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4 अगस्त 2010

एक शब्द से हिल जाते हैं-व्यंग्य चिंतन (ek shabd se hil jate hain-hindi vyangya chinttan)

अकादमिक हिन्दी लेखक, आलोचक और विद्वानों की स्थिति भाषा की दृष्टि से बहुत रोचक है। पहली बात तो यह है कि अकादमिक हिन्दी वाले भाषा के शिखर संगठनों, समाचार पत्र पत्रिकाओं तथा टीवी चैनलों पर इस तरह कब्जा किये बैठे हैं कि जैसे हिन्दी भाषा की कल्पना उनके बिना नहीं की जा सकती। दूसरी बात यह है कि आम हिन्दी भाषी पाठकों में कोई उनका नाम भी नहीं जानता। इस लेखक ने अनेक नाम तो अब जाकर अंतर्जाल पर पढ़कर सुने हैं। इससे पहले भी कुछ लेखकों का नाम समाचार पत्र पत्रिकाओं में पढ़ा पर उनकी रचनायें पढ़ने को नहीं मिली। ऐसे लेखकों ने खूब किताबें लिखी। कुछ को शैक्षणिक पाठ्यक्रमों में भी जगह मिली, पर वह आम दुकानों में उनके दर्शन नहीं हुए। सरकार द्वारा संपोषित लाईब्रेरियों के अलावा अन्य कहीं भी उनको पाना कठिन है।
हम इधर आम पाठक को देखते हैं तो वह बाज़ार, रेल्वे स्टेशन और बस स्टैंडों पर जो किताबें खरीदता है वह इनका नाम तक नहीं जानता। दिलचस्प बात यह है कि अकादमिक लेखक उसे महत्व भी नहीं देते। कई तो कह देते हैं कि ‘लोगों को पढ़ने की तमीज़ नहीं है।’
कहने का अभिप्राय यह है कि अकादमिक हिन्दी और आम हिन्दी में बहुत अंतर है। अकादमिक हिन्दी वालों को यह भ्रम पता नहीं कैसे रहता है कि वह हिन्दी का विकास कर रहे हैं। यह लोग अखबार में छपते जरूर है पर उसे स्वयं पढ़ते नहीं। अगर पढ़ते होते तो पता चलता कि आजकल अखबारों के शीर्षकों में धड़ल्ले से देवनागरी लिपि में अंग्रेजी शब्दों का उपयोग करें-यथा‘ अपने फिगर मेन्टेन करें’, ‘बरसात का एंजोयमेंट‘ और ‘अपना होम स्वीट बनायें’, आदि आदि।
इसका मतलब साफ है कि हिन्दी के अकादमिक लेखक, विद्वान तथा आलोचक हिन्दी को साफ सुथरी भाषा के रूप में बनाये रखने में नाकाम रहे हैं जैसा कि वह उनके चेले दावा करते हैं। इससे ज्यादा बुरी बात क्या हो सकती है कि अधिकतर बड़े अखबार अंग्रेजी लेखकों के आलेख अपने हिन्दी संस्करणों में छापकर कृतकृत्य हो रहे हैं। मतलब यह कि हिन्दी में तो सामयिक लेखक पैदा होना ही बंद हो गये हैं भले ही अखबार, टीवी चैनल और प्रकाशन संस्थानों की कृपा पाने हिन्दी लेखकों की कमी नहीं है। कहते हैं हिन्दी में पाठक नहीं मिलते क्योंकि सभी मस्तराम और सविता भाभी जैसा साहित्य चाहते हैं। इससे बड़ा झूठ कुछ नहीं हो सकता क्योंकि आज भी श्रीबाल्मीकि रामायण, श्रीमद्भागवत तथा अन्य पौराणिक ग्रंथ लोग बड़े चाव से पढ़ते हैं।
कभी कभी तो लगता है कि इस देश के आर्थिक, सामाजिक तथा संस्कृति पुरुषों ने मिलकर यही प्रयास किया है कि अपना वर्चस्व बनाये रखने के लिये भारतीय अध्यात्मिक ग्रंथों का साहित्य जनमानस से विस्मृत किया जाये मगर भला हो धार्मिक प्रकाशनों का जिन्होंने ऐसा नहीं होने दिया। अभिप्राय यह है कि एक तरफ मस्तराम तथा सविताभाभी नुमा साहित्य आधुनिक बाज़ार ने लिखवाया तो वहीं क्लिष्ट शब्दों तथा निरर्थक संदेशों वाली ऐसी सामग्री को तैयार करवाया जिससे हिन्दी का आम पाठक समझ ही न सके।
यहां अकादमिक लेखकों से आशय भी स्पष्ट कर दिया जाये तो ठीक है। वह लेखक जो सरकार से सहायता प्राप्त संस्थाओं, प्रतिबद्ध वैचारिक संगठनों अथवा निजी प्रकाशकों की कृपा से किताबें छपवाते हैं वह अकादमिक लेखकों की श्रेणी में आते हैं। जो लेखक अपने निजी पैसे से किताबें छपवाते हैं या उनके लिये यह कार्य दृष्कर है वह आम लेखक हैं। इस आम लेखक की स्थिति तो बड़ी दयनीय है। अकादमिक लेखक उनको भीड़ की भेड़ की तरह अपने कार्यक्रमों में बुलाते हैं। चाहे कितनी भी रचनायें आम लेखक लिख चुका हो वह उसे लेखक नहीं मानते। अगर किसी ने निजी सहारे से किताब छपवाई है तो पूछा जाता है-‘इसकी कुछ प्रतियां बिकी हैं क्या?’
अगर छपवाई और सरकारी संस्था या निजी प्रकाशन से समर्थन नहीं मिला तो उसका लेखक कुछ भी नहीं है। जिसने नहीं छपवाई उसे तो लेखक ही नहीं माना जाता। चलिऐ यह सब ठीक है मगर अब पता चला है कि अकादमिक लेखक, विद्वान और आलोचक लिखते चाहें कितना भी हों, आपस में एक दूसरे की प्रशंसा करते हों पर सच यह है कि वह पढ़ते बिल्कुल नहीं हैं। पांच सौ शब्दों में एक शब्द ही उनकी हालत खराब कर देता है।
‘‘यह शब्द क्यों लिखा या कहा है?’’
एक शब्द को समूची मानव सभ्यता से जोड़ देते हैं।
किसी अकादमिक लेखक ने कह दिया कि
‘आज के कुछ लड़के छिछोरे या आवारा हैं।’
बस मच गया बवाल! समूची मानव सभ्यता पर खतरा और हमला! यहां यह भी स्पष्ट कर दें कि ऐसे बयान अकादमिक लेखकों में भी विकासवादियों, नारीवादियों, जनकल्याण वादियों के ही छपते हैं। ऐसे में आम लेखक और पाठक किंकर्तव्यमूढ़ होकर देखता और पढ़ता है। अब वह पहले किसी का विवादास्पद लेखक या बयान पढ़े या उसमें लिखे गये अप्रिय शब्द को लेकर लग रहे नारों को देखे।
‘कुछ’ पर की गयी टिप्पणी को पूरी मानव जाति से जोड़ लिया। आम पाठक क्या कहे? आम लेखक तो लिखने से भी डरता है क्योंकि कई खेमों में बंटे इन अकादमिक लेखकों में उसकी कोई पहचान नहीं होती। अपनी अकादमिक पहचान रखने वाले इन महिला तथा पुरुष लेखकों का पूरी मानव सभ्यता ही क्या बल्कि अपने ही देश के हिन्दी समुदाय का प्रतिनिधि नहीं माना जा सकता। इनकी संख्या चाहे कितनी भी हो पर उनसे हजार गुणा संख्या तो उन स्वतंत्र लेखकों की है जिनको इन अकादमिक लेखकों की वजह से अपने लिखा छपवाने से वंचित हो जाना पड़ता है।
ऐसे ही अकादमिक पुरुषों तथा महिलाओं के बीच झगड़ा चल पड़ा है। एक अकादमिक पुरुष ने कह दिया कि ‘कुछ महिला लेखिकाओं के लेखन का स्तर बहुत खराब है और उनमें बुरे सा बुरा दिखने की होड़ लगी है।’
अकादमिक न होने के कारण हमने उस शब्द का उपयोग नहीं किया जो उस हिन्दी के महापुरुष ने कहा है। अब चूंकि वह हिन्दी के महान विद्वानों का आपसी विवाद है-क्योंकि किताबें छपवाना कोई आसान काम नहीं है चाहे महिला हो या पुरुष-अतः कहना कठिन है कि आगे क्या होगा? वैसे वह बयान पढ़ने से पता चलता है कि इसमें प्रचार पाने के लिये फिक्सिंग भी हो सकती है क्योंकि जहां उस महापुरुष को खूब प्रचार मिला वहीं अनेक अकादमिक महिला लेखिकाओं ने भी इसका लाभ उठाया।
मजे की बात यह है कि हिन्दी की एक बहुत बड़ी अकादमी की पत्रिका में यह साक्षात्कार छपा। अंक का नाम बताया गया है ‘बेवफाई-भाग 2’। यह हिन्दी के सर्वौच्च पुरस्कार भी बांटती है। जिन स्वतंत्र और मौलिक लेखकों के दिमाग में कभी ऐसे पुरस्कार पाने की ख्वाहिश हो वह इस बात पर ध्यान दें कि कि वह महापुरुष एक कुलपति होने के साथ इस संस्था की प्रवर समिति में भी हैं। इतनी बड़ी अकादमिक संस्था ‘बेवफाई’ जैसे शब्द का उपयोग करती है और उसी से जुड़ा महापुरुष महिलाओं के लिये घटिया शब्द का इस्तेमाल करता है तब उससे सामान्य हिन्दी भाषियों का हितैषी कैसे माना जा सकता है। वह इन अकादमिक लेखकों के एक समूह के पितृपुरुष हैं और अब उसी के लोगों से उनकी ठन भी गयी है। यह लड़ाई एकदम निजी है पर जैसा कि अकादमिक लेखकों की प्रवृत्ति है वह समूची मानव सभ्यता को इससे जोड़ रह हैं।
आखिरी बात यह है कि उन कथित विद्वान ने एक जगह कुछ महिला लेखिकाओं की ओर इंगित करते हुए कहा है कि उनकी किताबों के शीर्षक का नाम ‘कितने बिस्तर में कितनी बार’ होना चाहिए। संभव है कि कोई अकादमिक लेखक इस शीर्षक की किताब लिख डालें क्योंकि उनके संगठन बहुत प्रभावशाली है। मुश्किल यह होगी कि इन लेखकों के लिखे हुए को आम आदमी पढ़ता नहीं और पाठकीय दृष्टि से यह लेखक स्वयं भी कोई उच्च स्तरीय नहीं है। उनके बयान का मतलब तो वही जाने या उनके समूह के लोग, पर उनके कथन में उस शब्द के अलावा भी अन्य शब्द भी हैं। हालांकि उन्होंने बुरे शब्द का उपयोग किया पर संदर्भ को देखें तो उसकी जगह दूसरा बुरा शब्द भी हो सकता था। मगर मुश्किल वही कि अकादमिक लेखकों को एक ही शब्द हिला देता है और दूसरी बात यह कि किसी अकादमिक लेखक या लेखिका पर उंगली उठाना उनको गवारा नहीं-आम लेखिका और लेखक तो उनके लिये भीड़ की भेड़ की तरह है। हमें क्या? देखते हैं कौन लिखता है ‘कितने बिस्तर में कितनी बार’।
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कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
http://anant-shabd.blogspot.com

