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19 सितंबर 2010

अयोध्या के राम मंदिर या वन में नहीं खो गये-हिन्दी कविता ( ayodhya ke ram mandiy ya van men nahin kho gaye-hindi poem)

एक राम वह हैं जो
भक्तों की भक्ति से प्रसन्न हो
उनको दिख जाते हैं,
एक राम वह भी हैं जो
आस्था के दलालों के हाथ
बाज़ार में बिक जाते हैं।’
पर हे राम! आप धन्य हो
केवल नाम लेने से ही रावण हो गया अमर
मगर जिन पर आपकी कृपा हो
वही बाल्मीकी और तुलसी जैसा
आपका चरित्र लिख पाते हैं।
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अयोध्या के राम
सभी के हो गये,
जगह जगह पर बने राम मंदिर
उनमें कभी न भटके
न कभी वन में खो गये।
सर्वशक्तिमान के रूप और अलग अलग नामों पर
बने हैं दरबार
भक्त लुटाते
दलाल भरते घरबार
मगर राम को हृदय से जिसने स्मरण किया
वह उसी के हो गये।
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कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
http://anant-shabd.blogspot.com

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22 मई 2009

गुस्से ने हास्य कवि बनाया-हास्य कविता (hasya kavita)

हास्य कवि ढूंढ रहा था
कोई जोरदार कविता
मिल गयी पुरानी प्रेमिका
जिसका नाम भी था कविता।

उसे देखते ही चहकते हुए वह बोली
‘’अरे, कवि
तुम भी अब बुढ़ाने लगे हो
फिर भी बाज नहीं आते
हास्य कविता गुड़गुड़ाने लगे हो
शर्म नहीं आती
पर मुझे बहुत आती
जब पति के सामने
तुम्हारे पुराने प्रेम का किस्सा सुनाती
तब वह बिफर कर कहते हैं
‘क्या बेतुके हास्य कवि से इश्क लड़ाया
मेरा जीवन ही एक मजाक बनाया
कोई श्रृंगार रस वाला कवि नहीं मिला
जो ऐसे हास्य कवि से प्रेम रचाया
जिसका सभी जगह होता गिला
कहीं सड़े टमाटर फिकते हैं
तो कहीं अंड़े पड़ते दिखते हैं’
उनकी बात सुनकर दुःख होता है
सच यह है तुम्हारी वजह से
मैंने अपना पूरा जीवन ही नरक बनाया
फिर भी इस बात की खुशी है
कि मेरे प्यार ने एक आदमी को कवि बनाया’

उसकी बात सुनकर कवि ने कहा
‘मेरे बेतुके हास्य कवि होने पर
मेरी पत्नी को भी शर्म आती है
पर वह थी मेरी पांचवी प्रेमिका
जिसके मिलन ने ही मुझे हास्य कवि बनाया
प्रेम में गंभीर लगता है
पर मिलन मजाक है
यह बाद में समझ आया।
गलतफहमी में मत रहना कि
तुमने कवि बनाया।
तुम्हारे साथ अकेले नहीं
बल्कि पांच के साथ मैंने प्रेम रचाया।
तुम्हारी कद काठी देखकर लगता है कि
अच्छा हुआ तुमसे विरह पाया
कहीं हो जाता मिलन तो
शायद गमों में शायरी लिखता
जिंदगी का बोझ शेरों में ढोता दिखता।
भले ही घर में अपनी गोटी गलत फिट है
पर हास्य कविता कुछ हिट है
दहेज में मिला ढेर सारा सामान
साथ में मिला बहुत बड़ा मकान
जिसके किराये से घर चलता है
उसी पर अपना काव्य पलता है
तुमसे भागकर शादी की होती
तो मेरी जेब ही सारा बोझ ढोती
तब भला कौन सुनता गम की कविता
पांचवीं प्रेमिका और वर्तमान पत्नी भी
कम नहीं है
पर उसके गुस्से ने
मुझे हास्य कवि बनाया

