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13 नवंबर 2012

आओ, ज्ञान दीप जलाएं-दीपावली पर विशेष हिंदी लेख,aao, gyan deep jalayen-deepawali par vishesh hindi lekh)

    आज सारे देश में दीपावली का पर्व मनाया जा रहा है।  वैसे कहने को तो  यह पर्व मूल रूप से भगवान श्रीराम की लंकाविजय के बाद अयोध्या वापसी पर हुए उत्सव के क्रम में मनाया जाता है पर इस पर सर्वाधिक पूजा श्री लक्ष्मी जी अधिक  की होती है।  आजकल भौतिकतावादी समाज के लिये भगवान राम के नाम का स्मरण करने की बजाय लक्ष्मी पर ध्यान रखना अधिक महत्वपूर्ण हो गया है।  भगवान श्रीराम के चरित्र के अनेक पक्ष हैं जिनमें सबसे अधिक उनका त्यागी भाव है।  अपने पिता के आदेश पर एक ही पल में अयोध्या के राज का उन्होंने त्याग कर जो अपनी लीला की उससे एक ही संदेश मिलता है कि अगर समाज की रक्षा और कल्याण करना हो तो उसके लिये राज्य की नहीं बल्कि राजसी इच्छाशक्ति की आवश्कता होती है।  इसके लिये यह आवश्यक है कि अध्यात्म का ज्ञान और बौद्धिक पराक्रम  मनुष्य के पास हो और यह बिना नियमित अभ्यास के नहीं आता।  अगर आदमी अध्यात्मिक ज्ञान का अभ्यास करे तो उसके सांसरिक कार्य भी योगानुष्ठान  बन जाते हैं।  जो मनुष्य सात्विक भाव से घर और व्यापार में रत रहता है उसे किसी अन्य प्रकार से यज्ञ की आवश्कता नहीं है।
     आज जब समाज में धर्म के नाम पर पाखंड बढ़ गया है तब अध्यात्मिक ज्ञान का रट्टा लगाने वालों की बन आयी है।  लोग व्यवसायिक धार्मिक कार्यक्रमों में जाकर अपने आपको ही भक्त होने का यकीन दिलाते हैं।  जैसे वक्ता वैसे ही श्रोता। ज्ञान बघारने वाले स्वयं ही उसे धारण किये दृष्टिगोचर नहीं होते।  ज्ञान को धारण करने की क्रिया को ध्राण शक्ति कहा जाता है और यह उन्हीं के पास हो सकती है जिनकी प्राणशक्ति तीक्ष्ण हो। यह प्राणशक्ति तभी प्राप्त हो सकती है जब कोई प्रातःकाल उठकर योगभ्यास और ध्यान करने के साथ ही मंत्रों का जाप करे।  देखा जा रहा है कि लोग केवल अर्थोपार्जन करना ही शक्ति का स्त्रोत मानते हैं। यही कारण है कि समाज का कथित सभ्रांत वर्ग अब क्षीण प्राणशक्ति के साथ जीवन व्यतीत कर रहा है।  यह अलग बात है कि लोग ज्ञान के लिये यज्ञ, हवन तथा अन्य कार्यक्रम आयोजित कर अपनी श्रेष्ठता प्रमाणित करने का प्रयास करते हैं।
मनुस्मृति में कहा गया है कि
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ज्ञानेनैवापरे विप्राः यजन्ते तैर्मखःसदा।
ज्ञानमूलां क्रियामेषा पश्चन्तो ज्ञानचक्षुषा।।
       हिन्दी में भावार्थ-कुछ गृहस्थ विद्वान अपनी क्रियाओं को अपने ज्ञान नेत्रों से देखते हैं। अपने कार्य को ज्ञान से संपन्न करना  भी एक तरह से यज्ञानुष्ठान है।  वह ज्ञान को महत्वपूर्ण मानते हैं इसलिये उन्हें श्रेष्ठ माना जाता है।
ब्राह्मो मुहूर्ते बुध्येत धर्मार्थो चानुचिन्तयेत्।
कायक्लेशांश्च तन्मूलान्वेदातत्तवार्थमेव च।।
      हिन्दी में भावार्थ-ब्रह्म मुहूर्त में उठकर धर्म का अनुष्ठान करने के बाद अर्थोपार्जन का विचार करना चाहिए।  इस शुभ मुहूर्त में शारीरिक क्लेशों को दूर करने के साथ ही वेदों के ज्ञान पर विचार करना भी उत्तम रहता है।
     इस दिवाली पर  प्रचार माध्यमों  दो बड़े ठगी के समाचार जोरो से चल रहे हैं।  ठगों ने अरबों रुपये की ठगी की और लाखों लोगों को चूना लगाया।  ठग पकड़े गये जिनकी सभी चर्चा कर रहे है  मगर शिकार हुए लोगों की बुद्धि पर कोई विचार नहीं दे रहा।  प्रश्न यह है कि कोई आदमी आपको एक साल में चार गुना धन देने या फिर बीस प्रतिशत व्याज देने का वादा कर रहा है क्या उसकी पृष्ठभूमि के बारे  में लोग पता करते हैं? नहीं न!  एक ने दो, दो ने चार और चार ने आठ को सुनाया। इस तरह संख्या सैंकड़ों और फिर लाखों तक पहुंच गयी।  यह भेड़चाल कही जाती है।  बीस लाख ठगे गये इसमें ठगों की चालाकी कम लोगों की ध्राणशक्ति की क्षीणता का अधिक प्रमाणित होती है।  पैसा बुद्धि हर लेता है पर इतनी कि मेहनत से कमाया गया पैसा कोई आदमी दूसरे पर यकीन कर इस तरह देता है तो यह सवाल भी उठेगा ही क्या हमारे समाज की बौद्धिक शक्ति इतनी क्षीण हो गयी है। आधुनिक शिक्षा पर भी प्रश्न  उठता है क्योंकि ठग कम और शिकार लोग अधिक शिक्षित हैं।  इन दोनों ठगों की पोल दिपावली पर इसलिये खुली क्योंकि जिन्होंने धन लगाया था उन्हें बाज़ार से सामान खरीदने के लिये अब चाहिये था।  नहीं मिला तो वह इधर उधर भागे और टीवी चैनलों के लिये  एक सनसनीखेज खबर बन गयी।
     बहरहाल दीपावली का पर्व मनाने वाले अपने अपने तरीके से मनाते हैं।  इस समय ज्ञान और ज्ञानसाधक अध्यात्मिक दृष्टि से अपने समय का उचित प्रयोग करना चाहते हैं तो जिनके पास धन है खर्च करने के लिये बाज़ार की तरफ देखते हैं।  आर्थिक विशेषज्ञ कहते हैं कि देश में पिछले कुछ वर्षों से करोड़पतियों की संख्या बढ़ी है।  वह विकास दर पर यह कहते हुए खुश होते हैं कि देश में अमीर बढ़ रहे हैं।  समाजशास्त्री यह बताते हुए चिंतित होते हैं कि देश मे अपराध बढ़े हैं।  अध्यात्मवादी जानते हैं कि इस भौतिकवादी युग में लोगों की ध्राणशक्ति कमजोर पड़ी है इसलिये शिकार और शिकारी लोगों की संख्या भी बढ़ी है और इसे रोकने के लिये तत्वज्ञान के अध्ययन के लिये प्रेरणामयी अभियान चलाने केे अलावा  अन्य कोई मार्ग नहीं है। 
चलिये अपने अपने तरीके से दीपावली का पर्व मनायें।  इस पावन पर इस ब्लॉग के पाठकों और लेखक मित्रों को बधाई।  उनके लिये मंगलकामनायें।
लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poet-Deepak raj kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर
poet, writer and editor-Deepak 'BharatDeep',Gwalior
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2 फ़रवरी 2010

अंतहीन मुद्दे-हिन्दी आलेख (antahin mudde-hindi lekh)

समझ में नहीं आता क्या कहें और क्या नहीं! कुछ न कहें या चुप रहें। चारों तरफ द्वंद्व देखकर मन को दुःख होता है-‘अरे, यार यह लोग क्यों आपस में शाब्दिक युद्ध कर रहे हैं।’

मुद्दा क्या है, तर्क क्या है? समझ में नहीं आता। कुछ मसले तो कभी हल होने वाले नहीं है क्योंकि वह समाज को व्यस्त रखने के लिये बनाये गये हैं।’

एक मुद्दे पर बरसों हो गये एक तर्क देते हुए! दूसरे को भी वही वितर्क करते हुए बरसों हो गये। मामला सुलझने की बात आये तो लोग नाकभौं सिकोड़ते हैं क्योंकि अगर ऐसा हुआ तो आगे बहस किस बात पर करेंगे।

हवा मे तीर चला रहे हैं क्योंकि अहिंसक प्रवृत्ति के हैं। दुश्मन कौन है, कोई दूसरा देश, समाज, परिवार या कोई पशु! बस लड़ रहे हैं! जिंदगी में मनोरंजन के लिये यह जरूरी है।  कोई देश को दुश्मन बताता है कोई वहां के लोगों को!  अनेक बार भ्रम होता है कि कोई देश बुरा है तो उसके लोग कैसे अच्छे हो सकते हैं और अगर लोग अच्छे हैं तो देश कैसे अच्छा हो सकता है।

इस देश में आजादी के बाद जितने भी मुद्दे पैदा हुए वह फिर कभी खत्म नहीं हुए।  उन पर बहस नित्य चलती हैं।  मुद्दे पैदा करने अपनी जगहों से हट गये पर उनकी चर्चा बराबर होती रही।  अनेक लोग उन मुद्दों पर लिखते पढ़ते स्वर्ग सिधार गये और अब उनकी पीढ़िया उन मुद्दों की चर्चा में व्यस्त हैं। कही बेटा तो कही भतीजा वारिस तो कहीं बेटी वारिस-धन के साथ उनको मुद्दे भी विरासत में मिलते हैं।  मुद्दा कोई भौतिक स्वरूप नहीं लेता पर वंशवादी इस देश में वह भी एक विरासत बन गया है।

ऐसे में किनारे पर खड़ा आदमी जानता है  कि वह मुद्दा केवल दिखावा है। मगर वह भी वहीं ध्यान लगाये खड़े हैं।  क्या करें, उनको कहीं ध्यान लगाना है।  वह सोचता है कि इसके अलावा क्या करे?  मुद्दा बिना मतलब का है पर है तो!  अगर न होता तो किसे देखते, किस पर चर्चा करते? एक खास वर्ग है जो चाहता है कि आम इंसान का ध्यान उस पर न जाये और उसका काम चलता रहे। उसका एक चाटुकार वर्ग है जो चाहता है कि उसका बौद्धिक विलास बना रहे और आम इंसान के ध्यान को अपनी तरफ खींचकर खास वर्ग का लक्ष्य पूरा करे। इसकी उसे कीमत मिलती है और    वही मुद्दे बनाता है और बेचता है। एक आम इंसान का वर्ग है जिसे मनोरंजन चाहिये। मनोरंजन यानि दिल बहलाने वाला मुद्दा।

मुद्दा बेचने वाले भी खूब हैं। यह अखबार, टीवी और फिल्म हैं ही इसलिये।  गरीब का कल्याण, महिलाओं का उद्धार, देशभक्ति, क्रिकेट, और भक्ति जैसे अंतहीन मुद्दे।  जाति, भाषा, धर्म और क्षेत्र के नाम पर झगड़े के मुद्दे।  बाजार के सौदागर मुद्दो को नवीन बनाये रखने के लिये उसका उठाने वाले चेहरे बदल लेते हैं।  इसमें पूरी तरह ईमानदार हैं। बाप ने अगर मुद्दा बनाया तो बदले चेहरे के रूप में बेटा लाते हैं। आपसी झगड़ा हो तो बेटी भी लाते हैं।  कहीं बहु, कहीं भतीजा-बस रक्त से उत्पन्न होने का आभास होना चाहिये। भांजा या भांजी नहीं चलेगी।

मुद्दों की महिमा अपरंपार है।  गरीबी कभी खत्म नहीं होगी। महिलाओं के साथ बदतमीजी पूरी तरह बंद नहीं होगी।  मजदूर का शोषण कभी खत्म नहीं होगा।  इस धरती पर कहीं स्वर्ग तो कहीं नरक हमेशा रहेगा क्योंकि इंसान खुद ही अपने कर्म से यह बनाता है। योगी जहां भी है स्वर्ग बनायेगा। भोगी जहां जायेगा नरक का निर्माण करेगा।  भोगी का कल्याण तब तक नहीं होगा जब तक योगी नहीं होगा मगर कुछ लोग हैं जो रोगियों को मद्दों की दवा पिला कर ठीक कर रहे हैं-यकीनन वह न चिकित्सक न चिंतक।  वह स्वयं ही रोगियों से भी बड़े रोगी हैं जो हमेशा रहने वाले मुद्दों के हल होने के ख्वाब देखते और दिखाते हैं।
कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
http://anant-shabd.blogspot.com

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29 जनवरी 2010

चुटकुले और हास्य कविताऐं भी साहित्य होती हैं-आलेख (chutkule aur sahitya-hindi lekh)

पता नहीं कुछ लोग चुटकुलों को साहित्य क्यों नहीं मानते, जबकि सच यह है कि उनके सृजन में वैसे ही महारथ की आवश्यकता होती है जैसी कि कहानी या व्यंग लिखने में। चुटकुलों में ही एक अधिक पात्र सृजित कर उनसे ऐसी बातें कहलायी जाती हैं जिनसे स्वाभाविक रूप से हंसी आती है और पाठक इस बात की परवाह नहीं करता कि वह साहित्य है या नहीं।
चुटकुलों की तरह हास्य कविताओं को भी अनेक लोग साहित्य नहीं मानते जबकि उनकी लोकप्रियता बहुत है। ऐसे में सवाल यह है कि साहित्य कहा किसे जाता है?
क्या उन बड़ी बड़ी किताबों को ही साहित्य माना जाये जिनको एक सीमित वर्ग का पाठक वर्ग पढ़ता है और बहुतसंख्यक वर्ग उनका नाम तक नहीं जानता। अनेक पुस्तकें तो ऐसी होती हैं कि किसी मध्यम रुचि वाले पाठक को सौंप दी जाये तो वह उसे हाथ में लेकर एक तरफ रख देता है। क्या साहित्य उन पुस्तकों को माना जाये जिनमें अनेक पात्रों वाली उलझी हुई निष्कर्ष से पर कहानी हो या जिनको पाठक पढ़ते हुए यही याद नहीं रख पाता कि कौन से पात्र की भूमिका क्या थी? क्या साहित्य उन निबंधों को माना जाये जिसका आम आदमी की बजाय केवल समाज के एक खास वर्ग के आचार विचार से संबंधित सामग्री होती है?
पता नहीं साहित्य की क्या परिभाषा हो सकती है, पर हमारी नज़र में जो रचना अधिक से अधिक पाठक वर्ग को प्रभावित करे वह साहित्य है। दरअसल हमारे देश के सम्मानों को लेकर विरोधाभासी परंपरा रही है। भारत का व्यवसायिक सिनेमा ही देश की जनता की पंसद है पर जब पुरस्कार की बात आती है तो कथित कलात्मक फिल्मों को ही पुरस्कृत किया जाता है जो कि देश की गरीबी बेरोजगारी या अन्य समस्याओं को सीधे सीधे प्रस्तुत कर दर्शक के सामने प्रश्न चिन्ह प्रस्तुत करती हैं। उनसे न तो समस्यायें हल होती हैं न आदमी का मनोरंजन होता है। सवाल यह है कि एक आम आदमी के सामने प्रश्न आयें तो भी वह क्या करे? देश की सामाजिक, राजनीतिक तथा आर्थिक समस्याओं की उसकी कोई निर्णायक भूमिका नहीं होती। अब भले ही पुरस्कार देने वाले आत्ममुग्धता की स्थिति में हों पर सच यही है कि व्यवसायिक सिनेमा ही इस देश के लोगों की दिल की धड़कन है।
यही स्थिति साहित्य से संबंधित पुरस्कारों की है। जब किसी लेखक की किताब छपी हो उसे ही पुरस्कार दिया जाता है जबकि सच तो यह है कि इस देश के हजारों ऐसे लेखक हैं जो अपनी रचनाओं से साहित्यक प्रवाह की निरंतरता बनाये हुए हैं-उनकी रचनायें अखबारों में छपती हैं या फिर वह मंच पर सुनाते हैं। इनमें अनेक चुटकुले और हास्य कविता लिखने वाले लेखक भी हैं। दरअसल हुआ यह है कि सम्मान आदि प्रदान करने वाली संस्थाओं पर कुछ रूढ़िवादी लेखक काबिज हो जाते हैं-यकीनन यह पद उनको चाटुकारिता लेखन के कारण ही मिलता है-जो चुटकुले या हास्य कवितायें नहीं लिख सकते वही उनकी गौण भूमिका मानते हैं जबकि इस देश का एक बहुत बड़ा वर्ग चुटकुले और हास्य कविताओं ही सुनता और पढ़ता है। इस देश में ऐसे अनेक कवि हैं जो अपनी हास्य रचनाओं के कारण ही लोगों के हृदय में छाये हुए हैं। यकीनन वह भी साहित्यकार ही हैं। प्रश्न चिन्ह खड़े करने वाली या समस्याओं को रूबरू कर पाठक के मन को चिंताओं के वन में छोड़ने वाली रचनायें ही साहित्य नहीं होती बल्कि जो लोगों के मन को मनोरंजन के साथ शिक्षा भी दें भले ही हास्य कविता या चुटकुले ही क्यों न हों साहित्य ही कही जा सकती हैं। वैसे हमारे यहां अब कुछ लोगों द्वारा क्षणिकाओं को भी साहित्य माना जाता है तब चुटकुलों और हास्य कविताओं की उपेक्षा करना ठीक नहीं लगता। अब लंबी रचनायें लिखने का समय नहीं रहा। थोड़े में अपनी बात कहने की आवश्यकता सभी जगह महसूस की जा रही है तब चुटकुलों और हास्य कविताओं का महत्व कम नहीं माना जा सकता।
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23 जनवरी 2010

बाजारू खेल में देशप्रेम ढूंढने का प्रयास-आलेख (cricket aur deshprem-hindi lekh)

