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2 मई 2010

खोखली धरा पर महल-हिन्दी क्षणिकायें (khokhli dhara par mahal-hindi kshanikaen)

नैतिकता का पैमाना कितना भी नीचे जाये,
काले धन के कुऐं से नीचे नहीं गिरेगा,
जहां धरती पर लहरा नही फसल
किसान के परिश्रम और लगन से
वहां इंसानियत का सच दिखेगा।
---------7
सफेदपोशों ने कर लिया दौलत के कुओं पर कब्जा,
गरीब और मजदूर प्यासे रह गये,
मेहनतकश कर ले तसल्ली एक समय की रोटी से
पर लुटेरों के पेट नहीं करते कभी
बड़े बड़े विद्वान यह कह गये।
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दूसरे की दौलत देखकर मचलना नहीं
कई अमीरों के खोखली धरा पर महल खड़े है।
जब तक नज़र न आये उनका गिरा चरित्र
तभी तक भी वह ज़माने में बड़े हैं।
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कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
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18 अप्रैल 2010

रिश्ते और जज़्बात-हिन्दी शायरी (rishtey aur jazbat-hindi shayari)

पेड़, पौद्ये, पशु और पक्षी में
दिल लगाना ही क्यों अच्छा लगता है,
शायद इसलिये कि इंसानों की तरह
जज़्बातों से वह खिलवाड़ नहीं करते हैं।
धोखे खाये होंगे हजार जमाने से,
थक गये इंसानों को आजमाने से,
दुर्गंध और बदनीयती से हुआ सामना
जब मिले इंसानी चेहरों से,
इसलिये दे सके जो ताजी हवा
बिना उम्मीद के दिखाये वफा
उन्हीं से रिश्ते निभाने पर जज़्बात मचलते हैं।
----------
उनके लिये जमाने भर से
घाव अपने दिल पर लेते रहे,
फिर भी कभी उफ नहीं कहा,
अपने मसले हल होते ही
मुंह वह फेर गये
यह भी नहीं पूछा कि
मेरे लिये तुमने कितना दर्द सहा।
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9 अप्रैल 2010

परदा-हिन्दी शायरी (parda hindi shayri)

पर्दे के बाहर आता औरत का चेहरा
उनको बहुत डराता है,
बयान न करे आदमी की हकीकत
यह ख्याल उनको डराता है।
इसलिये किताबों में छपे पुराने बयान को
रोज करते है सुनाकर ताजा,
कभी इस धरती पर पैदा न हुए अपने फरिश्ते को
जताते दुनिया का राजा,
उसकी नसीहतों का हमेशा बजाते बाजा,
असलियत न आ जाये परदे से कभी बाहर
इस सोच से ही उनका दिल घबड़ाता है।
-------------
अपने यकीन को ताकतवर कहने वाले
तलवारों को चौराहे पर नचाते हैं।
अमनपसंद होने का दावा करते वह लोग
जो इशारों से खून बहाते हैं।
सच यह है कि देते हैं जमाने को नसीहत
अपने को फरिश्ते दिखने की खातिर
पहले कराते हैं फसाद
फिर सुलह कराने जाते हैं।
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1 अप्रैल 2010

अप्रैल फूल यानि मूर्ख दिवस-हास्य कविता (april fool-hindi hasya kavita)

एप्रिल फूल अब क्या मनायें
यहां तो खुद ही रोज मूर्ख बन जायें।
नकली नायकों को पर्दे पर दिखाकर
देवताओं की तरह उनका नाम जपायें।
बेकसूर रहें खौफ के साये में
कसूरवार जेल में भी जश्न मनायें।
सजाया है बाजार ने पर्दे पर खेल
उसमें आम इंसान अपनी नज़र गंवायें।
रोज रोज वादे कर, वह मुकर जाते हैं
हम हर बार उन पर यकीन जतायें।
देश की तरक्की के चर्चे हैं चारों तरफ
पर हम भूख और लाचारी को न भूल पायें।
खुद ही कसमें खाते हैं रोज बदलने की
पर कभी अपने को सुधार न पायें।
बेअक्लों की महफिल में रोज बैठते हैं
फिर भला क्या मूर्ख दिवस मनायें।
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28 मार्च 2010

