिता के साथ ही मातृभूमि के कारण भी है।  आधुनिककाल  में देशभक्ति के भाव से अनेक गीत तथा प्रार्थनायें लिखी गयी हैं पर उनमें केवल आर्तभाव है।  इसके विपरीत हमारा अध्यात्मिक दर्शन मातृभूमि की आराधना में शक्तिशाली भाव पैदा करने के लिये अनेक मंत्रों का प्रवर्तक है।  हमारे यहां साकार तथा सकाम भक्ति के  दो प्रकार होते हैं-एक तो है आरती दूसरा है मंत्र जाप।  आरती  अत्यंत स्पष्ट रूप से परमात्मा के इष्ट स्वरूप से याचना के भाव से गायी जाती है।  उसमें अपने अभावों तथा कमजोरियों का उल्लेख किया जाता है। यहां तक कि उसमें स्वयं को अत्यंत हेय जीव बताया जाता है। इसके विपरीत मंत्र में परमात्मा के इष्ट स्वरूप को आह्वान किया जाता है।  अपने हेय रूप की बजाय अपने तपरूप से परमात्मा को आकर्षित किया जता है।  आरती मेें आशा का तत्व होता है ताकि परमात्मा प्रसन्न होकर इच्छित फल प्रदान करें जबकि मंत्रजाप में यह विश्वास होता है कि परमात्मा निश्चय ही किसी विषय में सफलता या वस्तु प्राप्त करने की शक्ति प्रदान करेंगे।

अथर्ववेद में कहा गया है कि
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सा नो भूमिर्वि सृजता माता पुत्रय में पचः।
          हिन्दी में भावार्थ-जिस प्रकार माता पिता अपने बच्चों को पालते हैं उसी तरह भूमि हमें समस्त आवश्यक पदार्थ प्रदान करें।
ता नः प्रजाः सं दुहतां समग्रा वाचो मधु प्रथिवी धेहि महान्।
          हिन्दी में भावार्थ-हे मातृभूमि! हम तुम्हारी प्रजा एकत्र हों मधुर वाणी बोले। हमको मधुर वचन बोलने की शक्ति दे।
उदीराणा उतासीनास्तिष्ठन्तः प्रकामन्तः।
पद्मयां दक्षिणसव्याभ्यां मा यथिष्महि  भूम्याम्।
          हिन्दी में भावार्थ-चलते फिरते, उठते बैठते, दायें बायें पांव से टहलते हुए भूमि में हम किसी को दुःख न दें।
भूमे मातार्नि धेहि भा भद्रया सुप्रतिष्ठितम्।
संविदाना दिवा कवे श्रियां धेहि भूत्याम्।
        हिन्दी में भावार्थ-हे मात्ृभूमि! कल्याणकारी बुद्धि से हमें युक्त कर मुझको प्रतिदिन सब विषयों को ज्ञान कराओ ताकि प्रथ्वी की संपत्ति प्राप्त हो।

            हमारे देश में स्वतंत्रता के बाद जणगणमण के रूप में राष्ट्रीय गीत तथा गान के रूप में वंदेमातरम को मान्य किया गया।  जनमगमन में अधिनायक शब्द पर अनेक लोग चर्चा करते हुए उसमें तानाशाह की वृत्ति देखते हैं। उसी तरह वंदेमातरम में भी अनेक लोगों को अप्रसन्नता होती है।  इन दोनों से प्रथक कभी किसी अन्य गीत या प्रार्थना को अधिक महत्व नहीं दिया जाता हैै।  दरअसल मातृभूमि हमारे लिये इस देह की उसी तरह सहायक होती है जैसे निरंकार ब्रह्म सहायक होता है।  हमारी बुद्धि शुद्ध होने के साथ ही विचार पवित्र हों इसके लिये अगर किसी सुविधाजनक मंत्र का जाप किया जाये तो निश्चित रूप से कल्याण होगा। अथर्ववेद के मंत्रों में ऐसा भाव है जिससे लगता है कि उसके जाप से मनुष्य में शक्ति आवश्यक रूप से आयेगी।

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
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29 जुलाई 2013

