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5 सितंबर 2015

समाज सेवा के दलाल-हिन्दी कविता(samaj sewa ke dalal-hindi kavita)

आम इंसान की भलाई
अब समाज सेवा के
दलाल करते हैं।

भर दी तिजोरियां
जमा कर ली सोने की बोरियां
किसी की बेबसी पर
 कब मलाल करते हैं।

कहें दीपकबापू दिल के जज़्बात से
कभी जिनका नाता नहीं रहा
संघर्ष का बोझ कभी नहीं सहा
उनसे हमदर्दी की बेकार आशा
गुनाहगारों से लेकर
चाहे जब माल  भरते हैं।
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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

29 अगस्त 2015

ज़माने की बात-हिन्दी कविता(zamane ki baat-hindi poem)

कहीं लोहे की टंकी में
खाने का सामान भरा
कहीं बर्तन खाली है।

कहीं ज़माने के लिये
कुर्बान होने वाले को कहते कातिल
कहीं लोग झूठे वादों
बजाते ताली हैं।

कहें दीपक बापू समंदर में
सीपियां नहीं ढूंढ सकते
 कभी वह लोग
जिन्होंने किनारे पर तैरती
मछली जाल में पा ली है।
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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

24 अगस्त 2015

यह सोचना मूर्खता है-हिन्दी कविता(yah sochna moorkhta hai-hindi poem)


सिंहासन पर बैठकर
कोई इतराये नहीं
यह सोचना मूर्खता है।

आकाश में उड़कर
कोई इतराये नहीं
यह सोचना मूर्खता है।

कहें दीपक बापू नारे और वादों से
बहकने वालो
नक्कार खाने में तूती न बजाओ
कोई तुम्हारी सुनेगा
यह सोचना मूर्खता है।
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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

19 अगस्त 2015

तन्हाई की सोच-हिन्दी कविता(tanhai ki soch-hindi poem)

तन्हाई हमेशा
बुरे सपने की तरह
नहीं सताती है।

अक्ल के दरवाजे खोल कर देखो
भीड़ में शामिल लोगो को भी
तन्हा हो जाने की
चिंता खाती है।

कहें दीपक बापू संबंध का नाम
कोई भी लिख दो
तन्हाई में की गयी सोच
सभी के व्यवहार का
बहीखाता साथ लाती है
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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

13 अगस्त 2015

जंग के दीवाने-हिन्दी कविता(jang ke deewane-hindi poem)

पत्थर के मकान
कभी टूटते नहीं
अलबत्ता लोग दिलों में
अपने घर के हिस्से बांट जाते हैं।

आया सामान सबके लिये
अपना अपना कहकर
छांट जाते हैं।

कहें दीपक बापू जमीन पर
गिरे वह लोग जो हारे
बचे वह भी नहीं जो जीते
कोई बहादुर कोई कमजोर कहलाया
जंग के दीवाने
दिल जरूर बांट जाते हैं।
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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

9 अगस्त 2015

भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान और सांस्कृतिक भिन्नता का समन्वय-हिन्दी चिंत्तन लेख(bharatiya adhyatmik gyan aru sanskritik bhinnata ka samanvay-hindi thought article)