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19 मार्च 2009

अंतर्जाल का ताला-व्यंग्य आलेख

कभी कभी यह मन होता है कि किसी ब्लाग लेखक के लिखे पाठ के विषय पर कुछ हम भी लिखें। इसका कारण यह है कि किसी भी विषय के अनेक दृष्टिकोण होते हैं और किसी अन्य लेखक के विषय ने अपने दृष्टिकोण से लिखा होता है तो हमारे मन में यह आता है कि अन्य दृष्टिकोण से उस पर लिखें और इसके लिये अगर उस लेखक की कुछ पंक्तियां अपने पाठ में उद्धृत करें तो अच्छा रहेगा। अंतर्जाल पर लिखते हुए इस मामलें में एक आसानी होती है कि उस लेखक की पंक्तियां कापी कर उसे अपने पाठ पर लिखें ताकि पाठकों को यह पता लगे कि अन्य लेखक ने भी उस पर कुछ लिखा है। इससे दोनों लेखकों का दृष्टिकोण पाठकों के समक्ष आता है।

मगर अब समस्या यह आने लगी है कि दूसरों की देखा देखी हमने भी अपने ब्लाग पर ताला लगा दिया है। इसलिये किसी की शिकायत तो कर ही नहीं सकते क्योंकि अंतर्जाल पर अपने पाठों की चोरी की समस्या से अनेक लेखक परेशान हैं। हमारे लिये कभी अधिक परेशानी नहीं रही क्योंकि हमारा लिखा चुराने लायक हैं यह नहीं लगता पर दूसरों की देखा देखी ताला लगा दिया तो लगा दिया। हम किसी के पाठ की चोरी नहीं करते पर जिसका विषय पसंद आये उस पर लिखते हैं और उस लेखक का उल्लेख करने में हमें कोई झिझक नहीं होती-सोचते हैं हो सकता है कि उसके नाम से हम भी कहीं हिट हो जायें। अब जाकर अपने ब्लाग/पत्रिका पर ताला भी इसलिये नहीं लगाया कि हमें अपने पाठ के चोरी होने का खतरा है बल्कि पाठकों और मित्रों को लगे कि ऐसा लिखता होगा कि उसे चोरी का खतरा अनुभव होता है।

बात करें ब्लाग/पत्रिका पर ताले के चोरी होने की। यह एक ऐसा साफ्टवेयर है जिसको अपने ब्लाग पर लिंक करने पर उसके पाठ की कोई कापी नहीं कर सकता। हालांकि इसका कोई तोड़ नहीं होगा यह कहना कठिन है क्योंकि अंतर्जाल पर अनेक तकनीकी खिलाड़ी ऐसे हैं जो तालों को तोड़ने वाले हथोड़े या तालियां बनाकर उसे तोड़ भी सकते हैं। वैसे भी मनुष्य में रचनात्मक विचार से अधिक विध्वंस की भावना अधिक होती है। इस ताले की वजह से हमें तीन चार बार स्वयं ही परेशानी झेलनी पड़ी। उस दिन एक मित्र ब्लाग लेखक का पाठ हमें बहुत अच्छा लगा। सोचा चलो कि उसके अंश लेकर अपने ब्लाग/पत्रिका पर चाप देते हैं और साथ में अपनी बात भी जोड़ लेंगे। जब उसकी कापी करने लगे तो वहां कर्सर काम नहीं कर रहा था। बहुत माथापच्ची की। फिर उनके ब्लाग का मुआयना किया तो देखा कि वहां एक साफ्टवेयर का लिंक है जो इसके लिये इजाजत नहीं देगा हालांकि उसके साथ ताले का लिंक भी था पर हमें वह दिखाई नहीं दिया। मन मारकर हमें अपना इरादा बदलना पड़ा। तब हमने उसी साफ्टवेयर का लिंक अपने ब्लाग पर लगाया। मगर देखा कि अनेक लोग अपनी टिप्पणियों में हमारे पाठ की कापी कर टिप्पणियां कर रहे हैं। तब हैरानी हुई। हमने सोचा चलने दो। दो तीन दिन पहले एक ब्लाग के ताले पर नजर पड़ी। तब वहां से हमने ताले का साफ्टवेयर लिया और अपने ब्लाग@पत्रिकाओं पर लगा दिया। इस तरह अपना ब्लाग सुरक्षित कर लिया।

