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25 अप्रैल 2009

इंसानों के भेष में कीड़े मकोड़े-आलेख

सच बात तो यह है कि सट्टा एक विषय है जिस पर अर्थशास्त्र में विचार नहीं किया जाता। पश्चिमी अर्थशास्त्र अपराधियों, पागलों और सन्यासियों को अपने दायरे से बाहर मानकर ही अपनी बात कहता है। यही कारण है कि क्रिकेट पर लगने वाले सट्टे पर यहां कभी आधिकारिक रूप से विचार नहीं किया जाता जबकि वास्तविकता यह है कि इससे कहीं कहीं देश की अर्थव्यवस्था और सामाजिक स्थिति प्रभावित हो रही है।
पहले सट्टा लगाने वाले आमतौर से मजदूर लोग हुआ करते थे। अनेक जगह पर सट्टे का नंबर लिखा होता था। सार्वजनिक स्थानों-खासतौर से पेशाबघरों- पर सट्टे के नंबर लिखे होते थे। सट्टा लगाने वाले बहुत बदनाम होते थे और उनके चेहरे से पता लग जाता था कि उस दिन उनका नंबर आया है कि नहीं। उनकी वह लोग मजाक उड़ाते थे जो नहीं लगाते थे और कहते-‘क्यों आज कौनसा नंबर आया। तुम्हारा लगा कि नहीं।’
कहने का तात्पर्य यह है कि सट्टा खेलने वाले को निम्नकोटि का माना जाता था। चूंकि वह लोग मजदूर और अल्प आय वाले होते थे इसलिये अपनी इतनी ही रकम लगाते थे जिससे उनके घर परिवार पर उसका कोई आर्थिक प्रभाव नहीं पड़े।

अब हालात बदल गये हैं। दिन ब दिन ऐसी घटनायें हो रही हैं जिसमें सट्टा लगाकर बरबाद हुए लोग अपराध या आत्महत्या जैसे जघन्य कार्यों की तरफ अग्रसर हो रहे हैं। इतना ही नहीं कई जगह तो ऐसे सट्टे से टूटे लोग अपने ही परिवार के लोगों पर आक्रमण कर देते हैं। केवल एक ही नहीं अनेक घटनायें सामने आयी हैं जिसमें सट्टे में बरबाद हुए लोगों ने आत्मघाती अपराध किये। होता यह है कि यह खबरें आती हैं तो सनसनी कुछ यूं फैलायी जाती है जिसमें रिश्तों के खून होने की बात कही जाती है। कहा जाता है कि ‘अमुक ने अपने माता पिता को मार डाला’, अमुक ने अपनी पत्नी और बच्चों सहित जहर खा लिया’, ‘अमुक ने अपनी बहन या भाई के के घर डाका डाला’ या ‘अमुक ने अपने रिश्ते के बच्चे का अपहरण किया’। उस समय प्रचार माध्यम सनसनी फैलाते हुए उस अपराधी की पृष्ठभूमि नहीं जानते पर जब पता लगता है कि उसने सट्टे के कारण ऐसा काम किया तो यह नहीं बताते कि वह सट्टा आखिर खेलता किस पर था।’
सच बात तो यह है कि सट्टे में इतनी बरबादी अंको वाले खेल में नहीं होती। फिर सट्टे में बरबाद यह लोग शिक्षित होते हैं और वह पुराने अंकों वाले सट्टे पर शायद ही सट्टा खेलते हों। अगर खेलते भी हों तो उसमें इतनी बरबादी नहीं होती। बहुत बड़ी रकम पर सट्टा संभवतः क्रिकेट पर ही खेला जाता है। प्रचार माध्यम इस बात तो जानकर छिपाते हैं यह अनजाने में पता नहीं। हो सकता है कि इसके अलावा भी कोई अन्य प्रकार का सट्टा खेला जाता हो पर प्रचार माध्यमों में जिस तरह क्रिकेट पर सट्टा खेलने वाले पकड़े जाते हैं उससे तो लगता है कि अधिकतर बरबाद लोग इसी पर ही सट्टा खेलते होंगे।
अनेक लोग क्रिकेट खेलते हैं और उनसे जब यह पूछा गया कि उनके आसपास क्या कुछ लोग क्रिकेट पर सट्टा खेलते है तो वह मानते हैं कि ‘ऐसा तो बहुत हो रहा है।’
सट्टे पर बरबाद होने वालों की दास्तान बताते हुए प्रचार माध्यम इस बात को नहीं बताते कि आखिर वह किस पर खेलता था पर अधिकतर संभावना यही बनती है कि वह क्रिकेट पर ही खेलता होगा। लोग भी सट्टे से अधिक कुछ जानना नहीं चाहते पर सच बात तो यह है कि क्रिकेट पर सट्टा खेलना अपने आप में बेवकूफी भरा कदम है। सट्टा खेलने वालों को निम्न श्रेणी का आदमी माना जाता है भले ही वह कितने बड़े परिवार का हो। सट्टा खेलने वालों की मानसिकता सबसे गंदी होती है। उनके दिमाग में चैबीसों घंटे केवल वही घूमता है। देखा यह गया है कि सट्टा खेलने वाले कहीं से भी पैसा हासिल कर सट्टा खेलते हैं और उसके लिये अपने माता पिता और भाई बहिन को धोखा देने में उनको कोई संकोच नहीं होता। इतना ही नहीं वह बार बार मरने की धमकी देकर अपने ही पालकों से पैसा एैंठते हैं। कहा जाता है कि पूत अगर सपूत हो तो धन का संचय क्यों किया जाये और कपूत हो तो क्यों किया जाये? अगर धन नहीं है तो पूत ठीक हो तो धन कमा लेगा इसलिये संचय आवश्यक नहीं है और कपूत है तो बाद में डांवाडोल कर देगा पर अगर सट्टेबाज हुआ तो जीते जी मरने वाले हालत कर देता है।
देखा जाये तो कोई आदमी हत्या, चोरी, डकैती के आरोप में जेल जा चुका हो उससे मिलें पर निकटता स्थापित नहीं करे पर अगर कोई सट्टेबाज हो तो उसे तो मिलना ही व्यर्थ है क्योंकि इस धरती पर वह एक नारकीय जीव होता है। एक जो सबसे बड़ी बात यह है कि क्रिकेट पर लगने वाला सट्टा अनेक बड़े चंगे परिवारों का नाश कर चुका है और यकीनन कहीं न कहीं इससे देश की अर्थव्यवस्था प्रभावित हो रही है। देश से बाहर हो या अंदर लोग क्रिकेट पर सट्टा लगाते हैं और कुछ लोगों को संदेह है कि जिन मैचों पर देश का सम्मान दांव पर नहीं होता उनके निर्णय पर सट्टेबाजों का प्रभाव हो सकता है। शायद यही कारण है कि देश की इज्जत के साथ खेलकर सट्टेबाजों के साथ निभाने से खिलाड़ियों के लिये जोखिम भरा था।
इसलिये अंतर्राष्ट्रीय मैचों के स्थान पर क्लब स्तर के मैचों को प्रोत्साहन दिया जा रहा है। क्लब स्तर की टीमों मे देश के सम्मान का प्रश्न नहीं होता। सच क्या है कोई नहीं जानता पर इतना तय है कि क्रिकेट पर लगने वाला सट्टा देश को खोखला कर रहा है। जो लोग सट्टा खेलते हैं उन्हें आत्म मंथन करना चाहिये। वैसे तो पूरी दुनियां के लोग भ्रम में जी रही है पर सट्टा खेलने वाले तो उससे भी बदतर हैं क्योंकि वह इंसानों के भेष में कीड़े मकौड़ों की तरह जीवन जीने वाले होते हैं और केवल उसी सोच के इर्दगिर्द घूमते हैं और तथा जिनकी बच्चे, बूढे, और जवान सभी मजाक उड़ाते हैं।
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20 सितंबर 2008

ऐसे भी लिखा जाता है-हास्य व्यंग्य

उस दिन उस लेखक मित्र से मेरी मुलाकात हो गयी जो कभी कभी मित्र मंडली में मिल जाता है और अनावश्यक रूप विवाद कर मुझसे लड़ता रहता है। हमारी मित्र मंडली की नियमित बैठक में हम दोनों कभी कभार ही जाते हैं और जब वह मिलता है तो न चाहते हुए भी मुझे उससे विवाद करना ही पड़ता है।
उस दिन राह चलते ही उसने रोक लिया और बिना किसी औपचारिक अभिवादन किए ही मुझसे बोला-‘‘मैंने तुम पर एक व्यंग्य लिखा और वह एक पत्रिका में प्रकाशित भी हो गया। उसमें छपने पर मुझे एक हजार रुपये भी मिले हैं।’

मैंने प्रसन्नता व्यक्त करते हुए अपना हाथ बढ़ाते हुए उससे कहा-‘बधाई हो। मुझ पर व्यंग्य लिखकर तुमने एक हजार रुपये कमा लिये और अब चलो मैं भी तुम्हें होटले में चाय पिलाने के साथ कुछ नाश्ता भी कराता हूं।’
पहले तो वह हक्का बक्का होकर मेरी तरफ देखने लगा फिर अपनी रंगी हुई दाढ़ी पर हाथ फेरते हुए बोला-‘‘बडे+ बेशर्म हो। तुम्हें अपनी इज्जत की परवाह ही नहीं है। मैंने तुम्हारी मजाक बनाई और जिसे भी सुनाता हूं वह तुम हंसता है। मुझे तुम पर तरस आता है, लोग हंस रहे हैं और तुम मुझे बधाई दे रहे हो।’’