                              ‘हिन्दूशब्द अगर धर्म से जोड़ा जायेगा तो उसका संबंध केवल अध्यात्मिक ज्ञान तक ही सीमित रखना चाहिये। देश में विभिन्न प्रकार की संस्कृतियां और सभ्यतायें हैं और वह ‘‘हिन्दूशब्द के तले एक हैं तो उसका आधार केवल अध्यात्मिक ज्ञान है।  हम अगर हिन्दू शब्द को सभ्यता से जोड़ेंगे तो विश्व गुरु का सम्मान दिलाने वाला अध्यात्मिक ज्ञान का आधार अत्यंत सीमित हो जायेगा।  विदेशी धार्मिक विचाराधारायें अध्यात्म और सांसरिक विषयों को जोड़कर चलती हैं। वह स्वर्ग प्राप्ति का मार्ग सांसरिक विषयों में ही ढूंढती है जबकि भारतीय या हिन्दू अध्यात्मिक विचाराधारायें स्वर्ग को लेकर लालायित नहीं करतीं।  सकाम और साकार भक्ति के प्रवर्तक स्वर्ग की बात करते हैं तो निराकार के साथ ही निष्काम भक्ति वाले उसका अस्तित्व ही नहीं मानते।  भारतीय धर्म का आधार ग्रंथ श्रीमद्भागवत गीता निष्काम भक्ति का संदेश देती है पर सकाम भक्ति पर कोई प्रतिबंध नहीं लगाती। हर प्रकार की भक्ति के प्रति उसमें सापेक्ष भाव है।
                              अपनी बात कहने से पहले हमने भारतीय  अध्यात्म को लेकर हमने अपना रुख स्पष्ट इसलिये क्योंकि  कुछ पेशेवर संतों के विवादास्पद  लेकर अनेक धार्मिक विद्वानों ने अपनी राय जिस तरह रखी उससे सहमत होना संभव नहीं है। पहला प्रतिवाद तो इसी पर है कि संत को ऐसा या वैसा नहीं होना चाहिये।  संत कैसा हो? इसकी कोई स्पष्ट व्याख्या नहीं की जा सकती।  हम जानते हैं कि विभाजन के बाद सिंध और पंजाब से अनेक हिन्दू या भारतीय अध्यात्मिक विचारधारा वाले लोग भारत नामक बने नये देश में आये।  उनकी संस्कृति अलग थी पर अध्यात्मिक विचारधारा के प्रवाह ने उन्हें यहां के लिये प्रेरित किया।  संत को नाचना नहीं चाहिये जबकि सिंधियों के भगवत्रूप संत कंवर तो नाचते और गाते थे।  विभाजन के समय जब वह रेल से भारत आ रहे थे तो आतंकवादियों ने उन्हें घेर लिया। उनसे नाचने गाने को कहा और फिर मार डाला। आज भी सिंधी समाज उनको स्मरण करता है।  संत कंवर जी के  अध्यात्मिक ज्ञान की कभी चर्चा नहीं होती पर उनके भजन आज भी गाये जाते हैं।  उसी तरह पंजाबी संस्कृति भी अत्यंत मुखर है।  गुरुनानक देव जी ने हिन्दू धर्म के अध्यात्मिक ज्ञान की पुर्नस्थापना करने के साथ ही  अंधविश्वासों का जमकर विरोध किया था। इसका सीधा आशय यह है कि उनके मानने वालों का धर्म के नाम पर कर्मकांडों तथा अंधविश्वासों को स्वीकार न करने का अर्थ यह कदापि नहीं होता कि भारतीय अध्यात्मिक विचाराधारा से मोह भंग हो गया है।  गुरुनानक जी तथा सिखों के अन्य गुरु सादगी से जीवन बिताने की की बात कहते थे। पंजाबी संस्कृति मेें उनके अध्यात्म्कि ज्ञान का प्रभाव है पर इसके बावजूद सांसरिक विषयों में भी मुखरता देखी जा सकती है।
                              इसके अलावा भारत के दक्षिण, पूर्व, पश्चिम में भी संस्कृति और संस्कार प्रथक दिखते हैं।  हमने देखा है कि जब धार्मिक विद्वान हिन्दू धर्म की बात करते हैं तो केवल उत्तर तथा मध्य भारत कं संस्कृति संदर्भ उससे जोड़ देते हैं। इससे हिन्दू धर्म को लेकर अनेक संशय पैदा होते हैं।  सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि हमारे अध्यात्मिक ग्रंथोें में साधु या संत के लिये कोई एक रूप तय नहीं है। प्राचीन काल में तपस्वी, मुनि और ऋषियों ने अपना पूरा जीवन हमेशा ही एकांत स्थानों में बिताया जब कि आधुनिक संत हमेशा ही भीड़ में रहकर धर्म का व्यापार करते हैं। दूसरी बात यह कि हिन्दू या भारतीय अध्यात्मिक विचाराधारा ज्ञान के साथ विज्ञान पर भी जोर देती है।  इसलिये रूढ़िवादी तर्क देकर कथित धार्मिक विद्वान भ्रम न ही फैलायें तो अच्छा है।
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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