भारत में चलने वाली एक क्लब स्तरीय प्रतियोगिता में पाकिस्तानी खिलाड़ियों को नीलामी में किसी ने नहीं खरीदा तो दोनों देशों में हो हल्ला मच गया है। किसी मनुष्य की नीलामी! बहुत आश्चर्य हो रहा है! यह तो गनीमत है कि इस देश में अधिकतर संख्या अभी भी अशिक्षित और अखबार न पढ़ने वाले लोगों की है वरना सारे देश मुंह खुला रह जाता और हर घर में चर्चा हो रही होती। कुछ लोग दुःखी होते तो कुछ खुश!
जब हम जैसा लेखक लिखता है तो अध्यात्म या धर्म की चर्चा न करे यह संभव नहीं हो पाता क्योंकि कहीं न कहीं लगता है कि एक तरफ लोग भारत के विश्व में अध्यात्मिक गुरु होने की बात करते हैं दूसरी तरफ अपने ही लोग जाते उल्टी दिशा में ही है। भारत से बाहर पनपी विचाराधाराओं के बारे में कहा जाता है कि वह मनुष्य को मनुष्य की गुलामी से बचाने के लिये प्रवाहित हुईं हैं। एक पश्चिमी देव पुरुष ने तो अपने कबीले के लोगों को गुलामी से मुक्ति के लिये संघर्ष किया। उसने गुलामी से अपने लोगों को मुक्त होने की प्रेरणा दी। उसकी जीवनी पर एक ंविदेशी हिन्दी टीवी चैनल ने ही कार्यक्रम दिखाया था जिसमें गुलामों की बकायदा नीलामी दिखाई जा रही थी। भारत में बंधुआ मजदूरी की परंपरा रही है पर उसमें कहीं ऐसी नीलामी की चर्चा नहीं होती जिसमें एक मालिक अपने गुलाम को दूसरे मालिक के हाथ बेचता है। कहने का तात्पर्य यह है कि जिस गुलामी और नीलामी की परंपरा का पश्चिमी सभ्यता ने करीब करीब त्याग दिया है उसी को भारतीय धनपतियों ने क्रिकेट के सहारे यहां जिंदा किया। धन्य है धन की महिमा!
क्ल्ब स्तरीय प्रतियोगिता को कोई अधिक भावनात्मक महत्व नहीं है और इसके मैच क्रिकेट के वही समर्थक देखते हैं जिनको उस समय कोई कामकाज नहीं होता है-जिन लोगों को कामकाज होता है वह ऐसे मैच में समय खराब नहीं करते क्योंकि अंतर्राष्ट्रीय स्तर के मैच ही उनको इसके लिये उपयुक्त लगते हैं। कहने वाले तो यह भी कहते हैं कि यह मैच दर्शकों के नंबर एक धन के साथ ही उस पर दांव खेलने वालो मूर्खों के धन से भी चलते हैं। मैच फिक्सिंग की वजह से बदनाम क्रिकेट हुई है और अंतर्राष्ट्रीय स्तर के मैच जोखिम वाले हो गये हैं इसलिये इन क्लब स्तरीय मैचों को आयोजित किया जा रहा है क्योंकि इसमें राष्ट्रप्रेम जैसी कोई चीज नहीं होती और फिक्सिंग की बात सामने आने उसके आहत होने वाली कोई बात हो।
ऐसे में पाकिस्तानी खिलाड़ियों के लिये नीलाम बोली न लगाना कोई राष्ट्रीय विषय नहीं होना चाहिये था पर इसे बनाया गया। पाकिस्तान में मातम मन रहा है तो उसके लिये स्यापा करने वाले कुछ लोग यहां भी हैं। उससे अधिक हैरान होने वाली बात तो यह कि उस पर खुश होने वाले भी बहुत हैं। कुछ लोगों ने तो भारतीय नेताओं पर आक्षेप करते हुए धनपतियों को महान बता डाला तो कुछ ने पाकिस्तान को अपने यहां भी ऐसा आयोजन करने का मजाकिया संदेश दिया। लगता है कि लोग समझे ही नहीं। लोग इसे पाकिस्तान पर एक फतह समझ रहे हैं और भारतीय धनपतियों को नायक! बाजार, सौदागर और उसके बंधुआ प्रचार माध्यमों का खेल को अगर नहीं समझेंगे तो यह भ्रम बना रहेगा।
जब भारत में कुछ लोग पाकिस्तानी खिलाड़ियों के लिये नीलाम बोली न लगने का जश्न मना रहे थे तब उस क्लब स्तरीय आयोजकों की एक प्रवक्ता अभिनेत्री एक संवाद सम्मेलन में यह बता रही थी कि ‘पाकिस्तान के खिलाड़ियों को यहां के ही कुछ लोगों की धमकियों की वजह से यहां न बुलाया गया।’
यह होना ही था। भारत की फिल्म और क्रिकेट को आर्थिक रूप से प्रभावित करने वाली कुछ ताकतें पाकिस्तान में हैं या नहीं कहना कठिन है पर इतना तय है कि भारतीय धनपतियों का मायावी संसार मध्य एशिया पर बहुत निर्भर करता है। पूरा मध्य एशिया भारत को रोकने के लिये पाकिस्तान का उपयोग करता है। यह संभव नहीं है कि भारत की कुछ आर्थिक ताकतें पाकिस्तान की अवहेलना कर सकें। इनकी मुश्किल दूसरी भी है कि पश्चिम के बिना भी यह भारतीय आर्थिक ताकतें नहीं चल सकती क्योंकि अंततः उनके धन संरक्षण के स्त्रोत वहीं हैं। यही पश्चिम पाकिस्तान से बहुत चिढ़ा हुआ है। पहले इस निर्णय के द्वारा पश्चिमी देशों को भी पाकिस्तान से दूरी का संकेत भेजा गया और भारत के कुछ संगठनों की धमकी की बात कर पाकिस्तान पर मरहम लगाया गया। भारतीय धनपतियों के नायकत्व की पोल तो उनकी प्रवक्ता वालीवुड अभिनेत्री के बयान से खुल ही गयी। इस लेखक ने कल अपने एक लेख में पाकिस्तान प्रचार युद्ध में भारत से हारने पर अपने मध्य एशिया मित्रों की मदद लेने का जिक्र किया था। यही कारण है कि क्लब स्तरीय प्रतियोगिता के आयोजकों को यह सब कहना पड़ा कि ‘यहां के कुछ संगठनों की धमकियों की वजह से ऐसा किया गया।’
यह संगठन कौन है? इशारा सभी समझ गये पर सच यह है कि ‘पाकिस्तानी खिलाड़ियों को यहां न बुलाने के लिये किसी ने बहुत बड़े संगठन ने धमकी दी हो ऐसा कहीं अखबारों में पढ़ने को नहीं मिला। इन संगठनों से लोगों को जरूर भारतीय धनपतियों का आभारी होना चाहिये जो उन्हें बैठे बिठाये इस तरह का श्रेय मिल गया।
हमें इन बातों पर यकीन नहीं है। कम से कम क्रिकेट में अब हमारे अंदर देशप्रेम जैसा कोई भाव नहीं है क्योंकि हमारे देश का राष्ट्रीय खेल तो हाकी है। इस निर्णय के पीछे दूसरा ही खेल नजर आ रहा है। इस तरह के फैसले में क्या छिपा हो सकता है? यह क्रमवार नीचे लिख रहे हैं।
1-सन् 2007 में पचास ओवरीय क्रिकेट प्रतियोगिता में भारत के हारने के बाद क्रिकेट की लोकप्रियता एकदम गिर गयी। तीन महान खिलाड़ियों के विज्ञापन तक टीवी चैनलों ने रोक दिये। एक वर्ष बाद हुई बीस ओवरीय प्रतियोगिता में विश्व कप में भारत जीता(!) तो फिर लोकप्रियता बहाल हुई। उसके बाद ही यह क्ल्ब स्तरीय प्रतियोगिता भी शुरु हुई और उसमें वही तीन महान खिलाड़ी भी शामिल होते हैं जिनको अभी तक भारत क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड की की बीस ओवरीय टीम के योग्य समझा नहीं जाता मगर बाजार के विज्ञापनों में उनकी उपस्थिति निरंतर रहती है। इन्हीं खिलाड़ियों की छवि भुनाने के लिये यह प्रतियोगिता आयोजित की जाती है इसमें पाकिस्तानी खिलाड़ियों का कोई अधिक महत्व नहीं है।
2-अंतिम बीस ओवरी प्रतियोगिता पाकिस्तान ने जीती और भारत का प्रदर्शन अत्यंत निराशाजनक रहा। इससे यकीनन क्रिकेट की लोकप्रियता गिरती लग रही है। कम से कम इस बीस ओवरीय प्रतियोगिता की लोकप्रियता अब संदिग्ध हो रही है। ऐसे में हो सकता है कि भारत के लोगों में राष्ट्रीय प्रेम और विजय का भाव पैदा कर इसके लिये उनमें आकर्षण पैदा करने का प्रयास हो सकता है। वैसे शुद्ध रूप से क्रिकेट प्रेमी अंतर्राट्रीय मैचों में दिलचस्पी लेते हैं पर ऐसे नवधनाढ्य लोगों के लिये यह क्लब स्तरीय मैच भी कम मजेदार नहीं होते। दूसरी बात यह है कि इन प्रतियोगिताओं में खेलने वालों को विज्ञापन के द्वारा भी धन दिलवाना पड़ता है। 26/11 के बाद भारत के जो स्थिति बनी है उसके बाद फिलहाल यह संभव नहीं है कि भारत में किसी पाकिस्तानी क्रिकेट खिलाड़ी का विज्ञापन देखने को लोग तैयार हों।
3-संदेह का कारण यह है कि अनेक देशों की टीमों के खिलाड़ियों की बोली नहीं लगी पर पाकिस्तान का जिक्र ही क्यों आया? अभिनेत्री प्रवक्ता आखिर यह क्यों कहा कि ‘यहां के कुछ लोगों की धमकी की वजह से ऐसा हुआ’, अन्य देशों की बात क्यों नहीं बतायी। संभव है कि यह प्रश्न ही प्रायोजित ढंग से किया गया हो। संदेह के घेरे में अनेक लोग हैं जो पाकिस्तान के लिये अपना प्रेम प्रदर्शन कर रहे हैं पर दूसरों के लिये खामोश हैं। दरअसल भारत में एक खास वर्ग है जो पाकिस्तान की चर्चा बनाये रखकर वहां के लोगों को खुश रखना चाहता है।
हमने पहले भी लिखा था कि भारत और पाकिस्तान का खास वर्ग आपस में मैत्री भाव बनाये रखता है और इस तरह उसका व्यवहार है कि दोनों देशों के आम नागरिक ही एक दूसरे के दुश्मन हैं। अभिनेत्री के बयान से यह सिद्ध तो हो गया कि कम से कम उसके अंदर पाकिस्तान के लिये शत्रुता का भाव नहीं है और पाकिस्तान क्रिके्रट खिलाड़ी भी भारत के मित्र हैं। इसका सीधा आशय यही है कि आम लोग ही पाकिस्तान के आम लोगों के शत्रु हैं।
कहने का अभिप्राय यह है कि पाकिस्तान के खिलाड़ियों की इस प्रतियोगिता में नीलाम बोली न लगना इस देश में राष्ट्रप्रेम के जज़्बात भुनाकर उसे अपने फायदे के लिये भी उपयोग करना हो सकता है। सबसे बड़ी बात यह है कि धनाढ्य वर्ग तो वैसे भी अपने व्यवसायिक हितों की वजह से नहीं लड़ता ऐसे आर्थिक उदारीकरण के इस युग में बाजार और सौदागर से एक बाजारु खेल में देशप्रेम की छवि दिखाने की आशा करना बेकार है। खासतौर से तब जब यहां का भारत का एक बहुत बड़ा तबका क्रिकेट को जानता नहीं है या फिर इसे अधिक महत्व नहीं देता। अलबत्ता बौद्धिक विलास में रत लोगों के लिये यह एक अच्छा विषय भी हो सकता है। एक आम लेखक के लिये यह संभव नहीं है कि वह कहीं से वास्तविक तथ्य जुटा सके। ऐसे में अखबारों और टीवी पर प्रसारित खबरों के आधार पर ही हम यह बातें लिख रहे हैं। सच क्या है! यह तो खास वर्ग के लोग ही जाने!
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21 जनवरी 2010

दोस्ती दुश्मनी का दिखावा-आलेख (dosti dushmani ka dikhava-hindi lekh)

भारत की एक व्यवसायिक प्रतियोगिता में पाकिस्तान खिलाड़ियों की नीलामी न होने पर देश के अनेक बुद्धिजीवी चिंतित है। यह आश्चर्य की बात है।
पाकिस्तान और भारत एक शत्रु देश हैं-इस तथ्य को सभी जानते हैं। एक आम आदमी के रूप में तो हम यही मानेंगे। मगर यह क्या एक नारा है जिसे हम आम आदमियों का दिमाग चाहे जब दौड़ लगाने के लिये प्रेरित किया जाता है और हम दौड़ पड़ते हैं। अगर कोई सामान्य बुद्धिजीवी पाकिस्तान के आम आदमी की तकलीफों का जिक्र करे तो हम उसे गद्दार तक कह देते हैं पर उसके क्रिकेट खिलाड़ियों तथा टीवी फिल्म कलाकारों का स्वागत हो तब हमारी जुबान तालू से चिपक जाती है।
दरअसल हम यहां पाकिस्तान के राजनीतिक तथा धार्मिक रूप से भारत के साथ की जा रही बदतमीजियों का समर्थन नहीं कर रहे बल्कि बस यही आग्रह कर रहे हैं कि एक आदमी के रूप में अपनी सोच का दायरा नारों की सीमा से आगे बढ़ायें।
अगर हम व्यापक अर्थ में बात करें तो भारत और पाकिस्तान के आपसी रिश्तों का आशय क्या है? दो ऐसे अलग देश जिनके आम इंसान एक दूसरे के प्रति शत्रुता का भाव रखते हैं-इसलिये दोनों को आपस में मिलाने की बात कही जाती है पर मिलाया नहीं जाता क्योंकि एक दूसरे की गर्दन काट डालेंगे।
मगर खास आदमियों का सोच कभी ऐसा नहीं दिखता। भारत में अपने विचार और उद्देश्य संप्रेक्षण करने यानि प्रचारात्मक लक्ष्य पाने के लिये फिल्म, टीवी, अखबार और रेडियो एक बहुत महत्वपूर्ण साधन हैं। इन्हीं से मिले संदेशों के आधार पर हम मानते हैं कि पाकिस्तान हमारा शत्रु है। मगर इन्हीं प्रचार माध्यमों से जुड़े लोग पाकिस्तान से ‘अपनी मित्रता’ की बात करते हैं और समय पड़ने पर यह याद दिलाना नहीं भूलते कि वह शत्रु राष्ट्र है।
भारत के फिल्मी और टीवी कलाकार पाकिस्तान में जाकर अपनी कला का प्रदर्शन करते हैं तो अनेक खेलों के खिलाड़ी भी वहां खेलते हैं-यह अलग बात है कि अधिकतर चर्चा क्रिकेट की होती है। पाकिस्तानी कलाकारो/खिलाड़ियों से उनके समकक्ष भारतीयों की मित्रता की बात हम अक्सर उनके ही श्रीमुख से सुनते हैं। इसके अलावा अनेक बुद्धिजीवी, लेखक तथा अन्य विद्वान भी वहां जाते हैं। इनमे से कई बुद्धिजीवी तो देश के होने वाले हादसों के समय टीवी पर ‘पाकिस्तानी मामलों के विशेषज्ञ’ के रूप में चर्चा करने के लिये प्रस्तुत होते हैं। इनके तर्कों में विरोधाभास होता है। यह पाकिस्तान के बारे में अनेक बुरी बातें कर देश का दिल प्रसन्न करते हैं वह यह कभी नहीं कहते कि उससे संबंध तोड़ लिया जाये। सीधी भाषा में बात कहें तो जिन स्थानों से पाकिस्तान के विरोध के स्वर उठते हैं वह मद्धिम होते ही ‘पाकिस्तान शत्रु है’ के नारे लगाने वाले दोस्ती की बात करने लगते हैं। पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद की बारे में सभी जानते हैं। इतना ही नहीं मादक द्रव्य पदार्थो, फिल्मों, क्रिकेट से सट्टे से होने वाली कमाई का हिस्सा पाकिस्तान में बैठे एक भारतीय माफिया गिरोह सरदार के पास पहुंचता है जिसके बारे में कहा जाता है कि वह इन आतंकवादियों को धन मुहैया कराता है। अखबारों में छपी खबरें बताती हैं कि जब जब सीमा पर आतंक बढ़ता है तब दोनों के बीच अवैध व्यापार भी बढ़ता है। अंतराष्ट्रीय व्यापार अवैध हो या वैध उसका एक व्यापक आर्थिक आधार होता है और यह तय है कि कहीं न कमाई की लालच दोनों देशों में ऐसे कई लोगों को है जिनको भारत की पाकिस्तान के साथ संबंध बने रहने से लाभ होता है। अब यह संबंध बाहर कैसे दिखते हैं यह उनके लिये महत्वपूर्ण नहीं है। पाकिस्तान में भारतीय फिल्में दिखाई जा रही हैं। यह वहां के फिल्मद्योग के लिये घातक है पर संभव है भारतीय फिल्म उद्योग इसकी भरपाई वहां के लोगों को अपने यहां कम देखकर करना चाहता है। भारत में होने वाली एक व्यवसायिक क्रिकेट प्रतियोगिता में पाकिस्तान खिलाड़ियों का न चुने जाने के पीछे क्या उद्देश्य है यह अभी कहना कठिन है पर उसे किसी की देशभक्ति समझना भारी भूल होगी। दरअसल इस पैसे के खेल में कुछ ऐसा है जिसने पाकिस्तानी खिलाड़ियों को यहां नहीं खरीदा गया। एक आम आदमी के रूप में हमें कुछ नहीं दिख रहा पर यकीनन इसके पीछे निजी पूंजीतंत्र की कोई राजनीति होगी। एक बात याद रखने लायक है कि निजी पूंजीतंत्र के माफियाओं से भी थोड़े बहुत रिश्ते होते हैं-अखबारों में कई बार इस गठजोड़ की चर्चा भी होती है। भारत का निजी पूंजीतंत्र बहुत मजबूत है तो पाकिस्तान का माफिया तंत्र-जिसमें उसकी सेना भी शामिल है-भी अभी तक दमदार रहा है। एक बात यह भी याद रखने लायक है कि भारत के निजी पूंजीतंत्र की अब क्रिकेट में भी घुसपैठ है और भारत ही नहीं बल्कि विदेशी खिलाड़ी भी यहां के विज्ञापनों में काम करते हैं। संभव है कि पाकिस्तान के खिलाड़ियों की इन विज्ञापनों में उपस्थिति भारत में स्वीकार्य न हो इसलिये उनको नहीं बुलाया गया हो-क्योंकि अगर वह खेलने आते तो मैचों के प्रचार के लिये कोई विज्ञापन उनसे भी कराना पड़ता और 26/11 के बाद इस देश के आम जन की मनोदशा देखकर इसमें खतरा अनुभव किया गया हो।
ऐसा लगता है कि विश्व में बढ़ते निजी पूंजीतंत्र के कारण कहीं न कहीं समीकरण बदल रहे हैं। पाकिस्तान के रणनीतिकार अभी तक अपने माफिया तंत्र के ही सहारे चलते रहेे हैं और उनके पास अपना कोई निजी व्यापक पूंजीतंत्र नहीं है। यही कारण है कि उनको ऐसे क्षेत्रों में ऐसी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है जहां सफेद धन से काम चलता है। पाकिस्तानी रुपया भारतीय रुपये के मुकाबले बहुत कमजोर माना जाता है।
वैसे अक्सर हम आम भारतीय एक बात भूल जाते हैं कि पाकिस्तान की अपनी कोई ताकत नहीं है। भारतीय फिल्म, टीवी, रेडियो और अन्य प्रचार माध्यम पाकिस्तान की वजह से उसका गुणगान नहीं करते बल्कि मध्य एशिया में भारत के निजी पूंजीतंत्र की गहरी जड़े हैं और धर्म के नाम पर पाकिस्तान उनके लिये वह हथियार है जो भारत पर दबाव डालने के काम आता है। जब कहीं प्रचार युद्ध में पाकिस्तान भारत से पिटने लगता है तब वह वहीं गुहार लगाता है तब उसके मानसिक जख्मों पर घाव लगाया जाता है। मध्य एशिया में भारत के निजी पूंजीतंत्र की जड़ों के बारे में अधिक कहने की जरूरत नहीं है।
कहने का अभिप्राय यह है कि हम आम आदमी के रूप में यह मानते रहें कि पाकिस्तान का आम आदमी हमारा शत्रु है मगर खास लोगों के लिये समय के अनुसार रुख बदलता रहता है। एक प्रतिष्ठत अखबार में पाकिस्तान की एक लेखिका का लेख छपता रहता है। उससे वहां का हालचाल मालुम होता है। वहां आतंकवाद से आम आदमी परेशान है। भारत की तरह वहां भी महंगाई से आदमी त्रस्त है। हिन्दूओं के वहां हाल बहुत बुरे हैं पर क्या गैर हिन्दू वहां कम दुःखी होगा? ऐसा सोचते हुए एक देश के दो में बंटने के इतिहास की याद आ जाती है। अपने पूर्वजों के मुख से वहां के लोगों के बारे में बहुत कुछ सुना है। बंटवारे के बारे में हम लिख चुके हैं और एक ही सवाल पूछते रहे हैं कि ‘आखिर इस बंटवारे से लाभ किनको हुआ था।’ जब इस पर विचार करते हैं तो कई ऐसे चित्र सामने आते हैं जो दिल को तकलीफ देते हैं। एक बाद दूसरी भी है कि पूरे विश्व के बड़े खास लोग आर्थिक, सामाजिक, तथा धार्मिक उदारीकरण के लिये जूझ रहे हैं पर आम आदमी के लिये रास्ता नहीं खोलते। पैसा आये जाये, कलाकर इधर नाचें या उधर, और टीम यहां खेले या वहां फर्क क्या पड़ता है? यह भला कैसा उदारीकरण हुआ? हम तो यह कह रहे हैं कि यह सभी बड़े लोग वीसा खत्म क्यों नहीं करते। अगर ऐसा नहीं हो सकता तो उसके नियमों का ढीला करें। वह ऐसा नहीं करेंगे और बतायेंगे कि आतंकवादी इसका फायदा ले लेंगे। सच्चाई यह है कि आतंकवादियों के लिये कहीं पहुंचना कठिन नहीं है पर उनका नाम लेकर आम आदमी को कानूनी फंदे में तो बंद रखा जा सकता है। कुल मिलाकर भारत पाकिस्तान ही नहीं बल्कि कहीं भी किन्हीं देशों की दोस्ती दुश्मनी केवल आम आदमी को दिखाने के लिये रह गयी लगती है। उदारीकरण केवल खास लोगों के लिये हुआ है। अगर ऐसा नहीं होता तो भला आई.पी.एल. में पाकिस्तान के खिलाड़ियों की नीलामी पर इतनी चर्चा क्यों होती? एक बात यहां उल्लेख करना जरूरी है कि क्रिक्रेट की अंतर्राष्ट्रीय परिषद के अध्यक्ष के अनुसार इस खेल को बचाने के लिये भारत और पाकिस्तान के बीच मैच होना जरूरी है। इस पर फिर कभी।
कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
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16 नवंबर 2009