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19 जुलाई 2010

धर्मार्थ कर-लघु हास्य व्यंग्य (dharmarth kar-laghu hasya vynagya)

सुबह घर से निकलते समय पत्नी ने अपने पति से कहा-‘मैं सर्वशक्तिमान के दरबार के निर्माण कार्य के लिये चंदा देने का वादा करके आयी हूं। अब तो आपकी तनख्वाह बहुत अच्छी है इसलिये कुछ पैसे देना तो मैं वहां दे आऊंगी।’
पति ने कहा-‘कितनी बात कहा है कि तनख्वाह की बात मत किया करो। अपना घर तो ऊपरी कमाई से ही चलता है। आजकल प्रचार माध्यम बहुत ताकतवर हो गये हैं इसलिये ऊपरी कमाई आसान नहीं रही है। इधर तुम धर्मार्थ काम के लिये पैसा मांगने लगी हो। आज इस दरबार में तो कल उस दरबार में चंदा देना बंद कर दो।
पत्नी ने कहा-‘कैसी बात करते हो? सर्वशक्तिमान की कृपा से इतनी अच्छी तनख्वाह हो गयी है...................’’
पति ने कहा-‘फिर वही बात! सर्वशक्तिमान की कृपा से तनख्वाह नहीं मिलती। वह तो अपनी मेहनत का फल है। उसकी कृपा से तो बस ऊपरी कमाई हो सकती है, जिसमें आजकल कमी हो गयी है फिर दफ्तर में अब नज़र भी रखी जाने लगी है। खतरा बढ़ गया है।
पत्नी उदास हो गयी तो पति ने कहा-‘ठीक है! देखता हूं आज कोई मुर्गा फंसा तो उससे अपनी कमाई के साथ ही सर्वशक्तिमान के नाम पर धर्मार्थ कर भी मांग लूंगा। अगर तुम इसी तरह धर्म का काम करती रही तो मुझे पता नहीं कितने लोगों से यह धर्मार्थ कर मांगना पड़ेगा। अब मैं चलता हूं और सर्वशक्तिमान से प्रार्थना करो कि आज ऊपरी कमाई के साथ धर्मार्थ कर भी वसूल हो जाये।’
पत्नी खुश हो गयी और बोली-‘अच्छा! आप जाओ मैं सर्वशक्तिमान से प्रार्थना करती हूं कि आज आपको कोई धर्मार्थ कर देने वाला मिल जाये।’
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20 सितंबर 2009

भारतीय प्रचारतंत्र और चीन-हिंदी व्यंग्य (indian media and china-hindi vyangya)

मीडिया यानि टीवी चैनल और समाचार पत्र-जिनकों हम संगठित प्रचारतंत्र भी कह सकते हैं-बिना सनसनी के नहीं चल सकते कम से कम उनमें काम करने वाले लोगों की मान्यता तो यही है। राई का पहाड़ और पहाड़ से निकली चुहिया को हाथी बनाने की कला ही प्रचारतंत्र का मूल मंत्र है। अब यह कहना कठिन है कि कितनी सनसनी खबरें प्रायोजित या स्वघटित हैं।
अभी कुछ दिनों पहले एक विदेशी चैनल का एक पत्रकार लोगों की हत्या कराकर उनके समाचारों को सनसनी ढंग से प्रसारित करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया। वह अपने व्यवसाय के सफलता के लिये ऐसी हरकतें कर रहा था। अभी हमारे देश के प्रचार तंत्र के लोगों की आत्मा मरी नहीं है कि वह ऐसी हरकतें करें पर ऐसी खबरें तो प्रायोजित करने के साथ प्रसारित कर ही सकते हैं जिससे किसी को शारीरिक हानि न पहुंचे न ही अपराध हो।
आखिर यह चल तो विदेशी ढर्रे पर ही रहे हैं। हो सकता है ऐसा न हो पर इधर चीन को लेकर जो सनसनी फैली है उसका तो न ओर मिल रहा है न छोर।

प्रचारतंत्र ने कह दिया कि घुसपैठ हुई। उसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई तो अनेक तरह के कथित प्रमाण लाये गये। आधिकारिक रूप से खंडन होते रहे हैं पर प्रचार तंत्र है कि बस अड़ा ही हुआ है कि घुसपैठ हुई। करीब दो सप्ताह से सनसनी फैली रही तब जाकर चीन की नींद खुली। मुश्किल यह है कि चीनी अपनी भाषा के अलावा दूसरी भाषा सीखते नहीं है इसलिये हिंदी के प्रचारतंत्र का उनको पता नहीं कि क्या चल रहा है?
किसी हिंदी भाषी ने ही उनको चीनी भाषा में लताड़ते हुए इन खबरों के बारे में पूछा होगा तब चीन ने आधिकारिक तौर पर भारतीय प्रचारतंत्र पर दुष्प्रचार का आरोप जड़ा। अभी तक भारत के रणनीतिकारों पर आक्रमण करने वाला चीन इतना बदहवास हो गया कि उसने सीधे ही प्रचारतंत्र को घेरे में ले लिया।
भारत की परवाह न करने वाला चीन पहली बार इतने तनाव में आया इस बात पर भारतीय प्रचारतंत्र को कुछ श्रेय दिया ही जाना चाहिए। इस प्रचारतंत्र को लेकर चीन भारतीय रणनीतिकारों से यह तो कह नहीं सकता कि इन पर नियंत्रण करो क्योंकि यह प्रचारतंत्र सरकारी नहीं है। भारत चीन से कह सकता है कि तुम अपने प्रचारतंत्र पर नियंत्रण करो क्योंकि वहां पर सरकार ही उसकी मालिक है। चीन का प्रचारतंत्र भी तो भारत के विरुद्ध विषवमन करता है और उसका सीधा आशय यही है कि वहां की सरकार यही चाहती है।
मगर इस बार चीन को भारतीय प्रचारतंत्र के रूप में जो असंगठित प्रतिद्वंद्वी मिला है उससे उसका पार पाना संभव नहीं है। सरकारी तौर पर नियंत्रण से परे इस प्रचारतंत्र की खूबी यह है कि कहता ही रहता है सुनता कुछ नहीं देखता है। एक शब्द देख लिया उस पर पूरा कार्यक्रम बना डाला। कहते हैं कि चीनी सुनते अधिक परबोलते कम हैं जबकि हमारा यह स्वतंत्र प्रचारतंत्र बोलता अधिक है सुनता कम। चीनी भी आखिर कुछ बोलेंगे पर उनका एक ही शब्द उनको परेशान कर डाल सकता है अगर भारतीय प्रचारतंत्र ने उसका नकारात्मक अर्थ लिया।
जब भारतीय प्रचारतंत्र उसके खिलाफ आग उगल रहा है तब कोई वहां के प्रचारतंत्र चुप बैठा हों यह संभव नहीं है मगर वह भारतीय प्रचारतंत्र का प्रसारण तो देखेंगे पर भारतीय प्रचारतंत्र उनकी तरफ नहीं देखेगा। यह उपेक्षासन का गुण भारतीय प्रचारतंत्र को विजेता बनाये हुए है। अपने विरुद्ध ऐसा प्रचार देख और सुनकर चीनी आग बबूला होकर कार्यक्रम बनायेंगे पर यहां देखेगा कौन? इससे उनकी आग और बढ़ जाती होगी।