किसी ने विरोध नहीं किया पर आज एक ब्लाग से जब पाठ का अंश लेने का विचार आया तो देखा कि वहां ताला लगा हुआ है। सच बात तो यह है कि यह ताला इसलिये लगाया जाता है कि कोई मेहनत से लिखे गये पाठों से कापी नहीं कर सके मगर मुश्किल इसमें यह आने वाली है कि इससे आपस में एक दूसरे से जुड़े ब्लाग लेखक उन ब्लाग के पाठों की कापी नहीं कर पायेंगे जिन पर ताले लगे हुए हैं और वह उन पर लिखना चाहते हैं। हालांकि इसका एक तरीका यह भी है कि अपने मित्र ब्लाग लेखक को ईमेल कर उस पाठ की कापी मांगी जा सकती है और वह दे भी देंगे पर लिखने का एक मूड और समय होता है। ईमेल भेजने और उत्तर आने के बीच मूड और समय के बदलने की पूरी गुंजायश होती है।

वैसे भी ताले केवल सामान्य इंसान का मार्ग अवरुद्ध करता है। चोर उठाईगीरे और डकैतों के लिये निर्जीव ताले कोई अवरोध नहीं खड़े कर पाते। अंतर्जाल पर जिस तरह की घटनायें सुनने को मिलती हैं उससे तो नहीं लगता कि ताला उनके लिये कोई अवरोध खड़ कर पायेगा। जिस तरह समाज की स्थिति है उससे अंतर्जाल अलग तो हो नहीं सकता। जिस तरह समाज में विध्वसंक और विलासी लोगों के बाहुल्य है वैसी ही हालत इंटरनेट पर भी है। रचनात्मक लोगांें की कमी यहां भी है अगर ऐसा नहीं होता तो हिंदी में लिखने वालों की संख्या देश की हिंदी आबादी के हिसाब से इतनी कम नहीं होती। इतने सारे इंटरनेट कनेक्शन हैं और सर्च इंजिनों पर हिंदी भाषियों की खोज का दृष्टिकोण देखें तो वह फिल्मी अभिनेत्रियों पर केंद्रित है।
भले ही किसी ब्लाग लेखक का पाठ उपयोग न हो पर ताला तोड़कर अपनी तकनीकी शक्ति का प्रदर्शन करने वाले भी यहां आत्मसंतुष्टि के लिये कर सकते हैं। हो सकता है कि कुछ तकनीकी जानकार पढ़ने लिखने की बजाय ब्लाग पर लगा ताला देखकर ही उसका तोड़ निकालने में ही अपना समय नष्ट करें क्योंकि कुछ लोगों को विध्वंस करने में मजा आता है। हम अपने आसपास कई ऐसे लोग देख सकते हैं जो किसी बेहतर चीज को देखकर उससे प्रसन्न होने की बजाय उसके नष्ट होने के उपायों पर विचार करने लगते हैं।
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21 जनवरी 2009

अगले जन्म के लिये-हास्य कविता

कवि की हाजिरी पर प्रसन्न होकर
अपने दरबार में प्रकट हुए सर्वशक्तिमान
और बोले
‘दो मेंं से एक वर मांग ले
पहला इस जन्म में अपनी
कविताओं के हिट होने का वरदान
पर इससे नहीं पैसे के लिहाज से तुम धनवान
या अगले जन्म में किसी प्रकाशक का
चमचा बनकर दौलत कमायेगा
और पायेगा दुनियां भर का सम्मान
पर कविता की नहीं होगी लोगों में शान’
कवि तुरंत बोला-
‘अगर इस जन्म में नहीं अपने नसीब है
कविताऐं तो फ्लाप हम भी गरीब हैं
जितने हिट हैं उतने ही ठीक हैं
अब तो निकल गयी उमर
इसलिये सुरक्षित रख लो
अगले जन्म के लिये अपना वरदान
तब युवावस्था में ही सारी
कामयाबी दिलाना
चमचे बनने की पूरी शक्ति देना
भले ही कविता लिखने की कम कर लेना
साहित्यकारों में करना शुमार
भले ही किसी प्रकाशक का चमचा बना देना
लिखें चाहें जैसा भी पर बढ़ाना सम्मान
किसी हालत में न हो इस जन्म जैसा भान

