कला लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
कला लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

23 अक्टूबर 2010

ज़माने को हंसता पाया-हिन्दी शायरी (zamane ka hansna-hindi sher)

अपनी बहादुरी पर
कुछ इतना इतराये कि
ज़माने का बोझ अपने कंधे पर उठाया,
जो दबकर गिरे ज़मीन पर
घायल होकर
अपने दर्द पर रोये
ज़माने को ऊपर खड़े हंसता पाया।
----------
उस्तादों के शेर चुराकर
वह लोगों को सुनाते हुए
शायर कहलाने लगे,
पकड़े गये तो शागिर्द होने का हक़ जताने लगे।
------------

कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
http://anant-shabd.blogspot.com

-----------------------------
‘दीपक भारतदीप की हिन्दी-पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
usdtad aur shagird
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका

हिन्दी कविता,hindi literature poem,hindi sahitya,ghayal,zameen,zamin,hindi kavita,

22 फ़रवरी 2010

इल्जाम से डरते हैं-हिन्दी व्यंग्य कवितायें (ilzam-hindi satire poem)

विश्वास तो करते हैं
पर साथ में धोखे की
गुंजायश भी रखते हैं।
वफा का आसरा करते हमेशा
पर घाव की मरहम भी साथ रखते हैं।
टूटे और बिखरे हैं कई बार
फिर भी कभी इरादा नहीं बदला
कोई हम पर धोखे और बेवफाई का इल्जाम लगाए
इस बात से डरते हैं।
---------
अपने गुस्से और घमंड से
लोगों को जिंदगी में हारते देखा है,
लूट के सामान से सजाया जिन्होंने घर अपना
बंद अंधेरी कोठरी में उनको रोते देखा है।
मेहनतकशों और ईमानदारों का
पसीना गिरते देखा जमीन पर
मगर आंसु बहाते किसी को नहीं देखा है।

कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
http://anant-shabd.blogspot.com

-----------------------------
‘दीपक भारतदीप की हिन्दी-पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका

29 जनवरी 2010

चुटकुले और हास्य कविताऐं भी साहित्य होती हैं-आलेख (chutkule aur sahitya-hindi lekh)

पता नहीं कुछ लोग चुटकुलों को साहित्य क्यों नहीं मानते, जबकि सच यह है कि उनके सृजन में वैसे ही महारथ की आवश्यकता होती है जैसी कि कहानी या व्यंग लिखने में। चुटकुलों में ही एक अधिक पात्र सृजित कर उनसे ऐसी बातें कहलायी जाती हैं जिनसे स्वाभाविक रूप से हंसी आती है और पाठक इस बात की परवाह नहीं करता कि वह साहित्य है या नहीं।
चुटकुलों की तरह हास्य कविताओं को भी अनेक लोग साहित्य नहीं मानते जबकि उनकी लोकप्रियता बहुत है। ऐसे में सवाल यह है कि साहित्य कहा किसे जाता है?
क्या उन बड़ी बड़ी किताबों को ही साहित्य माना जाये जिनको एक सीमित वर्ग का पाठक वर्ग पढ़ता है और बहुतसंख्यक वर्ग उनका नाम तक नहीं जानता। अनेक पुस्तकें तो ऐसी होती हैं कि किसी मध्यम रुचि वाले पाठक को सौंप दी जाये तो वह उसे हाथ में लेकर एक तरफ रख देता है। क्या साहित्य उन पुस्तकों को माना जाये जिनमें अनेक पात्रों वाली उलझी हुई निष्कर्ष से पर कहानी हो या जिनको पाठक पढ़ते हुए यही याद नहीं रख पाता कि कौन से पात्र की भूमिका क्या थी? क्या साहित्य उन निबंधों को माना जाये जिसका आम आदमी की बजाय केवल समाज के एक खास वर्ग के आचार विचार से संबंधित सामग्री होती है?
पता नहीं साहित्य की क्या परिभाषा हो सकती है, पर हमारी नज़र में जो रचना अधिक से अधिक पाठक वर्ग को प्रभावित करे वह साहित्य है। दरअसल हमारे देश के सम्मानों को लेकर विरोधाभासी परंपरा रही है। भारत का व्यवसायिक सिनेमा ही देश की जनता की पंसद है पर जब पुरस्कार की बात आती है तो कथित कलात्मक फिल्मों को ही पुरस्कृत किया जाता है जो कि देश की गरीबी बेरोजगारी या अन्य समस्याओं को सीधे सीधे प्रस्तुत कर दर्शक के सामने प्रश्न चिन्ह प्रस्तुत करती हैं। उनसे न तो समस्यायें हल होती हैं न आदमी का मनोरंजन होता है। सवाल यह है कि एक आम आदमी के सामने प्रश्न आयें तो भी वह क्या करे? देश की सामाजिक, राजनीतिक तथा आर्थिक समस्याओं की उसकी कोई निर्णायक भूमिका नहीं होती। अब भले ही पुरस्कार देने वाले आत्ममुग्धता की स्थिति में हों पर सच यही है कि व्यवसायिक सिनेमा ही इस देश के लोगों की दिल की धड़कन है।
यही स्थिति साहित्य से संबंधित पुरस्कारों की है। जब किसी लेखक की किताब छपी हो उसे ही पुरस्कार दिया जाता है जबकि सच तो यह है कि इस देश के हजारों ऐसे लेखक हैं जो अपनी रचनाओं से साहित्यक प्रवाह की निरंतरता बनाये हुए हैं-उनकी रचनायें अखबारों में छपती हैं या फिर वह मंच पर सुनाते हैं। इनमें अनेक चुटकुले और हास्य कविता लिखने वाले लेखक भी हैं। दरअसल हुआ यह है कि सम्मान आदि प्रदान करने वाली संस्थाओं पर कुछ रूढ़िवादी लेखक काबिज हो जाते हैं-यकीनन यह पद उनको चाटुकारिता लेखन के कारण ही मिलता है-जो चुटकुले या हास्य कवितायें नहीं लिख सकते वही उनकी गौण भूमिका मानते हैं जबकि इस देश का एक बहुत बड़ा वर्ग चुटकुले और हास्य कविताओं ही सुनता और पढ़ता है। इस देश में ऐसे अनेक कवि हैं जो अपनी हास्य रचनाओं के कारण ही लोगों के हृदय में छाये हुए हैं। यकीनन वह भी साहित्यकार ही हैं। प्रश्न चिन्ह खड़े करने वाली या समस्याओं को रूबरू कर पाठक के मन को चिंताओं के वन में छोड़ने वाली रचनायें ही साहित्य नहीं होती बल्कि जो लोगों के मन को मनोरंजन के साथ शिक्षा भी दें भले ही हास्य कविता या चुटकुले ही क्यों न हों साहित्य ही कही जा सकती हैं। वैसे हमारे यहां अब कुछ लोगों द्वारा क्षणिकाओं को भी साहित्य माना जाता है तब चुटकुलों और हास्य कविताओं की उपेक्षा करना ठीक नहीं लगता। अब लंबी रचनायें लिखने का समय नहीं रहा। थोड़े में अपनी बात कहने की आवश्यकता सभी जगह महसूस की जा रही है तब चुटकुलों और हास्य कविताओं का महत्व कम नहीं माना जा सकता।
कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
http://anant-shabd.blogspot.com

-----------------------------
‘दीपक भारतदीप की हिन्दी-पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका

26 जनवरी 2010

निकल जायेगा तेल-हिन्दी हास्य कविता (nikal jayega tel-hindi hasya kavita)

फंदेबाज आया दनदनाता और बोला

‘दीपक बापू सुना है साहित्य के इनाम बांटने वाली

किसी संस्था का एक कंपनी से हो गया है तालमेल,

कर रहे हैं लेखक उसका विरोध.

तुम भी दिखलाओ क्रोध,

मौका अच्छा है लेखकों में नाम कमाने का,

नहीं है मौका यह गंवाने का,

जम जाये शायद तुम्हारे लिये किसी पुरस्कार का खेल।’



सुनकर पहले तो चैंके

फिर इंटरनेट पर कीबोर्ड पर हाथ नचाते

कहैं दीपक बापू

‘कमबख्त, हमारा लिखा कभी पढ़ना नहीं,

बस, जहां देखो  इनाम की बात

उम्मीद हमारे अंदर आकर जगाना वहीं,

तुम्हें नहीं मालूम

दिग्गज साहित्यकारों के नज़र में

हास्य कविताएं कभी साहित्य नहीं होती,

कवि वही है जो खुद एक भी आंसु न बहाये

पर लिखे ऐसा कि पढ़कर जनता रोती,

हमसे बेहतर लिखने वाले बहुत सारे लेखक

जोरदार लिखते रहे,

उनके नाम पर एक भी पुरस्कार नहीं

पर अविस्मरणीय है उनके शब्द

जो उन्होंने कहे,

वैसे सच कहें कि इनाम बांटने वाली संस्था का

प्रायोजित कंपनी से हुआ है जो मेल,

हम जैसे अदना को मिलने की तो भूल जाओ

बड़ों बड़ों का बिगड़ जायेगा खेल।

न किसी ने पहले पूछा

न कोई आगे पूछेगा

जब क्रिकेट, फिल्म और पत्रकारिता में

चल रहा है कंपनियों का खेल

चलने दो साहित्य के साथ उनका मेल।

हम तो कवि हैं

कविता करते जायेंगे,

पुरस्कारों की भीड़ में शायद ही

कभी अपना नाम पायेंगे,

अलबत्ता कहो तो समर्थन करने लगें

शायद जम जाये अपने लिये भी पुरस्कार का खेल।

बड़े बड़े लोग कतार में लगे हैं,

जीत लिये हैं बहुत सारे पुरस्कार

अब दूसरे के पीछे भगे हैं,

न तो विरोध में

न क्रोध में अपना नाम चमकेगा,

नक्कारखाने में तूती की तरह बजेगा,

निकल जायेगा कीबोर्ड पर ऐसे ही तेल।


कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
http://anant-shabd.blogspot.com

