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30 अगस्त 2014

युवा कंधे-हिन्दी कविता(yuva kandhe-hindi poem)




युवा कंधे अपने ऊपर
भविष्य के सपनों का
बोझ उठाये हैं।

फिसल गयी उम्र जिनकी
अपनी नाकाम जिंदगी  के आसरे
उन्हीं के दम पर जुटाये हैं।

नौनिहालों का लगा दिया
आकाश में उड़ने के
सपने देखनें में
स्वयं अपनी जिंदगी के पल
मौजमस्ती में लुंटाये हैं।

कहें दीपक बापू मार्गदर्शन का अभाव
हर पीढ़ी में दिखता
सभी बचते  परिवर्तन के युद्ध से
सौंपते हथियार नये योद्धा के हाथ
देकर बहादुरी दिखाने का संदेश
भले ही हवाओं के डर से भी
हमेशा अपना मुंह छुपाये हैं।
---------

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

22 अगस्त 2014

सांई भगवान के दर्शन में आम और विशिष्ट भक्त-हिन्दी व्यंग्य चिंत्तन(sai bhagwan ke darshan mein aam aur vishisht bhakt)



    
      सांई बाबा के मंदिर में आम और विशिष्ट दर्शकों के वर्ग बन गये हैं।  जो दर्शक तीन सौ रुपये देंगे उन्हें आमजनों की तरह पंक्ति में नहीं लगना पड़ेगा और वह विशिष्ट भक्त होकर सांई के निकट जा सकेंगे।  सांई बाबा के स्थाई सेवक इसके पीछे दो तर्क दे रहे हैं-एक तो यह कि इससे प्राप्त आमदनी से मंदिर का रखरखाव होगा दूसरा यह कि इससे भीड़ पर नियंत्रण रखने में सुविधा होगी। दोनों ही तर्क समझ से परे हैं।  आमदनी से मंदिर के रखरखाव का जवाब यह है कि वहां चढ़ाव इतना आता रहा है कि सामान्य मंदिर अब भव्य बन गया है। दूसरी बात यह है कि सांईबाबा के अनेक शहरों में मंदिर हैं और वह चढ़ावे से ही चल रहे हैं।  कई भक्त अगर पैसा नहीं डालते तो कई सांई बाबा के चमत्कार का लाभ मिलने पर बहुत सारा धन दे ही देते हैं।  भीड़ नियंत्रण की बात हास्यास्पद ही है। इससे आमजनों की पंक्ति को बीच बीच में व्यवधान झेलना पड़ेगा।
      हम सांई बाबा के स्थाई सेवकों के फैसले का विरोध नहीं कर रहे। हम तो यह सलाह देंगे कि वह आम भक्तों से भी सौ रुपया लेने लगें।  इससे भीड़ कम हो जायेगी और आय भी बढ़ेगी।  मगर वह कभी नहीं मानेंगे।  वजह यही है कि यही फोकटिया भक्तों की भीड़ ही सांईबाबा की प्रचलित भक्ति की शक्ति है।  अगर आमजन कम हो गये तो विशिष्ट भक्त भी कम हो जायेंगे। हमारे यहां दिखावे की भक्ति कम नहीं है।  विशिष्ट भक्त दिखने की चाह कुछ ऐसे लोगों में ज्यादा होती है जो भक्ति कम अपनी शक्ति ज्यादा दिखाना चाहते हैं।  दौलत, शौहरत और ऊंचे ओहदे वालों को इस बात से चैन नहीं मिलता कि उनके पास शक्ति है। वह उसका भौतिक सत्यापन चाहते हैं और यह केवल भीड़ में अकेले चमकने से ही मिलता है।  वैसे तो हमारे यहां दक्षिण के एक दो मंदिर में भी यह पंरपरा रही है कि पैसा देकर विशिष्टता के साथ भगवान की मूर्ति के दर्शन किये जायें पर सांईबाबा मंदिर में इस तरह की नयी परंपरा थोड़ा चौंकाने वाली है।
      अभी हाल ही में एक महान ज्ञानी ने सांईबाबा को भगवान मानने को चुनौती दी थी।  इस पर लंबी बहस चली। निष्कर्ष न निकलना था न निकला। अलबत्ता इस बहस के बीच में विज्ञापन की धारा खूब चलती दिखाई।  हम जैसे योग तथा अध्यात्म साधकों के लिये ऐसी बहसों में कुछ नहीं होता और न ही पैसा देकर दर्शन करने के निर्णयों से कोई परेशानी होती है।  समस्या हम जैसे लोगों के साथ यह है कि भारतीय अध्यात्म ग्रंथों में कही गयी बातों को तोड़मरोड़ कर पेश करने पर थोड़ी निराशा होती है जो कि कुछ न कुल बोलने या लिखने को प्रेरित करती है।
