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15 अगस्त 2013

अथर्ववेद से संदेश-मातृभूमि हमें बुद्धि बल प्रदान करे (atharvvede se sandesh-matrabhoomi hamen buddhibal pradan karen)



         हमारे देश में मातृभूमि का अत्यंत महत्व दिया जाता है।  हमारा अध्यात्मिक दर्शन का स्पष्ट मानना है कि देहधारी मनुष्य की इस संसार में उपस्थिति माता पिता के साथ ही मातृभूमि के कारण भी है।  आधुनिककाल  में देशभक्ति के भाव से अनेक गीत तथा प्रार्थनायें लिखी गयी हैं पर उनमें केवल आर्तभाव है।  इसके विपरीत हमारा अध्यात्मिक दर्शन मातृभूमि की आराधना में शक्तिशाली भाव पैदा करने के लिये अनेक मंत्रों का प्रवर्तक है।  हमारे यहां साकार तथा सकाम भक्ति के  दो प्रकार होते हैं-एक तो है आरती दूसरा है मंत्र जाप।  आरती  अत्यंत स्पष्ट रूप से परमात्मा के इष्ट स्वरूप से याचना के भाव से गायी जाती है।  उसमें अपने अभावों तथा कमजोरियों का उल्लेख किया जाता है। यहां तक कि उसमें स्वयं को अत्यंत हेय जीव बताया जाता है। इसके विपरीत मंत्र में परमात्मा के इष्ट स्वरूप को आह्वान किया जाता है।  अपने हेय रूप की बजाय अपने तपरूप से परमात्मा को आकर्षित किया जता है।  आरती मेें आशा का तत्व होता है ताकि परमात्मा प्रसन्न होकर इच्छित फल प्रदान करें जबकि मंत्रजाप में यह विश्वास होता है कि परमात्मा निश्चय ही किसी विषय में सफलता या वस्तु प्राप्त करने की शक्ति प्रदान करेंगे।

अथर्ववेद में कहा गया है कि
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सा नो भूमिर्वि सृजता माता पुत्रय में पचः।
          हिन्दी में भावार्थ-जिस प्रकार माता पिता अपने बच्चों को पालते हैं उसी तरह भूमि हमें समस्त आवश्यक पदार्थ प्रदान करें।
ता नः प्रजाः सं दुहतां समग्रा वाचो मधु प्रथिवी धेहि महान्।
          हिन्दी में भावार्थ-हे मातृभूमि! हम तुम्हारी प्रजा एकत्र हों मधुर वाणी बोले। हमको मधुर वचन बोलने की शक्ति दे।
उदीराणा उतासीनास्तिष्ठन्तः प्रकामन्तः।
पद्मयां दक्षिणसव्याभ्यां मा यथिष्महि  भूम्याम्।
          हिन्दी में भावार्थ-चलते फिरते, उठते बैठते, दायें बायें पांव से टहलते हुए भूमि में हम किसी को दुःख न दें।
भूमे मातार्नि धेहि भा भद्रया सुप्रतिष्ठितम्।
संविदाना दिवा कवे श्रियां धेहि भूत्याम्।
        हिन्दी में भावार्थ-हे मात्ृभूमि! कल्याणकारी बुद्धि से हमें युक्त कर मुझको प्रतिदिन सब विषयों को ज्ञान कराओ ताकि प्रथ्वी की संपत्ति प्राप्त हो।

            हमारे देश में स्वतंत्रता के बाद जणगणमण के रूप में राष्ट्रीय गीत तथा गान के रूप में वंदेमातरम को मान्य किया गया।  जनमगमन में अधिनायक शब्द पर अनेक लोग चर्चा करते हुए उसमें तानाशाह की वृत्ति देखते हैं। उसी तरह वंदेमातरम में भी अनेक लोगों को अप्रसन्नता होती है।  इन दोनों से प्रथक कभी किसी अन्य गीत या प्रार्थना को अधिक महत्व नहीं दिया जाता हैै।  दरअसल मातृभूमि हमारे लिये इस देह की उसी तरह सहायक होती है जैसे निरंकार ब्रह्म सहायक होता है।  हमारी बुद्धि शुद्ध होने के साथ ही विचार पवित्र हों इसके लिये अगर किसी सुविधाजनक मंत्र का जाप किया जाये तो निश्चित रूप से कल्याण होगा। अथर्ववेद के मंत्रों में ऐसा भाव है जिससे लगता है कि उसके जाप से मनुष्य में शक्ति आवश्यक रूप से आयेगी।