-----------------------------
‘दीपक भारतदीप की हिन्दी-पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका

21 जनवरी 2010

दोस्ती दुश्मनी का दिखावा-आलेख (dosti dushmani ka dikhava-hindi lekh)

भारत की एक व्यवसायिक प्रतियोगिता में पाकिस्तान खिलाड़ियों की नीलामी न होने पर देश के अनेक बुद्धिजीवी चिंतित है। यह आश्चर्य की बात है।
पाकिस्तान और भारत एक शत्रु देश हैं-इस तथ्य को सभी जानते हैं। एक आम आदमी के रूप में तो हम यही मानेंगे। मगर यह क्या एक नारा है जिसे हम आम आदमियों का दिमाग चाहे जब दौड़ लगाने के लिये प्रेरित किया जाता है और हम दौड़ पड़ते हैं। अगर कोई सामान्य बुद्धिजीवी पाकिस्तान के आम आदमी की तकलीफों का जिक्र करे तो हम उसे गद्दार तक कह देते हैं पर उसके क्रिकेट खिलाड़ियों तथा टीवी फिल्म कलाकारों का स्वागत हो तब हमारी जुबान तालू से चिपक जाती है।
दरअसल हम यहां पाकिस्तान के राजनीतिक तथा धार्मिक रूप से भारत के साथ की जा रही बदतमीजियों का समर्थन नहीं कर रहे बल्कि बस यही आग्रह कर रहे हैं कि एक आदमी के रूप में अपनी सोच का दायरा नारों की सीमा से आगे बढ़ायें।
अगर हम व्यापक अर्थ में बात करें तो भारत और पाकिस्तान के आपसी रिश्तों का आशय क्या है? दो ऐसे अलग देश जिनके आम इंसान एक दूसरे के प्रति शत्रुता का भाव रखते हैं-इसलिये दोनों को आपस में मिलाने की बात कही जाती है पर मिलाया नहीं जाता क्योंकि एक दूसरे की गर्दन काट डालेंगे।
मगर खास आदमियों का सोच कभी ऐसा नहीं दिखता। भारत में अपने विचार और उद्देश्य संप्रेक्षण करने यानि प्रचारात्मक लक्ष्य पाने के लिये फिल्म, टीवी, अखबार और रेडियो एक बहुत महत्वपूर्ण साधन हैं। इन्हीं से मिले संदेशों के आधार पर हम मानते हैं कि पाकिस्तान हमारा शत्रु है। मगर इन्हीं प्रचार माध्यमों से जुड़े लोग पाकिस्तान से ‘अपनी मित्रता’ की बात करते हैं और समय पड़ने पर यह याद दिलाना नहीं भूलते कि वह शत्रु राष्ट्र है।
भारत के फिल्मी और टीवी कलाकार पाकिस्तान में जाकर अपनी कला का प्रदर्शन करते हैं तो अनेक खेलों के खिलाड़ी भी वहां खेलते हैं-यह अलग बात है कि अधिकतर चर्चा क्रिकेट की होती है। पाकिस्तानी कलाकारो/खिलाड़ियों से उनके समकक्ष भारतीयों की मित्रता की बात हम अक्सर उनके ही श्रीमुख से सुनते हैं। इसके अलावा अनेक बुद्धिजीवी, लेखक तथा अन्य विद्वान भी वहां जाते हैं। इनमे से कई बुद्धिजीवी तो देश के होने वाले हादसों के समय टीवी पर ‘पाकिस्तानी मामलों के विशेषज्ञ’ के रूप में चर्चा करने के लिये प्रस्तुत होते हैं। इनके तर्कों में विरोधाभास होता है। यह पाकिस्तान के बारे में अनेक बुरी बातें कर देश का दिल प्रसन्न करते हैं वह यह कभी नहीं कहते कि उससे संबंध तोड़ लिया जाये। सीधी भाषा में बात कहें तो जिन स्थानों से पाकिस्तान के विरोध के स्वर उठते हैं वह मद्धिम होते ही ‘पाकिस्तान शत्रु है’ के नारे लगाने वाले दोस्ती की बात करने लगते हैं। पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद की बारे में सभी जानते हैं। इतना ही नहीं मादक द्रव्य पदार्थो, फिल्मों, क्रिकेट से सट्टे से होने वाली कमाई का हिस्सा पाकिस्तान में बैठे एक भारतीय माफिया गिरोह सरदार के पास पहुंचता है जिसके बारे में कहा जाता है कि वह इन आतंकवादियों को धन मुहैया कराता है। अखबारों में छपी खबरें बताती हैं कि जब जब सीमा पर आतंक बढ़ता है तब दोनों के बीच अवैध व्यापार भी बढ़ता है। अंतराष्ट्रीय व्यापार अवैध हो या वैध उसका एक व्यापक आर्थिक आधार होता है और यह तय है कि कहीं न कमाई की लालच दोनों देशों में ऐसे कई लोगों को है जिनको भारत की पाकिस्तान के साथ संबंध बने रहने से लाभ होता है। अब यह संबंध बाहर कैसे दिखते हैं यह उनके लिये महत्वपूर्ण नहीं है। पाकिस्तान में भारतीय फिल्में दिखाई जा रही हैं। यह वहां के फिल्मद्योग के लिये घातक है पर संभव है भारतीय फिल्म उद्योग इसकी भरपाई वहां के लोगों को अपने यहां कम देखकर करना चाहता है। भारत में होने वाली एक व्यवसायिक क्रिकेट प्रतियोगिता में पाकिस्तान खिलाड़ियों का न चुने जाने के पीछे क्या उद्देश्य है यह अभी कहना कठिन है पर उसे किसी की देशभक्ति समझना भारी भूल होगी। दरअसल इस पैसे के खेल में कुछ ऐसा है जिसने पाकिस्तानी खिलाड़ियों को यहां नहीं खरीदा गया। एक आम आदमी के रूप में हमें कुछ नहीं दिख रहा पर यकीनन इसके पीछे निजी पूंजीतंत्र की कोई राजनीति होगी। एक बात याद रखने लायक है कि निजी पूंजीतंत्र के माफियाओं से भी थोड़े बहुत रिश्ते होते हैं-अखबारों में कई बार इस गठजोड़ की चर्चा भी होती है। भारत का निजी पूंजीतंत्र बहुत मजबूत है तो पाकिस्तान का माफिया तंत्र-जिसमें उसकी सेना भी शामिल है-भी अभी तक दमदार रहा है। एक बात यह भी याद रखने लायक है कि भारत के निजी पूंजीतंत्र की अब क्रिकेट में भी घुसपैठ है और भारत ही नहीं बल्कि विदेशी खिलाड़ी भी यहां के विज्ञापनों में काम करते हैं। संभव है कि पाकिस्तान के खिलाड़ियों की इन विज्ञापनों में उपस्थिति भारत में स्वीकार्य न हो इसलिये उनको नहीं बुलाया गया हो-क्योंकि अगर वह खेलने आते तो मैचों के प्रचार के लिये कोई विज्ञापन उनसे भी कराना पड़ता और 26/11 के बाद इस देश के आम जन की मनोदशा देखकर इसमें खतरा अनुभव किया गया हो।
ऐसा लगता है कि विश्व में बढ़ते निजी पूंजीतंत्र के कारण कहीं न कहीं समीकरण बदल रहे हैं। पाकिस्तान के रणनीतिकार अभी तक अपने माफिया तंत्र के ही सहारे चलते रहेे हैं और उनके पास अपना कोई निजी व्यापक पूंजीतंत्र नहीं है। यही कारण है कि उनको ऐसे क्षेत्रों में ऐसी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है जहां सफेद धन से काम चलता है। पाकिस्तानी रुपया भारतीय रुपये के मुकाबले बहुत कमजोर माना जाता है।
वैसे अक्सर हम आम भारतीय एक बात भूल जाते हैं कि पाकिस्तान की अपनी कोई ताकत नहीं है। भारतीय फिल्म, टीवी, रेडियो और अन्य प्रचार माध्यम पाकिस्तान की वजह से उसका गुणगान नहीं करते बल्कि मध्य एशिया में भारत के निजी पूंजीतंत्र की गहरी जड़े हैं और धर्म के नाम पर पाकिस्तान उनके लिये वह हथियार है जो भारत पर दबाव डालने के काम आता है। जब कहीं प्रचार युद्ध में पाकिस्तान भारत से पिटने लगता है तब वह वहीं गुहार लगाता है तब उसके मानसिक जख्मों पर घाव लगाया जाता है। मध्य एशिया में भारत के निजी पूंजीतंत्र की जड़ों के बारे में अधिक कहने की जरूरत नहीं है।
कहने का अभिप्राय यह है कि हम आम आदमी के रूप में यह मानते रहें कि पाकिस्तान का आम आदमी हमारा शत्रु है मगर खास लोगों के लिये समय के अनुसार रुख बदलता रहता है। एक प्रतिष्ठत अखबार में पाकिस्तान की एक लेखिका का लेख छपता रहता है। उससे वहां का हालचाल मालुम होता है। वहां आतंकवाद से आम आदमी परेशान है। भारत की तरह वहां भी महंगाई से आदमी त्रस्त है। हिन्दूओं के वहां हाल बहुत बुरे हैं पर क्या गैर हिन्दू वहां कम दुःखी होगा? ऐसा सोचते हुए एक देश के दो में बंटने के इतिहास की याद आ जाती है। अपने पूर्वजों के मुख से वहां के लोगों के बारे में बहुत कुछ सुना है। बंटवारे के बारे में हम लिख चुके हैं और एक ही सवाल पूछते रहे हैं कि ‘आखिर इस बंटवारे से लाभ किनको हुआ था।’ जब इस पर विचार करते हैं तो कई ऐसे चित्र सामने आते हैं जो दिल को तकलीफ देते हैं। एक बाद दूसरी भी है कि पूरे विश्व के बड़े खास लोग आर्थिक, सामाजिक, तथा धार्मिक उदारीकरण के लिये जूझ रहे हैं पर आम आदमी के लिये रास्ता नहीं खोलते। पैसा आये जाये, कलाकर इधर नाचें या उधर, और टीम यहां खेले या वहां फर्क क्या पड़ता है? यह भला कैसा उदारीकरण हुआ? हम तो यह कह रहे हैं कि यह सभी बड़े लोग वीसा खत्म क्यों नहीं करते। अगर ऐसा नहीं हो सकता तो उसके नियमों का ढीला करें। वह ऐसा नहीं करेंगे और बतायेंगे कि आतंकवादी इसका फायदा ले लेंगे। सच्चाई यह है कि आतंकवादियों के लिये कहीं पहुंचना कठिन नहीं है पर उनका नाम लेकर आम आदमी को कानूनी फंदे में तो बंद रखा जा सकता है। कुल मिलाकर भारत पाकिस्तान ही नहीं बल्कि कहीं भी किन्हीं देशों की दोस्ती दुश्मनी केवल आम आदमी को दिखाने के लिये रह गयी लगती है। उदारीकरण केवल खास लोगों के लिये हुआ है। अगर ऐसा नहीं होता तो भला आई.पी.एल. में पाकिस्तान के खिलाड़ियों की नीलामी पर इतनी चर्चा क्यों होती? एक बात यहां उल्लेख करना जरूरी है कि क्रिक्रेट की अंतर्राष्ट्रीय परिषद के अध्यक्ष के अनुसार इस खेल को बचाने के लिये भारत और पाकिस्तान के बीच मैच होना जरूरी है। इस पर फिर कभी।
कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
http://anant-shabd.blogspot.com