      अगर हम श्रीमद्भागवत गीता का अध्ययन करें तो योग, तप और ध्यान एकांत में किये जाने वाली क्रियायें हैं और परमात्मा से आत्मा का संयोग न केवल वाणी वरन् समस्त इंद्रियों के  मौन से ही संभव है।  निष्काम तथा निराकार भक्ति का श्रेष्ठ रूप एकांत में ही दिख सकता है। भारतीय अध्यात्मिक ग्रंथ इस बात को मानते हैं पर साथ ही सकाम तथा भक्ति को भी स्वीकार करते है। सकाम तथा साकार भक्ति की आस्था का प्रवाह बाहर रहता है और धर्म के ठेकेदार इसी में अपने हाथ धोते हैं।
      सकाम तथा साकार भक्ति को इसलिये मान्य किया गया है क्योंकि सभी लोग एकांतवास का आनंद नहीं उठा सकते। श्रीमद्भागवत गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने इसे स्वीकार किया है कि हजार में कोई एक मुझे भजता है और उनमें भी हजार में से एक मुझे प्राप्त करता है।  उन्होंने संकेतों में सकाम भक्ति का रूप भी बताया है और यह माना कि अंततः वह भी वास्तव में उनके ही भक्त हैं।  इसका मतलब सीधा यह है कि श्रीमद्भागवत गीता के साधकों को कभी दूसरे की भक्ति पर आक्षेप नहीं करना चाहिये।  जो लोग श्रीमद्भागवत गीता में आस्था रखने का दावा करते हुए दूसरे की भक्ति पर आक्षेप करते हैं तो इसका आशय यह है कि वह कहीं न कहीं अज्ञान के अंधेरे में हैं।
      सकाम भक्ति का भाव बाहर आकर्षित रहता है यही कारण है कि मूर्तियों में भी भगवान का रुप देखा जाता है। दरअसल हमारा मन चंचल है। वह आकर्षण ढूंढता है और भगवान की मूर्तियां दिखने में आकर्षक होती है इसलिये वह मन का मोह लेती है। इस तरह भक्त का भाव मनोरंजन, आस्था तथा श्रद्धा की त्रिवेणी में नहा लेता है।  हमारे यहां रामलीला तथा कृष्ण रास के प्रदर्शन की परंपरा रही है। उनमें यह तीनों तत्व प्रवाहित रहे थे।  यह अलग बात है कि उनके कलाकार सीधे कभी दर्शकों से धन नहीं मांगते बल्कि आयोजक श्रद्धालू उनको दान दक्षिण देकर तृप्त कर देते हैं।
      सांईबाबा की मूतियों के दर्शन की धारा में भी यह तीन तत्व प्रवाहित हैं।  ऐसे में हम मनोरंजन तत्व का विचार आता हैं। जिस तरह सिनेमाघरों में दर्शकों के वर्ग होते हैं उसी तरह अब भगवान के दर्शन में भी बन रहे हैं तो इसके पीछे यही तत्व माना जा सकता है। हमें याद आ रहे हैं वह दिन जब हम फिल्में बॉलकनी का टिकट स्टूडेंट कंसेशन में लेकर देखते थे।  इतना ही नहीं मध्यांतर में भी हम बॉलकनी की ही कैंटीन में चाय पीते थे।  नीचे फर्स्ट या थर्ड क्लास वाली कैंटीन में जाने की सोचना भी उस समय स्तरहीनता लगती थी। कभी वह टिकट नहीं मिला तो नीचे भी फिल्म देखी पर जब ऊपर देखते थे तो मन में अहंकार आ ही जाता था।  उस समय हम उन दोस्तों पर अपना रौब झाड़ते थे जो इस सुविधा का लाभ उठाने योग्य नहीं थे-मतलब यह महाविद्यालयीन शिक्षा से परे थे।
      अब अंतर्जाल पर अध्यात्मिक साधना करते हुए इस अहंकार को पहचान लिया है।  इसलिये कहीं भी विशिष्ट व्यवहार मिले तो भी उसका प्रभाव हम पर नहीं पड़ता।  अलबत्ता गुण और कर्म विभाग के अध्ययन से हमें इस संसार और यहां के जीवों का व्यवहार समझ में आ गया है।  विशिष्ट भक्त, दर्शक या सहायक बनने का अवसर मिलने पर लोग फूल जाते हैं पर अंततः उनको नीचे उतरना ही पड़ता है। यह अलग बात है कि ऊंचाई पर जब वह रहते हैं तब लोग उनको बेचारगी के भाव से देखते हैं।  सांई बाबा के आम भक्तों के सामने भी यह भाव तब दिखाई देगा जब वह विशिष्ट भक्तों को अपने से प्रथक होकर दर्शक करते देखेंगे।


दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

7 अगस्त 2014

योग तो सभी करते ही हैं-श्रीमद्भागवतगीता पर विशेष लेख(special hindi article on shrimadbhagwat geeta in hindi)




      श्रीमद्भागवत गीता की चर्चा बहुत होती है पर इसके ज्ञान की समझ और फिर उसकी बताई राह पर चलने वाले कितने हैं इस पर कोई विचार नहीं करता। अभी हमने टीवी चैनलों और समाचार पत्रों में श्रीमद्भागवत गीता पर बहुत चर्चा देखी और सुनी।  एक माननीय न्यायाधीश ने श्रीमद्भागवत गीता के विषय को शैक्षणिक पाठ्यक्रम में सम्मिलित करने का सुझाव दिया।  उस पर देश में कोहराम मच गया है।  इस बहस में कुछ सवाल ऐसे उठे जिन पर हंसी आई तो कुछ जवाब ऐसे आये जिन पर आश्चर्य हुआ। जैसा कि हम जानते हैं कि टीवी चैनलों और समाचार पत्रों में केवल प्रायोजित तथा धनिकों से सम्मानित बुद्धिजीवियों की बात को ही महत्व मिलता है।  अंतर्जाल पर हम जैसे असंगठित, मौलिक तथा फोकटिया लेखकों का अपने पैसे खर्च कर भड़ास निकालने का अवसर मिलता है यही कम नहीं है मगर पंरपरागत प्रचार माध्यमों में आये विद्वान नाम के साथ नामा पाने के लिये कृत्रिम भड़ास से सजे हुए आते हैं। इस तरह की बहसों में एक बात मुख्य रूप से मानी गयी कि यह केवल हिन्दूओं का ही  ग्रंथ है।
      हम जैसे योग तथा ज्ञान साधकों के लिये श्रीमद्भागवत गीता का महत्व इतना है कि वह इसके शब्दों के शाब्दिक, लाक्षणिक तथा व्यंजनात्मक तीनों विधाओं के अर्थ को न केवल सहजता से समझते हैं वरन् उसे आत्मसात करने का प्रयास भी करते हैं।  कम से कम यह लेखक तो यह अनुभव करता है कि श्रीमद्भागवत गीता के संदेशों को लेकर लोग इतने गंभीर नहीं लगते जितनी इसकी पवित्रता को स्वीकार करने के पाखंड में व्यस्त हैं।
      जिन लोगों ने श्रीमद्भागवत गीता को आत्मसात किया है या प्रयास कर रहे हैं वह जानते हैं कि श्रीमद्भागवत गीता जीवन जीने की वैसी ही कला है जैसी कि योग साधना को माना जाता है।  पतंजलि योग सूत्र के रूप में हमारे पास देह, मन और विचारों के विकार निकालने की विद्या है।  अगर कोई सांसरिक विषयों से संपर्क न रखकर पूर्ण सन्यासी जीवन बिताये तो पतंजलि योग उसके लिये महान विज्ञान है। श्रीमद्भागवत गीता में यह बताया जाता है कि सांसरिक विषयों के साथ जुड़कर भी सहज भाव से जीवन जी सकते हैं। कहा जाता है कि  श्रीमद्भागवत गीता में वेदों का पूर्ण सार है। ठीक उसी तरह पतंजलि योग के भी सूत्रों का सार उसमें हैं।  श्रीमद्भागवत गीता कुछ सिखाती नहीं है वरन्  सांसरिक विषयों का सच बताती है।  यह विश्व का अकेला ऐसा  ग्रंथ है जिसमें ज्ञान के साथ विज्ञान भी है।  इस लेखक की मान्यता यह है कि इस संसार में योग जाने अनजाने हर व्यक्ति कर रहा है।  कुछ लोग अज्ञान के अभाव में सांसरिक विषयों का सत्य मानकर उनसे जुड़ते हैं। यह जुड़ना योग ही है पर उससे इंसान असहज होता है।  जहां विषय आकर्षित कर मनुष्य को अपने साथ संयोग कराते हैं वह वह विवश होता है पर योग का ज्ञान रखने वाले अपनी आवश्यकता के अनुसार चलते हैं।  वह विषयों से जुड़ते हैं फिर अपन मन वहां से हटा लेते हैं।  इसके विपरीत अज्ञानी मनुष्य विषयों का बोझ उठाये सारी जिंदगी रोते हुए गुजारते हैं।  श्रीमद्भागवत गीता पर चलने वाले सहज योग के पथ पर चलते हैं और जो नहीं समझते वह असहज पथ पर चल ही रहे हैं।
      श्रीमद्भागवत गीता की विषय सामग्री को पढ़ने और पढ़ाने से अधिक समझने की आवश्यकता है। ज्ञानी इस बात को जानते हैं कि इस संसार में असहज पथ पर चलने वाले लोगों को ज्ञान देना कठिन है और जो सहज हैं उन्हें उसकी आवश्यकता ही नहीं है। दूसरे को तो तब सुधारें जब स्वयं सिद्धि प्राप्त कर लें मगर श्रीमद्भागवत गीता के रम जाने पर होता यह है कि जितनी बार उसे पढ़ो लगता है कि नित्य कोई नयी बात निकल रही है।  एक बात तय रही जिसने श्रीमद्भागवत गीता को आत्मसात कर लिया वह कभी प्रचार नहीं करेगा।  इसका पहले हमें अनुमान नहीं था पर जैसे जैसे प्रचार माध्यमों में चर्चा देखते हैं तो इस देश में श्रीमद्भागवत के महत्व का जिस तरह बखान होता है तब यह लेखक उन लोगों को देखना चाहता है जिन्हें सिद्धहस्त कहा जा सके। अभी तक यह लक्ष्य नहीं प्राप्त हो सका। छोटे शहर का  होने का कारण इस देश में कला, धर्म, साहित्य, पत्रकारित तथा अन्य विषयों का मार्ग दर्शन करने वाले बड़े शहरों जैसे विद्वानों का दर्जा इस लेखक को मिलना संभव नहीं है यह बात निराशा पैदा करने वाली लगती है पर श्रीमद्भागवत गीता का ऐसा प्रभाव है कि यही बात आत्मविश्वास पैदा भी करती है कि किसी प्रकार भौतिक उपलब्धि न होने की संभावना अध्यात्मिक साधना की सच्ची प्रेरणा बनती है।  इस विषय पर लेखक ने पहले भी अपने ब्लॉग पर लिखा है।  आगे भी लिखेंगे।
दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

