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30 अगस्त 2010

क्रिकेट मैच में हारने की कसम-हिन्दी व्यंग्य (cricket match men harne ki kasam-hindi vyangya)

पाकिस्तान के सात खिलाड़ी मैच फिक्सिंग के आरोपों में फंस गये हैं। फंसे भी क्रिकेट के जनक इंग्लैंड में हैं जहां पाकिस्तानी पहले से बदनाम हैं। यह खबरें तो उन्हीं प्रचार माध्यमों से ही मिल रही हैं जो उस बाज़ार के ही भौंपू हैं जिसके अनेक शिखर सौदागरों पर भूमिगत माफिया से संबंध रखने का आरोप है। कभी कभी ऐसी खबरें देखकर हैरानी होती है कि आखिर यह क्रिकेट जो इन प्रचार समाचार माध्यमों के रोजगार का आधार है क्योंकि इससे उनको प्रतिदिन आधे घंटे की सामग्री मिलती है तो कैसे उसे बदनाम करने पर तुल जाते हैं।
पहली बार पता चला कि नोबॉल भी फिक्स होती है। पाकिस्तान के क्रिकेट खिलाड़ियों ने गेंद फैंकते समय अपना पांव लाईन से इतना बाहर रखा था कि अंपायर के लिये यह संभव नहीं था कि वह उसकी अनदेखी करे। जब खिलाड़ी फिक्स हैं तो अंपायर भी फिक्स हो सकता है पर पाकिस्तानी खिलाड़ियों ने इतना पांव निकाला कि नोबॉल न देने के लिये फिक्स करने वाला अंपायर भी कैमरें की वजह से उसे संदेह का लाभ नहीं दे सकता था।
आरोप लगे हैं कि पाकिस्तानी खिलाड़ी औरतों, पैसे तथा मस्ती करने के शौकीन हैं। पाकिस्तानी खिलाड़ियों का चरित्र तो वहीं के लोग बयान करते हैं। कुछ पर तो मादक द्रव्य पदार्थों की तस्करी का भी आरोप है। जब पाकिस्तानी खिलाड़ी पकड़े जाते हैं तो उनकी एकाध प्रेमिका भी सामने आती है जो उनकी काली करतूतों का बयान करती है। एक चैनल के मुताबिक पाकिस्तान का एक गेंदबाज की प्रेमिका के अनुसार वह तो बिल्कुल अपराध प्रवृत्ति का और यह भी उसी ने बताया था कि ‘2010 में पाकिस्तानी कोई मैच जीतने वाला नहीं है, ऐसा तय कर लिया गया है। पिछले 82 मैचों से फिक्सिंग चल रही है। वगैरह वगैरह।
जिस बात पर हमारी नज़र अटकी वह थी कि ‘पाकिस्तान खिलाड़ियों ने 2010 में मैच न जीतने की कसम खा रखी है। संभवत आजकल उनको हारने के पैसे मिल रहे हैं। हां, यह क्रिकेट में होता है। श्रीलंका में हुए एक मैच में आस्ट्रेलिया और पाकिस्तान दोनों की टीमें मैच हारना चाहती थीं क्योंकि पर्दे के पीछे उनको अधिक पैसा मिलने वाला था। यानि जो जीतता वह कम पैसे पाता तोे बताईये पैसे के लिऐ खेलने वाले खिलाड़ी क्यों जीतना चाहेंगे। ऐसे आरोप टीवी चैनलों ने लगाये थे। बहरहाल पाकिस्तान टीम के खिलाड़ी अपनी आक्रामक छबि भुनाते हैं। उनके हाव भाव ऐसे हैं जैसे कि तूफान हो और इसलिये उनकी जीत पर अधिक पैसा लग जाता है। सट्टेबाज उसके हारने पर ही कमाते होंगे इसलिये ही शायद वह उनको हारने के लिये पैसा देते होंगे।
इधर अपने देश की बीसीसीआई की टीम भी लगातर जीतने में विश्वास नहंीं रखती। यकीनन इस टीम के कर्णधारों को पाकिस्तानी खिलाड़ियों की इस कसम का पता लगा होगा कि वह 2010 में जीतेंगे नहीं इसलिये उसके साथ न खेलने का फैसला किया होगा ।
बात अगर पाकिस्तान की हो तो अपने देश के सामाजिक, आर्थिक, खेल तथा कला जगत के शिखर पुरुषों के दोनों हाथों में लड्डू होते हैं। अगर संबंध अच्छे रखने हों तो कहना पड़ता है कि ‘इंसान सब कर सकता है पर पड़ौसी नहीं बदल सकता‘ या फिर ‘आम आदमी के आदमी से संपर्क करना चाहिऐ।’
अगर संबंध खराब करने हों तो आतंकवाद का मुद्दा एक पहले से ही तय हथियार है कहा जाता है कि ‘पहले पाकिस्तान अपने यहां आतंकवादी का खत्मा करे।
पिछली बार आईपीएल में पाकिस्तान के खिलाड़ियों को नहीं खरीदा गया था तो देश के तमाम लोगों ने भारी विलाप किया था। यहां तक कि इस विलाप में वह लोग भी शामिल थे जो प्रत्यक्षः इन टीमों के मालिक माने जाते हैं-इसका सीधा मतलब यही था कि यह मालिक तो मुखौटे हैं जबकि उनके पीछे अदृश्य आर्थिक शक्तियां हैं जो इस खेल का अपनी तरीके से संचालन करती हैं।
बाद में आईपीएल में फिक्सिंग के आरोप लगे थे। उसमें पाकिस्तान के खिलाड़ियों का न होना इस बात का प्रमाण था कि अकेले पाकिस्तानी ही ऐसा खेल नहीं खेलते बल्कि हर देश के कुछ खिलाड़ी शक के दायरे में हैं। यह अलग बात है कि पाकिस्तान बदनाम हैं तो उसके खिलाड़ियों को चाहे जब पकड़ कर यह दिखाया जाता है कि देखो बाकी जगह साफ काम चल रहा है। किसी अन्य देश का नाम नहीं आने दिया जाता क्योंकि उसकी बदनामी से मामला बिगड़ सकता है। पाकिस्तान के बारे में तो कोई भी कह देगा कि ‘वह तो देश ही ऐसा है।’ इससे प्रचार में मामला हल्का हो जाता है और प्रचार माध्यमों के लिये भी सनसनीखेज सामग्री बन जाती है।
पाकिस्तानी या तो चालाक नहीं है या लापरवाह हैं जो पकड़े जाते हैं। संभव है वह कमाई के लिये हल्के सूत्रों का इस्तेमाल करते हों। भारतीय प्रचार माध्यमों को तो सभी जानते हैं। निष्पक्ष दिखने के नाम पर तब इन खिलाड़ियों के कारनामों की चर्चा से बचते हैं जब यह भारत आते हैं। अभी पाकिस्तानी के एक खिलाड़ी ने एक भारतीय महिला खिलाड़ी से शादी की। वह भारत आया तो उसके लोगों ने ही उस पर आरोप लगाया था कि ‘वह तो फिक्सर है।’ मगर भारत की एक अन्य महिला ने जब उसी पाकिस्तानी खिलाड़ी से विवाह होने की बात कही और बिना तलाक दिये दूसरी शादी का विरोध किया तो यह प्रचार माध्यम एक बूढ़े अभिनेता को पाकिस्तानी खिलाड़ी के समर्थन में लाये। मामला सुलट गया और भारतीय खिलाड़िन से उस खिलाड़ी का विवाह हुआ। वह बूढ़े अभिनेता भी उस शादी में गया। आज तक एक बात समझ में नहीं आयी कि इन फिल्म वालों से क्रिकेट वालों रिश्ते बनते कैसे हैं। संभवत कहीं न कहीं धन के स्त्रोत एक जैसे ही होंगे।
इस देश में क्रिकेट खेल का आकर्षण अब उतना नहीं रहा जितना टीवी चैनल और अखबार दिखा रहे हैं। कभी कभी तो ऐसा लगता है कि उनके पास मज़बूरी है क्योंकि इसके अलावा वह कुछ नया कर ही नहीं सकते।
एक दो नहीं पूरे सात पाकिस्तनी खिलाड़ी ब्रिटेन से मैच हारना चाहते थे। हारे भी! इससे उनके धार्मिक लोग नाराज़ हो गये हैं। इसलिये नहीं कि पैसा खाकर हारे बल्कि धर्म का नाम नीचा किया। कट्टर लोग धमकियां दे रहे हैं। कोरी धमकियां ही हैं क्योंकि इन कट्टर धार्मिक लोगों को पैसा भी उन लोगों से मिलता है जो क्रिकेट में मैदान के बाहर से इशारों में खिलाड़ियों को नचाते हैं और फिर उनको रैम्प पर भी नाचने का अवसर प्रदान करते हैं।
बहरहाल पाकिस्तानी खिलाड़ियों ने 2010 में हारने की कसम खाई है। यह आरोपी सात खिलाड़ी हटे तो दूसरे नये लोग आकर भी उस कसम को निभायेंगे। इधर बीसीसीआई की टीम भी तब तक नहीं उनके साथ खेलेगी जब तक उनकी कसम खत्म की अवधि नहीं होती। आखिर बीसीसीआई के खिलाड़ी जीत कर थक जायेंगे तो उनको तो हराकर कर विश्राम कौन देगा। पाकिस्तानी खिलाड़ी यह अवसर देने को तैयार नहीं लगते। यही कारण है कि आतंक का मुद्दे की वजह से दोनों नहीं ख्ेाल रहे अब यह बात बड़े लोग कहते हैं तो माननी पड़ती है। 2011 में फिर मित्रता का नारा लगेगा क्योंकि तब पाकिस्तानी खिलाड़ियों की कसम की अवधि खत्म हो जायेगी। इधर आईपीएल की तैयारी भी चल रही है। लगता नहीं है कि पाकिस्तानी खिलाड़ियों को इस बार भी मौका मिलेगा। कहीं किसी क्लब को जीतने का आदेश हो और उसमें अपनी कसम से बंधे एक दो पाकिस्तानी खिलाड़ी हारने के लिए खेले तो.......अब तो उनके लिये 2011 में ही दरवाजे खुल सकते हैं।
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कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
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16 अगस्त 2010