इस प्रचार का ही नतीजा है कि दिल्ली में चीन के राजनयिक इधर उधर भागदौड़ करते रहे। एक तरह से चीन इस प्रचारतंत्र को लेकर भारत पर दबाव डाल रहा है पर यह उसके लिये परेशानी का कारण ही बनने वाला है। हो सकता है कि अभी यह प्रचारतंत्र चुप हो जाये पर अब चीन को आगे यह सब झेलना पड़ सकता है।
अपने प्रचारतंत्र का एक विषय पाकिस्तान तो बना ही हुआ है। उसके यहां अपने देश तथा विदेश के जो खुराफाती तत्व सक्रिय हैं उन पर हमारा प्रचारतंत्र अपनी बहुत सारी रील और शब्द खर्च कर चुका है। लोग उससे उकता गये हैं। लोगों को व्यस्त रखने के लिये एक दुश्मन तो चाहिये न! मुश्किल यह है कि चीन बहुत खौंचड़ी है पर उसने अपने यहां अपराधियों को पनाह नहीं दी है जिसको प्रचारतंत्र हीरो बना दे। वहां की हीरो तो बस सरकार ही है! अमेरिकी आर्थिक विशेषज्ञ कहते हैं कि उसकी विकासदर में अपराध के पैसे का भी योगदान है। ऐसे में वहां के किसी अपराधी का महिमामंडन तो यहां हो नहीं सकता। लेदेकर एक ही विषय बचता है ‘सीधा हमला’। भारतीय सैन्य विशेषज्ञ स्वयं मानते हैं कि सीमा का आधिकारिक अभिलेख न होने के कारण दोनों के सामने ऐसी समस्या आती है। जब भारत को समस्या आयी तो उसे इस तरह सीधा हमला प्रसारित कर प्रचारतंत्र ने जो गजब की फुर्ती दिखाई उसके लिये वह प्रशंसा के काबिल है क्योंकि उसने उस देश को हिला दिया जो किसी से डरता नहीं है। इसका यह भी नतीजा आ सकता है कि आगे चीन ऐसी गल्तियां न करे जिससे तिल का ताड़ बने।
वैसे एक खबर एक चैनल ने दूसरी खबर भी चलाई कि भारतीय बाघ का दुश्मन चीन। दरअसल वहां शेर की खाल से शराब बनती है और आरोप लग रहा है कि नेपाल के तस्करी के जरिये भारत से खाल चीन जाती है। शेरों का शिकार करने कोई चीनी नहीं आते बल्कि अपने ही देश के लोग यह काम करते हैं। इसमें चीन का पूरा दोष नहीं है पर तस्करी के द्वारा इस तरह शेरों की खाल जाने की जिम्मेदारी से वह बच भी नहीं सकता। फिलहाल दोस्ताना रूप से यह बात तो चैनल वाले मान भी रहे हैं पर यह दोस्ताना आगे जारी रहेगा-यह चीनियों को सोचना भी नहीं चाहिए। अपने देश में शेरों की हत्या कर देना कोई सामान्य मामला नहीं है पर जिस तरह चीन को लक्ष्य कर यह कार्यक्रम प्रस्तुत किया गया उससे तो लग रहा है कि चीन पर प्रचारतंत्र की नजर पड़ गयी है। आने वाले समय में ऐसे बहुत सारे कार्यक्रम आ सकते हैं जिस पर चीन बौखला सकता है। इसकी वजह यह है कि वहां की हर गतिविधि के लिये सरकार सीधे जिम्मेदार मानी जाती है। अभी कुछ दिनों पहले भारत के नाम से नकली दवाईयां नाइजीरिया में भेजने के मामले में चीन फंस चुका है। भारतीय प्रचारतंत्र अभी तक चीन को समझता नहीं था पर अब उसे लगने लगा कि वहां की सरकार भारत को परेशान करने के लिए अपराध की हद तक जा सकती है। अपराध की भनक भी प्रचारतंत्र के कान खड़े कर सकती है क्योंकि सनसनी तो उसी ही फैलती है न! यहीं से चीन भी अब उसके दायरे में आ गया है क्योंकि उसके साफसुथरे और संपन्न होने का तिलिस्म भारतीय प्रचारतंत्र के सामने खत्म हो गया है। अब चीन के सामने एक केवल एक मार्ग है वह प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष से भारत के विरुद्ध अपराध होने को रोक दे नहीं तो जितना वह करेगा उससे अधिक तो भारतीय प्रचारतंत्र बतायेगा। इसे रोकना किसी के लिये संभव नहीं है।
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7 जुलाई 2009

बजट का कटु सत्य-हास्य व्यंग्य (hindi vyangya on budget)

उन्होंने जैसे ही दोपहर में बजट देखने के लिये टीवी खोला वैसे ही पत्नी बोली-‘सुनते हो जी! कल तुमने दो हजार रुपये दिये थे सभी खर्च हो गये। अब कुछ पैसे और दो क्योंकि अभी डिस्क कनेक्शन वाला आने वाला होगा। कुछ देर पहले आया तो मैंने कहा कि बाद में आना।’
उन्होंने कहा-‘अरे, अब तो बैंक से पैसे निकालने पड़ेंगे। अभी तो मेरी जेब में पैसा नहीं है। अभी तो टीवी परबजट सुन लूं।’
पत्नी ने कहा-‘इस बजट की बजाय तुम अपने घर का ख्याल करो। अभी डिस्क कनेक्शन वाले के साथ धोबी भी आने वाला है। मुन्ना के स्कूल जाकर फीस जमा भी करनी है। आज आखिरी तारीख है।’
वह टीवी बंदकर बाहर निकल पड़े। सोचा पान वाले के यहां टीवी चल रहा है तो वहां पहुंच गये। दूसरे लोग भी जमा थे। पान वाले ने कहा-‘बाबूजी इस बार आपका उधार नहीं आया। क्या बात है?’
उन्होंने कहा-‘दे दूंगा। अभी जरा बजट तो सुन लूं। घर पर लाईट नहीं थी। अपना पर्स वहीं छोड़ आया।’
उनकी बात सुनते ही पान वाला खी खी कर हंस पड़ा-‘बाबूजी, आप हमारे बजट की भी ध्यान रखा करो।’
दूसरे लोग भी उनकी तरफ घूरकर देखने लगे जैसे कि वह कोई अजूबा हों।
वह अपना अपमान नही सह सके और यह कहकर चल दिये कि‘-अभी पर्स लाकर तुमको पैसा देता हूं।’
वहां से चले तो किराने वाले के यहां भी टीवी चल रहा था। वह वहां पहुंचे तो उनको देखते ही बोला-‘बाबूजी, अच्छा हुआ आप आ गये। मुझे पैसे की जरूरत थी अभी थोक दुकान वाला अपने सामान का पैसा लेने आता होगा। आप चुका दें तो बड़ा अहसान होगा।’
उन्होंने कहा-‘अभी तो पैसे नहीं लाया। बजट सुनकर चला जाऊंगा।’
किराने वाले ने कहा-‘बाबूजी अभी तो टीवी पर बजट आने में टाईम है। अभी घर जाकर ले आईये तो मेरा काम बन जायेगा।’
वहां भी दूसरे लोग खड़े थे। इसलिये तत्काल ‘अभी लाया’ कहकर वह वहां से खिसक लिये।
फिर वह चाय के होटल की दुकान पर पहुंचे। वहां चाय वाला बोला-‘बाबूजी, क्या बात इतने दिन बाद आये। न आपने चाय पी न पुराना पैसा दिया। कहीं बाहर गये थे क्या?’
दरअसल अब उसकी चाय में मजा नहीं आ रहा था इसलिये उन्होंने दो महीने से उसके यहां चाय पीना बंद कर दिया था। फिर इधर डाक्टर ने भी अधिक चाय पीने से मना कर दिया था। चाय पीना बंद की तो पैसा देना भी भूल गये।
वह बोले-यार, अभी तो पैसा नहीं लाया। हां, बजट सुनकर वापस घर जाकर पर्स लेकर तुम्हारा पैसा दे जाऊंगा।’
चाय वाला खी खी कर हंस पड़ा। एक अन्य सज्जन भी वहां बजट सुनने वहां बैठे थे उन्होंने कहा-‘आईये बैठ जाईये। जनाब! पुराना शौक इसलिये छूटता नहीं इसलिये बजट सुनने के लिये घर से बाहर ही आना पड़ता है। घर पर बैठो तो वहां इस बजट की बजाय घर के बजट को सुनना पड़ता है।’
यह कटु सत्य था जो कि सभी के लिये असहनीय होता है। अब तो उनका बजट सुनने का शौक हवा हो गया था। वह वहां से ‘अभी लाया’ कहकर निकल पड़े। जब तक बजट टीवी पर चलता रहा वह सड़क पर घूमते रहे और भी यह बजट तो कभी वह बजट उनके दिमाग में घूमता रहा।
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30 जून 2009

अंतर्जाल का इश्क, आशिक और माशुका-हास्य व्यंग्य

आशिक और माशुका ने अपने प्यार के प्रचार के लिये एक ब्लाग संयुक्त ब्लाग इस आशा के साथ बनाया कि वह अगर हिट हो गया तो उससे उनको कमाई होगी जिसमें से पैसा जोड़कर अपना घर बसायेंगे। दोनों का संयुक्त ब्लाग था और उन्होंने तय कर रखा कि किसी दूसरे को टिप्पणी नहीं लिखने देंगे। इसी कारण उन्होंने टिप्पणी लिखने के विकल्प में ब्लाग लेखक ही दर्ज कर रखा था। सब कुछ ठीक ठाक चल रहा था कि अनाम और छद्म ब्लाग लेखकों की नजर में यह सब आ गया। हुआ यूं कि दोनों ही अंतर्जाल पर जाकर दूसरों के ब्लाग पर भी व्यंग्यतात्मक टिप्पणियां लगाने लगे। अगर यह काम वह धर्मवादी ब्लाग पर करते तो ठीक था पर उन मासूम प्रेमियों ने नारीवादी और विकासवादी ब्लाग लेखकों के ब्लाग पर यह काम किया।
कहने को वह भले लोग थे पर जिस तरह उनका प्रेमपाठ और टिप्पण उस ब्लाग पर चल रहा था वह उनसे टिप्पणी प्राप्त ब्लाग लेखकों को सहन नहीं हुआ।
एक अनाम ब्लाग लेखक ने छद्म पुरुष का नाम लिखकर आशिक को समझाया-अरे, भई इससे तुम्हें कोई फायदा नहीं होगा? लोग तुम्हें कमाई कराना चाहते हैं। इसलिये अपने ब्लाग पर संवाद सभी के लिये खुला रखो।’
आशिक ने लिख भेजा-
‘ऐसी तैसी में गयी कमाई
रोज देखता हूं दूसरे ब्लाग पर
कमाई के हजार नुस्खे
पर किसी की जेब भरी नजर नहीं आई।
बड़ी मुश्किल से
कोई माशुका हाथ आई।
पता लगा कि जैसे ही खोली
सभी के लिये टिप्पणियों की खिड़की
ले उड़ा मेरी माशुका को कोई अनाम भाई।’

