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30 जुलाई 2008

सर्वशक्तिमान ने कोई कानून नहीं बनाया -हिन्दी शायरी


किसी भूखे को रोटी खिलाने का
उनकी किताबों में कोई इलाज नहीं
ढेर सारे कसूरों की सजाएं है
कसूरवार की मजबूरी समझने का
कोई कहीं रिवाज नहीं
जमाने को सिखाते हैं तमाम तरीके
जन्नत में जाने के
अपनी हकीकतो से दूर
ख्वाबों में जाने के
सर्वशक्तिमान ने कोई कानून नहीं बनाया
फिर भी उसके नाम पर सुनाते हैं
चंद किताबें पढ़कर फैसले
इंसान की भूख को पढ़ने का
कहीं कोई मिजाज नहीं
सभी को मोहब्बत का पैगाम देते हैं
पर जिस्म की भूख पर है खामोश
क्योंकि उस पर किसी का बस नहीं
अरे, ऊपर वाले का नाम लेकर
दुनियो को उसके दस्तूर पर चलाने वालों
उससे पूछ का बताओ
भूखा अगर रोटी की चोरी करे
तो उसकी सजा क्यों होना चाहिए
अगर वह इंसान के पेट में भूख नहीं बनाता तो
मान लेते उसका होगा वजूद
इस धरती पर भी कहीं

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शांति लाने का दावा

बारूद के ढेर चारों और लगाकर
हर समस्या के इलाज के लिए
नये-नयी चीजें बनाकर
आदमी में लालच का भूत जगाकर
वह करते हैं दुनिया में शांति लाने का दावा

बंद कमरों में मिलते अपने देश की
कुर्सियों पर सजे बुत
चर्चाओं के दौर चलते
प्रस्ताव पारित होते बहुत
पर जंग का कारवाँ भी
चल रहा है फिर भी हर जगह
होती कुछ और
बताते और कुछ वजह
जब सब चीज बिकाऊ है
तो कैसे मिल सकता है
कहीं से मुफ्त में शांति का वादा
बहाने तो बहुत मिल जाते हैं
पर कुछ लोग का व्यवसाय ही है
देना अशांति को बढावा

एक दुकान से खरीदेंगे शांति
दूसरा अपनी बेचने के लिए
जोर-जोर से चिल्लाएगा
फैलेगी फिर अशांति
जब फूल अब मुफ्त नहीं मिलते
तो बंदूक और गोली कैसे
उनके हाथ आते हैं
जहाँ से चूहा भी नहीं निकल सकता आजादी से
वहाँ कोहराम मचाकर
वह कैसे निकल जाते हैं
विकास के लिए बहता दौलत का दरिया
कुछ बूँदें वहाँ भी पहुंचा देता है
जहाँ कहीं शांति का ठेकेदार
कुछ समेट लेता है
जानते सब हैं पर
दुनिया को देते हैं भुलावा
न दें तो कैसे करेंगे शांति लाने का दावा
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28 जुलाई 2008

मशहूर होने से भी भला क्या फायदा-व्यंग्य

लिखना मैंने इसलिये नहीं शुरू किया कि मुझे मशहूर होना है। मुझे अपने मशहूर होने की चिंता कभी नहीं सताती क्योंकि लगता है कि लोग अपनी पूरी ऊर्जा इसी प्रयास में नष्ट करते हैं कि वह प्रसिद्ध व्यक्ति बने और समाज में उनकी चर्चा चारों और लोग करें। मैं उनके करतबों पर ही लिखता रहता हूं पर किसी का नाम लिये बगैर अपनी बात कह जाता हूं कि अगर वह पढ़े भी तो उसे लगे कि किसी अन्य व्यक्ति के लिये लिखा होगा।

उस दिन पांच लोग कहीं आपस में मिले। इसमें मैं और मेरे ब्लाग/पत्रिका पढ़ने वाला एक मित्र भी था। तीन अन्य भी उसके परिचित थे। तीनों अपनी अपनी डींगे हांक रहे थे।
‘अरे, मैं किसी से नहीं डरता मेरी पहुंच दूर तक है।’
‘अरे, इस इलाके में मुझे सब जानते हैं। अपना ही राज्य है।’
‘मैं जहां रहता हूं, वहां सब लोग मेरी इज्जत करते हैं। एक मैं ही वहां इज्जतदार हूं।’
वैसे मेरा मित्र भी कम नहीं है, पर उसे मालुम है कि मैं हाल ही उसकी बात को पकड़ कर लिख कर व्यंग्य लिखने का काम कर सकता हूं। इसलिए कुछ देर तो चुप रहा फिर उसने मुझे ही वहां उलझाने के लिये अपना पासा फैंका और बोला-‘तुम मेरे इस मित्र को जानते हो। कई पत्र-पत्रिकाओं में इसके लेख और व्यंग्य छप चुके हैं। आजकल इंटरनेट पर लिखते हुए अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर नाम कमा रहा है पर देखों अपनी प्रशंसा स्वयं नहीं करता।’
मैंने मित्र की तरफ देखा और फिर कहा-‘‘अरे, यार तुम भी क्या बात लेकर बैठ गये। हमें भला कौन जानता है? लिखते हम भी हैं और फिल्मों के हीरो भी लिख रहे हैं पर भला कोई उनके मुकाबले हमें कौन पढ़ता है। तुम्हें और कोई नहीं मिला कि हमारा मजाक उड़ाने लगे।’
उनमें से एक सज्जन बोले-‘‘आप कौनसे अखबार में लिखते हैं?‘
मैने कहा-‘अरे, यह तो ऐसे ही बना रहा है। पहले कुछ कम प्रसिद्ध पत्र-पत्रिकाओं के लिखा था। अंतर्जाल पर ब्लाग लिख रहे हैं पर कौन पढ़ता है वहां पर। अब तो फिल्मी हीरो हीरोइन के ब्लाग बनते जायेंगे। लोग उनको पढेंगें कि हमें। यह मुझे मित्र कह रहा है इससे पूछो कितनी बार इसने मेरा ब्लाग खोला है?’