दिखाने के लिये दोस्ताना जंग-हास्य व्यंग्य (dikhane ki liye dostana-hasya vyangya)

दृश्यव्य एवं श्रव्य प्रचार माध्यमों के सीधे प्रसारणों पर कोई हास्य व्यंगात्मक चित्रांकन किया गया-अक्सर टीवी चैनल हादसों रोमांचों का सीधा प्रसारण करते हैं जिन पर बनी इस फिल्म का नाम शायद............ लाईव है। यह फिल्म न देखी है न इरादा है। इसकी कहानी कहीं पढ़ी। इस पर हम भी अनेक हास्य कवितायें और व्यंगय लिख चुके हैं। हमने तो ‘टूट रही खबर’ पर भी बहुत लिखा है संभव है कोई उन पाठों को लेकर कोई काल्पनिक कहानी लिख कर फिल्म बना ले।
उस दिन हमारे एक मित्र कह रहे थे कि ‘यार, देश में इतना भ्रष्टाचार है उस पर कुछ जोरदार लिखो।’
हमने कहा-‘हम लिखते हैं तुम पढ़ोगे कहां? इंटरनेट पर तुम जाते नहीं और जिन प्रकाशनों के काग़जों पर सुबह तुम आंखें गढ़ा कर पूरा दिन खराब करने की तैयारी करते हो वह हमें घास भी नहीं डालते।’
उसने कहा-‘हां, यह तो है! तुम कुछ जोरदार लिखो तो वह घास जरूर डालेेंगे।’
हमने कहा-‘अब जोरदार कैसे लिखें! यह भी बता दो। जो छप जाये वही जोरदार हो जाता है जो न छपे वह वैसे ही कूंड़ा है।’
तब उसने कहा-‘नहीं, यह तो नहीं कह सकता कि तुम कूड़ा लिखते हो, अलबत्ता तुम्हें अपनी रचनाओं को मैनेज नहीं करना आता होगा। वरना यह सभी तो तुम्हारी रचनाओं के पीछे पड़ जायें और तुम्हारे हर बयान पर अपनी कृपादृष्टि डालें।’
यह मैनेज करना एक बहुत बड़ी समस्या है। फिर क्या मैनेज करें! यह भी समझ में नहीं आता! अगर कोई संत या फिल्मी नायक होते या समाज सेवक के रूप में ख्याति मिली होती तो यकीनन हमारा लिखा भी लोग पढ़ते। यह अलग बात है कि वह सब लिखवाने के लिये या तो चेले रखने पड़ते या फिर किराये पर लोग बुलाने पड़ते। कुछ लोग फिल्मी गीतकारों के लिये यह बात भी कहते हैं कि उनमें से अधिकतर केवल नाम के लिये हैं वरना गाने तो वह अपने किराये के लोगों से ही लिखवाते रहे हैं। पता नहंी इसमें कितना सच है या झूठ, इतना तय है कि लिखना और सामाजिक सक्रियता एक साथ रखना कठिन काम है। सामाजिक सक्रियता से ही संबंध बनते हैं जिससे पद और प्रचार मिलता है और ऐसे में रचनाऐं और बयान स्वयं ही अमरत्व पाते जाते है।
अगर आजकल हम दृष्टिपात करें तो यह पता लगता है कि प्रचार माध्यमों ने धार्मिक, आर्थिक और सामाजिक शिखरों पर विराजमान प्रतिमाओं का चयन कर रखा है जिनको समय समय पर वह सीधे प्रसारण या टूट रही खबर में दिखा देते हैं।
एक संत है जो लोक संत माने जाते हैं। वैसे तो उनको संत भी प्रचार माध्यमों ने ही बनाया है पर आजकल उनकी वक्रदृष्टि का शिकार हो गये हैं। कभी अपने प्रवचनों में ही विदेशी महिला से ‘आई लव यू कहला देते हैं’, तो कभी प्रसाद बांटते हुए भी आगंतुकों से लड़ पड़ते हैं। उन पर ही अपने आश्रम में बच्चों की बलि देने का आरोप भी इन प्रचार माध्यमों ने लगाये। जिस ढंग से संत ने प्रतिकार किया है उससे लगता है कि कम से कम इस आरोप में सच्चाई नहंी है। अलबत्ता कभी किन्नरों की तरह नाचकर तो कभी अनर्गल बयान देकर प्रचार माध्यमों को उस समय सामग्री देतेे हैं जब वह किसी सनसनीखेज रोमांच के लिये तरसते हैं। तब संदेह होता है कि कहीं यह प्रसारण प्रचार माध्यमों और उन संत की दोस्ताना जंग का प्रमाण तो नहीं है।
एक तो बड़ी धार्मिक संस्था है। वह आये दिन अपनी विचारधारा से जुड़े लोगों के लिये अनर्गल फतवे जारी करती है। सच तो यह है कि इस देश में कोई एक व्यक्ति, समूह या संस्था ऐसी नहंी है जिसका यह दावा स्वीकार किया जाये कि वह अपने धर्म की अकेले मालिक है मगर उस संस्था का प्रचार यही संचार माध्यम इस तरह करते हैं कि उस धर्म के आम लोग कोई भेड़ या बकरी हैं और उस संस्था के फतवे पर चलना उसकी मज़बूरी है। वह संस्था अपने धर्म से जुड़े आम इंसान के लिये कोई रोटी, कपड़े या मकान का इंतजाम नहंी करती और उत्तर प्रदेश के एक क्षेत्र तक ही उसका काम सीमित है पर दावा यह है कि सारे देश में उसकी चलती है। उसके उस दावे को प्रचार माध्यम हवा देते हैं। उसके फतवों पर बहस होती है! वहां से दो तीन तयशुदा विद्वान आते हैं और अपनी धार्मिक पुस्तक का हवाला देकर चले जाते हैं। जब हम फतवों और चर्चाओं का अध्ययन करते हैं तो संदेह होता है कि कहीं यह दोस्ताना जंग तो नहीं है।
एक स्वर्गीय शिखर पुरुष का बेटा प्रतिदिन कोई न कोई हरकत करता है और प्रचार माध्यम उसे उठाये फिरते हैं। वह है क्या? कोई अभिनेता, लेखक, चित्रकार या व्यवसायी! नहीं, वह तो कुछ भी नहीं है सिवाय अपने पिता की दौलत और घर के मालिक होने के सिवाय।’ शायद वह देश का पहला ऐसा हीरो है जिसने किसी फिल्म में काम नहीं किया पर रुतवा वैसा ही पा रहा है।
लब्बोलुआब यह है कि प्रचार माध्यमों के इस तरह के प्रसारणों में हास्य व्यंग्य की बात है तो केवल इसलिये नहीं कि वह रोमांच का सीधा प्रसारण करते हैं बल्कि वह पूर्वनिर्धारित लगते हैं-ऐसा लगता है कि जैसे उसकी पटकथा पहले लिखी गयी हों हादसों के तयशुदा होने की बात कहना कठिन है क्योंकि अपने देश के प्रचार कर्मी आस्ट्रेलिया के उस टीवी पत्रकार की तरह नहीं कर सकते जिसने अपनी खबरों के लिये पांच कत्ल किये-इस बात का पक्का विश्वास है पर रोमांच में उन पर संदेह होता है।
ऐसे में अपने को लेकर कोई भ्रम नहीं रहता इसलिये लिखते हुए अपने विषय ही अधिक चुनने पर विश्वास करते हैं। रहा भ्रष्टाचार पर लिखने का सवाल! इस पर क्या लिखें! इतने सारे किस्से सामने आते हैं पर उनका असर नहीं दिखता! लोगों की मति ऐसी मर गयी है कि उसके जिंदा होने के आसार अगले कई बरस तक नहीं है। लोग दूसरे के भ्रष्टाचार पर एकदम उछल जाते हैं पर खुद करते हैं वह दिखाई नहीं देता। यकीन मानिए जो भ्रष्टाचारी पकड़े गये हैं उनमें से कुछ इतने उच्च पदों पर रहे हैं कि एक दो बार नहीं बल्कि पचास बार स्वाधीनता दिवस, गणतंत्र, गांधी जयंती या नव वर्ष पर उन्होंने कार्यक्रमों में मुख्य अतिथि की भूमिका का निर्वाह करते हुए ‘भ्रष्टाचार’ को देश की समस्या बताकर उससे मुक्ति की बात कही होगी। उस समय तालियां भी बजी होंगी। मगर जब पकड़े गये होंगे तब उनको याद आया होगा कि उनके कारनामे भी भ्रष्टाचार की परिधि में आते है।
कहने का अभिप्राय यह है कि लोगों को अपनी कथनी और करनी का अंतर सहजता पूर्वक कर लेते हैं। जब कहा जाये तो जवाब मिलता है कि ‘आजकल इस संसार में बेईमानी के बिना काम नहीं चलता।’
जब धर लिये जाते हैं तो सारी हेकड़ी निकल जाती है पर उससे दूसरे सबक लेते हों यह नहीं लगता। क्योंकि ऊपरी कमाई करने वाले सभी शख्स अधिकार के साथ यह करते हैं और उनको लगता है कि वह तो ‘ईमानदार है’ क्योंकि पकड़े आदमी से कम ही पैसा ले रहे हैं।’ अलबत्ता प्रचार माध्यमों में ऐसे प्रसारणों के बारे में यह नहीं कहा जा सकता कि वह दोस्ताना जंग है। यह अलग बात है कि कोई बड़ा मगरमच्छ अपने से छोटे मगरमच्छ को फंसाकर प्रचार माध्यमों के लिये सामग्री तैयार करवाता  हो या जिसको हिस्सा न मिलता हो वह जाल बिछाता हो । वैसे अपने देश में जितने भी आन्दोलन हैं भ्रष्टाचार के विरुद्ध नहीं बल्कि उसके बंटवारे के लिए होते हैं । इस पर अंत में प्रस्तुत है एक क्षणिका।
एक दिन उन्होंने भ्रष्टाचार पर भाषण दिया
दूसरे दिन रिश्वत लेते पकड़े गये,
तब बोले
‘मैं तो पैसा नहीं ले रहा था,
वह जबरदस्ती दे रहा था,
नोट असली है या नकली
मैं तो पकड़ कर देख रहा था।’