वह बिचारा हास्य कवि था। उस मासूम को पता ही नहीं था कि उसने क्या कर डाला था। अब तो अनाम ब्लाग लेखक को गुस्सा आ गया। उसने फौरन लड़की का छद्म नाम लिखकर लड़की को ऐसा ही संदेश भेजा।
लड़की को केवल टिप्पणी लिखना ही आती थी। उसने जवाब में लिख भेजा कि ‘कोई टिप्पणी नहीं।’
अब तो अनाम ब्लाग लेखक का पारा चढ़ गया। उसने फौरन एक दूसरे छद्म लेखक को संदेश भेजा कि-‘यह कैसे हो सकता है कि हम इतने पुराने लोेग और नये ब्लाग लेखकों में इतनी हिम्मत आ गयी कि वह हमारी सुन नहीं रहे। अपनी प्रतिष्ठा के लिये इनके प्रेम पाठ में खलल डालना ही होगा। दोनों की प्यार भरी बातों को पढ़कर लोग मजे ले रहे हैं और अपने ब्लाग फ्लाप होते जा रहे हैं।’
इधर छद्मनामधारी ब्लाग लेखक भी किसी नये अभियान के लिये तैयार बैठा था।
उसने लड़की का नाम लिखकर लड़के को प्यार से संदेश भेजा और कहा-‘अरे जनाब आप यह क्या कर रहे हैं। हम आपका अमर प्रेम देखकर बहुत खुश हैं पर इसका लाभ तभी है कि जब दूसरे लोग आपके ब्लाग पर अपनी बात रखें। आपने तो अपने प्रोफाइल में ही लिखा हुआ है कि आप अपने प्यार के प्रचार से कमाना चाहते हैं फिर यह टिप्पणी से पर्दा क्यों? आप बेफिक्र रहिये। मैं एक तकनीक विशेषज्ञ ब्लाग लेखिका हूं। अगर किसी ने एैसी वैसी हरकत की तो उसका आई पी पता निकालकर आपको दूंगी। उसका नाम अपने ब्लाग पर छाप दूंगी। आप डरिये नहीं।
आशिक जाल में फंस गया। उधर ऐसा ही संदेश उसी दूसरे छद्म ब्लाग लेखक ने माशुका को पुरुष नाम से भेजा। साथ में लिखा कि ‘मैं तुम्हें बहुत स्नेह करता हूं पर हां, यहां भाई या अंकल के संबोधन से नहीं पुकारा जाता यह बात ध्यान रखना।’
आशिक माशुक ने अपने ब्लाग को सार्वजनिक रूप से टिप्पणियों के लिये खोल दिया। ब्लाग पर आशिक कवितायें लिखता। कभी कभी वह अपनी माशुका के नाम से भी कवितायें लिख देता। टिप्पणियां अलबत्ता उसकी माशुका ही देती थी। हालत यह थी कि आशिक जो कवितायें माशुका द्वारा लिखी बताकर प्रकाशित करता उसं पर भी वह लिख देती थी कि‘तुमने यह लिखकर मेरा दिल मोह लिया है।’
मगर अनाम और छदम नाम ब्लाग लेखकों का चैन कहां? एक दिन आशिक को संबोधित करते हुए अनेक छद्मनाम ब्लाग लेखक ने लड़कियों की तरफ से टिप्पणियां लिख दी।
‘अरे, जानू तुम कहां हो? तुमने क्या इतने दिन से अपना ईमेल नहीं खोला? कितने संदेश भेज चुकी हूं। आज तुम्हारा यह नया ब्लाग मेरी नजर में आ गया। यह किसके साथ बनाया है? कौन चुड़ैल है? उसको मैं छोड़ूंगी नहीं।’

‘अरे, धोखेबाज? अब पता लगा कि इतने दिन से तुम कहां हो? अगर तुम्हें मेरे साथ आगे संपर्क बनाना पसंद नहीं है तो कोई बात नहीं! प्लीज मेरा ब्लाग मुझे लौटा दो। उस पर में अब लिखकर तुम्हारी यादों के सहारे जिंदा रहूंगी।’
इस तरह के अनेक संदेश थे। माशुका ने पढ़ा तो तमतमा गयी। उसने आशिक से कह दिया कि‘मेरी सहेली पहले ही कहती थी कि कभी इंटरनेट पर इश्क न लड़ाना। वहां तो बस धोखे ही धोखे है।’
माशुक ने लिखा-‘अरे, यह सब झूठ है। मैं पता कर रहा हूं कि यह कौन लोग हैं। निश्चित रूप से यह फर्जी नाम हैं। मैं इनका पता कर लूंगा। ब्लाग जगत में मेरे कुछ मित्र हैं जो इसमें मेरी मदद करेंगे।’
माशुका ने कहा-‘एक सप्ताह के अंदर अगर तुमने इसकी जांच पड़ताल कर रिपोर्ट प्रस्तुत नहीं की तो मुझे भूल जाना। यह बदमाशी किसने की है उनके नाम पते मेरे को बताना। उसका प्रमाणीकरण करने के बाद ही हमारे प्रेम पाठ और उस पर टिप्पणियों का क्रम दोबारा शुरु होगा। वरना गुड बाय!
आशिक ने सोचा कि दोस्त मदद करेंगे। दोस्त के नाम पर भी उसके पास वही अनाम और छद्मनाम ब्लाग लेखक थे। उसने उनको ईमेल किया और अपनी दुर्दशा बयान की।
उसका ईमेल मिलते ही दोनों अपने घरों से एक दूसरे से मिलने भागे। इतनी तेज भागे कि रास्ते में टकरा कर गिर पड़े। वहां भीड़ जमा हो गयी कि पता नहीं यह हादसा कैसे हो गया। वह उठ खड़े हुए और लोगों को अपने पास से हटाते हुए बोले-‘हटो! क्या कभी ब्लागर नहीं देखा।’
उस दिन दोनों ने बैठकर शराब खाने में दारु पी। दारु के महंगी होने से लेकर बरसात न होने पर चिंतायें जाहिर की। इतने विषयों पर चर्चा की पर यह विषय भूल गये। अपनी चर्चा की अपने ब्लाग पर रिपोर्ट भी लिखी पर इस विषय को छूआ भी नहीं।
अनाम ब्लाग लेखक ने अगले दिन आशिक को इ्र्रमेल किया और लिखा‘तुम चिंता मत करो। हम उनका पता लगा रहे हैं। यह कौन लोग हैं जो तुम्हारे अमर प्रेम को शैशवास्था में ही नरक भेजने पर तुले हैं। हमने अपने से अधिक जानकार लोगों को सब बताया है। वह जल्दी रिपोर्ट करेंगे।
छद्म ब्लाग लेखक ने भी लिखा-‘अरे, तुम्हारे विरोधियों को नहीं मालुम किससे टक्कर ले रहे हैं? बस मैंने अपने एक दोस्त को लिखा है वह पता कर लेगा।’
दोनों का जवाब एक जैसा देखकर आशिक का माथा ठनका। इससे पहले तो दोनों ने यह आश्वासन दिया था कि वह स्वयं ही पता लगा लेने में सक्षम हैं पर अब दोनेां अपना दायित्व ऐसे लोगों पर डाल रहे थे जिनको वह जानता तक नहीं था।
इस तरह छह दिन हो गये। वह हर दिन कसमें देकर अनाम और छद्म नाम ब्लाग लेखकों को संदेश भेजता कि‘आज किसी तरह मेरा काम कर दो। बस अब कम दिन बचे हैं।’
सातवें दिन माशुका के अल्टीमेटम समाप्त होने के एक घंटे पहले अनाम ब्लाग लेखक का संदेश उस आशिक के पास आया-‘मेरे दोस्त ने कहा है कि इस तरह का पता लगाने के लिये व्यवसायिक संस्थायें हैं पर उसके लिये कुछ पैसा खर्च करना पड़ेगा।’
लगभग ऐसा ही जवाब छद्मनाम ब्लाग लेखक ने भी भेजा। हताश आशिक ब्लाग लेखक ने अपने ब्लाग पर यह कविता लिखी।
पता नहीं कैसे वह घड़ी आयी
जब मैंने वाह वाह सुनने के लिये
अपने ब्लाग पर टिप्पणी की खिड़की खुलवायी।
कभी कभी वहां से झांकती
कोई चिड़िया चहकी
पर मेरी माशुका की तरह नहीं महकी
फिर किस पर क्या फिदा होते
सूरत उसकी नजर न आई।
जिनके नाम नहीं है वह अनाम
अंदर क्या आते
जो अंदर थी चिड़िया वही
छोड़कर निकल गयी
हे ब्लाग बनाने वाले तू ने
यह टिप्पणी वाली खिड़की क्यों बनाई।’

....................................
सातवां दिन भी बीत गया। तब तैश में आकर उसने अनाम और छद्मब्लाग नामधारी ब्लाग लेखकों को लानत भेजी। इससे वह और नाराज हो गये। तब इधर उधर हाथ मारकर देखा तो पाया कि वह लड़की और कोई नहीं उनका ही एक विरोधी छद्म ब्लाग लेखक था। अनाम ब्लाग लेखक ने तत्काल उठाकर उस कवि को यह संदेश भेजा-‘महाराज, लो यह पता कर लिया। वह लड़की थी ही नहीं जिसके चक्कर में तुम हमें लानत भेज रहे हो। हम तुम्हें बता रहे हैं यह उस ब्लाग लेखक की करतूत है जिससे हम भी बहुत चिढ़ते हो। तुम उस पर व्यंग्य कवितायें लिखो हम टिप्पणियां कर उसे रौशन करेंगे।’
मगर हास्य कवि चुप बैठ गया। उसने सोचा कि ‘अगर वह तीसरा भी कोई अनाम या छद्म ब्लाग लेखक होगा तो क्या फायदा? इससे तो अच्छा है अकेले बैठकर सिर धुनते रहें‘दोस्त दोस्त ना रहा, प्यार प्यार न रहा।’
.........................
नोट-यह व्यंग्य काल्पनिक है तथा इसका किसी धटना या व्यक्ति से कोई लेना देना नहीं है। अगर किसी की कारिस्तानी से मेल खा जाये तो वही इसके लिये जिम्मेदार होगा।
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7 जून 2009