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3 जनवरी 2009

असली फिल्म के नायक और खलनायक-व्यंग्य

युद्ध और आंतक पर बहुत सारी सामग्री टीवी चैनलों, समाचार पत्र पत्रिकाओं और अंतर्जाल पर पढ़ने को मिल जाती है। सभी में तमाम तरह के वाद विवाद और प्रतिवाद पढ़ने, देखने और सुनने को मिल जते हैं। मगर ऐसा लगता है कि कुछ छूट रहा है। विद्वान गण केवल जो दिख रहा है या दिखाया जा रहा है उसी पर ही ध्यान केंद्रित किये हुऐ है। अपनी तरफ से न तो कोई उनका अनुमान लगाते हैं और नहीं कोई राय रखते हैं। यह बात केवल हिंदी में दर्ज सामग्री पर हो रही है। इसलिये अंग्रेजी पढ़ने और लिखने वाले शायद इस बात से इतफाक न रखें कि सब कुछ प्रायोजित लग रहा हैं । ऐसा लग रहा है कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ही सब कुछ ऐसा प्रायोजित किया जा रहा है कि विद्वान लोग उसे देखकर ही लिखते हैं।

इस लेखक को गुरूजी ने जो ज्ञान दिया था। वह यह था कि ‘जो तस्वीर दिखाई जा रही है उसके पीछे जाकर देखो। तस्वीर सामने से आकर्षक होती है इसलिये लोग उसे दिखाते है पर उसके पीछे जो पुट्ठा या कागज होता है वह नहीं दिखाते। अगर तुम लेखक बनना चाहते हो तो किसी समाचार, घटना या दृश्य को देखकर उस पर विचार तो करो पर फिर उसके पीछे क्या है या क्या हो सकता है इस पर भी नजर डालो।’

अब हम जैसा अल्पबुद्धि वाला आदमी जो हमेशा ज्ञान की तलाश में रहता है अगर उसे लगे कि यह बात ज्ञान की तो गांठ से बांध लेता है। सो बांध ली। अपने लिखे पर कई बार हास्यास्पद स्थिति का सामना भी करना पड़ता है। लोग कटाक्ष करते हैं कि ‘यार बहुत गहराई से सोचते हो।’
तब यह बात मजाक लगती है क्योंकि उस सोच में कहीं गहराई नहीं होती । बस! होता है जो सामने दिख रहा है उसके पीछे झांकने की कोशिश भर होती है। युद्ध और आंतक पर पढ़ पढ़ कर हमेशा ऐसा सोचते हैं आखिर कौनसी चीज है जो दिख नहीं रही और दिख रही हो तो फिर उसके पीछे और क्या हो सकता है। अपने साधन सीमित है सो कही उड़कर अमेरिका या इजरायल तो जा नहीं सकते। आम आदमी है सो बड़े संपर्क कुछ बताने के लिये उपलब्ध नहीं है। सो अपना दिमाग चल गया तो बस चल गया।

एक ब्लाग पर एक विद्वान महोदय का लेख पढ़ लिया। इजरायल और फलस्तीन संधर्ष पर था। नाम वगैरह इसलिये नहीं दे रहे क्योंकि जो लिख रहे हैं वह मूर्खतापूर्ण ही लग रहा है। उसमें लिखा गया था कि गाजापट्टी की पंद्रह लाख जनता परेशान है। वहां गरीबी है और उनकेत अपने संगठन हमास में दिलचस्पी न होने के बावजूद आम लोग इजरायल के हमले झेल रहे हैं। उसमें इजरायल और अमेरिका दोनों को कोसा गया है।

हम सोच रहे थे कि आखिर पूरे विश्व में आतंक के विरुद्ध यह दोनों देश ही क्येां आका्रमक होते दिख रहे है? दूसरा कोई होता है तो उनको सांप सूंघ जाता है। सो दिमाग धूमने लगा। अरे यह क्या? हमारी एक बात पर तो नजर गयी नहीं। अमेरिका और इजरायल दोनों आधुनिक हथियारों के निर्माता और विक्रेता हैं। जब अमेरिका की किसी से खटकती है या वह स्वयं ही खटकता है तो पचहत्तर हजार फीट ऊपर से बमबारी करता है। हजारों मील दूर से मिसाइलें फैंकता है। इजरायल भी गाहे बगाहे फलस्तीन पर बरसता है। कहीं यह तो नहीं कि यह अपने लिये हथियारों की प्रयोगशाला चुनते हों। अमेरिका तो इधर उधर परमाणुरहित देश ढूंढता है पर इजरायल को तो स्थाई रूप से प्रयोगशाला मिली हुई है।

