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9 दिसंबर 2010

विकिलीक्स के संस्थापक की गिरफ्तारी-हिन्दी लेख (detaining of wikileeas modretor-hindi article)

विकिलीक्स का संस्थापक जूलियन असांजे को अंततः लंदन में गिरफ्तार कर लिया गया। जैसे ही उसके ब्रिटेन में होने की जानकारी जग जाहिर हुई तभी यह अनुमान लगा कि उसकी आज़ादी अब चंद घंटे की है। वह जिस कथित सम्राज्यवादी अमेरिका से पंगा ले रहा था उसका सहयोगी ब्रिटेन उसे नहीं पकड़ेगा इसकी संभावना तो वैसे भी नगण्य थी पर अगर वह किसी अन्य देश में भी होता तो पता मिलने पर उसे गिरफ्तार होना ही था। मतलब यह कि वह अज्ञातवास में रहकर ही बचा रह सकता था।
इस दुनियां के सारे देश अमेरिका से डरते हैं। एक ही संभावना असांजे की आज़ादी को बचा सकती थी वह यह कि क्यूबा में वह अपना ठिकाना बना लेता। जहां तक अमेरिका की ताकत का सवाल है तो अब कई संदेह होने लगे हैं। कोई भी देश अमेरिका से पंगा नहीं लेना चाहता। अब इसे क्या समझा जाये? सभी उसके उपनिवेश हैं? इसका सहजता से उत्तर दिया जा सकता है कि ‘हां,।’
मगर हम इसे अगर दूसरे ढंग से सोचे तो ऐसा भी लगता है कि अमेरिका स्वयं भी कोई स्वतंत्र देश नहीं है। अमेरिका स्वयं ही दुनियां भर के पूंजीपतियों, अपराधियों तथा कलाकर्मियों (?) का उपनिवेश देश है जो चाहते हैं कि वहां उनकी सपंत्ति, धन तथा परिवार की सुरक्षा होती रहे ताकि वह अपने अपने देशों की प्रजा पर दिल, दिमाग तथा देह पर राज्य कर धन जुटाते रहें। चाहे रूस हो या चीन चाहे फ्रांस हो, कोई भी देश अमेरिकी विरोधी को अपने यहां टिकने नहीं दे सकता। जब ताकतवर और अमीर देशों के यह हाल है तो विकासशील देशों का क्या कहा जा सकता है जिनके शिखर पुरुष पूरी तरह से अमेरिका के आसरे हैं।
वैसे तो कहा जाता है कि अमेरिका मानवतावाद, लोकतंत्र तथा स्वतंत्र अभिव्यक्ति का सबसे ताकतवर ठेकेदार है पर दूसरा यह भी सच है कि दुनियां भर के क्रूरतम शासक उसकी कृपा से अपने पदों पर बैठ सके हैं। ईदी अमीन हो या सद्दाम हुसैन या खुमैनी सभी उसके ऐसे मोहरे रहे हैं जो बाद में उसके विरोधी हो गये। ओसामा बिन लादेन के अमेरिकी संपर्कों की चर्चा कम ही होती है पर कहने वाले तो कहते हैं कि वह पूर्व राष्ट्रपति परिवार का -जो हथियारों कंपनियों से जुड़ा है-व्यवसायिक साझाीदार भी रहा है। शक यूं भी होता है कि उसके मरने या बचने के बारे में कोई आधिकारिक जानकारी अमेरिका नहीं देता यह कहते हुए कि उसके पास नहीं है। जिस तरह अमेरिका की ताकत है उसे देखते हुए यह बात संदेहजनक लगती है कि उसे लादेन का पता नहीं है। स्पष्टतः कहीं न कहीं अपने हथियार नियमित रूप से बेचने के लिये वह उसका नाम जिंदा रखना चाहता है। इस बहाने अपने हथियारों का अफगानिस्तान में गाहे बगाहे प्रयोग कर विश्व बाज़ार में वह अपनी धाक भी जमाता रहता है। उसके कई विमान, टैंक, मिसाइल तथा अन्य हथियारों का नाम वहीं प्रयोग करने पर ही प्रचार में आता है जो अन्य देश बाद में खरीदते हैं।
जूलियन असांजे की विकीलीक्स से जो जानकारियां आईं वह हमारे अनुमानों का पुष्टि करने वाली तो थीं पर नयी नहीं थी। इस पर अनेक लोगों को संदेह था कि यह सब फिक्सिंग की तहत हो रहा है। अब असांजे की गिरफ्तारी से यह तो पुष्टि होती है कि वह स्वतंत्र रूप से सक्रिय था। असांजे मूलतः आस्ट्रेलिया का रहने वाला हैकर है। वह प्रोग्रामिंग में महारथ हासिल कर चुका है मगर जिस तरह उसने विकीलीक्स का संचालन किया उससे एक बात तो तय हो गयी कि आने वाले समय में इंटरनेट अपनी भूमिका व्यापक रूप से निभाएगा। अलबत्ता दुनियां भर में गोपनीयता कानून बने हुए हैं जो उसके लिये संकट होगा। गोपनीयता कानूनों पर बहस होना चाहिए। दरअसल अब गोपनीय कानून भ्रष्ट, मूर्ख, निक्कमे तथा अपराध प्रवृत्ति के राज्य से जुड़े पदाधिकारियों के लिये सुरक्षा कवच का काम कर रहे हैं-ईमानदार अधिकारियों को उसकी जरूरत भी नहीं महसूस होती। फिर आजकल के तकनीकी युग में गोपनीय क्या रह गया है?
मान लीजिये किसी ने ताज़महल की आकाशीय लोकेशन बनाकर सेफ में बंद कर दी। उसे किसी छाप दिया तो कहें कि उसने गोपनीय दस्तावेज चुराया है। आप ही बताईये कि ताज़महल की लोकेशन क्या अब गोपनीय रह गयी है। अजी, छोड़िये अपना घर ही गोपनीय नहीं रहा। हमने गूगल से अपने घर की छत देखी थी। अगर कोई नाराज हो जाये तो तत्काल गूगल से जाकर हमारे घर की लोकेशन उठाकर हमारी छत पर पत्थर-बम लिखते हुए डर लगता है-गिरा सकता है। सीधी सी बात है कि गोपनीयता का मतलब अब वह नहीं रहा जो परंपरागत रूप से लिया जाता है। फिर अमेरिका की विदेश मंत्राणी कह रही हैं कि उसमें हमारी बातचीत देश की रणनीति का हिस्सा नहीं है तब फिर गोपनीयता का प्रश्न ही कहां रहा?
बहरहाल अब देखें आगे क्या होता है? असांजे ने जो कर दिखाया है वह इंटरनेट लेखकों के लिये प्रेरणादायक बन सकता है। सच बात तो यह है कि उसकी लड़ाई केवल अमेरिका से नहीं थी जैसा कि कुछ लोग मानते हैं। दरअसल विश्व उदारीकरण के चलते पूंजी, अपराध तथा अन्य आकर्षक क्षेत्रों के लोग अब समूह बनाकर या गिरोहबंद होकर काम करने लगे हैं। मूर्ख टाईप लोगों को वह बुत बनाकर आगे कर देते हैं और पीछे डोरे की तरह उनको नचाते हैं। अमेरिका के रणनीतिकारों की बातें सुनकर हंसी अधिक आती है। यहां यह भी बता दें कि उनमें से कई बातें पहले ही कहीं न कहीं प्रचार माध्यमों में आती रहीं हैं। ऐसा लगता है कि दुनियां भर के संगठित प्रचार माध्यम जो ताकतवर समूहों के हाथ में है इस भय से ग्रसित हैं कि कहीं इंटरनेट के स्वतंत्र लेखक उनको चुनौती न देने लगें इसलिये ही असांजे जूलियन को सबक सिखाने का निर्णय लिया गया है। यही कारण है कि एक स्वतंत्र अभिव्यक्ति के मसीहा अमेरिका की शहर पर दूसरे मसीहा ब्रिटेन में उसे गिरफ्तार किया गया। अमेरिका को उसका मोस्ट वांटेड उसे कितनी जल्दी मिल गया यह भी चर्चा का विषय है खास तौर से तब जब उसने एक भी गोली नहीं दागी हो। जहां तक उसके प्रति सदाशयता का प्रश्न है तो भारत के हर विचारधारा का रचनाकार उसके प्रति अपना सद्भाव दिखायेगा-कम से कम अभी तक तो यही लगता है। हमारे जैसे आम और मामूली आदमी के लिये केवल बैठकर तमाशा देखने के कुछ और करने का चारा भी तो नहीं होता।
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कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
http://anant-shabd.blogspot.com

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19 मार्च 2009

अंतर्जाल का ताला-व्यंग्य आलेख

कभी कभी यह मन होता है कि किसी ब्लाग लेखक के लिखे पाठ के विषय पर कुछ हम भी लिखें। इसका कारण यह है कि किसी भी विषय के अनेक दृष्टिकोण होते हैं और किसी अन्य लेखक के विषय ने अपने दृष्टिकोण से लिखा होता है तो हमारे मन में यह आता है कि अन्य दृष्टिकोण से उस पर लिखें और इसके लिये अगर उस लेखक की कुछ पंक्तियां अपने पाठ में उद्धृत करें तो अच्छा रहेगा। अंतर्जाल पर लिखते हुए इस मामलें में एक आसानी होती है कि उस लेखक की पंक्तियां कापी कर उसे अपने पाठ पर लिखें ताकि पाठकों को यह पता लगे कि अन्य लेखक ने भी उस पर कुछ लिखा है। इससे दोनों लेखकों का दृष्टिकोण पाठकों के समक्ष आता है।