मैंने बहुत प्रसन्न मुद्रा में उससे कहा-‘तुमने इस बारे में अन्य मित्रों में भी इसकी चर्चा की है। फिर तो तुम मेरे साथ किसी बार में चलो। आजकल बरसात का मौसम है। कहीं बैठकर जाम पियेंगे। तुम्हारा यह अधिकार बनता है कि मेरे पर व्यंग्य लिखने में इतनी मेहनत की और फिर प्रचार कर रहे हो। इससे तो मुझे ही लाभ हो सकता है। संभव है किसी विज्ञापन कंपनी तक मेरा नाम पहुंच जाये और मुझे किसी कंपनी के उत्पाद का विज्ञापन करने का अवसर मिले। आजकल उन्हीं लोगों को लोकप्रियता मिल रही है जिन पर व्यंग्य लिखा जा रहा है।
मेरा वह मित्र और बिफर उठा-‘‘यार, दुनियां में बहुत बेशर्म देखे पर तुम जैसा नहीं। यह तो पूछो मैंने उसमें लिखा क्या है? मैंने गुस्से में लिखा पर अब मेरा मन फटा जा रहा है इस बात पर कि तुम उसकी परवाह ही नहीं कर रहे। मैंने सोचा था कि जब मित्र मंडली में यह व्यंग्य पढ़कर सुनाऊंगा तो वह तुमसे चर्चा करेंगे पर तुम तो ऐसे जैसे उछल रहे हो जैसे कि कोई बहुत बड़ा सम्मान मिल गया है।’’
मैंने कहा-‘’तुम्हारा व्यंग्य ही मुझे बहुत सारे सम्मान दिलायेगा। तुम कुछ अखबार पढ़ा करो तो समझ में आये। जिन पर व्यंग्य लिखे जा रहे हैं वही अब सब तरह चमक रहे हैं। उनकी कोई अदा हो या बयान लोग उस पर व्यंग्य लिखकर उनको प्रचार ही देते हैं। वह प्रसिद्धि के उस शिखर पर इन्हीं व्यंग्यों की बदौलत पहुंचे हैं। उनको तमाम तरह के पैसे और प्रतिष्ठा की उपलब्धि इसलिये मिली है कि उन पर व्यंग्य लिखे जाते रहे हैं। फिल्मों के वही हीरो प्रसिद्ध हैं जिन पर व्यंग्य लिखे जा रहे हैं। जिस पर व्यंग्य लिखा जाता है उसके लिये तो वह मुफ््त का विज्ञापन है। मैं तुम्हें हमेशा अपना विरोधी समझता था पर तुम तो मेरे सच्चे मित्र निकले। यार, मुझे माफ करना। मैंने तुम्हें कितना गलत समझा।’’

वह अपने बाल पर हाथ फेरते हुए आसमान में देखने लगा। मैंने उसके हाथ में डंडे की तरह गोल हुए पत्रिका की तरफ हाथ बढ़ाते हुए कहा-‘देखूं तो सही कौनसी पत्रिका है। इसे मैं खरीद कर लाऊंगा। इसमें मेरे जीवन की धारा बदलने वाली सामग्री है। तुम चाहो तो पैसे ले लो। तुम बिना पैसे के कोई काम नहीं करते यह मैं जानता हूं, फिर भी तुम्हें मानता हूं। मैं इसका स्वयं प्रचार करूंगा और लोग यह सुनकर मुझसे और अधिक प्रभावित होंगे कि मुझ पर व्यंग्य लिखा गया है।’’

उसने अपनी पत्रिका वाला हाथ पीछे खींच लिया और बोला-‘मुझे पागल समझ रखा है जो यह पत्रिका तुम्हें दिखाऊंगा। मैंने तुम पर कोई व्यंग्य नहीं लिखा। तुमने अपनी शक्ल आईने में देखी है जो तुम पर व्यंग्य लिखूंगा। मैं तो तुम्हें चिढ़ा रहा था। इस पत्रिका में मेरा एक व्यंग्य है और उसका पात्र तुमसे मिलता जुलता है। तुम सबको ऐसे ही कहते फिरोगे कि देखो मुझ पर व्यंग्य लिखा गया है। चलते बनो। मैंने जो यह व्यंग्य लिखा है उसका पात्र तुमसे मिलता जुलता जरूर है पर उसका नाम तुम जैसा नहीं है।’

मैंने बनावटी गुस्से का प्रदर्शन करते हुए कहा-‘‘तुमने उसमें मेरा नाम नहीं दिया। मैं जानता हूं तुम मेरे कभी वफादार नहीं हो सकते।’’

वह बोला-‘मुझे क्या अपनी तरह अव्यवसायिक समझ रखा है जो तुम पर व्यंग्य लिखकर तुम्हें लोकप्रियता दिलवाऊंगा। तुम में ऐसा कौनसा गुण है जो तुम पर व्यंग्य लिखा जाये।’

मैंने कहा-‘‘तुम्हारे मुताबिक मैं एक गद्य लेखक नहीं बल्कि गधा लेखक हूं और मेरी पद्य रचनाऐं रद्द रचनाऐं होती हैं।’’
वह सिर हिलाते हुए इंकार करते हुए बोला-‘नहीं। मैंने ऐसा कभी नहीं कहा। तुम तो अच्छे गद्य और पद्यकार हो तभी तो कोई उनको पढ़ता नहीं है। मैं तुम्हें ऐसा प्रचार नहीं दे सकता कि लोग उसे पढ़तें हुए मुझे ही गालियां देने लगें।
मैंने कहा-‘तुम मेरे लिऐ कहते हो कि मैं ऐसी रचनाऐं लिखता हूं जिससे मेरी कमअक्ली का परिचय मिलता है।’
उसने फिर इंकार में सिर हिलाया और कहा-‘मैंने ऐसा कभी नहीं कहा। तुम तो बहुत अक्ल के साथ अपनी रचनाएं लिखते हो इसी कारण किसी पत्र-पत्रिका के संपादक के समझ में नही आती और प्रकाशन जगत से तुम्हारा नाम अब लापता हो गया है। फिर मैं अपने व्यंग्य में तुम्हारा नाम कैसे दे सकता हूं।

मेरा धीरज जवाब दे गया और मैंने मुट्ठिया और दंात भींचते हुए कहा-‘फिर तुमने मुझे यह झूठा सपना क्यों दिखाया कि मुझ पर व्यंग्य लिखा है।’
वह बोला-‘ऐसे ही। मैं भी कम चालाक नहीं हूं। तुम जिस तरह काल्पनिक नाम से व्यंग्य लेकर दूसरों को प्रचार से वंचित करते हो वैसे मैंने भी किया। तुमने पता नहीं मुझ पर कितने व्यंग्य लिखे पर कभी मेरा नाम लिखा जो मैं लिखता। अरे, तुम तो मेरे पर एक हास्य कविता तक नहीं लिख पाये।’

मैंने आखिर उससे पूछा-‘पर तुमने अभी कुछ देर पहले ही कहा था कि‘तुम पर व्यंग्य लिखा है।’

वह अपनी पत्रिका को कसकर पकड़ते हुए मेरे से दूर हो गया और बोला-‘तब मुझे पता नहीं था कि व्यंग्य भी विज्ञापनों करने के लिये लिखे जाते हैं।’
फिर वह रुका नहीं। उसके जाने के बाद मैंने आसमान में देखा। उस बिचारे को क्या दोष दूं। मैं भी तो यही करता हूं। किसी का नाम नहीं देखा। इशारा कर देता हूं। हालत यह हो जाती है कि एक नहीं चार-चार लोग कहने लगते हैं कि हम पर लिखा है। किसी ने संपर्क किया ही नहीं जो मैं उन पर व्यंग्य लिखकर प्रचार करता। अगर किसी का नाम लिखकर व्यंग्य दूं तो वह उसका दो तरह से उपयोग कर सकता है। एक तो वह अपनी सफाई में तमाम तरह की बातें कहेगा और फिर अपने चेलों को मुझ पर शब्दिक आक्रमण करने के लिये उकसायेगा। कुल मिलाकर वह उसका प्रचार करेगा। इसी आशंका के कारण मैं किसी ऐसे व्यक्ति का नाम नहीं देता जो इसका लाभ उठा सके। वह मुझे इसी चालाकी की सजा दे गया।
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17 अगस्त 2008

रहीम के दोहे:कटहल कभी राई के सामान छोटा नहीं दिखाई देता

बड़े पेट के भरन को, है रहीम देख बाढि
यातें हाथी हहरि कै, दया दांत द्वे काढि

कविवर रहीम कहते हैं कि जो आदमी बड़ा है वह अपना दुख अधिक दिन तक नहीं छिपा सकता क्योंकि उसकी संपन्नता लोगों ने देखी होती है जब उसके रहन सहन में गिरावट आ जाती है तब लोगों को उसके दुख का पता लग जाता है। हाथी के दो दांत इसलिये बाहर निकल आये क्योंकि वह अपनी भूख सहन नहीं कर पाया।

बड़े बड़ाई नहिं तजैं, लघु रहीम इतराइ
राइ करौंदा होत है, कटहर होत न राइ

कविवर रहीम कहते हैं कि बड़े आदमी कभी अपने मुख से स्वयं अपनी बड़ाई नहीं करते जबकि छोटे लोग अहंकार दिखाते है। करौंदा पहले राई की तरह छोटा दिखाई देता है परंतु कटहल कभी भी राई के समान छोटा नजर नहीं आता।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-कहा जाता है कि धनाढ्य व्यक्ति इतना अहंकार नहीं दिखाता जितना नव धनाढ्य दिखाते हैं। होता यह है कि जो पहले से ही धनाढ्य हैं उनको स्वाभाविक रूप से समाज में सम्मान प्राप्त होता है जबकि नव धनाढ्य उससे वंचित होते हैं इसलिये वह अपना बखान कर अपनी प्रभुता का बखान करते हैं और अपनी संपत्ति को उपयोग इस तरह करते हैं जैसे कि किसी अन्य के पास न हो।

वैसे बड़ा आदमी तो उसी को ही माना जाता है कि जिसका आचरण समाज के हित श्रेयस्कर हो। इसके अलावा वह दूसरों की सहायता करता हो। लोग हृदय से उसी का सम्मान करते हैं जो उनके काम आता है पर धन, पद और बाहुबल से संपन्न लोगों को दिखावटी सम्मान भी मिल जाता है और वह उसे पाकर अहंकार में आ जाते हैं। आज तो सभी जगह यह हालत है कि धन और समाज के शिखर पर जो लोग बैठे हैं वह बौने चरित्र के हैं। वह इस योग्य नहीं है कि उस मायावी शिखर पर बैठें पर जब उस पर विराजमान होते हैं तो अपनी शक्ति का अहंकार उन्हें हो ही जाता है। जिन लोगों का चरित्र और व्यवसाय ईमानदारी का है वह कहीं भी पहुंच जायें उनको अहंकार नहीं आता क्योंकि उनको अपने गुणों के कारण वैसे भी सब जगह सम्मान मिलता है।
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28 जून 2008