4 अगस्त 2015

इंसानों की भीड़-हिन्दी कविता(insanon ki bheed-hindi poem)

नारों से समाज में
बदलाव वह कहां से
बदलाव लायेंगे।

सुविधाभोगी समाज
मन के बीमारों में कहां से
ताजगी का भाव लायेंगे।

कहें दीपक बापू झंडा उठाकर
इंसानों की भीड़
हांकते भेड़ के झुंड की तरह
संवेदनाओं के सौदागर
बुझे दिलों के अंदर
कहां से ताव लायेंगे।
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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh


संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

1 अगस्त 2015

फांसी की सजा पर सवाल बवाल और समाज का ताल बेताल-हिन्दी चिंत्तन लेख(fansi ke saja par swatl, bawal aur samaj ka tal betal-hindi thought article)

                               अभी भारत के प्रचार माध्यमों में एक फांसी का प्रकरण इस तरह छाया रहा गोया किसी युद्ध के समाचार हो। एक अपराधी को धारावाहिक बमविस्फोटों तथा सामूहिक हत्याकांड में 22 वर्ष तक जेल में रखने के बाद फांसी की सजा मिली।  कुछ लोग कह रहे हैं कि न्याय में देरी हुई है पर हमारा मानना सब दुरस्त हुआ है। न्यायपालिक पर विलंब का दायित्व डालने वाले जरा उस अपराधी को मिले दोहरे दंड के बारे में सोचें।  उसने अपने जीवन की सर्वश्रेष्ठ आयु सीमा जेल में तिल तिल कर सड़ते हुए गुजारी। अगर फांसी की सजा माफ होकर आजीवन कारावास में बदलती जो संभवत वह रिहा भी हो जाता। मगर नहीं, 22 साल तक अपने अपराध का बोझ वह कारावास में गुजारता रहा फिर पाई मौत।  यह दोहरा दंड है इस पर अफसोस करने वाले नहीं जानते सारी सुविधायें मिल जायें तो भी स्वतंत्रता पूर्वक विचरण में रुकावट आदमी के मन को सबसे ज्यादा त्रास देती है। भारतीय न्याय तथा प्रशासनिक व्यवस्था पर दोष ढूंढने की बजाय उसमें गुण भी ढूंढने चाहिये।

