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30 जुलाई 2008

सर्वशक्तिमान ने कोई कानून नहीं बनाया -हिन्दी शायरी


किसी भूखे को रोटी खिलाने का
उनकी किताबों में कोई इलाज नहीं
ढेर सारे कसूरों की सजाएं है
कसूरवार की मजबूरी समझने का
कोई कहीं रिवाज नहीं
जमाने को सिखाते हैं तमाम तरीके
जन्नत में जाने के
अपनी हकीकतो से दूर
ख्वाबों में जाने के
सर्वशक्तिमान ने कोई कानून नहीं बनाया
फिर भी उसके नाम पर सुनाते हैं
चंद किताबें पढ़कर फैसले
इंसान की भूख को पढ़ने का
कहीं कोई मिजाज नहीं
सभी को मोहब्बत का पैगाम देते हैं
पर जिस्म की भूख पर है खामोश
क्योंकि उस पर किसी का बस नहीं
अरे, ऊपर वाले का नाम लेकर
दुनियो को उसके दस्तूर पर चलाने वालों
उससे पूछ का बताओ
भूखा अगर रोटी की चोरी करे
तो उसकी सजा क्यों होना चाहिए
अगर वह इंसान के पेट में भूख नहीं बनाता तो
मान लेते उसका होगा वजूद
इस धरती पर भी कहीं

यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की चिंतन पत्रिका’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
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2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
4.अनंत शब्दयोग
लेखक संपादक-दीपक भारतदीप


शांति लाने का दावा

बारूद के ढेर चारों और लगाकर
हर समस्या के इलाज के लिए
नये-नयी चीजें बनाकर
आदमी में लालच का भूत जगाकर
वह करते हैं दुनिया में शांति लाने का दावा

बंद कमरों में मिलते अपने देश की
कुर्सियों पर सजे बुत
चर्चाओं के दौर चलते
प्रस्ताव पारित होते बहुत
पर जंग का कारवाँ भी
चल रहा है फिर भी हर जगह
होती कुछ और
बताते और कुछ वजह
जब सब चीज बिकाऊ है
तो कैसे मिल सकता है
कहीं से मुफ्त में शांति का वादा
बहाने तो बहुत मिल जाते हैं
पर कुछ लोग का व्यवसाय ही है
देना अशांति को बढावा

एक दुकान से खरीदेंगे शांति
दूसरा अपनी बेचने के लिए
जोर-जोर से चिल्लाएगा
फैलेगी फिर अशांति
जब फूल अब मुफ्त नहीं मिलते
तो बंदूक और गोली कैसे
उनके हाथ आते हैं
जहाँ से चूहा भी नहीं निकल सकता आजादी से
वहाँ कोहराम मचाकर
वह कैसे निकल जाते हैं
विकास के लिए बहता दौलत का दरिया
कुछ बूँदें वहाँ भी पहुंचा देता है
जहाँ कहीं शांति का ठेकेदार
कुछ समेट लेता है
जानते सब हैं पर
दुनिया को देते हैं भुलावा
न दें तो कैसे करेंगे शांति लाने का दावा
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28 जुलाई 2008

मशहूर होने से भी भला क्या फायदा-व्यंग्य

लिखना मैंने इसलिये नहीं शुरू किया कि मुझे मशहूर होना है। मुझे अपने मशहूर होने की चिंता कभी नहीं सताती क्योंकि लगता है कि लोग अपनी पूरी ऊर्जा इसी प्रयास में नष्ट करते हैं कि वह प्रसिद्ध व्यक्ति बने और समाज में उनकी चर्चा चारों और लोग करें। मैं उनके करतबों पर ही लिखता रहता हूं पर किसी का नाम लिये बगैर अपनी बात कह जाता हूं कि अगर वह पढ़े भी तो उसे लगे कि किसी अन्य व्यक्ति के लिये लिखा होगा।