सोच की ताज़गी-हिन्दी व्यंग्य कविता (soch ki tazgi-hindi vyangya kavita)

अपनी सोच पर इतना न इतराओ
कि उसको कोई हिलाने लगे,
किसी पर न उछालो कीचड़ कि
छींटे तुम्हारे चेहरे पर भी आकर गिरें
फिर तुमको कोई आईना दिखाने लगे।
हवा के झौंके हैं सभी यहां
तुम भी बह जाओगे,
कोई नया कहेगा,
तुम पुराने हो जाओगे,
नई सांसों की ताजगी के साथ जीना सीखो
नहीं तो हो सकता है कि
कोई अपनी ताजगी से
तुम्हें बासी बताने लगे।
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7 मार्च 2010

इंसान और प्रकृति-हिन्दी व्यंग्य कवितायें (men and neture-hindi satire poem)

हैरानी है इस बात पर कि
समलैंगिकों के मेल पर लोग
आजादी का जश्न मनाते हैं,
मगर किसी स्त्री पुरुष के मिलन पर
मचाते हैं शोर
उनके नामों की कर पहचान,
पूछतें हैं रिश्ते का नाम,
सभ्यता को बिखरता जताते हैं।
कहें दीपक बापू
आधुनिक सभ्यता के प्रवर्तक
पता नहीं कौन हैं,
सब इस पर मौन हैं,
जो समलैंगिकों में देखते हैं
जमाने का बदलाव,
बिना रिश्ते के स्त्री पुरुष के मिलन
पर आता है उनको ताव,
मालुम नहीं शायद उनको
रिश्ते तो बनाये हैं इंसानों ने,
पर नर मादा का मेल होगा
तय किया है प्रकृति के पैमानों ने,
फिर जवानी के जोश में हुए हादसों पर
चिल्लाते हुए लोग, क्यों बुढ़ाये जाते हैं।
----------
योगी कभी भोग नहीं करेंगे
किसने यह सिखाया है,
जो न जाने योग,
वही पाले बैठे हैं मन के रोग,
खुद चले न जो कभी एक कदम रास्ता
वही जमाने को दिखाया है।
जानते नहीं कि
भटक जाये योगी,
बन जाता है महाभोगी,
पकड़े जाते हैं जब ऐसे योगी
तब मचाते हैं वही लोग शोर
जिन्होंने शिष्य के रूप में अपना नाम लिखाया है।

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19 फ़रवरी 2010

तलवार और शायरी-हिन्दी काव्य (talvar aur shayri-hindi poem)

तलवार से एक कत्ल करोगे,
पर खुद भी कभी उसके वार से मरोगे।
अपनी शायरी से जीत लो दुनियां
अपना नाम अक्लमंदों की सूची में भरोगे।
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तलवारें है जिनके हाथ में
उन पर क्या भरोसा करना
कब कर बैठें वह अपने आदमी पर वार,
गरदना काटने पर बहादुरी
और कट जाने पर शहीद का दर्जा
भले ही जमाना देता है
पर शायरी से जीते हैं दिल जिन्होंने
उनको इतिहास अपने पन्नों में
हमदर्दों के रूप में दर्ज कर लेता है
सच कहा है कि किसी ने
लफ्ज़ों करते हैं जितना प्रहार
कर नहीं सकती वैसा तलवार।

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12 फ़रवरी 2010

लोग खुद ही हंसते हैं-हास्य कवितायें (velantinday-hindi hasya kavita)

वैलेंटाइन डे पर वह

कुछ प्रेम इस तरह जताते हैं।

होली से पहले ही अपने इष्ट को

सरेराह मसखरी बनाते हैं।

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आया फंदेबाज और बोला

‘दीपक बापू,

आ रहा है वैलंटाईन डे

कोई जोरदार श्रृंगार रस से भरी

कविता कागज पर लिखकर

ब्लाग पर सजाना,

शायद लग जाये हिट का खजाना,

यह हास्य कवितायें लिखना

पुराने जमाने की बात है,

प्रेम के लिये रौशन है सभी के दिल

हास्य के लिये तो बस अंधेरी रात है,

तुम भी वही राह चलो

जिस पर चल रहा है जमाना।’