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12 मई 2010

अमेरिका कभी पाकिस्तान पर गर्माता है कभी शर्माता है-हिन्दी लेख (relation between pakistan and america-hindi article)

अमेरिका की विदेश मंत्री हेनरी क्लिंटन ने कहा था अगर टाईम्स स्कवायर पर बम मिलने की घटना के तार पाकिस्तान से जुड़े पाये गये तो उसे गंभीर परिणाम भोगने पड़ेंगे। इससे पहले कि पाकिस्तान की तरफ से कोई औपचारिक विरोध दर्ज होता अमेरिका के रणनीतिकार ऐसी धमकी देने से ही इंकार करने लगे। इस तरह यह बात जाहिर हो गया है कि अमेरिका अब लगातार रणनीतिक गलतियां करता जा रहा है और सामरिक दृष्टि से विश्व का शक्तिशाली देश होने के बावजूद उनका आत्मविश्वास डांवाडोल हो रहा है।
ऐसा लगता है कि अमेरिकी रणीनीतिकार अपनी कार्य तथा विचार षैली में समय के अनुसार बदलाव नहीं लाना चाहते इसलिये नये लक्ष्यों को प्राप्त करने में अपने पुराने पूर्वाग्रह नहीं छोड़ते जिससे उनको असफलता मिल रही है। इसका सीधा आषय अमेरिकी रणनीतिकारों की बौद्धिक क्षमता पर संदेह उठाना भी लग सकता है। पर अगर यह प्रमाणित हो जाये कि वह लक्ष्य प्राप्त ही नहीं करना चाहते ताकि लंबे अभियानों से वह विष्व समुदाय को भ्रमित कर अपने हथियार तथा तकनीकी बेची जा सके तो फिर कोई प्रष्न नहीं रह जाता। हालांकि इस सौदेबाजी के तरीके के दीर्घकालीन परिणामों का अपने हित में रहने के बारे में अमेरिकी रणनीतिकार आश्वस्त हो सकते हैं पर इसमें इतनी अनिश्चतायें हैं कि हो सकता है कि उल्टा पास पड़ जाये। इसलिये यहां उनकी अदूरदर्शिता साफ दिखाई देती है। खासतौर से पाकिस्तान और अफगानिस्तान को लेकर अमेरिकी रणनीति विफलता की तरफ बढ़ती दिख रही है।
दरअसल अमेरिका विष्व भर के आतंक, अपराध तथा अन्य गैरकानूनी गतिविधियों को अपने हित के नजरिये से देखता है। विष्व में आर्थिक उदारीकरण का प्रवर्तक होने के नाते अमेरिका को यह समझ लेना चाहिये कि अगर रुपये या डालर को अगर राष्ट्र की सीमाओं को बांधा नहीं जा सकता क्योंकि बडे पूंजीपतियों को आपने वैष्विक वृत्ति का मान लिया है पर उनकी छत्रछाया में ही ऐसे अनेक कृत्य होते हैं जिनको गैरकानूनी माना जाता है और उनके सहारे पलने वाले असामजिक तत्व किसी के सगे नहीं होते। यह तो अमेरिकी भी मानते हैं कि आतंकवादियों को अंततः बड़े पैसे वालों द्वारा ही आर्थिक सहायता दी जाती है। ऐसे में पूंजीपतियों को वैष्विक मानना और आतंकवादियों को अपने तथा अन्य देषों के हितों की दृष्टि में बांटना अपने आपको धोखा देने के अलावा और क्या हो सकता है?
वैसे तो आतंकवाद की लड़ाई का कथित नेता होने का दावा करने वाला अमेरिका स्वयं ही संदेहों के दायरे में है। 9/11 के जिम्मेदार उसके प्रसिद्ध अपराधी पाकिस्तान में पनाह लिये हुए हैं। वह उन पर रोज बमबारी करता है पर नतीजा सिफर! कभी कभी तो लगता है कि उसक यहा प्रायोजित कार्यक्रम है ताकि उसके सहारे
वह अपने नयी तकनीकी से सुसज्जित ड्रान विमानों का परीक्षण कर सके-याद रखने वाली बात यह है कि अमेरिकी विरोधी उस पर भी आरोप लगाते हैं कि वह अपने हथियारों के परीक्षण के लिये ऐसे युद्ध जारी रखता है।
यहां बार बार सवाल आता है कि आखिर अमेरिकाष्षत्रु इतने अजेय कैसे हो गये है जिनको मारने के लिये उसे दस वर्ष भी कम पड़ते हैं? फिर वह भारत के पाकिस्तान में रह रहे अपराधियों के प्रष्न को अनदेखा कर देता हैं विभिन्न माध्यमों से मिलने वाले समाचारों पर यकीन करें तो पाकिस्तान के भारत में रह रहे अपराधी कहीं न कहंी अमेरिका पर मेहरबान है इसलिये वह इस विषय पर चुप्पी साध लेता है।
दरअसल अमेरिका अब दो नावों की सवारी करना चाहता है। अपने आर्थिक लाभ के लिये वह भारत को भी अपने पाले में रखना चाहता है तो पाकिस्तान उसके लिये सामरिक महत्व का है जिसे वह छोड़ना नहीं चाहता। कभी कभी तो लगता है कि अमेरिकी रणनीतिकार आत्म्मुग्धता के शिकार हैं क्योंकि उनको लगता है कि वही राजनीतिक जुआ खेलना जानते हैं और बाकी सभी अनाड़ी हैं। बाकी जगह तो पता नहीं पर पाकिस्तान और अफगानिस्तान को लेकर उनको बहुत सारे भ्रम हैं। पाकिस्तान में चीन के साथ खाड़ी देश भी अपने ढंग से सक्रिय हैं तो अफगानिस्तान में भी रूस की सक्रियता है। वैसे कुछ लोगों को लगता है कि कूटनीतिक रूप से पाकिस्तान कोई सफल देश है तो उन्हें यह भ्रम नहीं रखना चाहिए। भले ही वह अमेरिका को अपने मुताबिक फैसले करने को बाध्य करता है पर इसका कारण यह है कि खाड़ी देशों तथा चीन की वजह से उसकी शक्ति बढ़ी हुई है। खाड़ी देश तथा चीन पहले भारत के विरुद्ध उपयोग उसका प्रभाव अपने यहां पड़ने से रोकने के लिये करते थे और आजकल ब्रिटेन और अमेरिका को दुविधा में डालने के लिये भी वही कर रहे हैं।
अमेरिका पहले अमेरिका तथा खाड़ी देशों का उपनिवेश था तो अब चीन भी उसका माईबाप हो गया है। देश के कुछ बुद्धिजीवी अक्सर यह कहते हैं कि आखिर पाकिस्तान भारत विरोध क्यों नहीं छोड़ता? उन्हें यह समझ लेना चाहिए कि खाड़ी देशों के साथ ही उसे अमेरिका और चीन से आर्थिक सहायता केवल भारत विरोध के कारण ही मिलती है। वह चाहे तो भारत से भी ले सकता है पर जितना माल उसे इन तीन क्षेत्रों से मिलती है वह उस पैमाने पर नहीं मिल सकता। सच तो यह है कि खाड़ी देशों ने धर्म तो चीन ने अर्थ के आधार पर पाकिस्तान को अपनी गिरफ्त में ले लिया है। उसके पास पैसा खूब आ रहा है इसलिये अमेरिका उसे हथियार बेचकर अपने बाज़ार को लाभ पहुंचाना चाहता है। मुश्किल यह है कि आतंकवाद एक ऐसा विषय है जिस पर किसी को आश्वस्त होकर नहीं बैठना चाहिऐ। मगर अमेरिकी रणनीतिकार जिस तरह आतंकवाद में भेद करते हैं उससे देखकर तो लगता है कि एक दिन उनको इसका भारी खामियाजा भुगतना पड़ सकता है।
बहरहाल अमेरिकी रणनीतिकारों ने अपनी पाकपरस्ती के कारण भारतीय जनता की सहानुभूति पूरी तरह से खो दी है और कालांतर में उसका दुष्परिणाम उसके सामने यह भी आ सकता है कि आतंकवाद के विरुद्ध कथित संयुक्त अभियान में भारतीय रणनीतिकार जन दबाव के अभाव में उसका साथ वैसे न दें जैसी की वह अपेक्षा करता है। दूसरी बात यह है कि उसके हथियार बेचने की रणनीति से आतंकवाद को जोड़ने वाली बातें अब कभी कभी लोगों को सच लगती है इसलिये वैश्विक रूप से कोई बड़ा अभियान चलाना उसके लिये संभव नहीं  रहा है।
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23 जनवरी 2010

