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17 फ़रवरी 2016

शहर में अमन का नाश-हिन्दी कविता(shahar mein aman ka nash-Hindi kavita)


ख्वाबों के पंख लगाकर
ज़मीन पर स्वर्ग
तलाश करते हैं।

अपने घर से लापता
शहर में अमन का
नाश करते हैं।

कहें दीपकबापू किताब पढ़कर 
कोई शब्दों का
कद्रदान नहीं बनता
अक्ल की कमी वाले
अर्थ का भी नाश करते हैं।
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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

25 जनवरी 2016

करें प्रार्थना-हिन्दी कविता(Karen prarthana-HindiPoem)

डंडा लगाने से
सभी का झंडा
ऊंचा हो ही जाता है।

पैसे का फंडा लगाने से
हर इंसान का चरित्र
ऊंचा हो ही जाता है।

कहें दीपकबापू करें प्रार्थना
सर्वशक्तिमान से
बंदों से बेपरवाह होकर
अपने ही शब्दों से
मुख का स्वर
ऊंचा हो ही जाता है।
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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

12 जनवरी 2016

भक्ति के दलाल-हिन्दी कविता(Bhakti ke Dalal-Hindi Kavita)

सर्वशक्तिमान के नाम का
व्यापार भी खूब चले
भक्ति के दलाल कमायें।

स्वर्ग का सपना
मोक्ष का विचार
बेचकर कमायें।

कहें दीपकबापू इंसान से
नाता रखते दिखें सभी
बड़े बोल सुनाकर
दौलत के साथ
शौहरत भी कमायें।
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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

29 दिसंबर 2015

वेदना संवेदना-हिन्दी कविता(Vedna Sanvedna-Hindi Kavita)

किताब की शब्द पंक्ति
जिंदगी की राह
आसान नहीं करती।

तख्तियों पर लिखे नारे लगाती
भीड़ बहुत होने पर भी
बदलाव नहीं करती।

कहें दीपकबापू हृदय में
पल रही वेदनाओं के साथ
जीने की आदत
 बहुत शोर मचाती
कभी मस्तिष्क में
संवेदना नहीं भरती।
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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

20 दिसंबर 2015

इच्छा घेर ही लेती है-हिन्दी शायरी(Ichchha Gher hi leti hai-Hindi Shayri)

कनखियों से हम पर
नज़र वह कभी कभी डालते
तसल्ली हुई यह जानकर
उस भीड़ में वह शामिल नहीं
जो मुंह फेर लेती है।

दीपकबापू जिंदा रहने के लिये
बहाने ढूंढने को मजबूर नहीं
तारीफ की चाहत से दूर कहीं
फिर भी मनोरम आंखें देखें
कुछ पल के लिये
यह इच्छा घेर ही लेती है।
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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

10 दिसंबर 2015

विषाक्त हवा-हिन्दी कविता(Vishakt Hawa-Hindi Kavita)

जिंदा लोगों से बेपरवाह
मुर्दों की निशानी पर
सिर झुकाते हैं।

जरुरतमंद के दर्द से
अनजान भरे पेट पर
अन्न लुटाते हैं।

कहें दीपकबापू बेबसी पर
हंसने वाले
भूत से खाते भय
चलती सांस का मोल
जानते नहीं
विषाक्त हवा पर
अपना दिल लुटाते हैं।
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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

2 दिसंबर 2015

जीने की आदत-हिन्दी कविता (Jine Ki Adat-HindiKavita)

कोई भूले बुरे दिन
लोग याद दिलाकर
घाव हरे कर जाते हैं।

किसी की खुशी पसंद नहीं
सभी गम बढ़ाने का
भाव भरे घर आते हैं।

कहें दीपकबापू आनंद से
जीने की आदत अपनी
उनका क्या परवाह करना
जिंदगी के समंदर में डूबने
नाव परे कर आते हैं।
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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

23 नवंबर 2015

सौदागर दौलत की दुनियां बसायें-दीपकबापू वाणी (Saudagar Daulat ki Duniyan basayen-DeepakBapuWani)



पत्थर से बनी दरबार में सभी जाकर, अपने इष्ट का कान बजायें।
दीपकबापू पाखंडियों की भीड़ में, सत्य वचन न कभी फरमायें।।
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जाम पीकर सोते रात में, प्रातः दिन की चिंताओं में जागे।
दीपकबापू अपनी तलाश में, इंसान इधर से उधर भागे।।
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शराब पिलायें हथियार दिलायें, सौदागर दौलत की दुनियां बसायें।
दीपकबापू कातिलों से रखें रिश्ते, अपनी ताकत का प्रचार करायें।।
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 बड़े पद से ऊंचे कहलायें लोग, हाथ के पसीने से नहीं बने पहचान।
दीपकबापू मदारी बने इतराये, नाच रहा बंदर समझते अपनी शान।।
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धर्म के प्रतीक जब व्यापार बने, तब कमाई के खंबे भी ऊंचे तने।
दीपकबापू योग से हों पसीना, माया से साधना के भी साधन घने।।
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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
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संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

15 नवंबर 2015

विज्ञापन के लिये बवाल जुटाते-दीपकबापू वाणी(Vigyapan ke liye bawal Jutate-DeepakBapuWani)