फिर होने लगी क्रिकेट मैच की चर्चा-आलेख

बंदर चाहे कितना भी बूढ़ा हो जाये गुलाट लगाना नहीं भूलता यही कुछ हालत हम भारतवासियों की है। कोई व्यसन या बुरी आदत बचपन से पड़ जाये तो उससे पीछा नहीं छुड़ा सकते। ऐसी आदतों में क्रिकेट मैच देखना भी शामिल है। 2007 में इस बात का भरोसा नहीं था कि भारत की क्रिकेट टीम एक दिवसीय विश्व कप मैच जीतेगी फिर भी लोग देखते रहे और जब वहां बुरी तरह हारी तब विरक्त होने लगे। मगर पिछले वर्ष बीस ओवरीय क्रिकेट प्रतियोगिता भारत ने जीती तो बच्चे, बड़े और बूढ़े फिर क्रिकेट मैच देखने लगे।
1983 तक भारत में एक दिवसीय मैच को महत्व नहीं दिया जाता था बल्कि पांच दिवसीय मैचों में ही दिलचस्पी लेते थे। उस वर्ष भारत ने एक दिवसीय क्रिकेट प्रतियोगिता क्या जीती? भारत में उसे देखने का फैशन चल पड़ा-यहां खेल खेलना और देखना भी अब फैशनाधारित हो गये हैं-जिसे देखो वही एक दिवसीय मैचों को देखना चाहता था। उस समय जो बाल्यकाल में थे वह पूरी युवावस्था और जो युवावस्था में थे वह वृद्धावस्था तक क्रिकेट मैच टीवी पर देखकर आखें खराब करते रहे। खिलाड़ियों पर जमकर दौलत और शौहरत बरसी। जब दौलत और शौहरत आती है तो अपने साथ विकार और अहंकार भी लाती है। यही हुआ। क्रिकेट का नाम हुआ तो वह बदनाम भी हुआ। देखने वालों में कुछ ऐसे भी तो जो मुफ्त में मजा लेते थे तो कुछ लोगों ने दांव लगाकर पैसे कमाने चाहे। खेल बदनाम हुआ। इधर अपने देश की टीम के सदस्य कमाते रहे पर खेल में पिछड़ते गये। 2007 में बंग्लादेश से हारे तो लोगों का इस खेल से विश्वास ही उठ गया।
एक समय ऐसा लगने लगा कि अब लोग अब इस खेल से विरक्त हो जायेंगे मगर ऐसा नहीं हुआ। लोगों के पास पैसा भी आया तो समय भी फालतू बहुत था। भीड़ फिर मैदान में रहने लगी। टिकिटों की मारामारी यथावत थी मगर इस देश में फालतू लोगों की संख्या को देखते हुए भी यह लोकप्रियता यथावत होने का प्रमाण नहीं था। इस खेल को बचपन और युवावस्था से केवल देख रहे लोग इससे विरक्त होते जा रहे थे। क्रिकेट की चर्चा ही एकदम बंद हो गयी।
पिछले साल भारत ने बीस ओवरीय क्रिकेट का विश्व कप क्या जीता लोगों के मन मस्तिष्क की वापसी इस खेल के प्रति हो गयी। जब भारत बीस ओवरीय प्रतियोगिता में खेल रहा था तब लोगों का आकर्षण इसके प्रति बिल्कुल नहीं था पर जैसे ही वह जीता सभी नाचने लगे। भारतीय टीम जो एक खोटा सौ का नोट हो गयी थी और पचास में भी नहीं चल रही थी बीस में क्या चली फिर सौ की हो गयी। लोग पुरानी टीम की चाल और चरित्र भूल गये। पहले प्रेमी रहे लोग जो अब क्रिकेट से चिढ़ने लगे थे फिर उसकी तरफ आकर्षित हो गये। भारत के लोगों में आकर्षण दोबारा पैदा हुआ तो क्रिकेट के व्यवसायियों की बाछें खिल गयीं। अब तो क्लब स्तर की टीमें बनाकर वह मैचा करवा रहे हैं जिसमें उनको भारी आय हो रही है।
इससे क्या जाहिर होता है? यही कि इस देश में लोग विजेता को सलाम करते हैं। जीत का आकर्षण भारतीयों की चिंतन क्षमता का हर लेता है। भारतीयों की मानसिकता अब विश्व में व्यवसायियों से छिपी नहीं है। दुनियां का सबसे लोकप्रिय खेल फुटबाल हैं। उसमें भारतीय टीम की उपस्थिति नगण्य है। वैसे कुछ फुटबाल व्यवसायियों ने क्रिकेट के संक्रमण काल में यह प्रयास किया था कि भारत में भी फुटबाल लोकप्रिय हो ताकि यहां के लोगों के जज्बातों का आर्थिक दोहन किया जा सके मगर उसके सफल होने से पहले ही बीस ओवरीय क्रिकेट मैचों के विश्व कप जीतने से भारतीय खेल प्रेमी (?) उसी तरफ लौट आये।
अब हालत यह है कि हम जैसा आदमी जो कि क्रिकेट मैचों से अलविदा कह चुका था वह भी मैच तिरछी नजर से देख लेता है। ऐसे में जब देश की टीम जीत रही हो तो फिर नजरें जम ही जाती हैं। यह इसलिये हुआ कि कहीं चार लोगों में उठना बैठना होता है तो वह अब फिर से क्रिकेट की चर्चा करने लगे हैं। इतना ही नहीं भाई लोग क्लब स्तर के मैच भी देखने लगे हैं। उमरदराज हो गये हैं पर क्रिकेट खेल से लगाव नहीं खत्म हुआ। पहले तो चलो देश की टीम की चर्चा करते थे पर अब क्लब स्तर के मैच-वह भी इस देश से बाहर हो रहे हों तब-देखकर विदेशी खिलाड़ियों की चर्चा करते हैं। मतलब यह बीस ओवरीय प्रतियोगिता की जीत ने भारत के बूढ़े और अधेड़ क्रिकेट प्रेमियों को फिर खींच लिया है। तब यही कहना पड़ता है कि ‘बंदर कितना भी बूढ़ा हो जाये गुलाट खाना नहीं भूलता’, वही हालत इस देश की भी है। जब चर्चा चारों तरफ हो रही हो तो भला कब तक कोई आदमी निर्लिप्त भाव से रह सकता है।
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23 मार्च 2009

तब एकमत हो पाएंगे-लघु हास्य व्यंग्य

वह दोनों बैठकर टीवी के सामने बैठकर समाचार सुन और देख रहे थे। उस समय भारत की जीत का समाचार प्रसारित हो रहा था। एक ने कहा-‘यार, आज समाचार सुनाने वाली एंकर ने क्या जोरदार ड्रेस पहनी है।’
दूसरे ने कहा-‘हां, आज हरभजन ने आज जोरदार गेंदबाजी की इसलिये भारत जीत गया।
पहला-‘आज एंकर के बाल कितने अच्छे सैट हैं।
दूसरा-हां, सचिन जब सैट हो जाता है तब तो उसे कोई आउट नहीं कर सकता।
पहला-दूसरी तरफ जो एंकर है वह भी बहुत अच्छी है, हालांकि उसकी ड्रेस आज अच्छी नहीं थी।
दूसरा-‘हां, आज दूसरी तरफ गंभीर जम तो गया था पर उससे रन नहीं बन पा रहे थे। ठीक है यार, कोई रोज थोड़े ही रन बनते हैं।
पहले ने कहा-‘आज वाकई दोनों लेडी एंकरों की जोड़ी रोमांचक लग रही है।’
दूसरे ने कहा-‘हां, आज वाकई मैच बहुत रोमांचक हुआ। ऐसा मैच तो कभी कभी ही देखने को मिलता है।’
अचानक पहले का ध्यान कुछ भंग हुआ। उसने दूसरे से कहा-‘मैं किसकी बात कर रहा हूं और तुम क्या सुन रहे हो?’
दूसरे ने कहा-‘अरे यार, मैं तो क्रिकेट की बात कर रहा हूं न। आज भारत ने मैच रोमांचकर ढंग से जीत लिया। सामने टीवी पर उसका समाचार ही तो चल रहा है।
पहले ने कहा-‘अरे, आज भारत का मैच था। मैंने तो ध्यान ही नहीं किया। क्या आज भारत मैच जीत गया? मजा आ गया।’
दूसरे ने आश्चर्य से पूछा-‘पर तुम फिर क्या देख और सुन रहे थे? यह टीवी पर क्रिकेट के समाचार ही तो आ रहे हैं पर तुम किसकी बात कर रहे थे?’
तब तक टीवी पर विज्ञापन आना शुरु हो गये। पहले कहा-‘छोड़ो यार, अब तो देखने के लिये विज्ञापन ही बचे हैं। चलो चैनल बदलते हैं।’
दूसरा चैनल बदलने लगा तो पहले ने कहा-‘देखें दूसरे चैनल पर पुरुष एंकर है या महिला? कोई दूसरा चैनल लगाकर देखो।
दूसरे ने कहा-‘यार, खबर तो सभी जगह भारत के जीतने की आ रही होगी। कहीं भी देखो। चैनल वालों में एका है कि वह एक ही समय पर कार्यक्रम दिखायेंगे ताकि दर्शक उनकी तय खबरों से भाग न सके।’
सभी जगह विज्ञापन आ रहे थे। पहले वाले ने झल्लाकर कहा-‘ओह! सभी जगह विज्ञापन आ रहे हैं। मजा नहीं आ रहा। चलो कहीं फिल्म लगा दो। शायद वहीं दोनों एकमत होकर देख और सुन पायेंगे।
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6 जनवरी 2009

नए टीवी लाने की गलती नहीं करना-हास्य कविता

एक सज्जन ने दूसरे से कहा
‘‘यार, क्या तुम्हारे घर में ळाह सास बहु का
रोज होता है झगड़ा
हमारे यहां तो रोज का है लफड़ा
पहले जब सास बहु पर आते थे
सामाजिक धारावाहिक
तब भी जमकर होता गाली गलौच के साथ घमासान
अब आने लगा है कामेडी धारावाहिक
तो भी मजाक ही मजाक में तानेबाजी से
मच जाती है जोरदार जंग
मेरा और पिताजी का मन होता है इससे तंग
इतने सारे टीवी चैनल
बने गये हैं हमारे घर के लिये लफड़ा’’