रहीम के दोहे:कष्ट के समय बुरे वचन भी सहन करने पड़ते हैं


समय परे ओछे बचन, सब के सहे रहीम
सभा दुसासन पट गहे, गदा लिए रहे भीम


कविवर रहीम कहते हैं कि बुरा समय आने पर तुच्छ और नीच वचनों का सहना करना पड़ा। जैसे भरी सभा में देशासन ने द्रोपदी का चीर हरण किया और शक्तिशाली भीम अपनी गदा हाथ में लिए रहे पर द्रोपदी की रक्षा नहीं कर सके।

समय पाय फल होत है, समय पाय झरि जाय
सदा रहे नहिं एक सौ, का रहीम पछिताय


कविवर रहीम कहते हैं कि समय आने पर अपने अच्छे कर्मों के फल की प्राप्ति अवश्य होती है। वह सदा कभी एक जैसा नहीं रहता इसीलिये कभी बुरा समय आता है तो भयभीत या परेशान होने की आवश्यकता नहीं है।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-जीवन में सभी के पास कभी न कभी अच्छा समय आता है ऐसे में अपना काम करते रहने के अलावा और कोई चारा नहीं है। आजकल लोग जीवन में बहुत जल्दी सफलता हासिल करने को बहुत आतुर रहते हैं और कुछ को मिल भी जाती है पर सभी के लिये यह संभव नहीं है।
कई लोग जल्दी सफलता हासिल करने के लिये ऐसे मार्ग पर चले जाते हैं वहां उन्हें शुरूआत में बहुत अच्छा लगता है पर बाद में वह पछताते है।


यह सही है कि कुछ लोगों के लिये जीवन का संघर्ष बहुत लंबा होता है पर उन्हें अपना धीरज नहीं खोना चाहिए। कई बार ऐसा लगता है कि हमें जीवन में किसी क्षेत्र मे सफलता नहीं मिलेगी पर सत्य तो यह है कि आदमी को अपने अच्छे कर्मों का फल एक दिन अवश्य मिलता है।

7 जून 2008

आज के गुरु-शिष्य प्राचीन काल जैसे नहीं-आलेख



भगवान श्रीराम ने गुरु वसिष्ठ से शिक्षा प्राप्त की और एक बार वहाँ से निकले तो फिर चल पड़े अपने जीवन पथ पर। फिर विश्वामित्र का सानिध्य प्राप्त किया और उनसे अनेक प्रकार का ज्ञान प्राप्त किया। फिर उन्होने अपना जीवन समाज के हित में लगा दिया न कि केवल गुरु के आश्रमों के चक्कर काटकर उसे व्यर्थ किया। भगवान श्री कृष्ण ने भी महर्षि संदीपनि से शिक्षा पाई और फिर धर्म की स्थापना के लिए उतरे तो वह कर दिखाया। न गुरु ने उन्हें अपने पास बाँध कर रखा न ही उन्होने हर ख़ास अवसर पर जाकर उनंके आश्रम पर कोई पिकनिक नहीं मनाई। अर्जुन ने अपने गुरु से शिक्षा पाई और अवसर आने पर अपने ही गुरु को परास्त भी किया। आशय यह है कि इस देश में गुरु-शिष्य की परंपरा ऐसी है जिसमें गुरु अपने शिष्य को अपना ज्ञान देकर विदा करता है और जब तक शिष्य उसके सानिध्य में है उसकी सेवा करता है। उसके बाद चल पड्ता है अपने जीवन पथ पर और अपने गुरु का नाम रोशन करता है।

भारत की इसी प्राचीनतम गुरु-शिष्य परंपरा का बखान करने वाले गुरु आज अपने शिष्यों को उस समय गुरु दीक्षा देते हैं जब उसकी शिक्षा प्राप्त करने की आयु निकल चुकी होती है और फिर उसे हर ख़ास मौके पर अपने दर्शन करने के लिए प्रेरित करते हैं। कई तथाकथित गुरु पूरे साल भर तमाम तरह के पर्वों के साथ अपने जन्मदिन भी मनाते हैं और उस पर अपने इर्द-गिर्द शिष्यों की भीड़ जमा कर अपनी आध्यात्मिक शक्ति का प्रदर्शन करते हैं. यहाँ इस बात का उल्लेख करना गलत नहीं होगा की भारतीय जीवन दर्शन में जन्मदिन मनाने की कोई ऐसी परंपरा नहीं है जिसका पालन यह लोग कर रहे हैं.

भारत में गुरु शिष्य की परंपरा एक बहुत रोमांचित करने वाली बात है, पूरे विश्व में इसकी गाथा गाई जाती है पर आजकल इसका दोहन कुछ धर्मचार्य अपने भक्तो का भावनात्मक शोषण कर रहे हैं वह उसका प्रतीक बिल्कुल नहीं है। हर व्यक्ति को जीवन में गुरु की आवश्यकता होती है और खासतौर से उस समय जब जीवन के शुरूआती दौर में एक छात्र होता है। अब गुरुकुल तो हैं नहीं और अँग्रेज़ी पद्धति पर आधारित शिक्षा में गुरु की शिक्षा केवल एक ही विषय तक सीमित रह गयी है-जैसे हिन्दी अँग्रेज़ी, इतिहास, भूगोल, विज्ञानआदि। शिक्षा के समय ही आदमी को चरित्र और जीवन के गूढ रहस्यों का ज्ञान दिया जाना चाहिए। यह देश के लोगों के खून में ही है कि आज के कुछ शिक्षक इसके बावजूद अपने विषयों से हटकर शिष्यों को गाहे-बगाहे अपनी तरफ से कई बार जीवन के संबंध में ज्ञान देते हैं पर उसे औपचारिक मान कर अनेक छात्र अनदेखा करते हैं पर कुछ समझदार छात्र उसे धारण भी करते हैं.

यही कारण है कि आज अपने विषयक ज्ञान में प्रवीण तो बहुत लोग हैं पर आचरण, नैतिकता और आध्यात्म ज्ञान की लोगों में कमी पाई जाती है। इस वजह से लोगों के दिमाग में तनाव होता है और उसको उससे मुक्ति दिलाने के लिए धर्मगुरू आगे आ जाते हैं। आज इस समय देश में धर्म गुरु कितने हैं और उनकी शक्ति किस तरह राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक क्षेत्र में फैली है यह बताने की ज़रूरत नहीं है। तमाम तरह के आयोजनों में आप भीड़ देखिए। कितनी भारी संख्या में लोग जाते हैं। इस पर एक प्रख्यात लेखक जो बहुत समय तक प्रगतिशील विचारधारा से जुडे थे का मैने एक लेख पढ़ा था तो उसमें उन्होने कहा था की ''हम इन धर्म गुरुओं की कितनी भी आलोचना करें पर यह एक वास्तविकता है कि वह कुछ देर के लिए अपने प्रवचनों से तनाव झेल रहे लोगों को मुक्त कर देते हैं।''

मतलब किसी धार्मिक विचारधारा के एकदम विरोधी उन जैसे लेखक को भी इनमें एक गुण नज़र आया। यह आज से पाँच छ:: वर्ष पूर्व मैने आलेख पढ़ा था और मुझे ताज्जुब हुआ-मेरा मानना था कि उन लेखक महोदय ने अगर भारतीय आध्यात्म का अध्ययन किया होता तो उनको पता लगता कि भारतीय आध्यात्म में वह अद्वितीय शक्ति है जिसके थोड़े से स्पर्श में ही आदमी का मन प्रूफुल्लित हो जाता है। मगर वह कुछ देर के लिए ही फिर निरंतर अभ्यास नो होने से फिर तनाव में आ जाते हैं।

एक बात बिल्कुल दावे के साथ मैं कहता हूँ कि अगर किसी व्यक्ति में बचपन से ही आध्यात्म के बीज नहीं बोए गये तो उमरभर उसमें आ नहीं सकते और जिसमें आ गये उसका कोई धर्म के नाम पर शोषण नहीं कर सकता। मैं स्वयं ही इस बात का उदाहरण देता हूँ। तमाम तरह के आध्यात्म ग्रंथ मैने बचपन में ही पढ़े और आज भी बड़ी रूचि के साथ पढ्ता हूँ। जब मेरी उम्र आठ साल थी तबा पडोस में रहने वाले एक पन्डित जी की बहू से मेरी माताजी ने पढ़ने के लिए तुलसीदास जी की श्री राम चरितमानस ली थी। मैं भी उसे पढ़ने लगा। मैने उसे धार्मिक भावना से नहीं कहानी की दृष्टि से पढ़ा। उसे कई बार पढ़ा। एक दिन पन्डित जी ने अपनी बहू से वह माँगी तो उसने उनको बताया की ''वह पडोस का लड्का है न वह उसे पढता है।''
उन्होने मुझे बुलाया और कहा'जब पढ़ लो तो वापस कर देना, पर इसको आदर से रखना। तुम इससे बहुत कुछ सीखोगे।''

फिर कभी उन्होने वह मुझसे वापस नहीं माँगी और जब हमने वह मकान खाली किया तब मैं उनको वापस कर आया, पर तब तक मेरे अंदर वह बीज अनुकुरित हो चुका था जिसकी कल्पना भी मैंने नहीं की थी। फिर तो मैने वाल्मीकि रामायण को पढ़ना शुरू किया और अपने जेब खर्च से मैं वह सब धार्मिक किताबें ले आया जो भारतीय अध्यात्म का आधार स्तंभ हैं। आज जब मैं किसी आध्यात्म विषय पर लिखता या बोलता हूँ तो अधिकतर लोग विद्वान होने का अहसास पाल लेते हैं। अब यह मैं नहीं जानता की ऐसा है कि नहीं पर मुझे अपने तर्क भी गढने की आदत भी है और में भी कभी-कभी ऐसे सत्संगों में जाता हूँ पर कुछ नया सुनने से अधिक कोई विचार नहीं आता. कभी-कभी तो ऐसा लगता है कि इतना ज्ञान तो मैं किताबों में पड़ चुका हूँ पर फिर भी वहाँ जाना मुझे अच्छा लगता है। इसलिए जब आज कल के तथाकथित बाबा लोग भारत के प्राचीनतम परंपरा के महिमा की बात करते हैं तो ऐसा लगता है की कोई ग्राहकों का समूह उनके सामने खड़ा है जिसे वह भारतीय आध्यात्म- जिसका कोई पेटेंट नहीं है- उसे बेच रहे हैं। वह हमेशा ही शिष्य को सिखाते रहते हैं और वह सीखता नहीं है और हर ख़ास मौके पर उनके दर्शन करने चला जाता है और वहाँ हर कोई अपनी सामर्थ्य के अनुसार भेंट अपने धर्म का पालन करता है जिसका भारत की प्राचीन गुरु-परंपरा से कोई लेना-देना हो मुझे नहीं लगता। एक बात अपने निष्कर्ष के तौर पर कहना चाहता हूँ कि आज के तथाकथित गुरुओं को एकलव्य जैसा शिष्य चाहिऐ जो उनको आज के युग में अपना अंगूठा काटकर न भेंट करे-क्योंकि उससे उनकी आश्रम फाईव स्टार आश्रमों थोडे ही बन पायेगा- बल्कि दूसरों को अंगूठा दिखाकर जुटाए पैसे से उनको भेंट दे पर अर्जुन जैसा शिष्य नहीं चाहिए जो दुष्कर्म करने वालों का समर्थन करने पर उनका प्रतिवाद करे। इन संतो और भक्तों को पुरानी गुरु-शिष्य परंपरा का प्रतीक नहीं है भले ही कितना भी बखान कर लें. (क्रमश:)