कौन दर्द दूर कर पायेगा-हिन्दी कविता (kaun dard door ka paayega-hindi kavita)



यकीन करो

तुम्हारे दर्द की दवा करने

कोई फरिश्ता आकाश से नहीं आयेगा,

जमीन पर भी इलाज का दावा करने वाला

कोई इंसान बिना पैसे मरहम नहीं लगायेगा।

कहें दीपक बापू

कान से नारे सुनकर अनुसना कर देना,

लिखे वादे से भी आंख फेर लेना,

नुस्खे बनाये है सौदागरों ने

केवल अपने घर भरने के लिये,

दूसरे के घर की

रौशनी चुराकर जलाते अपने दिये,

आर्त होकर मत गाओ उनके गीत,

मतलब के हैं जो मीत,

कहीं रिश्ते नाम के रह जाते,

कहीं नाम से रिश्ते लोग बढ़ाते,

अपने सहने की ताकत बढ़ाओ

मुस्कराकर अपने गम घटाओ,

कोई नहीं है इस दुनियां में

लोग खरीद रहे खुद अपने लिये जख्म

इस ज़माने में आपसी  होड़ लगाकर

कौन किसका दर्द दूर कर पायेगा।

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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
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16 जून 2013

रविवार कि व्यवसायिक प्रचार वार-हिन्दी व्यंग्य चिंत्तन (ravivar ki vyavasayik war-hindi vyangya chinttan)