मगर अब समस्या यह आने लगी है कि दूसरों की देखा देखी हमने भी अपने ब्लाग पर ताला लगा दिया है। इसलिये किसी की शिकायत तो कर ही नहीं सकते क्योंकि अंतर्जाल पर अपने पाठों की चोरी की समस्या से अनेक लेखक परेशान हैं। हमारे लिये कभी अधिक परेशानी नहीं रही क्योंकि हमारा लिखा चुराने लायक हैं यह नहीं लगता पर दूसरों की देखा देखी ताला लगा दिया तो लगा दिया। हम किसी के पाठ की चोरी नहीं करते पर जिसका विषय पसंद आये उस पर लिखते हैं और उस लेखक का उल्लेख करने में हमें कोई झिझक नहीं होती-सोचते हैं हो सकता है कि उसके नाम से हम भी कहीं हिट हो जायें। अब जाकर अपने ब्लाग/पत्रिका पर ताला भी इसलिये नहीं लगाया कि हमें अपने पाठ के चोरी होने का खतरा है बल्कि पाठकों और मित्रों को लगे कि ऐसा लिखता होगा कि उसे चोरी का खतरा अनुभव होता है।

बात करें ब्लाग/पत्रिका पर ताले के चोरी होने की। यह एक ऐसा साफ्टवेयर है जिसको अपने ब्लाग पर लिंक करने पर उसके पाठ की कोई कापी नहीं कर सकता। हालांकि इसका कोई तोड़ नहीं होगा यह कहना कठिन है क्योंकि अंतर्जाल पर अनेक तकनीकी खिलाड़ी ऐसे हैं जो तालों को तोड़ने वाले हथोड़े या तालियां बनाकर उसे तोड़ भी सकते हैं। वैसे भी मनुष्य में रचनात्मक विचार से अधिक विध्वंस की भावना अधिक होती है। इस ताले की वजह से हमें तीन चार बार स्वयं ही परेशानी झेलनी पड़ी। उस दिन एक मित्र ब्लाग लेखक का पाठ हमें बहुत अच्छा लगा। सोचा चलो कि उसके अंश लेकर अपने ब्लाग/पत्रिका पर चाप देते हैं और साथ में अपनी बात भी जोड़ लेंगे। जब उसकी कापी करने लगे तो वहां कर्सर काम नहीं कर रहा था। बहुत माथापच्ची की। फिर उनके ब्लाग का मुआयना किया तो देखा कि वहां एक साफ्टवेयर का लिंक है जो इसके लिये इजाजत नहीं देगा हालांकि उसके साथ ताले का लिंक भी था पर हमें वह दिखाई नहीं दिया। मन मारकर हमें अपना इरादा बदलना पड़ा। तब हमने उसी साफ्टवेयर का लिंक अपने ब्लाग पर लगाया। मगर देखा कि अनेक लोग अपनी टिप्पणियों में हमारे पाठ की कापी कर टिप्पणियां कर रहे हैं। तब हैरानी हुई। हमने सोचा चलने दो। दो तीन दिन पहले एक ब्लाग के ताले पर नजर पड़ी। तब वहां से हमने ताले का साफ्टवेयर लिया और अपने ब्लाग@पत्रिकाओं पर लगा दिया। इस तरह अपना ब्लाग सुरक्षित कर लिया।

किसी ने विरोध नहीं किया पर आज एक ब्लाग से जब पाठ का अंश लेने का विचार आया तो देखा कि वहां ताला लगा हुआ है। सच बात तो यह है कि यह ताला इसलिये लगाया जाता है कि कोई मेहनत से लिखे गये पाठों से कापी नहीं कर सके मगर मुश्किल इसमें यह आने वाली है कि इससे आपस में एक दूसरे से जुड़े ब्लाग लेखक उन ब्लाग के पाठों की कापी नहीं कर पायेंगे जिन पर ताले लगे हुए हैं और वह उन पर लिखना चाहते हैं। हालांकि इसका एक तरीका यह भी है कि अपने मित्र ब्लाग लेखक को ईमेल कर उस पाठ की कापी मांगी जा सकती है और वह दे भी देंगे पर लिखने का एक मूड और समय होता है। ईमेल भेजने और उत्तर आने के बीच मूड और समय के बदलने की पूरी गुंजायश होती है।

वैसे भी ताले केवल सामान्य इंसान का मार्ग अवरुद्ध करता है। चोर उठाईगीरे और डकैतों के लिये निर्जीव ताले कोई अवरोध नहीं खड़े कर पाते। अंतर्जाल पर जिस तरह की घटनायें सुनने को मिलती हैं उससे तो नहीं लगता कि ताला उनके लिये कोई अवरोध खड़ कर पायेगा। जिस तरह समाज की स्थिति है उससे अंतर्जाल अलग तो हो नहीं सकता। जिस तरह समाज में विध्वसंक और विलासी लोगों के बाहुल्य है वैसी ही हालत इंटरनेट पर भी है। रचनात्मक लोगांें की कमी यहां भी है अगर ऐसा नहीं होता तो हिंदी में लिखने वालों की संख्या देश की हिंदी आबादी के हिसाब से इतनी कम नहीं होती। इतने सारे इंटरनेट कनेक्शन हैं और सर्च इंजिनों पर हिंदी भाषियों की खोज का दृष्टिकोण देखें तो वह फिल्मी अभिनेत्रियों पर केंद्रित है।
भले ही किसी ब्लाग लेखक का पाठ उपयोग न हो पर ताला तोड़कर अपनी तकनीकी शक्ति का प्रदर्शन करने वाले भी यहां आत्मसंतुष्टि के लिये कर सकते हैं। हो सकता है कि कुछ तकनीकी जानकार पढ़ने लिखने की बजाय ब्लाग पर लगा ताला देखकर ही उसका तोड़ निकालने में ही अपना समय नष्ट करें क्योंकि कुछ लोगों को विध्वंस करने में मजा आता है। हम अपने आसपास कई ऐसे लोग देख सकते हैं जो किसी बेहतर चीज को देखकर उससे प्रसन्न होने की बजाय उसके नष्ट होने के उपायों पर विचार करने लगते हैं।
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30 जुलाई 2008

सर्वशक्तिमान ने कोई कानून नहीं बनाया -हिन्दी शायरी


किसी भूखे को रोटी खिलाने का
उनकी किताबों में कोई इलाज नहीं
ढेर सारे कसूरों की सजाएं है
कसूरवार की मजबूरी समझने का
कोई कहीं रिवाज नहीं
जमाने को सिखाते हैं तमाम तरीके
जन्नत में जाने के
अपनी हकीकतो से दूर
ख्वाबों में जाने के
सर्वशक्तिमान ने कोई कानून नहीं बनाया
फिर भी उसके नाम पर सुनाते हैं
चंद किताबें पढ़कर फैसले
इंसान की भूख को पढ़ने का
कहीं कोई मिजाज नहीं
सभी को मोहब्बत का पैगाम देते हैं
पर जिस्म की भूख पर है खामोश
क्योंकि उस पर किसी का बस नहीं
अरे, ऊपर वाले का नाम लेकर
दुनियो को उसके दस्तूर पर चलाने वालों
उससे पूछ का बताओ
भूखा अगर रोटी की चोरी करे
तो उसकी सजा क्यों होना चाहिए
अगर वह इंसान के पेट में भूख नहीं बनाता तो
मान लेते उसका होगा वजूद
इस धरती पर भी कहीं

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शांति लाने का दावा

बारूद के ढेर चारों और लगाकर
हर समस्या के इलाज के लिए
नये-नयी चीजें बनाकर
आदमी में लालच का भूत जगाकर
वह करते हैं दुनिया में शांति लाने का दावा

बंद कमरों में मिलते अपने देश की
कुर्सियों पर सजे बुत
चर्चाओं के दौर चलते
प्रस्ताव पारित होते बहुत
पर जंग का कारवाँ भी
चल रहा है फिर भी हर जगह
होती कुछ और
बताते और कुछ वजह
जब सब चीज बिकाऊ है
तो कैसे मिल सकता है
कहीं से मुफ्त में शांति का वादा
बहाने तो बहुत मिल जाते हैं
पर कुछ लोग का व्यवसाय ही है
देना अशांति को बढावा

एक दुकान से खरीदेंगे शांति
दूसरा अपनी बेचने के लिए
जोर-जोर से चिल्लाएगा
फैलेगी फिर अशांति
जब फूल अब मुफ्त नहीं मिलते
तो बंदूक और गोली कैसे
उनके हाथ आते हैं
जहाँ से चूहा भी नहीं निकल सकता आजादी से
वहाँ कोहराम मचाकर
वह कैसे निकल जाते हैं
विकास के लिए बहता दौलत का दरिया
कुछ बूँदें वहाँ भी पहुंचा देता है
जहाँ कहीं शांति का ठेकेदार
कुछ समेट लेता है
जानते सब हैं पर
दुनिया को देते हैं भुलावा
न दें तो कैसे करेंगे शांति लाने का दावा
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1 जून 2008