                              फांसी के धारावाहिक प्रसारण पर प्रचार माध्यमों ने विज्ञापन की राशि कितनी कमाई होगी पता नहीं।  फांसी प्राप्त अपराधी की प्रचार माध्यमों में खलनायक की छवि बनाकर पेश करना सहज है वह जानता था।  इसलिये फांसी की सजा से  एक दिन पहले उसने अपने पास खड़े प्रहरी से कहा मेरी फांसी का राजनीतिक उपयोग हुआ।
                              उसे जाकर कौन बताता कि उसकी फांसी का राजनीतिक से अधिक व्यवसायिक उपयोग हुआ। सच बात तो यह है कि उसका अपराध ऐसा था कि नैतिक आधार खत्म हो गया था वरना वह इन प्रचार माध्यमों से अपने नाम के सहारे कमाई करने के एवज में पैसा भी मांग सकता था।
                              राह चलते हुए एक आदमी को हमने यह कहते सुना कि कल फांसी प्रकरण के प्रसारण से टीवी समाचार चैनलों ने बोर कर दिया। दूसरी कोई खबर ही नहीं सुना रहे थे।
                              दूसरे ने कहा कि हमने तो अब हिन्दी समाचार चैनल देखना ही कम कर दिया है।  सभी अपने विज्ञापन देने वालों की खबरे चला रहे हें। किसी को देश से कोई मतलब नहीं है।
                              हम पहले से प्रचार माध्यमों के बारे में यह कहते आ रहे हैं कि वह दर्शकों की चिंता नहीं करते। वह जितने दर्शक जुटा रहे हैं उनकी संख्या होने पर भी  आबादी की दृष्टि से बृहद इस देश में स्तर से कम भी हो सकती है।  आजकल हम देख रहे हैं कोई भी अब टीवी समाचार से स्थापित किसी मुद्दे पर उस तरह सार्वजनिक चर्चा पहले के मुकाबले कम ही होती जा रही है। अनेक पुराने समाचार पढ़ने और सुनने वाले नशेड़ी इन प्रचार माध्यमों से निराश हो गये है।
                              प्रगतिशील और जनवादी बुद्धिजीवियों के प्रभाव में प्रचार माध्यमों के पेशेवर कर्मी अभी भी चल रहे हैं।  धर्म, जाति, भाषा तथा क्षेत्र के विषय में उन परंपरागत सिद्धंातों अभी हमारे प्रचार तथा विचार विमर्श की र्शैली मुक्त नहंी हो पायी जो बोरियत पैदा करती है।  एक व्यक्ति को उकसाती है दूसरे का डराती है। सामाजिक द्वंद्वों के बीच समाचार तथा बहसों का चुनाव व्यवसायिकता के लिये ठीक है पर जब अपनी निष्कर्म भाव की सक्रियता से समाज में एक परिवर्तन लाने की इच्छा हो तब सबसे पहले परंपरागत धारा से स्वयं को बाहर लाना चाहिये।
                               विज्ञापन से चलने वाले इन हिन्दी समाचार चैनलों से निष्काम भाव की आशा करना तो व्यर्थ ही है इसलिये परंपरागत प्रचार और विचारधारा के साथ उनका साथ रहेगा।  मगर यह भी सच यह है कि अभिव्यक्ति की प्रगतिशील और जनवादी शैली अब बोरियत पैदा करने वाली हो गयी है। इससे प्रथक होकर एक स्वतंत्र आक्रामक शैली होने पर ही प्रचारक और विचारक की छवि अब समाज में बन सकती है पर सवाल यह है कि अकुशल प्रबंध के शिकार इन व्यवसायिक प्रचार घरानों से नये प्रयोग की आशा नहीं की जा सकती।
                              सभ्य समाज में क्या फांसी की सजा होना चाहिये? जवाब यह है कि अगर फांसी की सजा नहीं होगी तो कुछ सुविधा भोगी लोग इसका विरोधकर अपनी छवि नहीं बना पायेंगे।      हमारे देश के हिन्दल प्रचार माध्यमों में कार्यरत पेशेवर विद्वान  सामान्य जन से प्रथक सभ्य दिखने के लिये फासीवाद के विरोध का आश्रय नहीं ले पायेंगे।
                              सभ्य समाज में क्या फांसी की सजा जरूरी है? जवाब यह कि समाज को सभ्य रखने के लिये फांसी की सजा जरूरी है।

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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh


संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

28 जुलाई 2015

सिंध प्रांत पाकिस्तान के हाथ से निकालने का अभियान चलायें(sindh provinces pakistan ke hath se niklane ka abhiyan chalayen)