दूसरे सज्जन ने कहा-
‘‘नहीं मेरे यहां ऐसी समस्या नहीं आती
दोनों के कमरे में अलग अलग टीवी है
पर वह अपनी पसंद के कार्यक्रम भी
भी भला दोनों कब देख पाती
मेरी बेटी अपनी मां से लड़कर
सारा दिन कार्टून फिल्म देखती
बेटा उधम मचाकर मेरी मां से
रिमोट छीनकर देखता है फिल्म
सास बहु दिन भर बच्चों से
जूझते हुए थक जाती
बच्चों की झाड़ फूंक न करूं
इसलिये मुझे भी नहीं बताती
पर कभी कभी दो नये टीवी
घर में लाने की मांग जरूर उठाती
मेरे पिताजी कहते हैं मुझसे
कभी ऐसी गलती नहीं करना
नये टीवी आये घर में तो
अपने गले का फंदा बन जायेगा
इन दोनों सास बहू का लफड़ा’'

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15 दिसंबर 2008

जूते को अस्त्र कहा जाये या शस्त्र-व्यंग्य

जूते का उपयोग सभी लोग पैर में पहनने के लिये करते हैं इसलिये उसकी अपनी कोई इज्जत नहीं है। हमारे देश में कोई स्त्री दूसरे स्त्री को अपने से कमतर साबित करने के लिये कहती है कि ‘वह क्या है? मेरी पैर की जूती के बराबर नहीं है।’

वैसे जूते का लिंग कोई तय नहीं किया गया है। अगर वह आदमी के पैर में है तो जूता और नारी के पैर में है तो जुती। यही जूती या जूता जब किसी को मारा जाता है तो उसका सारा सम्मान जमीन पर आ जाता है। अगर न भी मारा जाये तो यह कहने भर से ही कि ‘मैं तुझे जूता मारूंगा’ आदमी की इज्जत के परखच्चे उड़ जाते हैं भले ही पैर से उतारा नहीं जाये। अगर उतार कर दिखाया जाये तो आदमी की इज्जत ही मर जाती है और अगर मारा जाये तो तो आदमी जीते जी मरे समान हो जाता है।

इराक की यात्रा में एक पत्रकार ने अपने पावों में पहनी जूतों की जोड़ी अमेरिका के राष्ट्रपति की तरफ फैंकी। पहले उसने एक पांव का और फिर दूसरे पांव का जूता उनकी तरफ फैंका। यह खबर दोपहर को सभी टीवी चैनल दिखा रहे थे। दुनियां के सर्वशक्तिमान देश के राष्ट्रपति पर यह प्रहार भारत का ही नहीं बल्कि विश्व के हर समाज का ध्यान आकर्षित करता है। यानि कम से कम एक बात तय है कि जूता फैंकना विश्व के हर समाज में बुरा माना जाता है।

पत्रकार ने जिस तरह जूता फैंका उससे लगता था कि वह कोई निशाना नही लगा रहा था और न ही उसका इरादा बुश को घायल करने का था पर वह अपना गुस्सा एक प्रतीक रूप में करना चाहता था। वहां उसे सुरक्षा कर्मियों ने पकड़ लिया और वह भी दूसरा जूता फैंकने के बाद। अभी तक बंदूकों और बमों से हमलों से सुरक्षा को लेकर सारे देश चिंतित थे पर अब उसमें उनको जूते के आक्रमण को लेकर भी सोचना पड़ेगा। आखिर सम्मान भी कोई चीज होती है। हमारा दर्शन कहता है कि ‘बड़े आदमी का छोटे के द्वारा किया गया अपमान भी उसके लिये मौत के समान होता है।

इस आक्रमण के बाद बुश पत्रकारों से कह रहे थे कि ‘यह प्रचार के लिये किया गया है। अब देखिये आप उसके बारे में मुझसे पूछ रहे हैं।’

हमेशा आक्रमक तेवर अपनाने वाले उस राष्ट्रपति का चेहरा एकदम बुझा हंुआ था। उससे यह लग रहा था कि उनको अपने अपमान का बोध हो रहा था। उनका चेहरा ऐसा लग रहा था जैसे कि गोली से बचे हों।
हमारी फिल्मों में दस नंबर जूते की चर्चा अक्सर आती है पर मारे गये जूते का साइज अगर सात भी तो कोई अपमान का पैमाना कम नहीं हो जाता।

दुनियां में सभी महत्वपूर्ण स्थानों की सुरक्षा वहां मैटल डिटेक्टर से केवल बारूद की जांच की जाती है और अगर इसी तरह जूतों से आक्रमण होते रहे तो आने वाले समय में जूतों से भी सुरक्षा का उपाय होगा।

युद्ध में अस्त्र शस्त्र का प्रयोग होता है। जिनका उपयोग हाथ रखकर किया जाता है उनको अस्त्र और जिनका फैंक कर किया जाता है उनको शस्त्र कहा जाता है। अभी तक जूते को अस्त्र शस्त्र की श्रेणी में नहीं माना जाता अलबत्ता इसके अस्त्र के रूप में ही उपयोग होने की बात कही जाती है। जूतों से मारने की बात अधिक कही जाती है पर यदाकदा ही ऐसा कोई मामला सामने आता है। लोग आपस में लड़ते हैं। एक दूसरे को तलवार से काटन या गोली से उड़ाने की बात कही जाती है पर जूते से मारने की बात केवल कमजोर से कही जाती है वह भी अगर अपना हो तो।

एक सेठ जी के यहां अनेक नौकर थे पर वह अक्सर अपने एक प्यारे नौकर को ही गलती होने पर जूते से मारने की धमकी देते थे। वह नौकर भी चालू था। सुन लेता था क्योंकि वह वेतन के अलावा अन्य तरह की चोरियां और दांव पैंच कर भी अपनी काम चलाता था। उसका वेतन कम था पर आय सबसे अधिक करता था। बाकी नौकर यह सोचकर खुश होतेे थे कि चलो हमें तो कभी जूते से मार खाने की धमकी नहीं मिलती। कम से कम सेठ हमारी इज्जत तो करता है और इसलिये सतर्कता पूर्वक काम करते ताकि कभी उनको उसकी तरह से बेइज्जत न होना पड़े। उनको यह पता ही नहीं था कि सेठ उनको साधने के लिये ही उस नौकर को जूते से मारने की धमकी देता था। इज्जत सभी को प्यारी होती है । कई लोग गोली या तलवार से कम जूते की मार खाने से अधिक डरते हैं। तलवार या गोली खाकर तो आदमी जनता की सहानुभूति का पात्र बन जाता है पर जूते से मार खाने पर ऐसी सहानुभूति मिलने की संभावना नहीं रहती । उल्टे लोगों को लगता है कि चोरी करने या लड़की छेड़ने-यही दोनों आजकल जघन्य अपराध माने जाते हैं जिसमें पब्लिक मारने को तैयार रहती है-के आरोप में पिट रहा है। यानि इससे पिटने वाला आदमी हल्का माना जाता है।

एक बात तय रही कि जूता मारने वाला हाथ में पकड़े ही रहता है फैंकता नहीं है-अगर विरोधी के हाथ लग जाये और वह भी उससे पीट दे तो अपमान करने पर प्रतिअपमान भी झेलना पड़ सकता है। एक बात और है कि गोली या तलवार से लड़ चुके दुश्मन से समझौता हो सकता है पर जूते मारने या खाने वाले से समझौता करने में भी संकोच होता है। एक सज्जन को हमेशा ही गुस्से में आकर जूता उठाने की आदत है-अलबत्ता मारा किसी को नहीं है। अपने जीवन में वह ऐसा चार पाचं बार कर चुके हैं। वही बतातेे हैं कि जिन पर जूता उठाया है अब वह कहीं मिल जाने पर देखकर ऐसे मूंह फेर लेते हैं जैस कि कभी मिले ही न होंं न ही मेरा साहस उनको देखने का होता है।

जूता मारना या मारने के लिये कहना ही अपने आप में एक अपराध है। ऐसे में अगर कहीं जूता उठाकर मारा जाये तो वह भी किसी महान हस्ती पर तो उसकी चर्चा तो होनी है। वह भी सर्वशक्तिमान देश के राष्ट्रपति पर एक पत्रकार जूता फैंके। पत्रकार तो बुद्धिजीवी होते हैं। यह अलग बात है कि सबसे अधिक जूता मारने की बात भी वही कहते हैं कि उनकी बंदूक या तलवार चलाने की बात पर यकीन कौन करेगा? यह कृत्य इतना बुरा है कि जूता फैंकने वाले पत्रकार के साथियों तक ने कह डाला कि वह पूरे इराक का प्रतिनिधि नहीं है। कुछ लोगों ने घर आये मेहमान के साथ इस अपमानजनक व्यवहार की कड़ी निंदा तक की है

यह लगभग उस देश पर हमले जैसा है पर कोई देश उसका जवाब देने का सोच भी नहीं सकता। कोई वह जूते उठाकर उस पत्रकार की तरफ फैंकने वाला नहीं था। उसे सुरक्षा कर्मी पकड़ कर ले गये और यकीनन वह बिना जूतों के ही गया होगा। उसकी हालत भी ऐसे ही हुई होगी जैसी कि आतंकवादियों की बंदूक के बिना हो जाती है।

इतिहास में यह शायद पहली मिसाल होगी जब जूते का शस्त्र के रूप में उपयोग किया गया होगा। अब आखिर उन जूतों का क्या होगा? वह पत्रकार को वापस तो नहीं दिये जायेंगे। अगर दे दिये तो वह उन जूतों को नीलाम कर भारी रकम वसूल कर लेगा। पश्चिम में ऐसी ही चीजों की मांग है। उन जूतों को उठाकर ले जाने की समस्या वहां के प्रशासन के सामने आयेगी। अगर वह कहीं असुरक्षित जगह पर रखे गये तो तस्करों की नजर उस पड़ सकती है। अब वह जूते एतिहासिक हो गये हैं कई लोग उन जूतों पर नजर गड़ाये बैठेंगे। भारत की अनेक एतिहासिक धरोहरों पश्चिम में पहुंच गयीं हैं और यह तो उनकी खुद की धरोहर होगी। भारत की धरोहर का प्रदर्शन तो वह कर लेते हैं पर इस धरोहर का प्रदर्शन करना संभव नहीं है।