मनु स्मृति:चारों आश्रमों में गृहस्थाश्रम श्रेष्ठ

1. वेद स्मृति के अनुसार चारों आश्रमों में गृहस्थाश्रम श्रेष्ठ है। इसका कारण यह है कि गृहस्थाश्रम में रहने वाला ही आदमी इन तीन आश्रमों में रहने वालों का पालन करता है।
2.वेद मंत्रों का जाप सभी को अभीष्ट फल प्रदान करता है, चाहे ज्ञानी करें या अज्ञानी, स्वर्ग के सुखों की इच्छा करने वाला करे अथवा मोक्ष की इच्छा करने वाला। संकलन कर्ता का अभिमत है यहाँ स्वर्ग के सुखों से आशय यह नहीं है जो मरने के बाद प्राप्त होते है वरन इस इहलोक में भी हम वह तमाम आनंद इन मंत्रों के हृदय से उच्चारण कर प्राप्त कर सकते हैं जो इस देह के लिए अभीष्ट होते हैं।
3. धर्म के दस लक्षण हैं १.धैर्य रखना २.क्षमा करना ३.मन पर नियंत्रण करना ४,चोरी नहीं करना ५.मन,वचन और कर्म करना ६.ज्ञानेद्रियाँ एवं कामेद्रियाँ अर्थात सभी इन्द्रियों पर नियंत्रण करना ७.शास्त्र का ज्ञान प्राप्त करना ८.ब्रह्म ज्ञान प्राप्त करना ९.सच बोलना १०.क्रोध नहीं करना।
4. आत्म साक्षात्कार कर लेने वाला योगी कर्मों के बंधनों में नहीं पड़ता। जो ब्रह्म के दर्शन नहीं कर पाता वही कर्तापन के अहंकार से अच्छे-बुरे कर्मों के परिणाम स्वरूप आवागमन के चक्र में पड़ता है।

रहीम के दोहे:कपट वाले स्थान से दूर रहें

रहिमन वहां न आइए, जहां कपट को हेत
हम तन ढारत ढेकुली, सींचत अपनो खेत

कविवर रहीम कहते हैं कि वहां कतई न जाईये जहां कपट होने की संभावना है। रात भर ढेंकली कोई किसान चलाता रहे पर कोई कपटी उसके खेत का पानी अपनी खेत की तरफ कर ले ऐसा भी होता है।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-छलकपट तो पहले भी था पर अब तो आधुनिक तरीके आ गये हैं और इस तरह छलकपट होता है कि कई बार पता भी नहीं चलता कि हमने क्या और क्यों गंवाया? पहले तो आमने-सामने ही कपट होता था पर अब तो मोबाइल और इंटरनेट के आने से तो वह व्यक्ति हमारी आंखों के सामने भी नहीं होता जो हमें ठगता है। खासतौर से उन युवक और युवतियों को सजग रहना चाहिए जो अपने लिये जीवन साथी ढूंढते है। यहंा तो इतना झूठ बोला जा सकता है कि जिसे पकड़ना संभव ही नहीं है। कोई छद्म नाम रखकर, किसी बड़े परिवार से संबंध बताकर या अपने को बहुत व्यक्ति के रूप में प्रस्तुत कर धोखा देना बहुत आसान है। एक की जगह दूसरे की फोटो भी रखी जा सकती है। ऐसे सैंकड़ों मामले हैं। अभी कई लोगों का यह पता भी नहीं होगा कि हिंदी में ब्लाग लिखे जाते हैं और वह इन कपटों की जानकारी बहुत अच्छी तरह रखते हैं। जो लोग इंटरनेट पर सक्रिय हैं उनको नित-प्रतिदिन हिंदी के ब्लाग पढ़ना चाहिए क्योंकि जिस तरह के धोखेबाजी की जानकारी यहां मिल जाती है अखबारों में भी नहीं मिल पाती।

इसीलिये कपट से बचने के लिए जितना हो सके सावधानीपूर्वक अपने संबंध बनाने चाहिए। नई तकनीकी ने आजकल धोखे के नये तरीकों को जन्म दिया है जिससे यह आसान हो गया है कि न नाम का पता चले न शहर की जानकारी हो और किसी से भी धोखे का शिकार जाये।

18 अप्रैल 2008

यह तो माया के विवाद हैं-चितन

सांई बाबा के नाम पर रायल्टी वसूलने की बात सुनकर मैं बिल्कुल नहीं चौंका क्योंकि अभी और भी चौंकाने वाली खबरें आऐंगी क्योंकि जैसे-जैसे लोगों की बुद्धि पर माया का आक्रमण होगा सत्य के निकट भारतीय अध्यात्म उनको याद आयेगा उसके लिए अपना धीरज बनाये रखना जरूरी है। मैं प्रतिदिन अंर्तजाल पर चाणक्य, विदुर, कबीर, रहीम और मनु के संदेश रखते समय एकदम निर्लिप्त भाव में रहता हूं ताकि जो लिख रहा हूं उसे समझ भी सकूं और धारण भी कर सकूं। सच माना जाये तो योगसाधना के बाद मेरा वह सर्वश्रेष्ठ समय होता है उसके बाद माया की रहा चला जाता हूं पर फिर भी वह समय मेरे साथ होता है और मेरा आगे का रास्ता प्रशस्त करता है।

मुझे अपने अध्यात्म में बचपन से ही लगाव रहा है पर कर्मकांडों और ढोंग पर एक फीसदी भी वास्ता रखने की इच्छा नहीं रखता। सांई बाबा के मंदिर पर हर गुरूवार को जाता हूं और मेरा तो एक ही काम है। चाहे जहां भी जाऊं ध्यान लगाकर बैठ जाता हूं। सांईबाबा के मंदिर में हजारों भक्त आते और जाते हैं और सब अपने विश्वास के साथ माथा टेक कर चले जाते हैं। सांई बाबा के बचपन में कई फोटो देखे थे तो उनके गुफा या आश्रम के बाहर एक पत्थर पर बैठे हुए दिखाए जाते थे। मतलब उनके आसपास कोई अन्य आकर्षक भवन या इमारत नहीं होती थी। आज सांईबाबा के मंदिर देखकर जब उन फोटो को याद करता हूं तो भ्रमित हो जाता हूं। फिर सोचता हूं कि मुझे इससे क्या लेना देना। सांई बाबा की भक्ति और मंदिर अलग-अलग विषय हैं और मंदिरों में जो नाटक देखता हूं तो हंसता हूं और सोचता हूं कि क्या कभी उन संतजी ने सोचा होगा कि उनके नाम पर लोग हास्य नाटक भी करेंगे। अपनी कारें और मोटर सायकलें वहां पुजवाने ले आते हैं। वहां के सेवक भी उस लोह लंगर की चीज की पूजा कर उसको सांईबाबा का आशीर्वाद दिलवाते हैं। इसका कारण यह भी है कि सांईबाबा को चमत्कारी संत माना जाता है और लोगों की इसी कारण उनमें आस्था भी है।

अधिक तो मैं नहीं जानता पर मुझे याद है कि मुझे शराब पीने की लत थी और एक दिन पत्नी की जिद पर उनके मंदिर गया तो उसके बाद शुरू हुआ विपत्ति को दौर। पत्नी की मां का स्वास्थ्य खराब था वह कोटा चलीं गयीं और इधर मैं उच्च रक्तचाप का शिकार हुआ। अपनी जिंदगी के उस बुरे दौर में मैं हनुमान जी के मंदिर भी एक साथी को ढूंढकर ले गया। आखिर मैं स्वयं भी कोटा गया क्योंकि यहां अकेले रहना कठिन लग रहा था। वहां सासुजी का देहांत हो गया।

उसके बाद लौटे तो फिर हर गुरूवार को मंदिर जाने लगे। इधर मेरी मानसिक स्थिति भी खराब होती जा रही थी। ऐसे में पांच वर्ष पूर्व (तब तक बाबा रामदेव की प्रसिद्धि इतनी नहीं थी)एक दिन भारतीय योग संस्थान का शिविर कालोनी में लगा। संयोगवश उसकी शूरूआत मैंने गुरूवार को ही की थी।

यह मेरे जीवन की दूसरी पारी है। जिन दिनों शराब पीता था तब भी मैं भगवान श्री विष्णु, श्री राम, श्री कृष्ण, श्री शिवजी, श्रीहनुमान और श्रीसांईबाबा के के मंदिर जाता रहा और बाल्मीकि रामायण का भी पाठ करता । योगसाधना शुरू करने के बाद श्रीगीता का दोबारा अध्ययन शुरू किया और देखते देखते अंतर्जाल पर लिखने भी आ गया। मतलब यह कि ओंकार के साथ निरंकार की ही आराधना करता हूं। अपना यह जिक्र मैंने इसलिये किया कि इसमें एक संक्षिप्त कहानी भी है जिसे लोग पढ़ लें तो क्या बुराई है।

असल बात तो मैं यह कहना चाहता हूं कि भारतीय अध्यात्म का मूल रहस्य श्रीगीता में है और इस समय पूरे विश्व में अध्यात्म के प्रति लोगों का रुझान बढ़ रहा है। ‘अध्यात्म’ यानि जो वह जीवात्मा जो हमारा संचालन करता है। उससे जुडे विषय को ही अध्यात्मिक कहा जाता है। कई लोग सहमत हों या नहीं पर यह एक कटु सत्य है कि हमारे प्राचीन मनीषियों ने आध्यात्म का रहस्य पूरी तरह जानकर लोगों के सामने प्रस्तुत किया और कहीं अन्य इसकी मिसाल नहीं है। भारत की ‘अध्यात्मिकता’ सत्य के निकट नहीं बल्कि स्वयं सत्य है। यह अलग बात है कि विदेशियों की क्या कहें देश के ही कई कथित साधु संतों ने इसकी व्याख्या अपने को पुजवाने के लिये की । दुनियों में श्रीगीता अकेली ऐसी पुस्तक है जिसमें ज्ञान सहित विज्ञान है और उसमें जो सत्य है उससे अलग कुछ नहीं है। लोग उल्टे हो जायें या सीधे चाहे खालीपीली नारे लगाते रहें, तलवारे चलाये या त्रिशूल, पत्थर उड़ाये या फूल पर सत्य के निकट नही जा सकते। अगर सत्य के निकट कोई ले जा सकता है तो बस श्रीगीता और भारतीय आध्यात्मिक ग्रंथ। अपने देश के लोग कहीं पत्थरमार होली खेलते हैं तो कहीं फूल चढ़ाते हैं तो कही पशु की बलि देने जाते है कही कही तो शराब चढ़ाने की भी परंपरा है। श्रीगीता को स्वय पढ़ने और अपने बच्चों को पढ़ाने से डरते है कहीं मन में सन्यास का ख्याल न आ जाये जबकि भगवान श्रीकृष्ण ने तो सांख्ययोग (सन्यास) को लगभग खारिज ही कर दिया है। हां उसे पढ़ने से निर्लिप्त भाव आता है और ढेर सारी माया देखकर भी आप प्रसन्न नहीं होते और यही सोचकर आदमी घबड़ाता है कि इतनी सारी माया का आनंद नही लिया तो क्या जीवन जिया। अभी मैंने श्रीगीता पर लिखना शुरू नहीं किया है और जब उसके श्लोकों की वर्तमान संदर्भ में व्याख्या करूंगा तो वह अत्यंत दिल्चस्प होगी। यकीन करिये वह ऐसी नहीं होगी जैसी आपने अभी तक सुनी। आजकल मैं हर बात हंसता हूं क्योंकि लोगों को ढोंग और पाखंड मुझे साफ दिखाई देते है। कहता इसलिये नहीं कि भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है कि भक्त के अलावा इस श्रीगीता का ज्ञान किसी को न दें।

