parsonal लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
parsonal लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

5 जनवरी 2014

चाणक्य नीति-पंच तत्वों की श्रेष्ठता से राष्ट्र की स्थिरता संभव(chankya neeti-panch tatvaon ki shreshthta se rashtra ki sthirta sambhav)



            हमारे देश में आधुनिक व्यवस्था करीब करीब ऐसी चरमर्राई अवस्था में है न तो हम अपनी स्थिति को खुशहाल कह सकते हैं न दर्दनाक होने का रोना रो सकते हैं। देश में पाश्चात्य संस्कृति के घालमेल, असमंजस्यपूर्ण शिक्षा पद्धति तथा कथित अव्यवस्थित विकास ने पूरे समाज को अस्त व्यस्त कर दिया है। शहरों में आलीशान मकान बन गये हैं पर सड़कें जर्जर हैं।  जनसंख्या बढ़ी है पर रास्ते पर जाम कारों की वजह से लगता है।  सबसे बड़ी बात यह है कि रोजगार क्षेत्र में अनिश्चितता और अस्थिरता के वातावरण ने लोगों को मानसिक रूप से तनावग्रस्त कर दिया है।  स्थिति यह है कि विभिन्न विद्वानों के भाषणों, कवियों की कविताओं और फिल्मों के कथानकों में धनवानों को क्रूर बताया जाता है पर अंततः सक्रिय लोग इन्हीं के दरबार में मत्था टेकते हैं।
            हमारे देश में मिश्रित अर्थव्यवस्था के सिद्धांत अपनाये गये हैं। उसमें करप्रणाली इस तरह रही कि अमीरों से अधिक कर वसूला जा सके।  इसका प्रभाव यह हुआ कि छोटे तथा मध्यम वर्ग धनिक कभी अधिक धन नहीं बन सके पर जो अधिक धन हैं वह अपनी शक्ति के बल पर करचोरी कर अपना स्तर बनाये रखने में सफल रहे। स्थिति यह है कि देश में गरीब और अमीर के बीच खाई अधिक चौड़ी हो गयी है। देश की सामाजिक, आर्थिक, कला, पत्रकारिता, खेल तथा सभी सार्वजनिक संस्थाओं पर धनिक लोगों ने अपने शिखर पुरुष स्थापित कर दिये हैं। जहां भ्रष्टाचार और व्याभिचार की घटनायें होना आम हो गया है।  एक तरह से धनिक लोग अब  केवल व्यापारी नहीं रहे वरन् राज्य से अधिक शक्तिशाली दिखते हैं।  ऐसे में गरीब और मध्यम वर्ग के लोगों में निराशाजनक का भाव व्याप्त हो गया है।
            देश की प्राकृतिक संपदा का दोहन अमीरों के पक्ष में हो रहा है। गंगा और यमुना जैसी नदियां कारखानों के साथ ही शहरों की गंदगी का बोझ ढोते ढोते अशुद्ध हो गयी हैं। इतना ही नहीं अनेक शीतल पेय उत्पाद कारखानों ने तो जमीन के जल को भी सोखने के साथ ही विषाक्त भी कर दियया है।  जिनसे बीमारियां फैलती है।  उसके बाद चिकित्सा यह हाल है कि गरीब आदमी के लिये राजकीय चिकित्सालयों में वैसी सुविधायें नहीं है जैसी कि अमीरों के निजी चिकित्सालयों में है। चिकित्सक अब भगवान नहीं व्यवसायी हो गये हैं।
चाणक्य नीति में कहा गया है कि
--------------
धनिकः श्रोत्रियो राजा नदी वैद्यस्तु पञ्चमः।
पञ्च यत्र न विद्यन्ते न तत्र दिवसं वसेत्।।
            हिन्दी में भावार्थ- धनवान, विद्वान, राजा, नदी और वैद्य यह पांच लोग अपने क्षेत्र को प्रसन्न रखते हैं।  जहां यह विद्यमान न हो वहां एक दिन भी नहीं रुकना चाहिये।
लोकयात्रा भयं लज्जा दक्षिण्यं त्यागशीलता।
पञ्च यत्र न विद्यन्ते न कुर्यात् तत्र सिंस्थतिम्।।
            हिन्दी में भावार्थ-जहां भौतिक उपलब्धियां, भय, लज्जा, दान तथा त्याग का भाव न हो वहां रहने का प्रयास नहीं करना चाहिये।
            सबसे हैरानी इस बात की है कि समाज कल्याण का विषय राजकीय बना दिया गया है।  राजसी मद में डूबे आर्थिक शिखर पुरुषों ने समाज की स्थितियों  से एकदम मुंह मोड़ लिया है।  दान दक्षिणा जैसी बातें अब केवल कर्मकांड तक ही सीमित रह गये हैं।  ऐसा नहीं है कि निष्काम दया करने वाले इस देश में कम हैं पर जनसंख्या जिस अनुपता में बड़ी है उस अनुपात में दानदाता नहीं बढ़े। इसका कारण यह है कि राज्य जब समाज कल्याण करता दिखता है तो सात्विक धनिक लोग भी यह मानकर मुंह फेर लेते हैं कि सब ठीक चल रहा है।  इधर अपराध इतनी तेजी बढ़े हैं कि लगता है कि जिनके पास धन, बल, और पद है उनके लिये एक कानून और आम इंसान के लिये दूसरे हैं। कहने का अभिप्राय यह है कि हम देश की छवि को उज्जवल रखने वाले तत्वों पर विचार करें तो निराशा हाथ लगती है।  इसके लिये राजसी कर्म में लगे लोगों को इस बात पर विचार करना चाहिये कि देश की व्यवस्था को किस तरह आदर्श मार्ग पर ले जाया जाये।