शक की गुंजायश पूरी है। उस दिन एक हिंदी में बेवसाइट देखी। उसमें अमेरिका के कुछ प्रोफेसरों ने अपने विचार कुछ इसी तरह दिये थे। उस समय लगा कि वाकई वहां बोलने की आजादी है क्योंकि उनके विचार हमारे देश के प्रगतिशील बुद्धिजीवियों से मेल खाते हैं। वह अपने ही देश की इराक की नीतियों से संतुष्ट नहीं थे। हमारे देश में देशभक्ति से ओतप्रोत होने के कारण बुद्धिजीवी ऐसे विचार रखने से कतराते हैं और जो रखते हैं तो उनसे लोग नाराज हो जाते है। हालांकि ऐसे नाराज लोगों में हम स्वयं भी होते हैं। उस लेख को पढ़कर लगा कि वाकई किसी के विचार लिखने पर उत्तेजित नहीं होना चाहिए। वैसे विश्व क अनेक विद्वान अमेरिका पर ऐसे आरोप लगाते हैं कि वह युद्ध के लिये वजहें बनाता है।

बहरहाल इन दोनों देशों की ताकत भी कम नहीं है। अपने देश में ही इन दोनों देशों के ढेर सारे समर्थक है। हम तो किसी के न विरोधी हैं न समर्थक पर जो दिख रहा है उसके पीछे जाकर देखते हैं तो पाते हैं कि जो देश हथियार निर्यातक देश हैं उनकी गतिविधियों पर दृष्टिपात करना चाहिये। इजरायल आतंकवाद से प्रभावित अनेक देशों को अपने हथियार और उपकरण बेच रहा है। उसकी तकनीकी क्षमता भी अब काफी प्रसिद्ध हो गयी है। इतनी कि हाल में अखबारों में एक चर्चा पढ़ने को मिली कहीं मृत आंतकवादियों के शव का परीक्षण कर यह बताया जा सकता है कि वह किस देश के किस प्रांत और शहर का है-ऐसी तकनीकी इजरायल ने बनाई है। तय बात है कि वह पहले परीक्षण कर बतायेगा और फिर उसे बेचेगां। अब अगर विश्व में आतंकवाद ही नहीं होगा तो उसके हथियार और तकनीकी कौन खरीदेगा? संभव है कि फलस्तीन में वह इसलिये उग्र होता हो कि पूरे विश्व में उसकी प्रतिक्रिया हो और लोग दूसरी जगह आतंकवाद फैलायें। प्रसंगवश दुनियां में आंतक का पहला शिकार इजरायल ही था और पहला आतंकवादी भी वहीं का था। ओलंपिक में इजरायल के फुटबाल टीम के सात सदस्यों की हत्या करने वाला कार्लोस कभी इजरायल के हाथ नहीं आया या उसने ऐसी कोशिश ही नहीं की-कहना मुश्किल है। मगर उसके बाद हम देख रहे हैं कि अमेरिका हो या इजरायल अपने जिन जाने पहचाने दुश्मनों से लड़ने निकलते हैं वह कभी उनक हाथ नहीं आते पर वह बढ़ते ही जाते हैं और मरते हैं उनके दुश्मनों के अनुयायी-अब वह होते हैं या नहीं यह अलग बात है।

