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9 सितंबर 2008

चोरी के मामले में डाल दो ढील-हास्य कविता

घर में घुसते ही बोला फंदेबाज
‘शंका तो हमें रास्ते में ही हो गयी थी कि
आज होगी तुम्हारे लिये जश्न की शाम
सामने होगी बोतल और हाथ में होगा जाम
बा ने बताया था फोन पर कि
ब्लाग चोरी होने के बाद तुम्हारे
पांव जमीन पर नहीं पड़ रहे
उछल कूद कर रहे हो इतनी कि
सिर के बाकी बाल भी झड़ रहे
क्या किसी अंग्रेज ब्लागर से की थी
अपना ब्लाग चुराने की डील
बड़ा बुरा हो रहा है हमें फील
देश में क्या कम ब्लागर थे
जो विदेश से ले आये हिट होने के लिये ऊर्जा
अपने लोगों के सीने में ठोक दी कील’


नोट-यह इस ब्लाग दीपक भारतदीप की हिंदी पत्रिका" की मूल रचना है। इसके अन्य कहीं प्रकाशन की अनुमति नहीं है। अगर किसी को यह कहीं अन्य प्रकाशित मिले तो इस ब्लाग http://deepakraj.wordpress.com पर सूचित करे।
दीपक भारतदीप, लेखक संपादक

ग्लास को मूंह लगाने के बाद
फिर उसे रखते हुए बोले महाकवि दीपक बापू
‘कमबख्त आज अच्छे दिन भी
तुम्हारा आना हुआ है
अंतर्जाल पर ब्लाग चोरी होना
सम्मान की बात समझी जाती है
कोई भाग्यशाली ही होता है
जिसके हिस्से यह घटना पेश आती है
यहां सभी हिट होने के लिये मरे जा रहे हैं
नैतिकता और भक्ति का तो बस नाम लेते हैं सब
अपने ऊपर दो नंबर की गठरी ले जा रहे हैं
पहले लोग अपने यहां छापे पड़वाते थे
अपने यहां इज्जत बढ़ाने के लिये
अब फिर रहे हैं अपना सामान
चोरी कराने के लिये
कर लेते हैं डील
फिर करवाते हैं अपने हिट होने की फील
चोरी हो जाने पर कोई नहीं रोता
हो जाने पर ही हिट होने की चैन की नींद सोता
चोरी होने को सामान बहुत है
पर उसे उठाने वाले बहुत कम है
किसका उठायें और किसका नहीं
चोरों को भी यही गम है
देश में भला किससे चोरी करवाते
विदेश में ब्लागर तो छिपा रहेगा
देश का होता तो पता नहीं
कब पाला बदल जाता
और हम अपनी असलियत कब तक छिपाते
हमने नहीं की
हम क्या जाने तकनीकी के बारे में
कोई प्रशंसक ही कर आया है
हमारा ब्लाग चुराने की डील
किसने की और कैसे की, इससे क्या मतलब
हमें तो बस गाना है अपना गुड फील
जब तक किसी विदेशी से हाथ न मिलायें
भला इस देश में कौन इज्जत करता है
शादी हो या व्यापार
हर कोई विदेश में डील के लिये मरता है
चोरी हुआ हमारा ब्लाग
जो कि हिट की शर्त पूरी करने के लिये काफी है
अब तुम पर हास्य कवितायें लिखते हुए
हमेशा रहे फ्लाप
तो अपना रुतवा विदेशियों के दम पर दिखायेंगे
सारा जमाना जा रहा है
हम भी जरा चलकर देखें
फिर अपनी असलियत पर लौट आयेंगे
अपने घर का चिराग तेल से नहीं
विदेशी ऊर्जा से जलायेंगे
अभी तो चीयर्स करो
तकनीकी से हम दोनों हैं पैदल
जिसमें अपना फायदा दिखे वही कहो
और हिट पाने में मस्त रहो
चोरी के मामले में डाल दो ढील
देशभक्ति तुम संभालों
हमें लगाने दो सब तरफ हिट की कील
..................................................
नोट-यह एक काल्पनिक हास्य कविता है इसका किसी घटना या व्यक्ति से कोई लेना देना नहीं है। अगरकिसी की कारिस्तानी से मेल खा जाये तो वही इसके लिये जिम्मेदार होगा