पहले देवत्व का प्रमाण दो-हिन्दी भाषा पर लेख (hindi article hindi controversy or dispute)

हिंदी भाषा की चर्चा अक्सर विवादों के कारण अधिक होती है। विवाद यही कि हिंदी थोपी जा रही है या हिंदी वाले दूसरी भाषाओं को कमतर मानते हैं। ऐसे बहुत सारे विवाद हैं जो बरसों से थम नहीं रहे। होता यह है कि कोई शख्स उस विवाद को ढोते हुए बूढ़ा हो जाता है तो लगता है कि विवाद थम गया पर फिर कोई उसका वारिस उठ खड़ा होता है तो लगता है कि विवाद फिर नये रूप में आ गया है। ऐसे केवल भाषा के साथ ही नहीं बल्कि हर प्रकार के विवाद से है जो शायद खड़े ही इसलिये किये जाते हैं कि उनका कभी निराकरण ही न हो। हिंदी के विवाद का भी कोई निपटारा आगे बीस साल तक नहीं होना है। इसलिये हिंदी का चाल, चरित्र और चेहरा फिर से देखना जरूरी है जिसे बहुत कम लोग समझ पाते हैं।
हिंदी संस्कृत के बाद विश्व की दूसरी आध्यात्मिक भाषा है। इसका मतलब सीधा यही है कि जैसे जैसे लोगों की अध्यात्मिक ज्ञानपिपासा बढ़ेगी हिंदी का प्रभाव स्वतः बढ़ेगा। फिर संकट कहां हैं?
जो लोग अंतर्जाल पर सक्रिय नहीं है उनका क्या कहें जो सक्रिय है वह भी नहीं समझ पा रहे कि हिंदी अब सांगठनिक ढांचों के दायरे’-टीवी, किताब, फिल्म तथा समाचार पत्र पत्रिकाओं-से बाहर निकल कर अनियंित्रत गति से अंतर्जाल पर बढ़ रही है। गूगल के प्रयासों को तो आप जानते हैं। इधर हिंदी में ही वेबसाईटों के पते होने की बात भी चल रही है। ऐसे में सांगठिनक ढांचों में सक्रिय खास वर्ग में चिंता फैली हुई है और हिंदी पर उठ रहे विवाद उसका एक प्रमाण हैं। घबड़ाहट हो रही है कि हिन्दी कहीं अंतर्जाल पर अंग्रेजी के समकक्ष न स्थापित हो जाये। अगर स्थापित हो तो फिर उस नियंत्रण अपना नियंत्रण रहे इसके लिये प्रयत्नशील हिंदी के विवादों पर अधिक बोल और लिख रहे हैं।
बात अधिक न करते हुए यह समझाना जरूरी है कि हिंदी के ठेकेदारी भले ही दिखावे के लिये कई लोग करते हैं पर हिंदी ऐसी अध्यात्मिक भाषा है जो साफ सुथरे चरित्र के साथ ही कथनी और करनी के भेद से परे रहने की शर्त रखती है। आप चाहे हिंदी में कितने भी उपन्यास, कहानियां, व्यंग्य या अन्य रचनायें लिखे आम हिंदी भाषी का यह स्वभाव है कि वह आपके चरित्र को देखता है। आप हिंदी के विकास का नारा लगायें खूब प्रचार मिलेगा पर हिंदी भाषियों का यह स्वभाव है कि जब तक आपकी रचनाओं के आध्यात्मिक ज्ञान और चरित्र में देवत्व का बोध नहीं होगा वह आपको हृदय से सम्मान नहीं देगा। हिंदी में यह भाव संस्कृत से ही आया है। सच बात तो यह है कि संस्कृत कभी की लुप्त हो गयी होती अगर उसमें अध्यात्मिक रचनाओं का खजाना नहीं होता।
कई लोगों को यह अजीब लगे पर जरा वह स्वयं अपने अंदर झांकें। भक्ति काल के कबीर, तुलसी, सूर, मीरा तथा अन्य कवियों को नाम जन जन में छाया हुआ मिलेगा भले ही उनकी रचनायें हिंदी में अनुवाद कर पढ़ी और सुनाई जाती हैं। इसके बाद भी इतने सारे कवि लेखक और चिंतक हुए पर उनको वही लोग जानते हैं जो अधिक शिक्षित हैं। भक्ति काल के कवियों का नाम गांव गांव में जाना जाता है मगर यह बात आप उसके बाद के कवियों और लेखकों के बारे में नहीं कह सकते। इससे यह स्पष्ट होता है कि हिंदी भाषी लोग ऐसी रचनायें देखना चाहते हैं जिनसे कुछ जीवन में सीखने का अवसर मिले। साथ ही कवि या लेखक का चरित्र भी उनके लिये प्रेरक होना चाहिये। संस्कृत में वाल्मीकि, वेदव्यास तथा महर्षि शुक का नाम लेखक के रूप में नहीं बल्कि देवता की तरह लिया जाता है। अगर आप अपने जीवन में केवल लिखने के लिये ही लिखते हैं और यह बात प्रमाणित नहीं होती कि आपका चरित्र वैसा ही है तो हिंदी में आपको अधिक सम्मान नहीं मिलेगा भले ही आप कितनी भी संस्थाओं से पुरुस्कार जीत लें। समाज के आपसी समझौतों और द्वंद्वों के बीच में सामग्री ढूंढकर उस पर गद्य या पद्य लिखने से केवल आप सम्मानीय नहीं हो जायेंगे बल्कि उसमेें ऐसे निष्कर्ष भी रखने पड़ेंगे जिनमें अध्यात्मिकता का बोध होता हो।
यहां अध्यात्म से आशय भी स्पष्ट कर दें। श्रीमद्भागवत गीता में अध्यात्म हमारी देह के अंदर मौजूद वह तत्व है जो परमात्मा का अंश है। इसी को जानने समझने की प्रक्रिया का नाम अध्यात्मिकता है। इस प्रक्रिया से निकले संदेश को ही अध्यात्मिक ज्ञान कहा जाता है। देह से संबंधित सारे ज्ञान सांसरिक होते हैं जिनको आप विज्ञान भी कह सकते हैं। आप अपनी रचनाओं में सांसरिक बातों पर लिखकर खूब नाम और नामा कमा सकते हैं पर सामान्य हिंदी भाषी-यह नियम क्षेत्रीय भाषाओं पर भी लागू है-आपको देव लेखक नहीं मानेगा। इतना ही नहीं अगर आप हिंदी का विरोध भी करते हैं तो बहुत कम लोग उस पर विचलित होंगे। वजह हिंदी के स्वाभाविक अध्यात्मिक भाव से ओतप्रोत लोग यह जानते हैं कि जिसके पास अध्यात्मिक ज्ञान नहीं है वही ऐसा करता है।
इसलिये हिंदी के समर्थक और विरोधियों को सामान्य हिन्दी भाषी से यह अपेक्षा बिल्कुल नहीं करना चाहिए कि वह उनके द्वंद्वों को देखकर उनको अनुग्रहीत करने वाला है। केवल हिन्दी भाषा ही नहीं बल्कि किसी भी भारतीय भाषा का भी यही स्वभाव है और हिन्दी का विरोध किसी भी भाषा का आम आदमी नहीं करेगा। आखिर इसमें भी उन्हीं पवित्र नामों का समावेश है-यथा राम, कृष्ण, बुद्ध, महावीर, गुरु नानक देव, शिवाजी, समर्थ रामदास, कबीर, तुलसी, रहीम, सूरदास, तथा सुब्रह्मण्यम भारती-जो कि अन्य भाषाओं में है। लोगों की भाषा अलग है पर उनके मन में बसे नाम वैसे ही हिंदी में है तो भला आम आदमी इसका क्यों अपमान करना चाहेगा?
इसलिये हिंदी के समर्थक अगर यह सोचते हों कि हिंदी बचाने के नारे पर सब उनके साथ आकर खड़े हों तो उनको अपने चरित्र में देवत्व का प्रमाण देना होगा। उसी तरह हिंदी के विरोध करने वालों को भी यह प्रमाणित करना होगा कि वह प्राचीन काल के देवताओं और दैत्यों से अधिक शक्तिशाली हैं। यह हिन्दी अध्यात्म की भाषा है जो बिना शब्द बोले भी गेय होती है-अरे, आपने देवताओं के नाम सुने तो होंगे उनके फोटो देखकर कोई भी पहचान जाता है कि यह किसका नाम है भले ही उस पर नाम न लिखा हो। उसी तरह मंदिर में जाकर कोई गैर हिंदी भाषी आदमी हाथ जोड़कर भगवान को प्रणाम करता है तो उसके पास खड़ा गैर हिन्दी भाषी यह जानते हैं कि वह भगवान को सादर प्रणाम कर रहा है। इस क्रिया को शब्दों में व्यक्त नहीं किया जाता पर हाथ पांव उसकी अनुभूति करा देते हैं अगर आपको इस पर शक हो तो वृंदावन या हरिद्वार में जाकर ऐसे स्थानों-यथा बांके बिहारी मंदिर और हर की पौड़ी-पर जाकर देखें जहां अनेक लोग ऐसे आते हैं जिनको हिन्दी नहीं आती पर वह अपने लोगों के साथ वहां आकर अपने मन को प्रफुल्लित करते हैं। वहां हिन्दी अव्यक्त है पर उसका भाव सभी के मन में है।
अधिक क्या लिखें? सभी भारतीय भाषाऐं अध्यात्मिक ज्ञान से संपन्न हैं इसलिये उनके आपसी विरोध संभव नहीं है। हमें तो लगता है कि यह विवाद वह लोग योजनाबद्ध ढंग से जीवित रखना चाहते हैं जो हिन्दी या भारतीय भाषा बोलते हैं पर उसके अध्यात्मिक ज्ञान का उनमें अभाव है। यह हमारा मत है। हम कोई सिद्ध नहीं है। जो एक आम आदमी के रूप में आता है लिख देते हैं। कोई गल्ती हो उससे पीछे हटने में हमें संकोच नहीं होता क्योंकि अध्यात्मिक ज्ञान पढ़ते हुए हमने यही सीखा है।
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5 अक्टूबर 2009

फुटबाल और हवा-हिंदी व्यंग्य लघुकथा (khel aur hava-hindu laghu katha)

उसने एक फुटबाल ली और उस पर लिख दिया धर्म। वह उस फुटबाल के साथ एक डंडा लेकर उस मैदान में पहुंच गया जहां गोल पोस्ट बना हुआ था। तमाम लोग वहां तफरी करने आते थे इसलिये वह पहले जोर से चिल्लाया और बोला-‘है कोई जो सामने आकर मुझे गोल करने से रोक सके।’
उसने अपनी आंखों पर चश्मा लगा लिया था। उसका डीलडौल और हाथ में डंडा देखकर लोग डर गये और फिर वह शुरु हो गया उसके गोल करने का सिलसिला। एक के बाद एक गोल कर वह चिल्लाता रहा-है कोई जो मेरा सामना कर सके। देखों धर्म को मैं कैसे लात मारकर गोल कर रहा हूं।’
लोग देखते और चुप रहते। कुछ बच्चे शोर बचाते तो कुछ बड़े कराहते हुए आपस में एक दूसरे का सांत्वना देते कि कोई तो माई का लाल आयेगा जो उसका गोल रोकेगा।’
उसी समय एक ज्ञानी वहां से निकला। उसने यह दृश्य देखा और फिर उसके पास जाकर बोला-‘क्या बात है? सामने कोई गोल पर तो है नहीं जो गोल किये जा रहे हो।’
वह बोला-‘तुम सामने आओ। मेरा गोल रोककर दिखाओ। यह फुटबाल मैंने एक कबाड़ी से खरीदी है और मैं चाहता हूं कि कोई मेरे से गोल गोल खेले।

ज्ञानी ने कहा-‘ यह होता ही है। अगर फुटबाल है तो खेलने का मन होगा। डंडा है तो उसे भी किसी को मारने का मन आयेगा। ऐसे में तुम्हारे साथ कोई नहीं खेलने आयेगा।’
उसने कहा-‘तुम ही खेल लो। दम है तो आ जाओ सामने।’
ज्ञानी ने उससे फुटबाल हाथ में ली और उसकी हवा भरने के मूंह पर जाकर उसका ढक्कन खोल दिया। वह पूरी हवा निकल गयी।
वह चिल्लाने लगा और बोला-‘अरे, डरपोक हवा निकाल दी। अभी डंडा मारता हूं।’
ज्ञानी ने कहा-‘फंस जाओगे। यहां बहुत सारे लोग हैं। फुटबाल पर तुमने धर्म लिखकर लोगों की भावनाओं को संशकित कर दिया था पर अब वह यहीं आयेंगे। देखो वह आ रहे हैं।’
उसने देखा कि लोग उसकी तरफ आ रहे हैं। ज्ञानी ने कहा-‘तुम अब घर जाओ। यह तुम नहीं फुटबाल थी जो तुमसे खेल रही थी। फुटबाल में हवा भरी थी जो उसके साथ तुम्हें भी उड़ा रही थी। वैसे तुम्हारी देह भी हवा से चल रही है पर यह हवा तुम्हारे दिमाग को भी चला रही थी। अब न यह फुटबाल चलेगी न डंडा।’
वह ज्ञानी ऐसा कहकर चल दिये तो तफरी करने आये एक सज्जन ने पूछा-‘पर आपने सब क्यों और कैसे किया?’
ज्ञानी ने कहा-‘मैंने कुछ नहीं किया। यह तो हवा ने किया है। उसे फुटबाल में भरी हवा ने बौखला दिया था। वह निकल गयी तो उसके लिये अपना यह नाटक जारी रखना कठिन था। मुझे करना ही क्या था? उसके कहने पर उसके साथ फुटबाल खेलने से अच्छा है कि उसकी हवा निकाल कर मामला ठंडा कर दो। फुटबाल खेलता तो वह गोल रोकने को लेकर विवाद करता। मेरे गोल पर आपत्तियां जताता। उसको छोड़ कर जाता तो वह यहां भीड़ के लोगों को बेकार में डराता। इससे अच्छा है कि धर्म नाम लिखकर झगड़ा बढ़ाने की उसकी योजना को फुटबाल में से हवा निकाल कर बेकार कर दिया जाये।’
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20 सितंबर 2009

भारतीय प्रचारतंत्र और चीन-हिंदी व्यंग्य (indian media and china-hindi vyangya)

मीडिया यानि टीवी चैनल और समाचार पत्र-जिनकों हम संगठित प्रचारतंत्र भी कह सकते हैं-बिना सनसनी के नहीं चल सकते कम से कम उनमें काम करने वाले लोगों की मान्यता तो यही है। राई का पहाड़ और पहाड़ से निकली चुहिया को हाथी बनाने की कला ही प्रचारतंत्र का मूल मंत्र है। अब यह कहना कठिन है कि कितनी सनसनी खबरें प्रायोजित या स्वघटित हैं।
अभी कुछ दिनों पहले एक विदेशी चैनल का एक पत्रकार लोगों की हत्या कराकर उनके समाचारों को सनसनी ढंग से प्रसारित करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया। वह अपने व्यवसाय के सफलता के लिये ऐसी हरकतें कर रहा था। अभी हमारे देश के प्रचार तंत्र के लोगों की आत्मा मरी नहीं है कि वह ऐसी हरकतें करें पर ऐसी खबरें तो प्रायोजित करने के साथ प्रसारित कर ही सकते हैं जिससे किसी को शारीरिक हानि न पहुंचे न ही अपराध हो।
आखिर यह चल तो विदेशी ढर्रे पर ही रहे हैं। हो सकता है ऐसा न हो पर इधर चीन को लेकर जो सनसनी फैली है उसका तो न ओर मिल रहा है न छोर।