सुनकर पहले गंभीर हुए और फिर

मुस्कराते हुए कहें दीपक बापू

‘मुश्किल यह है कि

इस नये जमाने के प्रेम पर

हमको तो बस हंसी ही आती है

सरेराह गले में हाथ डालकर

घूमने में

या बार में बीयर पीने के

प्रेम से रिश्ते की बात हमारे

समझ में नहीं आती है।

खामोशी बोलती है

बंद आंखें भी राज खोलती हैं

प्रेम कोई ऐसी शय नहीं

जिसे बाजार में बेचने के लिये सजाना,

ऐसा करके बस यूं ही 

मुफ्त में जमाने को हंसाना।

फिर छोटे पर्दे पर

हर साल देखकर हमें होली की याद आती है

दृश्यों में कुछ भाग रहे हैं प्रे्रम करते हुए

पीछे विरोधी दौड़ रहे

आशिक माशुका भाग रहे डरते हुए,

इस धींगामुश्ती में होली की याद आती है

जो एक पखवाड़े बाद रंग दिखाती है,

कुछ लोग प्रेम पर बंदिश को लेकर करते स्यापा,

शब्दों के चयन में खो बैठते अपना आपा,

यह देखकर लोग खुद ही हंसते हैं

उन्हें भला क्या हंसाना।’

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6 फ़रवरी 2010

सपने ही सच के गवाह हो गए-हिंदी व्यंग्य कविताएँ (sapne aur sach-hindi hasya kavitaen)

कुछ मुद्दे हल ही नहीं हुए
पर हवा हो गये,
क्योंकि नये मुद्दों ने जन्म लिया
जो इंसान की दिमागी फितरतों की दवा हो गये।
ज़माना चला है ख्वाबों की राह
जहां सपने ही सच के गवाह हो गये।
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वादा कर वह भूल जाते हैं,
देने की लिए नया जो लाते हैं।
सुनने वाले भी भला कहाँ याद रखते
नए में मशगूल हो जाते हैं।
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26 जनवरी 2010

निकल जायेगा तेल-हिन्दी हास्य कविता (nikal jayega tel-hindi hasya kavita)

फंदेबाज आया दनदनाता और बोला

‘दीपक बापू सुना है साहित्य के इनाम बांटने वाली

किसी संस्था का एक कंपनी से हो गया है तालमेल,

कर रहे हैं लेखक उसका विरोध.

तुम भी दिखलाओ क्रोध,

मौका अच्छा है लेखकों में नाम कमाने का,

नहीं है मौका यह गंवाने का,

जम जाये शायद तुम्हारे लिये किसी पुरस्कार का खेल।’