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poet-Deepak raj kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर
poet, writer and editor-Deepak 'BharatDeep',Gwalior
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9 जुलाई 2013

उम्रदराज का मनोविज्ञान-हिन्दी लेख (umradaraj ka manovigyan-hindi lekh)



       भारतीय अध्यात्मिक दर्शन में स्त्री पुरुषों के संबंध में बहुत कुछ लिखा गया है।  मूल रूप से काम संबंध स्त्री पुरुष का ही माना गया है।  उसमें कहीं भी समलैंगिक संबंधों की चर्चा नहीं है।  आधुनिक समय में जिस तरह कुछ देश समलैंगिक संबंधों को कानूनी दर्जा दे रहे हैं उसके आधार पर हम कह सकते हैं कि हमारा दर्शन अपूर्ण है पर सच बात यह है कि स्त्री पुरुष के संबंधों से ही आगे के जीवन का निर्माण होता है इसलिये वही एक सात्विक प्राकृतिक अवस्था है।  ऐसे में अगर भारत में कोई समलैंगिक दुर्घटना होती है तब हायतौबा मच जाती है।  दरअसल हम यहां  उस घटना की बात कर रहे हैं जिसमें एक राजनेता पर एक युवक का दैहिक शोषण करने का आरोप लगने की बात  सामने आयी है जिसने देश के सामाजिक जगत को हैरान कर दिया है।  राजनेता की आयु अस्सी वर्ष है और उसकी प्रतिष्ठा का जो पतन हुआ है वह राजनीति में नैतिकता के हृास से अधिक समाज में बढ़ती विकृत मानसिकता का प्रमाण भी है।
             आमतौर से राज्य कर्म में लिप्त लोगों के पास अपना काम निकलवाने वालों की भारी भीड़ रहती है।  दूसरी बात यह कि राजकीय संरक्षण पाने का मोह लोगों में इतना होता है कि वह किसी भी हद तक जा सकते हैं।  ऐसे में उन राजसी पुरुषों को  जो प्रत्यक्ष राज्य कर्म में लिप्त हैं  अपना नैतिक आवरण बचाना कठिन कार्य होता है।  जैसा कि हम जानते हैं कि मनुष्य के तीन प्रकार के स्वाभाविक कर्म होते हैं-सात्विक, राजस और तामस।  सात्विक लोग अपने निज आवश्यकताओं तक राजस कर्म करते हैं। उनके लक्ष्य भी सीमित होते हैं इसलिये आमतौर से प्रत्यक्ष राज्य कर्म में उनकी भूमिका अधिक लंबी नहीं रह पाती।  अधिक रहे और प्रभावी भी  तो प्रजा का भाग्य ही समझिये।  तामसी प्रवृत्ति के लोगों को यदि राज्य कर्म में प्रत्यक्ष भूमिका मिल जाये तो समझ लीजिये कि हालातों को बिगड़ना ही है।  हां, अगर राजसी प्रवृत्ति के लोग अगर राज्य कर्म में सीधे हों तो एक बेहतर संभावना बनती है।  अगर राज्य कर्म राजसी प्रवृत्ति से किये जायें तो यकीनन प्रजा के लिये सुखदायक होता है।  यहां हम यह भी बता दें कि जिनकी मूल प्रवृत्ति सात्विक है उन्हें राज्य कर्म से बचना चाहिये क्योंकि भले ही वह अपने आचरण की वजह से कुछ समय तक प्रजा में लोकप्रिय रहें पर अपने अंदर छल, कपट, धोखा तथा चालाकी के गुणों के अभाव में कालांतर में उनका राज्य प्रजा के लिये फलदायी नहीं रहता।  राज्य कर्म में प्रजा हित के लिये अनेक बार शत्रु, विरोधी, अपराधी तथा अव्यवस्था फैलाने वाले के साथ इन्हीं गुणों की शक्ति पर ही निपटा जा सकता है।  बहरहाल हम राजसी प्रकृत्ति के लोगों से ही राज्य कर्म करने की बात तो करते हैं पर उनके आचरण सात्विक होने की आशा भी करते हैं। यही से समाज की कठिन यात्रा प्रारंभ होती है। 