बाजारू खेल में देशप्रेम ढूंढने का प्रयास-आलेख (cricket aur deshprem-hindi lekh)

भारत में चलने वाली एक क्लब स्तरीय प्रतियोगिता में पाकिस्तानी खिलाड़ियों को नीलामी में किसी ने नहीं खरीदा तो दोनों देशों में हो हल्ला मच गया है। किसी मनुष्य की नीलामी! बहुत आश्चर्य हो रहा है! यह तो गनीमत है कि इस देश में अधिकतर संख्या अभी भी अशिक्षित और अखबार न पढ़ने वाले लोगों की है वरना सारे देश मुंह खुला रह जाता और हर घर में चर्चा हो रही होती। कुछ लोग दुःखी होते तो कुछ खुश!
जब हम जैसा लेखक लिखता है तो अध्यात्म या धर्म की चर्चा न करे यह संभव नहीं हो पाता क्योंकि कहीं न कहीं लगता है कि एक तरफ लोग भारत के विश्व में अध्यात्मिक गुरु होने की बात करते हैं दूसरी तरफ अपने ही लोग जाते उल्टी दिशा में ही है। भारत से बाहर पनपी विचाराधाराओं के बारे में कहा जाता है कि वह मनुष्य को मनुष्य की गुलामी से बचाने के लिये प्रवाहित हुईं हैं। एक पश्चिमी देव पुरुष ने तो अपने कबीले के लोगों को गुलामी से मुक्ति के लिये संघर्ष किया। उसने गुलामी से अपने लोगों को मुक्त होने की प्रेरणा दी। उसकी जीवनी पर एक ंविदेशी हिन्दी टीवी चैनल ने ही कार्यक्रम दिखाया था जिसमें गुलामों की बकायदा नीलामी दिखाई जा रही थी। भारत में बंधुआ मजदूरी की परंपरा रही है पर उसमें कहीं ऐसी नीलामी की चर्चा नहीं होती जिसमें एक मालिक अपने गुलाम को दूसरे मालिक के हाथ बेचता है। कहने का तात्पर्य यह है कि जिस गुलामी और नीलामी की परंपरा का पश्चिमी सभ्यता ने करीब करीब त्याग दिया है उसी को भारतीय धनपतियों ने क्रिकेट के सहारे यहां जिंदा किया। धन्य है धन की महिमा!
क्ल्ब स्तरीय प्रतियोगिता को कोई अधिक भावनात्मक महत्व नहीं है और इसके मैच क्रिकेट के वही समर्थक देखते हैं जिनको उस समय कोई कामकाज नहीं होता है-जिन लोगों को कामकाज होता है वह ऐसे मैच में समय खराब नहीं करते क्योंकि अंतर्राष्ट्रीय स्तर के मैच ही उनको इसके लिये उपयुक्त लगते हैं। कहने वाले तो यह भी कहते हैं कि यह मैच दर्शकों के नंबर एक धन के साथ ही उस पर दांव खेलने वालो मूर्खों के धन से भी चलते हैं। मैच फिक्सिंग की वजह से बदनाम क्रिकेट हुई है और अंतर्राष्ट्रीय स्तर के मैच जोखिम वाले हो गये हैं इसलिये इन क्लब स्तरीय मैचों को आयोजित किया जा रहा है क्योंकि इसमें राष्ट्रप्रेम जैसी कोई चीज नहीं होती और फिक्सिंग की बात सामने आने उसके आहत होने वाली कोई बात हो।
ऐसे में पाकिस्तानी खिलाड़ियों के लिये नीलाम बोली न लगाना कोई राष्ट्रीय विषय नहीं होना चाहिये था पर इसे बनाया गया। पाकिस्तान में मातम मन रहा है तो उसके लिये स्यापा करने वाले कुछ लोग यहां भी हैं। उससे अधिक हैरान होने वाली बात तो यह कि उस पर खुश होने वाले भी बहुत हैं। कुछ लोगों ने तो भारतीय नेताओं पर आक्षेप करते हुए धनपतियों को महान बता डाला तो कुछ ने पाकिस्तान को अपने यहां भी ऐसा आयोजन करने का मजाकिया संदेश दिया। लगता है कि लोग समझे ही नहीं। लोग इसे पाकिस्तान पर एक फतह समझ रहे हैं और भारतीय धनपतियों को नायक! बाजार, सौदागर और उसके बंधुआ प्रचार माध्यमों का खेल को अगर नहीं समझेंगे तो यह भ्रम बना रहेगा।
जब भारत में कुछ लोग पाकिस्तानी खिलाड़ियों के लिये नीलाम बोली न लगने का जश्न मना रहे थे तब उस क्लब स्तरीय आयोजकों की एक प्रवक्ता अभिनेत्री एक संवाद सम्मेलन में यह बता रही थी कि ‘पाकिस्तान के खिलाड़ियों को यहां के ही कुछ लोगों की धमकियों की वजह से यहां न बुलाया गया।’
यह होना ही था। भारत की फिल्म और क्रिकेट को आर्थिक रूप से प्रभावित करने वाली कुछ ताकतें पाकिस्तान में हैं या नहीं कहना कठिन है पर इतना तय है कि भारतीय धनपतियों का मायावी संसार मध्य एशिया पर बहुत निर्भर करता है। पूरा मध्य एशिया भारत को रोकने के लिये पाकिस्तान का उपयोग करता है। यह संभव नहीं है कि भारत की कुछ आर्थिक ताकतें पाकिस्तान की अवहेलना कर सकें। इनकी मुश्किल दूसरी भी है कि पश्चिम के बिना भी यह भारतीय आर्थिक ताकतें नहीं चल सकती क्योंकि अंततः उनके धन संरक्षण के स्त्रोत वहीं हैं। यही पश्चिम पाकिस्तान से बहुत चिढ़ा हुआ है। पहले इस निर्णय के द्वारा पश्चिमी देशों को भी पाकिस्तान से दूरी का संकेत भेजा गया और भारत के कुछ संगठनों की धमकी की बात कर पाकिस्तान पर मरहम लगाया गया। भारतीय धनपतियों के नायकत्व की पोल तो उनकी प्रवक्ता वालीवुड अभिनेत्री के बयान से खुल ही गयी। इस लेखक ने कल अपने एक लेख में पाकिस्तान प्रचार युद्ध में भारत से हारने पर अपने मध्य एशिया मित्रों की मदद लेने का जिक्र किया था। यही कारण है कि क्लब स्तरीय प्रतियोगिता के आयोजकों को यह सब कहना पड़ा कि ‘यहां के कुछ संगठनों की धमकियों की वजह से ऐसा किया गया।’
यह संगठन कौन है? इशारा सभी समझ गये पर सच यह है कि ‘पाकिस्तानी खिलाड़ियों को यहां न बुलाने के लिये किसी ने बहुत बड़े संगठन ने धमकी दी हो ऐसा कहीं अखबारों में पढ़ने को नहीं मिला। इन संगठनों से लोगों को जरूर भारतीय धनपतियों का आभारी होना चाहिये जो उन्हें बैठे बिठाये इस तरह का श्रेय मिल गया।