सुनकर पहले तो चैंके

फिर इंटरनेट पर कीबोर्ड पर हाथ नचाते

कहैं दीपक बापू

‘कमबख्त, हमारा लिखा कभी पढ़ना नहीं,

बस, जहां देखो  इनाम की बात

उम्मीद हमारे अंदर आकर जगाना वहीं,

तुम्हें नहीं मालूम

दिग्गज साहित्यकारों के नज़र में

हास्य कविताएं कभी साहित्य नहीं होती,

कवि वही है जो खुद एक भी आंसु न बहाये

पर लिखे ऐसा कि पढ़कर जनता रोती,

हमसे बेहतर लिखने वाले बहुत सारे लेखक

जोरदार लिखते रहे,

उनके नाम पर एक भी पुरस्कार नहीं

पर अविस्मरणीय है उनके शब्द

जो उन्होंने कहे,

वैसे सच कहें कि इनाम बांटने वाली संस्था का

प्रायोजित कंपनी से हुआ है जो मेल,

हम जैसे अदना को मिलने की तो भूल जाओ

बड़ों बड़ों का बिगड़ जायेगा खेल।

न किसी ने पहले पूछा

न कोई आगे पूछेगा

जब क्रिकेट, फिल्म और पत्रकारिता में

चल रहा है कंपनियों का खेल

चलने दो साहित्य के साथ उनका मेल।

हम तो कवि हैं

कविता करते जायेंगे,

पुरस्कारों की भीड़ में शायद ही

कभी अपना नाम पायेंगे,

अलबत्ता कहो तो समर्थन करने लगें

शायद जम जाये अपने लिये भी पुरस्कार का खेल।

बड़े बड़े लोग कतार में लगे हैं,

जीत लिये हैं बहुत सारे पुरस्कार

अब दूसरे के पीछे भगे हैं,

न तो विरोध में

न क्रोध में अपना नाम चमकेगा,

नक्कारखाने में तूती की तरह बजेगा,

निकल जायेगा कीबोर्ड पर ऐसे ही तेल।


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25 दिसंबर 2009

नकद और उधार-व्यंग्य क्षणिकाएं (nakad aur aur udhar-vyangya kavitaen)

 जेब में पैसा न हो तो भी

जश्न मना सकते हों उधार लेकर।

प्रचार महकमें के

दावों  में बह जाना आसान है

जो बाजार में खुशी खरीदने के लिये

सारे साधन जुटा लेता है

दुकान और कर्जेदार  का पता भी देता है

अगर भले हो तुम

पास नहीं आया नकद रुपया

तो भी चुकाओगे जान देकर।

--------------

उधार की रौशनी

कितनी देर चलेगी।

बाद में जिंदगी

ब्याज और किश्त की

अंधेरी गलियों में ही ढलेगी।

------

कभी बाजार में जेब में पैसा न हो तो भी

जश्न मना सकते हों उधार लेकर।

प्रचार महकमें के

दावों  में बह जाना आसान है

जो बाजार में खुशी खरीदने के लिये

सारे साधन जुटा लेता है

दुकान और कर्जेदार  का पता भी देता है

अगर भले हो तुम

पास नहीं आया नकद रुपया

तो भी चुकाओगे जान देकर।

--------------

उधार की रौशनी

कितनी देर चलेगी।

बाद में जिंदगी

ब्याज और किश्त की

अंधेरी गलियों में ही ढलेगी।

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कभी बाजार में

आज नकद कल उधार की

तख्ती मिलती थी

अब किश्तों पर हर माल उपलब्ध

लिखा मिलता है।

कभी कभी तो लगता है कि

नकद माल बेचने से

सौदागर खुश नहीं होता

किश्तों पर ब्याज मिलने के ख्वाब से ही

उसका चेहरा खिलता है।



आज नकद कल उधार की

तख्ती मिलती थी

अब किश्तों पर हर माल उपलब्ध

लिखा मिलता है।

कभी कभी तो लगता है कि

नकद माल बेचने से

सौदागर खुश नहीं होता

किश्तों पर ब्याज मिलने के ख्वाब से ही

उसका चेहरा खिलता है।
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19 दिसंबर 2009

स्यापा पसंद-हिन्दी व्यंग्य कवितायें (syapa pasand-hindi vyangya kavita)

 कुछ लोगों की मौत पर

बरसों तक रोने के गीत गाते,

कहीं पत्थर तोड़ा गया

उसके गम में बरसी तक मनाते,

कभी दुनियां की गरीबी पर तरस खाकर

अमीर के खिलाफ नारे लगाकर

स्यापा पसंद लोग अपनी

हाजिरी जमाने के सामने लगाते हैं।

फिर भी तरक्की पसंद कहलाते हैं।

---------

लफ्जों को खूबसूरत ढंग से चुनते हैं

अल्फाजों को बेहद करीने से बुनते हैं।

दिल में दर्द हो या न हो

पर कहीं हुए दंगे,

और गरीब अमीर के पंगे,

पर बहाते ढेर सारे आंसु,

कहीं ढहे पत्थर की याद में

इस तरह दर्द भरे गीत गाते धांसु,

जिसे देखकर

जमाने भर के लोग

स्यापे में अपना सिर धुनते हैं।

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5 दिसंबर 2009

चिंताओं की गठरी-हिन्दी शायरी (chintaon ki gathri-hindi shayri)