       आधुनिक व्यापार और प्रचार जगत में रविवार एक तरह से व्यवसायिक वार बन गया है।  भले ही सरकारी और गैर सरकारी संस्थाओं के साथ ही अधिकतर संगठित व्यवसायिक तथा औद्योगिक  क्षेत्रों में रविवार को अवकाश रहता है पर उपभोक्ता वस्तुओं के विक्रय केंद्रों में इस दिन लोगों की भारी  भीड़ रहती है।  इसके साथ ही प्रचार माध्यमों पर भी दर्शकों का तांता लगा रहता है। घर में रखे टीवी हों या बाज़ार के फिल्म दर्शन केंद्र दर्शकों का समूह उनके पर्दों को निहारता है।  यही कारण है कि शनिवार शाम से लेकर रविवार रात्रि तक अपने व्यवसायिक  हित साधनो वाले व्यवसायी अपने उत्पादों तथा गतिविधियों को आम लोगों की आंखों में चमकाने के लिये प्रचार माध्यमों में अपने विज्ञापन प्रस्तुत करने के लिये आतुर रहते हैं। आम लोगोें की आंखों तथा कान के माध्यम से वह उनके दिमाग में प्रवेश कर उसकी जेब ढीली करने का प्रयास करते हैं।
     हमने यह भी देखा है कि यह काम केवल प्रत्यक्ष व्यवसायी ही नहीं करते बल्कि अप्रत्यक्ष रूप से आमलोगों की नज़रों में बने रखने के लिये ऐसे लोग भी करते हैं जिनका काम समाज सेवा करना है।  यह तो पता नहीं विदेशों में किस तरह इस रविवार का उपयोग प्रचार दिवस के रूप में होता है या नहीं पर भारत में इसका प्रयास अभी हाल ही में शुरु हुआ है।  राजनीतिक, आर्थिक, कला, पत्रकारिता तथा फिल्म के क्षेत्रों से जुड़े लोगों ने रविवार को आत्म प्रचार के लिये जिस तरह रविवार का दिन चुनना शुरु किया है वह अन्ना हजारे के आंदोलन के दौरान उनके प्रबंधकर्ताओं के कौशल से प्रेरित हुआ लगता है।  अन्ना हजारे ने लंबे समय तक अनशन किया पर शुक्रवार शाम से रविवार शाम तक उनके प्रबंधक इस तरह विषयों का संचालन करते थे कि उनका आंदोलन पूरे दो दिन तक टीवी के पर्दे पर छाया रहता था।  अन्ना हजारे साहब के आंदोलन का परिणाम क्या हुआ, यह अलग से विचार का विषय है पर प्रचार में बने रहने के लिये उनसे जुड़े प्रबंधकों ने जो कार्यशैली अपनाई उसका अनुकरण अब राजनीतिक, आर्थिक, तथा कला से जुड़े लोग कर रहे हैं।  आज का रविवार तो अत्यंत दिलचस्प निकला। एक साथ तीन तीन बड़े राजनीतिक दलों ने क्रम से पर्दे पर अपने अपने शिखर पुरुषों को इस तरह बनाये रखा कि उनके प्रसारण में आपसी टकराव न हो भले ही दलीय रूप से उनमें प्रतिद्वंद्वता हो। इस दौरान एक टीवी उद्घोषक ने इस बार पर हैरानी जताई कि आज रविवार के दिन ही क्या योजनापूर्वक यह सब किया जा रहा है?
  हमें उसके इस मासूम प्रश्न पर हंसी आ गयी। अभी यह प्रयास अधिक दिख रहे हों पर ऐसा पहले हो चुका है।  हालांकि लोकप्रियता के आधार पर अपना काम करने वाले सभी क्षेत्रों के लोगों के ऐसे  प्रयास भी पश्चिम से प्रेरित है।  हमने यह देखा है कि पश्चिमी देशों ने अनेक ऐसी घटनाओं को शनिवार और रविवार के दिन इस तरह प्रस्तुत किया जिससे उनका प्रचार अधिक हो।   भारत में संभवतः अन्ना हजारे के आंदोलन के बाद ही                                               