हमें इन बातों पर यकीन नहीं है। कम से कम क्रिकेट में अब हमारे अंदर देशप्रेम जैसा कोई भाव नहीं है क्योंकि हमारे देश का राष्ट्रीय खेल तो हाकी है। इस निर्णय के पीछे दूसरा ही खेल नजर आ रहा है। इस तरह के फैसले में क्या छिपा हो सकता है? यह क्रमवार नीचे लिख रहे हैं।
1-सन् 2007 में पचास ओवरीय क्रिकेट प्रतियोगिता में भारत के हारने के बाद क्रिकेट की लोकप्रियता एकदम गिर गयी। तीन महान खिलाड़ियों के विज्ञापन तक टीवी चैनलों ने रोक दिये। एक वर्ष बाद हुई बीस ओवरीय प्रतियोगिता में विश्व कप में भारत जीता(!) तो फिर लोकप्रियता बहाल हुई। उसके बाद ही यह क्ल्ब स्तरीय प्रतियोगिता भी शुरु हुई और उसमें वही तीन महान खिलाड़ी भी शामिल होते हैं जिनको अभी तक भारत क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड की की बीस ओवरीय टीम के योग्य समझा नहीं जाता मगर बाजार के विज्ञापनों में उनकी उपस्थिति निरंतर रहती है। इन्हीं खिलाड़ियों की छवि भुनाने के लिये यह प्रतियोगिता आयोजित की जाती है इसमें पाकिस्तानी खिलाड़ियों का कोई अधिक महत्व नहीं है।
2-अंतिम बीस ओवरी प्रतियोगिता पाकिस्तान ने जीती और भारत का प्रदर्शन अत्यंत निराशाजनक रहा। इससे यकीनन क्रिकेट की लोकप्रियता गिरती लग रही है। कम से कम इस बीस ओवरीय प्रतियोगिता की लोकप्रियता अब संदिग्ध हो रही है। ऐसे में हो सकता है कि भारत के लोगों में राष्ट्रीय प्रेम और विजय का भाव पैदा कर इसके लिये उनमें आकर्षण पैदा करने का प्रयास हो सकता है। वैसे शुद्ध रूप से क्रिकेट प्रेमी अंतर्राट्रीय मैचों में दिलचस्पी लेते हैं पर ऐसे नवधनाढ्य लोगों के लिये यह क्लब स्तरीय मैच भी कम मजेदार नहीं होते। दूसरी बात यह है कि इन प्रतियोगिताओं में खेलने वालों को विज्ञापन के द्वारा भी धन दिलवाना पड़ता है। 26/11 के बाद भारत के जो स्थिति बनी है उसके बाद फिलहाल यह संभव नहीं है कि भारत में किसी पाकिस्तानी क्रिकेट खिलाड़ी का विज्ञापन देखने को लोग तैयार हों।
3-संदेह का कारण यह है कि अनेक देशों की टीमों के खिलाड़ियों की बोली नहीं लगी पर पाकिस्तान का जिक्र ही क्यों आया? अभिनेत्री प्रवक्ता आखिर यह क्यों कहा कि ‘यहां के कुछ लोगों की धमकी की वजह से ऐसा हुआ’, अन्य देशों की बात क्यों नहीं बतायी। संभव है कि यह प्रश्न ही प्रायोजित ढंग से किया गया हो। संदेह के घेरे में अनेक लोग हैं जो पाकिस्तान के लिये अपना प्रेम प्रदर्शन कर रहे हैं पर दूसरों के लिये खामोश हैं। दरअसल भारत में एक खास वर्ग है जो पाकिस्तान की चर्चा बनाये रखकर वहां के लोगों को खुश रखना चाहता है।
हमने पहले भी लिखा था कि भारत और पाकिस्तान का खास वर्ग आपस में मैत्री भाव बनाये रखता है और इस तरह उसका व्यवहार है कि दोनों देशों के आम नागरिक ही एक दूसरे के दुश्मन हैं। अभिनेत्री के बयान से यह सिद्ध तो हो गया कि कम से कम उसके अंदर पाकिस्तान के लिये शत्रुता का भाव नहीं है और पाकिस्तान क्रिके्रट खिलाड़ी भी भारत के मित्र हैं। इसका सीधा आशय यही है कि आम लोग ही पाकिस्तान के आम लोगों के शत्रु हैं।
कहने का अभिप्राय यह है कि पाकिस्तान के खिलाड़ियों की इस प्रतियोगिता में नीलाम बोली न लगना इस देश में राष्ट्रप्रेम के जज़्बात भुनाकर उसे अपने फायदे के लिये भी उपयोग करना हो सकता है। सबसे बड़ी बात यह है कि धनाढ्य वर्ग तो वैसे भी अपने व्यवसायिक हितों की वजह से नहीं लड़ता ऐसे आर्थिक उदारीकरण के इस युग में बाजार और सौदागर से एक बाजारु खेल में देशप्रेम की छवि दिखाने की आशा करना बेकार है। खासतौर से तब जब यहां का भारत का एक बहुत बड़ा तबका क्रिकेट को जानता नहीं है या फिर इसे अधिक महत्व नहीं देता। अलबत्ता बौद्धिक विलास में रत लोगों के लिये यह एक अच्छा विषय भी हो सकता है। एक आम लेखक के लिये यह संभव नहीं है कि वह कहीं से वास्तविक तथ्य जुटा सके। ऐसे में अखबारों और टीवी पर प्रसारित खबरों के आधार पर ही हम यह बातें लिख रहे हैं। सच क्या है! यह तो खास वर्ग के लोग ही जाने!
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कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
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20 सितंबर 2009

भारतीय प्रचारतंत्र और चीन-हिंदी व्यंग्य (indian media and china-hindi vyangya)

मीडिया यानि टीवी चैनल और समाचार पत्र-जिनकों हम संगठित प्रचारतंत्र भी कह सकते हैं-बिना सनसनी के नहीं चल सकते कम से कम उनमें काम करने वाले लोगों की मान्यता तो यही है। राई का पहाड़ और पहाड़ से निकली चुहिया को हाथी बनाने की कला ही प्रचारतंत्र का मूल मंत्र है। अब यह कहना कठिन है कि कितनी सनसनी खबरें प्रायोजित या स्वघटित हैं।
अभी कुछ दिनों पहले एक विदेशी चैनल का एक पत्रकार लोगों की हत्या कराकर उनके समाचारों को सनसनी ढंग से प्रसारित करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया। वह अपने व्यवसाय के सफलता के लिये ऐसी हरकतें कर रहा था। अभी हमारे देश के प्रचार तंत्र के लोगों की आत्मा मरी नहीं है कि वह ऐसी हरकतें करें पर ऐसी खबरें तो प्रायोजित करने के साथ प्रसारित कर ही सकते हैं जिससे किसी को शारीरिक हानि न पहुंचे न ही अपराध हो।
आखिर यह चल तो विदेशी ढर्रे पर ही रहे हैं। हो सकता है ऐसा न हो पर इधर चीन को लेकर जो सनसनी फैली है उसका तो न ओर मिल रहा है न छोर।