दूसरे सज्जन ने कहा-‘अगर आप लिखते हैं तो जरूर मशहूर हो जायेंगे। फिल्मी हीरो हीरोइन गासिपों के अलावा क्या लिखेंगे। वैसे भी उनका लिखा अखबार में आ जाता है। आप लिखते रहें तो एक दिन मशहूर हो जायेंगें।
बहरहाल मैंने अपनी बौद्धिक शक्ति का उपयोग करते हुए वहां बातचीत का विषय बदल दिया। वहां से निकलते ही मैंने मित्र से कहा-‘दिलवा दिया शाप! उसने क्या कह दिया कि मशहूर हो जाओगे।

मेरा मित्र बोला-‘यार, फिर तो वाकई चिंता की बात है तुम्हारे ब्लाग पर मैंने अभी तक तीन टिप्पणियां लिखीं हैं तो हमें भी तो मशहूर हो जायेंगे। वैसे मशहूर होना तो अच्छी बात है।’
मैंने उससे कहा-‘मशहूर होकर लिखा नहीं जाता। आदमी इसी फिक्र में कई बातें इसलिए नहीं लिख पाता कि अब तो मशहूर हो गया हूं कहीं ऐसा न हो कि लोग इससे नाराज न हो जायें। मशहूर होने का बोझ ढोना कई लोगों के लिए मुश्किल काम है और उनमें हम एक है।
मित्र ने कहा-‘फिर तुम लिखते क्यों हो? मशहूर होने के लिए ही न!
मैंने कहा-‘‘मशहूर नहीं हूं इसलिये लिख रहा हूं। जमकर लिख रहा हूं। मशहूर होने के बाद तो यही सोचकर बैठा रहूंगा कि लिखूं क्या?’

मित्र ने आखिर मुझसे पूछा-‘आखिर मशहूर होना होता कैसे है?’
मैंने भी प्रति प्रश्न किया-‘कैसे होता है?’
मित्र ने कहा-‘‘मैं क्या जानूं? तुम लेखक हो तुम्हीं बताओ।’
मैने कहा-‘मशहूर होने की बात तो तुमने उठाई थी। मुझे लगा कि होगी कोई अच्छी बात है।’
मित्र बोला-‘अच्छा तुम अब मुझ पर ही व्यंग्य करने लगे। मैं इसलिये वहां चुप था कि कहीं तुम मेरी बातों से व्यंग्य सामग्री न ढूंढ लो और अब यही कारिस्तानी यहीं करने लगे। मेरी टिप्पणियां वहां से हटा देना। मुझे ऐसे व्यक्ति के साथ मशहूर नहीं होना जिसे मालुम ही न हो कि वह होता क्या है?’

मशहूर होने के लिये लोग जाने क्या क्या पापड़ बेलते हैं? तमाम तरह की उल्टी सीधी हरकतें करते हैं। उलूलजुलूल लिखते है। लिखने में सबसे बड़ा मजा यह है कि आप किसी आदमी के सामने नहीं होते और इसलिये कोई आपको पहचान नहीं पाता। पिछली राखी की बात है मैं एक रेस्टरां में चाय पी रहा था। उसी दिन एक अखबार में मोबाइल पर लिख मेरा एक व्यंग्य छपा था और दो आदमी उसे पढ़कर हंस रहे थे। एक ने कहा-‘‘देखो यार, मोबाइल पर उसने क्या लिखा है?
दूसरा उसे पढ़ते हुए हंस रहा था। उसे नहीं मालुम कि उसको लिखने वाला लेखक उसे मात्र पांच फुट की दूरी पर बैठा है। बाद में मैंने जब अपने मित्र को जब यह घटना बताई तो वह कहने लगा कि-‘तुमने उनको बताया क्यों नहीं कि तुम उसके लेखक हो।
‘अगर वह कह देते कि क्या बकवाद लिखी है तो मैं क्या करता?‘मैने कहा-‘‘इतना ही ठीक है कि मुझे पढ़ रहे थे। अपने आपको मशहूर करने के प्रयास में कभी कभी उल्टा सीधा भी सुनना पड़ता है। इससे बेहतर है अपने लेख भले ही मशहूर हों, थोड़ा बहुत नाम भी हो जाये पर हमें अपना यह चेहरा मशहूर नहीं कराना।’

मशहूर होने को मतलब है कि अपने ऐसे विरोधी पैदा करना जो छींटाकशी के लिये तैयार बैठे रहते हैं और आप अपने मित्रों से हमेशा सतर्कता की आशा नहीं कर सकते जो सोचते हैं कि यह तो मशहूर आदमी है अपना बचाव स्वयं कर लेगा। वैसे चुपचाप लिखते रहने से ही इतनी आनंद की अनुभूति होती है कि लगता है कि मशहूर हुए तो मिलने वाले बहुत आयेंगे। कई तरह के फोन सुनने पड़ेंगे। तब भला क्या खाक लिख पायेंगे। ऐसे ही ठीक है कि कोई हमें चेहरे से जानता नहीं है। अधिक मशहूर होना मतलब अपनी शांति भंग करना भी होता है।

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22 जून 2008

रेल में किताबें बेच सकते हैं, ज्ञान नहीं-आलेख


वृंदावन की यात्रा कर हम दोनों पति-पत्नी दोनों ही खुश होते हैं। इस बार जब हम दोनों वहां पहुंचे तो बरसात हो रही थी और ठहरने के स्थान पर सामान रखकर हम सबसे अंग्रेजों के मंदिर में गये क्योंकि वह अधिक पास था। हमारे साथ के परिचित सज्जन तो नहीं चले पर उनकी दस वर्षीय बेटी हमारे साथ वहां चली।

वृंदावन में अनेक मंदिर हैं पर बांके बिहारी और अंग्रेजों (इस्कान) का मंदिर बहुत अधिक प्रसिद्ध हैं और हम दोनों भी वहां रहते हुए प्रतिदिन जाते हैं। अंग्रेजों के मंदिर में आरती के समय नाचते हुए लोगों का दृश्य भी अच्छा लगता है। हालांकि बरसों से जा रहे हैं पर अब वहां मैटल डिक्टेटर और अन्य कड़ी सुरक्षा सहित अन्य परिवर्तन देखकर हमें आश्चर्य होता है। वहां तमाम लोग आते हैं और ऐसा लगता है कि कुछ पिकनिक मनाने के लिए भी आते हैं तो कुछ केवल देखने भर के लिये चले आते हैं। कुछ लोग भक्ति भाव से आते हैं। अगर सीधे कहें तो वहां चारों तरह के भक्त आते हैं-आर्ती, अर्थाथी, जिज्ञासु और ज्ञानी। मैं तो वहां कर ध्यान लगाता हूं और मेरी पत्नी भीड़ में बैठकर तालियां बजाते हुए भजन गाती है।

बरसात बंद होने पर जो उमस का गुब्बार फूटा तो उसमें हम पसीना-पसीना हो गये थे। ग्यारस और अवकाश का दिन होने के कारण वहां भीड़ अधिक थी और मुझे ध्यान के लिये किसी अच्छी जगह की तलाश थी। मेरी पत्नी ने दीवार से रखे कूलर की तरफ इशारा किया और मैं वहां ध्यान लगाने बैठ गया और वह आगे बैठकर ताली बजाते हुए नाम जपने लगी। कुछ देर बाद हम बांके बिहारी के मंदिर जाने के लिये तैयार होकर बाहर निकलने लगे। वहां लगी दुकान पर किताबों का मैं निरीक्षण करने लगा। मेरी पत्नी किताबों में रुचि नहीं लेती वह फिर माला या कोई गले में डालने के लिये प्रतीकों के हार खरीदने के इरादे से खड़ी हो गयी।

मैं किताब की दुकान पर पहुंचा तो वहां धवल वस्त्र पहने एक सेल्समेन ने
मेरी तरफ चार पांच छोटी किताबों एक साथ आगे बढ़ाते हुए कहा-‘यह लीजिये सौ रुपये की हैं। दान समझकर लीजिये इससे आपको ज्ञान भी मिलेगा।’

मैंने उससे पूछा-‘क्या कबीर की रचनाओं का कोई अंग्रेजी संग्रह है?’