यह बड़ी शिद्दत के साथ शुरु हुआ। दरअसल जब अन्ना हजारे का आंदोलन थमता था तो प्रचार माध्यमों के प्रबंधकों के साथ समस्या आती थी कि इस तरह का कोई दूसरा घटनाक्रम कब आये जब उनके विज्ञापन का समय सहजता से लंबे समय तक बीत सके।  इधर यह भी देखने में आया कि कुछ संगठन अपने आंदोलनों का दिन भी शनिवार और रविवार को ही चुनते हैं। तय बात है कि जिन लोगों का स्वाभाविक कर्म ही प्रचार के सहारे हैं उन्हें भी यह प्रेरणा मिली होगी कि वह अपने घटनाक्रमों को शनिवार तथा रविवार के दिन योजनापूर्वक बनायें।  यह बुरा प्रयास नहीं है क्योंकि जागरुक लोगों को सामान्य दिनों में घर आकर टीवी खोलने से पहले आराम के दौर से निकलना पड़ता है।  अवकाश के दौरान वह निंरतर जुड़े रहते हैं जिससे उन्हें प्रभावित किया जा सकता है। 
      आज रविवार के दिन शिखर पुरुषों की तीन अलग अलग पत्रकार वार्ताओं के समय इस तरह चुने गये कि एक दूसरे के साथ टकरायें नहीं। देश में अभी लोकसभा चुनावों में एक वर्ष का समय है पर राजनीतिक वातावरण में गर्मी अभी से आ गयी है।  स्वाभाविक रूप से जिन लोगों को अगले चुनावों में सक्रिय भागीदारी करना है वह प्रचार में निरंतर बने रहने के लिये प्रयास करेंगे।  चुनाव लड़ना कोई सरल काम नहीं है।  अकेले पैसा खर्च कर भी चुनाव जीतना संभव नहीं है। इससे पहले आम लोगों में अपनी सक्रियता  दिखानी पड़ती है।  अपने आप को सभ्य तथा सतर्क व्यक्ति साबित करना होता है। यह काम प्रचार से ही संभव है। वह भी एक या दो दिन  बल्कि वर्ष दो वर्ष कभी तीन वर्ष भी इसमें लग सकते हैं।
          इधर हमने क्रिकेट मैचों में भी यह देखा है कि जब किसी प्रतियोगिता में बीसीसीआई की टीम तथा पाकिस्तान आमने सामने होते हैं तब दिन ऐसा ही चुना जाता है कि भारत में अवकाश हो।  यह माना जाता है बीसीसीआई की टीम तथा पाकिस्तान का मैच सबसे महंगा होता है।  अभी चैंपियन ट्राफी में दोनों का मैच शनिवार को हुआ।  इस मैच का महत्व एकदम खत्म हो चुका था। पाकिस्तान की टीम पहले ही अगले दौर से बाहर हो चुकी थी और बीसीसीआई की टीम सभी मैच जीतकर सेमीफायनल के लिये योग्यता प्राप्त कर चुकी थी।  टीवी चैनलों ने इसे महामुकाबला बताने का प्रयास भी नहीं किया।  इस पर बरसात के कारण टुकड़ो टुकड़ों में यह मैचा खेला गया।  मैच छोटा था बड़ा होता तो भी बीसीसीआई का दल ही  जीतता।  दरअसल पाकिस्तान की टीम जितने बुरे दौर में उतना ही आकर्षक रूप बीसीसीआई की टीम का है। बहरहाल मुकाबला आकर्षक नहीं था। खेल भी कोई आकर्षक नहीं हुआ।  जीत भी आकर्षक नहीं रही।  सच बात तो यह है कि पाकिस्तान की टीम का प्रदर्शन इस प्रतियोगिता में इतना निम्न स्तरीय रहा है कि बीसीसीआई की टीम अगर पाकिस्तान से हारती तो शक शुबहे में आ जाती।  वैसे इस प्रतियोगिता में जाने से पहले बीसीसीआई की टीम अत्यंत संदेहों के साथ लेकर गयी है जो निंरतर जीतों से दूर हो गया लगता है पर अगर पाकिस्तान से हारती तो फिर वहीं फिक्सिंग का भूत उसके सामने आ जाता। बहरहाल रविवार को व्यवसायिक वार बना दिया गया है तो उसे बुरा भी नहीं कहा जा सकता।