प्रचारतंत्र ने कह दिया कि घुसपैठ हुई। उसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई तो अनेक तरह के कथित प्रमाण लाये गये। आधिकारिक रूप से खंडन होते रहे हैं पर प्रचार तंत्र है कि बस अड़ा ही हुआ है कि घुसपैठ हुई। करीब दो सप्ताह से सनसनी फैली रही तब जाकर चीन की नींद खुली। मुश्किल यह है कि चीनी अपनी भाषा के अलावा दूसरी भाषा सीखते नहीं है इसलिये हिंदी के प्रचारतंत्र का उनको पता नहीं कि क्या चल रहा है?
किसी हिंदी भाषी ने ही उनको चीनी भाषा में लताड़ते हुए इन खबरों के बारे में पूछा होगा तब चीन ने आधिकारिक तौर पर भारतीय प्रचारतंत्र पर दुष्प्रचार का आरोप जड़ा। अभी तक भारत के रणनीतिकारों पर आक्रमण करने वाला चीन इतना बदहवास हो गया कि उसने सीधे ही प्रचारतंत्र को घेरे में ले लिया।
भारत की परवाह न करने वाला चीन पहली बार इतने तनाव में आया इस बात पर भारतीय प्रचारतंत्र को कुछ श्रेय दिया ही जाना चाहिए। इस प्रचारतंत्र को लेकर चीन भारतीय रणनीतिकारों से यह तो कह नहीं सकता कि इन पर नियंत्रण करो क्योंकि यह प्रचारतंत्र सरकारी नहीं है। भारत चीन से कह सकता है कि तुम अपने प्रचारतंत्र पर नियंत्रण करो क्योंकि वहां पर सरकार ही उसकी मालिक है। चीन का प्रचारतंत्र भी तो भारत के विरुद्ध विषवमन करता है और उसका सीधा आशय यही है कि वहां की सरकार यही चाहती है।
मगर इस बार चीन को भारतीय प्रचारतंत्र के रूप में जो असंगठित प्रतिद्वंद्वी मिला है उससे उसका पार पाना संभव नहीं है। सरकारी तौर पर नियंत्रण से परे इस प्रचारतंत्र की खूबी यह है कि कहता ही रहता है सुनता कुछ नहीं देखता है। एक शब्द देख लिया उस पर पूरा कार्यक्रम बना डाला। कहते हैं कि चीनी सुनते अधिक परबोलते कम हैं जबकि हमारा यह स्वतंत्र प्रचारतंत्र बोलता अधिक है सुनता कम। चीनी भी आखिर कुछ बोलेंगे पर उनका एक ही शब्द उनको परेशान कर डाल सकता है अगर भारतीय प्रचारतंत्र ने उसका नकारात्मक अर्थ लिया।
जब भारतीय प्रचारतंत्र उसके खिलाफ आग उगल रहा है तब कोई वहां के प्रचारतंत्र चुप बैठा हों यह संभव नहीं है मगर वह भारतीय प्रचारतंत्र का प्रसारण तो देखेंगे पर भारतीय प्रचारतंत्र उनकी तरफ नहीं देखेगा। यह उपेक्षासन का गुण भारतीय प्रचारतंत्र को विजेता बनाये हुए है। अपने विरुद्ध ऐसा प्रचार देख और सुनकर चीनी आग बबूला होकर कार्यक्रम बनायेंगे पर यहां देखेगा कौन? इससे उनकी आग और बढ़ जाती होगी।

इस प्रचार का ही नतीजा है कि दिल्ली में चीन के राजनयिक इधर उधर भागदौड़ करते रहे। एक तरह से चीन इस प्रचारतंत्र को लेकर भारत पर दबाव डाल रहा है पर यह उसके लिये परेशानी का कारण ही बनने वाला है। हो सकता है कि अभी यह प्रचारतंत्र चुप हो जाये पर अब चीन को आगे यह सब झेलना पड़ सकता है।
अपने प्रचारतंत्र का एक विषय पाकिस्तान तो बना ही हुआ है। उसके यहां अपने देश तथा विदेश के जो खुराफाती तत्व सक्रिय हैं उन पर हमारा प्रचारतंत्र अपनी बहुत सारी रील और शब्द खर्च कर चुका है। लोग उससे उकता गये हैं। लोगों को व्यस्त रखने के लिये एक दुश्मन तो चाहिये न! मुश्किल यह है कि चीन बहुत खौंचड़ी है पर उसने अपने यहां अपराधियों को पनाह नहीं दी है जिसको प्रचारतंत्र हीरो बना दे। वहां की हीरो तो बस सरकार ही है! अमेरिकी आर्थिक विशेषज्ञ कहते हैं कि उसकी विकासदर में अपराध के पैसे का भी योगदान है। ऐसे में वहां के किसी अपराधी का महिमामंडन तो यहां हो नहीं सकता। लेदेकर एक ही विषय बचता है ‘सीधा हमला’। भारतीय सैन्य विशेषज्ञ स्वयं मानते हैं कि सीमा का आधिकारिक अभिलेख न होने के कारण दोनों के सामने ऐसी समस्या आती है। जब भारत को समस्या आयी तो उसे इस तरह सीधा हमला प्रसारित कर प्रचारतंत्र ने जो गजब की फुर्ती दिखाई उसके लिये वह प्रशंसा के काबिल है क्योंकि उसने उस देश को हिला दिया जो किसी से डरता नहीं है। इसका यह भी नतीजा आ सकता है कि आगे चीन ऐसी गल्तियां न करे जिससे तिल का ताड़ बने।
वैसे एक खबर एक चैनल ने दूसरी खबर भी चलाई कि भारतीय बाघ का दुश्मन चीन। दरअसल वहां शेर की खाल से शराब बनती है और आरोप लग रहा है कि नेपाल के तस्करी के जरिये भारत से खाल चीन जाती है। शेरों का शिकार करने कोई चीनी नहीं आते बल्कि अपने ही देश के लोग यह काम करते हैं। इसमें चीन का पूरा दोष नहीं है पर तस्करी के द्वारा इस तरह शेरों की खाल जाने की जिम्मेदारी से वह बच भी नहीं सकता। फिलहाल दोस्ताना रूप से यह बात तो चैनल वाले मान भी रहे हैं पर यह दोस्ताना आगे जारी रहेगा-यह चीनियों को सोचना भी नहीं चाहिए। अपने देश में शेरों की हत्या कर देना कोई सामान्य मामला नहीं है पर जिस तरह चीन को लक्ष्य कर यह कार्यक्रम प्रस्तुत किया गया उससे तो लग रहा है कि चीन पर प्रचारतंत्र की नजर पड़ गयी है। आने वाले समय में ऐसे बहुत सारे कार्यक्रम आ सकते हैं जिस पर चीन बौखला सकता है। इसकी वजह यह है कि वहां की हर गतिविधि के लिये सरकार सीधे जिम्मेदार मानी जाती है। अभी कुछ दिनों पहले भारत के नाम से नकली दवाईयां नाइजीरिया में भेजने के मामले में चीन फंस चुका है। भारतीय प्रचारतंत्र अभी तक चीन को समझता नहीं था पर अब उसे लगने लगा कि वहां की सरकार भारत को परेशान करने के लिए अपराध की हद तक जा सकती है। अपराध की भनक भी प्रचारतंत्र के कान खड़े कर सकती है क्योंकि सनसनी तो उसी ही फैलती है न! यहीं से चीन भी अब उसके दायरे में आ गया है क्योंकि उसके साफसुथरे और संपन्न होने का तिलिस्म भारतीय प्रचारतंत्र के सामने खत्म हो गया है। अब चीन के सामने एक केवल एक मार्ग है वह प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष से भारत के विरुद्ध अपराध होने को रोक दे नहीं तो जितना वह करेगा उससे अधिक तो भारतीय प्रचारतंत्र बतायेगा। इसे रोकना किसी के लिये संभव नहीं है।
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23 मार्च 2009

तब एकमत हो पाएंगे-लघु हास्य व्यंग्य

वह दोनों बैठकर टीवी के सामने बैठकर समाचार सुन और देख रहे थे। उस समय भारत की जीत का समाचार प्रसारित हो रहा था। एक ने कहा-‘यार, आज समाचार सुनाने वाली एंकर ने क्या जोरदार ड्रेस पहनी है।’
दूसरे ने कहा-‘हां, आज हरभजन ने आज जोरदार गेंदबाजी की इसलिये भारत जीत गया।
पहला-‘आज एंकर के बाल कितने अच्छे सैट हैं।
दूसरा-हां, सचिन जब सैट हो जाता है तब तो उसे कोई आउट नहीं कर सकता।
पहला-दूसरी तरफ जो एंकर है वह भी बहुत अच्छी है, हालांकि उसकी ड्रेस आज अच्छी नहीं थी।
दूसरा-‘हां, आज दूसरी तरफ गंभीर जम तो गया था पर उससे रन नहीं बन पा रहे थे। ठीक है यार, कोई रोज थोड़े ही रन बनते हैं।
पहले ने कहा-‘आज वाकई दोनों लेडी एंकरों की जोड़ी रोमांचक लग रही है।’
दूसरे ने कहा-‘हां, आज वाकई मैच बहुत रोमांचक हुआ। ऐसा मैच तो कभी कभी ही देखने को मिलता है।’
अचानक पहले का ध्यान कुछ भंग हुआ। उसने दूसरे से कहा-‘मैं किसकी बात कर रहा हूं और तुम क्या सुन रहे हो?’
दूसरे ने कहा-‘अरे यार, मैं तो क्रिकेट की बात कर रहा हूं न। आज भारत ने मैच रोमांचकर ढंग से जीत लिया। सामने टीवी पर उसका समाचार ही तो चल रहा है।
पहले ने कहा-‘अरे, आज भारत का मैच था। मैंने तो ध्यान ही नहीं किया। क्या आज भारत मैच जीत गया? मजा आ गया।’
दूसरे ने आश्चर्य से पूछा-‘पर तुम फिर क्या देख और सुन रहे थे? यह टीवी पर क्रिकेट के समाचार ही तो आ रहे हैं पर तुम किसकी बात कर रहे थे?’
तब तक टीवी पर विज्ञापन आना शुरु हो गये। पहले कहा-‘छोड़ो यार, अब तो देखने के लिये विज्ञापन ही बचे हैं। चलो चैनल बदलते हैं।’
दूसरा चैनल बदलने लगा तो पहले ने कहा-‘देखें दूसरे चैनल पर पुरुष एंकर है या महिला? कोई दूसरा चैनल लगाकर देखो।
दूसरे ने कहा-‘यार, खबर तो सभी जगह भारत के जीतने की आ रही होगी। कहीं भी देखो। चैनल वालों में एका है कि वह एक ही समय पर कार्यक्रम दिखायेंगे ताकि दर्शक उनकी तय खबरों से भाग न सके।’
सभी जगह विज्ञापन आ रहे थे। पहले वाले ने झल्लाकर कहा-‘ओह! सभी जगह विज्ञापन आ रहे हैं। मजा नहीं आ रहा। चलो कहीं फिल्म लगा दो। शायद वहीं दोनों एकमत होकर देख और सुन पायेंगे।
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5 दिसंबर 2008