मंदिरों मे भगवान का नाम लेने जरूर लोग जाते हैं पर मन में तो माया का ही रूप धारण किये जाते हैं। मन में भगवान है तो माया भी वहीं है उसी तरह मंदिर में भी है वहां भी आपके मन के अनुसार ही सब है। अपनी इच्छा की पूर्ति के लिये लोग वहां जाते हैं तो कुछ लोग दर्शन करने चले जाते हैं तो कुछ लोग ऐसे ही चले जाते है। खेलती माया है और आदमी को गलतफहमी यह कि मै खेल रहा हूं । काम कर रही इंद्रियां पर मनुष्य अपने आप को कर्ता समझता है।

असल बात बहुत छोटी है। सांईबाबा संत थे और एक तरह से फक्कड़ थे। उनका रहनसहन और जीवन स्तर एकदम सामान्य था पर उनका नाम लेलेकर लोगों ने अपने घर भर लिये और अब अगर यह रायल्टी का मामला है तो भी है तो माया का ही मामला। कई जगह उनके मंदिर है और मैं अगर किसी दूसरे शहर में गुरूवार को होता हूं तो भी उनके मंदिर का पता कर वहां जरूर जाता हूं। मंदिरों में तो बचपन से जाने की आदत है पर मैं केवल इसलिये भगवान की भक्ति करता हूं कि मेरी बुद्धि स्थिर रहे और किसी पाप से बचूं। फिर तो सारे काम अपने आप होते है। कई मंदिरों पर संपत्ति के विवाद होते हैं और तो और वहां के सेवकों के कत्ल तक हो जाते हैं। यह सब माया का खेल है। अब अगर यह मामला बढ़ता है तो बहुत सारे विवाद होंगे। कुछ इधर बोलेंगे तो कुछ उधर। हम दृष्टा बनकर देखेंगे। वैसे भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान सोने की खदान है और कुछ लोग इसको बदनाम करने के लिये भी ऐसे मामले उठा सकते हैं जिससे यह धर्म और बदनाम हो कि देखो इस धर्म को मानने वाले कैसे हैं? जानते हैं क्यों? अध्यात्म और धर्म अलग-अलग विषय है और जिस तरह विश्व में लोग माया से त्रस्त हो रहे हैं वह इसी ज्ञान की तरफ या कहंे कि श्रीगीता के ज्ञान की तरफ बढ़ेंगे। उनको रोकना मुश्किल होगा। इसीलिये उनके मन में भारतीय लोगों की छबि खराब की जाये तो लोग समझें कि देखो अगर इनका ज्ञान इस सत्य के निकट है तो फिर यह ऐसे क्यों हैं?
मैं महापुरुषों के संदेश भी अपने विवेक से पढ़कर लिखता हूंे ताकि कल को कोई यह न कहे कि हमारे विचार चुरा रहा है। यकीन करिय एक दिन ऐसा भी आने वाला है जब लोग कहेंगे कि हमारा इन महापुरुषों के संदशों पर भी अधिकार है क्योंकि हमने ही उनको छापा है। यह गनीमत ही रही कि गीताप्रेस वालों ने भारत के समस्त ग्रंथों को हिंदी में छाप दिया नहीं तो शायद इनके अनुवाद पर भी झगड़े चलते और हर कोई अपनी रायल्टी का दावा करता। जिस तरह यह मायावी विवाद खड़े किये जा रहे हैं उसके वह आशय मै नहीं लेता जो लोग समझते हैं। मेरा मानना है कि ऐसे विवाद केवल भारत के आध्यात्मिक ज्ञान को बदनाम करने के लिये किये जाते है। मुख्य बात यह है कि इसके लिये प्रेरित कौन करता है? यह देखना चाहिए। पत्रकारिता के मेरे गुरू जिनको मैं अपना जीवन का गुरू मानता हूं ने मुझसे कहा था कि तस्वीर तो लोग दिखाते और देखते हैं पर तुम पीछे देखने की करना जो लोग छिपाते हैं। देखना है कि यह विवाद आखिर किस रूप में आगे बढ़ता है क्योंकि श्री सत्य सांई बाबा विश्व में असंख्य लोगों के विश्व के केंद्र में है और जिस तरह यह मामला चल रहा है लोगों को उनसे विरक्त करने के प्रयासों के अलावा कुछ नहीं कहा जा सकता।

14 अप्रैल 2008

क्रिकेट से अपनी भावनाएं जोड़ना अब व्यर्थ

कानपुर में कल खत्म तीसरे टेस्ट मैच को देखकर तो ऐसा लगता है कि खिलाड़ी अब पांच दिवसीय मैचों में भी ट्वंटी-ट्वंटी जैसा खेलने चाहते हैं। पिच बहुत खराब थी या उस पर खेला नहीं जा सकता है यह केवल एक प्रचार ही लगता है। इसी पिच पर लक्ष्मण और गांगुली जमकर खेले और शायद इसलिये कि उनको अब इसका आभास हो गया है कि ट्वंटी-ट्वंटी के चक्क्र में रहे तो इससे भी जायेंगे। बाकी खिलाडी तो इसी चक्कर में है कि अब ट्वंटी-ट्वंटी का समय आ रहा है और उसके लिये इन्हीं टेस्ट मैचों में ही प्रयास किये जायें तो अच्छा है। चाहे कितनी भी सफाई दी जाये पर तीन दिन मे चार परियों का होना इस बात का प्रमाण है कि खिलाडि़यों में अब पिच पर टिक कर बल्लेबाजी करने की धीरज समाप्त हो गया है।

मैने यह मैच नहीं देखा। कल ऐसा लगा रहा कि भारत जीत रहा है तब काम से चला गया। जिस तरह राहुल द्रविड़ और गांगुली को खेलते देखा तो यह लगा कि पिच कैसी भी हो बल्लेबाज पर भी बहुत कुछ निर्भर होता है। संभव है कि अब ट्वंटी-ट्वंटी की जो प्रतियोगिता हो रही है उसके लिये कुछ खिलाड़ी तैयारी कर रहे हों और जिनको वहां पैसा कमाने का अवसर नहीं मिला हो वह इस प्रयास में रहे हो कि ट्वंटी-ट्वंटी के किसी प्रायोजक की नजर उस पर पड़ जाये। भारत जीत गया इससे कुछ लोगों को बहुत तसल्ली हो गयी होगी क्योंकि पिछले टेस्ट मैच में कुछ लोग भारत की हार पर रुआंसे हो गये होंगे। कुछ मिलाकर अब क्रिकेट के प्रशंसकों के दायरा सिमट रहा है और मुझे नहीं लगता कि इसकी किसी को फिक्र है। राष्ट्रीय भावना को इस खेल से जोड़ने का कोई मतलब नहीं रहा क्योंकि अब तो विदेशी खिलाड़ी भी इसमें कुछ देश के खिलाडियों के साथ मिलकर अपनी टीमों का मोर्चा संभालेंगे। भारत के संवेदनशील लोगों को यह गवारा नहीं होगा पर यह भी सच है कि आर्थिक उदारीकरण के इस युग में यह सब तो चलता रहेगा।

1983 में विश्व कप जीतने पर ही भारत में एकदिवसीय क्रिकेट मैच लोकप्रिय हुए थे और उसका कारण था कि लोगों में राष्ट्रप्रेम का भाव जाग उठा था। अब भले ही क्रिकेट में पैसा अधिक हो गया है पर उसका जो नया रूप सामने आ रहा है उसे देखते हुए उसमें ऐसी कोई भावना रखना अपने आपको धोखा देना होगा। हम जैसे लोगों के लिये तो अब भावनात्मक रूप से इस खेल में जुड़ना मुश्किल है जो हर बात में कुछ रोमांच तो चाहते हैं पर उसके साथ अपने क्षेत्र, प्रदेश और राष्ट्र की भावना की संतुष्टि चाहते हैं। अब तो इस खेल के साथ वही लोग जुड़ेंगे जो शुद्ध रूप से मनोरंजन तथा आर्थिक फायदे चाहते हैं।

मनु स्मृति:सुपात्र को दिया दान ही फलता है

न वार्यपि प्रयचछत्तु बैडालव्रतिके द्विजे
न बकव्रतिके विप्रे नावेदविदि धर्मवित्

धार्मिक वृत्ति के लोगों को चाहिए कि वह दूसरों को मूर्ख बनाकर लूटने वाले व्यक्ति या साघू का भेष धरकर ढोंग और पाखंड रचाने वाले तथा ब्रहम् ज्ञान से रहित व्यक्ति को पानी तक न पिलायें।