प्रचारतंत्र ने कह दिया कि घुसपैठ हुई। उसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई तो अनेक तरह के कथित प्रमाण लाये गये। आधिकारिक रूप से खंडन होते रहे हैं पर प्रचार तंत्र है कि बस अड़ा ही हुआ है कि घुसपैठ हुई। करीब दो सप्ताह से सनसनी फैली रही तब जाकर चीन की नींद खुली। मुश्किल यह है कि चीनी अपनी भाषा के अलावा दूसरी भाषा सीखते नहीं है इसलिये हिंदी के प्रचारतंत्र का उनको पता नहीं कि क्या चल रहा है?
किसी हिंदी भाषी ने ही उनको चीनी भाषा में लताड़ते हुए इन खबरों के बारे में पूछा होगा तब चीन ने आधिकारिक तौर पर भारतीय प्रचारतंत्र पर दुष्प्रचार का आरोप जड़ा। अभी तक भारत के रणनीतिकारों पर आक्रमण करने वाला चीन इतना बदहवास हो गया कि उसने सीधे ही प्रचारतंत्र को घेरे में ले लिया।
भारत की परवाह न करने वाला चीन पहली बार इतने तनाव में आया इस बात पर भारतीय प्रचारतंत्र को कुछ श्रेय दिया ही जाना चाहिए। इस प्रचारतंत्र को लेकर चीन भारतीय रणनीतिकारों से यह तो कह नहीं सकता कि इन पर नियंत्रण करो क्योंकि यह प्रचारतंत्र सरकारी नहीं है। भारत चीन से कह सकता है कि तुम अपने प्रचारतंत्र पर नियंत्रण करो क्योंकि वहां पर सरकार ही उसकी मालिक है। चीन का प्रचारतंत्र भी तो भारत के विरुद्ध विषवमन करता है और उसका सीधा आशय यही है कि वहां की सरकार यही चाहती है।
मगर इस बार चीन को भारतीय प्रचारतंत्र के रूप में जो असंगठित प्रतिद्वंद्वी मिला है उससे उसका पार पाना संभव नहीं है। सरकारी तौर पर नियंत्रण से परे इस प्रचारतंत्र की खूबी यह है कि कहता ही रहता है सुनता कुछ नहीं देखता है। एक शब्द देख लिया उस पर पूरा कार्यक्रम बना डाला। कहते हैं कि चीनी सुनते अधिक परबोलते कम हैं जबकि हमारा यह स्वतंत्र प्रचारतंत्र बोलता अधिक है सुनता कम। चीनी भी आखिर कुछ बोलेंगे पर उनका एक ही शब्द उनको परेशान कर डाल सकता है अगर भारतीय प्रचारतंत्र ने उसका नकारात्मक अर्थ लिया।
जब भारतीय प्रचारतंत्र उसके खिलाफ आग उगल रहा है तब कोई वहां के प्रचारतंत्र चुप बैठा हों यह संभव नहीं है मगर वह भारतीय प्रचारतंत्र का प्रसारण तो देखेंगे पर भारतीय प्रचारतंत्र उनकी तरफ नहीं देखेगा। यह उपेक्षासन का गुण भारतीय प्रचारतंत्र को विजेता बनाये हुए है। अपने विरुद्ध ऐसा प्रचार देख और सुनकर चीनी आग बबूला होकर कार्यक्रम बनायेंगे पर यहां देखेगा कौन? इससे उनकी आग और बढ़ जाती होगी।

इस प्रचार का ही नतीजा है कि दिल्ली में चीन के राजनयिक इधर उधर भागदौड़ करते रहे। एक तरह से चीन इस प्रचारतंत्र को लेकर भारत पर दबाव डाल रहा है पर यह उसके लिये परेशानी का कारण ही बनने वाला है। हो सकता है कि अभी यह प्रचारतंत्र चुप हो जाये पर अब चीन को आगे यह सब झेलना पड़ सकता है।
अपने प्रचारतंत्र का एक विषय पाकिस्तान तो बना ही हुआ है। उसके यहां अपने देश तथा विदेश के जो खुराफाती तत्व सक्रिय हैं उन पर हमारा प्रचारतंत्र अपनी बहुत सारी रील और शब्द खर्च कर चुका है। लोग उससे उकता गये हैं। लोगों को व्यस्त रखने के लिये एक दुश्मन तो चाहिये न! मुश्किल यह है कि चीन बहुत खौंचड़ी है पर उसने अपने यहां अपराधियों को पनाह नहीं दी है जिसको प्रचारतंत्र हीरो बना दे। वहां की हीरो तो बस सरकार ही है! अमेरिकी आर्थिक विशेषज्ञ कहते हैं कि उसकी विकासदर में अपराध के पैसे का भी योगदान है। ऐसे में वहां के किसी अपराधी का महिमामंडन तो यहां हो नहीं सकता। लेदेकर एक ही विषय बचता है ‘सीधा हमला’। भारतीय सैन्य विशेषज्ञ स्वयं मानते हैं कि सीमा का आधिकारिक अभिलेख न होने के कारण दोनों के सामने ऐसी समस्या आती है। जब भारत को समस्या आयी तो उसे इस तरह सीधा हमला प्रसारित कर प्रचारतंत्र ने जो गजब की फुर्ती दिखाई उसके लिये वह प्रशंसा के काबिल है क्योंकि उसने उस देश को हिला दिया जो किसी से डरता नहीं है। इसका यह भी नतीजा आ सकता है कि आगे चीन ऐसी गल्तियां न करे जिससे तिल का ताड़ बने।
वैसे एक खबर एक चैनल ने दूसरी खबर भी चलाई कि भारतीय बाघ का दुश्मन चीन। दरअसल वहां शेर की खाल से शराब बनती है और आरोप लग रहा है कि नेपाल के तस्करी के जरिये भारत से खाल चीन जाती है। शेरों का शिकार करने कोई चीनी नहीं आते बल्कि अपने ही देश के लोग यह काम करते हैं। इसमें चीन का पूरा दोष नहीं है पर तस्करी के द्वारा इस तरह शेरों की खाल जाने की जिम्मेदारी से वह बच भी नहीं सकता। फिलहाल दोस्ताना रूप से यह बात तो चैनल वाले मान भी रहे हैं पर यह दोस्ताना आगे जारी रहेगा-यह चीनियों को सोचना भी नहीं चाहिए। अपने देश में शेरों की हत्या कर देना कोई सामान्य मामला नहीं है पर जिस तरह चीन को लक्ष्य कर यह कार्यक्रम प्रस्तुत किया गया उससे तो लग रहा है कि चीन पर प्रचारतंत्र की नजर पड़ गयी है। आने वाले समय में ऐसे बहुत सारे कार्यक्रम आ सकते हैं जिस पर चीन बौखला सकता है। इसकी वजह यह है कि वहां की हर गतिविधि के लिये सरकार सीधे जिम्मेदार मानी जाती है। अभी कुछ दिनों पहले भारत के नाम से नकली दवाईयां नाइजीरिया में भेजने के मामले में चीन फंस चुका है। भारतीय प्रचारतंत्र अभी तक चीन को समझता नहीं था पर अब उसे लगने लगा कि वहां की सरकार भारत को परेशान करने के लिए अपराध की हद तक जा सकती है। अपराध की भनक भी प्रचारतंत्र के कान खड़े कर सकती है क्योंकि सनसनी तो उसी ही फैलती है न! यहीं से चीन भी अब उसके दायरे में आ गया है क्योंकि उसके साफसुथरे और संपन्न होने का तिलिस्म भारतीय प्रचारतंत्र के सामने खत्म हो गया है। अब चीन के सामने एक केवल एक मार्ग है वह प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष से भारत के विरुद्ध अपराध होने को रोक दे नहीं तो जितना वह करेगा उससे अधिक तो भारतीय प्रचारतंत्र बतायेगा। इसे रोकना किसी के लिये संभव नहीं है।
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9 सितंबर 2009

खिचड़ी समाचार-हास्य व्यंग्य (khichdi samachar-hindi hasya vyangya)

उस क्रिकेट माडल ने टीवी वाले पत्रकारों के साथ बदतमीजी की। यह खबर भी टीवी चैनल वालों ने दी हैं। क्रिकेट माडल यानि वह खिलाड़ी जो खेलने के साथ ही विज्ञापन में भी करते हैं। अब टीवी चैनल वाले उस पर शोर मचा रहे हैं कि उसने ऐसा क्यों किया?’
अब उनका यह प्रलाप भी उस तरह प्रायोजित है जैसा कि उनके समाचार या वास्तव में ही वह दुःखी हैं, कहना कठिन हैं। एक जिज्ञासु होने के नाते समाचारों में हमारी दिलचस्पी है पर टीवी समाचार चैनल वाले समाचार दिखाते ही कहां हैं?
इस मामले में उन पर उंगली भी कोई नहीं उठाता। कहते हैं कि हमारा चैनल समाचारों के लिये बना है। टी.आर.पी रैटिंग में अपने नंबरों के उनके दावे भी होते हैं। इस पर आपत्ति भी नहीं की जानी चाहिये पर मुद्दा यह है कि उनको यह सम्मान समाचार के लिये नहीं बल्कि मनोंरजन के लिये मिलता है ऐसे में जो चैनल केवल समाचार देते हैं उनका हक मारा जाता है। सच तो यह है कि अनेक समाचार चैनल तो केवल मनोरंजन ही परोस रहे हैं पर अपनी रेटिंग के लिये वह समाचार चैनल की पदवी ओढ़े रहते है। अगर ईमानदारी से ऐसे मनोरंजन समाचार चैनल का सही आंकलन किया जाये तो उनको पूर्णतः समाचार और मनोरंजन चैनलों के मुकाबले कोई स्थान ही नहीं मिल सकता। अलबत्ता यह खिचड़ी चैनल है और उनके लिये कोई अलग से रैटिंग की व्यवस्था होना चाहिए।
जिस क्रिकेट माडल ने उनको फटकारा वह खिचड़ी चैनलों के चहेतोें में एक है। अपने इन मनोरंजक समाचार चैनलों के पास फिल्मी अभिनेताओं, अभिनेत्रियों और क्रिकेट खिलाड़ियों के जन्म दिनों का पूरा चिट्ठा है। जिसका वह रोज उपयोग करते हैं। उस दिन जन्म दिन वाला फिल्मी और क्रिकेट माडल तो संभवतः इतना बिजी रहता होगा कि वह शायद ही उनके प्रसारण देख पाता हो। इससे भी मन नहीं भरता तो प्रायोजित इश्क भी करवा देते हैं-समाचार देखकर तो यही लगता है कि कभी किसी अभिनेत्री को क्रिकेट खिलाड़ी से तो कभी अभिनेता से इश्क करवाकर उसका समाचार चटखारे लेकर सुनाते हैं।
यह मनोरंजक समाचार चैनल जो खिचड़ी प्रस्तुत करते हैं वह प्रायोजित लगती है। अब भले ही उस क्रिकेट माडल ने टीवी पत्रकार को फटकारा हो पर उसका प्रतिकार करने की क्षमता किसी में नहीं है। वजह टीवी चैनल और क्रिकेट माडल के एक और दो नंबर के प्रायोजक एक ही हैं। अगर चैनल वाले गुस्से में उसे दिखाना बंद कर दें या उसकी खिचड़ी लीलाओं-क्रिकेट से अलग की क्रियाओं- का बहिष्कार करें तो प्रायोजक नाराज होगा कि तुम हमारे माडल को नहीं दिखा रहे काहे का विज्ञापन? उसका प्रचार करो ताकि उसके द्वारा अभिनीत विज्ञापन फिल्मों के हमारे उत्पाद बाजार में बिक सकें।
खिलाड़ी स्वयं भी नाराज हो सकता है कि जब मेरी खिचड़ी गतिविधियों-इश्क और जन्मदिन कार्यक्रम- का प्रसारण नहीं कर रहे तो काहे का साक्षात्कार? कहीं उसके संगी साथी ही अपने साथी के बहिष्कार का प्रतिकार उसी रूप में करने लगे तो बस हो गया खिचड़ी चैनलों का काम? साठ मिनट में से पचास मिनट तक का समय इन अभिनेताओं, अभिनेत्रियों और क्रिकेट खिलाड़ियों की खिचड़ी गतिविधियों के कारण ही इन चैनलों का समय पास होता है। अगर आप इन चैनल वालों से कहें कि इस तरह के समाचार क्यों दे रहे हैं तो यही कहेंगे कि ‘दर्शक ऐसा हीं चाहते हैं’। अब इनसे कौन कहे कि ‘तो ठीक है तो अपने आपको समाचार की बजाय मनोरंजन चैनल के रूप में पंजीकृत क्यों नहीं कराते।’
हो सकता है कि यह कहें कि इससे उनको दर्शक कम मिलेंगे क्योंकि अधिकतर समाचार जिज्ञासु फिर धोखे में नहीं फंसेंगे न! मगर इनके कहने का कोई मतलब नहीं है क्योकि सभी जानते हैं कि यह चैनल दर्शकों की कम अपने प्रायोजकों को की अधिक सोचते हैं। यह उनका मुकाबला यूं भी नहीं कर सकते क्योंकि जो इनके सामने जाकर अपमानित होते हैं वह पत्रकार सामान्य होते हैं। उनमें इतना माद्दा नहीं होता कि वह इनका प्रतिकार करें। उनके प्रबंधक तो उनके अपमान की चिंता करने से रहे क्योंकि उनको अपने प्रायोजक स्वामियों का पता है जो कि इन फिल्म और खेलों के माडलों के भी स्वामी है।
वैसे आजकल तो फिल्म वाले क्रिकेट पर भी हावी होते जा रहे हैं। पहले फिल्म अभिनेत्रियां अपने प्रचार के लिये कोई क्रिकेट खिलाड़ी से इश्क का नाटक रचती थीं पर वह तो अब टीम ही खरीदने लगी हैं जिसमें एक नहीं चैदह खिलाड़ी होते हैं और उनकी मालकिन होने से प्रचार वैसे ही मिल जाता है। क्रिकेट, फिल्म और समाचार की यह खिचड़ी रूपरेखा केवल आम आदमी से पैसा वसूलने के लिये बनी हैं।
क्रिकेट खिलाड़ी और फिल्म अभिनेता अभिनेत्रियां करोड़ों रुपये कमा रहे हैं और उसका अहंकार उनमें आना स्वाभाविक है। उनके सामने दो लाख या तीन लाख माहवार कमाने वाले पत्रकार की भी कोई हैसियत नहीं है ओर फिर उनको यह भी पता है कि अगर इन छोटे पत्रकारों को फटकार दिया तो क्या बिगड़ने वाला है? उनके प्रबंधक भी तो उसी प्रायोजित धनसागर में पानी भरते हैं जहां से हम पीते हैं।
इधर हम सुनते आ रहे हैं कि विदेशों में एक चैनल के संवाददाता ने अपनी सनसनी खेज खबरों के लिये अनेक हत्यायें करा दी। हमारे देश में ऐसा हादसा होना संभव नहीं है पर समाचारों की खिचड़ी पकाने के लिये चालबाजियां संभव हैं क्योंकि उनमें कोई अपराधिक कृत्य नहीं होता। इसलिये लगता है जब कोई खेल या फिल्म की खबर नहीं जम रही हो तो यह संभव है कि किसी प्रायोजक या उसके प्रबंधक से कहलाकर फिल्मी और क्रिकेट माडल से ऐसा व्यवहार कराया जाये जिससे सनसनी फैले। हमारे देश के संचार माध्यमों के कार्यकर्ता पश्चिम की राह पर ही चलते हैं और यह खिचड़ी पकाई गयी कि फिक्स की गयी पता नहीं।
अब यह तो विश्वास की बात हो गयी। वैसे अधिकतर टीवी पत्रकार आम मध्यमवर्गीय होते हैं उनके लिये यह संभव नहीं है कि स्वयं ऐसी योजनायें बनाकर उस पर अमल करें अलबता उनके पीछे जो घाघ लोग हैं उनके लिये ऐसी योजनायें बनाना कोई मुश्किल काम नहीं है। यही कारण है कि खिचड़ी समाचार ही पूर्ण समाचार का दर्जा पाता है।
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25 अगस्त 2009

चिंतन चितेरा-आलेख (chintan chitera-hindi lekh)

स्थापित प्रचार माध्यमों, लेखक, विद्वान और बुद्धिजीवियो का तिलिस्म टूटने लगा है। अंतर्जाल पर अनेक बार हिंदी और अंग्रेजी में पाठ पढ़कर ऐसा लगता है कि पिछले एक सदी से इस देश में भ्रम को सच कहकर बेचा गया है। यह प्रचार माध्यम, लेखक, विद्वान और बुद्धिजीवी-इनको हम संगठित प्रचारक भी कह सकते हैं- एक तरफ पश्चिमी विकास की तरफ देखते हुए भविष्य के विकास का सपना देखने के लिये प्रेरित करते हैं या फिर अतीत के कुछ चुने हुए मुद्दो पर ही अपनी राय रखते हैं-क्योंकि उनको अपनी संकीर्ण मानसिकता तथा संक्षिप्त बौद्धिक क्षमता के कारण अधिक मुद्दे चयन करने में असुविधा होती है। कभी कभी प्रचार पाने के लिये वह विवादास्पद मुद्दों को ही सामने लाते हैं।
अब यह कहना मुश्किल है कि यह योजनाबद्ध प्रयास है या अनजाने में प्रचार पाने का स्वभाविक मोह जिससे देश के मुख्य मुद्दों से लोगों का ध्यान हटाया जाता है या उनको यह आम आदमी के लिये संदेश है कि उसकी समस्यायें कोई महत्व नहीं रखती। इधर अंतर्जाल पर जहां कुछ लेखक लीक से हटकर लिखते हुए दिख रहे हैं तो कुछ ऐसे भी हैं जो इन्हीं संगठित प्रचारकों की छाया बन गये हैं।
एक तरफ आप देखें कि सामान्य भारतीय चैतरफा परेशानियों से घिरा है। पहले तो समस्या यह थी कि जेब में पैसा है पर सामान महंगा है पर अब तो यह भी समस्या है कि वह जेब का पैसा असली है या नकली। देश में नकली मुद्रा का प्रचलन फौजी हमले से अधिक खतरनाक है यह बात आज तक किसने लिखी है। आतंकवाद से लड़ना आसान है पर यह नकली मुद्रा उस देश का अस्तित्व ही खतरे में डाल रही है जिस पर हम गर्व करते हैं। इधर सूखे की मार है। देश में बीमारियों की संख्या कम नहीं है पर जंग लड़ी जा रही है केवल ‘स्वाइन फ्लू के खिलाफ!
अंतर्जाल पर कई बार अनेक पाठ संवेदनशील और वैचारिक पाठ पढ़कर मन चिंतन करने को तैयार हो जाता है पर वर्तमान सच्चाईयां बहुत जल्दी सामने खड़ा होकर बेबस करती हैं। लिखने वाले मित्रों के पाठ कभी कभी प्रभावित करते हैं पर बहुत जल्दी उनका प्रभाव समाप्त होने लगता है। कुछ अंतर्जाल लेखक तो संगठित प्रचाकरों द्वारा सुझाये गये उन विषयों को ढो रहे हैं जिनसे समाज का सीधा कोई सरोकार नहीं है।
आज ही एक खबर पढ़ी कि अनेक देशी आतंकवादी संगठनों के नेता बाहर जाने के लिये आसरा ढूंढ रहे हैं ताकि सुरक्षा भी मिले और वह हफ्ता वसूली का पैसा अन्य व्यवसायों में लगा सकें। कितनी अजीब बात है कि गरीबों और मजदूरों की रक्षा के नाम पर आतंक फैलाने वाले यह संगठन अपने उगाहे पैसे को उन्हीं पूंजीपतियों को सौंपना चाहते हैं जिनसे उन्होंने वसूला है। हैरानी की बात है कि प्रचार माध्यमों में उनके समर्थक लेखक उनके सैद्धांतिक आधार बताते हैं और अब अंतर्जाल पर भी यही होने लगा है।