31 मई 2008

गांधीवाद,गांधीगिरी और गांधीमार्ग-आलेख

गांधीगिरी, गांधीवाद और गांधी मार्ग या विचारधारा तीनों शब्दों का अर्थ भले ही एक जैसे लगते है पर मेरी दृष्टि में में इनका भावार्थ एक नहीं है। हो सकता है कि कुछ लोग मुझे रूढ़ समझें पर विशुद्ध रूप से हिन्दी क्षेत्र का होने के कारण हर शब्द का अर्थ और भाव मेरे स्मृति पटल में इस तरह अंकित है कि हिन्दी भाषा के हर शब्द का अर्थ और भाव मेरे लिये सहज हो गया और मुझे किसी भी शब्द का भावार्थ समझने में कठिनाई नहीं होती ।

जब भी हिन्दी भाषा में किसी संज्ञा के साथ गिरी शब्द जुड़ता है तो वह उसके अर्थ के साथ उसके भाव और महत्त्व को कम करता है। दूसरे शब्दों में कहें कि यह उसे निम्नकोटि का भावार्थ प्रदान करता है। मैं किसी काम को लघु नहीं मानता क्योंकि अपने पेट के लिये रोजगार अर्जित करने के लिये कोई निम्न व्यसाय करने से निम्न नहीं होता है और हमारे देश में तो कई ऐसे संत हुए हैं जिन्होंने इन्हीं निम्न व्यसायों से जुडे होने के बावजूद देश के आध्यात्म को ऐसी दिशा दी जिसके कारण देश आज विश्व्गुरु कहलाता है-पांडवों को भी अपने अज्ञातवास के दौरान निम्नकोटि के काम करना पड़े थे।

यहां इस चर्चा का उद्देश्य केवल भाषा और भाव का है। गिरी शब्द महत्वहीन व्यवसायों और संज्ञाओं में जोडा जाता है और कभी-कभी तो किसी नकारात्मक शब्द को प्रभावी बनाने के लिए भी इसका इस्तेमाल होता है-जैसे उठाईगिरी, दादागिरी और गुंडागिरी। आजकल दो शब्द बहुत शब्द प्रचलित हैं जैसे चमचागिरी और नेतागिरी और इनका उच्चारण कोई उनका महत्व प्रतिपादित करना नहीं होता बल्कि किसी का मजाक उडाने के लिए भी किया जाता है। आपने कभी शिक्षकगिरी , चिकित्सकगिरी , व्यापारीगिरी और अधिकारीगिरी जैसे शब्द नहीं सुने होंगे। तात्पर्य यह है कि यह केवल किसी संज्ञा के मह्त्व को कम प्रदर्शित करता है। ऐसे में गांधी जी के आदर्शों को मानने वाला मुझ जैसा हिन्दीभाषी क्षेत्र का शख्स अपने आपको असहज अनुभव करता है।

अब गांधीवाद शब्द की चर्चा करें। वाद या नारे तो केवल लोगों को यह बताने के लिये हैं कि हम उनके अनुगामी हैं और उनके बारे में हम अधिक जानते हैं इसलिए हम जो कहते हैं वही मानो। अगर आप किसी भी वाद या नारे पर चलने वाले बुद्धिजीवी से उसका स्वरूप पूछें तो सब केवल रटे-रटाए नारे लगाने वाली बात कहेंगे। गरीबों और शोषितों को उठाना, महिलाओं को सम्मान दिलाना और जन कल्याण करना। सो इस पर बात अधिक क्या कहें । इन नारों और वाद पर मैं पहले भी बहुत कुछ लिख चुका हूं।
गांधी विचार या गांधी दर्शन शब्द से मेरा मन प्रुफ़ुल्लित हो जाता है। इस शब्द का प्रयोग जो व्यक्ति करता है उसके बारे में यही सोच हमारे मन में आता है यह वाकई उनके बारे में जानता है। गांधी जी ने ऐसा चरित्र जिया है जिस पर जितना भी लिख जाये कम है। उन्होने कोई अभिनय नहीं किया और न कोई ऐसा अभिनेता इस देश में हुआ कि उनके चरित्र को जी सके। हमारे देश के कुछ लोग वालीवुड का बहुत शोर मचाते हैं पर गांधीजी पर फ़िल्म बनाने वाला और उनका चरित्र निभाने वाला दोनों विदेशी थे। मतलब साफ़ है कि इस देश में उनके वाद पर बहुत चले पर दर्शन किसी ने नहीं अपनाया और ऐसा करते तो तब जब समझ में आता।

हाल में एक फ़िल्म बनी जिसमें एक अभिनेता ने गांधीगिरी की और गांधीजी के कुछ भक्त बहुत प्रसन्न हो गये। भाई लोगों को पता नहीं कि भाषा का शब्द, अर्थ और उसका भाव बहुत महत्वपूर्ण होता है। गांधीगिरी शब्द का भाव पहले समझो। इस देश की अधिकतर जनता गांव में रह्ती है वह कभी इसे उस भाव से नहीं लेगी जो तथाकथित गांधीवादी समझ रहे हैं। उन्हें यह समझ लेना चाहिये कि हिन्दी क्षेत्रों में गिरी शब्द उसका महत्व कम करने के साथ उसको हास्याभिव्यक्ति भी प्रदान करता है। फ़िर मुंबई को छोड़कर आप किसी भी हिन्दी भाषी क्षेत्र में चले जायें वहां हिन्दी ऐसी नहीं है जैसी वालीवुड की है। उनके फ़िल्मों से हिन्दी का प्रचार तो हो सकता है पर लोग वैसी बोलते नहीं है जैसी उसमें देखते और सुनते हैं।फिल्मों ने देश के चरित्र पर दुष्प्रभाव डाला है पर भाषा अभी बची हुई है। अगर इसी तरह बंबईया फिल्मों की भाषा को आम बोलचाल में अपनाते रहे तो उसे भी हानि पहुंचा सकते हैं.
इस सबके विश्लेषण के साथ मेरा तो यही कहना है कि मैं हमेशा गांधी मार्ग या उनके दर्शन पर चलने के लिये ही कहूंगा क्योंकि गांधिगिरी शब्द मुझे असहज कर देता है और अपने जीवन में कभी भी उसका उच्चारण नहीं कर सकता। हो सकता है मैं गलत हूं पर क्या करूं मैने हिन्दी को जिस रूप में पढा है उसके आधार पर मेरी यह समझ बनी है हालांकि मैं यह दावा भी नहीं करता की मैं एक दम सही हूँ। हिन्दी भाषा में इतनी विशेषज्ञता नहीं है कि ऐसा दावा कर सकूं

लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप

18 अप्रैल 2008

समाज तो होता है एक भ्रम-चिंतन

समाज को बांटकर विकास करने का सिद्धांत मुझे कभी नहीं सुहाता। मुझे उकताहट होती है जब कोई आदमी अपनी जाति, भाषा, धर्म, प्रदेश और या कुल के नाम अपना परिचय देकर अहंकार या कुंठा प्रदर्शित करते हैं। मेरा मानना है कि यह सब उन लोगों को कहना पड़ता है जो अपने अंदर केवल कमाने और खाने के अलावा कोई योग्यता नहीं रखते। वैसे कोई आदमी किसी का सगा नहीं होता। यहां तक कि जब अपने परिवार पर संकट होता है तो पहले अपने को बचाने का प्रयास करता है। अगर वह किसी समूह या वर्ग के होने का दावा करता है तो इसका आशय यह है कि उसका लाभ उठाना चाहता है अगर कहीं से उसे लगता है कि उसके वर्ग या समूह की हानि से उसे भी परेशानी होगी तो वह उसके साथ हो जाता है। इसके विपरीत अगर उसे लगता है कि मदद नहीं करने से व्यक्तिगत हानि होगी तो वह दूर भागता है और अगर हानि लाभ की संभावना से परे हो तो वह मूंह भी फेर लेता है।

मतलब यह कि व्यक्तियों द्वारा समूहों और वर्गों के जुड़े होना भी एक भ्रम है। मै किसी प्रकार के नारों और वाद पर चर्चा नहीं करता क्योंकि उनमें कोई को गहन विचार नहीं होता। कुछ अनुमान और कल्पनाएं दिखाकर ऐसे नारे और वाद प्रतिपादित किये जाते हैं जिनका प्रयोजन उन समूहों और वर्गो के लोगों को एकत्रित कर अपने लिये आर्थिक और सामाजिक श्रीवृद्धि के साधन जुटायें जायें। हर समूह या वर्ग के शीर्षस्थ लोग कथित रूप से बड़े होने का स्वांग कर कल्याण और विकास का नारा देते हैं। मैंने कई बार देखा है और कई बार ठगा जाता हूं। कई बार तो ऐसा भी लगा है कि जिस समूह या वर्ग से जुड़ा बताकर कोई बड़ा आदमी मेरे कल्याण की बात कर मुझे अपने साथ जुड़ने को प्रेरित कर रहा है तो यह जानते हुए भी कि वह ढोंग कर रहा है तब भी उसकी बात दिखाने के लिये मान लेता हूं। सोचता हूं कि यार, आदमी को समूह या वर्ग से जुड़ा होना चाहिए क्योंकि सब लोग एसा ही करते हैं। मनुष्य ही सामजिक प्राणी है और असामाजिक भी। ऐसे में अपने समूह या वर्ग से अलग किसी समूह या वर्ग के व्यक्ति से कोई वाद-विवाद हुआ तो उसमें मेरे लोग ही मेरे काम आयेंगे-यही भ्रम पालकर खामोश हो जाता हूं। भरोसा नहीं है कि मेरे समूह या वर्ग के बड़े लोग मेरे किसी काम आयेंगे इसलिये किसी से वाद-विवाद भी नही करता पर फिर भी सच नहीं कहता और भीड़ में भेड़ की तरह शामिल हो जाता हूं।