      राजसी प्रवृत्ति के लोगों के लोभ, लालच, काम तथा अहंकार का भाव स्वाभाविक रूप से रहता है।  यही कारण है कि ज्ञानी लोग कभी भी राजसी लोगों के दरबार में जाने से कतराते हैं।  आज के लोकतांत्रिक युग में किसी का भी राजपद स्थाई नहीं है इसलिये यह सुविधा जरूर मिल जाती है कि जब तक आदमी पद पर उसे सम्मान देते रहो। जैसे ही हटे उसे पुराने हिसाब निकाल लो।
     यह जिस विषय पर बात हो रही है वह अस्सी वर्षीय राजनेता के एक युवक का दैहिक शोषण के आरोप से जुड़ा है।  वैसे तो पहले भी अनेक नेताओं पर इसी तरह के आरोप लगे हैं और उनकी आयु भी अस्सी के आसपास रही है पर समलैंगिकता की बात जो यह सामने आयी है उससे अच्छे खासे राजनेताओं को हतप्रभ कर दिया है।  अगर किसी युवा नेता का किसी युवती के साथ ऐसा व्यवहार होता तो संभवतः समझा जा सकता था।  राजनेता के संगी साथी तमाम तरह का प्रतिवाद कर सकते थे मगर इस प्रकरण में तो ऐसी स्थिति हो गयी है कि कोई क्या कहे?  हम अगर अपने अध्यात्म दर्शन की बात करें तो नारियों का दैहिक शोषण चाहे भले ही उनकी मर्जी से हो मगर दोष पूरा पुरुष की ही माना जाता है।  उसमें आप किसी नारी से यह प्रश्न नहीं पूछ सकते कि तुमने पहले क्यों नहीं बताया? इस प्रकरण में अनुचित उचित क्या है, फिलहाल कहना कठिन लगता है।
       आम लोगों में कुछ लोग युवा नेता और युवती के बीच किसी प्रकार के विवादास्पद संबंधों पर नाखुश होने के बावजूद उसे अप्राकृतिक नहीं मानते। कोई भी ऐसा प्रकरण भले ही अपराधिक पृष्ठभूमि पर आधारित हो पर उसे समझा जा सकता है। दूसरी बात यह कि राजसी पुरुषों में कुछ ऐसे लोग होते ही है जो राजपद मिलने पर मदांध हो जाते हैं, इस सत्य को सभी जानते हैं। इसलिये पद की शक्ति पर नारियों के देह शोषण का प्रकरण हर स्थिति में तर्क की कसौटी पर प्रथक प्रथक रूप से देखा भी जा सकता है मगर जहां किसी पुरुष का दूसरे युवा पुरुष के साथ दबाव डालकर  अप्राकृतिक यौन संबंधों की बात हुई हो वह देश भी के सभ्य राजनेताओं का मुंह अगर खुला रह गया हो तो कौन सी बड़ी बात है?
      प्रचार माध्यमों पर राजनेता के कृत्य का समर्थन कोई नहीं कर रहा पर उसके पक्ष के लोग अपना बचाव यह कहकर कर रहे हैं कि हमने तो उससे मंत्र पद छीनकर  दल से निकाल दिया।  उस राजनेता के खिलाफ पुलिस में रिपोर्ट भी लिखने के बाद उसे गिरफ्तार कर जेल भी भेजा गया है।  इस आधुनिक लोकतंत्र की यह महिमा भी है कि मात्र एक सप्ताह पूर्व जो राजनेता इतना शक्तिशाली था कि उसके प्रदेश का अर्थतंत्र उसके पांव तले था वह अब जेल में पहुंच गया।  वह भी उस जेल में जिसके शुभारंभ के लिये फीता उसने स्वयं ही काटा था।  फिल्मी दुनियां के लेखकों  के लिये यह एक मनोरंजन कहानी हो सकती है पर समाज के लिये यह अत्यंत चिंता का विषय है कि उसके शिखर पुरुष यौन दुराचार नहीं वरन् यौन विकृत्ति का शिकार हो गया।