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18 जनवरी 2013

फेसबुक टु ठेसबुक-हिन्दी व्यंग्य (facebook to thesbook-hindi vyangya or hindi satire)

        कम से कम आधुनिक तकनीकी से जुड़ने का सौभाग्य हमें मिला इसके लिये परमात्मा का धन्यवाद अवश्य अर्जित करना चाहिए। अंतर्जाल इंटरनेट अनेक बार गजब का अनुभव कराता है।  सभी अनुभवों की चर्चा करना तो संभव नहीं है पर फेसबुक के माध्यम से ऐसे लोगों को तलाशना अच्छा लगता है जिन्हें हमने बिसारा या उन्होंने ही याद करना छोड़ दिया है।  हम जैसे लेखकों के लिये फेसबुक केवल चंद मित्रों और प्रशंसकों से जुड़े होने का एक माध्यम भर है जबकि ब्लॉग पर लिखने के पर  ही असली आनंद मिलता है। यह ब्लॉग एक तरह से अपनी पत्रिका लगती है।  यहां लिखकर स्वयंभू लेखक, कवि और संपादक होने की अनुभूति होती है। यह आत्ममुग्धता की स्थिति है पर लिखने के लिये प्रेरणा मिलती है तो वह बुरी भी नहीं है।  शुरुआत में फेसबुक से जुड़ना ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं लगा।  अलबत्ता ब्लॉग मित्रों को देखकर अपना खाता बना लिया।  जान पहचान की बालक बालिकाओं ने अपनी फेसबुकीय रुचि के बारे में बताया फिर भी अधिक दिलचस्पी नहीं जागी।  एक बार दूसरे शहर गये तो वहां एक बालक ने लेपटॉप पर अपने फेसबुक से हमारा खाता जोड़ दिया।  तय बात है कि उसके संपर्क के अनेक लोगों में हमारी दिलचस्पी भी थी।  इनमें लेखक कोई नहीं है पर फेसबुक पर सक्रिय होने के लिये उसकी कोई आवश्यकता भी नहीं होती। इधर से उधर फोटो उठाकर अपने यहां लगाने के लिये बस एक बटन दबाना है।  लोग अपनी मनपसंद की सामग्री इसी तरह लगाकर खेल रहे हैं।  अपने फोटो एल्बम लगाकर एक दूसरे को प्रोत्साहित करते हैं।
    ऐसे में भूले बिसरे लोगों को ढूंढने का प्रयास करना हम जैसे लेखकों के लिये दिलचस्प होता है।  यह दिलचस्पी तब आनंददायक होती है जब आप ऐसे लोगों का खाता ढूंढ लेते हैं जिनके साथ कभी आपने अपने खूबसूरत पल गुजारे पर अब हालातों ने आपसे अलग कर दिया।  आम आदमी की याद्दाश्त कमजोर होती है इसलिये समय, हालत और स्वार्थों की पूर्ति के स्त्रोत बदलते ही वह अपनी आंखों में प्रिय लगने वाले चेहरों को भी बदल देता है।  कर्ण को प्रिय लगने वाले स्वर भी बदल जाते हैं।  लेखक होता तो आम आदमी है पर वह अपनी याद्दाश्त नहीं खोता।  दौर बदलने के साथ वह अपनी यादों को जिंदा रखता है।  यह उसकी स्वाभाविक प्रवृत्ति होती है।  वरना वह नित नयी रचनायें नहंी कर सकता।
              फेसबुक में हमने ऐसे अनेक खाते ढूंढे हैं जिनके स्वामी हमसे दूर हो गये। जब मिलते हैं तो तपाक से मिलते हैं।  नहीं मिलते तो पता नहीं उनको याद भी आती कि नहीं।  एक प्रियजन का खाता ढूंढ रहे थे पर उसने बनाया ही नहीं था।  तीन चार साल में तीन मुलाकतें हुई। आखिरी मुलाकात छह महीने पहले हुई थी।  वह पढ़े लिखे हैं  फेसबुक खाता कभी खोलेंगे यह सोचना मूर्खता थी। एक संभावना थी कि उनके परिवार के नयी पीढ़ी के सदस्य उन्हें इस काम के लिये प्रेरित कर सकते हैं।  हमने महीना भर पहले  एक दो बार ऐसे ही प्रयास किया कि शायद उनका खाता बन गया हो। कल अचानक फिर ख्याल आया तो उनका खाता फोटो सहित दिख गया।  हम कभी उनकी फोटो तो कभी उनकी गोदी में बैठी छह महीने की पोती की तरफ देखते थे।  उनके पूरे परिवार के सदस्यों के फेसबुक खाते देख लिये।  उनके फेसबुक से होते हुए हमने कई ऐसे करीबी लोगों के खाते भी देखे जिनको जानते हैं पर कोई औपचारिक संपर्क नहीं है।
       पहले विचार किया कि उनका फेसबुक मित्र बनने का संदेश भेजा जाये पर फिर लगा कि उनकी गतिविधियों पर हम नज़र रखे हुए हैं इससे वह खुलकर दूसरों से सपंर्क रखते समय प्रभावित हो सकते हैं।  सबसे बड़ी बात यह कि हम उनके फेसबुक पर उनके फोटो के साथ ही प्रोफाईल पर उनके मन का अध्ययन कर रहे थे।  पहली बार लगा कि फेसबुक एक तरह से वाईस स्टोरेज भी है।   हमने पहले भी कुछ ऐसे करीबी लोगों की फेसबुक देखी थी पर उस समय ऐसी बातें दिमाग में नहीं आयी अब  आने लगी थी।  सभी का फेसबुक कुछ बोल रहा था।  चेहरे की मुस्काने रहस्य छिपाती लग रही थीं।  वैसे भी हम नहीं चाहते कि हम किसी के व्यक्तिगत जीवन में हस्तक्षेप करें पर फेसबुक की मूक भाषा अगर कुछ कहती है तो उसे अनदेखा करना हमारे लिये संभव भी नहीं है।  फोटो एल्बम क्या कह रहे हैं?  जो नाम बार बार जुबान पर है वह फेसबुक पर क्यों नहीं है?  जिसका नाम दिल में होने का दावा है वह फेस कहीं करीब क्यों नहीं दिखाई देता?
              एक बात तय रही कि एक लेखक होने के नाते हम ब्लॉग का महत्व कभी कर ही नहीं सकते पर ऐसा भी लगने लगा है कि फेसबुक पर कुछ कहानियां हमारा इंतजार कर रही हैं। यहा कहानियां अंततः ब्लॉगों की शोभा बढ़ायेंगी।  यही कारण है कि फेसबुक पर उन लोगों को दूर ही रखना होगा क्योकि अंततः ब्लॉगों से रचनायें वहीं आयेंगी और वह हमारे नायक नायिकाऐं इसका हिस्सा होंगी।  फेस टु फेस यानि सामना होने पर फेसबुक की बात ही क्या इंटरनेट से अनजान होने का दावा भी प्रस्तुत करना होगा।  आखिरी बात फेसबुक पर जो संपर्क रखते हैं उनका प्रिय होना प्रमाणित है पर जो रोज नहीं मिलते पर उनमें से किसी के सामने खाताधारक अगर यह दावा करता है कि वह उसका प्रिय है तो प्रमाण स्वरूप उसका फेसबुक का पता जरूर मांगना चाहिये  यह देखने के लिये उसके एल्बम में कहीं स्वयं का फोटो है कि नहीं। यह अलग बात है कि जब दावा करने पर अपना फोटो न दिखे तो यह फेसबुक ठेसबुक भी बन सकती है।
लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poet-Deepak raj kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर
poet, writer and editor-Deepak 'BharatDeep',Gwalior
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5 जनवरी 2013