यानि हम उनके दुश्मनों पर भी उतनी ही नजर डालें। उस लेख में चर्चा थी कि हमास ने अपने यहां ईरानी मिसाइलों का जमावड़ा किया और वह इजरायल पर बरसाईं। हमास एक मामूली संगठन है और अगर वह इजरायल पर हमला करता है तो उस पर भी शक तो होगा ही। मारे गये तो आम लोग पर हमास के नेताओं का क्या हुआ? क्या यह आंतकवाद और युद्ध किसी संाठगांठ का नतीजा है। ईरान की तकनीकी कोई अधिक प्रभावी हो ऐसी जानकारी नहीं है। उसकी मिसाइलें लेकर हमास ने अगर इजरायल पर हमला किया तो संदेह होता है कि कहीं दोनों तरफ से कमीशन तो नहीं खाया। एक तरफ ईरान ने कहा हो कि जरा हमारे उत्पाद का उपयोग कर देखो कि उनका क्या प्रभाव होता है। इजरायल तो खैर स्थाई दुश्मन( भले ही उसने फिक्स किया हो) है ही। शक इसलिये होता है कि नये साल में पूरे विश्व में इजरायल की आक्रामता की चर्चा होती रही। हमने कुछ ब्लाग पढे हैं जिनमें तमाम तरह की घटनाओं और दुर्घटनाओं की तारीख पर ही सवाल उठाया जाता है। ऐसा कहने वाले कहते हैं कि आप देखिये यह घटनायें तभी होती हैं जब अमेरिका में सुबह होती है दूसरा यह कि उनका अवकाश निकट होता है। वर्ष पुराना होने और नये पर आने के बीच कुछ ऐसा होता है जो अमेरिका और इजरायल के लोगों में चर्चा का विषय होता है-कहने का मतलब है कि यह ब्लाग लिखने वाले भी पता नहीं क्यों अमेरिका और इजरायल के लोगों को मानसिक खुराक देने के लिये समाचार प्रायोजित करने का संदेह व्यक्त करते हैं।
नहीं यह केाई आरोप नहीं हैं। समझ में यह बात नहीं आती कि आखिर क्या यह युद्ध और आतंक भी कहीं फिक्स तो नहीं होते? क्योंकि यहां जो खलनायक हैं वह अमरत्व प्राप्त कर लेते हैं और कहीं न दिखाई देते हैं न पकड़ाई आते हैं। अगर मर खप भी जायें तो कई वर्षों तक उनके अनुयायी उनको जीवित बताकर माल बटोरते रहेंगे। अगर कोई अन्य देश लड़ने को तैयार होता है तो यह उसकी मदद को भी नहीं जाते भले ही वह हथियार खरीदता हो। कहीं ऐसा तो नहीं यह दिखाते कोई हथियार हों और बेचते कोई और हों। अगर इनसे हथियार खरीदने वाला देश किसी अन्य देश से उलझ गया और हथियार तयशुदा गारंटी के अनुरूप कारगर नहीं हुए तो पोल खुल जाने का खतरा इनको सताता हों। इस देश में पूराने लोगों को आज भी कार्लोस की याद है और वह आखिरी तक फ्रंास में रहा। इजरायल ने उसे वापस लेने का कोई गंभीर प्रयास किया हो ऐसा याद नहीं आतां अमेरिका के शत्रू भी अभी तक पकड़ से बाहर हैं।

कभी कभी तो यह लगता है कि जिस तरह विश्व में पूंजीपति और हथियार कंपनियां ताकतवर है उनके लिये तो एक तरह से अपने व्यवसाय के लिये वास्तविक फिल्में बनाना आवश्यक हैं। इसलिये वह नायक और खलनायक प्रायोजित करती हैं और दुनियां भर के बुद्धिजीवी जो फिल्म नहीं देखते वही उनके लिये समीक्षक हो जाते हैं। कुछ लोग नायक के करतब देखकर ताली बजाते हैं तो कई खलनायक के प्रति सहानुभूति जताते हैं। सैट पर नायक और खलनायक का अभिनय करने के दौरान आपस में लडते हैं फिर एक हो जाते हैं। फिल्मी समीक्षक उनके अभिनय पर समीक्षायें लिखते हैं। अभी अमेरिका में नये नायक का आगमन हो रहा है कुछ विद्वान तो यही कह रहे हैं कि वह भी तयशुदा पटकथा के अनुरूप चले इसलिये ही यह सब हो रहा है। सच क्या है? कोई नहीं जानता। अब हमारा सोच पता नहीं विद्वतापूर्ण है कि मूर्खतापूर्ण यह नहीं जानते पर तस्वीर के पीछे जाकर द्रेखते हैं तो ऐसे ही ख्याल आते हैं।
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16 नवंबर 2008