 जो तुम भी चाहोगे

इंसानी बुत बनकर

बड़े कहलाओगे।

सीख लो नटों के इशारों की डोर पर नाचना

जमाने में मशहूर हो जाओगे।

आम इंसान की अगर

नसीब हुई है जिंदगी

करो उसी की बंदगी

आजादी में सांसें ले रहे हो

इसी पर करो फख्र

खुश रहो इस बात पर

कि नहीं है गिरने की फिक्र

बड़े बनकर

गंवा बैठोगे अपना अमन

कितनी भी ऊंचाई पर जाओ

चिंताओं की गठरी सिर पर उठाओगे।

पर्दे के पीछे बैठे काले चेहरों से

कभी मुंह नहीं फेर पाओगे
 
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25 नवंबर 2009

अब मत पूछना-हिंदी हास्य कविता (ab mat poochna-hindi haysa kavita)

 माशुका ने पूछा आशिक से

‘अगर शादी के बाद मैं

मर गयी तो क्या

मेरी याद में ताजमहल बनवाओगे।’

आशिक ने कहा

‘किस जमाने की माशुका हो

भूल जाओ चैदहवीं सदी

जब किसी की याद में

कोई बड़ी इमारत बनवाई जाती थी,

फिर समय बदला तो

किसी की याद में कहीं पवित्र जगह पर

बैठने के लिये बैंच लगती तो

कहीं सीढ़ियां बनवायी जाती थी,

अब तो किस के पास समय है कि

धन और समय बरबाद करे

अब तो मरने वाले की याद में

बस, मोमबत्तियां जलाई जाती हैं

दिल में हो न हो

बाहर संवेदनाएं दिखाई जाती हैं

हमारा दर्शन कहता है कि

जीवन और मौत तो

जिंदगी का हिस्सा है

उस पर क्या हंसना क्या रोना

अब यह मत पूछना कि

मेरे मरने पर मेरी अर्थी पर

कितनी मोमबतियां जलाओगे।’
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13 नवंबर 2009

महापुरुषों का अनुसरण-हिंदी हास्य कविता (anusaran-hindi hasya kavita)

अपने विरोधी पर
शब्द प्रहार करते हुए उन्होंने कहा
‘वह बरसों जनता की सेवा में लगे हैं
लोग भी अब उनके चेहरे से थके हैं
नया चेहरा सामने नहीं आने देते
जहां मौका मिलता वहीं
अपने लिये हाथ फैला लेते हैं।
हमें देखो
अब तो सब छोड़ दिया है
नये चेहरों को जनता से जोड़ दिया है
बेटी को सौंप दिया है
पत्रकारिता का जिम्मा
बेटे को की जनसेवा की विरासत
अब हमारे घर में
कोई नहीं बचा युवा पीढ़ी में निकम्मा
हम तो करते हैं
महापुरुषों का अनुसरण
जो नयी पीढ़ी को आगे आने का मौका देते हैं।
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5 नवंबर 2009

अभिव्यक्ति की ताकत-कविता और लघु आलेख ( abhivyakti ki taqat-kavita aur alekh)