मददगार लगाते मदद का नारा-हिन्दी कविता(mdadgaar lagate madad ke nare-hindi kavita or hindi poem)


लड़खड़ाये थे हमारे कदम
इसलिये रास्ते में गिरे पड़े थे
बेहोशी की हालत में
कौन सुध लेता
होश में चिल्लाये
तब भी आते जाते लोगों ने
कर दिया अनसुना
मानो उनकी आंखों और कानों पर
बड़े ताले जड़े थे।
कहें दीपक बापू
मर गये हैं ज़माने के जज़्बात,
अपनी जिंदगी बचाने के लिये
जहां लोग रख देते दूसरों के सीने पर लात,
सड़क पर दरिंदों के हमले पर क्या रोऐं
वहां फरिश्तों के वेश में दिखे लोग
बेजान बुतों की तरह खड़े थे।
मददगार बनना था जिनको
हमारे घावों पर हमदर्दी जताने के साथ
मदद का नारा लगाते हुए
इसी ज़माने के लोग अड़े थे।

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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
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27 दिसंबर 2012

महाबहस की शौहरत-हिन्दी कविता (mahabahas ke shauharat-hindi kavita)

कुछ लोग हर विषय पर बोलेंगे,
फिर अपने प्रचार की तराजु में
अपनी इज्जत का वजन तोलेंगे।
कहें दीपक बापू
हर जगह छाये हैं वह चेहरे
बाज़ार के सौदागरों से लेकर दाम,
प्रचारकों के साथी होकर करते काम,
अपने लफ्जों की कीमत लेकर ही
हर बार अपना मुंह खोलेंगे,
नाम वाले हो या बदनाम
पर्दे पर विज्ञापनों के बीच 
महाबहस के लिये
सामान जुटायेंगे वही लोग
जो पहले मशहुर होकर
शौहरत के लिये इधर उधर डोलेंगे।
लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poet-Deepak raj kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
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17 दिसंबर 2012

दिल और दिमाग-हिन्दी शायरी (dil aur dimag-hindi shayari)

अब उदास होने को  हमारा मन नहीं करता,
तन्हा हो या भीड़ में अपना  सोच नहीं मरता।
असलियत आ गयी है सामने
पूरे जमाने की
ख्याली घोड़े पर सवार लोग
करते हैं दौड़ जीतने के दावे
सौदे के सम्मान से हर कोई झोली भरता।
कहें दीपक बापू
अपनी कलम चलती जब कागज पर,
या नाचती हैं  टंकित कर,
होठों पर हंसी खुद-ब-खुद आ जाती है
लोगों ने भर ली झोली सामानों से
हम शब्दों के भंडार से खुश हैं
मुश्किल है आज के दौर में
अपने दिल और दिमाग को जिंदा रखना
यह हर कोई जुटा है खुशियां ढूंढने में
जिंदा रहने के लिये हर पल आदमी मरता।


लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
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21 अक्टूबर 2012