30 जुलाई 2014

रिश्ते का कत्ल-हिन्दी कविता (ristey ka katla-hindi poem)



पल भर की खुशी के लिये
आदमी उछलता है आसमान में
लंबे समय के गम बुलाता है,

पतंगे की तरह चुनता है रौशनी
करता है अपनी देह भस्म
आंखें बंद होने से पहले अक्ल को सुलाता है।

दिल की चाहत पूरी करने के लिये
भागता है इधर से उधर
रुह को रुलाता है।

कहें दीपक बापू रिश्ते का कत्ल
करने पर आमादा होता जब इंसान
दूसरे की अच्छाई में कसूर देखने से
पहले अपनी असलियत को भुलाता है।
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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

21 जुलाई 2014

बेईमान का आदर्श-हिन्दी व्यंग्य कविता(beiman ka adarsha-hindi satire poem)



पैसे की भूख में इंसान
दिल के जज़्बातों से नीयत चुराकर
नालायकी से हाथ मिला देता है।

दूसरे की भूख मिटाने के लिये
जिस हाथ से बनाता खाना
उसी से कंकड़ मिला देता है।

अपनी जिम्मेदारी के लिये
थामे है जिस हाथ में कलम
वही रिश्वत से मिला देता है।

कहें दीपक बापू अपने हाथ में
आदर्श का झंडा उठाये है हर इंसान
मौका पड़ते ही बेईमानी से मिला देता है।
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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