-----------------------------
‘दीपक भारतदीप की हिन्दी-पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका

14 जनवरी 2010

सचिव पुरान-हिन्दी हास्य कविता (sachiv parun-hindi hasya kavita)

छोटे नेता ने बड़े नेता से कहा

‘हमारी मेहनत से आप बने बड़े नेता

और अब हमें भुला दिया,

कोई काम लेकर

जब भी आपसे मिलने की कोशिश की

आप अपने हमें सचिव के पास टरका दिया।

वह अपनी मजबूरियां बताकर भगा देता है

कभी कभी तो लगता है कि

हम पुराने लोगों  से अलग कर

आपको उसने बंधक बना लिया।’



सुनकर बोले बड़े नेता

‘भईया, धीरे से बोल

अपना मुंह बिना सोचे मत खोल,

कहीं कोई सुन न ले

तुम्हें गलतफहमी हो गयी है

वह भी पुराना है पर तुम नहीं देख पाये

तुम मैदान में जाकर हमारे लिये

जब जाते लड़ने

उसने पर्दे के पीछे बहुत खेल किया।

वह हमारी पसंद नहीं

बल्कि हम उसकी पसंद हैं

इसलिये उसने अपना स्वामी बना दिया।

तुम नहीं जानते यह खेल

निकल जाता है इसमे तेल

इसलिये बड़ा बनने पर

अपनी उंगली सचिव के हाथ में देकर ही

चलना पड़ता है

जो नहीं चले उनकी राह

उनका बेड़ा भी ऐसे ही सचिवों ने गर्क किया।

हम तुम्हारे मुख हैं

पर सचिव ने अपना मुखौटा बना लिया।

हम जैसे तो बहुत आयेंगे,

पर सचिव के बिना नहीं चल पायेंगे,

हम उसे छोड़े देंगे

तो दूसरे लोग  खुद से जोड़ लेंगे,

सचिव भी ताकत की धार

उसकी तरफ मोड़ देंगे,

भईये, हमारा सचिव अच्छा इंसान है

हमें दुनियां कहती, पर असल में वही महान है

यही सचिव पुरान है,

हम नेताओं का ताज छिन जाता,

पर उनका कोई कुछ बिगाड़ नहीं पाता,

वैसे भी हम ठहरे भाषण देने वाले,

कहीं गद्य सुनाते, कहीं करते कविता

कभी चुटकुले भी सुनाते

किराये पर बुलाते तालियां बजाने वाले,

पद पर पहुंचने के लिये खूब पापड़ बेले

भले ही तुमने वहां पहुंचाया

पर उस बने रहने के लिये

सचिव की कृपा जरूरी है

वह तो ऊपर वाले की कृपा है कि

ऐसा सेवक मिला  

जिसने हमें अपना स्वामी बना लिया।


कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
http://anant-shabd.blogspot.com

-----------------------------
‘दीपक भारतदीप की हिन्दी-पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका

25 दिसंबर 2009

नकद और उधार-व्यंग्य क्षणिकाएं (nakad aur aur udhar-vyangya kavitaen)

 जेब में पैसा न हो तो भी

जश्न मना सकते हों उधार लेकर।

प्रचार महकमें के

दावों  में बह जाना आसान है

जो बाजार में खुशी खरीदने के लिये

सारे साधन जुटा लेता है

दुकान और कर्जेदार  का पता भी देता है

अगर भले हो तुम

पास नहीं आया नकद रुपया

तो भी चुकाओगे जान देकर।

--------------

उधार की रौशनी

कितनी देर चलेगी।

बाद में जिंदगी

ब्याज और किश्त की

अंधेरी गलियों में ही ढलेगी।

------

कभी बाजार में जेब में पैसा न हो तो भी

जश्न मना सकते हों उधार लेकर।

प्रचार महकमें के

दावों  में बह जाना आसान है

जो बाजार में खुशी खरीदने के लिये

सारे साधन जुटा लेता है

दुकान और कर्जेदार  का पता भी देता है

अगर भले हो तुम

पास नहीं आया नकद रुपया

तो भी चुकाओगे जान देकर।

--------------

उधार की रौशनी

कितनी देर चलेगी।

बाद में जिंदगी

ब्याज और किश्त की

अंधेरी गलियों में ही ढलेगी।

------

कभी बाजार में

आज नकद कल उधार की

तख्ती मिलती थी

अब किश्तों पर हर माल उपलब्ध

लिखा मिलता है।

कभी कभी तो लगता है कि

नकद माल बेचने से

सौदागर खुश नहीं होता

किश्तों पर ब्याज मिलने के ख्वाब से ही

उसका चेहरा खिलता है।



आज नकद कल उधार की

तख्ती मिलती थी

अब किश्तों पर हर माल उपलब्ध

लिखा मिलता है।

कभी कभी तो लगता है कि

नकद माल बेचने से

सौदागर खुश नहीं होता

किश्तों पर ब्याज मिलने के ख्वाब से ही

उसका चेहरा खिलता है।
कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
http://anant-shabd.blogspot.com

-----------------------------
‘दीपक भारतदीप की हिन्दी-पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका

19 दिसंबर 2009

स्यापा पसंद-हिन्दी व्यंग्य कवितायें (syapa pasand-hindi vyangya kavita)

 कुछ लोगों की मौत पर

बरसों तक रोने के गीत गाते,

कहीं पत्थर तोड़ा गया

उसके गम में बरसी तक मनाते,

कभी दुनियां की गरीबी पर तरस खाकर

अमीर के खिलाफ नारे लगाकर

स्यापा पसंद लोग अपनी

हाजिरी जमाने के सामने लगाते हैं।

फिर भी तरक्की पसंद कहलाते हैं।

---------

लफ्जों को खूबसूरत ढंग से चुनते हैं

अल्फाजों को बेहद करीने से बुनते हैं।

दिल में दर्द हो या न हो

पर कहीं हुए दंगे,

और गरीब अमीर के पंगे,

पर बहाते ढेर सारे आंसु,

कहीं ढहे पत्थर की याद में

इस तरह दर्द भरे गीत गाते धांसु,

जिसे देखकर

जमाने भर के लोग

स्यापे में अपना सिर धुनते हैं।

कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
http://anant-shabd.blogspot.com

-----------------------------
‘दीपक भारतदीप की हिन्दी-पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका

10 दिसंबर 2009

भ्रष्टाचार के विरुद्ध सम्मेलन क्यों नहीं करते-आलेख (Why not Conference against Corruption - hindi Article)