इस प्रसंग में एक टिप्पणीकर्ता की याद आ रही है। प्रसंग था श्रीलंका में एक उग्रवादी नेता के मारे जाने का था। उस पर इस लेखक ने एक पाठ लिखा था। उस पर एक प्रतिक्रिया आयी कि ‘इस खेल को भारत के लोग समझ नहीं रहे। दरअसल चीन ने श्रीलंका ने को हथियार तथा सैनिक दिये हैं और श्रीलंका में उग्रवादियों के गुटों के सफाये के साथ ही भारत के दुश्मन चीन ने हिन्द महासागर में अपने पांव फैला दिये हैं।’
कुछ संगठित प्रचारकों ने भी यही विचार व्यक्त किया। उस दिन अखबार में पढ़ने को मिला कि श्रीलंका को आधुनिक हथियार ब्रिटेन ने दिये थे और अब उनको वापस मांग रहा है। सच क्या है यह पता नहीं पर ब्रिटेन और चीन एक साथ किसी मोर्च पर काम नहीं कर सकते और दूसरा यह कि चीन का तो केवल हौव्वा है जबकि उसके हथियारों की श्रेष्ठता उसके सामानों की तरह प्रमाणिक नहीं है।
कहने का तात्पर्य यह है कि तयशुदा मुद्दों में चीन भी शामिल है जिसका हौव्वा खड़ा किया जाता है। हम जब केवल अंतर्राष्ट्रीय खतरों की बात करते हैं तब आंतरिक खतरों की बात से मूंह छिपा रहे होते हैं। क्या अपना यह इतिहास भूल गये हैं कि इस देश को आक्रांतों ने कम अपने ही गद्दारों ने अधिक त्रस्त किया। नकली नोट, घी, दूध, तथा खून की बातें केवल समाचार का विषय नहीं है बल्कि उन पर आंतकवाद से अधिक विचार कर उसका मुकाबला करने की आवश्यकता है। देश की समस्याओं पर चाहे जिस धर्म, जाति, भाषा या क्षेत्र के आदमी का समर्थन चाहिए मिल जायेगा पर लगता है कि इसकी किसी को जरूरत नहीं है। सब एक विषय पर समर्थन देंगे तो एक समाज बन जायेंगे जबकि आतंकवाद के आधार पर उसमें विभाजन कर उस पर दैहिक और बौद्धिक रूप से शासन किया जा सकता है-यही प्रवृत्ति संगठित प्रचारकों की नजर आती है।
बड़े लेखक, बुद्धिजीवी और विद्वान देश की एकता, अखंडता और स्वतंत्रता पर वाद और नारों के साथ बोलकर अपनी प्रसिद्धि हासिल कर रहे हैं पर उनका लाभ क्या है कोई नहीं बोलता? नकली मुद्रा उस देश को नष्ट करने जा रही है जिसकी स्वतंत्रता का दावा हम करते हैं और नकली घी, दूध, खून और खाद्य सामग्री इस देश के उन इंसानों के को संक्रमित करती जा रही है जिसको हम गौरवान्वित करना चाहते हैं। फिर यह गौरव और सम्मान का बखन किसलिये?
ऐसे में हिंदी ब्लाग पर ऐसे लेख देखकर तसल्ली होती है कि संगठित प्रचारकों के सतही विषयों से अधिक चिंतन क्षमता उनके लेखकों में है। वह संख्या में कम हैं। उनको पढ़ने वाले कम हैं। उनका नाम कोई नहीं जानता पर इससे क्या? जिनकी संख्या अधिक है, पढ़े भी अधिक जाते है। उनके नाम भी आकाश पर चमक रहे हैं पर उनका लिखा न तो समाज के किसी मतलब का है न ही भविष्य की पीढ़ी के लिये किसी काम का है। यह लेखक भी क्या करे? इधर इतिहास, साहित्य, और अन्य विषयों पर बिना मतलब का लेखन पढ़कर और उधर समाज की सच्चाईयां देखकर जो दूरी दिखाई देती है उसके बीच में जब चिंतन चितेरा फंस जाता है तब यह तय करना कठिन होता है कि हम किस पर लिखें?
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9 अगस्त 2009

मसला भेदभाव का-आलेख (bhedbhav ka masla-hindi article)

जहां तक नस्ल, जाति, भाषा और धर्म के आधार पर भेदभाव का प्रश्न है तो यह एक विश्वव्यापी समस्या है। इसे हम यूं भी कह सकते हैं कि यह एक मानवीय स्वभाव है कि मनुष्य समय पड़ने पर अपनी नस्ल, जाति, भाषा और धर्म से अलग व्यक्ति पर प्रतिकूल टिप्पणी करता है और काम पड़े तो उससे निकलवाता भी है। भारत के बाहर नस्लवाद एक बहुत गंभीर समस्या माना जाता है पर जाति, भाषा और धर्म के आधार पर यहां भेदभाव होता है-इससे इंकार नहीं किया जा सकता। इसका दूसरा पक्ष यह भी है कि किसी भी व्यक्ति के साथ यह भेदभाव सामयिक होता है और इसका शिकार कोई भी हो सकता है। मुश्किल यह है कि इस देश में अग्रेजों ने जो विभाजन के बीज बोये वह अब अधिक फलीभूत हो गये हैं। फिर स्वतंत्रता के बाद भी जाति, धर्म और भाषा के नाम पर विवाद चलाये गये ताकि लोगों का ध्यान उनमें लगा रहे-यह इस लेखक के सोचने का अपना यह तरीका हो सकता है। इसके साथ ही बुद्धिजीवियों का एक वर्ग विकास का पथिक तो दूसरा वर्ग परंपरारक्षक बन गया। दोनों वर्ग कभी गुलामी की मानसिकता से उबर नहीं पाये और जमीन वास्तविकताओं से परे होकर केवल नारे और वाद के सहारे चलते रहे। प्रचार माध्यमों में भी यही बुद्धिजीवी हैं जिनके पास जब कोई काम या खबर नहीं होता तो कुछ खबरें वह फिलर तत्वों से बनाते हैं। फिलर यानि जब कहीं अखबार में खबर न हो तो कोई फोटो या कार्टून छाप दो। इनमें एक जाति और धर्म के आधार पर भेदभाव का भी है।
अभी एक अभिनेता ने शिकायत की थी कि उसको धर्म के कारण मकान नहीं मिल पा रहा। सच तो वही जाने पर उसकी बात पर शुरु से ही हंसी आयी। यकीन नहीं था कि ऐसा हो सकता है-इसके बहुत सारे तर्क हैं पर उनकी चर्चा करना व्यर्थ है।
आज से 22 वर्ष पूर्व जब हम अपना मकान छोड़कर किराये के मकान में गये तो यह सोचकर परेशान थे कि समय कैसे निकलेगा? बहरहाल दो साल उस किराये के मकान में गुजारे। फिर एक दिन मकान मालिक से एक रात झगड़ा हुआ। हमने घोषणा कर दी कि परसों शाम तक मकान खाली कर देंगे।
हमने यह घोषणा की थी झगड़ा टालने के लिये पर मकान मालिक ने कहा कि-‘ अगर नहीं किया तो..............’’
हमने मकान ढूंढ लिया। हम मकान देखने गये वहां मालकिन से बात हुई। जातिगत या कहें कि भाषाई दृष्टि से अलग होने के बावजूद एक समानता थी कि दोनों के पूर्वज विभाजन के समय इधर आये थे-भारत पाकिस्तान विभाजन पर हमारी राय कुछ अलग है उस पर फिर कभी। यह हमारी किस्मत कहें कि मकान मिल गया। अगले दिन हम मकान खाली कर सामान गाड़ी से लेकर उस मकान में पहुंचे। सामान उतारने से पहले हमने उस मकान का दरवाजा खटखटाया तो मकान मालिक बाहर निकले। हमने कहा-‘ हम सामान ले आयें हैं।’
पीछे मकान मालकिन भी आ गयी थी। उसका चेहरा उतरा हुआ लग रहा था। मकान मालिक ने कहा-‘भाई साहब हम आपको जानते नहीं है। इसलिये.....’’
इसी बीच एक अन्य सज्जन भी बाहर आये और मुझे देखकर बोले-’’अरे, तुम यहां कैसे? अरे, भई यह तो बहुत बढ़िया लड़का है।’
वह उस मकान मालिक के बहनोई थे और व्यापारिक रिश्तों की वजह से हमें जानते थे। यह अलग बात है कि तब हम व्यापार से अलग हो चुके थे।
बहरहाल हम मकान के अंदर पहुंच गये। माजरा कुछ समझ में नहीं आया।
बाद में मकान मालिक ने बताया कि ‘आपको तो हमारे पति वापस भेजने वाले थे। वह तो हमारे ननदोई जी ने आपको अच्छी तरह पहचान लिया इसलिये इन्होंने नहीं रोका। यह आपके आने से चिंतित थे इसलिये अपने बहनोई को बुला लिया था कि किसी तरह आपको वापस भेज दें। हमारे पति कह रहे थे कि ‘उनकी जाति/भाषा वाले लोग झगड़ालू होते हैं।’
हम उनके मकान में दो किश्तों में चार साल रहे। पहले वह मकान खाली किया और फिर लौटकर आये। वह मकान मालिक मुझे आज भी अपना छोटा भाई समझते हैं। मान लीजिये उस दिन उनके बहनोई नहीं आते या पहचान के नहीं निकलते तो...................हमें उस मकान से बाहर कर दिया जाता। तब हम कौनसे और क्या शिकायत करते।
अपने मकान के बाद फिर अपने मकान पहुंचने में हमें बारह बरस लगे। चार मकान खाली किये। चार मकान देखे। कुछ मकान मालिकों ने प्याज खाने की वजह से तो कुछ लोगों ने जाति की वजह से मकान देने से मना किया। हर हाल में रहे हम लेखक ही। जानते थे कि यह सब झेलने वाले हम न पहले हैं न आखिरी! हमारा जीवन संघर्ष हमारा है और वह हमें लड़ना है।
हो सकता है कई लोग मेरी इस बात से नाराज हो जायें कि हमने बचपन से बकवास बहुत सुनी है जैसे जनकल्याण, प्रगति, सामाजिक धार्मिक एकता, संस्कार और संस्कृति की रक्षा, समाज का विकास और भी बहुत से नारे जो सपनों की तरह बिकते हैं। इस देश में आम आदमी का संघर्ष हमेशा उसकी व्यक्तिगत आधार पर निर्भर होता है। अपने जीवन संघर्ष में हमने या तो अपनी भाषा और जाति से बाहर के मित्रों से सहयोग पाया या फिर अपने दम पर युद्ध जीता। एक जाति के आदमी ने सहयोग नहीं दिया पर उसी जाति के दूसरे आदमी ने किया। सभी प्रकार की जातियों और अलग अलग प्रदेशों के लोगों से मित्रता है-इस लेखक जैसे इतने विविध संपर्क वाले लोग इस देश में ही बहुत कम लोग होंगे भले ही विविधता वाला यह देश है। लेखक होने के नाते सभी से सम्मान पाया। जिस तरह धर्म और भक्ति एकदम निजी विषय हैं वैसे ही किसी व्यक्ति का व्यवहार! आप एक व्यक्ति के व्यवहार के संदर्भ में पूरे समाज पर उंगली उठाते हैं तो हमारी नजर में आप झूठ बोल रहे हैं या निराशा ने आपको भ्रमित कर दिया है।
मुश्किल यही है कि बुद्धिजीवियों का एक तबका इसी भेदभाव को मिटाने की यात्रा पर निकलकर देश में प्रसिद्ध होता रहा है तो बाकी उनकी राह पर चलकर यही बात कहते जाते हैं। इधर विश्व स्तर पर कुछ ऐसे लेखक पुरस्कृत हुए हैं तो फिर कहना ही क्या? आप ऐसे विषयों पर रखी बातें इस लेखक के सामने रख दीजिये तो बता देगा कि उसमें कितना झूठ है। पांचों उंगलियां कभी बराबर नहीं होती। एक परिवार में नहीं होती तो समाज में कैसे हो जायेंगी? फिर एक बात है कि सामाजिक कार्य में निष्क्रिय लोगों की संख्या अधिक हो सकती है पर मूर्खों और दुर्जनों की नहीं। भेदभाव करने वाले इतने नहीं है जितना समभाव रखने वाले।
अभी एक ब्लाग लेखक ने लिखा कि एक हिन्दू ने मूंह फेरा तो दूसरे ने मदद की। अब उसका लिखना तो केवल मूंह फेरने वाले पर ही था। वह उसी परिप्रेक्ष्य में भेदभाव वाली बात कहता गया। हम आखिर तक यही सोचते रहे कि उस मदद करने वाले की मदद कोई काम नहीं आयी। यह नकारात्मक सोच है जो कि अधिकतर बुद्धिजीवियों में पायी जाती है। हमने सकारात्मक सोच अपनाया है इसलिये यही कहते हैं कि सभी एक जैसे नहीं है। हां, अगर लिखने से नाम मिलता है तो लिखे जाओ। हम भी तो अपनी बात लिख ही रहे हैं।
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8 अगस्त 2009

देशभक्ति को सस्ता मत बनाओ-आलेख (deshbhakti & google-hindi lekh)

हम बचपन में 15 अगस्त और 26 जनवरी पर स्कूल में जाते थे तब पहले रेडियो पर तथा बाद में राह चलते हुए दुकानों पर देशभक्ति के गीत सुनते हुए मन में एक जोश पैदा होता था। स्कूल में झंडावदन करते हुए मन में देश के लिये जो जज्बा पैदा होता था वह आज भी है। मगर इसका मतलब यह नहीं है कि हम यह मान लें कि यह हमारे अंदर ही है और इसलिये बाकी सभी में जगाते फिरें। वैसे भी आपातकाल में देश धर्म, जाति, भाषा या और क्षेत्रीय समूहों का मोह छोड़कर देशभक्ति दिखाते हैं। इसलिये सामान्य समय में होने वाले झगड़ों को देखकर यह भ्रम नहीं पालना चाहिये कि देश की एकता को खतरा है। इन्हीं सामान्य समयों में हल्के फुल्के अंतराष्ट्रीय वाद विवादों पर यह भी नहीं करना चाहिये कि देश के लोगों से उनको देशभक्ति का भाव जाग्रत करने का अभियाना बिना किसी योजना के प्रारंभ कर दें। इस देश को हर नागरिक संकट के समय बचाने आयेगा-भले ही वह अपनी रक्षा के स्वार्थ का भाव रखे या निष्काम भाव-इस पर विश्वास रखना चाहिए।