12 मार्च 2014

न सतयुग था न कलियुग है-हिन्दी व्यंग्य कविता(n satyug tha n kaliyug hai-hindi vyangya kavita)



दूसरों के दर्द दिखाकर अपनी छवि महान इंसान  जैसी बनाते है,
कुछ लोग चढ़ जाते तख्त पर तब वादों की जगह दावे जताते हैं,
बेबस आदमी को बंदर की तरह कुछ लोग नचा रहे हैं,
राजरोग के शिकार खाने से परहेज पर मजे से पैसा पचा रहे हैं,
इंसानों के भीड़ उनके लिये कामयाबी का सबूत है,
आदर्शवाद की बात करते है वही जिनकी पाखंड से भरी करतूत हैं,
होठों  पर लाते मासूम मुस्कराहट मन में छिपी मतलबपरस्ती,
झौंपड़ियों में  एक बार करें गरीब की आरती पाते महल की मस्ती,
कहें दीपक बापू सच यह है न कभी सतयुग था न अब कलियुग है
कुछ ही इंसानों में फरिश्ते जैसे होते गुण वरना पशु ही पाये जाते हैं।
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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poet-Deepak raj kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर
poet, writer and editor-Deepak 'BharatDeep',Gwalior
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6 मार्च 2014

ख्वाब देखने की आदत-हिन्दी व्यंग्य कविता(khawab dekhne ke aadat-hindi vyangya kavita)



कभी उदास कभी मुस्कराती है जिंदगी
एक पल दर्द है दूसरे पल ही
खुशी मुस्कराती चली आती है,
समय ठहरता नहीं है
फिर भी खुशनुमा पलों के रुकने की
ख्वाहिश मन को सताती है।
कहें दीपक बापू
लोग चाल बदलते हैं अपने मतलब के लिये,
अंधेरों के हमदर्द  बाद में बनते हैं
पहले अपने घर के रौशन कर दिये,
धोखा देना आसान है इस दुनियां में
करता है जब ज़माना पत्थरों पर आस,
कमाने की चाहत वालों से वफादारी की उम्मीद बेकार
दलालें का देवता न सोना होता न देवी होती घास,
मुसीबत से लड़ने फरिश्ते आकाश से नहीं आते
सच्चाई से मुंह फेर कर
ख्वाब देखने की आदत इंसान को सताती है।
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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
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28 फ़रवरी 2014

अंधी चाहत में इंसान की हर रग-हिन्दी व्यंग्य कविता(andhi chahat mein insan ki har)



 कहना कठिन हो गया कौन कारोबारी और कौन ठग है,
लोगों की नज़रों में दौलतमंद शख्स ही  हीरे का नग है।
कायदा हो गया यह धोखे से आये या वफा से पैसा आना चाहिये,
खाली जेब तफरी करने की मजबूरी किसी को  न बताईये,
पर्दे पर चमकते देखे हैं हमने कई सितारे अप्सराओं के साथ,
संभालते थे लोगों का खजाना चोरी करते पकड़े गये वही हाथ,
रोटी से पेट भरता है मगर दौलत की भूख किसी की मिटी नहीं,
खौफनाक रास्ते पर चलते ठिठककर रुके जब भद्द पिटी कहीं,
कहें दीपक बापू ईमानदार और बेईमानी की पहचान कठिन हुई
दुनियां जीतने की अंधी चाहत में फंस गयी इंसान की हर रग है।
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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
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14 फ़रवरी 2014

विदुर नीति-भौतिक पदार्थ अंततः नष्ट होते ही हैं(bhautik padarth nasht hote hee hain-vidur neeti)