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poet-Deepak raj kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर
poet, writer and editor-Deepak 'BharatDeep',Gwalior
‘दीपक भारतदीप की हिन्दी-पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका

४.दीपकबापू कहिन
५,हिन्दी पत्रिका
६,ईपत्रिका
७.जागरण पत्रिका

26 दिसंबर 2013

ज़माने के दिल में नफरत की आग-हिन्दी व्यंग्य कविता(zamane ke dil mein nafarat ki aag-hindi vyangya kavita)



दर्द जमाने में बहुत है
बगावत हर दिल में बसी है,
फरिश्तों का मुखौटा लगा लिया
जिन इंसानों ने
उनकी नीयत शैतानियत में फसी है।
कहें दीपक बापू
पैसे की भूख जिनकी कभी मिटी नहीं
वही लोगों को रोटी देने का
भरोसा दे रहे हैं,
दान के लिये ठेका लेकर
चंदा उगाही की दौड़ में भाग ले रहे हैं,
किसी  बीमारी का इलाज
जिनके पास नहीं है
वही दवा देने के दावे करते हैं,
भलाई के व्यापार में
दरियादिल वही मशहूर हुए
अपने घर के खजाने जो भरते हैं,
अपनी शान-ओ-शौकत में
मशगूल लोगों समझ
आम इंसानों को बुजदिल और बेजुबान
नहीं मालुम उनको
ज़माने के दिलों में
नफरत की कितनी आग बसी है।
------------------

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poet-Deepak raj kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर
poet, writer and editor-Deepak 'BharatDeep',Gwalior
‘दीपक भारतदीप की हिन्दी-पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका

४.दीपकबापू कहिन
५,हिन्दी पत्रिका
६,ईपत्रिका
७.जागरण पत्रिका

10 दिसंबर 2013

परतंत्रता और स्वतंत्रता का मूल अर्थ समझना होगा-हिन्दी चिंत्तन लेख(gulami aur aazadi ka matlab samajhana hoga-hindi chinnttan lekh)



            हमारा देश अंग्रेजों की राजनीतिक दासता से तो मुक्त हो गया पर जीवनशैली, भाषा, रहन सहन तथा वैचारिक शैली की दृष्टि से हमारा पूरा समाज आज भी उनका गुलाम है। स्थिति यह है कि हिन्दी भाषा का उपभोक्ता बाज़ार इतना बड़ा हो गया है पर उसका आर्थिक दोहन वह लोग कर रहे हैं जो अंग्रेजी के गुलाम है। स्थिति यह है अंग्रेजी भाषा तथा जीवनशैली अपनाने वालों को हमारे यहं सभ्रांत माना जाता है। इतना ही नहीं हिन्दी धारावाहिकों, फिल्मो तथा साहित्य में प्रसिद्धि पाये अनेक लोगों को अपने टीवी साक्षात्कारों में अंग्रेजी भाषा बोलते देखना पड़ता है।  अंग्रेजी भाषा तथा जीवनशैली  का वर्चस्व चारों ओर दिखाई देता है। पहनावे के लिये पश्चिमी परिधानों को अपनाया जा रहा है तो खानपान में भी यही फास्ट फूड जैसे पदार्थों का प्रयोग धड़ल्ले से हो रहा है।  उससे ज्यादा महत्वपूर्ण बात यह कि समाज  अपने सांस्कारिक, सांस्कृतिक तथा धार्मिक कार्यक्रमों में अंग्रेजी प्रक्रिया का पालन करने की प्रवृत्ति को सहजता से मान्यता दी है।  यह सब तो चल सकता है पर मुख्य विषय यह है कि हमारे यहां अब लोग अपने छोटे व्यवसायों से अलग होकर नौकरी यानि गुलामी  पर आश्रित हो रहे हैं।  जो आदमी योग्यता की दृष्टि से निम्न या मध्यम स्तर का है वह देश में तो जो उच्च है वह विदेश में नौकरी की प्रतीक्षा कर रहा है। एक तरह से देश का जनमानस ही परतंत्रता के भाव में सांस ले रहा है।  स्वतंत्र चिंत्तन, कर्म, विचार तथा अभिव्यक्ति का मतलब ही लोग नहीं समझ पा रहे।
कौटिल्य का अर्थशास्त्र में कहा गया है कि
----------------
द्वधीभावौ द्वियाः प्रोक्तःस्वतन्त्रपरतन्त्रयो।
स्वतंन्त्र उक्ते द्वान्यस्तु यः स्वादुभववेतनः।।
            हिन्दी में भावार्थ-स्वतंत्र और परतंत्र के भाव में भेद बस इतना ही है कि अपनी अधीन स्वतंत्र व्यक्ति होता है दूसरे के अधीन आसरा ढूंढता है।
            15 अगस्त को मनाया जाने वाला स्वतंत्रता दिवस केवल राजनीतिक और प्रशासनिक दासता से मुक्ति का प्रतीक हो सकता है पर वह मानसिक स्वतंत्रता का परिचायक कतई नहीं है। हम यह भी देख रहे हैं कि अनेक व्यवसायिक परिवारों के लोग नौकरियों में घुस गये है। सबसे ज्यादा हंसी महिलाओं के हितों के संरक्षण की बात करने वालों पर आती है। वह घर गृहस्थी में कार्यरत महिलाओं को पुरुष की दासता से मुक्त करने की बात कहते हैं। उनको लगता है कि अपने परिवार के लिये खाना बनाना, बर्तन मांजना या घर मे झाड़ू लगाना उनकी गुलामी का प्रमाण है। वह घर के बाहर नौकरी करने वाली महिलाओं को स्वतंत्र कहते हैं। सीधी बात कहें तो परंपरागत ढंग से मजदूरी, छोटे व्यवसाय तथा उद्यम करने वाले पुरुष तथा घर परिवार संभालने वाली स्त्रियां इन विदुषकनुमा बुद्धिजीवियों के लिये परंतत्रता का परिचायक है।  कंपनियों की अस्थाई नौकरी करने वाले लोग उनके लिये स्वतंत्र और सभ्य हैं। अपने परिवार से सदैव हमदर्दी रखने वाली स्त्री उनके लिये एक गुलाम है और बाहर जाकर दूसरों की नौकरी करने वाली एक स्वतंत्र स्त्री है।  जबकि हमारा अध्यात्मिक दर्शन कहता है कि दूसरे की नौकरी करना या पराये घर में अपना आसरा ढूंढना एक तरह से परतंत्रता है। स्वतंत्र व्यक्ति को अपना जीवन, कर्म, विचार तथा व्यवहार हमेशा स्वतंत्र भाव से करना चाहिये।  इसी स्वतंत्र भाव से मनुष्य के अंदर आत्मविश्वास भी पैदा होता है।