यह मेरा अकेले का सच नहीं है बल्कि सब लोग यही कर रहे हैं। अपने अंदर एक अनजाना खौफ है जो शुरू से आदमी में जाति,भाषा,धर्म और क्षेत्र के नाम पर बने समूहों और वर्गों में उसे बने रहने के लिये प्रेरित करता है जो सामान्य लोगों के सहयोग से कुछ कथित लोगों को बड़ा आदमी बना देते हैं और उनका जीवन भर उनका शोषण करते हैं। इस देश में पहले भी ऐसा ही हुआ अब भी हो रहा है। सत्य सब जानते हैं कि कोई भी किसी का नहीं है पर फिर भी भ्रम का साथ देते हैं।

14 अप्रैल 2008

क्रिकेट से अपनी भावनाएं जोड़ना अब व्यर्थ

कानपुर में कल खत्म तीसरे टेस्ट मैच को देखकर तो ऐसा लगता है कि खिलाड़ी अब पांच दिवसीय मैचों में भी ट्वंटी-ट्वंटी जैसा खेलने चाहते हैं। पिच बहुत खराब थी या उस पर खेला नहीं जा सकता है यह केवल एक प्रचार ही लगता है। इसी पिच पर लक्ष्मण और गांगुली जमकर खेले और शायद इसलिये कि उनको अब इसका आभास हो गया है कि ट्वंटी-ट्वंटी के चक्क्र में रहे तो इससे भी जायेंगे। बाकी खिलाडी तो इसी चक्कर में है कि अब ट्वंटी-ट्वंटी का समय आ रहा है और उसके लिये इन्हीं टेस्ट मैचों में ही प्रयास किये जायें तो अच्छा है। चाहे कितनी भी सफाई दी जाये पर तीन दिन मे चार परियों का होना इस बात का प्रमाण है कि खिलाडि़यों में अब पिच पर टिक कर बल्लेबाजी करने की धीरज समाप्त हो गया है।

मैने यह मैच नहीं देखा। कल ऐसा लगा रहा कि भारत जीत रहा है तब काम से चला गया। जिस तरह राहुल द्रविड़ और गांगुली को खेलते देखा तो यह लगा कि पिच कैसी भी हो बल्लेबाज पर भी बहुत कुछ निर्भर होता है। संभव है कि अब ट्वंटी-ट्वंटी की जो प्रतियोगिता हो रही है उसके लिये कुछ खिलाड़ी तैयारी कर रहे हों और जिनको वहां पैसा कमाने का अवसर नहीं मिला हो वह इस प्रयास में रहे हो कि ट्वंटी-ट्वंटी के किसी प्रायोजक की नजर उस पर पड़ जाये। भारत जीत गया इससे कुछ लोगों को बहुत तसल्ली हो गयी होगी क्योंकि पिछले टेस्ट मैच में कुछ लोग भारत की हार पर रुआंसे हो गये होंगे। कुछ मिलाकर अब क्रिकेट के प्रशंसकों के दायरा सिमट रहा है और मुझे नहीं लगता कि इसकी किसी को फिक्र है। राष्ट्रीय भावना को इस खेल से जोड़ने का कोई मतलब नहीं रहा क्योंकि अब तो विदेशी खिलाड़ी भी इसमें कुछ देश के खिलाडियों के साथ मिलकर अपनी टीमों का मोर्चा संभालेंगे। भारत के संवेदनशील लोगों को यह गवारा नहीं होगा पर यह भी सच है कि आर्थिक उदारीकरण के इस युग में यह सब तो चलता रहेगा।

1983 में विश्व कप जीतने पर ही भारत में एकदिवसीय क्रिकेट मैच लोकप्रिय हुए थे और उसका कारण था कि लोगों में राष्ट्रप्रेम का भाव जाग उठा था। अब भले ही क्रिकेट में पैसा अधिक हो गया है पर उसका जो नया रूप सामने आ रहा है उसे देखते हुए उसमें ऐसी कोई भावना रखना अपने आपको धोखा देना होगा। हम जैसे लोगों के लिये तो अब भावनात्मक रूप से इस खेल में जुड़ना मुश्किल है जो हर बात में कुछ रोमांच तो चाहते हैं पर उसके साथ अपने क्षेत्र, प्रदेश और राष्ट्र की भावना की संतुष्टि चाहते हैं। अब तो इस खेल के साथ वही लोग जुड़ेंगे जो शुद्ध रूप से मनोरंजन तथा आर्थिक फायदे चाहते हैं।

रामनवमी:राम से भी बड़ा है राम का नाम

भारतीय अध्यात्म में भगवान श्रीराम के स्थान को कौन नहीं जानता? आज रामनवमी है और हर भारतीय के मन में उनके प्रति जो श्रद्धा है उसको प्रकट रूप में देख सकते है। आस्था और विश्वास के प्रतीक के रूप में भगवान श्रीराम की जो छवि है वह अद्वितीय है पर उनके जीवन चरित्र को लेकर आए दिन जो वाद-विवाद होते हैं और मैं उनमें उभयपक्षीय तर्क देखता हूं तो मुझे हंसी आती है। वैसे देखा जाये तो भगवान श्रीराम जी ने अपने जीवन का उद्देश्य अधर्म का नाश कर धर्म की स्थापना करना बताया पर उससे उनका आशय यह था कि आम इंसान शांति के साथ जीवन व्यतीत कर सके और तथा भगवान की भक्ति कर सके। उन्होंने न तो किसी प्रकार के धर्म का नामकरण किया और न ही किसी विशेष प्रकार की भक्ति का प्रचार किया।

मेरा यह आलेख किश्तों में आएगा इसलिये यह बता दूं कि मैं बाल्मीकि रामायण के आधार पर ही लिखने वाला हूं। मैं अपनी बुद्धि और विवेक से अपने वह तर्क रखूंगा जो भगवान श्रीराम के जीवन चरित्र के अध्ययन से मेरे दिमाग में आते हैं। मेरा मौलिक चिंतन है और भगवान श्रीराम के चरित्र की व्याख्या करने वालों के मैं कई बार अपने को अलग अनुभव करता हूं। मैने अपने स्कूल की किताबें और बाल्मीकि रामायण की पढ़ाई एक साथ शुरू की और मेरे लेखक बन जाने का कारण भी यही रहा। शायद इसलिये जब मै भगवान श्रीराम के बारे में कई बार किसी की कथा सुनता हूं तो मुझे लगता है कि लोगों का भटकाया जा रहा है। कथा इस तरह होती है कि सुनाने वाला अपना अधिक महत्व प्रतिपादित करता है और उसमें भगवान श्रीराम के प्रति भक्ति कम दृष्टिगोचर होती है। शायद यही वजह है कि भगवान श्रीराम के चरित्र की आलोचना करने वाले लोगों का वह सही ढंग से मुकाबला नहीं कर पाते। कभी तो इस बात की अनुभूति होती है कि श्रीराम के जीवन चरित्र सुनाने वाले भी उसके बारे में किताबी ज्ञान तो रखते हैं पर मन में भक्ति नहीं होती उनका उद्देश्य कथा कर अपना उदरपूति करना होता है।

कई बार मेरे सामने ऐसा भी होता है कि जब भगवान श्रीराम के चरित्र की व्याख्या जब अपने मौलिक ढंग से करता हूं तो लोग प्रतिवाद करते हैं कि ऐसा नहीं वैसा। वह तो भगवान थे-आदि। कुल मिलाकर मनुष्य के रूप में की गयी लीला को भी लोग भगवान का ही सामथर््य मानते है। लोग अपने को विश्वास अधिक दिलाना चाहते हैं कि वह भगवान श्रीराम के भक्त हैं न कि विश्वास के साथ भक्ति करते हैं। अगर देखा जाय तो भक्ति का चरम शिखर अगर किसी ने प्राप्त किया है तो उनके सबसे बड़ा नाम संत कबीर और तुलसीदासजी का है-इस क्रम में मीरा और सूर भी आते हैं। ज्ञानियों में चरम शिखर के प्रतीक हम बाल्मीकि और वेदव्यास को मान सकते हैं। भगवान को पाने के दोनों मार्ग- भक्ति और ज्ञान- हैं। भगवान को दोनों ही प्रिय हैं पर ज्ञान के बारे में लोगों का मानना है कि भक्ति मार्ग मे रुकावट डालता है और जो आदमी भक्ति करता है और जब वह चरम पर पहुंचता है तो वह भी महाज्ञानी हो जाता है। बाल्मीकि और वेदव्यास ने ज्ञान मार्ग को चुना तो वह समाज को ऐसी रचनाएं दे गये कि सदियों तक उनकी चमक फीकी नहीं पड़ सकती और कबीर, तुलसी, सूर, और मीरा ने भक्ति का सर्वोच्च शिखर छूकर यह दिखा दिया है कि इस कलियुग में भी भगवान भक्ति में कितनी शक्ति है। किसी की किसी से तुलना नहीं हो सकती पर संत कबीर जी ने तो कमाल ही कर दिया। उन्होंने अपनी रचनाओं में भक्ति और ज्ञान दोनों का समावेश इस तरह किया कि वर्तमान समय में एसा कोई कर सकता है यह सोचना भी कठिन है और यहीं से शुरू होते हैं विवाद क्योंकि लोग कबीर की तरह प्रसिद्ध तो होना चाहते हैं पर हो नहीं सकते इसलिये उनके इष्ट भगवान श्रीराम के जीवन चरित्र पर टिप्पणियां करने लगते हैं।