वैसे अपने देश में जूता मारने के लिये कहने की कई लोगों में आदत है पर इसका अस्त्र शस्त्र की तरह उपयोग करने की चर्चा कभी नहीं हुई। अब लगता है कि आने वाले इस सभ्य युग में यह भी एक तरीका हो सकता है पर यह पश्चिम के लिये ही है। अपने देश में तो हर आदमी क्रोध में आने पर जूता मारने की बात करता है पर हर कोई जानता है कि उसके बाद क्या होगा? वैसे यहां कोई नई बात नहीं है। किसी ज्योतिषी ने भविष्यवाणी की थी कि तीसरा युद्ध पत्थरों से लड़ा जायेगा। लगता है नहीं! शायद वह जूतों से लड़ा जायेगा। अमेरिका ने परमाणु बम का ईजाद कर जापान पर उसका उपयोग किया पर जूता परमाणु बम से अधिक खतरनाक है। परमाणु बम की मार से तो आदमी मर खप जाता है या कराह कराह कर जीता है पर जूते की मार तो ऐसी होती है कि अगर एक बार फैंका भी जाये तो कोई भी जूता देखकर वह मंजर नजर आता है। या मरने या कराहने से भी बुरी स्थिति है। अब सवाल यह है कि जूते को अस्त्र कहा जाये कि शस्त्र? दोनों की श्रेणी में तो उसे रखा नहीं जाता। या यह कहा जाये कि जूते को जूता ही रहने तो क्योंकि उसकी मार अस्त्रों शस्त्रों से भी गहरी होती है।

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9 नवंबर 2008

जब आये सोच की बारी आदमी हार जाता-हिंदी शायरी

एक तलाश पूरी होते ही
आदमी दूसरी में जुट जाता
अंतहीन सिलसिला है
अपने मकसद रोज नये बनाता
पूरे होते ही दूसरे में जुट जाता
भरता जाता अपना घर
पर कीमती समय का जो मिला है खजाना
नहीं देखता उसकी तरफ
जो हर पल लुट जाता

धरती के सामानो से जब उकता जाता
तब घेर लेती बैचेनी
तब चैन पाने के लिये आसमान
की तरफ अपने हाथ बढ़ता
दिल को खुश कर सके
ऐसा सामान भला वहां से कब टपक कर आता
हाथ उठाये सर्वशक्तिमान का नाम पुकारता
कभी नीली छतरी के नीचे
कभी पत्थर की छत को टिकाये
दीवारों के पीछे
पर फिर भी उसे तसल्ली का एक पल नहीं मिल पाता

हर पल दौड़ते रहने की आदत ऐसी
कि रुक कर सोचने का ख्याल कभी नहीं आता
जिंदगी में लोहे, लकड़ी और प्लास्टिक के सामान
जुटाता रहा
पर फिर उनका घर कबाड़ बन जाता
जिनके आने पर मनाता है जश्न
फिर उनके पुराने होने पर घबड़ाता
आदमी दिमाग के सोचने से परे होने का आदी होता
जब आये सोच की बारी वह हार जाता
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27 सितंबर 2008

समझने और समझाने का अभियान-व्यंग्य आलेख

बहुत दिन से हमारे दिमाग में यह बात नहीं आ रही कि आखिर कौन किसको क्या और क्यों समझा रहा है? कब समझा रहा है यह तो समझ में आ रहा है क्योंकि चाहे जब कोई किसी को समझाने लगता है? मगर माजरा हमारी समझ में नहीं आ रहा है। कहीं छपा हुआ पढ़ते हैं या कोई दिखा रहा है तो उसे पढ़ते हैं, मगर समझ में कुछ नहीं आ रहा है।

देश में अनेक जगह पर बम फटे उसमें अनेक लोग हताहत हुए और कई परिवारों पर संकट टूट पड़ा। सब जगह तफशीश चल रही है पर इधर बुद्धिजीवियों ने देश में बहस शुरू कर दी है। अमुक धर्म देश तोड़ता है और अमुक तो प्रेम का संदेश देता है। जाति, भाषा और धर्म के लोग बहस किये जा रहे हैं। किसी से पूछो कि भई क्या बात है? आखिर यह बहस चल किस रही है।’

जवाब मिलता है कि ‘क्या करें विषयों की कमी है।’

जवाब सुनकर हैरानी होती है। फिर सोचते हैं कि ‘जिनको वाद और नारों पर चलने की आदत हो गयी है कि उनके लिये यह कठिनाई तो है कि जो विषय अखबार और टीवी पर दिखता हो उसके अलावा वह लिखें किस बात पर? फिर आजकल लो आलेख और व्यंग्य तात्कालिक मुद्दों पर लिखने के सभी अभ्यस्त हैं। वाद और नारों जमीन पर खड़े लेखक लोग समाज की थोड़ी हलचल पर ही अपनी प्रतिक्रिया देना प्रारंभ कर देते हैं। आदमी का नाम पूछा और शुरू हो गये धर्म, जाति और भाषा के नाम पर एकता का नारा लेकर। अगर अपराधी है तो उसकी जाति,भाषा और धर्म की सफाई की बात करते हुए एकता की बात करते हैं। हमारे एक सवाल का जवाब कोई नहीं देता कि क्या ‘आतंकी हिंसा अपराध शास्त्र से बाहर का विषय है?’

अगर आजकल के बुद्धिजीवियों की बातें पढ़ें और सुने तो लगता है कि यह अपराध शास्त्र से बाहर है क्योंकि इसमें हर कोई ऐसा व्यक्ति अपना दखल देकर विचार व्यक्त करता है जैसे कि वह स्वयं ही विशेषज्ञ हो। व्यवसायिक अपराध विशेषज्ञों की तो कोई बात ही नहीं सुनता। अपराध के तीन कारण होते हैं-जड़ (धन),जोरु (स्त्री) और जमीन। मगर भाई लोग इसके साथ जबरन धर्म, जाति और भाषा का विवाद जोड़ने में लगे हैं। यानि उनके लिये यह अपराध शास्त्र से बाहर का विषय है।

हम तो ठहरे लकीर के फकीर! जो पढ़ा है उस पर ही सोचते हैं। कभी सोचते हैं कि अपराध शास्त्र के लोग अपने पाठ्यक्रम का विस्तार करें तो ही ठीक रहेगा। अब इन तीनों चीजों के अलावा तीन और चीजें भी अपराध के लिये उत्तरदायी माने-धर्म,जाति और भाषा।’

यहां यह स्पष्ट कर दें कि हमने अपराध शास्त्र नहीं पढ़ा उनका एक नियम हमने रट रखा है कि अपराध केवल जड़,जोरु और जमीन के कारण ही होता है। अगर अपराध शास्त्री उसमें तीन से छह कारण जोड़ लें तो हम भी अपनी स्मृतियों में बदलाव करेंगे। अपने दिमागी कंप्यूटर में तीन से छह कारण अपराध के फीड कर देंगे। बाकी जो अन्य विद्वान है उनसे तो हम इसलिये सहमत नहीं हो सकते क्योंकि हम भी अपने को कम विद्वान नहीं समझते। एक विद्वान दूसरे विद्वान से सहमत नहीं होता यह भी हमने कहीं पढ़ा तब से चाहते हुए भी असहमति व्यक्त कर देते हैं ताकि मर्यादा बनी रहे। हां, कोई अपराध शास्त्री कहेगा तो उसे मान जायेंगे। इतना तो हम भी जानते हैं कि अपने से अधिक सयानों की बात मान लेनी चाहिये।


सभी आतंकी हिंसा की घटनाओं की चर्चा करते हैंं। हताहतों के परिवारों पर जो संकट आया उसका जिक्र करने की बजाय लोग उन मामलों में संदिग्ध लोगों पर चर्चा कर रहे हैं। उनके धर्म और जाति पर बहस छेड़े हुए हैं। अब समझाने वालों के जरा हाल देखिये।

एक तरफ कहते हैं कि दहशत की वारदात को किसी धर्म,जाति या भाषा से मत जोडि़ये। दूसरी तरफ जब वह उस पर चर्चा करते हैं तो फिर अपराधियों की जाति, भाषा और धर्म को लेकर बहस करते हैं। वह धर्म ऐसा नहीं है, वह जाति तो बहुत सौम्य है और भाषा तो सबकी महान होती है। अब समझ में नहीं आता कि वह कि हिंसक घटना से धर्म, जाति और भाषा से अलग कर रहे हैं या जोड़ रहे हैं। यह हास्याप्रद स्थिति देखकर कोई भी हैरान हो सकता है।

फिर कहते हैं कि संविधान और कानून का सम्मान होना चाहिये। मगर बहसों में संदिग्ध लोगों की तरफ से सफाई देने लगते हैं। एक तरफ कहते हैं कि अदालतों में यकीन है पर दूसरी तरफ बहस करते हुए किसी के दोषी या निर्दोष होने का प्रमाण पत्र चिपकाने लगते हैं। इतना ही नहीं समुदायों का नाम लेकर उनके युवकों से सही राह पर चलने का आग्रह करने लगते हैं। हम जैसे लोग जो इन वारदातों को वैसा अपराध मानते हैं जैसे अन्य और किसी समुदाय से जोड़ने की सोच भी नहीं सकते उनका ध्यान भी ऐसे लोगों की वजह से चला जाता है।

इस उहापोह में यही सोचते हैं कि आखिर लिखें तो किस विषय पर लिखें। अपराध पर या अपराधी के समुदाय पर। अपराध की सजा तो अदालत ही दे सकती है पर अपराधी की वजह से जाति,धर्म, और भाषा के नाम पर बने भ्रामक समूहों की चर्चा करना हमें पसंद नहीं है। ऐसे में सोचते हैं कि नहीं लिखें तो बहुत अच्छा। जिन लोगों ने इन वारदातों में अपनी जान गंवाई है उनके तो बस जमीन पर बिखरे खून का फोटो दिखाकर उनकी भूमिका की इतिश्री हो जाती है और उनके त्रस्त परिवार की एक दो दिन चर्चा रहती है पर फिर शुरू हो जाता है अपराधियों के नाम का प्रचार। हादसे से पीडि़त परिवारों की पीड़ा को इस तरह अनदेखा कर देने वाले बुद्धिजीवियों को देखकर उनके संवेदनशील होने पर संदेह होता है।

फिर शुरू होता है समझने और समझाने का अभियान। इस समय सभी जगह यह समझने और समझाने का अभियान चल रहा है। हम बार बार इधर उधर दृष्टिपात करते हैं पर आज तक यह समझ में नहीं आया कि कौन किसको क्या और क्यों समझा रहा है? समझाने वाला तो कहीं लिखता तो कहीं बोलता दिखता है पर वह समझा किसको रहा है यह दिखाई नहीं देता।
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20 सितंबर 2008