अक्सर लोग आपस में अपने दर्द की चर्चा करते हुए जी हल्का कर लेते हैं। उनकी ढेर सारी शिकायत अपने और गैर लोगों से होती हैं। उनके सामने कहते हुए कहीं संकोच तेा कहीं डर होता है कि वह व्यक्ति नाराज न दुःखी न हो जाये जिसके प्रतिकूल बात कह रहे हैं। फिर हम देख रहे हैं कि सदियों से बड़े लोगों द्वारा छोटे लोगों पर अनाचार की ढेर सारी कहानियां हैं। जाति, धर्म, भाषा और क्षेत्र के नाम पर होने वाले संघर्षों में हमेशा आम आदमी निशाना बना है। इस संघर्ष से लगने वाली आग में आम इंसान के घर और झोंपड़ियां जली हैं। कभी महलों के जलने की चर्चा नहीं सुनने में नहीं आती। कभी कभी तो निराशा होती है पर कभी यह देखकर दिल प्रफुल्लित होता है कि आज भी समाज में दरियादिल लोग हैं जो धर्म के नाम पर होने वाले कार्यक्रमों में अपनी सकारात्मक भूमिका निभाते हैं। लोग धर्म के नाम पर छोटे कार्यक्रम कर अपने लिये खुशियां जुटाते हैं।
सच तो यह है कि गरीबों के कल्याण के नाम पर अनेक पेशेवर लोग अपने अभियान चलाते हैं। उनके दो उद्देश्य ही होते हैं एक तो उसके नाम पर अमीरों से चंदा वसूल करें और गरीब से पहले ही दाम वसूल कर लेते हैं या फिर उनको मुफ्त में अपने अभियान में पैदल दौड़ लगवाते हैं अलबत्ता उनके भले का काम धेले भर का नहीं होता।
हमारा देश धार्मिक प्रधान माना जाता है। धर्म के नाम पर सत्संग और सम्मेलन इतने होते हैं कि उसे देखकर लगता ही नहीं है कि यहां कोई राक्षस भी है। सभी जगह देवताओं के समूह दिखाई देते हैं। यह सत्संग या सम्मेलन केवल भारत में ही उत्पन्न विचाराधाराओं को मानने वाले लोगों द्वारा आयोजित नहीं किये जाते बल्कि बाहर उत्पन्न विचाराधाराओं के लोग भी करते हैं। सभी प्रकार के धर्म सम्मेलनों में गरीबों के खाने पीने के इंतजाम किये जाते हैं। अगर धार्मिक जुलूस हों तो जगह जगह पानी और प्रसाद की व्यवस्था का दौर सभी धर्म के लोग करते हैं। ऐसा नहंी लगता कि विदेशों में रहने वाले भारतीय या अन्य धर्मी ऐसे कार्यक्रंम करते हों। यही कारण है कि धर्म जितनी शिद्दत से यहां माना जाता है कहीं अन्य नहीं। धार्मिक संवदेनाओं के कारण यहां वाद विवाद भी अधिक होते हैं।
धर्म प्रधान होने के बावजूद भी इस समाज में ही भ्रष्टाचार, अनाचार, व्याभिचार तथा दुव्र्यवहार की घटनायें इतनी अधिक होती हैं कि उनकी कहानियों पर अनेक ग्रंथ लिखे जा सकते हैं। देश की छबि विदेश में क्या देश में ही खराब हो गयी है। इसका कारण यह है कि लोग आवेश, लालच, मोह तथा अहंकार में प्रतिदिन ऐसे काम करने से बाज नहीं आते तो हर धर्म की दृष्टि से गलत हैं। सभी धर्म, जातियों, भाषाओं और क्षेत्र के नाम पर बने समूहों के झंडे तले ऐसी घटनायें होती हैं कि कोई यह दावा कर ही नहीं सकता कि उसके समूह के सभी सदस्य पवित्र तथा उदार हैं। आखिर ऐसा क्यों?
इसका उत्तर यही है कि लोग अपने को उस समय अभिव्यक्त नहीं करते जब उचित समय हो। जहां एक आम आदमी पर अनाचार होता है तो वहां दूसरा यह सोचकर मुंह फेर लेता है कि स्वयं के साथ तो नहीं हो रहा है। जब उसके साथ होता है तो दूसरा भी ऐसा ही करता है। परिणामस्वरूप पूरे समाज में बड़े वर्ग का अनाचार, भ्रष्टाचार, तथा व्याभिचार निर्बाध गति से चलता रहता है। इसका कहीं कोई प्रतिरोध नहीं है। जरूरत है अपनेे अंदर के भय समाप्त करने की तभी आम आदमी कोई लडाई लड़ सकता है। उसे अपनी जुबान का सही समय पर उपयेाग करना चाहिये और अपनी पीड़ा सभी के सामने कहकर हल्का होने की बजाय वहां कहना चाहिये जहां समस्या का हल होता है। सबसे बड़ी बात यह है कि सामान्य लोग धर्म, जाति, भाषा और क्षेत्रीय आधार बने समूहों के पिछलग्गू होने की बजाय व्यक्ति आधार पर एक दूसरे से संपर्क बनायें तथा अपनी सामूहिक अभिव्यक्ति का एक स्वर दें। प्रस्तुत है इस पर एक स्वरचित शेर
आखिर यह सिलसिला कब तक चलता रहेगा।
यूं जमाना खास लोगों के जुर्म सहेगा।
शायद जब तक कुदरत से तोहफे में मिली
जुबान से अपना दर्द पूरी ताकत से नहीं कहेगा।।

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कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
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31 अक्टूबर 2009

बहार और कगार-हिंदी कविता (bahar aur kagar-hindi kavita)

ज़िन्दगी के देखे दो ही रास्ते
एक बागों की बहार
दूसरा उजाड़ की कगार का.

