hindi hasya kavita लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
hindi hasya kavita लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

12 फ़रवरी 2010

लोग खुद ही हंसते हैं-हास्य कवितायें (velantinday-hindi hasya kavita)

वैलेंटाइन डे पर वह

कुछ प्रेम इस तरह जताते हैं।

होली से पहले ही अपने इष्ट को

सरेराह मसखरी बनाते हैं।

-----------

आया फंदेबाज और बोला

‘दीपक बापू,

आ रहा है वैलंटाईन डे

कोई जोरदार श्रृंगार रस से भरी

कविता कागज पर लिखकर

ब्लाग पर सजाना,

शायद लग जाये हिट का खजाना,

यह हास्य कवितायें लिखना

पुराने जमाने की बात है,

प्रेम के लिये रौशन है सभी के दिल

हास्य के लिये तो बस अंधेरी रात है,

तुम भी वही राह चलो

जिस पर चल रहा है जमाना।’

सुनकर पहले गंभीर हुए और फिर

मुस्कराते हुए कहें दीपक बापू

‘मुश्किल यह है कि

इस नये जमाने के प्रेम पर

हमको तो बस हंसी ही आती है

सरेराह गले में हाथ डालकर

घूमने में

या बार में बीयर पीने के

प्रेम से रिश्ते की बात हमारे

समझ में नहीं आती है।

खामोशी बोलती है

बंद आंखें भी राज खोलती हैं

प्रेम कोई ऐसी शय नहीं

जिसे बाजार में बेचने के लिये सजाना,

ऐसा करके बस यूं ही 

मुफ्त में जमाने को हंसाना।

फिर छोटे पर्दे पर

हर साल देखकर हमें होली की याद आती है

दृश्यों में कुछ भाग रहे हैं प्रे्रम करते हुए

पीछे विरोधी दौड़ रहे

आशिक माशुका भाग रहे डरते हुए,

इस धींगामुश्ती में होली की याद आती है

जो एक पखवाड़े बाद रंग दिखाती है,

कुछ लोग प्रेम पर बंदिश को लेकर करते स्यापा,

शब्दों के चयन में खो बैठते अपना आपा,

यह देखकर लोग खुद ही हंसते हैं

उन्हें भला क्या हंसाना।’

कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
http://anant-shabd.blogspot.com

-----------------------------
‘दीपक भारतदीप की हिन्दी-पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका

25 नवंबर 2009

अब मत पूछना-हिंदी हास्य कविता (ab mat poochna-hindi haysa kavita)

 माशुका ने पूछा आशिक से

‘अगर शादी के बाद मैं

मर गयी तो क्या

मेरी याद में ताजमहल बनवाओगे।’

आशिक ने कहा

‘किस जमाने की माशुका हो

भूल जाओ चैदहवीं सदी

जब किसी की याद में

कोई बड़ी इमारत बनवाई जाती थी,

फिर समय बदला तो

किसी की याद में कहीं पवित्र जगह पर

बैठने के लिये बैंच लगती तो

कहीं सीढ़ियां बनवायी जाती थी,

अब तो किस के पास समय है कि

धन और समय बरबाद करे

अब तो मरने वाले की याद में

बस, मोमबत्तियां जलाई जाती हैं

दिल में हो न हो

बाहर संवेदनाएं दिखाई जाती हैं

हमारा दर्शन कहता है कि

जीवन और मौत तो

जिंदगी का हिस्सा है

उस पर क्या हंसना क्या रोना

अब यह मत पूछना कि

मेरे मरने पर मेरी अर्थी पर

कितनी मोमबतियां जलाओगे।’
कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
http://anant-shabd.blogspot.com

-----------------------------
‘दीपक भारतदीप की हिन्दी-पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका

समस्त ब्लॉग/पत्रिका का संकलन यहाँ पढ़ें-

पाठकों ने सतत अपनी टिप्पणियों में यह बात लिखी है कि आपके अनेक पत्रिका/ब्लॉग हैं, इसलिए आपका नया पाठ ढूँढने में कठिनाई होती है. उनकी परेशानी को दृष्टिगत रखते हुए इस लेखक द्वारा अपने समस्त ब्लॉग/पत्रिकाओं का एक निजी संग्रहक बनाया गया है हिंद केसरी पत्रिका. अत: नियमित पाठक चाहें तो इस ब्लॉग संग्रहक का पता नोट कर लें. यहाँ नए पाठ वाला ब्लॉग सबसे ऊपर दिखाई देगा. इसके अलावा समस्त ब्लॉग/पत्रिका यहाँ एक साथ दिखाई देंगी.
दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका


हिंदी मित्र पत्रिका

यह ब्लाग/पत्रिका हिंदी मित्र पत्रिका अनेक ब्लाग का संकलक/संग्रहक है। जिन पाठकों को एक साथ अनेक विषयों पर पढ़ने की इच्छा है, वह यहां क्लिक करें। इसके अलावा जिन मित्रों को अपने ब्लाग यहां दिखाने हैं वह अपने ब्लाग यहां जोड़ सकते हैं। लेखक संपादक दीपक भारतदीप, ग्वालियर

संबद्ध विशिष्ट पत्रिकायें

लोकप्रिय पत्रिकाएँ

वर्डप्रेस की संबद्ध अन्य पत्रिकायें