यथा प्लवेनौपलेन निमज्जत्युदके तरन्
तथा निमज्जतोऽधस्तादज्ञो दातृप्रतीच्छकौ


जिस तरह पानी में पत्थर की नाव पर सवार व्यक्ति नाव के साथ ही पानी में डूब जाता है वैसे ही दान लेने वाली कुपात्र और मूर्ख तथा उसे दान देने वाला दोनों ही नरक में जाते हैं।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-भारतीय अध्यात्म में दान की महिमा बहुत है पर इस आड़ में ढोंगी साधु और संतों ने आम लोगों को मूर्ख बनाकर लूटने का जो सिलसिला शुरू किया तो वह सदियों के बाद आज भी जारी है। हालांकि आज लोग पहले के मुकाबले अधिक शिक्षित हैं पर इसके बावजूद धर्म के नाम ढोंगी लोगों का दान देकर उनके भरण-भोषण कर अनजाने में पाप के भागी बन रहे हैं। कहने को तो कई लोग कहते हैं कि हमें क्या मतलब? हम तो शुद्ध मन से दान कर रहे है और हमारी नीयत तो साफ है।’

हमारे अध्यात्म के मनीषी मनु कहते हैं कि सुपात्र को दिया गया दान फलता है और कुपात्र को दिया गया दान पाप का भागी बना देता है। अगर हमने शुद्ध हृदय से दान दिया है और लेने वाला मूर्ख और दुष्ट है तो उसके द्वारा किया गया दुरुपयोग हमें भी पाप का भागी बना देता है अतः ऐसे दान से तो न करना अच्छा। अतः दान देते समय लेने वाले की पात्रता का भी विचार करना चाहिए।
मनु स्मृति:ढोंगी आदमी को पानी भी न पिलायें

13 अप्रैल 2008

सौम्यता, सहजता, सरलता और समभाव का प्रतीक हैं भगवान श्रीराम

सौम्यता, सहजता, सरलता और समभाव का प्रतीक हैं भगवान श्रीराम

आज पूरे देश में रामनवमी का त्यौहार मनाया जा रहा है। राम हमारे देश के लोगों के हृदय के नायक है। यह स्वाभाविक ही है कि लोग राम का नाम सुनते ही प्रफुल्लित हो उठते हैं। राम की महिमा यह कि जिस रूप में उन्हें माना जाये उसी रूप में आपके हृदय में स्थित हो जाते है। राम उनके भी जो उनको माने और राम उनके भी जो उन्हें भजें और वह उनके भी हैं जो उन्हें अपने हृदय में धारण करें।
मैं बचपन से भगवान विष्णू की उपासना करता आया हू। स्वाभाविक रूप से भगवान श्री राम के प्रति भक्तिभाव है। इसका एक कारण यह भी रहा है कि मैं मूर्ति तो भगवान विष्णू की रखता हूं पाठ बाल्मीकी रामायण का करता हूं। कुल मिलाकर भगवान विष्णू ही मेरे हृदय में राम की तरह स्थित हैं। मतलब यह मेरे लिये भगवान राम ही भगवान विष्णू है। यह समभाव की प्रवृति मुझे भगवान राम के चरित्र से मिलती है।
भगवान राम के प्रति केवल भारत में ही बल्कि विश्व में भी उनकी अनुयायियों की भारी संख्या है। मतलब यह कि भगवान श्रीराम का चरित्र केवल देश की सीमाओं में नहीे सुना और सुनाया जाता है वरन् देश के बाहर भी उनके प्रति लोगों के मन में भारी श्रद्धा है। जब मै आज भारत के अंदर चल रहे हालाते पर नजर डालता हूं तो लगता है लोग केवल नाम के लिये ही राम को जप रहे है। भगवान राम के चरित्र की व्याख्यायें बहुत लोग कर रहे है पर केवल लोगों में फौरी तौर पर भक्ति भाव जगाकर अपनी हित साधने तक ही उनकी कोशिश रहती है। मैं अक्सर जब परेशानी या तनाव में होता हूं तो उनका स्मरण करता हूं।
यकीन मानिए भगवान राम के मंदिर में जाकर कोई वस्तू या कार्यसिद्ध की मांग नहीं करता वरन् वह मेरे मन और बुद्धि में बने रहें इसीलिये उनके समक्ष नतमस्तक होता हूं। जब संकट में उन्हें याद करता हूं तो केवल इसीलिये कि मेरा घैर्य, आस्था और विश्वास बना रहे यही इच्छा मेरी होती है। थोड़ी देर बाद मुझे महसूस होता है कि वह शक्ति प्रदान कर रहे है।
भगवान श्रीराम का चरित्र कभी किसी अविश्वास और अकर्मणता का प्रेरक नहीं हो सकता। जो केवल इस उद्देश्य से भगवान राम को पूजते हैं कि उन पर कोई संकट न आये और उनके सारे कार्य सिद्ध हो जायें-वह राम का चरित्र न तो समझते है न उन्हें कभी अपने विश्वास को प्रमाणित करने का अवसर मिल पाता है।
भगवान श्री राम की कथा पढ़ना और सुनना अच्छी बात है पर उन्हें अपने हृदय में धारण कर ही जीवन में आनंद ले पाते है। ऐसे विरले ही होते है। भगवान राम के चरित्र में जो सौम्यता, सहजता, सहृदयता, समभाव और सदाशयता है वह विरले ही चरित्रों में मिल पाती है। यही कारण है कि भारत की सीमाओं के बाहर भी उनका चरित्र पढ़ा और सुना जाता है। अगर मनुष्य के रूप में की गयी उनकी लीलाओं का चर्चा की जाये तो वह कभी विचलित नहीं हुए। कैकयी द्वारा बनवास, सीताजी के हरण और रावण के साथ युद्ध में श्रीलक्ष्मण जी के बेहोश होने के समय उन्होंने जिस दृढ़ता का परिचय दिया वह विरलों में ही देखने को मिलती है। रावण के साथ युद्ध में एक ऐसा समय भी आया जब सभी राक्षसों को ऐसा लगा रहा था कि भगवान राम ही उनके साथ युद्ध कर रहे है। वह घबड़ा कर इधर उधर भाग रहे थे जहां जाते उन्हें राम देखते। मतलब यह कि राम केवल उनके ही नहीं है जो उनके पूजते बल्कि उनके भी है जो उन्हें नहीं पूजते-नहीं तो आखिर अपने शत्रूओं को दर्शन क्यों देते? यह उनके समभाव का प्रतीक है। क्या हम उन्हें मानने वाले ऐसा समभाव दिखा पाते है। कतई नहीं। यकीनन हमेें अब आत्ममंथन करना चाहिए कि क्या केवल भगवान श्रीराम की मूर्ति लगाकर उनके प्रति दिखावे की आस्था प्रकट करना ही काफी है। हमें उनके पूर्ण स्वरूप का स्मरण कर उसे अपने मन और बुद्धि में स्थापित करना चाहिए। याद रहे मनुष्य की पहचान उसकी बुद्धि से है। अगर आप अपनी बुद्धि में अपने इष्ट को स्थापित करेंगे तो धीरे धीरे उन जैसे होते जायेंगे। एक विद्वान का मानना है कि मूर्ति पूजा का प्रत्यक्ष रूप से लाभ कुछ नहीं होता पर उसका यह फायदा जरूर होता है आदमी जब भगवान की पूजा करता है तो उसके हृदय में उनके गुणों का एक स्वरूप स्थापित होता है जो आगे चलकर उसका स्थायी हिस्सा बन जाता है। शर्त यही है वह आदमी उस समय किसी अन्य भाव का स्थान न दे।
इस दुनिया में हमेशा मूर्तिपूजा का विरोध करने वालों की संख्या ज्यादा रही है। दरअसल वह इससे होने वाले मनोवैज्ञानिक फायदों को नहीं जानते। प्रत्यक्ष रूप से तो इसका फायदा नही होता दिखता पर अप्रत्यक्ष रूप से जो व्यक्ति में शांति और दृढ़मा आती है उसको किसी पैमाने से मापना कठिन है। मुख्य बात है अपने अंदर भाव उत्पन्न करना। आखिर कोई भी व्यक्ति काम करता है तो उसके पीछे उसके विचार, संकल्प और निश्चयों के साथ ही चलता है। जब उनमें दोष है तो किसी सार्थक कार्य के संपन्न होने की आशा करना ही व्यर्थ है। अब लोग किसी और को तो नहीं अपने आपको धोखा देते है। मंदिरों में जाकर वह भगवान के सामने नतमस्तक तो होते है पर स्वरूप के अंतर्मन में ध्यान करने की कला में कितने दक्ष है यह तो वही जाने। अलबत्ता सबसे बड़ी बात राम की भक्ति के साथ उन्हें मन और बुद्धि में धारण भी जरूरी है। मूर्तियां तो उनका वह स्वरूप है जो आखों से ग्रहण करने के लिए स्थापित किया जाता है ताकि उसे हम अपने अंतर्मन में ले जा सके।
भगवान राम का चरित्र कभी न भुलाये जाने वाला चरित्र है। उनके प्रति अपार श्रद्धा के साथ उनके संदेशों पर चलने की जरूरत भी है। उन्होंने नैतिक आचरण, समभाव, सहजता और सरल दृष्टिकोण से जीवन जीने का जो तरीका प्रचारित किया उस पर चलने की जरूरत है। हमें समूह नहीं एक व्यक्ति के रूप में यह विचार करना चाहिए कि क्या हम उनके द्वारा निर्मित पथ पर चले रहे है या नहीं। दूसरा व्यक्ति क्या कर रहा है यह हमें नहीं सोचना चाहिए। भगवान श्रीराम को अपने हृदय में धारण करन चाहिए जिससे केवल न हम स्वयं बल्कि समाज को भी संकट से उबारने की शक्ति अर्जित कर सकें।