कोपेनहेगन में जलवायु परिवर्तन रोकने के लिये कार्बन उत्सर्जन को लेकर एक
महासम्मेलन हो रहा है। पश्चिम के विकसित देश दुनियां की फिक्र बहुत करते
हैं। उनके न केवल फिक्र करना चाहिये बल्कि करते हुए दिखना भी चाहिये।
आखिर दुनियां के यह छह सात मुल्क ही पूरी सारे विश्व समुदाय रहनुमा बन
गये हैं। गरीब, विकासशील और एशियाई देशों के शिखर पुरुष हों या आम आदमी
उनकी तरफ आकर्षित होकर देखता रहता है। उनकी तूती बोलती है। चो जैसा
सम्मेलन बुलाओ। जब बुलाओ सभी देशों के प्रतिनिधि पहुंच जाते हैं। बहुत कम
लोगों को पताहोगा कि यह पश्चिमी देश भले ही औपचारिक रूप से अलग अलग हों
पर उनका ऐजेंडा एक ही है कि गरीब, विकासशील देशों के आर्थिक और प्राकृतिक
साधनों का दोहन इस तरह किया जाये कि उनकी खुद की अमीरी और ताकत बनी रहे।
इन देशों के नागरिकों को एक दूसरे के यहां आने जाने के लिये बहुत सारी छूट
है जबकि गरीब, विकासशील और एशियाई देशों के लिये ढेर सारे प्रतिबंध है।
कई बार तो ऐसा लगता है कि ब्रिटेन और अमेरिका इन देशों के नेता है तो कभी
यह भी लगता है कि बाकी पश्चिमी राष्ट्र उनकी आड़ में अपनी ताकत दिखाते
हैं। कम से कम डेनमार्क के प्रस्ताव से-जिसमें विकसित राष्ट्रों को
कार्बन गैस उत्सर्जन के लिये तमाम छूटें देने और गरीब और विकासशील देशों
पर इस आड़ में अपना फंदा कसने वाली शर्ते शामिल हैं-यही लगता है। एक दम
व्यंग्य जैसा! इस प्रस्ताव को न केवल भारत ने बल्कि उसके साथ जुड़े जी 77
देशों के प्रतिनिधियों ने खारिज भी किया बल्कि यह भी बता दिया कि अगर यह
प्रस्ताव दोबारा उसने रखा तो वह इस बात को भूल जाये कि कोपेनहेगन का यह
सम्मेलन आगे भी जारी रहेगा।
चीन की प्रतिक्रिया थोड़ी आक्रामक हैं पर उसमें भी मजाक लगता है। उसने कहा
कि ‘वह आखिरी दम तक विकासशील देशों की हितों के लिये लड़ेगा।’
चीन की सदाशयता पर हम कोई आपत्ति नहीं कर रहे पर यह कमजोर व्यक्ति या देश
की प्रतिक्रिया लगती है जिसे मालुम है कि सामने वाला आखिर उसकी दम निकाल
सकता है। दूसरा यह भी कि अगर उसके पास को अंतिम समय रोकेगा पर अगर पास हो
गया तो वह सिर झुकाकर मान लेगा। इसकी जगह यह भी कहा जा सकता कि अगर
डेनमार्क इस प्रस्ताव को दोबारा रखेगा तो उसे काली सूची में डाल दिया
जायेगा, पर यह करने की ताकत किसी एशियाई देश में नहीं लगती भले ही वह इस
महाद्वीप का रहनुमा होने का दावा करता हों। यह एशियाई देशों की कमजोरी
है कि वह इन पश्चिमी देशों द्वारा आयोजित सम्मेलनों में उनके प्रस्तावों
पर ही विचार करते हुए समर्थन या विरोध करते हैं। अपनी तरफ से कोई नयी सोच
या समस्या वह सामने नहीं रखते। इतना ही नहीं संयुक्त राष्ट्रसंध जैसी
संस्था जो कि केवल पश्चिमी देशों के वर्चस्व का बढ़ावा देती है उसकी
संस्थाओं में शामिल होकर अपने को गौरवान्वित समझते हैं। संयुक्त राष्ट्र
की सुरक्षा परिषद पिछले कई सालों से कोई उल्लेखनीय रूप से कार्य नहीं कर
पायी। अमेरिका चाहे जैसा प्रस्ताव पास करा लेता है और अगर विवादास्पद विषय
हो तो वह बिना प्र्रस्ताव के ही अपना काम करता है। इराक और अफगानिस्तान
युद्ध में सुरक्षा परिषद कोई भूमिका नहीं निभा पाया। इसके पांच स्थाई
सदस्य-अमेरिका, ब्रिटेन, सोवियत संघ, फ्रांस और चीन हैं। जर्मनी, इजरायज
और जापान जैसे देश इसके स्थाई सदस्य नहीं है और न इसकी परवाह करते हैं।
पता नहीं अपने भारत देश के लो्ग इसका स्थाई सदस्य बनने के लिये क्यों
बेताब हैं। सुनने में यह भी आया कि अगर नये स्थाई सदस्य बने होंगे तो
उनके पास वीटो पावर नहीं होगा। अगर यह वीटो पावर नहीं है तो समझ लो कि
स्थाई सदस्य होना या न होना बराबर है। ऐसे में सुरक्षा परिषद की स्थाई
सदस्यता भीख की तरह लेना ही बेमानी है।
बहरहाल पश्चिम के देशों की अर्थव्यस्था का वजूद अपने आंतरिक आधारों पर कम
बाह्य आधारों पर अघिक टिका है इसलिये वह अन्य देशों को ऐसे कामों में
व्यस्त रखते हैं। कभी पर्यावरण पर सम्मेलन करेंगेतो कभी आतंकवाद पर!
जबकि इन समस्याओं के लिये वही अधिक जिम्मेदार हैं। आप पता कर लें एशिया
के उग्रपंथियों के ठिकाने किन देशों में हैं तो पश्चिमी देशों के नाम ही
सामने आयेंगे जो मानवाधिकार के पैरोकार होने का दावा करते हैं। कभी जलवायु
परिवर्तन का मामला उठायेंगे तो कभी व्यापार का ताकि दूसरे देशों पर रुतवा
जमा सकें।
विश्व भर में आतंकवाद, पर्यावरण प्रदू्रषण तथा अन्य अनेक संकट हैं। इन पर
विचार करना चाहिये पर यह भी देखना चाहिये कि पह किस वजह से हैं। बीमारी का
इलाज करने की बात समझ में आती है पर वह किस वजह से है यह जानना भी जरूरी
है। उस वजह से परे होने का उपाय करना भी जरूरी है। आतंकवाद और पर्यावरण
के साथ एक विश्वव्यापी समस्या है वह है भ्रष्टाचार। अनेक विद्वान कहते
हैं कि विकासशील देशों में भ्रष्टाचार चरम पर है। ऐसा नहीं है कि विकसित
राष्ट्र इससे अछूते हैं पर फिर भी वह इसका विचार नहीं करते न कोई सम्मेलन
करते हैं। विकासशील देशों का बहुत सारा पैसा इन देशों की बैंकों में
गुप्त रूप से पहुंचता है-गाहे बगाहे इसकी चर्चा समय समय पर होती है। कुछ
कहने वाले तो यह भी कहते हैं कि इसी पैसे से पश्चिम के विकसित राष्ट्र
अपना काम चला रहे हैं। वैसे अमेरिका में सरकारी रूप से चंदा लेना और देना
वैध माना जाता है कुछ विशेषज्ञ कहते हैं कि अंततः चंदा देने वालों को कोई
न कोई लाभ मिलता है। अधिक नहीं तो इतना तो मिल ही जाता है कि बाह्य
व्यापार करने वाले पूंजीपति अपनी सरकार के सहारे संबंधित देशोें का प्रभाव
डालते है-कहीं कहीं भ्रष्टाचार को बढ़ावा भी देते हैं।
एक समय ब्रिटेन के बारे में कहा जाता था कि उसके राज्य में कभी सूर्य अस्त
नहीं होता है। इसका कारण यह था कि एशियाई देशों के एक बहुत बड़े भूभाग पर
उसका राज्य चलता था। धीरे धीरे वह छोटा होता गया। अलबत्ता अंग्रेजों ने
अपनी शिक्षा पद्धति कायम की। अंग्रेजों ने यह कल्पना भी नहीं की होगी कि
वह जो शिक्षा पद्धति इन देशों में स्थापित कर रहे हैं वह सदियों से उनके
लिये इस तरह गुलाम उपलब्ध करायेगी कि सब कुछ होते हुए भी यह देश कमजोर की
तरह ललकारेंगे ‘आखिरी दम तक लड़ेंगे।’
चीन एक ताकतवर मुल्क हैं वह धमका भी सकता था । वह यह भी डेनमार्क से पूछ
सकता था कि ‘यह प्रस्ताव तुमने रखा यह तो बाद की बात पहले यह बताओं कि इस
पर सोचा भी कैसे?’
कहने का तात्पर्य यह था कि भाषा कड़क भी हो सकती है। सुनने मे यह भी आया है
कि इस प्रस्ताव के पीछे ब्रिटेन की सोच काम कर रही थी। संभवतः ब्रिटेन को
यह लगा होगा कि आर्थिक, सामाजिक तथा राजनीतिक रूप से वह आज भाी इतना
ताकतवर है कि अन्य देश स्वतंत्र जरूर हैं पर उनका विवेक तथा पैसा तो उसका
गुलाम है इसलिये चाहे जैसा प्रस्ताव पास करा लेगा।
आतंकवाद, पर्यावरण प्रदूषण, मादक द्रव्य पदार्थों का व्यापार तथा अन्य
अनेक ऐसी समस्यायें हैं जिनकी जड़ में भ्रष्टाचार है। यह भ्रष्टाचार जब तब
नहीं मिटेगा तब कोई समस्या हल नहीं होगी मगर इसके विरुद्ध कोई सम्मेलन
नहीं करेगा। ब्रिटेन तो कभी नहीं क्योंकि उसके द्वारा स्थापित व्यवस्था
से ही भ्रष्टाचार पनपा है और जिसके पास भी देश तथा समाज के प्रबंध का छोटा
भी अंश है वह अपने को राजा समझता है और बाकी को गुलाम। उनके लिये बैंकों
में जमा अपनी राशि इष्ट देवी है जिससे बढ़ते देख वह प्रसन होते हैं। फिर
जिस तरह अंग्रेजों ने इन एशियाई देशों से पैसा कमाकर अपने देश भेजा आज
उनके गुलाम यही काम रहे हैं। देखा जाये जो ब्रिटेन और अमेरिका ने आज तक
भी किसी परमाणु संपन्न राष्ट्र के खिलाफ युद्ध नहीं जीता पर फिर उसके चीन
जैसा प्रतिद्धंदी उसके सामने नम्र भाषा में बात करता है तब संदेह होता
है। यही कारण है कि इन विकसित राष्ट्रों ने भारत के प्रस्ताव को भी उसी
तरह खारिज किया जबकि वह विचारणीय था और उसमें व्यंग्य जैसा कुछ भी नहीं
था। बहरहाल विकासशील देशों के भ्रष्टाचार से अमीर हुए मुल्कों से यह आशा
करना ही बेकार है कि वह भ्रष्टाचार पर कभी कोई महासम्मेलन करेंगे।
कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
http://anant-shabd.blogspot.com