जंग के लिए मित्रों का जमावडा जरूरी -आलेख

1971 का भारत पाक युद्ध जिन लोगों ने देखा है वह यह बता सकते हैं कि उसमें इस देश ने क्या पाया और खोया? सच तो यह है कि वहां से इस देश के हालत बिगड़े तो फिर कभी संभले ही नहीं। भारतीय अर्थव्यवस्था में महंगाई और बेरोजगारी का दौर शुरू हुआ तो वह आज तक थमा ही नहीं है।

कुछ लोगों को लगता है कि देश का प्रबुद्ध वर्ग केवल बहस कर ही अपना काम चलाता है पर इसका कारण यह है कि 1971 के युद्ध की विजय का उन्माद जब थम गया तब उसके बाद जो हालत इस देश में हुए उसकी कल्पना नहीं की जा सकती। सच तो यह है कि युद्ध के बाद इस देश के आम और खास दोनों प्रकार कम आदमियों में नैतिक चरित्र का गिरावट का ही प्रमाण मिला। उस सयम अमेरिका सहित अनेक देशों ने भारत पर प्रतिबंध लगाये थे जिससे देश में खाद्य सामग्री के साथ ही मिट्टी के तेल का संकट भी शुरू हो गया था। उस समय बाजार में सामान्य ढंग से उपलब्ध गेहूं, चावल, शक्कर,डालडा घी, मिट्टी का तेल, लक्स और लाईफबाय साबुन बाजार से गायब हो गये और उनको राशन की दुकानों पर बेचा जाने लगा। वैसे उस समय कालाबाजार का दौर शुरू हो गया पर आम आदमी की अधीरता का परिचय दे रहा था। लोगों ने मिट्टी के तेल के कनस्तर भरकर घर में रख लिये जैसे कि एक दिन फिर वह मिलने वाला ही न हो। लाईफबाय और लक्स साबुन को वह लोग भी राशन से लेने लगे जो उसका उपयोग नहीं करते थे। उनको भी यह डर लगने लगा कि कहीं अन्य साबुन मिलना भी बाजार में बंद न हो जाये। जिन लोगों को अपने काम से फुरसत नहीं थी वह अपने बच्चों को इस काम में लगाने लगे। लोग उस समय आवश्यकता से अधिक संग्रह कर रहे थे गोया कि बाजार में प्रलय हो जायेगी। आशय यह है कि फिलहाल तो लोग युद्ध की बात कर रहे हैं पर क्या वह उसके समाप्त होने पर अपने भविष्य को लेकर धीरज रख पायेंगे?

युद्ध के बाद बंग्लादेश की सहायता के लिये कर लगाया गया जो बहुत समय तक चला। अनेक चीजों में वह कर लगा था पर पता नहीं वह सभी सरकारी खजाने में जमा हुआ कि नहीं। आज के अनेक प्रबुद्ध लोगों ने यह दृश्य देखे हैं और इसलिये ही वह दोनों देशों के बीच बृहत युद्ध के विचार को खारिज करते हैं। अंतर्जाल पर अनेक ब्लाग लेखकों ने देश के खास वर्ग के लोगों के नैतिक चरित्र पर उंगली उठायी है पर उनको यहां के आम आदमी का चरित्र भी देखना चाहिये। 1971 का युद्ध जब तक चला खूब उन्माद था। लोग रातभर जागकर अपनी गलियों,मोहल्लों में पहरा देते थे कि कहीं दुश्मन का जासूस न आ जाये। जैसे ही युद्ध समाप्त हुआ सभी लोगे अपने स्वार्थ पूर्ति को लेकर अधीर हो गये और उसके बाद भारतीय अर्थव्यव्स्था में गरीब और अमीर के बीच का भेद बढ़ता ही गया और कालांतर में वह इतना विकराल रूप ले बैठा जिसे आज भी देश भुगत रहा है।
1971 में भारत ने जिस बंग्लादेश को आजाद कराया वह भी कोई पाकिस्तान से कम खतरनाक नहीं है। उसके यहां आतंकवादियों के अनेक शिविर है पर वह उनसे इंकार करता है। पूर्वांचल में चल रहा आतंक केवल उसी के सहारे चल रहा है और इस पर भी वह भारत को आंखें दिखाता है। सच बात तो यह है कि 1971 का विजय अपने आप में एक भ्रम साबित हुई है। ऐसे मेें 37 वर्ष बाद किसी ऐसे दूसरे युद्ध को बिना सोचे प्रारंभ करने का प्रबुद्ध लोग विरोध कर रहे हैं तो उनकी बात भी विचारणीय है पर इसका मतलब यह नहीं है कि कोई सीमित कार्यवाही नहीं की जानी चाहिये।

इसके लिये पाकिस्तान की अंदरूनी स्थिति का फायदा उठाना कोई मुश्किल काम नहीं है। पाकिस्तान में पंजाब प्रांत के प्रभाव का उसके तीन अन्य प्रांतों-सिंध, बलूचिस्तान और सीमा प्रांत में जमकर विरोध होता है। देखा जाये तो पाकिस्तान ने मजहब पर आधारित आतंकवाद को अपने देश में पनाह देकर अपने देश को एक ही किया यह अलग बात है कि अब यह आतंकी अपना खेल उसके इन्हीं क्षेत्रों में दिखाने लगे। आज भी पाकिस्तान का संविधान उसके एक बहुत बड़े भूभाग पर नहीं चलता। ऐसे ही भूभाग पर उसने विदेशी आतंकियों को स्थापित किया है जिनकी वजह से वहां के लोग उसके नियंत्रण में है।
अफगानिस्तान पर सोवियत संध के कब्जे के बाद जब अमेरिका ने उसके खिलाफ युद्ध शुरू किया तो बलूचिस्तान और सीमा प्रात में आतंकवादियों के अड्डे बनाये। सोवियत संघ के वहां से हटने के बाद अमेरिका ने भी उन आतंकियों से मूंह फेर दिया पर उन्होंने इसका बदला उसके यहां वर्डट्रेड सेंटर ध्वस्त कर लिया। उसके बाद अमेरिका ने आतंकवादियों के विरुद्ध जंग छेड़ ली और किसी न किसी स्तर पर भारत ने उसका समर्थन दिया।