उस दिन पांच लोग कहीं आपस में मिले। इसमें मैं और मेरे ब्लाग/पत्रिका पढ़ने वाला एक मित्र भी था। तीन अन्य भी उसके परिचित थे। तीनों अपनी अपनी डींगे हांक रहे थे।
‘अरे, मैं किसी से नहीं डरता मेरी पहुंच दूर तक है।’
‘अरे, इस इलाके में मुझे सब जानते हैं। अपना ही राज्य है।’
‘मैं जहां रहता हूं, वहां सब लोग मेरी इज्जत करते हैं। एक मैं ही वहां इज्जतदार हूं।’
वैसे मेरा मित्र भी कम नहीं है, पर उसे मालुम है कि मैं हाल ही उसकी बात को पकड़ कर लिख कर व्यंग्य लिखने का काम कर सकता हूं। इसलिए कुछ देर तो चुप रहा फिर उसने मुझे ही वहां उलझाने के लिये अपना पासा फैंका और बोला-‘तुम मेरे इस मित्र को जानते हो। कई पत्र-पत्रिकाओं में इसके लेख और व्यंग्य छप चुके हैं। आजकल इंटरनेट पर लिखते हुए अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर नाम कमा रहा है पर देखों अपनी प्रशंसा स्वयं नहीं करता।’
मैंने मित्र की तरफ देखा और फिर कहा-‘‘अरे, यार तुम भी क्या बात लेकर बैठ गये। हमें भला कौन जानता है? लिखते हम भी हैं और फिल्मों के हीरो भी लिख रहे हैं पर भला कोई उनके मुकाबले हमें कौन पढ़ता है। तुम्हें और कोई नहीं मिला कि हमारा मजाक उड़ाने लगे।’
उनमें से एक सज्जन बोले-‘‘आप कौनसे अखबार में लिखते हैं?‘
मैने कहा-‘अरे, यह तो ऐसे ही बना रहा है। पहले कुछ कम प्रसिद्ध पत्र-पत्रिकाओं के लिखा था। अंतर्जाल पर ब्लाग लिख रहे हैं पर कौन पढ़ता है वहां पर। अब तो फिल्मी हीरो हीरोइन के ब्लाग बनते जायेंगे। लोग उनको पढेंगें कि हमें। यह मुझे मित्र कह रहा है इससे पूछो कितनी बार इसने मेरा ब्लाग खोला है?’

दूसरे सज्जन ने कहा-‘अगर आप लिखते हैं तो जरूर मशहूर हो जायेंगे। फिल्मी हीरो हीरोइन गासिपों के अलावा क्या लिखेंगे। वैसे भी उनका लिखा अखबार में आ जाता है। आप लिखते रहें तो एक दिन मशहूर हो जायेंगें।
बहरहाल मैंने अपनी बौद्धिक शक्ति का उपयोग करते हुए वहां बातचीत का विषय बदल दिया। वहां से निकलते ही मैंने मित्र से कहा-‘दिलवा दिया शाप! उसने क्या कह दिया कि मशहूर हो जाओगे।

मेरा मित्र बोला-‘यार, फिर तो वाकई चिंता की बात है तुम्हारे ब्लाग पर मैंने अभी तक तीन टिप्पणियां लिखीं हैं तो हमें भी तो मशहूर हो जायेंगे। वैसे मशहूर होना तो अच्छी बात है।’
मैंने उससे कहा-‘मशहूर होकर लिखा नहीं जाता। आदमी इसी फिक्र में कई बातें इसलिए नहीं लिख पाता कि अब तो मशहूर हो गया हूं कहीं ऐसा न हो कि लोग इससे नाराज न हो जायें। मशहूर होने का बोझ ढोना कई लोगों के लिए मुश्किल काम है और उनमें हम एक है।
मित्र ने कहा-‘फिर तुम लिखते क्यों हो? मशहूर होने के लिए ही न!
मैंने कहा-‘‘मशहूर नहीं हूं इसलिये लिख रहा हूं। जमकर लिख रहा हूं। मशहूर होने के बाद तो यही सोचकर बैठा रहूंगा कि लिखूं क्या?’

मित्र ने आखिर मुझसे पूछा-‘आखिर मशहूर होना होता कैसे है?’
मैंने भी प्रति प्रश्न किया-‘कैसे होता है?’
मित्र ने कहा-‘‘मैं क्या जानूं? तुम लेखक हो तुम्हीं बताओ।’
मैने कहा-‘मशहूर होने की बात तो तुमने उठाई थी। मुझे लगा कि होगी कोई अच्छी बात है।’
मित्र बोला-‘अच्छा तुम अब मुझ पर ही व्यंग्य करने लगे। मैं इसलिये वहां चुप था कि कहीं तुम मेरी बातों से व्यंग्य सामग्री न ढूंढ लो और अब यही कारिस्तानी यहीं करने लगे। मेरी टिप्पणियां वहां से हटा देना। मुझे ऐसे व्यक्ति के साथ मशहूर नहीं होना जिसे मालुम ही न हो कि वह होता क्या है?’