दरियादिलों का इतिहास-हिंदी कविता (dariyadilon ka itihas-hindi kavita or poem

कमरे के अंदर वह खाना खाते हुए
आपस में बतियाइंगे,
कभी चिल्लायेंगे
कभी खिलखिलायेंगे,
बाहर भीड़ के सामने
करेंगे जहान का भला करने के फैसले का दावा
किया होगा जो उनके कारिंदों ने बैठकर
उसे अपनी मुलाकात का नतीजा दिखायेंगे।
कहें दीपक बापू
ऐसे दृश्य देखते हुए बीत गये बरसों
ऊंचाई पर बैठे लोग
अपनी अदाओं से रिझाते हैं
आम इंसानों के घावों से निकलता खून देखकर
,अपना खाली समय मनोरंजन में बिताते हैं,
फिर भी इतिहास के पन्नों में
दरियादिल की तरह लिखायेंगे।
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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poet-Deepak raj kukreja "Bharatdeep"
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16 अगस्त 2012

धोखे का सौदा-हिंदी कविता (dhokhe ka sauda -hindi poem or kavita)

दौलत के ढेर पर बैठे हैं जो लोग
शौहरत भी उनके पास है,
मतलबपरस्तों ने पा लिये बड़े ओहदे
दरियादिली दिखाने की उनसे बेकार आस है,
चर्चे आम है कातिलों के,
प्यार के सौदागर बादशाह बने दिलों के,
मजे के दीवाने जमाने की चाहत है
गंगा उल्टी तरफ बहती नजर आये।
कहें दीपक बापू
ख्वाबों को हकीकत में लाना आसान नहीं,
सपनों की सच में कोई शान नहीं,
कसूरवार किसे कहें
सभी बेकसूरी के दावे करते नजर आये।
धोखे का सौदा
दुकानदार और ग्राहक दोनों को ललचाये।
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लेखक एवं कवि- दीपक राज कुकरेजा,‘‘भारतदीप’’, ग्वालियर
लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर 
poet, writer and editor-Deepak 'BharatDeep',Gwalior

writer aur editor-Deepak 'Bharatdeep' Gwalior



10 अगस्त 2012

तत्वज्ञान के संदर्भ में महिला महामंडलेश्वर विवाद-हिन्दी लेख (tatvagyan sa sandarbh mein mahila mandleshwar wowen sant-hindi article)