राजमहल अब चारागाह हो गए-हिन्दी शायरी

कई बस्तियां बसीं और उजड़ गईं
राजमहल खडे थे जहाँ
अब बकरियों के चरागाह हो गए

सर्वशक्तिमान अपनी कृपा के साथ
कहर का हथियार नहीं रखता अपने साथ
तो कौन मानता उसे
कई जगह उसका भी प्रवेश होता वर्जित
नाम लिया जाता
पर घुसने नहीं दिया जाता
नरक और स्वर्ग के दृश्य यहीं दिखते
फिर कौन ऊपर देख कर डरता
खडे रहते फ़रिश्ते नरक में
शैतानों के महल होते सब जगह
जो अब इतिहास के कूड़ेदान में शामिल हो गए
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चंद किताबों को पढ़कर
सबको वह सुनाते हैं
खुद चलते नहीं जिस रास्ते
वह दूसरे को बताते हैं
उपदेश देते हैं जो शांति और प्रेम का
पहले वह लोगों को लडाते हैं
फिर गुरु की भूमिका में आते हैं
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31 मार्च 2008

क्या वह ज्ञानी थे-हिन्दी कहानी

वह ज्ञानी थे और अभी प्रवचन कार्यक्रम कर लौटे थे। मेरे से उनकी मुलाकात उनके यजमान के घर पर जो कि मेरे मित्र थे के घर पर हुई जहां मै किसी काम से गया था।

मित्र ने मुझसे कहा कि ‘‘तुम प्रवचन कार्यक्रम में क्यों नहीं आये? आना चाहिए भई। यह ठीक है कि तुम आजकल योग साधना कर रहे हो पर कभी-कभी सत्संग भी सुना करो।’’

वह प्रवचनकर्ता कोई साधु संत नहीं थे बल्कि गृहस्थ थे पर ऐसे ही उनका नाम हो गया था तो लोग समय पास करने के लिये उनका बुला लेते थे। मैं मित्र की बात सुनकर हंस पड़ा तो वह सज्जन बोले-‘‘हां इस दुनियां में सुबह बहुत तेजी से सांस लेने वाले भी कई योगी न रहे। कबीरदास जी यही कहते हैं इसलिये भगवान भजन में मन लगाना चाहिये। योग साधना से क्या होता है।’’

मैं थोड़ा जोर से हंसा तो वह बोले-‘‘आप इसे मजाक मत समझिये मैं आपको सही ज्ञान की बात बता रहा हूं।’’

इसी बीच मेरे मित्र की पत्नी भी एक थाली में फल और मिठाई रखकर आ गयी तो वह उसे देखते हुए बोले-‘‘मिठाई तो अभी नहीं खाउंगा। एक सेव अभी खा लेता हूं बाकी थैले में रख दो घर ले जाता हूं।

मैं भी मुस्कराते हुए उन्हें देख रहा था। मेरा मित्र होम्योपैथी का डाक्टर था और अधिक प्रसिद्ध न होने के बावजूद उसका काम ठीक चल रहा था और अपने मोहल्ले की तरफ के वह इस कार्यक्रम का मुख्य कर्ताधर्ता था।

वह सेव खाते हुए उससे बोले-‘भाई, हमें कम से कम महीने भर की दवाई दे दो ताकि हमारी और पत्नी की डायबिटीज कंट्रोल में रहे।’’

मेरा मित्र दवाई लेने चला गया तो उसकी पत्नी भी वहंा से चली गयी। तब वह मुझसे बोले-योगसाधना से कोई सिद्ध नही होता। यह कहने की बात है। इसलिये आप भगवान में मन लगाया करो। उनकी भक्ति से सब ठीक हो जाता है।’’


मैने उनसे कहा-‘यह मेरा मित्र डाक्टर है और पोच वर्ष पूर्व उच्च रक्तचाप की शिकायत के कारण इलाज कराने आया था । तब इसने मुझे खूब डांटा था। इसके पास अब कभी मरीज का तरह दवाई नहीं लेने न आना पड़े इसलिये ही योगसाधना करता हूं। यकीन करिये केवल उसके बाद दो वर्ष पहले बुखार की शिकायत लेकर आया था यह अलग बात है कि यह उस दिन घर पर नहीं था तो इसके पोर्च में पलंग पर सो गया और मेरा बुखार चला गया। इससे बचने के लिये ही मैं योगसाधना, ध्यान और मंत्रजाप करता हूं।’’

तब तक मेरा मित्र कमरे के अंदर आ गया था और मैने उसके सामने ही कहा-‘‘एक डाक्टर के रूप में मुझे इसकी शक्ल पसंद नहीं है।’’

उनका मूंह उतरा हूआ था। उन्होंने अपना मिठाई और फल को थैला उठाया और वहंा से चले गये। जाते वक्त उन्होंने मेरे मित्र और उसकी पत्नी से बात की पर मेरी तरफ देखा भी नहीं। उनके जाने के बाद मैने अपने मित्र से पूछा-‘‘कौन सज्जन थे ये?’’

वह बोला-‘‘कोई अधिक प्रसिद्ध तो नहीं है मेरे मरीज है और मोहल्ले के लोगों ने कहा कि सत्संग कराना है। सो बुलवा लिया। वैसे बहुत ज्ञानी हैं।’’
तुम्हें कैसे लगे?’

मित्र और मेरे बीच अनेक बार अध्यात्म पर जोरदार बहसें सुन चुकी उसकी पत्नी को मेरे से इस उत्तर की आशा नहीं थी। इसलिये उसने हंसते हुए पूछा-‘‘क्या सोच बोल रहे हैं या हमारा मन रख रहे हैं।’’

वह गलत नहीं थी पर मैं मित्र द्वारा दिये गये महत्वपूर्ण कागज के लिफाफे को लेकर वहां से बाहर निकल गया। पीछे से मेरा मित्र मुझसे कह रहा था-सच बोलना। क्या तुंम हमारा दिल रखने के लिये मान रहे हो कि वह वास्तव में ज्ञानी हैं।’’

मैने पलटकर उसे मुस्कराते हुए देख और वहां से बिना उत्तर दिये चला आया।

30 मार्च 2008

दलाई लामा ने भी लगाया चीन पर आरोप

आखिर तिब्बत के निर्वासित धार्मिक नेता दलाई लामा ने भी वहां की बिगड़ी हालत के लिये चीन को ही जिम्मेदार ठहरा दिया। इससे पूर्व मैंने अपने लेख में यह संदेह जाहिर किया था कि चीन के शासक वहां के हालत बिगाड़ कर अपने सैन्य ठिकानों सुदृढ़ एवं विस्तृत करने का बहाना ढूंढ रहे हो सकते हैं। अब दलाई लामा ने जिस तरह उनका जिस तरह कटघरे में खड़ा किया है उसे जरूर देखना चाहिए।

दलाई लामा ने तो यहां बैठकर वहां के लोगों से शांति की अपील की थी फिर भी वहां क्यों हिंसा हो रही है? चीन के सम्राज्यवादी शासकों ने सांस्कृतिक क्रांति के बाद से ही चारों तरह एक तरह से आतंक की अभेद्य दीवार अपने देश में बना रखी है और उसे देख कर नहीं लगता कि वहां उसके शासकों की नजर के बिना किसी आंदोलन को चलाना तो दूर उसकी सोच भी नही सकता होगा। उसके पड़ौसी देशों में भी किसी की हिम्मत नहीं है कि उसके अंदर चल रही असंतुष्ट गतिविधियों को प्रत्यक्ष क्या अप्रत्यक्ष समर्थन भी दे सके।

एसा लगता है कि चीन की जनता को भले ही बाहर की हवा न लगी हो पर उसके नेता अब दूसरे देश के नेताओं से राजनीति का सबक सीख गये हैं। जब संपूर्ण देश में अशांति का माहौल हो तो किसी क्षेत्र विशेष में फैले अंसतोष को हवा दो ताकि लोगो का ध्यान उस ओर चला जाये। वहां फिर बलप्रयोग करो ताकि देश की जनता वाहवाही करे और दुश्मन डर जाये। यह आंदोलन चीनी नेताओं के इशारे पर उन नेताओं ने शुरू किया होगा जिन्हें चीन के राजनयिकों ने उपकृत किया होगा या ऐसा करने का आश्वासन दिया होगा-हालांकि इसमें उनके लिये जोखिम भी कम नहीं है क्योंकि जब चीन जब वहां अपना काम पूरा कर लेगा तब उनका भी वैसा ही हश्र होगा जैसा अन्य विरोधियों का होता आया है।

वैसे भी इस समय तिब्बतियों को स्वतंत्रता मिलना तो दूर स्वायत्ता मिलना भी कठिन है और अगर ऐसा कोई आंदोलन वहां चल रहा है तो उसे केवल पश्चिमी राष्ट्रों का मूंहजुबानी समर्थन ही मिल सकता है इससे अधिक कुछ आशा नही की जा सकती। भारत से बड़ा उपभोक्ता बाजार चीन का है और उसे पाने की होड़ सभी पश्चिमी राष्ट्रों में है। इसके अलावा सामरिक दृष्टि से चीन इतना ताकतवर है कि कोई उस पर हमला नहीं कर सकता। ऐसे में तिब्बत की चीन से मुक्ति अभी तो संभव नहीं है। ऐसे में वहां चल रहे कथित आंदोलन का लंबे समय तक चलना संभव नहीं है। इसके बावजूद विश्व के सभी देशों को उस पर नजर रखना ही चाहिए क्योंकि वह अपनी सामरिक शक्ति बढ़ायेगा जो कि विश्व के लिये हितकर नहीं है। अभी तक चीन ने तिब्बत को अपनी सैन्य छावनी बनाकर रखा हुआ है और अब वह वहां अपने देश के अन्य इलाकों से लोग लाकर अपनी ताकत बढ़ाना चाहता है। उसके कथित विकास के दावे खोखले हैं और चूंकि अब प्रचार माध्यम इतने व्यापक हो गये हैं इसलिय कोई देश अपने लोगों को दूसरे देशों से मिलने वाली जानकारी रोक नहीं सकता और निश्चित रूप से वहां की सरकार की जनता में असलियत अब खुल रही होगी और उससे विचलित वहां की सरकार उनका ध्यान बंटाने के लिये यह नाटक कर रही है-दलाई लामा के आरोप से तो यही लगता है।