मशहूर होने के लिये लोग जाने क्या क्या पापड़ बेलते हैं? तमाम तरह की उल्टी सीधी हरकतें करते हैं। उलूलजुलूल लिखते है। लिखने में सबसे बड़ा मजा यह है कि आप किसी आदमी के सामने नहीं होते और इसलिये कोई आपको पहचान नहीं पाता। पिछली राखी की बात है मैं एक रेस्टरां में चाय पी रहा था। उसी दिन एक अखबार में मोबाइल पर लिख मेरा एक व्यंग्य छपा था और दो आदमी उसे पढ़कर हंस रहे थे। एक ने कहा-‘‘देखो यार, मोबाइल पर उसने क्या लिखा है?
दूसरा उसे पढ़ते हुए हंस रहा था। उसे नहीं मालुम कि उसको लिखने वाला लेखक उसे मात्र पांच फुट की दूरी पर बैठा है। बाद में मैंने जब अपने मित्र को जब यह घटना बताई तो वह कहने लगा कि-‘तुमने उनको बताया क्यों नहीं कि तुम उसके लेखक हो।
‘अगर वह कह देते कि क्या बकवाद लिखी है तो मैं क्या करता?‘मैने कहा-‘‘इतना ही ठीक है कि मुझे पढ़ रहे थे। अपने आपको मशहूर करने के प्रयास में कभी कभी उल्टा सीधा भी सुनना पड़ता है। इससे बेहतर है अपने लेख भले ही मशहूर हों, थोड़ा बहुत नाम भी हो जाये पर हमें अपना यह चेहरा मशहूर नहीं कराना।’

मशहूर होने को मतलब है कि अपने ऐसे विरोधी पैदा करना जो छींटाकशी के लिये तैयार बैठे रहते हैं और आप अपने मित्रों से हमेशा सतर्कता की आशा नहीं कर सकते जो सोचते हैं कि यह तो मशहूर आदमी है अपना बचाव स्वयं कर लेगा। वैसे चुपचाप लिखते रहने से ही इतनी आनंद की अनुभूति होती है कि लगता है कि मशहूर हुए तो मिलने वाले बहुत आयेंगे। कई तरह के फोन सुनने पड़ेंगे। तब भला क्या खाक लिख पायेंगे। ऐसे ही ठीक है कि कोई हमें चेहरे से जानता नहीं है। अधिक मशहूर होना मतलब अपनी शांति भंग करना भी होता है।

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लेखक संपादक-दीपक भारतदीप

14 अप्रैल 2008

अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम बनेगा ब्लोग-hindi article

जब मेरे ब्लागों पर कुछ ऐसे लोगों के कमेंट आते हैं जिनसे मैं परिचित नहीं हूं तो तत्काल जाकर उनके ब्लाग देखता हूं। मुझे आश्चर्य तब होता है जब वैचारिक धरातल पर सब मेरे साथ ही खड़े दिखाई देते है। परिचितों में तो करीब-करीब सभी एक ही वैचारिक संघर्ष में व्यस्त हैं। मैने ब्लागरों में जो बातें देखीं हैं वह भी गौर करने लायक है-

1. सभी ब्लागर अपने धर्म में आस्थावान हैं पर उनका कर्मकांडों और अंधविश्वासों से बहुत कड़ा विरोध है। इस मामले में वह यह मानने को तैयार नहीं है कि दिखावे की भक्ति कर लोगों को स्वर्ग का रास्ता दिखाया जाये जो कभी बना ही नहीं।

2.अपने विचारों के साथ ईमानदारी के साथ चलने की उनमें दृढ़ता है और वह किसी प्रकार की चाटुकारिता में यकीन नहीं करते।
3.देश के हालातों से बहुत चिंतित हैं और ऐसी घटना जिसमें किसी महिला को अपमानित किया जाता है, गरीब को सताया जाता है और निर्दोष को मारा जाता है उससे वह विचलित होते है।
4.राष्ट्रभाषा हिंदी के प्रति अटूट निष्ठा है और जिसको प्रमाणित करने के लिये वह किसी भी हद तक कष्ट उठा सकते हैं।
5. वह वर्तमान व्यवस्था से असंतुष्ट हैं। प्रचार माध्यमों के प्रति उनके मन में अनेक संदेह है और वह इसे व्यक्त करते हैं।

लिखने की शैली और प्रस्तुतिकरण के तरीके में अंतर हो सकता है पर कमोवेश मूल विचार में एकरूपता है। अपने आलेखों और कविताओं पर उनके रवैये से एक बात लगती है कि कहीं न कहीं उनके मन में इस समाज को बदलते देखने की इच्छा है। वह जानते हैं कि उनके लिखे से समाज नहीं बदलेगा पर मैं कहता हूं कि आज अगर हम कोई विचार आज लिखकर या बोलकर व्यक्त करते हैं तो कल वह समाज के हिस्सा बन ही जाता है। हमारे सामने भी ऐसा हो सकता है और हमारे बाद भी। काम कहने वाले और करने वाले दोनों मिट जाते हैं पर जो उनके शब्द होते हैं वह आगे चलते जाते हैं।