                              गुरदासपुर में हमले से भारत में भारी नाराजगी का वातावरण है अनेक सामरिक विशेषज्ञ मानते हैं कि पाकिस्तान का सिंध प्रांत ऐसा है जहां अगर सही रणनीति अपनायी जाये तो भारत उस पर नियंत्रण कर सकता है। पाकिस्तान के सिंधी भाषी मूलतः वहां के पंजाबी भाषियों से सांस्कृतिक दृष्टि से एकरूप हैं पर दोनों के बीच भारी वैमनस्य है। इसका कारण यह है कि पंजाब चूंकि हिमालय के निकट इसलिये वहां से नदियां बहकर सिंध जाती हैं।  पंजाब में उनके जल का इतना दोहन हो जाता है कि सिंध पहंुचते पहुंचते उनमें जल कम रह जाता है। दूसरी बात यह कि प्रभावशाली पंजाबियों ने पाकिस्तान तो ले लिया पर लाहौर से अधिक कराची में भारत से गये उर्दू भाषियों को बसाकर वहां सिंधियों के लिये एक नया विरोधी समुदाय स्थापित किया।  इतना ही नहीं भारत से गये जितने भी अपराधी हैं वह सब कराची में जाकर रहते हैं। कभी लाहौर या मुल्तान में उनका निवास नहीं सुना जाता।
                              आज भी प्रभावशाली पंजाबी समुदाय सिंध, ब्लूचिस्तान और सीमा प्रांत को अपने अनुचर की तरह मानता है।  हम कहते हैं जरूर है कि भारत में कोई स्वयं को पहले भारतीय नहीं मानता पर सच यह है कि भारत शब्द इतना प्राचीन है कि जनमानस में इस कदर बसा है कि उसे स्वयं को भारतीय कहने की आवश्यकता नहीं है। पाकिस्तान की स्थिति अलग हैं।  वहां के जनमानस में भारत शब्द से घृणा भरी गयी है। समस्या यह है कि पाकिस्तान के प्रति वहां कोई वफादार बन नहीं सकता।  ऐसे में पाकिस्तान मानसिक रूप से भी एक विघटित राष्ट्र है।
                              हमारे भारत के रणनीतिकारों को चाहिये कि वह सिंध में पाकिस्तान के विरुद्ध चल रहे आंदोलनों को जीवंत करें। वहां जियो सिंध आंदोलन चलता रहा है जिसके शीर्ष नेता हमेशा भारत की तरफ सहायता के लिये ताकते रहे हैं।  अगर सिंध पाकिस्तान के लिये समस्या बना तो वह आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक रूप से लड़खड़ा जायेगा।
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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh


संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

25 जुलाई 2015

अध्यात्मिक दृढ़ता के अभाव में मनुष्य टूटता ही है-हिन्दी चिंत्तन लेख(adhyatmik dridhta ke abhav mein tootta hee hai-hindi thought article)


                     कभी भारतीय लोग अपने परिश्रम, लगन तथा धार्मिक दृढ़ता की वजह से पूरे विश्व में जाने जाते थे पर अब स्थिति बदल गयी है हमारे देश में सामाजिक, आर्थिक तथा वैचारिक संस्थाओं की प्रमाणिक सक्रियता के अभाव में आत्महत्या करने वालों की संख्या बढ़ रही है।  आज से लगभग बीस वर्ष पूर्व जब पश्चिमी जगत में आत्महत्या करने की अधिक घटनाओं के बारे में पढ़ते थे तो आश्चर्य होता था। इस लेखक ने एक  समाचार पत्र में संपादक के नाम पत्र में लिखा था कि भारत में अध्यात्मिक रूप से परिपक्वता है इसलिये यहां जापान की तर हाराकिरी की परंपरा कभी नहीं बन पायी।  अब भारत में आत्महत्या का वह दौर चल रहा है जिसकी कल्पना कभी की नहीं जा सकती थी।  अब हमारे देश का समाज आर्थिक, सामाजिक तथा सांस्कृतिक रूप ये पाश्चात्य रंग में डूब चुका है तब उसमें वहां के गुणों के साथ दोषों का आना भी स्वाभाविक है।
                              कथित विकास के चलते जहां बौद्धिक तीव्रता का गुण आने की बात कही जाती है पर उसमें उपभोग के विषय की प्रधानता है और चिंत्तन का नितांत अभाव दिखता है। किसी नयी चीज का उपभोग करने की प्रवृत्ति तो बढ़ी है पर चरित्र निर्माण का विचार तक किसी को नहीं आता।  बाहर चक्षु नये नये सामान तलाश रहे हैं पर अंतर्मन में खालीपन रहता है। भीड़ में लोग अकेले हैं।  अपने दैहिक सामर्थ्य दिखाने की सभी को ललक है पर मानसिक शक्ति का अभाव दिखता है।  भौतिकता से निंरतर योग और अध्यात्म से वियोग किसी को ज्यादा समय तक जीवन में खड़ा नहीं रहने देता। यही अंतिम सत्य है कि अध्यात्मिक दृढ़ता के अभाव में मनुष्य टूटता ही है।
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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