28 जुलाई 2008

मशहूर होने से भी भला क्या फायदा-व्यंग्य

लिखना मैंने इसलिये नहीं शुरू किया कि मुझे मशहूर होना है। मुझे अपने मशहूर होने की चिंता कभी नहीं सताती क्योंकि लगता है कि लोग अपनी पूरी ऊर्जा इसी प्रयास में नष्ट करते हैं कि वह प्रसिद्ध व्यक्ति बने और समाज में उनकी चर्चा चारों और लोग करें। मैं उनके करतबों पर ही लिखता रहता हूं पर किसी का नाम लिये बगैर अपनी बात कह जाता हूं कि अगर वह पढ़े भी तो उसे लगे कि किसी अन्य व्यक्ति के लिये लिखा होगा।

उस दिन पांच लोग कहीं आपस में मिले। इसमें मैं और मेरे ब्लाग/पत्रिका पढ़ने वाला एक मित्र भी था। तीन अन्य भी उसके परिचित थे। तीनों अपनी अपनी डींगे हांक रहे थे।
‘अरे, मैं किसी से नहीं डरता मेरी पहुंच दूर तक है।’
‘अरे, इस इलाके में मुझे सब जानते हैं। अपना ही राज्य है।’
‘मैं जहां रहता हूं, वहां सब लोग मेरी इज्जत करते हैं। एक मैं ही वहां इज्जतदार हूं।’
वैसे मेरा मित्र भी कम नहीं है, पर उसे मालुम है कि मैं हाल ही उसकी बात को पकड़ कर लिख कर व्यंग्य लिखने का काम कर सकता हूं। इसलिए कुछ देर तो चुप रहा फिर उसने मुझे ही वहां उलझाने के लिये अपना पासा फैंका और बोला-‘तुम मेरे इस मित्र को जानते हो। कई पत्र-पत्रिकाओं में इसके लेख और व्यंग्य छप चुके हैं। आजकल इंटरनेट पर लिखते हुए अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर नाम कमा रहा है पर देखों अपनी प्रशंसा स्वयं नहीं करता।’
मैंने मित्र की तरफ देखा और फिर कहा-‘‘अरे, यार तुम भी क्या बात लेकर बैठ गये। हमें भला कौन जानता है? लिखते हम भी हैं और फिल्मों के हीरो भी लिख रहे हैं पर भला कोई उनके मुकाबले हमें कौन पढ़ता है। तुम्हें और कोई नहीं मिला कि हमारा मजाक उड़ाने लगे।’
उनमें से एक सज्जन बोले-‘‘आप कौनसे अखबार में लिखते हैं?‘
मैने कहा-‘अरे, यह तो ऐसे ही बना रहा है। पहले कुछ कम प्रसिद्ध पत्र-पत्रिकाओं के लिखा था। अंतर्जाल पर ब्लाग लिख रहे हैं पर कौन पढ़ता है वहां पर। अब तो फिल्मी हीरो हीरोइन के ब्लाग बनते जायेंगे। लोग उनको पढेंगें कि हमें। यह मुझे मित्र कह रहा है इससे पूछो कितनी बार इसने मेरा ब्लाग खोला है?’

दूसरे सज्जन ने कहा-‘अगर आप लिखते हैं तो जरूर मशहूर हो जायेंगे। फिल्मी हीरो हीरोइन गासिपों के अलावा क्या लिखेंगे। वैसे भी उनका लिखा अखबार में आ जाता है। आप लिखते रहें तो एक दिन मशहूर हो जायेंगें।
बहरहाल मैंने अपनी बौद्धिक शक्ति का उपयोग करते हुए वहां बातचीत का विषय बदल दिया। वहां से निकलते ही मैंने मित्र से कहा-‘दिलवा दिया शाप! उसने क्या कह दिया कि मशहूर हो जाओगे।