         समलैंगिकता का जुड़ाव न हो तो यह कोई पहला ऐसा प्रकरण नहीं है कि जब किसी वरिष्ठ राजनेता का ऐसा हश्र  हुआ हो।  दरअसल बुजुर्ग राजनेताओं का ऐसे प्रकरण में फंसना कोई आश्चर्य की बात नहीं  होना चाहिये पर एक बात कहनी पड़ती है कि इन लोगों ने धूप में अपने बाल सफेद किये।  अपने पद बनाये रखने में उन्होंने भले ही महारत हासिल किया पर बदलते जमाने को समझा नहीं।  आज जब प्रचार माध्यम इतने सक्रिय हो गये हैं और  हर हाथ में कैमरा है और उसका उपयोग करने के लिये सभी लालायित भी हैं।  अभी तक  कैमरा के पिंजरे में फंसने का शिकार अनेक राजनेता, अधिकारी और पत्रकार  हो चुके हों। जब इन बुजुर्गों को सतर्क रहना था तब यह शिकार बन गये।  इन महानुभावों ने आधुनिक तकीनीकी तंत्र को   समझा नहीं  और अपने कर्म जस की तस जारी रखे जिसमें  स्वयं भी फंस गये।  एक चैनल पर एक मनोचिकित्सक कह रहे थे कि इस तरह के राजनेता अपनी मानसिक विकृति का शिकार घटना के प्रकाश में आने के दिन ही नहीं होते बल्कि बीस यह तीस बरसों से उनको ऐसे दौर पड़ते रहे होंगे, इसलिये यह संभव नहीं है कि समर्थकों या विरोधियों को मालुम न हो।  आप इस प्रकरण में बहस के लिये चैनल पर मनोचिकित्सक को बुलाये जाने का यह अर्थ समझ सकते हैं कि कहीं न कहीं मनोविज्ञानिक रूप से भी इस घटना को  देखा जा रहा है। गुस्सा कम हैरानी अधिक हो रही है।
        अब यह प्रकरण तो कानून के दायरे में है पर हम इसका सामाजिक विश्लेषण तो कर ही सकते हैं। अस्सी वर्षीय राजनेता पर एक युवक ने यौनाचार का आरोप लगाया हो यह   तय बात है कि युवक का प्रकरण नारी शोषण की श्रेणी में नहीं आता।  यह अलग बात है कि कुछ बुद्धिमान बदहवासी में उस युवक की छवि में युवती जैसी मासूमियत भरने का प्रयास कर रहे हैं।  नारी का दैहिक शोषण जहां विश्व में भारत की छवि क्रूर बनाता है वह यह प्रकरण शर्मनाक स्थिति बना देगा।  ऐसा नहंी है कि विदेशों में इस तरह के प्रकरण नहीं होते पर हमारे देश के लिये अत्यंत शर्मनाक है।  इस देश में सभ्य राजनेताओं की कमी नहीं है पर आज के प्रचार माध्यमों के लिये सनसनी केवल असभ्यता ही निर्माण करती है।  यही कारण है कि सभी दलों के सभ्य राजनेता फूंकफुंककर अपने अपने हिसाब से बयानबाजी कर रहे हैं।  आखिरी बात राज्य कर्म में लिप्त सभी लोगों को यह कहना चाहेंगे कि पुराने ढर्रे पर यह सोचकर मत चलो कि हम कभी पकड़े नहीं जायेंगे। आंखें खोलो और देखो कि तुम्हारी किसी भी छवि को कभी भी कैमरे में कैद किया जा सकता है। यह केवल सलाह ही है इसे कोई मानेगा इसमें संशय है। जो सभ्य राजनेता है उन्हें इस सलाह की आवश्यकता नहीं है और जो मानसिक विकृति का शिकार है वह जब अपने दुर्भाव के चरम पर होते है तब उनको इसका ध्यान नहीं रहेगा।  उम्रदराज नेताओं का ऐसी घटनाओं में फंसना यही दर्शाता है। इतने उम्रदराज कि अगर सामान्य मनुष्य होते तो किसी ऐसे ही  अपराध में उन्हें बंदी बनाने से पहले दस बार सोचा जाता जबकि उन्हें तो उच्च पद पर होने के बावजूद इस   सुविधाजनक सोच का लाभ पाने के योग्य नहीं समझा गया।         