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poet-Deepak raj kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर
poet, writer and editor-Deepak 'BharatDeep',Gwalior
‘दीपक भारतदीप की हिन्दी-पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका

४.दीपकबापू कहिन
५,हिन्दी पत्रिका
६,ईपत्रिका
७.जागरण पत्रिका

30 अक्टूबर 2013

मुफ्त के लिये खोज-हिन्दी क्षणिकायें(muft ke liye khoj-hindi short poem's)



सर्वशक्तिमान से इश्क करना भी
वह सिखायेंगे,
सोने के छिपे खजाने का रास्ता भी दिखायेंगे,
खुश रहे योगी के साथ भोगी भी
धर्म के ठेकेदार के रूप में वह
अपना नाम इसी तरह लिखायेंगे।
कहें दीपक बापू
मुख से लेते सर्वशक्तिमान का नाम,
अपनी इज्जत बढ़ाने के  साथ  लेते दाम,
जिंदगी के हर पल में
स्वर्णिम सुख लेने की कला वह क्या सिखायेंगे।
---------------
दिल और दिमाग से
सोचता है कौन,
हर कोई चीखने को आतुर
कोई रहता नहीं मौन,
हर कोई फायदों के पीछे पड़ा है,
ढूंढता है कहां खजाना गड़ा है।
कहें दीपक बापू
मेहनत से डर इंसान
मुफ्त सोना पाने पर हर जगह अड़ा है।
--------------

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poet-Deepak raj kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर
poet, writer and editor-Deepak 'BharatDeep',Gwalior
‘दीपक भारतदीप की हिन्दी-पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका

४.दीपकबापू कहिन
५,हिन्दी पत्रिका
६,ईपत्रिका
७.जागरण पत्रिका

17 अक्टूबर 2013

खजाने की आशायें-हिन्दी चिंत्तन लेख(khazane ki aashyaen-hindi chinttan lekh,hindi thought article)