मेरा मित्र बोला-‘यार, फिर तो वाकई चिंता की बात है तुम्हारे ब्लाग पर मैंने अभी तक तीन टिप्पणियां लिखीं हैं तो हमें भी तो मशहूर हो जायेंगे। वैसे मशहूर होना तो अच्छी बात है।’
मैंने उससे कहा-‘मशहूर होकर लिखा नहीं जाता। आदमी इसी फिक्र में कई बातें इसलिए नहीं लिख पाता कि अब तो मशहूर हो गया हूं कहीं ऐसा न हो कि लोग इससे नाराज न हो जायें। मशहूर होने का बोझ ढोना कई लोगों के लिए मुश्किल काम है और उनमें हम एक है।
मित्र ने कहा-‘फिर तुम लिखते क्यों हो? मशहूर होने के लिए ही न!
मैंने कहा-‘‘मशहूर नहीं हूं इसलिये लिख रहा हूं। जमकर लिख रहा हूं। मशहूर होने के बाद तो यही सोचकर बैठा रहूंगा कि लिखूं क्या?’

मित्र ने आखिर मुझसे पूछा-‘आखिर मशहूर होना होता कैसे है?’
मैंने भी प्रति प्रश्न किया-‘कैसे होता है?’
मित्र ने कहा-‘‘मैं क्या जानूं? तुम लेखक हो तुम्हीं बताओ।’
मैने कहा-‘मशहूर होने की बात तो तुमने उठाई थी। मुझे लगा कि होगी कोई अच्छी बात है।’
मित्र बोला-‘अच्छा तुम अब मुझ पर ही व्यंग्य करने लगे। मैं इसलिये वहां चुप था कि कहीं तुम मेरी बातों से व्यंग्य सामग्री न ढूंढ लो और अब यही कारिस्तानी यहीं करने लगे। मेरी टिप्पणियां वहां से हटा देना। मुझे ऐसे व्यक्ति के साथ मशहूर नहीं होना जिसे मालुम ही न हो कि वह होता क्या है?’

मशहूर होने के लिये लोग जाने क्या क्या पापड़ बेलते हैं? तमाम तरह की उल्टी सीधी हरकतें करते हैं। उलूलजुलूल लिखते है। लिखने में सबसे बड़ा मजा यह है कि आप किसी आदमी के सामने नहीं होते और इसलिये कोई आपको पहचान नहीं पाता। पिछली राखी की बात है मैं एक रेस्टरां में चाय पी रहा था। उसी दिन एक अखबार में मोबाइल पर लिख मेरा एक व्यंग्य छपा था और दो आदमी उसे पढ़कर हंस रहे थे। एक ने कहा-‘‘देखो यार, मोबाइल पर उसने क्या लिखा है?
दूसरा उसे पढ़ते हुए हंस रहा था। उसे नहीं मालुम कि उसको लिखने वाला लेखक उसे मात्र पांच फुट की दूरी पर बैठा है। बाद में मैंने जब अपने मित्र को जब यह घटना बताई तो वह कहने लगा कि-‘तुमने उनको बताया क्यों नहीं कि तुम उसके लेखक हो।
‘अगर वह कह देते कि क्या बकवाद लिखी है तो मैं क्या करता?‘मैने कहा-‘‘इतना ही ठीक है कि मुझे पढ़ रहे थे। अपने आपको मशहूर करने के प्रयास में कभी कभी उल्टा सीधा भी सुनना पड़ता है। इससे बेहतर है अपने लेख भले ही मशहूर हों, थोड़ा बहुत नाम भी हो जाये पर हमें अपना यह चेहरा मशहूर नहीं कराना।’

मशहूर होने को मतलब है कि अपने ऐसे विरोधी पैदा करना जो छींटाकशी के लिये तैयार बैठे रहते हैं और आप अपने मित्रों से हमेशा सतर्कता की आशा नहीं कर सकते जो सोचते हैं कि यह तो मशहूर आदमी है अपना बचाव स्वयं कर लेगा। वैसे चुपचाप लिखते रहने से ही इतनी आनंद की अनुभूति होती है कि लगता है कि मशहूर हुए तो मिलने वाले बहुत आयेंगे। कई तरह के फोन सुनने पड़ेंगे। तब भला क्या खाक लिख पायेंगे। ऐसे ही ठीक है कि कोई हमें चेहरे से जानता नहीं है। अधिक मशहूर होना मतलब अपनी शांति भंग करना भी होता है।

यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की चिंतन पत्रिका’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
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1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
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4.अनंत शब्दयोग
लेखक संपादक-दीपक भारतदीप

31 मई 2008

गांधीवाद,गांधीगिरी और गांधीमार्ग-आलेख

गांधीगिरी, गांधीवाद और गांधी मार्ग या विचारधारा तीनों शब्दों का अर्थ भले ही एक जैसे लगते है पर मेरी दृष्टि में में इनका भावार्थ एक नहीं है। हो सकता है कि कुछ लोग मुझे रूढ़ समझें पर विशुद्ध रूप से हिन्दी क्षेत्र का होने के कारण हर शब्द का अर्थ और भाव मेरे स्मृति पटल में इस तरह अंकित है कि हिन्दी भाषा के हर शब्द का अर्थ और भाव मेरे लिये सहज हो गया और मुझे किसी भी शब्द का भावार्थ समझने में कठिनाई नहीं होती ।

जब भी हिन्दी भाषा में किसी संज्ञा के साथ गिरी शब्द जुड़ता है तो वह उसके अर्थ के साथ उसके भाव और महत्त्व को कम करता है। दूसरे शब्दों में कहें कि यह उसे निम्नकोटि का भावार्थ प्रदान करता है। मैं किसी काम को लघु नहीं मानता क्योंकि अपने पेट के लिये रोजगार अर्जित करने के लिये कोई निम्न व्यसाय करने से निम्न नहीं होता है और हमारे देश में तो कई ऐसे संत हुए हैं जिन्होंने इन्हीं निम्न व्यसायों से जुडे होने के बावजूद देश के आध्यात्म को ऐसी दिशा दी जिसके कारण देश आज विश्व्गुरु कहलाता है-पांडवों को भी अपने अज्ञातवास के दौरान निम्नकोटि के काम करना पड़े थे।

यहां इस चर्चा का उद्देश्य केवल भाषा और भाव का है। गिरी शब्द महत्वहीन व्यवसायों और संज्ञाओं में जोडा जाता है और कभी-कभी तो किसी नकारात्मक शब्द को प्रभावी बनाने के लिए भी इसका इस्तेमाल होता है-जैसे उठाईगिरी, दादागिरी और गुंडागिरी। आजकल दो शब्द बहुत शब्द प्रचलित हैं जैसे चमचागिरी और नेतागिरी और इनका उच्चारण कोई उनका महत्व प्रतिपादित करना नहीं होता बल्कि किसी का मजाक उडाने के लिए भी किया जाता है। आपने कभी शिक्षकगिरी , चिकित्सकगिरी , व्यापारीगिरी और अधिकारीगिरी जैसे शब्द नहीं सुने होंगे। तात्पर्य यह है कि यह केवल किसी संज्ञा के मह्त्व को कम प्रदर्शित करता है। ऐसे में गांधी जी के आदर्शों को मानने वाला मुझ जैसा हिन्दीभाषी क्षेत्र का शख्स अपने आपको असहज अनुभव करता है।

अब गांधीवाद शब्द की चर्चा करें। वाद या नारे तो केवल लोगों को यह बताने के लिये हैं कि हम उनके अनुगामी हैं और उनके बारे में हम अधिक जानते हैं इसलिए हम जो कहते हैं वही मानो। अगर आप किसी भी वाद या नारे पर चलने वाले बुद्धिजीवी से उसका स्वरूप पूछें तो सब केवल रटे-रटाए नारे लगाने वाली बात कहेंगे। गरीबों और शोषितों को उठाना, महिलाओं को सम्मान दिलाना और जन कल्याण करना। सो इस पर बात अधिक क्या कहें । इन नारों और वाद पर मैं पहले भी बहुत कुछ लिख चुका हूं।
गांधी विचार या गांधी दर्शन शब्द से मेरा मन प्रुफ़ुल्लित हो जाता है। इस शब्द का प्रयोग जो व्यक्ति करता है उसके बारे में यही सोच हमारे मन में आता है यह वाकई उनके बारे में जानता है। गांधी जी ने ऐसा चरित्र जिया है जिस पर जितना भी लिख जाये कम है। उन्होने कोई अभिनय नहीं किया और न कोई ऐसा अभिनेता इस देश में हुआ कि उनके चरित्र को जी सके। हमारे देश के कुछ लोग वालीवुड का बहुत शोर मचाते हैं पर गांधीजी पर फ़िल्म बनाने वाला और उनका चरित्र निभाने वाला दोनों विदेशी थे। मतलब साफ़ है कि इस देश में उनके वाद पर बहुत चले पर दर्शन किसी ने नहीं अपनाया और ऐसा करते तो तब जब समझ में आता।