अब अमेरिका के समर्थन की भारत को दरकरार है। सच तो यह है कि वह इस समय विश्व का सर्वाधिक संपन्न और शक्तिशाली राष्ट्र है पर वह भारत विरोधी आतंकियों के प्रति उसका रवैया उतना सख्त नहीं है। अब अगर वह भारत को समर्थन देकर आतंकियों के शिविरों को तहस नहस करने के लिये समर्थन देता है तभी कोई सीमित सैन्य कार्यवाही की जा सकती है। उसके बिना ऐसा करने पर बृहद युद्ध छिड़ जाने की आशंका भी बलवती हो सकती है। अब जो कूटनीतिक गतिविधियां विश्व के परिदृश्य पर उभर रही हैं उससे यह कहना आसान नहीं है कि भारत कोई सीमित कार्यवाही भी कर सकेगा। अमेरिका अगर यह मान लेता है कि भारत विरोधी आतंकी उसके भी दुश्मन है तो ठीक है। इसके विपरीत अगर वह अमेरिका को यह समझाने में सफल हो जाते हैं कि वह उसके विरोधी नहीं हैं तो शायद वह वैसा समर्थन नहीं दे। वैसे अमेरिका ने अभी पूरी तरह अपने पते नहीं खोले हैं पर इतना तय है कि वह पाकिस्तान के प्रति अभी झुका हुआ है पर उसे अब भारत के प्रति भी अपना समर्थन व्यक्त करना होगा क्योंकि यह तो वह भी मानता है आतंकवाद के विरुद्ध संघर्ष में भारत का उसे सहयोग मिलता रहा है। 1971 में भारत की विजय पर उसी ने ही प्रतिबंध लगाकर पानी फेरा था यह इस देश का प्रबुद्ध वर्ग जानता हैं। यह तब की बात है कि जब वह इतना शक्तिशाली नहीं था।
मगर यह सभी अनुमान है। आगे कैसा समय आने वाला है यह कहना कठिन है। अपने जन्म के बाद भारी मंदी से जूझ रहे अमेरिका को कई तरह से भारत की आवश्यकता है। ऐसे में यह भी संभव है कि वह कोई ऐसी योजना बना रहा हो जिससे कि सांप भी मर जाये और लाठी भी न टूटे। पाकिस्तान पर उसकी पकड़ स्पष्ट है और इसके बावजूद अगर वहां भारत विरोधी आतंकी मौजूद हैं तो शक के घेर में वह स्वयं भी आ जाता है। कुल मिलाकर मामला यह है कि भारत को विश्व के सभी देशों को साथ लेकर कोई कार्यवाही करनी होगी क्योंकि अकेले तो अमेरिका भी अभी आंतकवाद के विरुद्ध विजय प्राप्त नहीं कर सका है। किसी युद्ध में विजय अनिश्चित होती है इसलिये काफी विचार कर ही उसे शुरु करना चाहिये। युद्ध से पहले अपने मित्रों का जमावड़ा बड़ी संख्या में करना चाहिये ताकि समय आने पर वह मदद कर सकें।
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6 नवंबर 2008

शुरू से आखिर तक दुनियां में ओबामा ही छाए रहे-संपादकीय

अमेरिका 232 वर्ष के इतिहास में पहली बार कोई अश्वेत राष्ट्रपति बना है। बराक ओबामा ने वहां चुनाव में विजय हासिल कर ली है। हालांकि पहले भी अमेरिका में चुनाव होते रहे हैं, पर शायद यह पहली बार है कि प्रतिद्वंद्वी उम्मीदवार का नाम भी लोग नहीं जान पाये-जी हां, उनका नाम जान मैक्कैन है। एक तरह से ओबामा की की इस जीत में प्रचार माध्यमों के साथ अंतर्जाल पर इतना प्रचार हुआ कि उनका कोई प्रतिद्वंद्वी भी है इसका आभास ही नहीं होता था। ऐसा लगता है कि वह तो अकेले ही दुनियां के इस शक्त्शिाली पद की की तरफ बढ़ रहे हैं। अमेरिका के इस राष्ट्रपति चुनाव में अन्य प्रचार माध्यमों के साथ ही अंतर्जाल ने ओबामा को विजयी पाने का निश्चय कर लिया था और इसमें सफलता मिली-ऐसा अब प्रतीत होता है।
पहले अमेरिका के पूर्व बिल क्लिंटन की पत्नी हैनरी क्लिंटन के साथ पार्टी में ही उम्मीदवारी पर हुई प्रतिद्वंद्वता के दौरान दोनों को खूब प्रचार मिला। विश्व भर के प्रचार माध्यमों के साथ अंतर्जाल पर भी दोनों के बारे में खूब लिखा गया। जहां भी देखो वही ओबामा और हैनरी क्लिंटन के नाम पर कुछ न कुछ लिखा जरूर कुछ न कुछ जरूर मिलता था। जब तक हैनरी क्लिंटन अपनी पार्टी में उनकी प्रतिद्वंद्वी रही तक उनका नाम जरूर चमका पर बाद में अकेल ओबामा ही पूरी दुनियां में छा गये। न केवल प्रचार माध्यमों बल्कि अंतर्जाल पर भी उनके बारे में इतना लिखा गया कि चुनाव में उनके प्रतिद्वंद्वी का नाम तो शायद अब बहुत कम ही लोग याद रख पायें।

वर्डप्रेस पर लिखने वाले ब्लाग लेखक जब भी अपने ब्लाग के डेशबोर्ड की तरफ जाते तब उनके सामने ओबामा पर लिखा गया कोई न कोई पाठ अवश्य पड़ जाता। इससे यह आभास हो गया था कि ओबामा ही वहां के राष्ट्रपति बनेंगे क्योंकि अमेरिका में इंटरनेट का उपयोग बहुत होता है। हालांकि भारत में भी प्रयोक्ता कम नहीं है पर उनके उद्देश्य सीमित है और बहुत कम लोग अभी पढ़ने लिखने के लिये तैयार दिखते हैं इसलिये अंतर्जाल के सहारे यहां किसी को ऐसी सफलता की तो सोचना भी नहीं चाहिये। इस लेखक ने पिछले छह माह से ऐसा कोई दिन नहीं देखा जब ओबामा के नाम पर लिखा गया कोई पाठ उसके सामने न पड़ा हो।

हालांकि पहले यह लगा कि यह एकतरफा प्रचार भी हो सकता है क्योंकि अमेरिकी मतदाता शायद प्रचार माध्यमों की लहर में न बहें जैसा कि भारत में देखा जाता है पर लगता है कि वहां भी ऐसा ही हुआ हैं-कम से कम चुनाव परिणाम देखकर तो यही लगता है।

ओबामा की जीत को सबसे बड़ा महत्वपूर्ण पहलू यह है कि वह अमेरिका के पहले अश्वेत राष्ट्रपति हैं। अमेरिकनों पर रूढि़वादी होने को आरोप लगता है पर जिस तरह वहां पहला अश्वेत राष्ट्रपति बना इस बात को प्रमाण है कि वहां वाकई खुली विचार धारा पर चलने वाला समाज है। यही कारण है कि लाख विरोधों के बावजूद आज भी अमेरिका लोगों को भाता है। ओबामा ने इस चुनाव प्रचार के दौरान भारत के प्रवासी और अप्रवासी भारतीयों को प्रसन्न करने वाली बहुत सारी बातें कही-कुछ लोगों ने तो उनकी जेब में हनुमान जी की मूर्ति होने की बात भी लिखी। पाकिस्तान के प्रति उनके बयान कोई अधिक उत्साहवर्धक नहीं हैं पर यह तो भविष्य ही बतायेगा कि वह क्या करते हैं-क्योंकि भाषणों में कोई बात कहना अलग बात है और शासन में आने पर उन पर चलना एक अलग मामला है। शासन में अनेक अधिकारीगण अपने हिसाब से चलने को भी बाध्य करते हैं। वैसे भी अमेरिका की विदेश नीति में सबसे अधिक अपने हित ही महत्वपूर्ण होते हैं बाकी सिद्धांत तो ताक पर रखे जा सकते हैं।

वैसे जहां तक भारत और अमेरिकी संबंध हैं तो वह निरंतर बढ़ ही रहे हैं और उनमें कोई रुकावट आयेगी इसकी संभावना नहीं लगती। इधर पाकिस्तान मेें अमेरिका हस्तक्षेंप बढ़ रहा है उससे दोनों का आपसी विवाद बढ़ सकता है। वैसे भी चीन और पाकिस्तान के संबंध जिस दौर में जाते दिख रहे हैं. और ऐसा लग रहा था कि चुनावों में व्यस्तता के कारण अमेरिका प्रशासन उन पर उदासीनता दिखा रहा है-उस पर ओबामा का क्या नजरिया है यह जानना कई लोगों की दिलचस्पी का विषय है। अभी तक श्वेत राष्ट्रपति चुनने वाले अमेरिकन मतदाताओं ने एक अश्वेत राष्ट्रपति को चुनकर अपने उदार और खुले दिमाग का होने का परिचय दिया उससे विश्व के अन्य समाजों को सीखना चाहये। खासतौर से एशिया के देशों के लोगों को सीखना चाहिये जो संकीर्ण विवादों में ही अपना समय नष्ट करते हैं और आदमी की काबलियत देखने की बजाय उसकी जाति,धर्म,भाषा, और क्षेत्र देखते हैं। जिस तरह विश्व में आर्थिक मंदी छायी हुई है और उससे विश्व में अनेक प्रकार के समीकरण बदलने की संभावना है उसे देखते हुए ओबामा का यह कार्यकाल उनके पूर्ववर्ती राष्ट्रपतियों से अधिक एतिहासिक और व्यस्त भी रह सकता है। कम से कम एक बात तो यह है कि वह जार्ज बुश से अधिक वह भारत के बारे में जानते हैं। जार्जबुश ने अपने चुनाव के दौरान भारत के बारे में अपनी अनभिज्ञता प्रकट की थी जबकि ओबामा ने कई बार भारत का नाम लिया। अपने चुनाव प्रचार में भारत द्वारा चंद्रयान भेजने पर उन्होंने अपने नासा के कार्य में सुधार की बात कही यह इस बात का प्रमाण है।
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