उसने तुरंत कहा-‘यहां तो केवल हमारी किताबें ही मिलती हैं।’

मैं वहां से चल पड़ा तो पत्नी ने कहा-‘जब आपको मालुम है तो फिर इन किताबोंे की दुकान पर जाते क्यों हैं?’
मैंने कहा-‘इस उम्मीद में शायद कोई किताब मिल जाये।’
वहां से बाहर निकलते हुए कम से कम तीन स्थानों पर ऐसी किताबें खरीदने के लिए हमारे समक्ष रखी गयी। अचानक मेरी पत्नी को याद आया कि कभी मैंने उससे इस्कान की श्रीगीता खरीदने की बात कही थी और उसने पूछा-‘आप खरीदते क्यों नहीं।’
मैंने उससे कहा-‘यह आज से पांच वर्ष पूर्व की बात है। तब तो मैंने अनेक संतों की व्याख्या वाली श्रीगीता खरीद ली थी, पर मेरे एक मित्र ने मुझसे कहा था कि गोरखपुर प्रेस की वही गीता पढ़ना जिसमें केवल संस्कृत श्लोक का अनुवाद हो। किसी द्वारा की गयी व्याख्या या महात्म्य वाली मत पढ़ना क्योंकि उससे भ्रमित हो जाओगे।’ वह तो मेरे पास थी।’
पत्नी ने पूछा-‘ पर उसने ऐसा क्यों कहा था?’
मैंने कहा-‘उसने मेरा लिखा पढ़ा था और वह जानता था कि मैं स्वयं भी अपना सृजन कर सकता हूं। वह मुझे और मेरे लेखन का प्रशंसक था और नहीं चाहता था कि मैं किसी दूसरे की सोच पर चलूं। वह मुझसे आज भी मौलिक सोच और सृजन की आशा करता हैं।’
पत्नी ने पूछा-‘वैसे इस तरह किताबों को इस तरह बेचना ठीक लगता है। अरे, जिसे खरीदना है वह खरीद लेगा।’
मैंने कहा-‘हां, मुझे भी लगता है कि किताबें तो बेची जा सकती हैं पर ज्ञान नहीं बेचा जा सकता है।’

रास्ते में एक जगह किताबों की दुकान पड़ी। वहां एक जगह हमारे साथ चल रही लड़की उसी दुकान के पास पानी पताशा खाने की जिद करने लगी तो मेरी पत्नी भी वहां रुक गयी। मैं पानी पताशा नहीं खाता इसलिये मेरी पत्नी ने उस किताब की दुकान की तरफ इशारा करते हुए बोली-‘आपको कोई किताब खरीदनी हो तो यहां देख लीजिये। आपकी पसंद की किताबें तो ऐसी ही दुकानों पर मिल पातीं हैं।’
मैं वहां जाकर किताबें देखने लगा। एक किताब ली। वहां से हम बांके बिहारी मंदिर में चले गये।

अगली सुबह हम वापस रवाना होने के लिये रेल्वे स्टेशन पर पहुंचे। वहां से हम एक ट्रेन में बैठे तो वहां इस्कान का ही एक गेहुंआ वस्त्र पहने व्यक्ति अपने हाथ में अपने संस्थान द्वारा प्रकाशित श्रीगीता और श्रीमद्भागवत सभी यात्रियों को दिखाकर उनको खरीदने के लिए प्रेरित करता हुआ हमारे पास आया। मेरे इंकार करने पर वह चला गया। मेरी पत्नी ने फिर हैरान होकर पूछा-‘यह क्या तरीका है?’
मैंने कहा-‘लगता है कि प्राईवेट कंपनियों की तरह इन पर भी टारगेट का बोझ है। शायद इन लोगों का अपने टारगेट पूरा करने पर ही आश्रमों मे बने रहने की छूट दी जाती होगी।

मुझे याद आ जब मैं छोटा था तब अपने माता पिता के साथ अंग्रेजों कें मंदिर में गया था उसके बाद उसमें बहुत विकास हुआ है। एक समय मैं सोचता था कि जो अंग्रेज भगवान श्रीकृष्ण के भक्त हैं वह शायद श्रीगीता को समझ पायें क्योंकि भारत में तो ऐसे लोग कम ही दिखते हैं। यहां तो ज्ञान का व्यापार होता। लगता है कि जाने अनजाने इस्कान के लोग भारतीय साधु संतों से अपने आपको बड़ा भक्त साबित करने के लिये ऐसा प्रयास कर रहे हैं जिनका कोई तार्किक आधार नहीं है। जहां तक किताबों का प्रश्न है जो जिज्ञासु और ज्ञानी भक्त हैं वह तो स्वयं ही खरीद लेते हैं पर अर्थाथी या आर्ती हैं उनकी इन किताबों में कोई दिलचस्पी नहीं होती। इस रेल्वे की बोगियों में इस तरह पवित्र ग्रंथों का ज्ञान बेचने वाले भक्त किस श्रेणी के हैं यह मेरे समझ से परे है? वैसे रेल की बोगी में ज्ञान और भक्ति की किताबें बेच सकते हैं पर ज्ञान और भक्ति भाव किसी में स्थापित करना मुश्किल है।

31 मई 2008

गांधीवाद,गांधीगिरी और गांधीमार्ग-आलेख

गांधीगिरी, गांधीवाद और गांधी मार्ग या विचारधारा तीनों शब्दों का अर्थ भले ही एक जैसे लगते है पर मेरी दृष्टि में में इनका भावार्थ एक नहीं है। हो सकता है कि कुछ लोग मुझे रूढ़ समझें पर विशुद्ध रूप से हिन्दी क्षेत्र का होने के कारण हर शब्द का अर्थ और भाव मेरे स्मृति पटल में इस तरह अंकित है कि हिन्दी भाषा के हर शब्द का अर्थ और भाव मेरे लिये सहज हो गया और मुझे किसी भी शब्द का भावार्थ समझने में कठिनाई नहीं होती ।