                                                एक बार फिर जमीन में गढ़े खजाने की बात सामने आयी। उत्तरप्रदेश के उन्नाव जिले में डोंडिया खेड़ा गांव में एक हजार टन सोने का खजाना मिलने की संभावना बन रही है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि पुरातत्व विभाग एक संत से मिले नक्शे के आधार पर यह खुदाई कर रहा है पर इसके आधार पर यह नहीं मान लेना चाहिये कि वहां खजाना मिल ही जायेगा।  बहरहाल वहां लोगों को एक अस्थाई मेला लग गया है।  लोग खजाने की खुदाई देखने आ रहे हैं पर पुलिस की जैसी व्यवस्था है उनका खुदाई के स्थान तक जाना कठिन है।  फिर भी मेला लग रहा है।  लोग पिकनिक मनाने के लिये वहां खजाना देखने आ रहे हैं। दुकाने लग गयी है। खजाना मिल भी गया तो भी सरकारी लोग उसे वहां सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित नहीं कर पायेंगे क्योंकि संभवत उन्हें ऐसा करने की अनुमति ऊपर से नहीं मिलेगी
                        परिणाम का हमें इंतजार है पर फिलहाल यह देखकर हैरानी हो रही है कि एक खजाना जो अभी दिख नहीं रहा वहां लोग अपने ख्वाबों को साथ लेकर लोग मेला लगाने पहुंच गये हैं।  हम बात कर रहे हैं भीड़ की। भारत में किसी भी तरह कहीं भी भीड़ जुटानी हो तो किसी चमत्कार का प्रचार कर दीजिये।  अक्सर लोग यह सवाल करते हैं कि आखिर कथित संतों और तांत्रिकों के पास लोग जाते क्यों है? जवाब है कि लोग मेहनत के बिना कुछ पाना चाहते हैं।  ऐसा नहीं है कि लोग अज्ञानी है मगर लालच उन्हें अक्ल का अंधा बना देती है।  लोग कहते हैं कि भारत में अंधविश्वास बहुत है पर हम इसे नहीं मानते। उल्टा हमारा मानना है कि भारत के हर आदमी में ज्ञान है यह अलग बात है कि लोभ और लालच उस पर पर्दा डाल देती है।  भगवान के प्रति जो विश्वास है वह लालच के कारण अंधविश्वास में बदल जाता है लोग जानते हैं कि इस तरह कुछ होगा नहीं पर सोचते हैं कि चलो अजमाने में हर्ज क्या है?
                        खजानों पर लिखा गया यह तीसरा लेख है। इसका मतलब यह है कि हम भारत के खजानों पर दो लेखक पहले भी लिख चुके हैं।  यह लेख हम नहीं लिखते अगर एक पाठक ने पुराने एक लेखक पर टिप्पणी नहीं की होती।  उस पाठिका की टिप्पणी के बाद हमने अपने वही लेख पढ़ डाले। उस पाठिका का धन्यवाद! उसकी टिप्पणी ने  उन पाठों को  याद दिलाया तब हमने सोचा कि  कुछ दूसरा लिखो उससे पहले वाला पढ़ लो। प्रस्तुत हैं वही दोनों लेख।