कभी वह अच्छा लगा तो कभी बुरा-हिंदी शायरी

एक दिन घूमते हुए उसने
चाय पिलाई तब वह अच्छा लगा
कुछ दिन बाद वह मिला तो
उसने पैसे उधार मांगे तब वह बुरा लगा
फिर एक दिन उसने
बस में साथ सवारी करते हुए
दोनों के लिये टिकिट खरीदा तब अच्छा लगा
कुछ दिन बाद मिलने पर
फिर उधार मांगा
पहली बार उसको दिया उधार पर
फिर भी बहुत बुरा लगा
एक दिन वह घर आया और
सारा पैसा वापस कर गया तब अच्छा लगा
वह एक दिन घर पर
आकर स्कूटर मांग कर ले गया तब बुरा लगा
वापस करने आया तो अच्छा लगा

क्या यह सोचने वाली बात नहीं कि
आदमी कभी बुरा या अच्छा नहीं होता
इसलिये नहीं तय की जा सकती
किसी आदमी के बारे में एक राय
हालातों से चलता है मन
उससे ही उठता बैठता आदमी
कब अच्छा होगा कि बुरा
कहना कठिन है
चलाता है मन उसे जो बहुत चंचल है
जो रात को नींद में भी नहीं सोता
कभी यहां तो कभी वहां लगा

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28 सितंबर 2008

महफिलों में नहीं असली शायर का काम-हिंदी शायरी

लोगों को आपस में
मिलाने के लिये किया हुआ है
उन्होंने शामियानों का इंतजाम
बताते हैं जमाने के लिये उसे
भलाई का काम
खुद सज जाते हैं हमेशा दूल्हों की तरह
अपना नाम लेकर
पढ़वाते हैं कसीदे
उनके मातहत बन जाते सिपहसालार
वह बन जाते बादशाह
बाहर से आया हर इंसान हो जाता आम

जिनको प्यारी है अपनी इज्जत
करते नहीं वहा हुज्जत
जो करते वहां विरोध, हो जाते बदनाम
मजलिसों के शिरकत का ख्याल
उनको इसलिये नहीं भाता
जिनको भरोसा है अपनी शख्यिसत पर
शायद इसलिये ही बदलाव का बीज
पनपता है कहीं एक जगह दुबक कर
मजलिसों में तो बस शोर ही नजर आता
ओ! अपने ख्याल और शायरी पर
भरोसा करने वालोंे
मजलिसों और महफिलों में नहीं तुम्हारा काम
बेतुके और बेहूदों क्यों न हो
इंतजाम करने वाले ही मालिक
सजते हैं वहां शायरों की तरह
बाहर निकल कर फीकी पड़ जायेगी चमक
इसलिये दुबके अपने शामियानों के पीछे
कायरों की तरह
वहां नहीं असली शायर का काम

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23 सितंबर 2008

इज्जत की खातिर क्या न किया-हिंदी शायरी


अपने खानदान की इज्जत

बचाने के लिये क्या नहीं किया

जमाने भर को दी दावत

जगमगा दिया मेहमानों के आने का रास्ता

अपनी मुस्कान बिखेर दी हर मिलने वाले से

पर फिर भी शिकायतों ने हैरान किया

खाने में स्वाद की कमी

शराब के खराब होने की चर्चा

शमियाने के बेढंगे होने की बात

जिसे इज्जत की खातिर किया वह

फिर भी नसीब नहीं हुई

चाहे जिंदगी की बचत को हवा किया

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22 सितंबर 2008

कर्ज के मर्ज का इलाज कहीं नहीं मिलता है-हिंदी शायरी

बाजार अब केवल सड़क पर ही नहीं सजते
उनके बैंड तो अब घर घर बजते
विज्ञापन के युग का हुआ है यही असर
जेब में पैसा नहीं हो फिर भी
खरीददार तो कर्ज लेकर चीज लाने के लिये सजते
फिर तो आगे किश्तों की खाई है
उससे भला लोग कहां बचते
...........................
किश्तों में खरीदने के लिये
कर्ज भी मिलता है
सच है मर्ज भी किश्तों में
शरीर को मिलता है
उसके इलाज के लिय भी कर्ज मिलता है
जब तब इंसान के जिस्म में खून है
उसे पीने के लिये
मच्छर तो हर जगह है मौजूद
रोज की कहानियों कोई न कोई
हादसा दर्ज होता
पर कर्ज के मर्ज का इलाज कहीं नहीं मिलता
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30 जुलाई 2008

