6 अक्तूबर 2015

अपनी ही पीठ पर ताली-हिन्दी व्यंग्य कविता(apni he peeth par tali-Hindi satire poem)


गुमनाम हो गये जो लोग
कभी कभी अपने सम्मान की लाश
चौराहे पर सजा देते हैं।

स्वर जिनका कोई सुनता नहीं
अपनी ही पीठ पर
ताली बजा लेते हैं।

कहें दीपकबापू देख तमाशा
आड़ी तिरछी लकीरें खीचंकर
काटेदार शब्द कागज में भींचकर
क्रांतिकार जैसा सम्मान पाये
अब कोने में छाये
निकलते हैं क्रुद्ध होकर
लोग भी मजा लेते हैं
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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

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