सोने का खज़ाना और भारत का अध्यात्मिक ज्ञान-हिन्दी लेख (sone ka khazana aur bharat ka adhyatmik gyan-hindi lekh)
              केरल के पद्मनाभ स्वामी मंदिर में अभी तक एक लाख करोड़ का खजाना बरामद हुआ है। यह खजाना त्रावणकोर या ट्रावनकोर के राजाओं का है। जहां तक हमारी जानकारी है भारत में इस तरह खजाना मिलने का यह पहला प्रसंग है।
           अलबत्ता बचपन से अपने देश के लोगों को खजाने के पीछे पागल होते देखा हैं। कई लोग कहीं कोई खास जगह देख लेते हैं तो कहते हैं कि यहां गढ़ा खजाना होगा। अनेक लोग सिद्धों के यहां चक्कर भी इसी आशा से लगाते हैं कि शायद कहीं किसी जगह गढ़े खजाने का पता बता दे। कुछ सिद्ध तो जाने ही इसलिये जाते हैं कि उनके पास गढ़े खजाने का पता बताने की क्षमता या सिद्धि है।
        ऐसे भी किस्से देखे हैं कि किसी ने पुराना मकान खरीदा और उसे बनवाना शुरु किया। भाग्य कहें या परिश्रम वह अपने व्यवसाय में अमीर हो गया तो लोगों ने यह कहना शुरु कर दिया कि खुदाई में उनको खजाना मिला है।
बहरहाल केरल के पद्मनाभ स्वामी मंदिर में मिले सोने और हीरे जवाहरात ने भले ही किसी को चौंकाया हो पर इतिहासविद् और तत्वज्ञानियों ने लिये यह कोई आश्चर्य का विषय नहीं हो सकता।
अभी हाल ही में पुट्टापर्थी के सत्य सांई बाबा के मंदिर में तो मात्र दो सौ ढाई करोड़ का खजाना मिला था तब अनेक लोगों की सांसें फूल गयी थी। अब केरल के पद्मनाभ स्वामी मंदिर में मिले खजाने ने उसके एतिहासिक महत्व पर धूल डाल दी है।
          बता रहे हैं कि केरल के पद्मनाभ स्वामी मंदिर में मिला यह खजाना तो मात्र एक कमरे का है और अभी ऐसे ही छह कमरे अन्य भी हैं। न हमने खजाना देखा है न देख पायेंगे। न पहुंचेंगे न पहुंच पायेंगे। इस खजाने का क्या होगा यह भी नहीं पता पर जिन्होंने उसका संग्रह किया उन पर तरस आता है। यह राजाओं का खजाना है और इसका मतलब यह है कि उन्होंने अपनी प्रजा के दम पर ही इसे बनाया होगा। नहीं भी बनाया होगा तो अपने उस राज्य के भौतिक या उसके नाम का ही उपयोग किया तो होगा जो बिना प्रजा की संख्या और क्षमता के संभव नहीं है।
             राजा हो या प्रजा सोना, हीरा, जवाहरात तथा अन्य कीमती धातुओं इस देश के लिये हमेशा कौतुक का विषय रही हैं। पेट की भूख शांत करने के लिये इसका प्रत्यक्ष कतई नहीं हो सकता अलबत्ता चूंकि लोगों के लिये आकर्षण का विषय है इसलिये उसका मोल अधिक ही रहता है। हमारे देश में सोना पैदा नहीं होता। इसे बाहर से ही मंगवाया जाता है। जब हम प्राचीन व्यापार की बात करते हैं तो यही बात सामने आती है कि जीवन उपयोगी वस्तुऐं-गेंहूं, चावल, दाल, कपास और उससे बना कपड़ा तथा अन्य आवश्यक वस्तुऐं-यहां से भेजी जाती थी जिनके बदले यह सोना और उससे बनी वस्तुओं जिनका जीवन में कोई उपयोग नहीं है यहां आता होंगी। कहा जाता है कि दूर के ढोल सुहावने। सोना दूर पैदा होता है उससे देश का प्रेम है पर प्रकृति की जो अन्य देशों से अधिक कृपा है उसकी परवाह नहीं है। हम कई बार लिख चुके हैं और आज भी लिख रहे हैं कि विश्व के प्रकृतिक विशेषज्ञों का कहना है कि भारत में जलस्तर सबसे बेहतर है। जी हां वह जल जो जीवन का आधार है हमारे यह अच्छा है इसलिये गेंहूं, चावल, दाल, कपास और सब्जियों की बहुतायत होने के कारण हम उनका महत्व नहीं समझते वैसे ही जैसे कहा जाता है कि घर का ब्राह्मण बैल बराबर। यह बात भी कह चुके हैं कि निरुपयोगी पर आकर्षक चीजों के मोह में हमारा समाज इस तरह भ्रमित रहता है कि उस पर हंसा ही जा सकता है। वैसे तो विश्व में सभी जगह अंधविश्वास फैला है पर हम भारतीय तो आंकठ उसमें डूबे रहे हैं। यहां इतना अज्ञान रहा है कि हमारे महान ऋषियों को सत्य का अनुसंधान करने के अच्छे अवसर मिले हैं। कहा जाता है कि कांटों में गुलाब खिलता है तो कीचड़ में कमल मिलता है। अगर यह समाज इतना अज्ञानी नहीं होता तो सत्य की खोज करने की सोचता कौन? मूर्खों पर शोध कर ही बुद्धिमता के तत्व खोजे जा सकते हैं। हम विश्व में अध्यात्मिक गुरु इसलिये बने क्योंकि सबसे ज्यादा मोहित समाज हमारा ही है। भौतिकता को पीछे इतना पागल हैं कि अध्यात्म का अर्थ भी अनेक लोग नहीं जानते। इनमें वह भी लोग शामिल हैं जो दावा करते हैं कि उन्होंने ग्रंथों का अध्ययन बहुत किया है।
           कहा जाता है कि सोमनाथ का मंदिर मोहम्मद गजनबी ने लूटा था। उसमें भी ढेर सारा सोना था। कहते हैं कि बाबर भी यहां लूटने ही आया था। यह अलग बात है कि वहां यहीं बस गया यह सोचकर कि यहां तो जीवन पर सोने की डाल पर बैठा जाये। बाद में उसके वंशज तो यहीं के होकर रह गये। यकीनन उस समय भारत में सोने के खजाने की चर्चा सभी जगह रही होगी। उस समय भगवान के बाद समाज में राजा का स्थान था तो राजा लोग मंदिरों में सोना रखते थे कि वहां प्रजा के असामाजिक तत्व दृष्टिपात नहीं करेंगे। उस समय मंदिरों में चोरी आदि होने की बात सामने भी नहीं आती।