हाल में एक फ़िल्म बनी जिसमें एक अभिनेता ने गांधीगिरी की और गांधीजी के कुछ भक्त बहुत प्रसन्न हो गये। भाई लोगों को पता नहीं कि भाषा का शब्द, अर्थ और उसका भाव बहुत महत्वपूर्ण होता है। गांधीगिरी शब्द का भाव पहले समझो। इस देश की अधिकतर जनता गांव में रह्ती है वह कभी इसे उस भाव से नहीं लेगी जो तथाकथित गांधीवादी समझ रहे हैं। उन्हें यह समझ लेना चाहिये कि हिन्दी क्षेत्रों में गिरी शब्द उसका महत्व कम करने के साथ उसको हास्याभिव्यक्ति भी प्रदान करता है। फ़िर मुंबई को छोड़कर आप किसी भी हिन्दी भाषी क्षेत्र में चले जायें वहां हिन्दी ऐसी नहीं है जैसी वालीवुड की है। उनके फ़िल्मों से हिन्दी का प्रचार तो हो सकता है पर लोग वैसी बोलते नहीं है जैसी उसमें देखते और सुनते हैं।फिल्मों ने देश के चरित्र पर दुष्प्रभाव डाला है पर भाषा अभी बची हुई है। अगर इसी तरह बंबईया फिल्मों की भाषा को आम बोलचाल में अपनाते रहे तो उसे भी हानि पहुंचा सकते हैं.
इस सबके विश्लेषण के साथ मेरा तो यही कहना है कि मैं हमेशा गांधी मार्ग या उनके दर्शन पर चलने के लिये ही कहूंगा क्योंकि गांधिगिरी शब्द मुझे असहज कर देता है और अपने जीवन में कभी भी उसका उच्चारण नहीं कर सकता। हो सकता है मैं गलत हूं पर क्या करूं मैने हिन्दी को जिस रूप में पढा है उसके आधार पर मेरी यह समझ बनी है हालांकि मैं यह दावा भी नहीं करता की मैं एक दम सही हूँ। हिन्दी भाषा में इतनी विशेषज्ञता नहीं है कि ऐसा दावा कर सकूं

लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप

18 अप्रैल 2008

फोटो के पीछे भी सच होता है-हास्य कविता

लाया फंदेबाज कई तस्वीरें
और दिखाते हुए बोला
‘‘दीपक बापू, तुम ही एक दोस्त हो
जिससे हम कुछ कह पाते हैं
पर जबसे किया है ब्लाग तुमने शुरू
हमारे लिये हो गये गुरू
भले ही अमल नहीं करते
पर तुंमसे ज्ञान बहुत पाते हैं
हम चाहते है चलो इस शहर में घूम आयें
तो कुछ बदलाव पायें
देखो यह फोटो
उस शहर में कितना बड़ा होटल है
और यह देखो कितना सुदर पार्क है
वहां एक चमकदार शापिंग माल भी
अब तुम अपने ध्यान लगाने के लिये
किसी जगह का पता मत पूछ लेना
क्योंकि इसका मुझे पता नहीं
और भी बहुत सारी इमारतें देखने लायक हैं
साथ चलो तो घूमकर आ जायें
फोटो देखकर खुश हुए
फिर मूंह बनाकर बोले-
‘‘घूम आयेंगे
कल शवासन में इन जगहों पर
ही जाकर घूम आयेंगे
फिर तुम्हें भी बतलायेंगे
कुछ समझा करो यार
शापिंग माल पर पैसे खर्च करो
तो खूब माल आ जायेगा
टिकिट के पैसे हों तो
वाटर पार्क में भी मजा आयेगा
जो होटल दिखा रहे हो
वह तो हमें बाहर से ही दिख पायेगा
हम देखते हैं इस मायावी दुनियां को
जिसका चेहरा हमेशा चमकता नजर आता है
पर इसके पीछे जो सच छिपा है
वह हमें सब जगह नजर आता है
कहीं पैसे के जोर पर
तो कहीं तलवार के सहारे
इसका रंग और निखर जाता है
सच का इस मायावी चेहरे से कोई नहीं नाता
तुम कहते हो कि
हमारे ध्यान के लिये
किसी सर्वशक्तिमान के दर का पता नहीं
पर हमें तो बस उसका ही आसरा होता
जब हमारा तन और मन थक जाता है
इन फोटो से जब ऊबता है मन
इष्टदेव की प्रतिमा को देखकर ही
प्रफुल्लित हो पाता है
तुम अपने परिवार को लेकर घूम आओ
हम चमकती हुई दुनियां की तस्वीरो के
पीछे छिपे कठोर सत्य से पीछा
छुड़ाकर जायें तो कहां जायें
अपनी कविता लिखकर ही खुश हैं
शब्दों भंडार के तरकस से निकलें तो
अपने निशाने पर जायें
कुछ समझें लोग तो कुछ समझ न पायें
……………………………………………..

16 अप्रैल 2008

अन्दर कुछ और बाहर कुछ और-हास्य कविता

सभाकक्ष से बाहर निकलते ही
फंदेबाज जोर से चिल्लाया
‘‘दीपक बापू, तुम्हें तो
मैं बहुत भला आदमी समझा था
पर तुम तो निकले एकदम चालू
अपने मजदूरों के वेतन और बोनस
बढ़ाने के लिये प्रबंधकों का पास तुम्हें लाया
मै उनका अध्यक्ष हूं और तुम मित्र
ढंग से हमारी बात कहोगे
यही सोच तुम्हें बुलाया
पर तुमने कंपनी से अपने ठेके के रेट बढ़ाये
मेरे लिये भी कुछ लाभ जुटाये
पर जिन मजदूरों की बात करने गये थे
उस पर तो हम बोल ही न पाये
बताओं अब क्या मूंह लेकर
साथियों के पास जाऊं
यह तुमने केसा हमको फंसाया ’’

गला खंखार कर मुस्कराते हुए बोले
‘‘चलो चलते हैं पहले वहां होटल में
जहां खाने की पर्ची तुम्हारे प्रबंधन ने दी है
फिर समझाते हैं तुम्हें माजरा
राजनीति करने चले हो या
खरीदने ज्वार बाजरा
हम न तीन में न तेरह में
न अटे में न फटे में
हम तो तुम्हारे वफादार हैं
मजदूरों के हिमायती है हम भी
पर राजनीति तो तुम्हारी चमकानी है
कमरे के अंदर
बाहर होती है राजनीति अलग-अलग
एक समझना बात बचकानी है
हमार ठेके के रेट तो वैसे ही बढ़ते
पर तुम कभी राजनीति की सीढ़ी नहीं चढ़ते
अरे, जाकर मजदूरों को
आश्वासन मिलने की बात बता देना
वहां कर रहे थे हम दोनों हुजूर-हुजूर प्रबंधन की
पर मजदूरों में हाय-हाय करा देना
कुछ तालियां हमारे नाम की बजवा देना
अपने दो-चार चमचों को भी
प्रमोशन दिलवा देना
पर असली हक की लड़ाई कभी न लड़ना
तुम्हारे बूते का नहीं है यह सब
निकल गया हाथ से मामला तो
फिर मुश्किल होगा पकड़ना
वाद और नारों पर चलना सालों साल
भरना अपने घर में माल
हमारी तरह गहरा चिंतन न करना
हम तो हैं सब जगह फ्लाप
और अब तो हिट की फिक्र छोड़ दी है
पर राजनीति में तुम्हें हिट होने के लिये
ऐसा ही मायाजाल है रचना
कमरे के बाहर हाय-हाय
अंदर उनको हुजूर-हुजूर करना
अब सब जगह ऐसा ही वक्त आया
कोई तुम्हें कुछ नहीं कहेगा
पूरा जमाना इसी रास्त चलता आया
...............................................
सूचना-यह काल्पनिक हास्य व्यंग्य रचना है और किसी घटना या व्यक्ति से इसका कोई मेल नहीं है अगर किसी की कारिस्तानी से मेल खा जाये तो वही उसके लिये जिम्मेदार होगा।
कमरे के अंदर-बाहर की राजनीति होती हैं अलग-अलग-हास्य कविता