19 जुलाई 2015

भजन या सत्संग से मिले अमृत से ही तनाव के विष से मुक्ति-हिन्दी चिंत्तन लेख(BHAJAN YA SATSANG SE MILE AMRIT SE MUKTI-HINDI THOUGHT ARTICLE)


                              अंग्रेजी संस्कारों ने हमारे देश में रविवार को सामान्य अवकाश का दिन बना दिया है। रविवार के दिन सुबह भजन या अध्यात्मिक सत्संग प्रसारित करने वाले टीवी चैनल खोलकर देखें तो वास्तव में शांति मिलती है। चैनल ढूंढने  के लिये रिमोट दबाते समय अगर कोई समाचार चैनल लग जाये तो दिमाग में तनाव आने लगता है-उसमें वही भयानक खबरें चलती हैं जो एक दिन पहले दिख चुकी हैं- और जब तक मनपसंद चैनल तक पहुंचे तक वह बना ही रहता है।  बाद में भजन या सत्संग के आनंद से मिले अमृत पर ही उस तनाव का निवारण हो पता है।
                              वैसे तो भारतीय अध्यात्मिक दर्शन के अनुसार सभी दिन हरि के माने जाते हैं पर अंग्रेजों ने गुलामी से मुक्ति देते समय शिक्षा, राजकीय प्रबंध व्यवस्था तथा रहन सहन के साथ ही भक्ति में भी अपने सिद्धांत सौंपे जिसे हमारे सुविधाभोगी शिखर पुरुषों से सहजता से स्वीकार कर लिय।  जैसा कि नियम है शिखर पुरुषों  का अनुसरण  समाज करता ही है।  हमें याद है पहले अनेक जगह मंगलवार को दुकानें बंद रहती थीं।  वणिक परिवार का होने के नाते मंगलवार हमारा प्रिय दिन था।  बाद में चाकरी में रोटी की तलाश शुरु हुई तो रविवार का दिन ही अध्यात्मिक के लिये मिलने लगा।  इधर हमारे धार्मिक शिखर पुरुषों-उनके अध्यात्मिक ज्ञानी होने का भ्रम कतई न पालें-ने जब देखा कि उनके पास आने वाली भीड़ में नौकरी पेशा तथा बड़ा व्यवसाय या उद्योग चलाने वाले ऐसे लोगों की संख्या अधिक है जो रविवार के दिन ही  अवकाश लेते हैं तो उन्होंने उसे ही मुख्य दिवस बना दिया।
                              इधर प्रचार माध्यम भी रविवार के दिन सुपर संडेबनाने का प्रयास करते हैं और उनके स्वामियों के प्रायोजित अनेक संगठन इसी दिन कोई प्रदर्शन आदि कर उनके लिये प्रचार सामग्री बनाते हैं या फिर कोई बंदा सनसनीखेज बयान देता है जिससे उन्हें सारा दिन प्रचारित कर बहस चलाने का अवसर मिल जाता है।  अन्ना आंदोलन और चुनाव के दौरान इन प्रचार माध्यमों को ऐसे अवसर खूब मिले पर अब लगता है कि अब शायद ऐसा नहीं हो पा रहा है। फिर भी महिलाओं के प्रति धटित अपराध अथवा धार्मिक नेताओं के बयानों से यह अपने विज्ञापन प्रसारण के बीच सनसनीखेज सामग्री निकालने का प्रयास कर रहे हैं। यह अलग बात कि जम नहीं पा रहा है।
                              इधर बाहुबली फिल्म की सफलता के अनेक अर्थ निकाले जा रहे हैं।  यह अवसर भी प्रचार माध्यम स्वयं देते है-यह पता नहीं कि वह अनजाने में करते हैं या जानबुझकर-जब बॉलीवुड के सुल्तान और बादशाह से बाहूबली फिल्म के नायक की चर्चा कर रहे हैं। तब अनेक लोगों के दिमाग में यह बात आती तो है कि अक्षय कुमार, अजय देवगन, सन्नी देयोल, अक्षय खन्ना और सुनील शेट्टी जैसे अभिनेता भी हैं जो फिल्म उद्योग को भारी राजस्व कमा कर देते हैं।  अक्षय कुमार के लिये इनके पास कोई उपमा ही नहीं होती।  यह अभिनेता अनेक बार आपस में काम कर चुके हैं पर उसकी चर्चा इतने महत्व की नहीं होती जैसी सुल्तान और बादशाह के आपस में अभिवादन करने पर ही हो जाती है।  अंततः फिल्म और टीवी भावनाओं पर ही अपना बाज़ार चमकाते हैं और इससे जुड़े लोगों का पता होना चाहिये कि उनके इस तरीके पर समाज में जागरुक लोग रेखांकित करते हैं।  सभी तो उनके मानसिक गुलाम नहीं हो सकते। हम ऐसा नहीं सोचते पर ऐसा सोचने वाले लोगों की बातें सुनी हैं इसलिये इस विशिष्ट रविवारीय लेख में लिख रहे हैं।
हरिओम, जय श्रीराम, जय श्री कृष्ण
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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