इतना तय है कि अनेक राजाओं ने प्रजा को भारी शोषण किया। किसी की परवाह नहीं की। यही कारण कि कई राजाओं के पतन पर कहीं कोई प्रजा के दुःखी होने की बात सामने नहीं आती। यहां के अमीर, जमीदार, साहुकार और राजाओं ने प्रजा के छोटे लोगों को भगवान का एक अनावश्यक उत्पाद समझा। यही कारण है विदेशियों ने आकर यहां सभी का सफाया किया। राजा बदले पर प्रजा तो अपनी जगह रही। यही कारण है यहां कहा भी जाता है कि कोउ भी नृप हो हमें का हानि। कुछ लोग इस भाव यहां के लोगों की उदासीनता से उपजा समझते हैं पर हम इसे विद्रोह से पनपा मानते हैं। खासतौर से तत्वज्ञान के सदंर्भ में हमारा मानना है कि जब आप स्वयं नहीं लड़ सकते तो उपेक्षासन कर लीजिये।
जिसके पास कुछ नहीं रहा उसे लुटने का खतरा नहीं था और जिन्होंने सोने के ताज पहने गर्दने उनकी ही कटी। जिनकी जिंदगी में रोटी से अधिक कुछ नहीं आया उन्होंने सुरक्षित जिंदगी निकाली और जिन्होंने संग्रह किया वही लुटे।
          अब यह जो भी खजाना मिला है यह तब की प्रजा के काम नहीं आया तो राजाओं के भी किस काम आया? ऐसे में हमारा ध्यान श्रीमद्भागवत् गीता के संदेशों की तरफ जाता है। जिसमें गुण तथा कर्मविभाग का संक्षिप्त पर गुढ़ वर्णन किया गया है। उस समय के आम और खास लोग मिट गये पर खजाना वहीं बना रहा। अब यह उन लोगों के हाथ लगा है जिनका न इसके संग्रह में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष कोई हाथ नहीं है। सच है माया अपना खेल खेलती है और आदमी समझता है मैं खेल रहा हूं। वह कभी व्यापक रूप लेती है और कभी सिकुड़ जाती है। कभी यहां तो कभी वहां प्रकट होती है। सत्य स्थिर और सूक्ष्म है। सच्चा धनी तो वही है जो तत्वज्ञान को धारण करता है। वह तत्वज्ञान जिसका खजाना हमारे ग्रंथों में है और लुटने को हमेशा तैयार है पर लूटने वाला कोई नहीं है। बहरहाल वह महान लोग धन्य हैं जो इसे संजोए रखने का काम करते रहे हैं इसलिये नहीं कि उसे छिपाना है बल्कि उनका उद्देश्य तो केवल इतना ही है कि आने वाली पीढ़ियों के वह काम आता रहे।
      इस विषय पर लिखे गये एक व्यंग्य को अवश्य पढ़ें
——————-
भारत आज भी सोने की चिड़िया है-हास्य व्यंग्य(bharat aaj bhi sone di chidiya hai-hasya vyangya)
          कौन कहता है कि भारत कभी सोने की चिड़िया थी। अब यह क्यों नहीं कहते कि भारत सोने की चिड़िया है। कम से कम देश में जिस तरह महिलाओं और पुरुषों के गले से चैन लूटने की घटनायें हो रही हैं उसे तो प्रमाण मिल ही जाता है। हमें तो नहीं लगता कि शायद का देश कोई भी शहर हो जिसके समाचार पत्रों में चैन खिंचने या लुटने की घटना किसी दिन न छपती हो। अभी तक जिन शहरों के अखबार देखे हैं उनमें वहीं की दुर्घटना और लूट की वारदात जरूर शामिल होती है इसलिये यह मानते हैं कि दूसरी जगह भी यही होगा।
          खबरें तो चोरी की भी होती हैं पर यह एकदम मामूली अपराध तो है साथ ही परंपरागत भी है। मतलब उनकी उपस्थिति सामान्य मानी जाती है। वैसे तो लूट की घटनायें भी परंपरागत हैं पर एक तो वह आम नहीं होती थीं दूसरे वह किसी सुनसान इलाके में होने की बात ही सामने आती थी। अब सरेआम हो लूट की वारदात हो रही हैं। वह भी बाइक पर सवार होकर अपराधी आते हैं।
         हमारे देश मूर्धन्य व्यंग्यकार शरद जोशी ने एक व्यंग्य में लिखा था कि हम इसलिये जिंदा हैं क्योंकि हमें मारने की फुरसत नहीं है। उनका मानना था कि हमसे अधिक अमीर इतनी संख्या में हैं कि लुटने के लिये पहले उनका नंबर आयेगा और लुटेरे इतनी कम संख्या में है कि उनको समझ में नहीं आता कि किसे पहले लूंटें और किसे बाद में। इसलिये लूटने से पहले पूरी तरह मुखबिरी कर लेते हैं। यह बहुत पहले लिखा गया व्यंग्य था। आज भी कमोबेश यही स्थिति है। हम ख्वामख्वाह में कहते है  कि अपराध और अपराधियों की संख्या बढ़ गयी हैं। आंकड़ें गवाह है कि देश में अमीरों की संख्या बढ़ गयी है। अब यह तय करना मुश्किल है कि इन दोनों के बढ़ने का पैमाना कितना है। अनुपात क्या है? वैसे हमें नहीं लगता कि स्वर्गीय शरद जोशी के हाथ से व्यंग्य लिखने और आजतक के अनुपात में कोई अंतर आया होगा। साथ ही हमारी मान्यता है कि अपराधी और अमीरों की संख्या इसलिये बढ़ी है क्योंकि जनसंख्या बढ़ी है। विकास की बात हम करते जरूर है पर जनसंख्या में गरीबी बढ़ी है। मतलब अपराध, अमीरी और गरीबी तीनों समान अनुपात में ही बढ़ी होगी ऐसा हमारा अनुमान है।
          सीधी बात कहें तो चिंता की कोई बात नहीं है। सब ठीकठाक है। विकास बढ़ा, जनंसख्या बढ़ी, अमीर बढ़े तो अपराध भी बढ़े और गरीबी भी यथावत है। तब रोने की कोई बात नहीं है। फिर हम इस बात को इतिहास की बात क्यों मानते हैं  कि भारत कभी सोने की चिड़िया थी। हम यह क्यों गाते हैं कि कभी कभी डाल पर करती थी सोने की चिड़िया बसेरा, वह भारत देश है मेरा। हम थे की जगह हैं शब्द क्यों नहीं उपयोग करते। अभी हमारे देश के संत ने परमधाम गमन किया तो उनके यहां से 98 किलो सोना और 307 किलो चांदी बरामद हुई। टीवी और अखबारों के समाचारों के अनुसार कई ऐसे लोग पकड़े गये जिनके लाकरों से सोने की ईंटे मिली।
          वैसे तो सोना पूरे विश्व के लोगों की कमजोरी है पर भारत में इसे इतना महत्व दिया जाता है कि दस हजार रुपये गुम होने से अधिक गंभीर और अपशकुन का मामला उतने मूल्य का सोना खोना या छिन जाना माना जाता है। बहु अगर कहीं पर्स खोकर आये तो वह सास को न बताये कि उसमें चार पांच हजार रुपये थे। यह भी सोचे सास को क्या मालुम कि उसमें कितने रुपये थे पर अगर पांच हजार रुपये की चैन छिन जाये तो उसके लिये धर्म संकट उत्पन्न हो जाता है क्योंकि वह सास के सामने हमेशा दिखती है और यह बात छिपाना कठिन है।