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poet-Deepak raj kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर
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10 अगस्त 2012

तत्वज्ञान के संदर्भ में महिला महामंडलेश्वर विवाद-हिन्दी लेख (tatvagyan sa sandarbh mein mahila mandleshwar wowen sant-hindi article)

      जब धर्म केवल कर्मकांडों तक सिमटता है तब वहां ज्ञान की बात करना निरर्थक है। मूलतः धर्म का आधार अध्यात्म है पर अध्यात्मिक दर्शन और धर्म के बीच कोई स्पष्ट रेखा हमारे यहां खींची नहीं गयी है इसी कारण कर्मकांडों के विद्वान आमजन की संवेदनसओं का दोहन करने में सफल हो जाते हैं।  प्रसंग है एक कथित महिला को महामंडलेश्वर बनाने का जिसका चहुं ओर विरोध हुआ तो उसे वहां से निलंबित कर दिया गया।  
     उस महिला के अनेक दृश्य टीवी चैनलों पर दिखाई दिये। जिसमें नृत्य और भजन थे।  तत्वज्ञान की बात करते हुए तो उसे देखा ही नहीं गया।  वह महिला धर्म के व्यापार में ढेर सारी माया अपने चरणों में स्थापित कर चुकी है। उसका श्रृंगार देखकर कोई भी इस बात को नहीं मानेगा कि उसके पास अध्यात्मिक ज्ञन का ‘अ’ भी होगा। आरोप लगाने वालों ने  ने इस पदवी में धन के लेनदेन का आरोप भी लगाया है। सच क्या है पता नहीं पर हम यहां बात कर रहे हैं महामंडलेश्वर की उस उपाधि की जिसकी जानकारी अनेक लोगों के  लिये नयी नहीं है पर उसको प्रदाने करने की कोई प्रक्रिया है यह बात पहली बार इतने प्रचार के  साथ सामने आयी ।  आदि गुरु शंकराचार्य ने धर्म प्रचार के लिये चार मठ बनाये जिनके सर्वेसर्वा अब शंकराचार्य कहलाते हैं।  इनका भारतीय समाज में स्थान कितना है यह अलग से विचार का विषय हो सकता है पर भारतीय अध्यात्म की जो धारा सदियों से बह रही है उसके प्रवाह में इनका योगदान अधिक नहीं है यह  वर्तमान लोगों की जानकारी देखकर लगता है।  हिन्दू धर्म तथा भारतीय अध्यात्म के इतिहास तथा तत्वज्ञान का अध्ययन करने वाले हर शख्स का आदि शंकराचार्य का पता है पर वर्तमान शंकराचार्यों के प्रति उनके मन में मामूली श्रद्धा है जो कि हमारे देश की धरती पर उपजते सहज मानवीय  स्वभाव के ही कारण है।  वह यह कि सभी संतों का सम्मान करना चाहिए। न भी करें तो उनकी निंदा करने से बचना चाहिए।
एक बात तय है कि बिना तत्वज्ञान के भारतीय जनमानस में सम्मान प्राप्त नहीं कर सकता।  वैसे तो कई संत हैं जो नृत्य और भजन कर भक्तों को प्रसन्न करते हैं। ऐसे संत तत्वज्ञानियों से अधिक धनवान होते हैं। जिनकी ज्ञान में रुचि नहीं है वह भक्त भी सांसरिक विषयों से ऊबकर इन संतों के सानिध्य में भक्ति और मनोरंजन के मिश्रित सत्संग का आनंद उठाते हैं।  वह इनको दान, चंदे या गुरुदक्षिणा देकर भगवान को प्रसन्न हुआ मानते हैं। इस तरह बिताया गया समय  क्षणिक रूप से उनको लाभ द्रेता है पर जब अध्यात्मिक शांति की बात मन में आती है तो उनको अपना मन खाली दिखता है।