-----------------------------
‘दीपक भारतदीप की हिन्दी-पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका

5 दिसंबर 2009

चिंताओं की गठरी-हिन्दी शायरी (chintaon ki gathri-hindi shayri)

 जो तुम भी चाहोगे

इंसानी बुत बनकर

बड़े कहलाओगे।

सीख लो नटों के इशारों की डोर पर नाचना

जमाने में मशहूर हो जाओगे।

आम इंसान की अगर

नसीब हुई है जिंदगी

करो उसी की बंदगी

आजादी में सांसें ले रहे हो

इसी पर करो फख्र

खुश रहो इस बात पर

कि नहीं है गिरने की फिक्र

बड़े बनकर

गंवा बैठोगे अपना अमन

कितनी भी ऊंचाई पर जाओ

चिंताओं की गठरी सिर पर उठाओगे।

पर्दे के पीछे बैठे काले चेहरों से

कभी मुंह नहीं फेर पाओगे
 
कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
http://anant-shabd.blogspot.com

-----------------------------
‘दीपक भारतदीप की हिन्दी-पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका

25 नवंबर 2009

अब मत पूछना-हिंदी हास्य कविता (ab mat poochna-hindi haysa kavita)

 माशुका ने पूछा आशिक से

‘अगर शादी के बाद मैं

मर गयी तो क्या

मेरी याद में ताजमहल बनवाओगे।’

आशिक ने कहा

‘किस जमाने की माशुका हो

भूल जाओ चैदहवीं सदी

जब किसी की याद में

कोई बड़ी इमारत बनवाई जाती थी,

फिर समय बदला तो

किसी की याद में कहीं पवित्र जगह पर

बैठने के लिये बैंच लगती तो

कहीं सीढ़ियां बनवायी जाती थी,

अब तो किस के पास समय है कि

धन और समय बरबाद करे

अब तो मरने वाले की याद में

बस, मोमबत्तियां जलाई जाती हैं

दिल में हो न हो

बाहर संवेदनाएं दिखाई जाती हैं

हमारा दर्शन कहता है कि

जीवन और मौत तो

जिंदगी का हिस्सा है

उस पर क्या हंसना क्या रोना

अब यह मत पूछना कि

मेरे मरने पर मेरी अर्थी पर

कितनी मोमबतियां जलाओगे।’
कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
http://anant-shabd.blogspot.com

-----------------------------
‘दीपक भारतदीप की हिन्दी-पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका

16 नवंबर 2009

पहले देवत्व का प्रमाण दो-हिन्दी भाषा पर लेख (hindi article hindi controversy or dispute)

हिंदी भाषा की चर्चा अक्सर विवादों के कारण अधिक होती है। विवाद यही कि हिंदी थोपी जा रही है या हिंदी वाले दूसरी भाषाओं को कमतर मानते हैं। ऐसे बहुत सारे विवाद हैं जो बरसों से थम नहीं रहे। होता यह है कि कोई शख्स उस विवाद को ढोते हुए बूढ़ा हो जाता है तो लगता है कि विवाद थम गया पर फिर कोई उसका वारिस उठ खड़ा होता है तो लगता है कि विवाद फिर नये रूप में आ गया है। ऐसे केवल भाषा के साथ ही नहीं बल्कि हर प्रकार के विवाद से है जो शायद खड़े ही इसलिये किये जाते हैं कि उनका कभी निराकरण ही न हो। हिंदी के विवाद का भी कोई निपटारा आगे बीस साल तक नहीं होना है। इसलिये हिंदी का चाल, चरित्र और चेहरा फिर से देखना जरूरी है जिसे बहुत कम लोग समझ पाते हैं।
हिंदी संस्कृत के बाद विश्व की दूसरी आध्यात्मिक भाषा है। इसका मतलब सीधा यही है कि जैसे जैसे लोगों की अध्यात्मिक ज्ञानपिपासा बढ़ेगी हिंदी का प्रभाव स्वतः बढ़ेगा। फिर संकट कहां हैं?
जो लोग अंतर्जाल पर सक्रिय नहीं है उनका क्या कहें जो सक्रिय है वह भी नहीं समझ पा रहे कि हिंदी अब सांगठनिक ढांचों के दायरे’-टीवी, किताब, फिल्म तथा समाचार पत्र पत्रिकाओं-से बाहर निकल कर अनियंित्रत गति से अंतर्जाल पर बढ़ रही है। गूगल के प्रयासों को तो आप जानते हैं। इधर हिंदी में ही वेबसाईटों के पते होने की बात भी चल रही है। ऐसे में सांगठिनक ढांचों में सक्रिय खास वर्ग में चिंता फैली हुई है और हिंदी पर उठ रहे विवाद उसका एक प्रमाण हैं। घबड़ाहट हो रही है कि हिन्दी कहीं अंतर्जाल पर अंग्रेजी के समकक्ष न स्थापित हो जाये। अगर स्थापित हो तो फिर उस नियंत्रण अपना नियंत्रण रहे इसके लिये प्रयत्नशील हिंदी के विवादों पर अधिक बोल और लिख रहे हैं।
बात अधिक न करते हुए यह समझाना जरूरी है कि हिंदी के ठेकेदारी भले ही दिखावे के लिये कई लोग करते हैं पर हिंदी ऐसी अध्यात्मिक भाषा है जो साफ सुथरे चरित्र के साथ ही कथनी और करनी के भेद से परे रहने की शर्त रखती है। आप चाहे हिंदी में कितने भी उपन्यास, कहानियां, व्यंग्य या अन्य रचनायें लिखे आम हिंदी भाषी का यह स्वभाव है कि वह आपके चरित्र को देखता है। आप हिंदी के विकास का नारा लगायें खूब प्रचार मिलेगा पर हिंदी भाषियों का यह स्वभाव है कि जब तक आपकी रचनाओं के आध्यात्मिक ज्ञान और चरित्र में देवत्व का बोध नहीं होगा वह आपको हृदय से सम्मान नहीं देगा। हिंदी में यह भाव संस्कृत से ही आया है। सच बात तो यह है कि संस्कृत कभी की लुप्त हो गयी होती अगर उसमें अध्यात्मिक रचनाओं का खजाना नहीं होता।
कई लोगों को यह अजीब लगे पर जरा वह स्वयं अपने अंदर झांकें। भक्ति काल के कबीर, तुलसी, सूर, मीरा तथा अन्य कवियों को नाम जन जन में छाया हुआ मिलेगा भले ही उनकी रचनायें हिंदी में अनुवाद कर पढ़ी और सुनाई जाती हैं। इसके बाद भी इतने सारे कवि लेखक और चिंतक हुए पर उनको वही लोग जानते हैं जो अधिक शिक्षित हैं। भक्ति काल के कवियों का नाम गांव गांव में जाना जाता है मगर यह बात आप उसके बाद के कवियों और लेखकों के बारे में नहीं कह सकते। इससे यह स्पष्ट होता है कि हिंदी भाषी लोग ऐसी रचनायें देखना चाहते हैं जिनसे कुछ जीवन में सीखने का अवसर मिले। साथ ही कवि या लेखक का चरित्र भी उनके लिये प्रेरक होना चाहिये। संस्कृत में वाल्मीकि, वेदव्यास तथा महर्षि शुक का नाम लेखक के रूप में नहीं बल्कि देवता की तरह लिया जाता है। अगर आप अपने जीवन में केवल लिखने के लिये ही लिखते हैं और यह बात प्रमाणित नहीं होती कि आपका चरित्र वैसा ही है तो हिंदी में आपको अधिक सम्मान नहीं मिलेगा भले ही आप कितनी भी संस्थाओं से पुरुस्कार जीत लें। समाज के आपसी समझौतों और द्वंद्वों के बीच में सामग्री ढूंढकर उस पर गद्य या पद्य लिखने से केवल आप सम्मानीय नहीं हो जायेंगे बल्कि उसमेें ऐसे निष्कर्ष भी रखने पड़ेंगे जिनमें अध्यात्मिकता का बोध होता हो।
यहां अध्यात्म से आशय भी स्पष्ट कर दें। श्रीमद्भागवत गीता में अध्यात्म हमारी देह के अंदर मौजूद वह तत्व है जो परमात्मा का अंश है। इसी को जानने समझने की प्रक्रिया का नाम अध्यात्मिकता है। इस प्रक्रिया से निकले संदेश को ही अध्यात्मिक ज्ञान कहा जाता है। देह से संबंधित सारे ज्ञान सांसरिक होते हैं जिनको आप विज्ञान भी कह सकते हैं। आप अपनी रचनाओं में सांसरिक बातों पर लिखकर खूब नाम और नामा कमा सकते हैं पर सामान्य हिंदी भाषी-यह नियम क्षेत्रीय भाषाओं पर भी लागू है-आपको देव लेखक नहीं मानेगा। इतना ही नहीं अगर आप हिंदी का विरोध भी करते हैं तो बहुत कम लोग उस पर विचलित होंगे। वजह हिंदी के स्वाभाविक अध्यात्मिक भाव से ओतप्रोत लोग यह जानते हैं कि जिसके पास अध्यात्मिक ज्ञान नहीं है वही ऐसा करता है।
इसलिये हिंदी के समर्थक और विरोधियों को सामान्य हिन्दी भाषी से यह अपेक्षा बिल्कुल नहीं करना चाहिए कि वह उनके द्वंद्वों को देखकर उनको अनुग्रहीत करने वाला है। केवल हिन्दी भाषा ही नहीं बल्कि किसी भी भारतीय भाषा का भी यही स्वभाव है और हिन्दी का विरोध किसी भी भाषा का आम आदमी नहीं करेगा। आखिर इसमें भी उन्हीं पवित्र नामों का समावेश है-यथा राम, कृष्ण, बुद्ध, महावीर, गुरु नानक देव, शिवाजी, समर्थ रामदास, कबीर, तुलसी, रहीम, सूरदास, तथा सुब्रह्मण्यम भारती-जो कि अन्य भाषाओं में है। लोगों की भाषा अलग है पर उनके मन में बसे नाम वैसे ही हिंदी में है तो भला आम आदमी इसका क्यों अपमान करना चाहेगा?
इसलिये हिंदी के समर्थक अगर यह सोचते हों कि हिंदी बचाने के नारे पर सब उनके साथ आकर खड़े हों तो उनको अपने चरित्र में देवत्व का प्रमाण देना होगा। उसी तरह हिंदी के विरोध करने वालों को भी यह प्रमाणित करना होगा कि वह प्राचीन काल के देवताओं और दैत्यों से अधिक शक्तिशाली हैं। यह हिन्दी अध्यात्म की भाषा है जो बिना शब्द बोले भी गेय होती है-अरे, आपने देवताओं के नाम सुने तो होंगे उनके फोटो देखकर कोई भी पहचान जाता है कि यह किसका नाम है भले ही उस पर नाम न लिखा हो। उसी तरह मंदिर में जाकर कोई गैर हिंदी भाषी आदमी हाथ जोड़कर भगवान को प्रणाम करता है तो उसके पास खड़ा गैर हिन्दी भाषी यह जानते हैं कि वह भगवान को सादर प्रणाम कर रहा है। इस क्रिया को शब्दों में व्यक्त नहीं किया जाता पर हाथ पांव उसकी अनुभूति करा देते हैं अगर आपको इस पर शक हो तो वृंदावन या हरिद्वार में जाकर ऐसे स्थानों-यथा बांके बिहारी मंदिर और हर की पौड़ी-पर जाकर देखें जहां अनेक लोग ऐसे आते हैं जिनको हिन्दी नहीं आती पर वह अपने लोगों के साथ वहां आकर अपने मन को प्रफुल्लित करते हैं। वहां हिन्दी अव्यक्त है पर उसका भाव सभी के मन में है।
अधिक क्या लिखें? सभी भारतीय भाषाऐं अध्यात्मिक ज्ञान से संपन्न हैं इसलिये उनके आपसी विरोध संभव नहीं है। हमें तो लगता है कि यह विवाद वह लोग योजनाबद्ध ढंग से जीवित रखना चाहते हैं जो हिन्दी या भारतीय भाषा बोलते हैं पर उसके अध्यात्मिक ज्ञान का उनमें अभाव है। यह हमारा मत है। हम कोई सिद्ध नहीं है। जो एक आम आदमी के रूप में आता है लिख देते हैं। कोई गल्ती हो उससे पीछे हटने में हमें संकोच नहीं होता क्योंकि अध्यात्मिक ज्ञान पढ़ते हुए हमने यही सीखा है।
-------------
कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
http://anant-shabd.blogspot.com