ऐसे भी लिखा जाता है-हास्य व्यंग्य

उस दिन उस लेखक मित्र से मेरी मुलाकात हो गयी जो कभी कभी मित्र मंडली में मिल जाता है और अनावश्यक रूप विवाद कर मुझसे लड़ता रहता है। हमारी मित्र मंडली की नियमित बैठक में हम दोनों कभी कभार ही जाते हैं और जब वह मिलता है तो न चाहते हुए भी मुझे उससे विवाद करना ही पड़ता है।
उस दिन राह चलते ही उसने रोक लिया और बिना किसी औपचारिक अभिवादन किए ही मुझसे बोला-‘‘मैंने तुम पर एक व्यंग्य लिखा और वह एक पत्रिका में प्रकाशित भी हो गया। उसमें छपने पर मुझे एक हजार रुपये भी मिले हैं।’

मैंने प्रसन्नता व्यक्त करते हुए अपना हाथ बढ़ाते हुए उससे कहा-‘बधाई हो। मुझ पर व्यंग्य लिखकर तुमने एक हजार रुपये कमा लिये और अब चलो मैं भी तुम्हें होटले में चाय पिलाने के साथ कुछ नाश्ता भी कराता हूं।’
पहले तो वह हक्का बक्का होकर मेरी तरफ देखने लगा फिर अपनी रंगी हुई दाढ़ी पर हाथ फेरते हुए बोला-‘‘बडे+ बेशर्म हो। तुम्हें अपनी इज्जत की परवाह ही नहीं है। मैंने तुम्हारी मजाक बनाई और जिसे भी सुनाता हूं वह तुम हंसता है। मुझे तुम पर तरस आता है, लोग हंस रहे हैं और तुम मुझे बधाई दे रहे हो।’’

मैंने बहुत प्रसन्न मुद्रा में उससे कहा-‘तुमने इस बारे में अन्य मित्रों में भी इसकी चर्चा की है। फिर तो तुम मेरे साथ किसी बार में चलो। आजकल बरसात का मौसम है। कहीं बैठकर जाम पियेंगे। तुम्हारा यह अधिकार बनता है कि मेरे पर व्यंग्य लिखने में इतनी मेहनत की और फिर प्रचार कर रहे हो। इससे तो मुझे ही लाभ हो सकता है। संभव है किसी विज्ञापन कंपनी तक मेरा नाम पहुंच जाये और मुझे किसी कंपनी के उत्पाद का विज्ञापन करने का अवसर मिले। आजकल उन्हीं लोगों को लोकप्रियता मिल रही है जिन पर व्यंग्य लिखा जा रहा है।
मेरा वह मित्र और बिफर उठा-‘‘यार, दुनियां में बहुत बेशर्म देखे पर तुम जैसा नहीं। यह तो पूछो मैंने उसमें लिखा क्या है? मैंने गुस्से में लिखा पर अब मेरा मन फटा जा रहा है इस बात पर कि तुम उसकी परवाह ही नहीं कर रहे। मैंने सोचा था कि जब मित्र मंडली में यह व्यंग्य पढ़कर सुनाऊंगा तो वह तुमसे चर्चा करेंगे पर तुम तो ऐसे जैसे उछल रहे हो जैसे कि कोई बहुत बड़ा सम्मान मिल गया है।’’
मैंने कहा-‘’तुम्हारा व्यंग्य ही मुझे बहुत सारे सम्मान दिलायेगा। तुम कुछ अखबार पढ़ा करो तो समझ में आये। जिन पर व्यंग्य लिखे जा रहे हैं वही अब सब तरह चमक रहे हैं। उनकी कोई अदा हो या बयान लोग उस पर व्यंग्य लिखकर उनको प्रचार ही देते हैं। वह प्रसिद्धि के उस शिखर पर इन्हीं व्यंग्यों की बदौलत पहुंचे हैं। उनको तमाम तरह के पैसे और प्रतिष्ठा की उपलब्धि इसलिये मिली है कि उन पर व्यंग्य लिखे जाते रहे हैं। फिल्मों के वही हीरो प्रसिद्ध हैं जिन पर व्यंग्य लिखे जा रहे हैं। जिस पर व्यंग्य लिखा जाता है उसके लिये तो वह मुफ््त का विज्ञापन है। मैं तुम्हें हमेशा अपना विरोधी समझता था पर तुम तो मेरे सच्चे मित्र निकले। यार, मुझे माफ करना। मैंने तुम्हें कितना गलत समझा।’’

वह अपने बाल पर हाथ फेरते हुए आसमान में देखने लगा। मैंने उसके हाथ में डंडे की तरह गोल हुए पत्रिका की तरफ हाथ बढ़ाते हुए कहा-‘देखूं तो सही कौनसी पत्रिका है। इसे मैं खरीद कर लाऊंगा। इसमें मेरे जीवन की धारा बदलने वाली सामग्री है। तुम चाहो तो पैसे ले लो। तुम बिना पैसे के कोई काम नहीं करते यह मैं जानता हूं, फिर भी तुम्हें मानता हूं। मैं इसका स्वयं प्रचार करूंगा और लोग यह सुनकर मुझसे और अधिक प्रभावित होंगे कि मुझ पर व्यंग्य लिखा गया है।’’

उसने अपनी पत्रिका वाला हाथ पीछे खींच लिया और बोला-‘मुझे पागल समझ रखा है जो यह पत्रिका तुम्हें दिखाऊंगा। मैंने तुम पर कोई व्यंग्य नहीं लिखा। तुमने अपनी शक्ल आईने में देखी है जो तुम पर व्यंग्य लिखूंगा। मैं तो तुम्हें चिढ़ा रहा था। इस पत्रिका में मेरा एक व्यंग्य है और उसका पात्र तुमसे मिलता जुलता है। तुम सबको ऐसे ही कहते फिरोगे कि देखो मुझ पर व्यंग्य लिखा गया है। चलते बनो। मैंने जो यह व्यंग्य लिखा है उसका पात्र तुमसे मिलता जुलता जरूर है पर उसका नाम तुम जैसा नहीं है।’

मैंने बनावटी गुस्से का प्रदर्शन करते हुए कहा-‘‘तुमने उसमें मेरा नाम नहीं दिया। मैं जानता हूं तुम मेरे कभी वफादार नहीं हो सकते।’’

वह बोला-‘मुझे क्या अपनी तरह अव्यवसायिक समझ रखा है जो तुम पर व्यंग्य लिखकर तुम्हें लोकप्रियता दिलवाऊंगा। तुम में ऐसा कौनसा गुण है जो तुम पर व्यंग्य लिखा जाये।’

मैंने कहा-‘‘तुम्हारे मुताबिक मैं एक गद्य लेखक नहीं बल्कि गधा लेखक हूं और मेरी पद्य रचनाऐं रद्द रचनाऐं होती हैं।’’
वह सिर हिलाते हुए इंकार करते हुए बोला-‘नहीं। मैंने ऐसा कभी नहीं कहा। तुम तो अच्छे गद्य और पद्यकार हो तभी तो कोई उनको पढ़ता नहीं है। मैं तुम्हें ऐसा प्रचार नहीं दे सकता कि लोग उसे पढ़तें हुए मुझे ही गालियां देने लगें।
मैंने कहा-‘तुम मेरे लिऐ कहते हो कि मैं ऐसी रचनाऐं लिखता हूं जिससे मेरी कमअक्ली का परिचय मिलता है।’
उसने फिर इंकार में सिर हिलाया और कहा-‘मैंने ऐसा कभी नहीं कहा। तुम तो बहुत अक्ल के साथ अपनी रचनाएं लिखते हो इसी कारण किसी पत्र-पत्रिका के संपादक के समझ में नही आती और प्रकाशन जगत से तुम्हारा नाम अब लापता हो गया है। फिर मैं अपने व्यंग्य में तुम्हारा नाम कैसे दे सकता हूं।

मेरा धीरज जवाब दे गया और मैंने मुट्ठिया और दंात भींचते हुए कहा-‘फिर तुमने मुझे यह झूठा सपना क्यों दिखाया कि मुझ पर व्यंग्य लिखा है।’
वह बोला-‘ऐसे ही। मैं भी कम चालाक नहीं हूं। तुम जिस तरह काल्पनिक नाम से व्यंग्य लेकर दूसरों को प्रचार से वंचित करते हो वैसे मैंने भी किया। तुमने पता नहीं मुझ पर कितने व्यंग्य लिखे पर कभी मेरा नाम लिखा जो मैं लिखता। अरे, तुम तो मेरे पर एक हास्य कविता तक नहीं लिख पाये।’

मैंने आखिर उससे पूछा-‘पर तुमने अभी कुछ देर पहले ही कहा था कि‘तुम पर व्यंग्य लिखा है।’

वह अपनी पत्रिका को कसकर पकड़ते हुए मेरे से दूर हो गया और बोला-‘तब मुझे पता नहीं था कि व्यंग्य भी विज्ञापनों करने के लिये लिखे जाते हैं।’
फिर वह रुका नहीं। उसके जाने के बाद मैंने आसमान में देखा। उस बिचारे को क्या दोष दूं। मैं भी तो यही करता हूं। किसी का नाम नहीं देखा। इशारा कर देता हूं। हालत यह हो जाती है कि एक नहीं चार-चार लोग कहने लगते हैं कि हम पर लिखा है। किसी ने संपर्क किया ही नहीं जो मैं उन पर व्यंग्य लिखकर प्रचार करता। अगर किसी का नाम लिखकर व्यंग्य दूं तो वह उसका दो तरह से उपयोग कर सकता है। एक तो वह अपनी सफाई में तमाम तरह की बातें कहेगा और फिर अपने चेलों को मुझ पर शब्दिक आक्रमण करने के लिये उकसायेगा। कुल मिलाकर वह उसका प्रचार करेगा। इसी आशंका के कारण मैं किसी ऐसे व्यक्ति का नाम नहीं देता जो इसका लाभ उठा सके। वह मुझे इसी चालाकी की सजा दे गया।
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