अक्सर लोग कहते हैं कि लिखे से समाज नहीं बदलता पर शब्द चलते हैं और कोई उनको पढ़कर प्रभावित होता है तो उसके कर्म पर प्रभाव होता है। आज जो मैं लिख रहा हूं वह किसी के शब्दों की प्रेरणा ही हैं न! किसी ने मुझे अभिव्यक्ति का पता दिया था लिखकर। वह मुझे कहां से कहां ले आया। यह तो एक शब्द हैं बहुत सारे शब्द हैं जिनको लेकर मैं आगे बढ़ा। मेरे लिखे से समाज नहीं बदला पर मेरे में बदलाव तो आया न! मैं अगर यहां लिख रहा हूं तो कोई जगह जहां से हट रहा हूं। अपने मनोरंजन के लिये टीवी या अखबार से परे होना पड़ता है। कहीं जाकर फालतू समय नष्ट करने से अच्छा मुझे लिखना लगता है।

निष्कर्ष यह है कि हिंदी में ब्लाग के पाठक और लेखक आज नहीं तो कल बढ़ेंगे ही। मैने एक चार वर्ष से अधिक पुराना ब्लाग देखा था उसमें उसका लेखक निराशा में था और हिंदी में ब्लाग लेखन की प्रगति से नाखुश था। आज हम देखें तो उसके मुकाबले स्थिति बहुत ठीक है। दरअसल लोग ऊबे हुए हैं और वर्तमान में उनकी अभिव्यक्ति का अपना कोई अधिक सशक्त साधन नहीं हैं, जो हैं उनसे वह संतुष्ट नहीं है। एक बात और है कि जो भी संचार और प्रचार माध्यम है वह चल तो हमारे पैसे से ही रहे हैं कोई अपनी जेब से नहीं चला रहा। हम उनका अप्रत्यक्ष भुगतान करते हैं पर उसका पता नहीं लगता यहां पर प्रत्यक्ष भुगतान कर रहे हैं उसको लेकर हम परेशान होते हें क्योंकि वह दिखता है। मै छह सौ रुपये का इंटरनेट का भुगतान करता हूं यह मानकर कि यह डिस्क कनेक्शन है जिसका डबल भुगतान करना है। लिखना तो मेरे लिये एक साधन है जिससे मुझे जीवन में ऊर्जा मिलती है।
जब मेरा यह सोच है तो ऐसा सोचने वाले और भी होंगे। यह अंतर्जाल पर ब्लाग लिखने और पढ़ने का सिलसिला इसलिये भी चलता रहेगा क्योंकि लिखने वाले इसका भुगतान करेंगे और जो इनका चला रहे हैं वह इसे बंद नहंी करेंगे। अन्य प्रचार माध्यम जरूर विज्ञापन न मिलने पर संकट में आ सकते हैं। जिस तरह ब्लाग लोगों की अभिव्यक्ति का साधन बन रहा है उससे तो ऐसा लगता है कि लोग अन्य जगह से हटकर इधर आयेंगे और यह एक सशक्त माध्यम बनेगा। ऐसे में जो प्रबंधन कौशल में माहिर होंगे वह आय भी अर्जित करेंगे और कुछ लोग इसका उपभोक्ता की तरह इस्तेमाल कर इसे प्राणवायु देते रहेंगे। आखिर दूसरे संचार और प्रचार माध्यमों में भी तो ऐसा ही हो रहा है। कोई खर्च कर रहा है और कोई कमा रहा है। मोबाइल पर फालतू बातें कर खर्च करने वाले क्या कम हैं? ऐसे में लिखने वाले भी ऐसा ही करेंगे। मेरा मानना है कि आगे संचार और प्रचार माध्यमों को इससे चुनौती मिलने वाली है और इसके कितना समय लगेगा यह कहना कठिन है पर अधिक नहीं लगेगा ऐसा मेरा अनुमान है। एक दृष्टा की तरह ही मैं इस खेल को देख रहा हूं। अभी हाल ही में कृतिदेव का यूनिकोड में परिवर्तित टूल मिलने के बाद तो मैने हास्य कविता लिखना कम ही कर दिया क्योंकि वह अधिक लिखना मुश्किल होने से ही लिखता था। हालांकि मुझे लगता है कि उन हास्य कवितओं के पाठक बहुत हैं और मुझे फिर लिखना शुरू करना पड़ेगा।

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