मगर कुछ लोगों के मन में देशभक्ति का भाव कुछ अधिक ही रहता है। उनकी प्रशंसा करना चाहिये। मगर जब सामान्य समय में वह हर छोटे मोटे विवाद पर देश में देशभक्ति का भाव दिखाते हुए दूसरे से भी तत्काल ऐसी आशा करते हैं कि वह भी ऐसी प्रतिक्रिया दे तब थोड़ा अजीब लगता है। अंतर्जाल पर हमारे ही एक मित्र ब्लाग लेखक ने भी ऐसा उतावलापन दिखाया। हमें हैरानी हुई। मामला है गूगल द्वारा अपने मानचित्र में भारत के अधिकार क्षेत्र को चीन में दिखाये जाने का! यह खबर हमने आज एक होटल में चाय पीते हुए जी न्यूज में भी देखी थी। बाद में पता लगा कि इस पर हमारे मित्र ने बहुत जल्दी अपनी प्रतिक्रिया दे दी। गूगल के ओरकुट से अपना परिचय हटा लिया। ब्लागर से ब्लाग उड़ा दिये। बोल दिया गूगल नमस्कार!
उन्होंने ऐसा नहीं कहा कि सभी ऐसा करें पर उनकी प्रतिष्ठता और वरिष्ठता का प्रभाव यह है कि अनेक ब्लाग लेखकों ने अपनी तलवारें निकाल ली-आशय यह है कि अपनी टिप्पणियों में देशभक्ति का भाव दिखाते हुए आगे ऐसा करने की घोषणा कर डाली।
एक ब्लागर ने असहमति दिखाई। इसी पाठ में ब्लाग लेखक के मित्र भ्राताश्री ने ही यह जानकारी भी दी कि गूगल के प्रवक्ता ने अपनी गलती मानी है और वह इसे सुधारेगा। समय सीमा नहीं दी।’
अब यह पता नहीं है कि आगे दोनों भ्राता क्या करने वाले हैं? मगर हिंदी ब्लाग आंदोलन को जारी रखने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है और इसी कारण लोग उन्हें अपनी मुखिया भी मानते हैं इसलिये उनके इस तरह के प्रयासों का ब्लाग जगत पर प्रभाव पड़ता है। मुख्य बात यह है कि इस तरह देशभक्ति का सस्ता बनाने का प्रयास लगता है।
इस तरह के अनेक विवादास्पद नक्शे आते रहते हैं और सरकारी तौर पर उसका विरोध होने पर बदलाव भी होता है। ऐसे में गूगल के विरुद्ध इस तरह का अभियान छेड़ने का का आव्हान थोड़ा भारी कदम लगता है खासतौर से तब जब आपने अभी कहीं औपचारिक विरोध भी दर्ज न कराया हो।
इन पंक्तियेां के लेखक को ब्लाग लिखने से कोई आर्थिक लाभ नहीं है। गूगल का विज्ञापन खाता तो अगले दस साल तक भी एक पैसा नहीं दे सकता। उसके विज्ञापन इसलिये लगा रखे हैं कि चलो उसकी सेवाओं का उपयेाग कर रहे हैं कि तो उसे ही कुछ फायदा हो जाये। सबसे बड़ी बात यह है कि आजादी के बाद हिंदी की विकास यात्रा व्यवसायिक और अकादमिक मठाधीशों के कब्जे में रही है। देश में शायद चालीस से पचास प्रसिद्ध लेखक ऐसे हैं जिनको संरक्षण देकर चलाया गया। बजाय हिंदी लेखकों को उभारने के अन्य भाषाओं से अनुवाद कर हिंदी के मूल लेखन की धारा को बहने ही नहीं दिया गया। आज भी अनेक हिंदी अखबारों में ऐसे बड़े लेखक ही छपते हैं जो अंग्रेजी में लिखने की वजह से मशहूर हुए पर हिंदी में नाम बना रहे इसलिये अपने अनुवाद हिंदी में छपवाते हैं।
व्यवसायिक प्रकाशनों में हिंदी लेखक से लिपिक की तरह काम लिया गया। आज इस देश में एक भी ऐसा लेखक नहीं है जो केवल लिखे के दम ही आगे बढ़ा हो। ऐसे में अंतर्जाल पर गूगल ने ही वह सुविधा दी है जिससे आम लेखक को आगे बढ़ने का अवसर मिल सकता है। हम जैसे लेखकों के लिये तो इतना ही बहुत है कि लिख पा रहे हैं। ऐसे अनेक लेखक हैं जो बहुत समय से लिख रहे हैं पर देश में उनकी पहचान नहीं है और वह अंतर्जाल पर आ रहे हैं।
गूगल का प्रतिद्वंद्वी याहू हिंदी के लिये किसी भी तरह उपयोगी भी नहीं है जबकि भारत का आम आदमी उसी पर ही अधिक सक्रिय है। न वह लिखने में सहायक है न पाठक देने में। गूगल के मुकाबले याहू का प्रचार भी कम बुरा नहीं है वह भी ऐसे मामले में जिसके निराकरण का प्रयास अभी शुरु भी नहीं हुए। हमें याहू के प्रचार पर ही भारी आपत्ति है क्योंकि वह किसी देशभक्ति का प्रतीक नहीं है। इधर समाचारों में यह पता भी लगा कि आधिकारिक रूप से नक्शे का विरोध दर्ज कराया जायेगा-उसके बाद की प्रतिक्रिया का इंतजार करना होगा। उसके बाद भी ब्लाग लेखकों से ऐसे आव्हान करने से पहले अन्य बड़े व्यवसायिक तथा प्रतिष्ठित लोगों से भी ऐसी कार्यवाही करवानी होगी। अपना पैसा खर्च कर ब्लाग लिखने वाले ब्लाग लेखकों में यह देशभक्ति का भाव दिखाने का खौफ तभी पैदा करें जब उसे विज्ञापन देने वाले बड़े संस्थान पहले उसके पीछे से हट जायें। अपने कुछ पल लिखने में आनंद से गुजारने वाले ब्लाग लेखक यह अच्छी तरह से जानते हैं कि उनके देशभक्ति दिखाने का वक्त कौनसा है? हालांकि यह जानकारी मित्र ब्लाग लेखक पर दर्ज है कि गूगल अपनी गलती स्वीकार कर चुका है।
वैसे मान लीजिये यह गलती अभी स्वीकार नहीं गयी होती तो भी तत्काल इस तरह के आव्हान करना ठीक नहीं है। यह देशभक्ति को सस्ता बनाने जैसा है। हम ब्लाग लेखक भले ही गूगल के समर्थक हैं पर आम प्रयोक्ता वैसे ही याहू समर्थक है। गूगल को भारत में अभी बहुत सफर तय करना है और उसे यह नक्शा बदलना ही होगा। यह लेखक अपने मिलने वालों से यही कहता है कि गूगल का उपयोग करो। आप यकीन करिये जिन लोगों ने गूगल का उपयोग हिंदी के लिये शुरु किया तो भले ही सभी ब्लाग लेखक नहीं बने पर वह उसका उपयोग करते हैं और याहू से फिर वास्ता नहीं रखते। सर्च इंजिन में हिंदी के विषय जिस तरह गूगल में दिखते हैं वह हिंदी के लिये आगे बहुत लाभप्रद होगा।
इस तरह के विवाद जिन पर हमारा निजी रूप से बस नहीं है उनके लिये इस तरह के आव्हान करना अतिआत्मविश्वास का परिचायक है। जब सभी लोग आपको बिना विवाद के अपना मुखिया मानते हैं तब आपको सोच समझकर ही कोई बात कहना चाहिये- खासतौर से जब देशभक्ति जैसा संवेदनशील विषय हो। इधर चीन का डर पैदा करने का प्रयास चल रहा है। आप भारतीय सेना की ताकत जानते हैं। भारत की एक इंच जमीन लेना भी अब आसान उसके लिये नहीं है। ऐसे कागजी नक्शे तो बनते बिगड़ते रहते हैं उनसे विचलित होना शोभा नहीं देता-खासतौर से जब आप लेखक हों और ऐसी कई घटनाओं पर लिख चुके हों।
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31 जुलाई 2009

हिंदी में लिखा अन्य भाषाओं में पढ़ते देखना रोमांचित करता है-आलेख (translate toolbar and hindi article)

भले ही वह संख्या कम है पर हिंदी भाषा में अपने ब्लाग अन्य भाषाओं में पढ़े जाते देखकर अचरज तो होता है। स्पष्टतः यह लगने लगा है कि अंतर्जाल पर जब आप किसी भाषा में लिख रहे हैं तो केवल आप उस भाषा के लेखक नहीं हैं बल्कि उस समूह के भावों के प्रवर्तक भी हैं। इस लेखक ने गूगल के अनुवाद टूलों को में अपने ब्लागों को दूसरी भाषा में पढ़े जाते देखा है। यह प्रतीत होता है कि हिंदी से अन्य भाषाओं में अधिक शुद्ध अनुवाद हो रहा है क्योंकि कोई शब्द अनुवाद से परे नहीं रह गया। हिंदी के शब्दों को पहले दूसरी भाषा में अनुवाद करके देखा। फिर उस अनुवाद को अंग्रेजी में किया तो देखा तो पाया कि उनका अनुवाद ठीक हो रहा है।

जिन भाषाओं में अपने ब्लाग को पढ़े जाते देखा उनमें चीनी, जापानी और हिब्रू शामिल हैं। अब अन्य भाषाओं से हिंदी में अनुवाद कैसे होगा इस पर भी काम करने का प्रयास करेंगे। भाषाई दृष्टि से सिकुड़ रहे विश्व में यह परिवर्तन देखने लायक होगा। यह लेखक आज भी भारत के ही उस अंग्रेजी ब्लाग लेखक को याद करता है जिसने यह भविष्यवाणी की थी कि विश्व में भाषाई दीवार अधिक समय तक नहीं चलेगी।

गूगल ने इस विश्व में एक क्रांतिकारी परिवर्तन लाने का प्रयास किया है जिसके परिणाम अब दृष्टिगोचर होने लगे हैं। इधर यह सुनने में आ रहा है कि गूगल को याहू और माइक्रोसोफ्ट चुनौती देने की योजना बना रहे हैं। पता नहीं उनकी क्या योजनायें होंगी पर इतना तय है कि याहू भारत के आम प्रयोक्ताओं में अधिक उपयोग में लाया जाता है जबकि गूगल रचनाधर्मी और व्यापारिक क्षेत्रो की पंसद है।

अंतर्जाल पर हिंदी लिखवाने के लिये जो गूगल ने योगदान दिया है उसे अनदेखा तो करना कठिन है। याहू भारतीय जनमानस में लोकप्रिय इसलिये बना हुआ है क्योंकि उसके बारे में यह भ्रम है कि एक भारतीय अभिनेता ने बनाया था जिसने अपनी फिल्म में याहू याहू कर गाना भी गया था। इसके बावजूद याहू की कोई हिंदी के लिये कोई खास भूमिका नहीं है। जो पाठक इस पाठ को पढ़ रहे हैं उन्हें यह पता होना चािहये कि इस हिंदी के पीछे गूगल के टूलों की महत्वपूर्ण भूमिका है।
इधर ब्लागों के आवागमन पर दृष्टिपात करने से भी यह पता चलता है कि याहू से पाठ पठन /पाठक संख्या नगण्य है जबकि गूगल का योगदान अधिक है। याहू से अधिक तो वेबदुनियां तथा दूसरे सर्च इंजिनों से पाठक आ रहे हैं। इसका कारण भी है। याहू ने हिंदी में अपना वर्चस्व जमाने के लिये एक हिंदी प्रकाशन से तालमेल किया है। जब पाठक उसका मुख्य पृष्ठ खोलता है तो वहां उस प्रकाशन द्वारा लगाये गये हिंदी में स्तंभ दिख जाते हैं। पाठक उन्हीं में उलझकर रह जाता है। यह स्तंभ केवल पुराने स्थापित या प्रसिद्ध लेखकों से ही सुजज्जित है। पाठक वहां आकर शायद ही हिंदी में लिखा शब्द पढ़ने का प्रयास करे। उसे पता भी नहीं होगा कि हिंदी में अंतर्जाल पर लिखने वाले अन्य ऐसे लेखक भी हैं जो प्रसिद्ध न हों पर सार्थक लिखते हैं। सच बात तो यह है कि याहू कि अंतर्जाल पर हिंदी लाने में कोई अधिक भूमिका नहीं है। इसके विपरीत गूगल ने न केवल रोमन लिपि से हिंदी में लिखने का टूल दिया है बल्कि कृतिदेव को यूनिकोड में परिवर्तित करने वाला टूल स्थापित कर हिंदी को सहज भाव से लिखने की प्रेरणा भी दी है।
भारत से बाहर गूगल को अधिक महत्व मिल रहा है। इसका कारण यह है कि उसने सर्ज इंजिन से खोज कर आने वाले पाठकों को ब्लाग/ वेबसाईटों को पढ़ने के लिये वहीं अनुवाद टूल भी लगा दिया है। इसी कारण हिंदी में लिखे गये ब्लाग अन्य भाषाओं में तथा अन्य भाषाओं से हिंदी में पढ़ना सहज हो गया है। यही कारण है कि रचानाधर्मी तथा व्यवसायी गूगल को अधिक पसंद करते हैं। इतना ही नहीं गूगल ने अपने अनेक कार्यक्रमों का निर्माण इस तरह किया है कि लोग उसके साफ्टवेयरों का उपयोग सार्वजनिक रूप से कर सकते हैं। गूगल ग्रुप में हिंदी टूल भारतीय विद्वानों ने ही लगाये हैं जबकि याहू इस तरह की सुविधा नहीं देता। सबसे बड़ी बात यह है कि अनुवाद और हिंदी लिखने के लिये जो गूगल ने जो सुविधा दी है उसने हिंदी लेखकों को बहुत सहायता मिली है।
इस लेखक को जितने भी मित्र मिले उन्होंने अपना ईमेल सबसे पहले याहू पर बनाया। आपसी बातचीत में चर्चा होने के बाद ही उन्होंने जीमेल बनाया।
इस लेखक का स्पष्ट मानना है कि याहू की लोकप्रियता से हिंदी को कोई लाभ नहीं है। उसने हिंदी के लिये बस इतना ही किया है कि एक पुराने प्रकाशन संस्थान को उसका जिम्मा दे दिया है। इसके विपरीत गूगल आम आदमी के जज्बातों को बाहर लाने के लिये जोरदार प्रयास कर रहा है। अन्य भाषाओं में हिंदी ब्लाग पढ़े जा सकते हैं यह बात रोमांचित करती है। साथ ही यह भी कि हम अन्य भाषाओं का लिखा हम हिंदी में पढ़ सकते हैं।
एक हिंदी लेखक के नाते अब इस बात पर भी विचार करना होगा कि मामला अब केवल हिंदी लेखन तक ही सीमित नहीं है। आपके पाठ विश्व स्तर पर पढ़े और समझे जायेंगे। इसलिये हिंदी के मठाधीशों से सम्मान या इनाम की आशा की बजाय अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अपनी बात पहुंचाने के लिये इस ब्लाग सुविधा का उपयोग करें। उन्हें यह समझना चाहिये कि वह किसी सीमित समूह के लिये वह अपना पाठ नहीं लिख रहे बल्कि पूरे विश्व में उसे कहीं भी कोई किसी भाषा में भी पढ़ सकता है। लिखकर तत्काल वाह वाही या सम्मान पाने का मोह न हो तो ही यह बात रोमांचित कर सकती है।
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15 जुलाई 2009

अपने ही पसीने से नहाये हम-हिंदी शायरी (apna pasina-hindi shayri)

ताउम्र एड़ियां रगड़कर चलते रहे
सिंहासन पर बैठने की बात
कभी समझ ही नहीं आई।
यह तय रहा हमेशा
पैदा मजदूर की तरह हुए हैं
वैसे ही छोड़ जायेंगे दुनियां
जिसके लिये बहायेंगे पसीना
मिलेगी नहीं वह खुशियां
कभी चली ठंडी हवा तो
उसने ही दिया सुकून
दूसरे की चाहतें पूरी करते रहे
अपनी सोचकर आंखें भर आई।

फिर भी नहीं गम है
अपनी शर्तो पर जिये
यह भी नहीं कम है
गरीबों पर जग हंसा तो
बादशाहों की भी मखौल उड़ाई।
हमने पैबंद लगाये अपने कपड़ों में
उन्होंने सोने से अपनी देह सजाई।
जिंदगी का फलासफा है
वैसी होगी वह जैसी तुमने नजरें पाई।
दूसरे का खून निचोड़कर
जिन्होंने अमीरी पाई
बैचेनी की कैद हमेशा उनके हिस्से आई।
अपने ही पसीने में नहाये हम तो क्या
हमेशा चैन की बंसी बजाई।

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30 जून 2009

अंतर्जाल का इश्क, आशिक और माशुका-हास्य व्यंग्य

आशिक और माशुका ने अपने प्यार के प्रचार के लिये एक ब्लाग संयुक्त ब्लाग इस आशा के साथ बनाया कि वह अगर हिट हो गया तो उससे उनको कमाई होगी जिसमें से पैसा जोड़कर अपना घर बसायेंगे। दोनों का संयुक्त ब्लाग था और उन्होंने तय कर रखा कि किसी दूसरे को टिप्पणी नहीं लिखने देंगे। इसी कारण उन्होंने टिप्पणी लिखने के विकल्प में ब्लाग लेखक ही दर्ज कर रखा था। सब कुछ ठीक ठाक चल रहा था कि अनाम और छद्म ब्लाग लेखकों की नजर में यह सब आ गया। हुआ यूं कि दोनों ही अंतर्जाल पर जाकर दूसरों के ब्लाग पर भी व्यंग्यतात्मक टिप्पणियां लगाने लगे। अगर यह काम वह धर्मवादी ब्लाग पर करते तो ठीक था पर उन मासूम प्रेमियों ने नारीवादी और विकासवादी ब्लाग लेखकों के ब्लाग पर यह काम किया।
कहने को वह भले लोग थे पर जिस तरह उनका प्रेमपाठ और टिप्पण उस ब्लाग पर चल रहा था वह उनसे टिप्पणी प्राप्त ब्लाग लेखकों को सहन नहीं हुआ।
एक अनाम ब्लाग लेखक ने छद्म पुरुष का नाम लिखकर आशिक को समझाया-अरे, भई इससे तुम्हें कोई फायदा नहीं होगा? लोग तुम्हें कमाई कराना चाहते हैं। इसलिये अपने ब्लाग पर संवाद सभी के लिये खुला रखो।’
आशिक ने लिख भेजा-
‘ऐसी तैसी में गयी कमाई
रोज देखता हूं दूसरे ब्लाग पर
कमाई के हजार नुस्खे
पर किसी की जेब भरी नजर नहीं आई।
बड़ी मुश्किल से
कोई माशुका हाथ आई।
पता लगा कि जैसे ही खोली
सभी के लिये टिप्पणियों की खिड़की
ले उड़ा मेरी माशुका को कोई अनाम भाई।’

वह बिचारा हास्य कवि था। उस मासूम को पता ही नहीं था कि उसने क्या कर डाला था। अब तो अनाम ब्लाग लेखक को गुस्सा आ गया। उसने फौरन लड़की का छद्म नाम लिखकर लड़की को ऐसा ही संदेश भेजा।
लड़की को केवल टिप्पणी लिखना ही आती थी। उसने जवाब में लिख भेजा कि ‘कोई टिप्पणी नहीं।’
अब तो अनाम ब्लाग लेखक का पारा चढ़ गया। उसने फौरन एक दूसरे छद्म लेखक को संदेश भेजा कि-‘यह कैसे हो सकता है कि हम इतने पुराने लोेग और नये ब्लाग लेखकों में इतनी हिम्मत आ गयी कि वह हमारी सुन नहीं रहे। अपनी प्रतिष्ठा के लिये इनके प्रेम पाठ में खलल डालना ही होगा। दोनों की प्यार भरी बातों को पढ़कर लोग मजे ले रहे हैं और अपने ब्लाग फ्लाप होते जा रहे हैं।’
इधर छद्मनामधारी ब्लाग लेखक भी किसी नये अभियान के लिये तैयार बैठा था।
उसने लड़की का नाम लिखकर लड़के को प्यार से संदेश भेजा और कहा-‘अरे जनाब आप यह क्या कर रहे हैं। हम आपका अमर प्रेम देखकर बहुत खुश हैं पर इसका लाभ तभी है कि जब दूसरे लोग आपके ब्लाग पर अपनी बात रखें। आपने तो अपने प्रोफाइल में ही लिखा हुआ है कि आप अपने प्यार के प्रचार से कमाना चाहते हैं फिर यह टिप्पणी से पर्दा क्यों? आप बेफिक्र रहिये। मैं एक तकनीक विशेषज्ञ ब्लाग लेखिका हूं। अगर किसी ने एैसी वैसी हरकत की तो उसका आई पी पता निकालकर आपको दूंगी। उसका नाम अपने ब्लाग पर छाप दूंगी। आप डरिये नहीं।
आशिक जाल में फंस गया। उधर ऐसा ही संदेश उसी दूसरे छद्म ब्लाग लेखक ने माशुका को पुरुष नाम से भेजा। साथ में लिखा कि ‘मैं तुम्हें बहुत स्नेह करता हूं पर हां, यहां भाई या अंकल के संबोधन से नहीं पुकारा जाता यह बात ध्यान रखना।’
आशिक माशुक ने अपने ब्लाग को सार्वजनिक रूप से टिप्पणियों के लिये खोल दिया। ब्लाग पर आशिक कवितायें लिखता। कभी कभी वह अपनी माशुका के नाम से भी कवितायें लिख देता। टिप्पणियां अलबत्ता उसकी माशुका ही देती थी। हालत यह थी कि आशिक जो कवितायें माशुका द्वारा लिखी बताकर प्रकाशित करता उसं पर भी वह लिख देती थी कि‘तुमने यह लिखकर मेरा दिल मोह लिया है।’
मगर अनाम और छदम नाम ब्लाग लेखकों का चैन कहां? एक दिन आशिक को संबोधित करते हुए अनेक छद्मनाम ब्लाग लेखक ने लड़कियों की तरफ से टिप्पणियां लिख दी।
‘अरे, जानू तुम कहां हो? तुमने क्या इतने दिन से अपना ईमेल नहीं खोला? कितने संदेश भेज चुकी हूं। आज तुम्हारा यह नया ब्लाग मेरी नजर में आ गया। यह किसके साथ बनाया है? कौन चुड़ैल है? उसको मैं छोड़ूंगी नहीं।’