      जब धर्म केवल कर्मकांडों तक सिमटता है तब वहां ज्ञान की बात करना निरर्थक है। मूलतः धर्म का आधार अध्यात्म है पर अध्यात्मिक दर्शन और धर्म के बीच कोई स्पष्ट रेखा हमारे यहां खींची नहीं गयी है इसी कारण कर्मकांडों के विद्वान आमजन की संवेदनसओं का दोहन करने में सफल हो जाते हैं।  प्रसंग है एक कथित महिला को महामंडलेश्वर बनाने का जिसका चहुं ओर विरोध हुआ तो उसे वहां से निलंबित कर दिया गया।  
     उस महिला के अनेक दृश्य टीवी चैनलों पर दिखाई दिये। जिसमें नृत्य और भजन थे।  तत्वज्ञान की बात करते हुए तो उसे देखा ही नहीं गया।  वह महिला धर्म के व्यापार में ढेर सारी माया अपने चरणों में स्थापित कर चुकी है। उसका श्रृंगार देखकर कोई भी इस बात को नहीं मानेगा कि उसके पास अध्यात्मिक ज्ञन का ‘अ’ भी होगा। आरोप लगाने वालों ने  ने इस पदवी में धन के लेनदेन का आरोप भी लगाया है। सच क्या है पता नहीं पर हम यहां बात कर रहे हैं महामंडलेश्वर की उस उपाधि की जिसकी जानकारी अनेक लोगों के  लिये नयी नहीं है पर उसको प्रदाने करने की कोई प्रक्रिया है यह बात पहली बार इतने प्रचार के  साथ सामने आयी ।  आदि गुरु शंकराचार्य ने धर्म प्रचार के लिये चार मठ बनाये जिनके सर्वेसर्वा अब शंकराचार्य कहलाते हैं।  इनका भारतीय समाज में स्थान कितना है यह अलग से विचार का विषय हो सकता है पर भारतीय अध्यात्म की जो धारा सदियों से बह रही है उसके प्रवाह में इनका योगदान अधिक नहीं है यह  वर्तमान लोगों की जानकारी देखकर लगता है।  हिन्दू धर्म तथा भारतीय अध्यात्म के इतिहास तथा तत्वज्ञान का अध्ययन करने वाले हर शख्स का आदि शंकराचार्य का पता है पर वर्तमान शंकराचार्यों के प्रति उनके मन में मामूली श्रद्धा है जो कि हमारे देश की धरती पर उपजते सहज मानवीय  स्वभाव के ही कारण है।  वह यह कि सभी संतों का सम्मान करना चाहिए। न भी करें तो उनकी निंदा करने से बचना चाहिए।
एक बात तय है कि बिना तत्वज्ञान के भारतीय जनमानस में सम्मान प्राप्त नहीं कर सकता।  वैसे तो कई संत हैं जो नृत्य और भजन कर भक्तों को प्रसन्न करते हैं। ऐसे संत तत्वज्ञानियों से अधिक धनवान होते हैं। जिनकी ज्ञान में रुचि नहीं है वह भक्त भी सांसरिक विषयों से ऊबकर इन संतों के सानिध्य में भक्ति और मनोरंजन के मिश्रित सत्संग का आनंद उठाते हैं।  वह इनको दान, चंदे या गुरुदक्षिणा देकर भगवान को प्रसन्न हुआ मानते हैं। इस तरह बिताया गया समय  क्षणिक रूप से उनको लाभ द्रेता है पर जब अध्यात्मिक शांति की बात मन में आती है तो उनको अपना मन खाली दिखता है।
      बहरहाल अब समय बदल गया है पर भारतीय अध्यात्मिक दर्शन सत्य पर आधारित है इसलिये उसके संदर्भ आज भी प्रासांगिक हैं।  नृत्य और गीत के सहारे भक्तों को सत्संग प्रदान करने वाली जिस महिला को विवादास्पद ढंग से महामंडलेश्वर बनाया गया उस पर बवाल उठा तब उसका नाम प्रचार में आया। अगर यह विवाद प्रचार माध्यमों में नहीं आता तो शायद अनेक  लोग यह समझ ही नहीं पाते कि महामंडलेश्वर होता क्या है? संभव है पैसे का लेनदेन हुआ हो। हमारे यह धार्मिक संगठनों में भी अब माया ने इस कदर अपनी पैठ बना ली है कि वहा उच्च पदों पर बैठे लोगों से सात्विक प्रवृत्ति की हमेशा आशा नहीं की जा सकती।  जिसने उपािध ली और जिन्होंने दी उन पर क्या आक्षेप किया जा सकता है? जब समाज ने क्रिकेट खिलाड़ियों में भगवान और फिल्मों अभिनेताओं में देवता होने की अवधाराणा को मान लिया है तब पेशेवर धार्मिक संगठनों या उनके पदाधिकारियों से-जिनको बिना किसी विद्यालय में गये ज्ञानी और धर्म का प्रतीक होने का प्रमाणपत्र मिला हुआ है-यह अपेक्षा करना व्यर्थ है कि वह अपनी उपाधियां उन नर्तकों और गायकों को न दें जो मनोरंजन को भक्ति के रूप में बदलने की कला में माहिर हों।
   जहां तक तत्वज्ञान का प्रश्न है तो वेदों और शास्त्रों के जानकार होने का दावा करने वाले अनेक संत जब श्रीमद्भागवत गीता पर बोलते हैं तो यह देखकर आश्चर्य होता है कि वह उस ज्ञान से स्वयं ही दूर हैं।  ऐसी घटनाओं से अधिक आश्चर्य इसलिये भी नहीं करना चाहिए क्योंकि भारतीय समाज में ऐसे तत्व हमेशा ही मौजूद रहेंगे जो धर्म के नाम कर्मकांड और भक्ति के नाम पर मनोरंजन का व्यवसाय करते हैं।
लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर 
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