24 मार्च 2008

मिलन के साथ वियोग भी आसान होना चाहिए-आलेख

कुछ ऐसी घटनाएँ अक्सर समाचारों में सुर्खियाँ बनतीं है जिसमें पति अपनी पत्नी की हत्या कर देता है
१. क्योंकि उसे संदेह होता है की उसके किसी दूसरे आदमी से उसके अवैध संबंध हैं।
२. कहीं पुरुष की पत्नी उसके अवैध संबंधों में बाधक होती है।
इसके उलट भी होता है। ऐसी घटनाएँ जो अभी तक पाश्चात्य देशों में होतीं थीं अब यहाँ भी होने लगीं है और कहा जाये कि यह सब अपनी सभ्यता छोड़कर विदेशी सभ्यता अपनाने का परिणाम है तो उसका कोई मतलब नहीं है। यह केवल असलियत से मुहँ फेरना होगा और किसी निष्कर्ष से बचने के लिए दिमागी कसरत से बचना होगा।
हम कहीं न कहीं सभी लोग पश्चिमी सभ्यता का अनुकरण कर ही रहे हैं। फिर भी समाज में बदनामी का डर रहता है इसलिए पुराने आदर्शों की बात करते हैं पर विवाह और जन्म दिन के अवसर पर हम सब भूलकर उसी ढर्रे पर आ जाते हैं जिस पर पश्चिम चल रहा है। जब अपनी ही कर्मों से परेशानी होती है तब अपने संस्कारों और संस्कृति की याद आती है.
एक दार्शनिक की तरह समाज को जब देखें हूँ तो कई लोगों को ऐसे तनावों में फंसा पायेंगे जिसमें आदमी का धन और समय अधिक नष्ट होता देखता हूँ। कई माँ-बाप अपने बच्चों की शादी कराकर अपने को मुक्त समझते हैं पर ऐसा होता नहीं है। लड़कियों की कमी है पर लड़के वालों के अंहकार में कमी नहीं है। हम इसे ऐसे भी कह सकते हैं कि लडकी के बाप के रूप में आदमी झुकता है लड़के के बाप के रूप में अकड़ता है। यह इतना स्वाभिक ढंग से होता है कि आदमी अपने वक्त पर सारे तर्क भूल जाता है. अपने आसपास जब कुछ लोगों को बच्चों के विवाह के बाद भी उनके अभिभावकों को तनाव झेलते हुए तो हम लोग अक्सर देखते है।

रिश्ते करना सरल है और निभाना और मुश्किल है और उससे अधिक मुश्किल है उनको तोड़ना। कई जगह लडकी भी लड़के के साथ रहना नहीं चाहती पर लड़के वाले दहेज़ और अन्य खर्च की वापसी न करनी पड़े इसलिए मामले को खींचते हैं। कई जगह कामकाजी लडकियां घरेलू तनाव से बहुत परेशान होती हैं और वह अपने पति से अलग होना चाहतीं है पर यह काम उनको कठिन लगता है। लंबे समय तक मामला चलता है। कुछ घर तो ऐसे भी देखे हैं कि जिनका टूटना तय हो जाता है पर उनका मामला बहुत लंबा चला जाता है। दरअसल अधिकतर सामाजिक और कानूनी कोशिशे परिवारों को टूटने से अधिक उसे बचाने पर केन्द्रित होतीं है। कुछ मामलों में मुझे लगा कि व्यर्थ की देरी से लडकी वालों को बहुत हानि होती है।

अधिकतर मामलों में लडकियां तलाक नहीं चाहतीं पर कुछ मामलों में वह रहना भी नहीं चाहतीं और छोड़ने के लिए तमाम तरह की मांगें भी रखतीं है। कुछ जगह लड़किया कामकाजी हैं और पति से नहीं बनतीं तो उसे छोड़ कर दूसरा विवाह करना चाहतीं है पर उनको रास्ता नहीं मिल पाता और बहुत मानसिक तनाव झेलतीं हैं। ऐसे मामले देखकर लगता है कि संबंध विच्छेद की प्रक्रिया बहुत आसान कर देना चाहिए। इस मामले में महिलाओं को अधिक छूट देना चाहिऐ। जहाँ वह अपने पति के साथ नहीं रहना चाहतीं वह उन्हें तुरंत तलाक लेने की छूट होना चाहिए। जिस तरह विवाहों का पंजीयन होता है वैसे ही विवाह-विच्छेद को भी पंजीयन कराना चाहिए। जब विवाह का काम आसानी से पंजीयन हो सकता है तो उनका विच्छेद का क्यों नहीं हो सकता।

कहीं अगर पति नहीं छोड़ना चाहता और पत्नी छोड़ना चाहती है उसको एकतरफा संबंध विच्छेद करने की छूट होना चाहिए। कुछ लोग कहेंगे कि समाज में इसे अफरातफरी फ़ैल जायेगी। ऐसा कहने वाले आँखें बंद किये बैठे हैं समाज की हालत वैसे भी कौन कम खराब है। अमेरिका में तलाक देना आसान है पर क्या सभी तलाक ले लेते हैं। देश में तलाक की संख्या बढ रही हैं और दहेज़ विरोधी एक्ट में रोज मामले दर्ज हो रहे हैं। इसका यह कारण यह है कि संबंध विच्छेद होना आसान न होने से लोग अपना तनाव इधर का उधर निकालते हैं। वैसे भी मैं अपने देश में पारिवारिक संस्था को बहुत मजबूत मानता हूँ और अधिकतर औरतें अपना परिवार बचाने के लिए आखिर तक लड़ती है यह भी पता है पर कुछ अपवाद होतीं है जो संबध विच्छेद आसानी से न होने से-क्योंकि इससे लड़के वालों से कुछ नहीं मिल पाता और लड़के वाले भी इसलिए नहीं देते कि उसे किसी के सामने देंगे ताकि गवाह हों-तमाम तरह की नाटकबाजी करने को बाध्य होतीं हैं। कुछ लड़कियों दूसरों के प्रति आकर्षित हो जातीं हैं पर किसी को बताने से डरती हैं अगर विवाह विच्छेद के प्रक्रिया आसान हो उन्हें भी कोई परेशानी नहीं होगी।

कुल मिलकर विवाह नाम की संस्था में रहकर जो तनाव झेलते हैं उनके लिए विवाह विच्छेद की आसान प्रक्रिया बनानी चाहिऐ। हालांकि देश के कुछ धर्म भीरू लोग आलेख की बात से असहमत होंगें पर जैसा याद रखिये वाद और नारों से समाज नहीं चला करते और उनकी वास्तविकताओं को समझना चाहिऐ। अगर हम इस बात से भयभीत होते हैं तो इसका मतलब हमें अपने मजबूत समाज पर भरोसा नहीं है और उसे ताकत से नियंत्रित करना ज़रूरी है तो फिर मुझे कुछ कहना नहीं है-आखिर साठ से इस पर कौन नियंत्रित कर सका।

मिलन के साथ वियोग भी आसन होना चाहिए-आलेख

कुछ ऐसी घटनाएँ अक्सर समाचारों में सुर्खियाँ बनतीं है जिसमें पति अपनी पत्नी की हत्या कर देता है
१। क्योंकि उसे संदेह होता है की उसके किसी दूसरे आदमी से उसके अवैध संबंध हैं।
२।या पत्नी उसके अवैध संबंधों में बाधक होती है।
इसके उलट भी होता है। ऐसी घटनाएँ जो अभी तक पाश्चात्य देशों में होतीं थीं अब यहाँ भी होने लगीं है और कहा जाये कि यह सब अपनी सभ्यता छोड़कर विदेशी सभ्यता अपनाने का परिणाम है तो उसका कोई मतलब नहीं है। यह केवल असलियत से मुहँ फेरना होगा और किसी निष्कर्ष से बचने के लिए दिमागी कसरत से बचना होगा।
हम कहीं न कहीं सभी लोग पश्चिमी सभ्यता का अनुकरण कर ही रहे हैं। फिर भी समाज में बदनामी का डर रहता है इसलिए पुराने आदर्शों की बात करते हैं पर विवाह और जन्म दिन के अवसर पर हम सब भूलकर उसी ढर्रे पर आ जाते हैं जिस पर पश्चिम चल रहा है।
मैं एक दार्शनिक की तरह समाज को जब देखता हूँ तो कई लोगों को ऐसे तनावों में फंसा पाता हूँ जिसमें आदमी का धन और समय अधिक नष्ट होता देखता हूँ। कई माँ-बाप अपने बच्चों की शादी कराकर अपने को मुक्त समझते हैं पर ऐसा होता नहीं है। लड़कियों की कमी है पर लड़के वालों के अंहकार में कमी नहीं है। हम इसे ऐसे भी कह सकते हैं कि लडकी के बाप के रूप में आदमी झुकता है लड़के के बाप के रूप में अकड़ता है। अपने आसपास जब कुछ लोगों को बच्चों के विवाह के बाद भी उनके तनाव झेलते हुए पाता हूँ तो हैरानी होती है।