‘अरे, धोखेबाज? अब पता लगा कि इतने दिन से तुम कहां हो? अगर तुम्हें मेरे साथ आगे संपर्क बनाना पसंद नहीं है तो कोई बात नहीं! प्लीज मेरा ब्लाग मुझे लौटा दो। उस पर में अब लिखकर तुम्हारी यादों के सहारे जिंदा रहूंगी।’
इस तरह के अनेक संदेश थे। माशुका ने पढ़ा तो तमतमा गयी। उसने आशिक से कह दिया कि‘मेरी सहेली पहले ही कहती थी कि कभी इंटरनेट पर इश्क न लड़ाना। वहां तो बस धोखे ही धोखे है।’
माशुक ने लिखा-‘अरे, यह सब झूठ है। मैं पता कर रहा हूं कि यह कौन लोग हैं। निश्चित रूप से यह फर्जी नाम हैं। मैं इनका पता कर लूंगा। ब्लाग जगत में मेरे कुछ मित्र हैं जो इसमें मेरी मदद करेंगे।’
माशुका ने कहा-‘एक सप्ताह के अंदर अगर तुमने इसकी जांच पड़ताल कर रिपोर्ट प्रस्तुत नहीं की तो मुझे भूल जाना। यह बदमाशी किसने की है उनके नाम पते मेरे को बताना। उसका प्रमाणीकरण करने के बाद ही हमारे प्रेम पाठ और उस पर टिप्पणियों का क्रम दोबारा शुरु होगा। वरना गुड बाय!
आशिक ने सोचा कि दोस्त मदद करेंगे। दोस्त के नाम पर भी उसके पास वही अनाम और छद्मनाम ब्लाग लेखक थे। उसने उनको ईमेल किया और अपनी दुर्दशा बयान की।
उसका ईमेल मिलते ही दोनों अपने घरों से एक दूसरे से मिलने भागे। इतनी तेज भागे कि रास्ते में टकरा कर गिर पड़े। वहां भीड़ जमा हो गयी कि पता नहीं यह हादसा कैसे हो गया। वह उठ खड़े हुए और लोगों को अपने पास से हटाते हुए बोले-‘हटो! क्या कभी ब्लागर नहीं देखा।’
उस दिन दोनों ने बैठकर शराब खाने में दारु पी। दारु के महंगी होने से लेकर बरसात न होने पर चिंतायें जाहिर की। इतने विषयों पर चर्चा की पर यह विषय भूल गये। अपनी चर्चा की अपने ब्लाग पर रिपोर्ट भी लिखी पर इस विषय को छूआ भी नहीं।
अनाम ब्लाग लेखक ने अगले दिन आशिक को इ्र्रमेल किया और लिखा‘तुम चिंता मत करो। हम उनका पता लगा रहे हैं। यह कौन लोग हैं जो तुम्हारे अमर प्रेम को शैशवास्था में ही नरक भेजने पर तुले हैं। हमने अपने से अधिक जानकार लोगों को सब बताया है। वह जल्दी रिपोर्ट करेंगे।
छद्म ब्लाग लेखक ने भी लिखा-‘अरे, तुम्हारे विरोधियों को नहीं मालुम किससे टक्कर ले रहे हैं? बस मैंने अपने एक दोस्त को लिखा है वह पता कर लेगा।’
दोनों का जवाब एक जैसा देखकर आशिक का माथा ठनका। इससे पहले तो दोनों ने यह आश्वासन दिया था कि वह स्वयं ही पता लगा लेने में सक्षम हैं पर अब दोनेां अपना दायित्व ऐसे लोगों पर डाल रहे थे जिनको वह जानता तक नहीं था।
इस तरह छह दिन हो गये। वह हर दिन कसमें देकर अनाम और छद्म नाम ब्लाग लेखकों को संदेश भेजता कि‘आज किसी तरह मेरा काम कर दो। बस अब कम दिन बचे हैं।’
सातवें दिन माशुका के अल्टीमेटम समाप्त होने के एक घंटे पहले अनाम ब्लाग लेखक का संदेश उस आशिक के पास आया-‘मेरे दोस्त ने कहा है कि इस तरह का पता लगाने के लिये व्यवसायिक संस्थायें हैं पर उसके लिये कुछ पैसा खर्च करना पड़ेगा।’
लगभग ऐसा ही जवाब छद्मनाम ब्लाग लेखक ने भी भेजा। हताश आशिक ब्लाग लेखक ने अपने ब्लाग पर यह कविता लिखी।
पता नहीं कैसे वह घड़ी आयी
जब मैंने वाह वाह सुनने के लिये
अपने ब्लाग पर टिप्पणी की खिड़की खुलवायी।
कभी कभी वहां से झांकती
कोई चिड़िया चहकी
पर मेरी माशुका की तरह नहीं महकी
फिर किस पर क्या फिदा होते
सूरत उसकी नजर न आई।
जिनके नाम नहीं है वह अनाम
अंदर क्या आते
जो अंदर थी चिड़िया वही
छोड़कर निकल गयी
हे ब्लाग बनाने वाले तू ने
यह टिप्पणी वाली खिड़की क्यों बनाई।’

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सातवां दिन भी बीत गया। तब तैश में आकर उसने अनाम और छद्मब्लाग नामधारी ब्लाग लेखकों को लानत भेजी। इससे वह और नाराज हो गये। तब इधर उधर हाथ मारकर देखा तो पाया कि वह लड़की और कोई नहीं उनका ही एक विरोधी छद्म ब्लाग लेखक था। अनाम ब्लाग लेखक ने तत्काल उठाकर उस कवि को यह संदेश भेजा-‘महाराज, लो यह पता कर लिया। वह लड़की थी ही नहीं जिसके चक्कर में तुम हमें लानत भेज रहे हो। हम तुम्हें बता रहे हैं यह उस ब्लाग लेखक की करतूत है जिससे हम भी बहुत चिढ़ते हो। तुम उस पर व्यंग्य कवितायें लिखो हम टिप्पणियां कर उसे रौशन करेंगे।’
मगर हास्य कवि चुप बैठ गया। उसने सोचा कि ‘अगर वह तीसरा भी कोई अनाम या छद्म ब्लाग लेखक होगा तो क्या फायदा? इससे तो अच्छा है अकेले बैठकर सिर धुनते रहें‘दोस्त दोस्त ना रहा, प्यार प्यार न रहा।’
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नोट-यह व्यंग्य काल्पनिक है तथा इसका किसी धटना या व्यक्ति से कोई लेना देना नहीं है। अगर किसी की कारिस्तानी से मेल खा जाये तो वही इसके लिये जिम्मेदार होगा।
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यह कविता/आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की हिन्दी-पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
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15 जून 2009

रात के पिटे मोहरे-हास्य व्यंग्य (hasya vyangya)

गुजु उस्ताद सुबह ही दिख गया। पहले हम उसके मोहल्ले में रहते थे अब कालोनी में मकान बना लिया सो उससे दूर हो गये, मगर हमारे काम पर जाने का रास्ता उसी मोहल्ले से जाता है। गुजु उस्ताद को भी हमारी तरह क्रिकेट देखने का शौक था पर इधर क्रिकेट मैचों पर फिक्सिंग वगैरह के आरोप लगे तो हम इससे विरक्त हो गये पर गुजु उस्ताद का शौक लगातार बना रहा।
हम रास्ते पर खड़ा देखकर कई बार उसे नमस्कार कर निकलते तो कई बार वही कर लेता। कई बार दोनों ही एक दूसरे को देखकर मूंह फेर लेते हैं। हां, क्रिकेट मैच के दिन हम अगर जरूरी समझते हैं तो रुक कर उससे बात कर लेते हैं। आज भी रुके।
वह देखते हुए बोला-‘हां, मुझे पता है कल भारत हार गया है और तुम जरूर जले पर नमक छिड़कने का काम करोगे। देशभक्ति नाम की चीज तो अब तुम में बची कहां है?’
हमने कहा-‘क्या बात करते हो? हम तुम्हें पहले भी बता चुके हैं क्रिकेट खेल में हमारी देशभक्ति को बिल्कुल नहीं आजमाना। हां, यह बताओ कल हुआ क्या?’
गुजु उस्ताद ने कहा-‘तुमने मैच तो जरूर देखा होगा। चोर चोरी से जाये पर हेराफेरी से न जाये। आंखें कितनी बूढ़ी हो जायें सुंदरी देख कर वही नजरें टिकाने से बाज नहीं आती।’
हमने कहा-‘नहीं मैच तो हम देख रहे थे। पहले लगा कि भारतीय टीम है पर जब तीसरा विकेट गिरा तो ध्यान आया कि यह तो बीसीसीआई की टीम है। अब काहे की देशभक्ति दिखा रहे हो? इस तरह मूंह लटका घूम रहे हो जैसे कि तुम्हारा माल असाबब लुट गया है। क्या यह पहला मौका है कि बीसीसीआई की टीम हारी है?’
गुजु उस्ताद-‘यार, पिछली बार बीस ओवरीय क्रिकेट प्रतियोगिता में अपनी टीम विश्व विजेता बनी थी और अब उसकी यह गत! देखते हुए दुःख होता है।’
हमने चैंकते हुए कहा-‘अपनी टीम! इससे तुम्हारा क्या आशय है? अरे, भई अपना राष्ट्रीय खेल तो हाकी है। यह तो बीसीसीआई यानि इंडियन क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड की टीम है। हार गयी तो हार गयी।’
गुजु उस्ताद-‘काहे को दिल को तसल्ली दे रहे हो कि हाकी राष्ट्रीय खेल है। हमें पता है तुम कभी हाकी खेलते थे पर साथ ही यह भी कि तुम ही लंबे समय तक क्रिकेट खेल देखते रहे। 1983 में विश्व कप जीतने पर तुमने ही अखबार में इसी भारतीय टीम की तारीफ में लेख लिखे थे। बोलो तो कटिंग लाकर दिखा दूं। हां, कुछ झूठे लोगों ने इस खेल को बदनाम किया तो तुम बरसाती मेंढक की तरह भाग गये। मगर यह क्रिकेट खेल इस देश का धर्म है। हां, इसमें तुम जैसे हाकी धर्म वाले अल्पसंख्यक जरूर हैं जो मजा लेने के लिये घुस आये और फिर बदनाम होता देखकर भाग खड़े हुए।’
हमने कहा-‘यह किसने कहा क्रिकेट इस देश का धर्म है?’
गुजु उस्ताद ने हमसे कहा-‘क्या टीवी देखते हो या नहीं। एफ. एम. रेडियो सुनते हो कि नहीं? सभी यही कह रहे हैं।
हमने कहा-‘सच बात तो यह है कि कल हमने बीसीसीआई टीम का तीसरा विकेट गिरते ही मैच बंद कर दिया। सोचा सुबह अखबार में परिणाम का समाचार देख लेंगे। मगर आजकल थोड़ी पूजा वगैरह कर रहे हैं इसलिये सोचा कि क्यों सुबह खराब करें। अगर बीसीसीआई की टीम हार गयी तो दुःख तो होगा क्योंकि यह देश से भाग लेने वाली अकेली टीम थी। पिछली प्रतियोगिता में तो अपने देश से चार पांच टीमें थी जिसमें भारत के खिलाड़ी भी शामिल थे तब देखने का मन नहीं कर रहा था। इस बार पता नहीं क्यों एक ही टीम उतारी।’
गुजु उस्ताद-‘महाराज, यह विश्व कप है इसमें एक ही टीम जाती है। यह कोई क्लब वाले मैच नहीं है। लगता है कि क्रिकेट को लेकर तुम्हारे अंदर स्मृति दोष हो गया है। फिर काहे दोबारा क्रिकेट मैच देखना काहे शुरु किया। लगता है तुम विधर्मी लोगों की नजर टीम को लग गयी।’
हमने कहा-‘वह कल टीवी में एक एंकर चिल्ला रही थी ‘युवराज ने लगाये थे पिछली बार छह छक्के और आज उस बालर को नींद नहीं आयी होगी‘। हमने यह देखना चाहा कि वह बालर कहीं उनींदी आंखों से बाल तो नहीं कर रहा है पर वह तो जमकर सोया हुआ लग रहा था। गजब की बालिंग कर रहा था। फिर युवराज नहीं आया तो हमने सोचा कि शायद टीम में नहीं होगा। इसलिये फिर सो गये। चलो ठीक है!’
गुजु उस्ताद ने घूर कर पूछा-‘क्या ठीक है। टीम का हारना?’
हमने कहा-‘नहीं यार, सुना ही बीसीसीआई की टीम अब प्रतियोगिता से बाहर हो गये इसलिये अब नींद खराब करने की जरूरत नहीं है। कल भी बारह बजे सोया था। आज देर से जागा हूं। वैसे तुम ज्यादा नहीं सोचना। तुम्हारी उम्र भी बहुत हो चली है। यह क्रिकेट तो ऐसा ही खेल है। कुछ नाम वाला तो कुछ बदनाम है।’
गुजु उस्ताद ने कहा-‘देखो! अब आगे मत बोलना। मुझसे सहानुभूति जताने के लिये रुके हो?मुझे पता है कि बाहर से क्रिकेट का धर्म निभाते नजर आते हो पर अंदर तो तुम अपनी हाकी की गाते है। अगर कोई शुद्ध क्रिकेट खेलने वाला होता तो उसे बताता मगर तो तुम हाकी वाले और कुछ कह दिया तो हाल ही कहोगे कि ‘हम हाकी खेलने वाले अल्पसंख्यक हैं इसलिये क्रिकेट वाले हम पर रुतबा जमाते हैं।’
हमने कहा-‘यार, सभी खेल धर्म तो एक ही जैसे है। सभी खेल स्वास्थ्य और मन के लिये बहुत अच्छे हैं। हम तो खेल निरपेक्ष हैं। आजकल तो शतरंज भी खेल लेते हैं।’
गुजु उस्ताद ने कहा-‘मैं तुम्हारी बात नहीं मानता। मुझे याद है जब क्रिकेट की बात मेरा तुम्हारा झगड़ा हुआ था तब मैं तुम्हें मारने के लिये बैट लाया तो तुम हाकी ले आये। इसलिये यह तो कहना ही नहीं कि क्रिकेट से तुम्हारा लगाव है।’
हमने सोचा गुजु उस्ताद बहुत अधिक अप्रसन्न होकर बोल रहे थे। तब हमने विषयांतर करते हुए कहा-‘पर अपनी टीम तो बहुत अच्छी है। हारी कैसे?’
गुजु उस्ताद बोले-‘तुम जाओ महाराज, हमने रात खराब की है और तुम दिन मत खराब करो। अभी तो नींद से उठे हैं और फिर हाकी धर्म वाले की शक्ल देख ली।’
हमने चुपचाप निकलने में वहां से खैर समझी। हमने सोचा रात के यह पिटे हुए पैदल कहीं चलते चलते वजीर जैसे आक्रामक बन गये तो फिर झगड़ा हो जायेगा। सच बात तो यह है कि गुजु उस्ताद ही वह शख्स हैं जिन पर हम क्रिकेट से जुड़ी कटोक्तियां कह जाते हैं बाकी के सामने तो मुश्किल ही होता है। लोग गुस्सा होने पर देशभक्ति का मामला बीच में ले आते हैं। हालांकि यह सब बाजार का ही कमाल है जो क्ल्ब के मैचों के वक्त देशभक्ति की बात को भुलवा कर बड़े शहरों के नाम पर भावनायें भड़काते हुए अपना माल बेचता है तो विश्व कप हो तो देश के नाम पर भी यही करता है। मगर भावनायें तो भावनायें हैं। हम ठहरे हाकी वाले-जहां तक देश का सवाल है तो उसमें भी कोई अच्छी स्थिति नहीं है फिर काहे झगड़ा लेते फिरें।
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7 जून 2009