राम से बड़ा है राम का नाम। मतलब यह कि इस देश में राम से बड़ा तो कोई हो नहीं सकता पर आदमी में हवस होती है कि वह अपने मरने के बाद भी पुजता रहे और जब तक राम का नाम लोगों के हृदय पटल पर अंकित है तब तक अन्य कोई पुज नहीं सकता। गरीबी, बेकारी और तंगहाली गुजारते हुए इस देश में राम की महिमा अब भी गाई जाती है यह कई लोगों का स्वीकार्य नहीं है। इसलिये वह अनेक तरह के ऐसे विवाद खड़े करते हैं कि लोगों का ध्यान उनकी ओर आकर्षित हो। इसलिये कई तरह के स्वांग रचते हैं। रामायण से कुछ अंश लाकर उसका नकारात्मक प्रचार करना, विदेशी पुस्तकों से उद्धरण लेकर अपने आपको आधुनिक साबित करना और उससे भी काम न बने तो वेदों से अप्रासंगिक हो चुके श्लोकांे का सामने लाकर पूरे हिंदू समाज पर प्रहार करना।


कहा जाता है कि श्रीगीता में चारों वेदों का सार है इसका मतलब यह कि जो उसमें नहीं है उस पर पुनर्विचार किया जा सकता है-वेदों की आलोचना करने वालों को यह मेरा संक्षिप्त उत्तर है और इस पर भी मैं अलग से लिखता रहूंगा। विदेशी पुस्तकों से उद्धरण लेकर यहां विद्वता दिखाने वालों को भी बता दूं कि संस्कृत और हिंदी के साथ देशी भाषाओं में जीवन के सत्य को जिस तरह उद्घाटित किया गया उसके चलते इस देश को विदेश से ज्ञान अर्जित करने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि अधिकतर विदेशी ज्ञान माया के इर्दगिर्द केंद्रित है इसलिए भी उनको महत्व नहीं मिलने वाला।

अब आता है रामायण या रामचरित मानस से अंश लेकर आलोचना करने वालों के सवाल का जवाब देने का तो ऐसे लोग अपने अधिकतर उद्धरण-जिसमें शंबुक वध और सीता का वनगमन आदि है- वह उत्तर रामायण से ही ले आते हैं जिसके बारे में अनेक विद्वान कहते हैं कि वह मूल रामायण का भाग नहीं लगता क्योंकि उसमें जो भाषा शैली वह भिन्न है और उसे किन्हीं अन्य विद्वानों ने जोड़ा है। अगर आप कहीं श्रीराम कथा को देखें तो वह अधिकतर भगवान श्रीराम के अभिषेक तक ही होती है-इससे ऐसा लगता है कि यह मसला बहुत समय से विवादास्पद रहा है। मुझे जिन लोगों ने रामायण और रामचरित मानस पढ़ते देखा वह भी मुझे उत्तर रामायण न पड़ने की सलाह दे गये। इसका आशय यह है कि मैं उत्तर वाले भाग पर कोई विचार नहीं बना पाता।
अब आते हैं मूल रामायण के उस भाग पर जिसमें इस पूरे संसार के लिये ज्ञान और भक्ति का खजाना है। शर्त यही है कि श्रद्धा और विश्वास से प्रातः उठकर स्वयं उसका अध्ययन, मनन, और चिंतन करो-किसी एक प्रक्रिया से काम नहीं चलने वाला। यह आलेख लंबा जरूर हो रहा है पर इसकी जरूरत मुझे अनुभव इसलिये हो रही है कि आगे जब संक्षिप्त चर्चा करूंगा तो उसमें मुझे इनको दोहराने की आवश्यकता नहीं होगी। अगर सब ठीकठाक रहा तो मैं उस हर तर्क को ध्यस्त कर दूंगा जो श्रीराम के विरोधी देते है।

उस दिन गैर हिंदू घार्मिक टीवी पर एक गैरहिंदू विद्वान तमाम तरह के कुतर्क दे रहा था। मैने हिंदी फोरम पर एक ब्लाग देखा जिसमें उसके उन तर्को पर गुस्सा जाहिर किया गया। उसमें यह भी बताया गया कि उन महाशय ने इंटरनेट पर भी तमाम उल्टीसीधी चीजें रख छोड़ीं है। उसने कहीं किसी हिंदू विद्वान से बहस की होगी। वहंा भी झगड़ा हुआ। मैं उस गैरहिंदू विद्वान का नाम नहीं लिखूंगा क्योंकि एक तो उसका नाम लिखने से वह मशहूर हो जायेगा दूसरे उसके तर्क काटने के लिये मेरे पास ठोस तर्क हैं। एक बात तय रही बाल्मीकि रामायण और श्रीगीता से बाहर दुनियां का कोई सत्य नहीं है और अगर कोई उनके बारे में दुष्प्रचार कर रहा है तो वह मूर्ख है और जो उसका तर्क की बजाय गुस्से से मुकाबला करना चाहता है वह अज्ञानी है। मुझे अपने बारे में नहीं पता पर मैं जो भी लिखूंगा इन्हीं महान ग्रंथों से ग्रहण किया होगा और अपनी विद्वता सिद्ध करने का मोह मैने कभी नहीं पाला यह तो छोड दिया अपने इष्टदेव पर-जहां वह ले चले वहीं चला जाता हूं।

रामनवमी के पावन पर्व पर इतना बड़ा लेख शायद मैं लिखने की सोचता भी नहीं अगर मेरे मित्र ब्लागर श्रीअनुनादसिंह के ब्लाग पर कृतिदेव का युनिकोड टुल नहीं मिलता। आजकल मैं फोरमों पर जाता हूं और यह जरूरी नहीं है कि मेरी पंसद के ब्लाग वहां मिल ही जायें पर अनुनाद सिंह का वह ब्लाग मेरी नजर में आ गया और मैने यह टूल वहां से उठाया और सफल रहा। अगर मैं उस दिन नहीं जा पाता या मेरी नजर से चूक जाता तो इतना बड़ा बिना हांफे लिखना संभव नहीं होता और होता भी तो आगे की कडियां लिखने की घोषणा नहीं करता। यह भगवान श्रीराम की महिमा है कि अपने भक्तों के लिये रास्ते भी बना देते हैं अगर वह यकीन करता हो तो। आज मैंने कोई विवादास्पद बात नहीं लिखी पर आगे भगवान श्रीराम के भक्तों के लिये दिलचस्प और उनके विरोधियों के विवादास्पद बातें इसमें आने वालीं हैं।
अपने सभी मित्र और साथी ब्लागरों के साथ पाठकों को रामनवमी की बधाई। शेष अगले अंक में

मनु स्मृति:सुपात्र को दिया दान ही फलता है

न वार्यपि प्रयचछत्तु बैडालव्रतिके द्विजे
न बकव्रतिके विप्रे नावेदविदि धर्मवित्

धार्मिक वृत्ति के लोगों को चाहिए कि वह दूसरों को मूर्ख बनाकर लूटने वाले व्यक्ति या साघू का भेष धरकर ढोंग और पाखंड रचाने वाले तथा ब्रहम् ज्ञान से रहित व्यक्ति को पानी तक न पिलायें।

यथा प्लवेनौपलेन निमज्जत्युदके तरन्
तथा निमज्जतोऽधस्तादज्ञो दातृप्रतीच्छकौ


जिस तरह पानी में पत्थर की नाव पर सवार व्यक्ति नाव के साथ ही पानी में डूब जाता है वैसे ही दान लेने वाली कुपात्र और मूर्ख तथा उसे दान देने वाला दोनों ही नरक में जाते हैं।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-भारतीय अध्यात्म में दान की महिमा बहुत है पर इस आड़ में ढोंगी साधु और संतों ने आम लोगों को मूर्ख बनाकर लूटने का जो सिलसिला शुरू किया तो वह सदियों के बाद आज भी जारी है। हालांकि आज लोग पहले के मुकाबले अधिक शिक्षित हैं पर इसके बावजूद धर्म के नाम ढोंगी लोगों का दान देकर उनके भरण-भोषण कर अनजाने में पाप के भागी बन रहे हैं। कहने को तो कई लोग कहते हैं कि हमें क्या मतलब? हम तो शुद्ध मन से दान कर रहे है और हमारी नीयत तो साफ है।’

हमारे अध्यात्म के मनीषी मनु कहते हैं कि सुपात्र को दिया गया दान फलता है और कुपात्र को दिया गया दान पाप का भागी बना देता है। अगर हमने शुद्ध हृदय से दान दिया है और लेने वाला मूर्ख और दुष्ट है तो उसके द्वारा किया गया दुरुपयोग हमें भी पाप का भागी बना देता है अतः ऐसे दान से तो न करना अच्छा। अतः दान देते समय लेने वाले की पात्रता का भी विचार करना चाहिए।
मनु स्मृति:ढोंगी आदमी को पानी भी न पिलायें