रिश्ते करना सरल है और निभाना और मुश्किल है और उससे अधिक मुश्किल है उनको तोड़ना। कई जगह लडकी भी लड़के के साथ रहना नहीं चाहती पर लड़के वाले दहेज़ और अन्य खर्च की वापसी न करनी पड़े इसलिए मामले को खींचते हैं। कई जगह कामकाजी लडकियां घरेलू तनाव से बहुत परेशान होती हैं और वह अपने पति से अलग होना चाहतीं है पर यह काम उनको कठिन लगता है। लंबे समय तक मामला चलता है। कुछ घर तो ऐसे भी देखे हैं कि जिनका टूटना तय हो जाता है पर उनका मामला बहुत लंबा चला जाता है। दरअसल अधिकतर सामाजिक और कानूनी कोशिशे परिवारों को टूटने से अधिक उसे बचाने पर केन्द्रित होतीं है। कुछ मामलों में मुझे लगा कि व्यर्थ की देरी से लडकी वालों को बहुत हानि होती है। अधिकतर मामलों में लडकियां तलाक नहीं चाहतीं पर कुछ मामलों में वह रहना भी नहीं चाहतीं और छोड़ने के लिए तमाम तरह की मांगें भी रखतीं है। कुछ जगह लड़किया कामकाजी हैं और पति से नहीं बनतीं तो उसे छोड़ कर दूसरा विवाह करना चाहतीं है पर उनको रास्ता नहीं मिल पाता और बहुत मानसिक तनाव झेलतीं हैं। ऐसे मामले देखकर लगता है कि संबंध विच्छेद की प्रक्रिया बहुत आसान कर देना चाहिए। इस मामले में महिलाओं को अधिक छूट देना चाहिऐ। जहाँ वह अपने पति के साथ नहीं रहना चाहतीं वह उन्हें तुरंत तलाक लेने की छूट होना चाहिए। जिस तरह विवाहों का पंजीयन होता है वैसे ही विवाह-विच्छेद को भी पंजीयन कराना चाहिए। जब विवाह का काम आसानी से पंजीयन हो सकता है तो उनका विच्छेद का क्यों नहीं हो सकता।

कहीं अगर पति नहीं छोड़ना चाहता और पत्नी छोड़ना चाहती है उसको एकतरफा संबंध विच्छेद करने की छूट होना चाहिए। कुछ लोग कहेंगे कि समाज में इसे अफरातफरी फ़ैल जायेगी। ऐसा कहने वाले आँखें बंद किये बैठे हैं समाज की हालत वैसे भी कौन कम खराब है। अमेरिका में तलाक देना आसान है पर क्या सभी तलाक ले लेते हैं। देश में तलाक की संख्या बढ रही हैं और दहेज़ विरोधी एक्ट में रोज मामले दर्ज हो रहे हैं। इसका यह कारान यह है कि संबंध विच्छेद होना आसान न होने से लोग अपना तनाव इधर का उधर निकालते हैं। वैसे भी मैं अपने देश में पारिवारिक संस्था को बहुत मजबूत मानता हूँ और अधिकतर औरतें अपना परिवार बचाने के लिए आखिर तक लड़ती है यह भी पता है पर कुछ अपवाद होतीं है जो संबध विच्छेद आसानी से न होने से-क्योंकि इससे लड़के वालों से कुछ नहीं मिल पाता और लड़के वाले भी इसलिए नहीं देते कि उसे किसी के सामने देंगे ताकि गवाह हों-तमाम तरह की नाटकबाजी करने को बाध्य होतीं हैं। कुछ लड़कियों दूसरों के प्रति आकर्षित हो जातीं हैं पर किसी को बताने से डरती हैं अगर विवाह विच्छेद के प्रक्रिया आसान हो उन्हें भी कोई परेशानी नहीं होगी।

कुल मिलकर विवाह नाम की संस्था में रहकर जो तनाव झेलते हैं उनके लिए विवाह विच्छेद की आसान प्रक्रिया बनानी चाहिऐ। हालांकि देश के कुछ धर्म भीरू लोग जो मेरे आलेख को पसंद करते है वह इससे असहमत होंगें पर जैसा मैं वाद और नारों से समाज नहीं चला करते और उनकी वास्तविकताओं को समझना चाहिऐ। अगर हम इस बात से भयभीत होते हैं तो इसका मतलब हमें अपने मजबूत समाज पर भरोसा नहीं है और उसे ताकत से नियंत्रित करना ज़रूरी है तो फिर मुझे कुछ कहना नहीं है-आखिर साथ साल से इस पर कौन नियंत्रित कर सका।

22 मार्च 2008

गुण ही गुणों को बरतते हैं-चिंतन

होली का हल्ला थम चुका है। कोई नशे में मदहोश होकर तो कोई रंग खेलते हुए थककर सो रहा है तो कोई मस्ती में अभी भी झूम रहा है कि उसके खुश होने का कोटा पूरा हो जाये। सब इस दुनिया से बेखबर होना चाहते हैं मगर कुछ लोग फिर भी हैं जो चिन्त्तन करते हैं। आम आदमी की याददाश्त कमजोर होती है पर एक लेखक की स्मरण शक्ति ही उसकी मित्र होती है-कुछ मायनों में दुश्मन भी।

चेतावनियों के स्वर कानों में गूँज रहे हैं और आंखों के सामने अखबारों में छपे गर्मी के आसन्न संकट के शब्द घूम रहे हैं। इस होली पर पानी खूब उडाया गया होगा। इसमें किसी ने कोई हमदर्दी नहीं दिखाई। अब आरही है गर्मी। पहले से ही दस्तक दे चुकी है और उसका जो भयानक रूप सामने आने वाला है वह हर वर्ष हम देखते हैं। गर्मी में पानी की कमीं के हर जगह से समाचार आयेंगे। कहीं आन्दोलन होगा। लोगों के हृदय में उष्णता उत्पन्न होगी और उसका ध्यान बंटाने के लिए बहुत सारे अन्य अर्थहीन विषय उठाये जायेंगे।

कभी-कभी लगता है देश में कोई समस्या ही नहीं है केवल दिखावा है। लोग पानी को रोते हैं पर फैलाते भी खूब हैं। देश के शहरों में सबके पास मोबाइल दिखता है उस पर बातें करते हैं। कौन है जो देश की हालत पर रोता है। कहीं से किसानों की आत्महत्या की खबर आती है पर कहीं कोई प्रतिक्रिया नहीं होती। सब कुछ सामान्य चलता दिख रहा है। लोग घुट-घुटकर जी रहे हैं पर बाहर से दिखता है कि सामान्य हैं। लोग चीख रहे हैं पर कोई किसी की नहीं सुन रहा है। किसी से ज्ञान चर्चा करना निरर्थक लगता है क्योंकि वह अगले ही पर अपने अज्ञान का परिचय देता है।

वैचारिक रूप से दायरों में सिमट गए लोगों से अब बात करना मुश्किल लगता है। जिसके पास जाओ वह या तो अपने घर की परेशानी बताता है या वह उसकी किसी भौतिक उपलब्धि का बयान करता है। में खामोश होकर सुनता हूँ। मुझे अपने घर-परिवार के जो काम करने हैं उनको करता हूँ। जो चीजें लाना होता है लाता हूँ पर उनका बखान नहीं करता।
''सुनो कल मैं मेले गया था वहाँ से नया फ्रिज ले आया।''
''मैंने अपने बेटे को गाडी दिलवा दी।''
''मैंने अपनी बेटी को मोबाइल दिलाया है।''
सब सुनता हूँ। फिर करते हैं देशकाल और राजनीति की बातें-जैसे कि बहुत बडे ज्ञाता हों। जब बताओ कि किस तरह सब जगह तयशुदा कार्यक्रम के अनुसार उनकी बुद्धि को संचालित किया जा रहा है। समाचार उनको इस तरह दिए जा रहे हैं कि देश, समाज और लोगों की यथास्थिति बनी रहे और वह उसमें बदलाव की नहीं सोचें। बदलाव की बात कोई सोच कर वह कई लोगों के लिए परेशानी पैदा करेंगे। व्यवस्था में सुधार की बातें पर बहुत की जातीं हैं पर बदलाव की नहीं। तमाम तरह के वादे और नारे गढे गए और भी गढे जायेंगे।

कभी-कभी उकता जाता हूँ, फिर सोचता हूँ कि सब मेरी तरह नहीं हो सकते। अपने जैसे लोगों का संपर्क ढूँढता हूँ और जब वह मिलते हैं तो लगता है कि वह भी इस दुनिया से क्षुब्ध हैं पर बदलाव की बात पर वह भी उदास हो जाते हैं उनको नहीं लगता कि वह उसे बदल सकते हैं और खुद को भी बदलने पर अपने साथ जुडे लोगों के विद्रोह का भय उन्हें सताता है-जिसे मोह भी कह सकते हैं।

कहीं एकांत मंदिर में जाकर बैठता हूँ और ध्यान लगाता हूँ। श्रीगीता में श्री कृष्ण जी के यह शब्द ''गुण ही गुण को बरतते हैं'' मुझे याद आते है। मेरे अधरों पर मुस्कराहट खेल जाती है। मन प्रसन्न हो जाता है। भला मैं दूसरों से क्या अपेक्षा करूं। दूसरे के अन्दर गुणों का मैं नियंत्रणकर्ता नहीं हो सकता। जो गुण उसमें है नहीं और वह पैदा भी नहीं कर सकता उससे भला मैं क्यों कोइ अपेक्षा करूं। मैं निर्लिप्त भाव को प्राप्त होता हूँ। यह दुनिया मेरी नहीं है बल्कि मैं इसमें हूँ। वह चलती रहेगी उसके साथ मुझे चलना है और उसे दृष्टा बनकर चलते देखना है। लोगों को अपने मन ,बुद्धि और अहंकार के वश में पडा देख कर उनका अभिनय देखना है। धीरे-धीरे मन की व्यग्रता ख़त्म हो जाती है।

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