जब भी हिन्दी भाषा में किसी संज्ञा के साथ गिरी शब्द जुड़ता है तो वह उसके अर्थ के साथ उसके भाव और महत्त्व को कम करता है। दूसरे शब्दों में कहें कि यह उसे निम्नकोटि का भावार्थ प्रदान करता है। मैं किसी काम को लघु नहीं मानता क्योंकि अपने पेट के लिये रोजगार अर्जित करने के लिये कोई निम्न व्यसाय करने से निम्न नहीं होता है और हमारे देश में तो कई ऐसे संत हुए हैं जिन्होंने इन्हीं निम्न व्यसायों से जुडे होने के बावजूद देश के आध्यात्म को ऐसी दिशा दी जिसके कारण देश आज विश्व्गुरु कहलाता है-पांडवों को भी अपने अज्ञातवास के दौरान निम्नकोटि के काम करना पड़े थे।

यहां इस चर्चा का उद्देश्य केवल भाषा और भाव का है। गिरी शब्द महत्वहीन व्यवसायों और संज्ञाओं में जोडा जाता है और कभी-कभी तो किसी नकारात्मक शब्द को प्रभावी बनाने के लिए भी इसका इस्तेमाल होता है-जैसे उठाईगिरी, दादागिरी और गुंडागिरी। आजकल दो शब्द बहुत शब्द प्रचलित हैं जैसे चमचागिरी और नेतागिरी और इनका उच्चारण कोई उनका महत्व प्रतिपादित करना नहीं होता बल्कि किसी का मजाक उडाने के लिए भी किया जाता है। आपने कभी शिक्षकगिरी , चिकित्सकगिरी , व्यापारीगिरी और अधिकारीगिरी जैसे शब्द नहीं सुने होंगे। तात्पर्य यह है कि यह केवल किसी संज्ञा के मह्त्व को कम प्रदर्शित करता है। ऐसे में गांधी जी के आदर्शों को मानने वाला मुझ जैसा हिन्दीभाषी क्षेत्र का शख्स अपने आपको असहज अनुभव करता है।

अब गांधीवाद शब्द की चर्चा करें। वाद या नारे तो केवल लोगों को यह बताने के लिये हैं कि हम उनके अनुगामी हैं और उनके बारे में हम अधिक जानते हैं इसलिए हम जो कहते हैं वही मानो। अगर आप किसी भी वाद या नारे पर चलने वाले बुद्धिजीवी से उसका स्वरूप पूछें तो सब केवल रटे-रटाए नारे लगाने वाली बात कहेंगे। गरीबों और शोषितों को उठाना, महिलाओं को सम्मान दिलाना और जन कल्याण करना। सो इस पर बात अधिक क्या कहें । इन नारों और वाद पर मैं पहले भी बहुत कुछ लिख चुका हूं।
गांधी विचार या गांधी दर्शन शब्द से मेरा मन प्रुफ़ुल्लित हो जाता है। इस शब्द का प्रयोग जो व्यक्ति करता है उसके बारे में यही सोच हमारे मन में आता है यह वाकई उनके बारे में जानता है। गांधी जी ने ऐसा चरित्र जिया है जिस पर जितना भी लिख जाये कम है। उन्होने कोई अभिनय नहीं किया और न कोई ऐसा अभिनेता इस देश में हुआ कि उनके चरित्र को जी सके। हमारे देश के कुछ लोग वालीवुड का बहुत शोर मचाते हैं पर गांधीजी पर फ़िल्म बनाने वाला और उनका चरित्र निभाने वाला दोनों विदेशी थे। मतलब साफ़ है कि इस देश में उनके वाद पर बहुत चले पर दर्शन किसी ने नहीं अपनाया और ऐसा करते तो तब जब समझ में आता।

हाल में एक फ़िल्म बनी जिसमें एक अभिनेता ने गांधीगिरी की और गांधीजी के कुछ भक्त बहुत प्रसन्न हो गये। भाई लोगों को पता नहीं कि भाषा का शब्द, अर्थ और उसका भाव बहुत महत्वपूर्ण होता है। गांधीगिरी शब्द का भाव पहले समझो। इस देश की अधिकतर जनता गांव में रह्ती है वह कभी इसे उस भाव से नहीं लेगी जो तथाकथित गांधीवादी समझ रहे हैं। उन्हें यह समझ लेना चाहिये कि हिन्दी क्षेत्रों में गिरी शब्द उसका महत्व कम करने के साथ उसको हास्याभिव्यक्ति भी प्रदान करता है। फ़िर मुंबई को छोड़कर आप किसी भी हिन्दी भाषी क्षेत्र में चले जायें वहां हिन्दी ऐसी नहीं है जैसी वालीवुड की है। उनके फ़िल्मों से हिन्दी का प्रचार तो हो सकता है पर लोग वैसी बोलते नहीं है जैसी उसमें देखते और सुनते हैं।फिल्मों ने देश के चरित्र पर दुष्प्रभाव डाला है पर भाषा अभी बची हुई है। अगर इसी तरह बंबईया फिल्मों की भाषा को आम बोलचाल में अपनाते रहे तो उसे भी हानि पहुंचा सकते हैं.
इस सबके विश्लेषण के साथ मेरा तो यही कहना है कि मैं हमेशा गांधी मार्ग या उनके दर्शन पर चलने के लिये ही कहूंगा क्योंकि गांधिगिरी शब्द मुझे असहज कर देता है और अपने जीवन में कभी भी उसका उच्चारण नहीं कर सकता। हो सकता है मैं गलत हूं पर क्या करूं मैने हिन्दी को जिस रूप में पढा है उसके आधार पर मेरी यह समझ बनी है हालांकि मैं यह दावा भी नहीं करता की मैं एक दम सही हूँ। हिन्दी भाषा में इतनी विशेषज्ञता नहीं है कि ऐसा दावा कर सकूं

लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप

18 अप्रैल 2008

यह तो माया के विवाद हैं-चितन

सांई बाबा के नाम पर रायल्टी वसूलने की बात सुनकर मैं बिल्कुल नहीं चौंका क्योंकि अभी और भी चौंकाने वाली खबरें आऐंगी क्योंकि जैसे-जैसे लोगों की बुद्धि पर माया का आक्रमण होगा सत्य के निकट भारतीय अध्यात्म उनको याद आयेगा उसके लिए अपना धीरज बनाये रखना जरूरी है। मैं प्रतिदिन अंर्तजाल पर चाणक्य, विदुर, कबीर, रहीम और मनु के संदेश रखते समय एकदम निर्लिप्त भाव में रहता हूं ताकि जो लिख रहा हूं उसे समझ भी सकूं और धारण भी कर सकूं। सच माना जाये तो योगसाधना के बाद मेरा वह सर्वश्रेष्ठ समय होता है उसके बाद माया की रहा चला जाता हूं पर फिर भी वह समय मेरे साथ होता है और मेरा आगे का रास्ता प्रशस्त करता है।