13 अप्रैल 2008

सौम्यता, सहजता, सरलता और समभाव का प्रतीक हैं भगवान श्रीराम

सौम्यता, सहजता, सरलता और समभाव का प्रतीक हैं भगवान श्रीराम

आज पूरे देश में रामनवमी का त्यौहार मनाया जा रहा है। राम हमारे देश के लोगों के हृदय के नायक है। यह स्वाभाविक ही है कि लोग राम का नाम सुनते ही प्रफुल्लित हो उठते हैं। राम की महिमा यह कि जिस रूप में उन्हें माना जाये उसी रूप में आपके हृदय में स्थित हो जाते है। राम उनके भी जो उनको माने और राम उनके भी जो उन्हें भजें और वह उनके भी हैं जो उन्हें अपने हृदय में धारण करें।
मैं बचपन से भगवान विष्णू की उपासना करता आया हू। स्वाभाविक रूप से भगवान श्री राम के प्रति भक्तिभाव है। इसका एक कारण यह भी रहा है कि मैं मूर्ति तो भगवान विष्णू की रखता हूं पाठ बाल्मीकी रामायण का करता हूं। कुल मिलाकर भगवान विष्णू ही मेरे हृदय में राम की तरह स्थित हैं। मतलब यह मेरे लिये भगवान राम ही भगवान विष्णू है। यह समभाव की प्रवृति मुझे भगवान राम के चरित्र से मिलती है।
भगवान राम के प्रति केवल भारत में ही बल्कि विश्व में भी उनकी अनुयायियों की भारी संख्या है। मतलब यह कि भगवान श्रीराम का चरित्र केवल देश की सीमाओं में नहीे सुना और सुनाया जाता है वरन् देश के बाहर भी उनके प्रति लोगों के मन में भारी श्रद्धा है। जब मै आज भारत के अंदर चल रहे हालाते पर नजर डालता हूं तो लगता है लोग केवल नाम के लिये ही राम को जप रहे है। भगवान राम के चरित्र की व्याख्यायें बहुत लोग कर रहे है पर केवल लोगों में फौरी तौर पर भक्ति भाव जगाकर अपनी हित साधने तक ही उनकी कोशिश रहती है। मैं अक्सर जब परेशानी या तनाव में होता हूं तो उनका स्मरण करता हूं।
यकीन मानिए भगवान राम के मंदिर में जाकर कोई वस्तू या कार्यसिद्ध की मांग नहीं करता वरन् वह मेरे मन और बुद्धि में बने रहें इसीलिये उनके समक्ष नतमस्तक होता हूं। जब संकट में उन्हें याद करता हूं तो केवल इसीलिये कि मेरा घैर्य, आस्था और विश्वास बना रहे यही इच्छा मेरी होती है। थोड़ी देर बाद मुझे महसूस होता है कि वह शक्ति प्रदान कर रहे है।
भगवान श्रीराम का चरित्र कभी किसी अविश्वास और अकर्मणता का प्रेरक नहीं हो सकता। जो केवल इस उद्देश्य से भगवान राम को पूजते हैं कि उन पर कोई संकट न आये और उनके सारे कार्य सिद्ध हो जायें-वह राम का चरित्र न तो समझते है न उन्हें कभी अपने विश्वास को प्रमाणित करने का अवसर मिल पाता है।
भगवान श्री राम की कथा पढ़ना और सुनना अच्छी बात है पर उन्हें अपने हृदय में धारण कर ही जीवन में आनंद ले पाते है। ऐसे विरले ही होते है। भगवान राम के चरित्र में जो सौम्यता, सहजता, सहृदयता, समभाव और सदाशयता है वह विरले ही चरित्रों में मिल पाती है। यही कारण है कि भारत की सीमाओं के बाहर भी उनका चरित्र पढ़ा और सुना जाता है। अगर मनुष्य के रूप में की गयी उनकी लीलाओं का चर्चा की जाये तो वह कभी विचलित नहीं हुए। कैकयी द्वारा बनवास, सीताजी के हरण और रावण के साथ युद्ध में श्रीलक्ष्मण जी के बेहोश होने के समय उन्होंने जिस दृढ़ता का परिचय दिया वह विरलों में ही देखने को मिलती है। रावण के साथ युद्ध में एक ऐसा समय भी आया जब सभी राक्षसों को ऐसा लगा रहा था कि भगवान राम ही उनके साथ युद्ध कर रहे है। वह घबड़ा कर इधर उधर भाग रहे थे जहां जाते उन्हें राम देखते। मतलब यह कि राम केवल उनके ही नहीं है जो उनके पूजते बल्कि उनके भी है जो उन्हें नहीं पूजते-नहीं तो आखिर अपने शत्रूओं को दर्शन क्यों देते? यह उनके समभाव का प्रतीक है। क्या हम उन्हें मानने वाले ऐसा समभाव दिखा पाते है। कतई नहीं। यकीनन हमेें अब आत्ममंथन करना चाहिए कि क्या केवल भगवान श्रीराम की मूर्ति लगाकर उनके प्रति दिखावे की आस्था प्रकट करना ही काफी है। हमें उनके पूर्ण स्वरूप का स्मरण कर उसे अपने मन और बुद्धि में स्थापित करना चाहिए। याद रहे मनुष्य की पहचान उसकी बुद्धि से है। अगर आप अपनी बुद्धि में अपने इष्ट को स्थापित करेंगे तो धीरे धीरे उन जैसे होते जायेंगे। एक विद्वान का मानना है कि मूर्ति पूजा का प्रत्यक्ष रूप से लाभ कुछ नहीं होता पर उसका यह फायदा जरूर होता है आदमी जब भगवान की पूजा करता है तो उसके हृदय में उनके गुणों का एक स्वरूप स्थापित होता है जो आगे चलकर उसका स्थायी हिस्सा बन जाता है। शर्त यही है वह आदमी उस समय किसी अन्य भाव का स्थान न दे।
इस दुनिया में हमेशा मूर्तिपूजा का विरोध करने वालों की संख्या ज्यादा रही है। दरअसल वह इससे होने वाले मनोवैज्ञानिक फायदों को नहीं जानते। प्रत्यक्ष रूप से तो इसका फायदा नही होता दिखता पर अप्रत्यक्ष रूप से जो व्यक्ति में शांति और दृढ़मा आती है उसको किसी पैमाने से मापना कठिन है। मुख्य बात है अपने अंदर भाव उत्पन्न करना। आखिर कोई भी व्यक्ति काम करता है तो उसके पीछे उसके विचार, संकल्प और निश्चयों के साथ ही चलता है। जब उनमें दोष है तो किसी सार्थक कार्य के संपन्न होने की आशा करना ही व्यर्थ है। अब लोग किसी और को तो नहीं अपने आपको धोखा देते है। मंदिरों में जाकर वह भगवान के सामने नतमस्तक तो होते है पर स्वरूप के अंतर्मन में ध्यान करने की कला में कितने दक्ष है यह तो वही जाने। अलबत्ता सबसे बड़ी बात राम की भक्ति के साथ उन्हें मन और बुद्धि में धारण भी जरूरी है। मूर्तियां तो उनका वह स्वरूप है जो आखों से ग्रहण करने के लिए स्थापित किया जाता है ताकि उसे हम अपने अंतर्मन में ले जा सके।
भगवान राम का चरित्र कभी न भुलाये जाने वाला चरित्र है। उनके प्रति अपार श्रद्धा के साथ उनके संदेशों पर चलने की जरूरत भी है। उन्होंने नैतिक आचरण, समभाव, सहजता और सरल दृष्टिकोण से जीवन जीने का जो तरीका प्रचारित किया उस पर चलने की जरूरत है। हमें समूह नहीं एक व्यक्ति के रूप में यह विचार करना चाहिए कि क्या हम उनके द्वारा निर्मित पथ पर चले रहे है या नहीं। दूसरा व्यक्ति क्या कर रहा है यह हमें नहीं सोचना चाहिए। भगवान श्रीराम को अपने हृदय में धारण करन चाहिए जिससे केवल न हम स्वयं बल्कि समाज को भी संकट से उबारने की शक्ति अर्जित कर सकें।

31 मार्च 2008

क्या वह ज्ञानी थे-हिन्दी कहानी

वह ज्ञानी थे और अभी प्रवचन कार्यक्रम कर लौटे थे। मेरे से उनकी मुलाकात उनके यजमान के घर पर जो कि मेरे मित्र थे के घर पर हुई जहां मै किसी काम से गया था।

मित्र ने मुझसे कहा कि ‘‘तुम प्रवचन कार्यक्रम में क्यों नहीं आये? आना चाहिए भई। यह ठीक है कि तुम आजकल योग साधना कर रहे हो पर कभी-कभी सत्संग भी सुना करो।’’

वह प्रवचनकर्ता कोई साधु संत नहीं थे बल्कि गृहस्थ थे पर ऐसे ही उनका नाम हो गया था तो लोग समय पास करने के लिये उनका बुला लेते थे। मैं मित्र की बात सुनकर हंस पड़ा तो वह सज्जन बोले-‘‘हां इस दुनियां में सुबह बहुत तेजी से सांस लेने वाले भी कई योगी न रहे। कबीरदास जी यही कहते हैं इसलिये भगवान भजन में मन लगाना चाहिये। योग साधना से क्या होता है।’’

मैं थोड़ा जोर से हंसा तो वह बोले-‘‘आप इसे मजाक मत समझिये मैं आपको सही ज्ञान की बात बता रहा हूं।’’

इसी बीच मेरे मित्र की पत्नी भी एक थाली में फल और मिठाई रखकर आ गयी तो वह उसे देखते हुए बोले-‘‘मिठाई तो अभी नहीं खाउंगा। एक सेव अभी खा लेता हूं बाकी थैले में रख दो घर ले जाता हूं।

मैं भी मुस्कराते हुए उन्हें देख रहा था। मेरा मित्र होम्योपैथी का डाक्टर था और अधिक प्रसिद्ध न होने के बावजूद उसका काम ठीक चल रहा था और अपने मोहल्ले की तरफ के वह इस कार्यक्रम का मुख्य कर्ताधर्ता था।

वह सेव खाते हुए उससे बोले-‘भाई, हमें कम से कम महीने भर की दवाई दे दो ताकि हमारी और पत्नी की डायबिटीज कंट्रोल में रहे।’’

मेरा मित्र दवाई लेने चला गया तो उसकी पत्नी भी वहंा से चली गयी। तब वह मुझसे बोले-योगसाधना से कोई सिद्ध नही होता। यह कहने की बात है। इसलिये आप भगवान में मन लगाया करो। उनकी भक्ति से सब ठीक हो जाता है।’’


मैने उनसे कहा-‘यह मेरा मित्र डाक्टर है और पोच वर्ष पूर्व उच्च रक्तचाप की शिकायत के कारण इलाज कराने आया था । तब इसने मुझे खूब डांटा था। इसके पास अब कभी मरीज का तरह दवाई नहीं लेने न आना पड़े इसलिये ही योगसाधना करता हूं। यकीन करिये केवल उसके बाद दो वर्ष पहले बुखार की शिकायत लेकर आया था यह अलग बात है कि यह उस दिन घर पर नहीं था तो इसके पोर्च में पलंग पर सो गया और मेरा बुखार चला गया। इससे बचने के लिये ही मैं योगसाधना, ध्यान और मंत्रजाप करता हूं।’’

तब तक मेरा मित्र कमरे के अंदर आ गया था और मैने उसके सामने ही कहा-‘‘एक डाक्टर के रूप में मुझे इसकी शक्ल पसंद नहीं है।’’

उनका मूंह उतरा हूआ था। उन्होंने अपना मिठाई और फल को थैला उठाया और वहंा से चले गये। जाते वक्त उन्होंने मेरे मित्र और उसकी पत्नी से बात की पर मेरी तरफ देखा भी नहीं। उनके जाने के बाद मैने अपने मित्र से पूछा-‘‘कौन सज्जन थे ये?’’

वह बोला-‘‘कोई अधिक प्रसिद्ध तो नहीं है मेरे मरीज है और मोहल्ले के लोगों ने कहा कि सत्संग कराना है। सो बुलवा लिया। वैसे बहुत ज्ञानी हैं।’’
तुम्हें कैसे लगे?’