      इस संसार में जो प्रत्यक्ष रूप से भौतिक पदार्थ दिख रहे हैं वह सभी नष्टप्राय है, यह ज्ञान रखने वाला ही सच्चा ज्ञानी है। यह ठीक है कि जीवन में सुविधा प्रदान करने वाले भौतिक पदार्थों का उपयोग करना कोई बुरी बात नहीं है पर उन पर पूरी तरह निर्भर होना घातक भी होता है।  आजकल वातानुकुल यंत्र, कार, शीतयंत्र, कंप्यूटर तथा टीवी जैसी सुविधाओं का उपयोग जमकर हो रहा है। इनके उपयोग से मनुष्य की दैहिक तथा मानसिक क्षमता पर बुरा प्रभाव पड़ रहा है उसके प्रति स्वास्थ्य विशेषज्ञ चेतावनियां देते आ रहे हैं।  सबसे बड़ी बात यह है कि इन वस्तुओं का उपयोग करना ही लोगों ने सुख मान लिया है। इस कारण अध्यात्मिक ज्ञान के प्रति रुचि के अभाव के कारण समाज में भौतिक पदार्थों के उपयोग से मानसिक तनाव बढ़ रहा है। दूसरी बात यह है कभी न कभी इन आधुनिक यंत्रों को खराब होना ही है तब लोग ऐसा अनुभव करते हैं जैसे कि उनका जीवन दूभर हो गया है।
      जब तक कार चलती है अच्छा लगता है पर जब खराब होती है तब मैकनिक के पास जाना एक संकट लगता है। उसी तरह जब फ्रिज खराब हो तो जब तक वह बन न जाये या दूसरा विकल्प के रूप में स्थापित न हो तब तब भारी असुविधा लगती है। कंप्युटर कीटाणुओं का शिकार बन जाये तो तब जीवन खाली लगता है जब उसको फारमेट न कराया जाये। जब इनका उपयोग हम करते हैं तो देह के लिये संकट खड़ा करते है और जब खराब हों तो मानसिक तनाव घेर लेता है।

विदुर नीति में कहा गया है कि
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तत्वज्ञ सर्वभूतानां योगज्ञः सर्वकर्मणाम्।
उपायज्ञो मनुष्याणां नरः पण्डित उच्यते
     हिन्दी में भावार्थ-जो समस्त भौतिक पदार्थों की वास्तविकता का ज्ञान, कार्य करने का तरीका तथा मनुष्यों में सबसे ज्यादा उपाय जानता है वही पण्डित कहलाता है।
न हृध्यत्यात्मसम्माने नावमानेन तप्यते।
गाङ्गो हृद इवाक्षोभ्यो यः स पण्डित उच्चयते।
     हिन्दी में भावार्थ-सम्मान मिलने पर जो गर्व नहीं करता, न ही अनादर होने पर संतप्त होता है तथा गंगा जी के समान जिसके चित्त में कभी क्षोभ नहीं होता वही पण्डित कहलाता है।

      कहने का अभिप्राय यह है कि इन भौतिक पदार्थों के मोहजाल में पड़ना अत्यंत ही मूर्खता है।  इससे विवेक शक्ति नष्ट होती है।  जो लोग इन पदार्थों का उपयोग तो करते हैं पर अपना सर्वस्व इनको नहीं सौपते वही ज्ञानी और पंडित कहे जा सकते हैं। एक बात तय है कि मनुष्य से बड़ी आयु इन भौतिक पदार्थों की नहीं होती और समय आने पर इनका साथ छूटता ही है। दूसरी बात यह कि इनका उपयोग सीमित रूप से ही किया जाये तभी सेहत बनी रहती है। यह ज्ञान रखने वालों को ही बुद्धिमान कहा जा सकता है।

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7 फ़रवरी 2014

गंभीर हमदर्द-हिन्दी व्यंग्य कविता(gambhir hamdard-hindi vyangya kavita)



टीवी के पर्दे पर रोज एक नया मुद्दा बहस के लिये आता है,
हर पेशेवर विद्वान अपने तर्क गंभीरता से भरे  बताता है,
कहें दीपक बापू जितने गंभीर वह लोग हो जाते हैं,
हमारे मन में उठती हंसी कि बेहाल हो जाते हैं,
किसी का बयान बहुत सनसनीखेज चर्चा करने वाले बताते,
देश पर भारी खतरा है यह सभी मनोयोग से गाते।
लोकतंत्र का कारवां तमाशों के सहारेजोर  शोर से चल रहा है,
शुक्र करे शब्दों की तसल्ली से वह इंसान जो अभाव में जल रहा है,
गरीबों के हमदर्द बटोर कर चंदा सियारों की तरह झुंड में चलते,
गनीमत है कुछ उदारमना सिंहों की बदौलत भूखों के चूल्हे जलते,
नारे और वादे गाते हुए शिखर पर चढ़े कई गंभीर से दिखते लोग,
घेर लेते है जल्दी ही उनके दिल और दिमाग को राजशाही रोग,
समाज सेवा के पेशे में पाखंडी ही हुनरमंद कहलाता है,
ज़माने के घाव से कमाने वाला हमदर्द मन में मुस्कराता है।

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
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