14 अप्रैल 2008

अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम बनेगा ब्लोग-hindi article

जब मेरे ब्लागों पर कुछ ऐसे लोगों के कमेंट आते हैं जिनसे मैं परिचित नहीं हूं तो तत्काल जाकर उनके ब्लाग देखता हूं। मुझे आश्चर्य तब होता है जब वैचारिक धरातल पर सब मेरे साथ ही खड़े दिखाई देते है। परिचितों में तो करीब-करीब सभी एक ही वैचारिक संघर्ष में व्यस्त हैं। मैने ब्लागरों में जो बातें देखीं हैं वह भी गौर करने लायक है-

1. सभी ब्लागर अपने धर्म में आस्थावान हैं पर उनका कर्मकांडों और अंधविश्वासों से बहुत कड़ा विरोध है। इस मामले में वह यह मानने को तैयार नहीं है कि दिखावे की भक्ति कर लोगों को स्वर्ग का रास्ता दिखाया जाये जो कभी बना ही नहीं।

2.अपने विचारों के साथ ईमानदारी के साथ चलने की उनमें दृढ़ता है और वह किसी प्रकार की चाटुकारिता में यकीन नहीं करते।
3.देश के हालातों से बहुत चिंतित हैं और ऐसी घटना जिसमें किसी महिला को अपमानित किया जाता है, गरीब को सताया जाता है और निर्दोष को मारा जाता है उससे वह विचलित होते है।
4.राष्ट्रभाषा हिंदी के प्रति अटूट निष्ठा है और जिसको प्रमाणित करने के लिये वह किसी भी हद तक कष्ट उठा सकते हैं।
5. वह वर्तमान व्यवस्था से असंतुष्ट हैं। प्रचार माध्यमों के प्रति उनके मन में अनेक संदेह है और वह इसे व्यक्त करते हैं।

लिखने की शैली और प्रस्तुतिकरण के तरीके में अंतर हो सकता है पर कमोवेश मूल विचार में एकरूपता है। अपने आलेखों और कविताओं पर उनके रवैये से एक बात लगती है कि कहीं न कहीं उनके मन में इस समाज को बदलते देखने की इच्छा है। वह जानते हैं कि उनके लिखे से समाज नहीं बदलेगा पर मैं कहता हूं कि आज अगर हम कोई विचार आज लिखकर या बोलकर व्यक्त करते हैं तो कल वह समाज के हिस्सा बन ही जाता है। हमारे सामने भी ऐसा हो सकता है और हमारे बाद भी। काम कहने वाले और करने वाले दोनों मिट जाते हैं पर जो उनके शब्द होते हैं वह आगे चलते जाते हैं।

अक्सर लोग कहते हैं कि लिखे से समाज नहीं बदलता पर शब्द चलते हैं और कोई उनको पढ़कर प्रभावित होता है तो उसके कर्म पर प्रभाव होता है। आज जो मैं लिख रहा हूं वह किसी के शब्दों की प्रेरणा ही हैं न! किसी ने मुझे अभिव्यक्ति का पता दिया था लिखकर। वह मुझे कहां से कहां ले आया। यह तो एक शब्द हैं बहुत सारे शब्द हैं जिनको लेकर मैं आगे बढ़ा। मेरे लिखे से समाज नहीं बदला पर मेरे में बदलाव तो आया न! मैं अगर यहां लिख रहा हूं तो कोई जगह जहां से हट रहा हूं। अपने मनोरंजन के लिये टीवी या अखबार से परे होना पड़ता है। कहीं जाकर फालतू समय नष्ट करने से अच्छा मुझे लिखना लगता है।