14 जुलाई 2015

असल के भी नकली खेल-हिन्दी कविता(asal ke bhee nakali khel-hindi poem)

कहीं खेल में बेईमानी
कहीं बेईमानी के भी
खेल होते हैं।

कहीं खिलाड़ी लगा जुआ में
कहीं जुआरी लगा खेल में
दोनों में बहुत सारे आपसी
घालमेल होते हैं।

कहें दीपक बापू बरसों गंवाये
खेल देखते हुए
पता लगा जुआ देख रहे थे,
जीत हार का फैसला
पहले तय हुआ देख रहे थे,
पैसे की माया है
असल के भी नकली खेल होते हैं
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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

8 जुलाई 2015

दिग्भ्रमित लोग-हिन्दी कविता(digbhramit log-hindi poem)

समाज सेवा के व्यापार में
वही शामिल हो जाते
जो  खाये पीये अघाये हैं।

मुफ्त में पायी हर सुविधा
ज़माने का दर्द से अनजान
हमदर्द का बिल्ला लगाये हैं।

कहें दीपक बापू तीखी जुबान से
शब्द दमदार नहीं हो जाते,
दबंग की बेढंग अदाओं पर
तारीफ से चमकदार नहीं हो पाते,
दिग्भ्रमित हो जाते चालाक लोग भी
चाटुकारों की भीड़ से
गोया अपने महल
गरीबों के लिये उन्होंने बनाये हैं।
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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

3 जुलाई 2015

खुशफहमी-हिन्दी कविता(khushfahami-hindi poem)


लोग पड़ौस में करते
संवेदना की तलाश
घर में मरी पड़ी है।

हमदर्दी की आस करते
उस मशहूर सूरत से
जो पैसे के फ्रेम में जड़ी है।

कहें दीपक बापू खुशफहमी में
जीते हैं लोग
किसके पास समय और चाहत है
जो देखे उनके हाथ में बंधी
सोने या लोहे की घड़ी है।
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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

28 जून 2015

क्रिकेट को व्यापार माने तो फिर गलत कुछ नहीं-हिन्दी चिंत्तन लेख(cricket is trade-hindi thought article)