चलती है टांगें
मकसद तय करता है मन
दुश्मन की शान में गुस्ताखी करना
या तारीफ के अल्फाज़ कहकर
दिल खुश करना यार का..

फिर भी समझ का फेर तो
होता है इंसान में अलग अलग
कहीं रौशनी देखकर अंगारों में
अपने पाँव जला देता है
कहीं प्यार के वहम में
अपनी अस्मत भी लुटा देता है
जिंदगी है उनकी ही साथी
जो आगे कदम बढ़ाने से पहले
अनुमान कर लेता है
समय और हालत की धार का..

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17 अक्टूबर 2009

अपनी असलियत मत बदलना-हिंदी व्यंग्य कविता (apni asliyat mat badlana-hindi vyangya kavita)

सारे जहां की प्यास मिटा सको
तुम वह समंदर बनना.
भेजे जो आकाश में पानी भरकर मेघ
जहां लोग पानी को तरसे
वहीँ समन्दर से लाया अमृत बरसे
अपने किये का नाम कभी न करना.

गंगा पवित्र नदी कहलाती है,
पर अपने किनारे की ही प्यास बुझाती है,
देवी की तरह पुजती पर
लाशों से मैली भी की जाती है,
जब तक समन्दर तक पहुँचती
तब तक समेटती है दूसरों के पाप,
जहां है इज्जत का वरदान
वहां साथ लगा है बदनामी का शाप,
तुम बने रहना हमेशा खारे
किनारे आये प्यासों की प्यास बुझाने के लिए
दिखावे के पुण्य की लालच में
अपनी असलियत मत बदलना.

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लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, Gwalior
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5 अक्टूबर 2009

उनके लिए एक शय-हिंदी कविता (ek shay-hindi kavita)

वह शर्मिन्दा नहीं
चाहे तुम्हें वह रास्ता बताया
जिस पर खुद कभी चले नहीं.
तुम्हारे पांवों के छाले बतलाते हैं
कि उनके कहने पर ही कदम-दर-कदम
अपने बढ़ाते रहे उस मंजिल की तरफ
जो जमीन पर नहीं बसी थी
ख्यालों में थी उनके कहीं.
उन्हें वास्ता था
तुम्हारी लाचारी से
जिस पर हमदर्दी दिखाकर
वह अपने लिए इज्जत जुटा रहे थे
उनकी अदाओं पर
लोग वाह वाह लुटा रहे थे
तुम उनके लिए एक शय से ज्यादा कभी थे ही नहीं
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16 सितंबर 2009

बुतों के पेट से बुत-व्यंग्य कविता (buton ke pet se but-vyangya kavita)

चौराहे पर खड़े पत्थर के बुत पर
कंकड़ लगने पर भी लोग
भड़क जाते हैं।
अगला निशाना खुद होंगे
यह भय सताता है
या पत्थर के बुत से भी
उनको हमदर्दी है
यह जमाने को दिखाते हैं।

कहना मुश्किल है कि
लोग ज्यादा जज्बाती हो गये हैं
या पत्थरों के बुतों के सहारे ही
खड़े हैं उनके घर
जिनके ढहने का रहता है डर
जिसे शोर कर वह छिपाते हैं।
यह मासूमियत है जिसके पीछे चालाकी छिपी
जो लोग कंकड़ लगने से कांप जाते हैं।
............................
बुतों के पेट से ही
बुत बनाकर वह बाजार में सजायेंगे।
समाज में विरासत मिलती है
जिस तरह अगली पीढ़ी को
उसी तरह खेल सजायेंगे।
जज्बातों के सौदागर
कभी जमाने में बदलाव नहीं लाते
वह तो बेचने में ही फायदा पायेंगे।
करना व्यापार है
पर लोगों के जज्बातों की
कद्र करते हुए सामान सजायेंगे।

....................................
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