मित्र और मेरे बीच अनेक बार अध्यात्म पर जोरदार बहसें सुन चुकी उसकी पत्नी को मेरे से इस उत्तर की आशा नहीं थी। इसलिये उसने हंसते हुए पूछा-‘‘क्या सोच बोल रहे हैं या हमारा मन रख रहे हैं।’’

वह गलत नहीं थी पर मैं मित्र द्वारा दिये गये महत्वपूर्ण कागज के लिफाफे को लेकर वहां से बाहर निकल गया। पीछे से मेरा मित्र मुझसे कह रहा था-सच बोलना। क्या तुंम हमारा दिल रखने के लिये मान रहे हो कि वह वास्तव में ज्ञानी हैं।’’

मैने पलटकर उसे मुस्कराते हुए देख और वहां से बिना उत्तर दिये चला आया।

30 मार्च 2008

दलाई लामा ने भी लगाया चीन पर आरोप

आखिर तिब्बत के निर्वासित धार्मिक नेता दलाई लामा ने भी वहां की बिगड़ी हालत के लिये चीन को ही जिम्मेदार ठहरा दिया। इससे पूर्व मैंने अपने लेख में यह संदेह जाहिर किया था कि चीन के शासक वहां के हालत बिगाड़ कर अपने सैन्य ठिकानों सुदृढ़ एवं विस्तृत करने का बहाना ढूंढ रहे हो सकते हैं। अब दलाई लामा ने जिस तरह उनका जिस तरह कटघरे में खड़ा किया है उसे जरूर देखना चाहिए।

दलाई लामा ने तो यहां बैठकर वहां के लोगों से शांति की अपील की थी फिर भी वहां क्यों हिंसा हो रही है? चीन के सम्राज्यवादी शासकों ने सांस्कृतिक क्रांति के बाद से ही चारों तरह एक तरह से आतंक की अभेद्य दीवार अपने देश में बना रखी है और उसे देख कर नहीं लगता कि वहां उसके शासकों की नजर के बिना किसी आंदोलन को चलाना तो दूर उसकी सोच भी नही सकता होगा। उसके पड़ौसी देशों में भी किसी की हिम्मत नहीं है कि उसके अंदर चल रही असंतुष्ट गतिविधियों को प्रत्यक्ष क्या अप्रत्यक्ष समर्थन भी दे सके।

एसा लगता है कि चीन की जनता को भले ही बाहर की हवा न लगी हो पर उसके नेता अब दूसरे देश के नेताओं से राजनीति का सबक सीख गये हैं। जब संपूर्ण देश में अशांति का माहौल हो तो किसी क्षेत्र विशेष में फैले अंसतोष को हवा दो ताकि लोगो का ध्यान उस ओर चला जाये। वहां फिर बलप्रयोग करो ताकि देश की जनता वाहवाही करे और दुश्मन डर जाये। यह आंदोलन चीनी नेताओं के इशारे पर उन नेताओं ने शुरू किया होगा जिन्हें चीन के राजनयिकों ने उपकृत किया होगा या ऐसा करने का आश्वासन दिया होगा-हालांकि इसमें उनके लिये जोखिम भी कम नहीं है क्योंकि जब चीन जब वहां अपना काम पूरा कर लेगा तब उनका भी वैसा ही हश्र होगा जैसा अन्य विरोधियों का होता आया है।

वैसे भी इस समय तिब्बतियों को स्वतंत्रता मिलना तो दूर स्वायत्ता मिलना भी कठिन है और अगर ऐसा कोई आंदोलन वहां चल रहा है तो उसे केवल पश्चिमी राष्ट्रों का मूंहजुबानी समर्थन ही मिल सकता है इससे अधिक कुछ आशा नही की जा सकती। भारत से बड़ा उपभोक्ता बाजार चीन का है और उसे पाने की होड़ सभी पश्चिमी राष्ट्रों में है। इसके अलावा सामरिक दृष्टि से चीन इतना ताकतवर है कि कोई उस पर हमला नहीं कर सकता। ऐसे में तिब्बत की चीन से मुक्ति अभी तो संभव नहीं है। ऐसे में वहां चल रहे कथित आंदोलन का लंबे समय तक चलना संभव नहीं है। इसके बावजूद विश्व के सभी देशों को उस पर नजर रखना ही चाहिए क्योंकि वह अपनी सामरिक शक्ति बढ़ायेगा जो कि विश्व के लिये हितकर नहीं है। अभी तक चीन ने तिब्बत को अपनी सैन्य छावनी बनाकर रखा हुआ है और अब वह वहां अपने देश के अन्य इलाकों से लोग लाकर अपनी ताकत बढ़ाना चाहता है। उसके कथित विकास के दावे खोखले हैं और चूंकि अब प्रचार माध्यम इतने व्यापक हो गये हैं इसलिय कोई देश अपने लोगों को दूसरे देशों से मिलने वाली जानकारी रोक नहीं सकता और निश्चित रूप से वहां की सरकार की जनता में असलियत अब खुल रही होगी और उससे विचलित वहां की सरकार उनका ध्यान बंटाने के लिये यह नाटक कर रही है-दलाई लामा के आरोप से तो यही लगता है।

22 मार्च 2008

गुण ही गुणों को बरतते हैं-चिंतन

होली का हल्ला थम चुका है। कोई नशे में मदहोश होकर तो कोई रंग खेलते हुए थककर सो रहा है तो कोई मस्ती में अभी भी झूम रहा है कि उसके खुश होने का कोटा पूरा हो जाये। सब इस दुनिया से बेखबर होना चाहते हैं मगर कुछ लोग फिर भी हैं जो चिन्त्तन करते हैं। आम आदमी की याददाश्त कमजोर होती है पर एक लेखक की स्मरण शक्ति ही उसकी मित्र होती है-कुछ मायनों में दुश्मन भी।

चेतावनियों के स्वर कानों में गूँज रहे हैं और आंखों के सामने अखबारों में छपे गर्मी के आसन्न संकट के शब्द घूम रहे हैं। इस होली पर पानी खूब उडाया गया होगा। इसमें किसी ने कोई हमदर्दी नहीं दिखाई। अब आरही है गर्मी। पहले से ही दस्तक दे चुकी है और उसका जो भयानक रूप सामने आने वाला है वह हर वर्ष हम देखते हैं। गर्मी में पानी की कमीं के हर जगह से समाचार आयेंगे। कहीं आन्दोलन होगा। लोगों के हृदय में उष्णता उत्पन्न होगी और उसका ध्यान बंटाने के लिए बहुत सारे अन्य अर्थहीन विषय उठाये जायेंगे।

कभी-कभी लगता है देश में कोई समस्या ही नहीं है केवल दिखावा है। लोग पानी को रोते हैं पर फैलाते भी खूब हैं। देश के शहरों में सबके पास मोबाइल दिखता है उस पर बातें करते हैं। कौन है जो देश की हालत पर रोता है। कहीं से किसानों की आत्महत्या की खबर आती है पर कहीं कोई प्रतिक्रिया नहीं होती। सब कुछ सामान्य चलता दिख रहा है। लोग घुट-घुटकर जी रहे हैं पर बाहर से दिखता है कि सामान्य हैं। लोग चीख रहे हैं पर कोई किसी की नहीं सुन रहा है। किसी से ज्ञान चर्चा करना निरर्थक लगता है क्योंकि वह अगले ही पर अपने अज्ञान का परिचय देता है।

वैचारिक रूप से दायरों में सिमट गए लोगों से अब बात करना मुश्किल लगता है। जिसके पास जाओ वह या तो अपने घर की परेशानी बताता है या वह उसकी किसी भौतिक उपलब्धि का बयान करता है। में खामोश होकर सुनता हूँ। मुझे अपने घर-परिवार के जो काम करने हैं उनको करता हूँ। जो चीजें लाना होता है लाता हूँ पर उनका बखान नहीं करता।
''सुनो कल मैं मेले गया था वहाँ से नया फ्रिज ले आया।''
''मैंने अपने बेटे को गाडी दिलवा दी।''
''मैंने अपनी बेटी को मोबाइल दिलाया है।''
सब सुनता हूँ। फिर करते हैं देशकाल और राजनीति की बातें-जैसे कि बहुत बडे ज्ञाता हों। जब बताओ कि किस तरह सब जगह तयशुदा कार्यक्रम के अनुसार उनकी बुद्धि को संचालित किया जा रहा है। समाचार उनको इस तरह दिए जा रहे हैं कि देश, समाज और लोगों की यथास्थिति बनी रहे और वह उसमें बदलाव की नहीं सोचें। बदलाव की बात कोई सोच कर वह कई लोगों के लिए परेशानी पैदा करेंगे। व्यवस्था में सुधार की बातें पर बहुत की जातीं हैं पर बदलाव की नहीं। तमाम तरह के वादे और नारे गढे गए और भी गढे जायेंगे।

कभी-कभी उकता जाता हूँ, फिर सोचता हूँ कि सब मेरी तरह नहीं हो सकते। अपने जैसे लोगों का संपर्क ढूँढता हूँ और जब वह मिलते हैं तो लगता है कि वह भी इस दुनिया से क्षुब्ध हैं पर बदलाव की बात पर वह भी उदास हो जाते हैं उनको नहीं लगता कि वह उसे बदल सकते हैं और खुद को भी बदलने पर अपने साथ जुडे लोगों के विद्रोह का भय उन्हें सताता है-जिसे मोह भी कह सकते हैं।

कहीं एकांत मंदिर में जाकर बैठता हूँ और ध्यान लगाता हूँ। श्रीगीता में श्री कृष्ण जी के यह शब्द ''गुण ही गुण को बरतते हैं'' मुझे याद आते है। मेरे अधरों पर मुस्कराहट खेल जाती है। मन प्रसन्न हो जाता है। भला मैं दूसरों से क्या अपेक्षा करूं। दूसरे के अन्दर गुणों का मैं नियंत्रणकर्ता नहीं हो सकता। जो गुण उसमें है नहीं और वह पैदा भी नहीं कर सकता उससे भला मैं क्यों कोइ अपेक्षा करूं। मैं निर्लिप्त भाव को प्राप्त होता हूँ। यह दुनिया मेरी नहीं है बल्कि मैं इसमें हूँ। वह चलती रहेगी उसके साथ मुझे चलना है और उसे दृष्टा बनकर चलते देखना है। लोगों को अपने मन ,बुद्धि और अहंकार के वश में पडा देख कर उनका अभिनय देखना है। धीरे-धीरे मन की व्यग्रता ख़त्म हो जाती है।

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