फिर होने लगी क्रिकेट मैच की चर्चा-आलेख

बंदर चाहे कितना भी बूढ़ा हो जाये गुलाट लगाना नहीं भूलता यही कुछ हालत हम भारतवासियों की है। कोई व्यसन या बुरी आदत बचपन से पड़ जाये तो उससे पीछा नहीं छुड़ा सकते। ऐसी आदतों में क्रिकेट मैच देखना भी शामिल है। 2007 में इस बात का भरोसा नहीं था कि भारत की क्रिकेट टीम एक दिवसीय विश्व कप मैच जीतेगी फिर भी लोग देखते रहे और जब वहां बुरी तरह हारी तब विरक्त होने लगे। मगर पिछले वर्ष बीस ओवरीय क्रिकेट प्रतियोगिता भारत ने जीती तो बच्चे, बड़े और बूढ़े फिर क्रिकेट मैच देखने लगे।
1983 तक भारत में एक दिवसीय मैच को महत्व नहीं दिया जाता था बल्कि पांच दिवसीय मैचों में ही दिलचस्पी लेते थे। उस वर्ष भारत ने एक दिवसीय क्रिकेट प्रतियोगिता क्या जीती? भारत में उसे देखने का फैशन चल पड़ा-यहां खेल खेलना और देखना भी अब फैशनाधारित हो गये हैं-जिसे देखो वही एक दिवसीय मैचों को देखना चाहता था। उस समय जो बाल्यकाल में थे वह पूरी युवावस्था और जो युवावस्था में थे वह वृद्धावस्था तक क्रिकेट मैच टीवी पर देखकर आखें खराब करते रहे। खिलाड़ियों पर जमकर दौलत और शौहरत बरसी। जब दौलत और शौहरत आती है तो अपने साथ विकार और अहंकार भी लाती है। यही हुआ। क्रिकेट का नाम हुआ तो वह बदनाम भी हुआ। देखने वालों में कुछ ऐसे भी तो जो मुफ्त में मजा लेते थे तो कुछ लोगों ने दांव लगाकर पैसे कमाने चाहे। खेल बदनाम हुआ। इधर अपने देश की टीम के सदस्य कमाते रहे पर खेल में पिछड़ते गये। 2007 में बंग्लादेश से हारे तो लोगों का इस खेल से विश्वास ही उठ गया।
एक समय ऐसा लगने लगा कि अब लोग अब इस खेल से विरक्त हो जायेंगे मगर ऐसा नहीं हुआ। लोगों के पास पैसा भी आया तो समय भी फालतू बहुत था। भीड़ फिर मैदान में रहने लगी। टिकिटों की मारामारी यथावत थी मगर इस देश में फालतू लोगों की संख्या को देखते हुए भी यह लोकप्रियता यथावत होने का प्रमाण नहीं था। इस खेल को बचपन और युवावस्था से केवल देख रहे लोग इससे विरक्त होते जा रहे थे। क्रिकेट की चर्चा ही एकदम बंद हो गयी।
पिछले साल भारत ने बीस ओवरीय क्रिकेट का विश्व कप क्या जीता लोगों के मन मस्तिष्क की वापसी इस खेल के प्रति हो गयी। जब भारत बीस ओवरीय प्रतियोगिता में खेल रहा था तब लोगों का आकर्षण इसके प्रति बिल्कुल नहीं था पर जैसे ही वह जीता सभी नाचने लगे। भारतीय टीम जो एक खोटा सौ का नोट हो गयी थी और पचास में भी नहीं चल रही थी बीस में क्या चली फिर सौ की हो गयी। लोग पुरानी टीम की चाल और चरित्र भूल गये। पहले प्रेमी रहे लोग जो अब क्रिकेट से चिढ़ने लगे थे फिर उसकी तरफ आकर्षित हो गये। भारत के लोगों में आकर्षण दोबारा पैदा हुआ तो क्रिकेट के व्यवसायियों की बाछें खिल गयीं। अब तो क्लब स्तर की टीमें बनाकर वह मैचा करवा रहे हैं जिसमें उनको भारी आय हो रही है।
इससे क्या जाहिर होता है? यही कि इस देश में लोग विजेता को सलाम करते हैं। जीत का आकर्षण भारतीयों की चिंतन क्षमता का हर लेता है। भारतीयों की मानसिकता अब विश्व में व्यवसायियों से छिपी नहीं है। दुनियां का सबसे लोकप्रिय खेल फुटबाल हैं। उसमें भारतीय टीम की उपस्थिति नगण्य है। वैसे कुछ फुटबाल व्यवसायियों ने क्रिकेट के संक्रमण काल में यह प्रयास किया था कि भारत में भी फुटबाल लोकप्रिय हो ताकि यहां के लोगों के जज्बातों का आर्थिक दोहन किया जा सके मगर उसके सफल होने से पहले ही बीस ओवरीय क्रिकेट मैचों के विश्व कप जीतने से भारतीय खेल प्रेमी (?) उसी तरफ लौट आये।
अब हालत यह है कि हम जैसा आदमी जो कि क्रिकेट मैचों से अलविदा कह चुका था वह भी मैच तिरछी नजर से देख लेता है। ऐसे में जब देश की टीम जीत रही हो तो फिर नजरें जम ही जाती हैं। यह इसलिये हुआ कि कहीं चार लोगों में उठना बैठना होता है तो वह अब फिर से क्रिकेट की चर्चा करने लगे हैं। इतना ही नहीं भाई लोग क्लब स्तर के मैच भी देखने लगे हैं। उमरदराज हो गये हैं पर क्रिकेट खेल से लगाव नहीं खत्म हुआ। पहले तो चलो देश की टीम की चर्चा करते थे पर अब क्लब स्तर के मैच-वह भी इस देश से बाहर हो रहे हों तब-देखकर विदेशी खिलाड़ियों की चर्चा करते हैं। मतलब यह बीस ओवरीय प्रतियोगिता की जीत ने भारत के बूढ़े और अधेड़ क्रिकेट प्रेमियों को फिर खींच लिया है। तब यही कहना पड़ता है कि ‘बंदर कितना भी बूढ़ा हो जाये गुलाट खाना नहीं भूलता’, वही हालत इस देश की भी है। जब चर्चा चारों तरफ हो रही हो तो भला कब तक कोई आदमी निर्लिप्त भाव से रह सकता है।
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2 जून 2009

कौन किसको ठग रहा है-हास्य व्यंग्य (hasya vyangya in hindi)

‘एक के तीन’, और ‘दो के छह’ की आवाज कहीं भी सुन लें तो हम भारतीयों के कान खड़े हो जाते हैं यह सोचकर कि कहीं यह सच तो नहीं है कि हमारा रुपया तिगुना हो जायेगा।’
भले ही कोई एक रुपये की तीन माचिस या दो रुपये की पेन की छह रिफिल बेचने के लिये आवाज क्यों नहीं लगा रहा हो पर हम उसकी तरफ देखना जरूर चाहेंगे भले ही बाद में निराशा हो। अगर कोई वाकई रुपये तिगुने की बात कर रहा हो तो......................हर देखने वाले आदमी और औरत के मूंह में पानी जरूर आ जायेगा।
अगर सामान्य आदमी हुआ तो भी उस पर विश्वास करने का मन जरूर होगा। विचार करेंगे और और हो सकता है कि उसके बाद न करें। अगर उस सामान्य आदमी की ईमानदारी की सिफारिश कोई अपना मित्र या रिश्तेदार करे तो तब विश्वास करने की संभावना पचास से पचहत्तर और फिर सौ फीसदी हो जाती है। पुरुष हुआ तो एकाध प्रतिशत कम हो सकती है पर अगर महिला हुई तो सौ फीसदी अपना कदम उस ठगी की तरफ बढ़ा देती है जिसके बाद रोने के अलावा और कुछ नहीं रह जाता। आदमी द्वारा विश्वास करने की एकाध प्रतिशत संभावना इसलिये कम हो जाती है क्योंकि उसकी आंख में रोने के लिये गुंजायश कम होती है और अगर ठग जाने पर वह रोए तो लोग कहेंगे कि ‘कैसा मर्द है रोता है। अरे, ठग गया तो क्या? मर्द है फिर कमा लेना।’
औरत अगर ठग जाती है तो रोती है-उसे यह अधिकार प्रकृति से उपहार के रूप में मिला है। उसकी आंख में आंसुओं का खजाना होता है और रोने पर उसके साथ सहानुभूति जताने वाले भी उसे कम बिगड़ते जमाने को अधिक बुरा कहते हैं।
अगर ठगने वाला साधु हुआ तो? फिर तो पुरुष और स्त्रियों के लिये इस बात की बहुत कम ही संभावना है कि वह अपने को बचा पायेंगे। जिस व्यक्ति ने धर्म का प्रतीक बाना पहन लिया उसे सिद्ध मान लेना इस समाज की कमजोरी है और यही कारण है कि ठग इसी भेष में अधिक घूमा करते हैं।
सोना, चांदी, या रुपया कभी कोई तिगुना नहीं कर सकता यह सर्वमान्य तथ्य है और सर्वशक्तिमान से तो यह आशा करना भी बेकार है कि वह अपने किसी दलाल को ऐसी सिद्धि देगा कि वह माया को तिगुना कर देगा। सर्वशक्तिमान का माया पर बस नहीं है पर इसके बावजूद माया में भी ऐसी शक्ति नहीं कि वह अपने को तिगुना कर ले। माया की लोग निंदा करते हैं पर उसके भी उसूल हैं-वह असली सोना, चांदी और रुपये में बसती है और नकली से उसे भी नफरत है। माया को सर्वशक्तिमान से इतना डर नहीं लगता जितनी नकली माया से लगता है। सर्वशक्तिमान ने माया को नहीं बनाया पर फिर भी वह उसके बंदों के बनाये कानूनों के अनुसार ही रचे तत्वों में बसती है और जो उससे बाहर है उसमें वह नहीं जाती। मगर बंदों में भी कुछ ऐसे हैं जो नकली सोना, चांदी और रुपये बनाकर नकली माया खड़ी करते हैं। कहने का तात्पर्य है कि माया बहुत शक्तिशाली है पर इतनी नहीं कि वह अपने को तिगुना कर ले। अगर गले का हार एक तोले का है तो वह दो तोले का तभी होगा जब उसमें दूसरा सोना लगेगा। एक रुपया तभी दो होगा जब उसके साथ दूसरा असली जुड़ेगा। यह रुपया और सोना भी एक इंसान के द्वारा दूसरे को दिया जायेगा तभी बढ़ेगा। यह संभव नहीं है कि किसी बैंक में पड़ा रुपया किसी के घर बिना किसी लिये दिये पहुंच जाये।
मगर उस साधु ने लोगों को माता का चमत्कार बताया और रुपया और जेवर यह कहता हुआ लेता गया कि उसका वह तीन गुना कर देगा। लोग दौड़ पड़े। एक शहर से दूसरे शहर और फिर तीसरे और फिर चैथे...........इस तरह यह संख्या दस तक पहुंच गयी। लोग टेलीफोन के जरिये अपने परिचितों को संदेश भेजने लगे कि‘आओ भई, साथ में रुपया और जेवर लेकर आओ और तिगुना पाओ।’
साधु होने पर बिना पैसे खर्च किये अपना विज्ञापन हो जाना भी कोई आश्चर्य की बात नहीं है। हम लोग दावा करते है कि अपने देश में अखबार और टीवी चैनल से भारी जागरुकता आ रही है मगर ऐसे समाचार इस दावे की पोल खोल देते हैं। वह साधु पकड़ा गया और अब रोती हुई औरतों की सूरतें देखकर यह लगता है कि आखिर किसने किसको ठगा है? वह कहती हैं कि साधु ने ठगा है।’
साधु कहता है कि ‘मैने तो लोगों से कहा तो वह विश्वास करते गये।’
जो ठगे गये वह कहते हैं कि ‘साधु ने ठगा है’। क्या उनकी बात मान लें। साधु से तो कानून निपटेगा पर उन लोगों से कौन निपटेगा जो स्वयं अपने को ठगते गये। अगर उन्होंने साधु को पैसा दिया तो क्या उन्होंने सोचा कि रिजर्व बैंक द्वारा बनाये गये नोट बकायदा नंबर डालकर सतर्कता से जारी किये जाते हैं। वह बिना किसी इंसानी हाथ के इधर से उधर नही जा सकते फिर उस साधु के पास वह कैसे आयेंगे। आ सकते हैं पर वह नकली हो सकते हैं।
अब ठगे गये लोग रो रहे हैं। हमें भी बहुत रोना आ रहा था पर वह इस बात पर नहीं कि साधु ने उनको ठगा बल्कि उन्होंने स्वयं को ठगा। इस देश में ठगों की संख्या कम नहीं है। यह देश हमेशा ठगने के लिये तैयार बैठा रहता है। पहले आंकड़ों का सट्टा लगाकर अपढ़ और मजदूर को ठगा जाता था अब खेलों और रियल्टी शो पर सट्टा लगाकर पढ़े लिखे लोगों को ठगा जा रहा है।
मजे की बात यह है कि अनेक बर्बाद लोग इस बात को मानते हैं कि आजकल सभी जगह ठगी है मगर जेब में पैसा आते ही उनका दिमाग फिर जाता है और चल पड़ते हैं ठगे जाने के लिये यह सोचकर कि शायद दाव लग जाये।
हम सब यह देखते हुए सोचते है कि कौन किसको ठग रहा है। कोई ठग किसी सामान्य आदमी के साथ ठगी कर रहा है या आदमी खुद अपने आपको उसके समक्ष प्रस्तुत कर स्वयं को ठग रहा है।
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25 अप्रैल 2009

इंसानों के भेष में कीड़े मकोड़े-आलेख

सच बात तो यह है कि सट्टा एक विषय है जिस पर अर्थशास्त्र में विचार नहीं किया जाता। पश्चिमी अर्थशास्त्र अपराधियों, पागलों और सन्यासियों को अपने दायरे से बाहर मानकर ही अपनी बात कहता है। यही कारण है कि क्रिकेट पर लगने वाले सट्टे पर यहां कभी आधिकारिक रूप से विचार नहीं किया जाता जबकि वास्तविकता यह है कि इससे कहीं कहीं देश की अर्थव्यवस्था और सामाजिक स्थिति प्रभावित हो रही है।
पहले सट्टा लगाने वाले आमतौर से मजदूर लोग हुआ करते थे। अनेक जगह पर सट्टे का नंबर लिखा होता था। सार्वजनिक स्थानों-खासतौर से पेशाबघरों- पर सट्टे के नंबर लिखे होते थे। सट्टा लगाने वाले बहुत बदनाम होते थे और उनके चेहरे से पता लग जाता था कि उस दिन उनका नंबर आया है कि नहीं। उनकी वह लोग मजाक उड़ाते थे जो नहीं लगाते थे और कहते-‘क्यों आज कौनसा नंबर आया। तुम्हारा लगा कि नहीं।’
कहने का तात्पर्य यह है कि सट्टा खेलने वाले को निम्नकोटि का माना जाता था। चूंकि वह लोग मजदूर और अल्प आय वाले होते थे इसलिये अपनी इतनी ही रकम लगाते थे जिससे उनके घर परिवार पर उसका कोई आर्थिक प्रभाव नहीं पड़े।

अब हालात बदल गये हैं। दिन ब दिन ऐसी घटनायें हो रही हैं जिसमें सट्टा लगाकर बरबाद हुए लोग अपराध या आत्महत्या जैसे जघन्य कार्यों की तरफ अग्रसर हो रहे हैं। इतना ही नहीं कई जगह तो ऐसे सट्टे से टूटे लोग अपने ही परिवार के लोगों पर आक्रमण कर देते हैं। केवल एक ही नहीं अनेक घटनायें सामने आयी हैं जिसमें सट्टे में बरबाद हुए लोगों ने आत्मघाती अपराध किये। होता यह है कि यह खबरें आती हैं तो सनसनी कुछ यूं फैलायी जाती है जिसमें रिश्तों के खून होने की बात कही जाती है। कहा जाता है कि ‘अमुक ने अपने माता पिता को मार डाला’, अमुक ने अपनी पत्नी और बच्चों सहित जहर खा लिया’, ‘अमुक ने अपनी बहन या भाई के के घर डाका डाला’ या ‘अमुक ने अपने रिश्ते के बच्चे का अपहरण किया’। उस समय प्रचार माध्यम सनसनी फैलाते हुए उस अपराधी की पृष्ठभूमि नहीं जानते पर जब पता लगता है कि उसने सट्टे के कारण ऐसा काम किया तो यह नहीं बताते कि वह सट्टा आखिर खेलता किस पर था।’
सच बात तो यह है कि सट्टे में इतनी बरबादी अंको वाले खेल में नहीं होती। फिर सट्टे में बरबाद यह लोग शिक्षित होते हैं और वह पुराने अंकों वाले सट्टे पर शायद ही सट्टा खेलते हों। अगर खेलते भी हों तो उसमें इतनी बरबादी नहीं होती। बहुत बड़ी रकम पर सट्टा संभवतः क्रिकेट पर ही खेला जाता है। प्रचार माध्यम इस बात तो जानकर छिपाते हैं यह अनजाने में पता नहीं। हो सकता है कि इसके अलावा भी कोई अन्य प्रकार का सट्टा खेला जाता हो पर प्रचार माध्यमों में जिस तरह क्रिकेट पर सट्टा खेलने वाले पकड़े जाते हैं उससे तो लगता है कि अधिकतर बरबाद लोग इसी पर ही सट्टा खेलते होंगे।
अनेक लोग क्रिकेट खेलते हैं और उनसे जब यह पूछा गया कि उनके आसपास क्या कुछ लोग क्रिकेट पर सट्टा खेलते है तो वह मानते हैं कि ‘ऐसा तो बहुत हो रहा है।’
सट्टे पर बरबाद होने वालों की दास्तान बताते हुए प्रचार माध्यम इस बात को नहीं बताते कि आखिर वह किस पर खेलता था पर अधिकतर संभावना यही बनती है कि वह क्रिकेट पर ही खेलता होगा। लोग भी सट्टे से अधिक कुछ जानना नहीं चाहते पर सच बात तो यह है कि क्रिकेट पर सट्टा खेलना अपने आप में बेवकूफी भरा कदम है। सट्टा खेलने वालों को निम्न श्रेणी का आदमी माना जाता है भले ही वह कितने बड़े परिवार का हो। सट्टा खेलने वालों की मानसिकता सबसे गंदी होती है। उनके दिमाग में चैबीसों घंटे केवल वही घूमता है। देखा यह गया है कि सट्टा खेलने वाले कहीं से भी पैसा हासिल कर सट्टा खेलते हैं और उसके लिये अपने माता पिता और भाई बहिन को धोखा देने में उनको कोई संकोच नहीं होता। इतना ही नहीं वह बार बार मरने की धमकी देकर अपने ही पालकों से पैसा एैंठते हैं। कहा जाता है कि पूत अगर सपूत हो तो धन का संचय क्यों किया जाये और कपूत हो तो क्यों किया जाये? अगर धन नहीं है तो पूत ठीक हो तो धन कमा लेगा इसलिये संचय आवश्यक नहीं है और कपूत है तो बाद में डांवाडोल कर देगा पर अगर सट्टेबाज हुआ तो जीते जी मरने वाले हालत कर देता है।
देखा जाये तो कोई आदमी हत्या, चोरी, डकैती के आरोप में जेल जा चुका हो उससे मिलें पर निकटता स्थापित नहीं करे पर अगर कोई सट्टेबाज हो तो उसे तो मिलना ही व्यर्थ है क्योंकि इस धरती पर वह एक नारकीय जीव होता है। एक जो सबसे बड़ी बात यह है कि क्रिकेट पर लगने वाला सट्टा अनेक बड़े चंगे परिवारों का नाश कर चुका है और यकीनन कहीं न कहीं इससे देश की अर्थव्यवस्था प्रभावित हो रही है। देश से बाहर हो या अंदर लोग क्रिकेट पर सट्टा लगाते हैं और कुछ लोगों को संदेह है कि जिन मैचों पर देश का सम्मान दांव पर नहीं होता उनके निर्णय पर सट्टेबाजों का प्रभाव हो सकता है। शायद यही कारण है कि देश की इज्जत के साथ खेलकर सट्टेबाजों के साथ निभाने से खिलाड़ियों के लिये जोखिम भरा था।
इसलिये अंतर्राष्ट्रीय मैचों के स्थान पर क्लब स्तर के मैचों को प्रोत्साहन दिया जा रहा है। क्लब स्तर की टीमों मे देश के सम्मान का प्रश्न नहीं होता। सच क्या है कोई नहीं जानता पर इतना तय है कि क्रिकेट पर लगने वाला सट्टा देश को खोखला कर रहा है। जो लोग सट्टा खेलते हैं उन्हें आत्म मंथन करना चाहिये। वैसे तो पूरी दुनियां के लोग भ्रम में जी रही है पर सट्टा खेलने वाले तो उससे भी बदतर हैं क्योंकि वह इंसानों के भेष में कीड़े मकौड़ों की तरह जीवन जीने वाले होते हैं और केवल उसी सोच के इर्दगिर्द घूमते हैं और तथा जिनकी बच्चे, बूढे, और जवान सभी मजाक उड़ाते हैं।
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