-----------------------------
‘दीपक भारतदीप की हिन्दी-पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका

13 नवंबर 2009

महापुरुषों का अनुसरण-हिंदी हास्य कविता (anusaran-hindi hasya kavita)

अपने विरोधी पर
शब्द प्रहार करते हुए उन्होंने कहा
‘वह बरसों जनता की सेवा में लगे हैं
लोग भी अब उनके चेहरे से थके हैं
नया चेहरा सामने नहीं आने देते
जहां मौका मिलता वहीं
अपने लिये हाथ फैला लेते हैं।
हमें देखो
अब तो सब छोड़ दिया है
नये चेहरों को जनता से जोड़ दिया है
बेटी को सौंप दिया है
पत्रकारिता का जिम्मा
बेटे को की जनसेवा की विरासत
अब हमारे घर में
कोई नहीं बचा युवा पीढ़ी में निकम्मा
हम तो करते हैं
महापुरुषों का अनुसरण
जो नयी पीढ़ी को आगे आने का मौका देते हैं।
---------------------------

कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
http://anant-shabd.blogspot.com

-----------------------------
‘दीपक भारतदीप की हिन्दी-पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका

5 नवंबर 2009

अभिव्यक्ति की ताकत-कविता और लघु आलेख ( abhivyakti ki taqat-kavita aur alekh)

अक्सर लोग आपस में अपने दर्द की चर्चा करते हुए जी हल्का कर लेते हैं। उनकी ढेर सारी शिकायत अपने और गैर लोगों से होती हैं। उनके सामने कहते हुए कहीं संकोच तेा कहीं डर होता है कि वह व्यक्ति नाराज न दुःखी न हो जाये जिसके प्रतिकूल बात कह रहे हैं। फिर हम देख रहे हैं कि सदियों से बड़े लोगों द्वारा छोटे लोगों पर अनाचार की ढेर सारी कहानियां हैं। जाति, धर्म, भाषा और क्षेत्र के नाम पर होने वाले संघर्षों में हमेशा आम आदमी निशाना बना है। इस संघर्ष से लगने वाली आग में आम इंसान के घर और झोंपड़ियां जली हैं। कभी महलों के जलने की चर्चा नहीं सुनने में नहीं आती। कभी कभी तो निराशा होती है पर कभी यह देखकर दिल प्रफुल्लित होता है कि आज भी समाज में दरियादिल लोग हैं जो धर्म के नाम पर होने वाले कार्यक्रमों में अपनी सकारात्मक भूमिका निभाते हैं। लोग धर्म के नाम पर छोटे कार्यक्रम कर अपने लिये खुशियां जुटाते हैं।
सच तो यह है कि गरीबों के कल्याण के नाम पर अनेक पेशेवर लोग अपने अभियान चलाते हैं। उनके दो उद्देश्य ही होते हैं एक तो उसके नाम पर अमीरों से चंदा वसूल करें और गरीब से पहले ही दाम वसूल कर लेते हैं या फिर उनको मुफ्त में अपने अभियान में पैदल दौड़ लगवाते हैं अलबत्ता उनके भले का काम धेले भर का नहीं होता।
हमारा देश धार्मिक प्रधान माना जाता है। धर्म के नाम पर सत्संग और सम्मेलन इतने होते हैं कि उसे देखकर लगता ही नहीं है कि यहां कोई राक्षस भी है। सभी जगह देवताओं के समूह दिखाई देते हैं। यह सत्संग या सम्मेलन केवल भारत में ही उत्पन्न विचाराधाराओं को मानने वाले लोगों द्वारा आयोजित नहीं किये जाते बल्कि बाहर उत्पन्न विचाराधाराओं के लोग भी करते हैं। सभी प्रकार के धर्म सम्मेलनों में गरीबों के खाने पीने के इंतजाम किये जाते हैं। अगर धार्मिक जुलूस हों तो जगह जगह पानी और प्रसाद की व्यवस्था का दौर सभी धर्म के लोग करते हैं। ऐसा नहंी लगता कि विदेशों में रहने वाले भारतीय या अन्य धर्मी ऐसे कार्यक्रंम करते हों। यही कारण है कि धर्म जितनी शिद्दत से यहां माना जाता है कहीं अन्य नहीं। धार्मिक संवदेनाओं के कारण यहां वाद विवाद भी अधिक होते हैं।
धर्म प्रधान होने के बावजूद भी इस समाज में ही भ्रष्टाचार, अनाचार, व्याभिचार तथा दुव्र्यवहार की घटनायें इतनी अधिक होती हैं कि उनकी कहानियों पर अनेक ग्रंथ लिखे जा सकते हैं। देश की छबि विदेश में क्या देश में ही खराब हो गयी है। इसका कारण यह है कि लोग आवेश, लालच, मोह तथा अहंकार में प्रतिदिन ऐसे काम करने से बाज नहीं आते तो हर धर्म की दृष्टि से गलत हैं। सभी धर्म, जातियों, भाषाओं और क्षेत्र के नाम पर बने समूहों के झंडे तले ऐसी घटनायें होती हैं कि कोई यह दावा कर ही नहीं सकता कि उसके समूह के सभी सदस्य पवित्र तथा उदार हैं। आखिर ऐसा क्यों?
इसका उत्तर यही है कि लोग अपने को उस समय अभिव्यक्त नहीं करते जब उचित समय हो। जहां एक आम आदमी पर अनाचार होता है तो वहां दूसरा यह सोचकर मुंह फेर लेता है कि स्वयं के साथ तो नहीं हो रहा है। जब उसके साथ होता है तो दूसरा भी ऐसा ही करता है। परिणामस्वरूप पूरे समाज में बड़े वर्ग का अनाचार, भ्रष्टाचार, तथा व्याभिचार निर्बाध गति से चलता रहता है। इसका कहीं कोई प्रतिरोध नहीं है। जरूरत है अपनेे अंदर के भय समाप्त करने की तभी आम आदमी कोई लडाई लड़ सकता है। उसे अपनी जुबान का सही समय पर उपयेाग करना चाहिये और अपनी पीड़ा सभी के सामने कहकर हल्का होने की बजाय वहां कहना चाहिये जहां समस्या का हल होता है। सबसे बड़ी बात यह है कि सामान्य लोग धर्म, जाति, भाषा और क्षेत्रीय आधार बने समूहों के पिछलग्गू होने की बजाय व्यक्ति आधार पर एक दूसरे से संपर्क बनायें तथा अपनी सामूहिक अभिव्यक्ति का एक स्वर दें। प्रस्तुत है इस पर एक स्वरचित शेर
आखिर यह सिलसिला कब तक चलता रहेगा।
यूं जमाना खास लोगों के जुर्म सहेगा।
शायद जब तक कुदरत से तोहफे में मिली
जुबान से अपना दर्द पूरी ताकत से नहीं कहेगा।।

------------------
कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
http://anant-shabd.blogspot.com

-----------------------------

‘दीपक भारतदीप की हिन्दी-पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका

31 अक्टूबर 2009

बहार और कगार-हिंदी कविता (bahar aur kagar-hindi kavita)

ज़िन्दगी के देखे दो ही रास्ते
एक बागों की बहार
दूसरा उजाड़ की कगार का.

