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20 अक्टूबर 2009

जल्दी जीतने की कोशिश-व्यंग्य कविता (jaldi jeetne ki koshish-hindi vyangya kavita)

भीड़ में अपनी पहचान ढूंढते हुए
क्यों अपना वक्त बर्बाद करते हो.
भीड़ जुटाने वाले सौदागरों के लिए
हर शख्स एक बेजान शय है
अपनी हालातों पर तुम
क्यों लंबी गहरी साँसें भरते हो.
सौदागरों के इशारे पर ही
अपनी अदाएं दिखाओ
चंद सिक्के मिल सकते हैं खैरात में
पर इज्जत की चाहत तुम क्यों करते हो.
अपने हाथ से अपनी कामयाबी पर
जश्न मनाने में देर लग सकती है,
जल्दी जीतने की कोशिश में
सौदागरों के हाथ में अपनी
आजादी क्यों गिरवी रखते हो.

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लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
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1 अक्टूबर 2009

दो तरह के लोग-हिंदी कविता (two type of man-hindi poem

धरती पर अपने कदम दर कदम
चलते हुए जब
नजर करता हूं नीचे की तरफ
तब जहां तक देखता हूं
वहीं तक ख्याल चलते हैं
दुनियां बहुत छोटी हो जाती है।

आंखें उठाकर देखता हूं जब आकाश में
चारों तरफ घुमते हुए
उसके अनंत स्वरूप के दृश्य से
इस दुनियां के बृहद होने की
अनुभूति स्वतः होने लग जाती है।
ख्यालों को लग जाते हैं पंख
सोचता हूं मेरे पांव भले ही
नरक में चलते हों
पर कहीं तो स्वर्ग होगा
तब अधरों पर मुस्कान खेल जाती है।

दृष्टि से बनता जैसा दृष्टिकोण
वैसा ही दृश्य सामने आता है
मगर दृष्टिकोण से जब बनती है दृष्टि
तब हृदय को छू लें
ऐसे मनोरम दृश्य सामने आते हैं
शायद यही वजह है
इस संसार में रहते दो प्रकार के लोग
एक जो बनाते हैं अपनी दुनियां खुद
दूसरे वह जिनको दूसरी की
बनी बनायी लकीर चलाती है।
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