           एक अंतर्राष्ट्रीय संस्था के अनुसार भारत के लोगों के पास सबसे अधिक सोना है। इसमें शक भी नहीं है। भारत में सोने का आभूषण विवाह के अवसर पर बनवाये जाते हैं। इतने सारे बरसों से इतनी शादिया हुई होंगी। उस समय सोना इस देश में आया होगा। फिर गया तो होगा नहीं। अब कितना सोना लापता है और कितना प्रचलन में यह शोध का विषय है पर इतना तय है कि भारत के लोगों के पास सबसे अधिक सोना होगा यह तर्क कुछ स्वाभाविक लगता है।
            भारत के लोग दूसरे तरीके से भी सबसे अधिक भाग्यशाली हैं क्योंकि अंतर्राष्ट्रीय विशेषज्ञ कहते हैं कि भूजल स्तर भारत में सबसे अधिक है। यही कारण है कि हमारा देश अन्न के लिये किसी का मुंह नहीं ताकता। हमारे ऋषि मुनि हमेशा ही इस बात को बताते आये हैं पर अज्ञान के अंधेरे में भटकने के आदी लोग इसे नहीं समझ पाते। कहा जाता है कि भारत का अध्यात्मिक ज्ञान सत्य के अधिक निकट है। हमें लगता है कि ऋषि मुनियों के लिये तत्व ज्ञान की खोज करना तथा सत्य तत्व को प्रतिष्ठित करना कोई कठिन काम नहीं रहा होगा क्योंकि मोह माया में फंसा इतना व्यापक समाज उनको यहां मिला जो शायद अन्यत्र कहीं नहीं होगा। अज्ञान के अंधेरे में ज्ञान का दीपक जलाना भला कौनसा कठिन काम रहा होगा?
             वैसे देखा जाये तो सोना तो केवल सुनार के लिये ही है। बनना हो या बेचना वही कमाता है। लोग सोने के गहने इसलिये बनवाते हैं वक्त पर काम आयेगा पर जब बाज़ार में बेचने जाते हैं तो सुनार तमाम तरह की कटौतियां तो काट ही लेता हैं। अगर आप आज जिस भाव कोई दूसरी चीज खरीदने की बजाय सोना खरीदें  और कुछ वर्ष बाद खरीदा सोना बेचें तो पायेंगे कि अन्य चीज भी उसी अनुपात में महंगी हो गयी है। मतलब वह सोना और अन्य चीज आज भी समान मूल्य की होती है। अंतर इतना है कि अन्य चीज पुरानी होने के कारण भाव खो देती है और सोना यथावत रहता है। हालांकि उसमें पहनने के कारण उसका कुछ भाग गल भी जाता है जिससे मूल्य कम होता है पर इतना नहीं जितना अन्य चीज का। संकट में सोने से सहारे की उम्मीद ही आदमी को उसे रखने पर विवश कर देती है।
          जब रोज टीवी पर दिख रहा है और अखबार में छप रहा है तब भी भला कोई सोना न पहनने का विचार कर रहा है? कतई नहीं! अगर महिला सोना नहीं पहनती उसे गरीब और घटिया समझा जाता है। सोना पहने है तो वह भले घर की मानी जाती है। भले घर की दिखने की खातिर महिलायें जान का जोखिम उठाये घूम रही है। धन के असमान वितरण ने कथित भले और गरीब घरों में अंतर बढ़ा दिया है। वैसे कुछ घर अधिक भले भी हो गये हैं क्योंकि उनकी महिलाऐं चैन छिन जाने के बाद फिर दूसरी खरीद कर पहनना शुरु देती हैं। बड़े जोश के साथ बताती हैं कि सोना चला गया तो क्या जान तो बच गयी।’
        भारत में वैभव प्रदर्शन बहुत है इसलिये अपराध भी बहुत है। वैभव प्रदर्शन करने वाले यह नहीं जानते कि उनके अहंकार से लोग नाखुश हैं और उनमें कोई अपराधी भी हो सकता है। पैसे, प्रतिष्ठा और पद के अहंकार में चूर लोग यही समझते हैं कि हम ही इस संसार में है। वैसे ही जैसे बाइक पर सवार लोग यह सोचकर सरपट दौड़ते हुए दुर्घटना का शिकार होते हैं कि हम ही इस सड़क पर चल रहे हैं या सड़क पर नहीं आसमान में उड़ रहे हैं वैसे ही वैभव के प्रदर्शन पर भी अपराध का सामना करने के लिये तैयार होना चाहिए। टीवी पर चैन छीनने की सीसीटीवी में कैद दृश्य देखकर अगर कुछ नहीं सीखा तो फिर कहना चाहिए कि पैसा अक्ल मार देता है।
        कुछ संस्थाओं ने सुझाव दिया है कि देश में अनाज की बरबादी रोकने के लिये शादी के अवसर पर बारातियों की संख्या सीमित रखने का कानून बनाया जाये। इस पर कुछ लोगों ने कहा कि अनाज की बर्बादी शादी से अधिक तो उसके भंडारण में हो रही है। अनेक जगह बरसात में हजारों टन अनाज होने के साथ कहीं ढूलाई में खराब होकर दुर्गति को प्राप्त होता है और उसकी मात्रा भी कम नहीं है। हम इस विवाद में न पड़कर शादियों में बारातियों की संख्या सीमित रखने के सुझाव पर सोच रहे हैं। अगर यह कानून बन गया तो फिर इस समाज का क्या होगा जो केवल विवाहों के अवसर के लिये अपने जीवन दांव पर लगा देता है। उस अवसर का उपयोग वह ऐसा करता है जैसे कि उसे पद्म श्री या पद्मविभूषण  मिलने का कार्यक्रम हो रहा है। बाराती कोई इसलिये बुलाता कि उसे उनसे कोई स्नेह या प्रेम है बल्कि अपने वैभव प्रदर्शन के लिये बुलाता है। यह वैभव प्रदर्शन कुछ लोगों को चिढ़ाता है तो कुछ लोगों को अपने अपराध के लिये उपयुक्त लगता है। ऐसा भी हुआ है कि शादी के लिये रखा गया पूरा सोना चोरी हो गया। सोने से जितना सामान्य आदमी का प्रेम है उतना ही डकैतों, लुटेरों और चोरों को भी है। सौ वैभव प्रदर्शन और चोरी, लूट और डकैती का रिश्ता चलता रहेगा। पहले बैलगाड़ी और घोड़े पर आदमी चलता था तो अपराधी भी उस पर चलते थे। अब वह पेट्रोल से चलने वाले वाहनों का उपयोग कर रहा है तो अपराधी भी वही कर रहे हैं। जो भले आदमी की जरूरत है वही बुरे आदमी का भी सहारा है। सोना तो बस सोना है। हम इन घटनाओं को देखते हुए तो यह कहते है कि भारत आज भी सोने की चिड़िया है।



लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poet-Deepak raj kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर
poet, writer and editor-Deepak 'BharatDeep',Gwalior
‘दीपक भारतदीप की हिन्दी-पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका

४.दीपकबापू कहिन
५,हिन्दी पत्रिका
६,ईपत्रिका
७.जागरण पत्रिका

समस्त ब्लॉग/पत्रिका का संकलन यहाँ पढ़ें-

पाठकों ने सतत अपनी टिप्पणियों में यह बात लिखी है कि आपके अनेक पत्रिका/ब्लॉग हैं, इसलिए आपका नया पाठ ढूँढने में कठिनाई होती है. उनकी परेशानी को दृष्टिगत रखते हुए इस लेखक द्वारा अपने समस्त ब्लॉग/पत्रिकाओं का एक निजी संग्रहक बनाया गया है हिंद केसरी पत्रिका. अत: नियमित पाठक चाहें तो इस ब्लॉग संग्रहक का पता नोट कर लें. यहाँ नए पाठ वाला ब्लॉग सबसे ऊपर दिखाई देगा. इसके अलावा समस्त ब्लॉग/पत्रिका यहाँ एक साथ दिखाई देंगी.
दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका


हिंदी मित्र पत्रिका

यह ब्लाग/पत्रिका हिंदी मित्र पत्रिका अनेक ब्लाग का संकलक/संग्रहक है। जिन पाठकों को एक साथ अनेक विषयों पर पढ़ने की इच्छा है, वह यहां क्लिक करें। इसके अलावा जिन मित्रों को अपने ब्लाग यहां दिखाने हैं वह अपने ब्लाग यहां जोड़ सकते हैं। लेखक संपादक दीपक भारतदीप, ग्वालियर

संबद्ध विशिष्ट पत्रिकायें

लोकप्रिय पत्रिकाएँ

वर्डप्रेस की संबद्ध अन्य पत्रिकायें