चलती है टांगें
मकसद तय करता है मन
दुश्मन की शान में गुस्ताखी करना
या तारीफ के अल्फाज़ कहकर
दिल खुश करना यार का..

फिर भी समझ का फेर तो
होता है इंसान में अलग अलग
कहीं रौशनी देखकर अंगारों में
अपने पाँव जला देता है
कहीं प्यार के वहम में
अपनी अस्मत भी लुटा देता है
जिंदगी है उनकी ही साथी
जो आगे कदम बढ़ाने से पहले
अनुमान कर लेता है
समय और हालत की धार का..

------------------
लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
-------------------------------

‘दीपक भारतदीप की हिन्दी-पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका

20 अक्टूबर 2009

जल्दी जीतने की कोशिश-व्यंग्य कविता (jaldi jeetne ki koshish-hindi vyangya kavita)

भीड़ में अपनी पहचान ढूंढते हुए
क्यों अपना वक्त बर्बाद करते हो.
भीड़ जुटाने वाले सौदागरों के लिए
हर शख्स एक बेजान शय है
अपनी हालातों पर तुम
क्यों लंबी गहरी साँसें भरते हो.
सौदागरों के इशारे पर ही
अपनी अदाएं दिखाओ
चंद सिक्के मिल सकते हैं खैरात में
पर इज्जत की चाहत तुम क्यों करते हो.
अपने हाथ से अपनी कामयाबी पर
जश्न मनाने में देर लग सकती है,
जल्दी जीतने की कोशिश में
सौदागरों के हाथ में अपनी
आजादी क्यों गिरवी रखते हो.

-------------------------------------
लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
-------------------------------

‘दीपक भारतदीप की हिन्दी-पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका

17 अक्टूबर 2009

अपनी असलियत मत बदलना-हिंदी व्यंग्य कविता (apni asliyat mat badlana-hindi vyangya kavita)

सारे जहां की प्यास मिटा सको
तुम वह समंदर बनना.
भेजे जो आकाश में पानी भरकर मेघ
जहां लोग पानी को तरसे
वहीँ समन्दर से लाया अमृत बरसे
अपने किये का नाम कभी न करना.

गंगा पवित्र नदी कहलाती है,
पर अपने किनारे की ही प्यास बुझाती है,
देवी की तरह पुजती पर
लाशों से मैली भी की जाती है,
जब तक समन्दर तक पहुँचती
तब तक समेटती है दूसरों के पाप,
जहां है इज्जत का वरदान
वहां साथ लगा है बदनामी का शाप,
तुम बने रहना हमेशा खारे
किनारे आये प्यासों की प्यास बुझाने के लिए
दिखावे के पुण्य की लालच में
अपनी असलियत मत बदलना.

-------------------------
लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
-------------------------------

‘दीपक भारतदीप की हिन्दी-पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका

5 अक्टूबर 2009

फुटबाल और हवा-हिंदी व्यंग्य लघुकथा (khel aur hava-hindu laghu katha)

उसने एक फुटबाल ली और उस पर लिख दिया धर्म। वह उस फुटबाल के साथ एक डंडा लेकर उस मैदान में पहुंच गया जहां गोल पोस्ट बना हुआ था। तमाम लोग वहां तफरी करने आते थे इसलिये वह पहले जोर से चिल्लाया और बोला-‘है कोई जो सामने आकर मुझे गोल करने से रोक सके।’
उसने अपनी आंखों पर चश्मा लगा लिया था। उसका डीलडौल और हाथ में डंडा देखकर लोग डर गये और फिर वह शुरु हो गया उसके गोल करने का सिलसिला। एक के बाद एक गोल कर वह चिल्लाता रहा-है कोई जो मेरा सामना कर सके। देखों धर्म को मैं कैसे लात मारकर गोल कर रहा हूं।’
लोग देखते और चुप रहते। कुछ बच्चे शोर बचाते तो कुछ बड़े कराहते हुए आपस में एक दूसरे का सांत्वना देते कि कोई तो माई का लाल आयेगा जो उसका गोल रोकेगा।’
उसी समय एक ज्ञानी वहां से निकला। उसने यह दृश्य देखा और फिर उसके पास जाकर बोला-‘क्या बात है? सामने कोई गोल पर तो है नहीं जो गोल किये जा रहे हो।’
वह बोला-‘तुम सामने आओ। मेरा गोल रोककर दिखाओ। यह फुटबाल मैंने एक कबाड़ी से खरीदी है और मैं चाहता हूं कि कोई मेरे से गोल गोल खेले।

ज्ञानी ने कहा-‘ यह होता ही है। अगर फुटबाल है तो खेलने का मन होगा। डंडा है तो उसे भी किसी को मारने का मन आयेगा। ऐसे में तुम्हारे साथ कोई नहीं खेलने आयेगा।’
उसने कहा-‘तुम ही खेल लो। दम है तो आ जाओ सामने।’
ज्ञानी ने उससे फुटबाल हाथ में ली और उसकी हवा भरने के मूंह पर जाकर उसका ढक्कन खोल दिया। वह पूरी हवा निकल गयी।
वह चिल्लाने लगा और बोला-‘अरे, डरपोक हवा निकाल दी। अभी डंडा मारता हूं।’
ज्ञानी ने कहा-‘फंस जाओगे। यहां बहुत सारे लोग हैं। फुटबाल पर तुमने धर्म लिखकर लोगों की भावनाओं को संशकित कर दिया था पर अब वह यहीं आयेंगे। देखो वह आ रहे हैं।’
उसने देखा कि लोग उसकी तरफ आ रहे हैं। ज्ञानी ने कहा-‘तुम अब घर जाओ। यह तुम नहीं फुटबाल थी जो तुमसे खेल रही थी। फुटबाल में हवा भरी थी जो उसके साथ तुम्हें भी उड़ा रही थी। वैसे तुम्हारी देह भी हवा से चल रही है पर यह हवा तुम्हारे दिमाग को भी चला रही थी। अब न यह फुटबाल चलेगी न डंडा।’
वह ज्ञानी ऐसा कहकर चल दिये तो तफरी करने आये एक सज्जन ने पूछा-‘पर आपने सब क्यों और कैसे किया?’
ज्ञानी ने कहा-‘मैंने कुछ नहीं किया। यह तो हवा ने किया है। उसे फुटबाल में भरी हवा ने बौखला दिया था। वह निकल गयी तो उसके लिये अपना यह नाटक जारी रखना कठिन था। मुझे करना ही क्या था? उसके कहने पर उसके साथ फुटबाल खेलने से अच्छा है कि उसकी हवा निकाल कर मामला ठंडा कर दो। फुटबाल खेलता तो वह गोल रोकने को लेकर विवाद करता। मेरे गोल पर आपत्तियां जताता। उसको छोड़ कर जाता तो वह यहां भीड़ के लोगों को बेकार में डराता। इससे अच्छा है कि धर्म नाम लिखकर झगड़ा बढ़ाने की उसकी योजना को फुटबाल में से हवा निकाल कर बेकार कर दिया जाये।’
...............................

लेखक संपादक-दीपक भारतदीप
‘दीपक भारतदीप की हिन्दी-पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका

hindi article, hindi sahitya, shori story, कला, मनोरंजन, मस्त राम, मस्ती, समाज, हिंदी साहित्य

1 अक्टूबर 2009

दो तरह के लोग-हिंदी कविता (two type of man-hindi poem

धरती पर अपने कदम दर कदम
चलते हुए जब
नजर करता हूं नीचे की तरफ
तब जहां तक देखता हूं
वहीं तक ख्याल चलते हैं
दुनियां बहुत छोटी हो जाती है।

आंखें उठाकर देखता हूं जब आकाश में
चारों तरफ घुमते हुए
उसके अनंत स्वरूप के दृश्य से
इस दुनियां के बृहद होने की
अनुभूति स्वतः होने लग जाती है।
ख्यालों को लग जाते हैं पंख
सोचता हूं मेरे पांव भले ही
नरक में चलते हों
पर कहीं तो स्वर्ग होगा
तब अधरों पर मुस्कान खेल जाती है।

दृष्टि से बनता जैसा दृष्टिकोण
वैसा ही दृश्य सामने आता है
मगर दृष्टिकोण से जब बनती है दृष्टि
तब हृदय को छू लें
ऐसे मनोरम दृश्य सामने आते हैं
शायद यही वजह है
इस संसार में रहते दो प्रकार के लोग
एक जो बनाते हैं अपनी दुनियां खुद
दूसरे वह जिनको दूसरी की
बनी बनायी लकीर चलाती है।
-------------------

‘दीपक भारतदीप की हिन्दी-पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
लेखक संपादक-दीपक भारतदीप

20 सितंबर 2009

भारतीय प्रचारतंत्र और चीन-हिंदी व्यंग्य (indian media and china-hindi vyangya)

मीडिया यानि टीवी चैनल और समाचार पत्र-जिनकों हम संगठित प्रचारतंत्र भी कह सकते हैं-बिना सनसनी के नहीं चल सकते कम से कम उनमें काम करने वाले लोगों की मान्यता तो यही है। राई का पहाड़ और पहाड़ से निकली चुहिया को हाथी बनाने की कला ही प्रचारतंत्र का मूल मंत्र है। अब यह कहना कठिन है कि कितनी सनसनी खबरें प्रायोजित या स्वघटित हैं।
अभी कुछ दिनों पहले एक विदेशी चैनल का एक पत्रकार लोगों की हत्या कराकर उनके समाचारों को सनसनी ढंग से प्रसारित करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया। वह अपने व्यवसाय के सफलता के लिये ऐसी हरकतें कर रहा था। अभी हमारे देश के प्रचार तंत्र के लोगों की आत्मा मरी नहीं है कि वह ऐसी हरकतें करें पर ऐसी खबरें तो प्रायोजित करने के साथ प्रसारित कर ही सकते हैं जिससे किसी को शारीरिक हानि न पहुंचे न ही अपराध हो।
आखिर यह चल तो विदेशी ढर्रे पर ही रहे हैं। हो सकता है ऐसा न हो पर इधर चीन को लेकर जो सनसनी फैली है उसका तो न ओर मिल रहा है न छोर।