अपने दिल में लोग नहीं झांकते, नाकामी का दोष ज़माने पर टांकते।
दीपकबापू पुरानी राह समझें बेकार, नयी बनी पर भी चलें हांफते।।
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वातानुकूलित कक्ष में बैठे बुद्धिमान, समाज सुधार का बोझ उठाये हैं।
दीपकबापू ले रहे चंदा दान, जुलूस में हजारों गरीब देव जुटाये हैं।।
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पर्दे पर हर रोज सवाल उठाते, विज्ञापन के लिये बवाल जुटाते।
दीपकबापू बीच बहस में फंसे, विद्वान मुफ्त में शब्द लुटाते।।
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कहीं तेल कहीं घी के दिये जले, मन गयी यूं सबकी दिवाली।
 ‘दीपकबापू बूझ रहे अब  हिसाब, दिल में कितनी खुशियां डाली।
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राजपद का मोह किसे नहीं, मिलने पर मद हो ही जाता है।
दीपकबापू भलाई बनी पेशा, दाम का गुलाम पद हो ही जाता है।।
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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
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3 नवंबर 2015

विकास के पत्थर-हिन्दी क्षणिका(Vikas ke Patthar-Hindi Short poem)


हमने स्वयं ही
विकास के पत्थर
सड़क पर पसराये हैं।
कहें दीपकबापू
कहीं चाहरदीवारों के
सिर पर चढ़ेंगे
कहीं इंसानों पर पड़ेंगे
दौलत के खेल में
शौहरत मोहब्बत के बीच
दीवार बनाते हुए
दिल टूट गया
अब क्यों पछतायें हैं।
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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

26 अक्टूबर 2015

चाटुकारिता के व्यापारी-हिन्दी कविता(Chatukarita ke Vyapari-Hindi Kavita)

जिसने पाया विरासत में
सोने का सिंहासन
श्रम का मोल नहीं जानेगा।

पांव पर चलने से पहले
सिर पर पहना जिसने ताज
बेबसी पर वक्रदृष्टि तानेगा।

कहें दीपकबापू खुली हवा में
सांस लेने के फायदे
प्रकृति के कायदे
ज़माने से मान पाने वाला
चाटुकारिता का व्यापारी
गुलाम क्या जानेगा।।
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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
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संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

15 अक्टूबर 2015

हृदय की उष्मा ठंडा करे, ऐसी बर्फ बाज़ार में न मिले-दीपकबापू वाणी (DeepakBapuWani)

खाये पीये अघाये लोग कहां जायें, यूं ही द्वंद्व में मन लगायें।
‘दीपकबापू’ मौन से रखे बैर, लोग शोर में सिर मारने जायें।।
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अगर वर्षा हो तो छाते से बचा लें, धैर्य हो तो अमर्ष पचा लें।
‘दीपकबापू’ स्वयं नाचते दौलत पर, शक्ति नहीं कि हर्ष पचा लें।
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सम्मान लेकर महंगे होते बोल, सुविधा की तराजू में भारी तोल।
‘दीपकबापू’ जाने मान पाने की कला, पोल होने से ही बजे ढोल।।
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पुराने विचार का भूत पीछे, भविष्य क्या खाक चमकायेंगे।
दीपकबापू मुर्दों के दूत बने, रचना में राख ही सजायेंगे।।
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दूध से दही मक्क्खन बने, एक एक कदम से राह बने।
दीपकबापू ज्ञान विज्ञान समझें, चिंता से चिंत्तन चाह बने
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हृदय की उष्मा ठंडा करे, ऐसी बर्फ बाज़ार में न मिले।
‘दीपकबापू’ मृत संवेदनाओं के बीच, प्रेम फूल न खिले।।
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कातिलों के साथी नकाब पहने, शांति के शब्दों से बनाते गहने।
दीपकबापू मक्कारों की सभा में, वफा की इमारत लगती ढहने।।
........................
किताब लिखकर सम्मान पाये, दूजा तुलसी कबीर रहीम न कोई।
दीपकबापू हैरान है यह देख, हिन्दी ने दगाबाजों की पालकी ढोई।।
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हर कदम पर वादा झूठा मिला, हर जगह यकीन छूटा मिला।
‘दीपकबापू’ असरदारों की दुनियां में, दिल का तार टूटा गिला।।

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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

6 अक्टूबर 2015

अपनी ही पीठ पर ताली-हिन्दी व्यंग्य कविता(apni he peeth par tali-Hindi satire poem)


गुमनाम हो गये जो लोग
कभी कभी अपने सम्मान की लाश
चौराहे पर सजा देते हैं।

स्वर जिनका कोई सुनता नहीं
अपनी ही पीठ पर
ताली बजा लेते हैं।

कहें दीपकबापू देख तमाशा
आड़ी तिरछी लकीरें खीचंकर
काटेदार शब्द कागज में भींचकर
क्रांतिकार जैसा सम्मान पाये
अब कोने में छाये
निकलते हैं क्रुद्ध होकर
लोग भी मजा लेते हैं
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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

30 सितंबर 2015

मन का खेल-हिन्दी कविता(Man ka Khel-Hindi Kavita)

मन हल्का हो तो
भारी बोझ भी
इंसान उठा जाता है।

ताकतवर हो मन से
हारते हुए दाव भी
जीतकर उठा जाता है।

कहें दीपकबापू चाहने वालों से
उम्मीद होती है
ताली बजाकर मन बढ़ायेंगे
संवेदनहीन सभा में
हार मन लेकर ही उठा जाता है।
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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

25 सितंबर 2015

अमृत और शराब-हिन्दी कविता(Amrit aur Sharab)


फारसी पढ़कर
तेल बेचने वाले
आज भी मिल जाते हैं।

सुधारवादी योद्धाओं के
अभियानों का सौदा करते
राज भी मिल जाते हैं।

कहें दीपकबापू भलाई पर
रोटी चलाने वाले
रखते दलाली की चाहत
दूसरा खाये मलाई
देखकर होते आहत
अमृत के नाम पर
भलाई बाज़ार में शराब बेचते
बाज़ भी मिल जाते हैं।
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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
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Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
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