मुझे अपने अध्यात्म में बचपन से ही लगाव रहा है पर कर्मकांडों और ढोंग पर एक फीसदी भी वास्ता रखने की इच्छा नहीं रखता। सांई बाबा के मंदिर पर हर गुरूवार को जाता हूं और मेरा तो एक ही काम है। चाहे जहां भी जाऊं ध्यान लगाकर बैठ जाता हूं। सांईबाबा के मंदिर में हजारों भक्त आते और जाते हैं और सब अपने विश्वास के साथ माथा टेक कर चले जाते हैं। सांई बाबा के बचपन में कई फोटो देखे थे तो उनके गुफा या आश्रम के बाहर एक पत्थर पर बैठे हुए दिखाए जाते थे। मतलब उनके आसपास कोई अन्य आकर्षक भवन या इमारत नहीं होती थी। आज सांईबाबा के मंदिर देखकर जब उन फोटो को याद करता हूं तो भ्रमित हो जाता हूं। फिर सोचता हूं कि मुझे इससे क्या लेना देना। सांई बाबा की भक्ति और मंदिर अलग-अलग विषय हैं और मंदिरों में जो नाटक देखता हूं तो हंसता हूं और सोचता हूं कि क्या कभी उन संतजी ने सोचा होगा कि उनके नाम पर लोग हास्य नाटक भी करेंगे। अपनी कारें और मोटर सायकलें वहां पुजवाने ले आते हैं। वहां के सेवक भी उस लोह लंगर की चीज की पूजा कर उसको सांईबाबा का आशीर्वाद दिलवाते हैं। इसका कारण यह भी है कि सांईबाबा को चमत्कारी संत माना जाता है और लोगों की इसी कारण उनमें आस्था भी है।

अधिक तो मैं नहीं जानता पर मुझे याद है कि मुझे शराब पीने की लत थी और एक दिन पत्नी की जिद पर उनके मंदिर गया तो उसके बाद शुरू हुआ विपत्ति को दौर। पत्नी की मां का स्वास्थ्य खराब था वह कोटा चलीं गयीं और इधर मैं उच्च रक्तचाप का शिकार हुआ। अपनी जिंदगी के उस बुरे दौर में मैं हनुमान जी के मंदिर भी एक साथी को ढूंढकर ले गया। आखिर मैं स्वयं भी कोटा गया क्योंकि यहां अकेले रहना कठिन लग रहा था। वहां सासुजी का देहांत हो गया।

उसके बाद लौटे तो फिर हर गुरूवार को मंदिर जाने लगे। इधर मेरी मानसिक स्थिति भी खराब होती जा रही थी। ऐसे में पांच वर्ष पूर्व (तब तक बाबा रामदेव की प्रसिद्धि इतनी नहीं थी)एक दिन भारतीय योग संस्थान का शिविर कालोनी में लगा। संयोगवश उसकी शूरूआत मैंने गुरूवार को ही की थी।

यह मेरे जीवन की दूसरी पारी है। जिन दिनों शराब पीता था तब भी मैं भगवान श्री विष्णु, श्री राम, श्री कृष्ण, श्री शिवजी, श्रीहनुमान और श्रीसांईबाबा के के मंदिर जाता रहा और बाल्मीकि रामायण का भी पाठ करता । योगसाधना शुरू करने के बाद श्रीगीता का दोबारा अध्ययन शुरू किया और देखते देखते अंतर्जाल पर लिखने भी आ गया। मतलब यह कि ओंकार के साथ निरंकार की ही आराधना करता हूं। अपना यह जिक्र मैंने इसलिये किया कि इसमें एक संक्षिप्त कहानी भी है जिसे लोग पढ़ लें तो क्या बुराई है।

असल बात तो मैं यह कहना चाहता हूं कि भारतीय अध्यात्म का मूल रहस्य श्रीगीता में है और इस समय पूरे विश्व में अध्यात्म के प्रति लोगों का रुझान बढ़ रहा है। ‘अध्यात्म’ यानि जो वह जीवात्मा जो हमारा संचालन करता है। उससे जुडे विषय को ही अध्यात्मिक कहा जाता है। कई लोग सहमत हों या नहीं पर यह एक कटु सत्य है कि हमारे प्राचीन मनीषियों ने आध्यात्म का रहस्य पूरी तरह जानकर लोगों के सामने प्रस्तुत किया और कहीं अन्य इसकी मिसाल नहीं है। भारत की ‘अध्यात्मिकता’ सत्य के निकट नहीं बल्कि स्वयं सत्य है। यह अलग बात है कि विदेशियों की क्या कहें देश के ही कई कथित साधु संतों ने इसकी व्याख्या अपने को पुजवाने के लिये की । दुनियों में श्रीगीता अकेली ऐसी पुस्तक है जिसमें ज्ञान सहित विज्ञान है और उसमें जो सत्य है उससे अलग कुछ नहीं है। लोग उल्टे हो जायें या सीधे चाहे खालीपीली नारे लगाते रहें, तलवारे चलाये या त्रिशूल, पत्थर उड़ाये या फूल पर सत्य के निकट नही जा सकते। अगर सत्य के निकट कोई ले जा सकता है तो बस श्रीगीता और भारतीय आध्यात्मिक ग्रंथ। अपने देश के लोग कहीं पत्थरमार होली खेलते हैं तो कहीं फूल चढ़ाते हैं तो कही पशु की बलि देने जाते है कही कही तो शराब चढ़ाने की भी परंपरा है। श्रीगीता को स्वय पढ़ने और अपने बच्चों को पढ़ाने से डरते है कहीं मन में सन्यास का ख्याल न आ जाये जबकि भगवान श्रीकृष्ण ने तो सांख्ययोग (सन्यास) को लगभग खारिज ही कर दिया है। हां उसे पढ़ने से निर्लिप्त भाव आता है और ढेर सारी माया देखकर भी आप प्रसन्न नहीं होते और यही सोचकर आदमी घबड़ाता है कि इतनी सारी माया का आनंद नही लिया तो क्या जीवन जिया। अभी मैंने श्रीगीता पर लिखना शुरू नहीं किया है और जब उसके श्लोकों की वर्तमान संदर्भ में व्याख्या करूंगा तो वह अत्यंत दिल्चस्प होगी। यकीन करिये वह ऐसी नहीं होगी जैसी आपने अभी तक सुनी। आजकल मैं हर बात हंसता हूं क्योंकि लोगों को ढोंग और पाखंड मुझे साफ दिखाई देते है। कहता इसलिये नहीं कि भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है कि भक्त के अलावा इस श्रीगीता का ज्ञान किसी को न दें।

मंदिरों मे भगवान का नाम लेने जरूर लोग जाते हैं पर मन में तो माया का ही रूप धारण किये जाते हैं। मन में भगवान है तो माया भी वहीं है उसी तरह मंदिर में भी है वहां भी आपके मन के अनुसार ही सब है। अपनी इच्छा की पूर्ति के लिये लोग वहां जाते हैं तो कुछ लोग दर्शन करने चले जाते हैं तो कुछ लोग ऐसे ही चले जाते है। खेलती माया है और आदमी को गलतफहमी यह कि मै खेल रहा हूं । काम कर रही इंद्रियां पर मनुष्य अपने आप को कर्ता समझता है।