प्रचारतंत्र ने कह दिया कि घुसपैठ हुई। उसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई तो अनेक तरह के कथित प्रमाण लाये गये। आधिकारिक रूप से खंडन होते रहे हैं पर प्रचार तंत्र है कि बस अड़ा ही हुआ है कि घुसपैठ हुई। करीब दो सप्ताह से सनसनी फैली रही तब जाकर चीन की नींद खुली। मुश्किल यह है कि चीनी अपनी भाषा के अलावा दूसरी भाषा सीखते नहीं है इसलिये हिंदी के प्रचारतंत्र का उनको पता नहीं कि क्या चल रहा है?
किसी हिंदी भाषी ने ही उनको चीनी भाषा में लताड़ते हुए इन खबरों के बारे में पूछा होगा तब चीन ने आधिकारिक तौर पर भारतीय प्रचारतंत्र पर दुष्प्रचार का आरोप जड़ा। अभी तक भारत के रणनीतिकारों पर आक्रमण करने वाला चीन इतना बदहवास हो गया कि उसने सीधे ही प्रचारतंत्र को घेरे में ले लिया।
भारत की परवाह न करने वाला चीन पहली बार इतने तनाव में आया इस बात पर भारतीय प्रचारतंत्र को कुछ श्रेय दिया ही जाना चाहिए। इस प्रचारतंत्र को लेकर चीन भारतीय रणनीतिकारों से यह तो कह नहीं सकता कि इन पर नियंत्रण करो क्योंकि यह प्रचारतंत्र सरकारी नहीं है। भारत चीन से कह सकता है कि तुम अपने प्रचारतंत्र पर नियंत्रण करो क्योंकि वहां पर सरकार ही उसकी मालिक है। चीन का प्रचारतंत्र भी तो भारत के विरुद्ध विषवमन करता है और उसका सीधा आशय यही है कि वहां की सरकार यही चाहती है।
मगर इस बार चीन को भारतीय प्रचारतंत्र के रूप में जो असंगठित प्रतिद्वंद्वी मिला है उससे उसका पार पाना संभव नहीं है। सरकारी तौर पर नियंत्रण से परे इस प्रचारतंत्र की खूबी यह है कि कहता ही रहता है सुनता कुछ नहीं देखता है। एक शब्द देख लिया उस पर पूरा कार्यक्रम बना डाला। कहते हैं कि चीनी सुनते अधिक परबोलते कम हैं जबकि हमारा यह स्वतंत्र प्रचारतंत्र बोलता अधिक है सुनता कम। चीनी भी आखिर कुछ बोलेंगे पर उनका एक ही शब्द उनको परेशान कर डाल सकता है अगर भारतीय प्रचारतंत्र ने उसका नकारात्मक अर्थ लिया।
जब भारतीय प्रचारतंत्र उसके खिलाफ आग उगल रहा है तब कोई वहां के प्रचारतंत्र चुप बैठा हों यह संभव नहीं है मगर वह भारतीय प्रचारतंत्र का प्रसारण तो देखेंगे पर भारतीय प्रचारतंत्र उनकी तरफ नहीं देखेगा। यह उपेक्षासन का गुण भारतीय प्रचारतंत्र को विजेता बनाये हुए है। अपने विरुद्ध ऐसा प्रचार देख और सुनकर चीनी आग बबूला होकर कार्यक्रम बनायेंगे पर यहां देखेगा कौन? इससे उनकी आग और बढ़ जाती होगी।

इस प्रचार का ही नतीजा है कि दिल्ली में चीन के राजनयिक इधर उधर भागदौड़ करते रहे। एक तरह से चीन इस प्रचारतंत्र को लेकर भारत पर दबाव डाल रहा है पर यह उसके लिये परेशानी का कारण ही बनने वाला है। हो सकता है कि अभी यह प्रचारतंत्र चुप हो जाये पर अब चीन को आगे यह सब झेलना पड़ सकता है।
अपने प्रचारतंत्र का एक विषय पाकिस्तान तो बना ही हुआ है। उसके यहां अपने देश तथा विदेश के जो खुराफाती तत्व सक्रिय हैं उन पर हमारा प्रचारतंत्र अपनी बहुत सारी रील और शब्द खर्च कर चुका है। लोग उससे उकता गये हैं। लोगों को व्यस्त रखने के लिये एक दुश्मन तो चाहिये न! मुश्किल यह है कि चीन बहुत खौंचड़ी है पर उसने अपने यहां अपराधियों को पनाह नहीं दी है जिसको प्रचारतंत्र हीरो बना दे। वहां की हीरो तो बस सरकार ही है! अमेरिकी आर्थिक विशेषज्ञ कहते हैं कि उसकी विकासदर में अपराध के पैसे का भी योगदान है। ऐसे में वहां के किसी अपराधी का महिमामंडन तो यहां हो नहीं सकता। लेदेकर एक ही विषय बचता है ‘सीधा हमला’। भारतीय सैन्य विशेषज्ञ स्वयं मानते हैं कि सीमा का आधिकारिक अभिलेख न होने के कारण दोनों के सामने ऐसी समस्या आती है। जब भारत को समस्या आयी तो उसे इस तरह सीधा हमला प्रसारित कर प्रचारतंत्र ने जो गजब की फुर्ती दिखाई उसके लिये वह प्रशंसा के काबिल है क्योंकि उसने उस देश को हिला दिया जो किसी से डरता नहीं है। इसका यह भी नतीजा आ सकता है कि आगे चीन ऐसी गल्तियां न करे जिससे तिल का ताड़ बने।
वैसे एक खबर एक चैनल ने दूसरी खबर भी चलाई कि भारतीय बाघ का दुश्मन चीन। दरअसल वहां शेर की खाल से शराब बनती है और आरोप लग रहा है कि नेपाल के तस्करी के जरिये भारत से खाल चीन जाती है। शेरों का शिकार करने कोई चीनी नहीं आते बल्कि अपने ही देश के लोग यह काम करते हैं। इसमें चीन का पूरा दोष नहीं है पर तस्करी के द्वारा इस तरह शेरों की खाल जाने की जिम्मेदारी से वह बच भी नहीं सकता। फिलहाल दोस्ताना रूप से यह बात तो चैनल वाले मान भी रहे हैं पर यह दोस्ताना आगे जारी रहेगा-यह चीनियों को सोचना भी नहीं चाहिए। अपने देश में शेरों की हत्या कर देना कोई सामान्य मामला नहीं है पर जिस तरह चीन को लक्ष्य कर यह कार्यक्रम प्रस्तुत किया गया उससे तो लग रहा है कि चीन पर प्रचारतंत्र की नजर पड़ गयी है। आने वाले समय में ऐसे बहुत सारे कार्यक्रम आ सकते हैं जिस पर चीन बौखला सकता है। इसकी वजह यह है कि वहां की हर गतिविधि के लिये सरकार सीधे जिम्मेदार मानी जाती है। अभी कुछ दिनों पहले भारत के नाम से नकली दवाईयां नाइजीरिया में भेजने के मामले में चीन फंस चुका है। भारतीय प्रचारतंत्र अभी तक चीन को समझता नहीं था पर अब उसे लगने लगा कि वहां की सरकार भारत को परेशान करने के लिए अपराध की हद तक जा सकती है। अपराध की भनक भी प्रचारतंत्र के कान खड़े कर सकती है क्योंकि सनसनी तो उसी ही फैलती है न! यहीं से चीन भी अब उसके दायरे में आ गया है क्योंकि उसके साफसुथरे और संपन्न होने का तिलिस्म भारतीय प्रचारतंत्र के सामने खत्म हो गया है। अब चीन के सामने एक केवल एक मार्ग है वह प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष से भारत के विरुद्ध अपराध होने को रोक दे नहीं तो जितना वह करेगा उससे अधिक तो भारतीय प्रचारतंत्र बतायेगा। इसे रोकना किसी के लिये संभव नहीं है।
-----------------
‘दीपक भारतदीप की हिन्दी-पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
लेखक संपादक-दीपक भारतदीप

समस्त ब्लॉग/पत्रिका का संकलन यहाँ पढ़ें-

पाठकों ने सतत अपनी टिप्पणियों में यह बात लिखी है कि आपके अनेक पत्रिका/ब्लॉग हैं, इसलिए आपका नया पाठ ढूँढने में कठिनाई होती है. उनकी परेशानी को दृष्टिगत रखते हुए इस लेखक द्वारा अपने समस्त ब्लॉग/पत्रिकाओं का एक निजी संग्रहक बनाया गया है हिंद केसरी पत्रिका. अत: नियमित पाठक चाहें तो इस ब्लॉग संग्रहक का पता नोट कर लें. यहाँ नए पाठ वाला ब्लॉग सबसे ऊपर दिखाई देगा. इसके अलावा समस्त ब्लॉग/पत्रिका यहाँ एक साथ दिखाई देंगी.
दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका


हिंदी मित्र पत्रिका

यह ब्लाग/पत्रिका हिंदी मित्र पत्रिका अनेक ब्लाग का संकलक/संग्रहक है। जिन पाठकों को एक साथ अनेक विषयों पर पढ़ने की इच्छा है, वह यहां क्लिक करें। इसके अलावा जिन मित्रों को अपने ब्लाग यहां दिखाने हैं वह अपने ब्लाग यहां जोड़ सकते हैं। लेखक संपादक दीपक भारतदीप, ग्वालियर