      बहरहाल अब समय बदल गया है पर भारतीय अध्यात्मिक दर्शन सत्य पर आधारित है इसलिये उसके संदर्भ आज भी प्रासांगिक हैं।  नृत्य और गीत के सहारे भक्तों को सत्संग प्रदान करने वाली जिस महिला को विवादास्पद ढंग से महामंडलेश्वर बनाया गया उस पर बवाल उठा तब उसका नाम प्रचार में आया। अगर यह विवाद प्रचार माध्यमों में नहीं आता तो शायद अनेक  लोग यह समझ ही नहीं पाते कि महामंडलेश्वर होता क्या है? संभव है पैसे का लेनदेन हुआ हो। हमारे यह धार्मिक संगठनों में भी अब माया ने इस कदर अपनी पैठ बना ली है कि वहा उच्च पदों पर बैठे लोगों से सात्विक प्रवृत्ति की हमेशा आशा नहीं की जा सकती।  जिसने उपािध ली और जिन्होंने दी उन पर क्या आक्षेप किया जा सकता है? जब समाज ने क्रिकेट खिलाड़ियों में भगवान और फिल्मों अभिनेताओं में देवता होने की अवधाराणा को मान लिया है तब पेशेवर धार्मिक संगठनों या उनके पदाधिकारियों से-जिनको बिना किसी विद्यालय में गये ज्ञानी और धर्म का प्रतीक होने का प्रमाणपत्र मिला हुआ है-यह अपेक्षा करना व्यर्थ है कि वह अपनी उपाधियां उन नर्तकों और गायकों को न दें जो मनोरंजन को भक्ति के रूप में बदलने की कला में माहिर हों।
   जहां तक तत्वज्ञान का प्रश्न है तो वेदों और शास्त्रों के जानकार होने का दावा करने वाले अनेक संत जब श्रीमद्भागवत गीता पर बोलते हैं तो यह देखकर आश्चर्य होता है कि वह उस ज्ञान से स्वयं ही दूर हैं।  ऐसी घटनाओं से अधिक आश्चर्य इसलिये भी नहीं करना चाहिए क्योंकि भारतीय समाज में ऐसे तत्व हमेशा ही मौजूद रहेंगे जो धर्म के नाम कर्मकांड और भक्ति के नाम पर मनोरंजन का व्यवसाय करते हैं।
लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर 
poet, writer and editor-Deepak 'BharatDeep',Gwalior

writer aur editor-Deepak 'Bharatdeep' Gwalior

19 सितंबर 2010

अयोध्या के राम मंदिर या वन में नहीं खो गये-हिन्दी कविता ( ayodhya ke ram mandiy ya van men nahin kho gaye-hindi poem)

एक राम वह हैं जो
भक्तों की भक्ति से प्रसन्न हो
उनको दिख जाते हैं,
एक राम वह भी हैं जो
आस्था के दलालों के हाथ
बाज़ार में बिक जाते हैं।’
पर हे राम! आप धन्य हो
केवल नाम लेने से ही रावण हो गया अमर
मगर जिन पर आपकी कृपा हो
वही बाल्मीकी और तुलसी जैसा
आपका चरित्र लिख पाते हैं।
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अयोध्या के राम
सभी के हो गये,
जगह जगह पर बने राम मंदिर
उनमें कभी न भटके
न कभी वन में खो गये।
सर्वशक्तिमान के रूप और अलग अलग नामों पर
बने हैं दरबार
भक्त लुटाते
दलाल भरते घरबार
मगर राम को हृदय से जिसने स्मरण किया
वह उसी के हो गये।
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कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
http://anant-shabd.blogspot.com

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