असल बात बहुत छोटी है। सांईबाबा संत थे और एक तरह से फक्कड़ थे। उनका रहनसहन और जीवन स्तर एकदम सामान्य था पर उनका नाम लेलेकर लोगों ने अपने घर भर लिये और अब अगर यह रायल्टी का मामला है तो भी है तो माया का ही मामला। कई जगह उनके मंदिर है और मैं अगर किसी दूसरे शहर में गुरूवार को होता हूं तो भी उनके मंदिर का पता कर वहां जरूर जाता हूं। मंदिरों में तो बचपन से जाने की आदत है पर मैं केवल इसलिये भगवान की भक्ति करता हूं कि मेरी बुद्धि स्थिर रहे और किसी पाप से बचूं। फिर तो सारे काम अपने आप होते है। कई मंदिरों पर संपत्ति के विवाद होते हैं और तो और वहां के सेवकों के कत्ल तक हो जाते हैं। यह सब माया का खेल है। अब अगर यह मामला बढ़ता है तो बहुत सारे विवाद होंगे। कुछ इधर बोलेंगे तो कुछ उधर। हम दृष्टा बनकर देखेंगे। वैसे भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान सोने की खदान है और कुछ लोग इसको बदनाम करने के लिये भी ऐसे मामले उठा सकते हैं जिससे यह धर्म और बदनाम हो कि देखो इस धर्म को मानने वाले कैसे हैं? जानते हैं क्यों? अध्यात्म और धर्म अलग-अलग विषय है और जिस तरह विश्व में लोग माया से त्रस्त हो रहे हैं वह इसी ज्ञान की तरफ या कहंे कि श्रीगीता के ज्ञान की तरफ बढ़ेंगे। उनको रोकना मुश्किल होगा। इसीलिये उनके मन में भारतीय लोगों की छबि खराब की जाये तो लोग समझें कि देखो अगर इनका ज्ञान इस सत्य के निकट है तो फिर यह ऐसे क्यों हैं?
मैं महापुरुषों के संदेश भी अपने विवेक से पढ़कर लिखता हूंे ताकि कल को कोई यह न कहे कि हमारे विचार चुरा रहा है। यकीन करिय एक दिन ऐसा भी आने वाला है जब लोग कहेंगे कि हमारा इन महापुरुषों के संदशों पर भी अधिकार है क्योंकि हमने ही उनको छापा है। यह गनीमत ही रही कि गीताप्रेस वालों ने भारत के समस्त ग्रंथों को हिंदी में छाप दिया नहीं तो शायद इनके अनुवाद पर भी झगड़े चलते और हर कोई अपनी रायल्टी का दावा करता। जिस तरह यह मायावी विवाद खड़े किये जा रहे हैं उसके वह आशय मै नहीं लेता जो लोग समझते हैं। मेरा मानना है कि ऐसे विवाद केवल भारत के आध्यात्मिक ज्ञान को बदनाम करने के लिये किये जाते है। मुख्य बात यह है कि इसके लिये प्रेरित कौन करता है? यह देखना चाहिए। पत्रकारिता के मेरे गुरू जिनको मैं अपना जीवन का गुरू मानता हूं ने मुझसे कहा था कि तस्वीर तो लोग दिखाते और देखते हैं पर तुम पीछे देखने की करना जो लोग छिपाते हैं। देखना है कि यह विवाद आखिर किस रूप में आगे बढ़ता है क्योंकि श्री सत्य सांई बाबा विश्व में असंख्य लोगों के विश्व के केंद्र में है और जिस तरह यह मामला चल रहा है लोगों को उनसे विरक्त करने के प्रयासों के अलावा कुछ नहीं कहा जा सकता।

समाज तो होता है एक भ्रम-चिंतन

समाज को बांटकर विकास करने का सिद्धांत मुझे कभी नहीं सुहाता। मुझे उकताहट होती है जब कोई आदमी अपनी जाति, भाषा, धर्म, प्रदेश और या कुल के नाम अपना परिचय देकर अहंकार या कुंठा प्रदर्शित करते हैं। मेरा मानना है कि यह सब उन लोगों को कहना पड़ता है जो अपने अंदर केवल कमाने और खाने के अलावा कोई योग्यता नहीं रखते। वैसे कोई आदमी किसी का सगा नहीं होता। यहां तक कि जब अपने परिवार पर संकट होता है तो पहले अपने को बचाने का प्रयास करता है। अगर वह किसी समूह या वर्ग के होने का दावा करता है तो इसका आशय यह है कि उसका लाभ उठाना चाहता है अगर कहीं से उसे लगता है कि उसके वर्ग या समूह की हानि से उसे भी परेशानी होगी तो वह उसके साथ हो जाता है। इसके विपरीत अगर उसे लगता है कि मदद नहीं करने से व्यक्तिगत हानि होगी तो वह दूर भागता है और अगर हानि लाभ की संभावना से परे हो तो वह मूंह भी फेर लेता है।

मतलब यह कि व्यक्तियों द्वारा समूहों और वर्गों के जुड़े होना भी एक भ्रम है। मै किसी प्रकार के नारों और वाद पर चर्चा नहीं करता क्योंकि उनमें कोई को गहन विचार नहीं होता। कुछ अनुमान और कल्पनाएं दिखाकर ऐसे नारे और वाद प्रतिपादित किये जाते हैं जिनका प्रयोजन उन समूहों और वर्गो के लोगों को एकत्रित कर अपने लिये आर्थिक और सामाजिक श्रीवृद्धि के साधन जुटायें जायें। हर समूह या वर्ग के शीर्षस्थ लोग कथित रूप से बड़े होने का स्वांग कर कल्याण और विकास का नारा देते हैं। मैंने कई बार देखा है और कई बार ठगा जाता हूं। कई बार तो ऐसा भी लगा है कि जिस समूह या वर्ग से जुड़ा बताकर कोई बड़ा आदमी मेरे कल्याण की बात कर मुझे अपने साथ जुड़ने को प्रेरित कर रहा है तो यह जानते हुए भी कि वह ढोंग कर रहा है तब भी उसकी बात दिखाने के लिये मान लेता हूं। सोचता हूं कि यार, आदमी को समूह या वर्ग से जुड़ा होना चाहिए क्योंकि सब लोग एसा ही करते हैं। मनुष्य ही सामजिक प्राणी है और असामाजिक भी। ऐसे में अपने समूह या वर्ग से अलग किसी समूह या वर्ग के व्यक्ति से कोई वाद-विवाद हुआ तो उसमें मेरे लोग ही मेरे काम आयेंगे-यही भ्रम पालकर खामोश हो जाता हूं। भरोसा नहीं है कि मेरे समूह या वर्ग के बड़े लोग मेरे किसी काम आयेंगे इसलिये किसी से वाद-विवाद भी नही करता पर फिर भी सच नहीं कहता और भीड़ में भेड़ की तरह शामिल हो जाता हूं।