                              क्रिकेट के व्यापार से जुड़े लोग इसमें खेलप्रेमियों में पहले राष्ट्रप्रेम का दोहन  करते थे। दो देशों की टीमों को तयशुदा परिणाम मैच में लड़ाकर-इसे खिलाकर कहना गलत होगा-कमाई करते थे। अब क्षेत्रीय प्रेम भी भुनाने लगे हैं। छह या आठ क्लब स्तरीय टीमें उतारकर बड़े शहर में खेलप्रेमियों में उन्माद पैदा करते हैं-हम जैसे लोग अपने प्रदेश या शहर का नाम न होने से इस प्रतियोगिता का प्रसारण देखने ही नहीं है।  यह अलग बात है कि जिन शहरों या प्रदेश के लोगों का इस प्रतियोगिता से सरोकार नहीं है वहां के लोग भी इसे देखते हैं।  कहा जाता है कि सट्टेबाज इन मैचों में पर्दे के पीछे अपना व्यवसायिक कौशन तथा प्रबंध भी दिखाते है जिससे यह क्लब स्तरीय प्रतियोगिता भी प्रचार माध्यमों के सहयोग से राष्ट्रीय स्तर पर लोकप्रिय हो गयी है।
                              आज तक इस प्रतियोगिता का आर्थिक ढांचा हमारी समझ में नहीं आया। इस क्लब स्तरीय प्रतियोगिता में खिलाड़ियों को अंतर्राष्ट्रीय मैचों से अधिक कमाई होती है। इतनी कि अनेक खिलाड़ी भारी मन से देशभक्ति के नाम पर अंतर्राष्ट्रीय मैचों में जाना चाहते हैं। क्लब स्तरीय के व्यय देखकर नहीं लगता कि केवल दर्शकों की टिकटों की राशि से यह खेल चल रहा हो।  प्रसारण से प्रचार माध्यम विज्ञापनों के कारण भुंगतान करते होंगे पर फिर भी इससे खेल व्यय की भरपाई हो जाये यह लगता नहीं है।  इससे भी आश्चर्यजनक बात यह कि प्रतियोगिता में टीम की स्वामी संस्थायें स्वयं को घाटे में बताती हैं। तब अनेक प्रकार के संदेह स्वाभाविक रूप से उठते हैं कि यह सब चल कैसे रहा हैऐसे में इसके पीछे सट्टेबाजी का शक होता है तो कोई बड़ी बात नहीं।  सट्टेबाजी एक पाप कर्म है पर यह अपराध माना जाये कि नहीं इस पर अलग बहस हो सकती है। कुछ लोगों मानना है कि सट्टेबाज, जुआरी और व्यसनी अपनी हानि स्वयं करते हैं इसलिये उन्हें दूसरी सजा देना ठीक नहीं है।  कुछ लोग  कहते हैं कि राज्य का काम है कि वह इसे रोके।
                              पहली विचारधारा के समर्थन में हमारा कहना तो यह है कि क्रिकेट खेलने वाले, खिलाने वाले और सिखाने वाले यह मान लें कि वह इसका व्यापार कर रहे हैं।  वह ज्यादा पैसे मिलेगा तो हारेंगे, जीतेंगे या फिर नहीं खेलेंगे-यह उनकी मर्जी है। व्यापार में वस्तु या सेवा बेचने वाले पर आप यह आरोप नहीं लगा सकते कि एक कम दाम में दे रहा है तो दूसरा ज्यादा दाम मांग रहा है। कोई अपनी वस्तु या सेवा  किसी को मुफ्त में भी दे तो हमें क्या? क्रिकेट के व्यापारी यह मानने को तैयार नहीं होते। वह कभी खेल के विकास तो कभी भावना की शुचिता की बात करते हैं।  इसी पाखंड के कारण उनके कर्म विवादास्पद हो जाते हैं। वैसे भारतीय जनमानस यह जान चुका है कि इन क्रिकेट मैचों के बहाने उसे मूर्ख बनाया जा रहा है। अलबत्ता जिनके पास फालतू का पैसा या समय है उनके पास बर्बाद करने की प्रवृत्ति होती है जो क्रिकेट को खेल को व्यापार की तरह चला रही है। हमारा तो यह भी मानना है कि इससे सरकार को राजस्व अर्जित करने का भी प्रयास करना चाहिये ठीक उसी तरह जैसे अन्य मनोरंजन व्यवसायों के किया जाता है।
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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

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