सर्वशक्तिमान ने कोई कानून नहीं बनाया -हिन्दी शायरी


किसी भूखे को रोटी खिलाने का
उनकी किताबों में कोई इलाज नहीं
ढेर सारे कसूरों की सजाएं है
कसूरवार की मजबूरी समझने का
कोई कहीं रिवाज नहीं
जमाने को सिखाते हैं तमाम तरीके
जन्नत में जाने के
अपनी हकीकतो से दूर
ख्वाबों में जाने के
सर्वशक्तिमान ने कोई कानून नहीं बनाया
फिर भी उसके नाम पर सुनाते हैं
चंद किताबें पढ़कर फैसले
इंसान की भूख को पढ़ने का
कहीं कोई मिजाज नहीं
सभी को मोहब्बत का पैगाम देते हैं
पर जिस्म की भूख पर है खामोश
क्योंकि उस पर किसी का बस नहीं
अरे, ऊपर वाले का नाम लेकर
दुनियो को उसके दस्तूर पर चलाने वालों
उससे पूछ का बताओ
भूखा अगर रोटी की चोरी करे
तो उसकी सजा क्यों होना चाहिए
अगर वह इंसान के पेट में भूख नहीं बनाता तो
मान लेते उसका होगा वजूद
इस धरती पर भी कहीं

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शांति लाने का दावा

बारूद के ढेर चारों और लगाकर
हर समस्या के इलाज के लिए
नये-नयी चीजें बनाकर
आदमी में लालच का भूत जगाकर
वह करते हैं दुनिया में शांति लाने का दावा

बंद कमरों में मिलते अपने देश की
कुर्सियों पर सजे बुत
चर्चाओं के दौर चलते
प्रस्ताव पारित होते बहुत
पर जंग का कारवाँ भी
चल रहा है फिर भी हर जगह
होती कुछ और
बताते और कुछ वजह
जब सब चीज बिकाऊ है
तो कैसे मिल सकता है
कहीं से मुफ्त में शांति का वादा
बहाने तो बहुत मिल जाते हैं
पर कुछ लोग का व्यवसाय ही है
देना अशांति को बढावा

एक दुकान से खरीदेंगे शांति
दूसरा अपनी बेचने के लिए
जोर-जोर से चिल्लाएगा
फैलेगी फिर अशांति
जब फूल अब मुफ्त नहीं मिलते
तो बंदूक और गोली कैसे
उनके हाथ आते हैं
जहाँ से चूहा भी नहीं निकल सकता आजादी से
वहाँ कोहराम मचाकर
वह कैसे निकल जाते हैं
विकास के लिए बहता दौलत का दरिया
कुछ बूँदें वहाँ भी पहुंचा देता है
जहाँ कहीं शांति का ठेकेदार
कुछ समेट लेता है
जानते सब हैं पर
दुनिया को देते हैं भुलावा
न दें तो कैसे करेंगे शांति लाने का दावा
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29 जुलाई 2008

पहरेदारी अपने घर की किसे सौपे-हिन्दी शायरी


लुट जाने का खतरा अब
गैरो से नहीं सताता
अपनों को ही यह काम
अच्छी तरह करना आता

पहरेदारी अपने घर की किसे सौपे
यकीन किसी पर नहीं आता
जहां भी देखा है लुटते हुए लोगों को
अपनों का हाथ नजर आता
कई बाग उजड़ गये हैं
माली अब फूल नहीं लगाता
इंतजार रहता है उसे
कोई आकर लगा जाये पेड़ तो
वह उसे बेच आये बाजार में
इस तरह अपना घर सजाता
नाम के लिये करते हैं मोहब्बत
बेईमानी से उनकी है सोहबत
जमाने के भलाई का लगाते जो लोग नारा
लूट में उनको ही मजा आता
कहें भारतदीप
मन में है उथलपुथल तो
अमन कहां से आयेगा यहां
जिनके हाथ में बागडोर होती चमन की
किसी और से क्या खतरा होगा
वही उसका दुश्मन हो जाता
..................................

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