यह मेरा अकेले का सच नहीं है बल्कि सब लोग यही कर रहे हैं। अपने अंदर एक अनजाना खौफ है जो शुरू से आदमी में जाति,भाषा,धर्म और क्षेत्र के नाम पर बने समूहों और वर्गों में उसे बने रहने के लिये प्रेरित करता है जो सामान्य लोगों के सहयोग से कुछ कथित लोगों को बड़ा आदमी बना देते हैं और उनका जीवन भर उनका शोषण करते हैं। इस देश में पहले भी ऐसा ही हुआ अब भी हो रहा है। सत्य सब जानते हैं कि कोई भी किसी का नहीं है पर फिर भी भ्रम का साथ देते हैं।

फोटो के पीछे भी सच होता है-हास्य कविता

लाया फंदेबाज कई तस्वीरें
और दिखाते हुए बोला
‘‘दीपक बापू, तुम ही एक दोस्त हो
जिससे हम कुछ कह पाते हैं
पर जबसे किया है ब्लाग तुमने शुरू
हमारे लिये हो गये गुरू
भले ही अमल नहीं करते
पर तुंमसे ज्ञान बहुत पाते हैं
हम चाहते है चलो इस शहर में घूम आयें
तो कुछ बदलाव पायें
देखो यह फोटो
उस शहर में कितना बड़ा होटल है
और यह देखो कितना सुदर पार्क है
वहां एक चमकदार शापिंग माल भी
अब तुम अपने ध्यान लगाने के लिये
किसी जगह का पता मत पूछ लेना
क्योंकि इसका मुझे पता नहीं
और भी बहुत सारी इमारतें देखने लायक हैं
साथ चलो तो घूमकर आ जायें
फोटो देखकर खुश हुए
फिर मूंह बनाकर बोले-
‘‘घूम आयेंगे
कल शवासन में इन जगहों पर
ही जाकर घूम आयेंगे
फिर तुम्हें भी बतलायेंगे
कुछ समझा करो यार
शापिंग माल पर पैसे खर्च करो
तो खूब माल आ जायेगा
टिकिट के पैसे हों तो
वाटर पार्क में भी मजा आयेगा
जो होटल दिखा रहे हो
वह तो हमें बाहर से ही दिख पायेगा
हम देखते हैं इस मायावी दुनियां को
जिसका चेहरा हमेशा चमकता नजर आता है
पर इसके पीछे जो सच छिपा है
वह हमें सब जगह नजर आता है
कहीं पैसे के जोर पर
तो कहीं तलवार के सहारे
इसका रंग और निखर जाता है
सच का इस मायावी चेहरे से कोई नहीं नाता
तुम कहते हो कि
हमारे ध्यान के लिये
किसी सर्वशक्तिमान के दर का पता नहीं
पर हमें तो बस उसका ही आसरा होता
जब हमारा तन और मन थक जाता है
इन फोटो से जब ऊबता है मन
इष्टदेव की प्रतिमा को देखकर ही
प्रफुल्लित हो पाता है
तुम अपने परिवार को लेकर घूम आओ
हम चमकती हुई दुनियां की तस्वीरो के
पीछे छिपे कठोर सत्य से पीछा
छुड़ाकर जायें तो कहां जायें
अपनी कविता लिखकर ही खुश हैं
शब्दों भंडार के तरकस से निकलें तो
अपने निशाने पर जायें
कुछ समझें लोग तो कुछ समझ न पायें
……………………………………………..

16 अप्रैल 2008

अन्दर कुछ और बाहर कुछ और-हास्य कविता

सभाकक्ष से बाहर निकलते ही
फंदेबाज जोर से चिल्लाया
‘‘दीपक बापू, तुम्हें तो
मैं बहुत भला आदमी समझा था
पर तुम तो निकले एकदम चालू
अपने मजदूरों के वेतन और बोनस
बढ़ाने के लिये प्रबंधकों का पास तुम्हें लाया
मै उनका अध्यक्ष हूं और तुम मित्र
ढंग से हमारी बात कहोगे
यही सोच तुम्हें बुलाया
पर तुमने कंपनी से अपने ठेके के रेट बढ़ाये
मेरे लिये भी कुछ लाभ जुटाये
पर जिन मजदूरों की बात करने गये थे
उस पर तो हम बोल ही न पाये
बताओं अब क्या मूंह लेकर
साथियों के पास जाऊं
यह तुमने केसा हमको फंसाया ’’

गला खंखार कर मुस्कराते हुए बोले
‘‘चलो चलते हैं पहले वहां होटल में
जहां खाने की पर्ची तुम्हारे प्रबंधन ने दी है
फिर समझाते हैं तुम्हें माजरा
राजनीति करने चले हो या
खरीदने ज्वार बाजरा
हम न तीन में न तेरह में
न अटे में न फटे में
हम तो तुम्हारे वफादार हैं
मजदूरों के हिमायती है हम भी
पर राजनीति तो तुम्हारी चमकानी है
कमरे के अंदर
बाहर होती है राजनीति अलग-अलग
एक समझना बात बचकानी है
हमार ठेके के रेट तो वैसे ही बढ़ते
पर तुम कभी राजनीति की सीढ़ी नहीं चढ़ते
अरे, जाकर मजदूरों को
आश्वासन मिलने की बात बता देना
वहां कर रहे थे हम दोनों हुजूर-हुजूर प्रबंधन की
पर मजदूरों में हाय-हाय करा देना
कुछ तालियां हमारे नाम की बजवा देना
अपने दो-चार चमचों को भी
प्रमोशन दिलवा देना
पर असली हक की लड़ाई कभी न लड़ना
तुम्हारे बूते का नहीं है यह सब
निकल गया हाथ से मामला तो
फिर मुश्किल होगा पकड़ना
वाद और नारों पर चलना सालों साल
भरना अपने घर में माल
हमारी तरह गहरा चिंतन न करना
हम तो हैं सब जगह फ्लाप
और अब तो हिट की फिक्र छोड़ दी है
पर राजनीति में तुम्हें हिट होने के लिये
ऐसा ही मायाजाल है रचना
कमरे के बाहर हाय-हाय
अंदर उनको हुजूर-हुजूर करना
अब सब जगह ऐसा ही वक्त आया
कोई तुम्हें कुछ नहीं कहेगा
पूरा जमाना इसी रास्त चलता आया
...............................................
सूचना-यह काल्पनिक हास्य व्यंग्य रचना है और किसी घटना या व्यक्ति से इसका कोई मेल नहीं है अगर किसी की कारिस्तानी से मेल खा जाये तो वही उसके लिये जिम्मेदार होगा।
कमरे के अंदर-बाहर की राजनीति होती हैं अलग-अलग-हास्य कविता

14 अप्रैल 2008

अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम बनेगा ब्लोग-hindi article

जब मेरे ब्लागों पर कुछ ऐसे लोगों के कमेंट आते हैं जिनसे मैं परिचित नहीं हूं तो तत्काल जाकर उनके ब्लाग देखता हूं। मुझे आश्चर्य तब होता है जब वैचारिक धरातल पर सब मेरे साथ ही खड़े दिखाई देते है। परिचितों में तो करीब-करीब सभी एक ही वैचारिक संघर्ष में व्यस्त हैं। मैने ब्लागरों में जो बातें देखीं हैं वह भी गौर करने लायक है-

1. सभी ब्लागर अपने धर्म में आस्थावान हैं पर उनका कर्मकांडों और अंधविश्वासों से बहुत कड़ा विरोध है। इस मामले में वह यह मानने को तैयार नहीं है कि दिखावे की भक्ति कर लोगों को स्वर्ग का रास्ता दिखाया जाये जो कभी बना ही नहीं।

2.अपने विचारों के साथ ईमानदारी के साथ चलने की उनमें दृढ़ता है और वह किसी प्रकार की चाटुकारिता में यकीन नहीं करते।
3.देश के हालातों से बहुत चिंतित हैं और ऐसी घटना जिसमें किसी महिला को अपमानित किया जाता है, गरीब को सताया जाता है और निर्दोष को मारा जाता है उससे वह विचलित होते है।
4.राष्ट्रभाषा हिंदी के प्रति अटूट निष्ठा है और जिसको प्रमाणित करने के लिये वह किसी भी हद तक कष्ट उठा सकते हैं।
5. वह वर्तमान व्यवस्था से असंतुष्ट हैं। प्रचार माध्यमों के प्रति उनके मन में अनेक संदेह है और वह इसे व्यक्त करते हैं।

लिखने की शैली और प्रस्तुतिकरण के तरीके में अंतर हो सकता है पर कमोवेश मूल विचार में एकरूपता है। अपने आलेखों और कविताओं पर उनके रवैये से एक बात लगती है कि कहीं न कहीं उनके मन में इस समाज को बदलते देखने की इच्छा है। वह जानते हैं कि उनके लिखे से समाज नहीं बदलेगा पर मैं कहता हूं कि आज अगर हम कोई विचार आज लिखकर या बोलकर व्यक्त करते हैं तो कल वह समाज के हिस्सा बन ही जाता है। हमारे सामने भी ऐसा हो सकता है और हमारे बाद भी। काम कहने वाले और करने वाले दोनों मिट जाते हैं पर जो उनके शब्द होते हैं वह आगे चलते जाते हैं।

अक्सर लोग कहते हैं कि लिखे से समाज नहीं बदलता पर शब्द चलते हैं और कोई उनको पढ़कर प्रभावित होता है तो उसके कर्म पर प्रभाव होता है। आज जो मैं लिख रहा हूं वह किसी के शब्दों की प्रेरणा ही हैं न! किसी ने मुझे अभिव्यक्ति का पता दिया था लिखकर। वह मुझे कहां से कहां ले आया। यह तो एक शब्द हैं बहुत सारे शब्द हैं जिनको लेकर मैं आगे बढ़ा। मेरे लिखे से समाज नहीं बदला पर मेरे में बदलाव तो आया न! मैं अगर यहां लिख रहा हूं तो कोई जगह जहां से हट रहा हूं। अपने मनोरंजन के लिये टीवी या अखबार से परे होना पड़ता है। कहीं जाकर फालतू समय नष्ट करने से अच्छा मुझे लिखना लगता है।

निष्कर्ष यह है कि हिंदी में ब्लाग के पाठक और लेखक आज नहीं तो कल बढ़ेंगे ही। मैने एक चार वर्ष से अधिक पुराना ब्लाग देखा था उसमें उसका लेखक निराशा में था और हिंदी में ब्लाग लेखन की प्रगति से नाखुश था। आज हम देखें तो उसके मुकाबले स्थिति बहुत ठीक है। दरअसल लोग ऊबे हुए हैं और वर्तमान में उनकी अभिव्यक्ति का अपना कोई अधिक सशक्त साधन नहीं हैं, जो हैं उनसे वह संतुष्ट नहीं है। एक बात और है कि जो भी संचार और प्रचार माध्यम है वह चल तो हमारे पैसे से ही रहे हैं कोई अपनी जेब से नहीं चला रहा। हम उनका अप्रत्यक्ष भुगतान करते हैं पर उसका पता नहीं लगता यहां पर प्रत्यक्ष भुगतान कर रहे हैं उसको लेकर हम परेशान होते हें क्योंकि वह दिखता है। मै छह सौ रुपये का इंटरनेट का भुगतान करता हूं यह मानकर कि यह डिस्क कनेक्शन है जिसका डबल भुगतान करना है। लिखना तो मेरे लिये एक साधन है जिससे मुझे जीवन में ऊर्जा मिलती है।
जब मेरा यह सोच है तो ऐसा सोचने वाले और भी होंगे। यह अंतर्जाल पर ब्लाग लिखने और पढ़ने का सिलसिला इसलिये भी चलता रहेगा क्योंकि लिखने वाले इसका भुगतान करेंगे और जो इनका चला रहे हैं वह इसे बंद नहंी करेंगे। अन्य प्रचार माध्यम जरूर विज्ञापन न मिलने पर संकट में आ सकते हैं। जिस तरह ब्लाग लोगों की अभिव्यक्ति का साधन बन रहा है उससे तो ऐसा लगता है कि लोग अन्य जगह से हटकर इधर आयेंगे और यह एक सशक्त माध्यम बनेगा। ऐसे में जो प्रबंधन कौशल में माहिर होंगे वह आय भी अर्जित करेंगे और कुछ लोग इसका उपभोक्ता की तरह इस्तेमाल कर इसे प्राणवायु देते रहेंगे। आखिर दूसरे संचार और प्रचार माध्यमों में भी तो ऐसा ही हो रहा है। कोई खर्च कर रहा है और कोई कमा रहा है। मोबाइल पर फालतू बातें कर खर्च करने वाले क्या कम हैं? ऐसे में लिखने वाले भी ऐसा ही करेंगे। मेरा मानना है कि आगे संचार और प्रचार माध्यमों को इससे चुनौती मिलने वाली है और इसके कितना समय लगेगा यह कहना कठिन है पर अधिक नहीं लगेगा ऐसा मेरा अनुमान है। एक दृष्टा की तरह ही मैं इस खेल को देख रहा हूं। अभी हाल ही में कृतिदेव का यूनिकोड में परिवर्तित टूल मिलने के बाद तो मैने हास्य कविता लिखना कम ही कर दिया क्योंकि वह अधिक लिखना मुश्किल होने से ही लिखता था। हालांकि मुझे लगता है कि उन हास्य कवितओं के पाठक बहुत हैं और मुझे फिर लिखना शुरू करना पड़ेगा।

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