निष्कर्ष यह है कि हिंदी में ब्लाग के पाठक और लेखक आज नहीं तो कल बढ़ेंगे ही। मैने एक चार वर्ष से अधिक पुराना ब्लाग देखा था उसमें उसका लेखक निराशा में था और हिंदी में ब्लाग लेखन की प्रगति से नाखुश था। आज हम देखें तो उसके मुकाबले स्थिति बहुत ठीक है। दरअसल लोग ऊबे हुए हैं और वर्तमान में उनकी अभिव्यक्ति का अपना कोई अधिक सशक्त साधन नहीं हैं, जो हैं उनसे वह संतुष्ट नहीं है। एक बात और है कि जो भी संचार और प्रचार माध्यम है वह चल तो हमारे पैसे से ही रहे हैं कोई अपनी जेब से नहीं चला रहा। हम उनका अप्रत्यक्ष भुगतान करते हैं पर उसका पता नहीं लगता यहां पर प्रत्यक्ष भुगतान कर रहे हैं उसको लेकर हम परेशान होते हें क्योंकि वह दिखता है। मै छह सौ रुपये का इंटरनेट का भुगतान करता हूं यह मानकर कि यह डिस्क कनेक्शन है जिसका डबल भुगतान करना है। लिखना तो मेरे लिये एक साधन है जिससे मुझे जीवन में ऊर्जा मिलती है।
जब मेरा यह सोच है तो ऐसा सोचने वाले और भी होंगे। यह अंतर्जाल पर ब्लाग लिखने और पढ़ने का सिलसिला इसलिये भी चलता रहेगा क्योंकि लिखने वाले इसका भुगतान करेंगे और जो इनका चला रहे हैं वह इसे बंद नहंी करेंगे। अन्य प्रचार माध्यम जरूर विज्ञापन न मिलने पर संकट में आ सकते हैं। जिस तरह ब्लाग लोगों की अभिव्यक्ति का साधन बन रहा है उससे तो ऐसा लगता है कि लोग अन्य जगह से हटकर इधर आयेंगे और यह एक सशक्त माध्यम बनेगा। ऐसे में जो प्रबंधन कौशल में माहिर होंगे वह आय भी अर्जित करेंगे और कुछ लोग इसका उपभोक्ता की तरह इस्तेमाल कर इसे प्राणवायु देते रहेंगे। आखिर दूसरे संचार और प्रचार माध्यमों में भी तो ऐसा ही हो रहा है। कोई खर्च कर रहा है और कोई कमा रहा है। मोबाइल पर फालतू बातें कर खर्च करने वाले क्या कम हैं? ऐसे में लिखने वाले भी ऐसा ही करेंगे। मेरा मानना है कि आगे संचार और प्रचार माध्यमों को इससे चुनौती मिलने वाली है और इसके कितना समय लगेगा यह कहना कठिन है पर अधिक नहीं लगेगा ऐसा मेरा अनुमान है। एक दृष्टा की तरह ही मैं इस खेल को देख रहा हूं। अभी हाल ही में कृतिदेव का यूनिकोड में परिवर्तित टूल मिलने के बाद तो मैने हास्य कविता लिखना कम ही कर दिया क्योंकि वह अधिक लिखना मुश्किल होने से ही लिखता था। हालांकि मुझे लगता है कि उन हास्य कवितओं के पाठक बहुत हैं और मुझे फिर लिखना शुरू करना पड़ेगा।

13 अप्रैल 2008

राजमहल अब चारागाह हो गए-हिन्दी शायरी

कई बस्तियां बसीं और उजड़ गईं
राजमहल खडे थे जहाँ
अब बकरियों के चरागाह हो गए

सर्वशक्तिमान अपनी कृपा के साथ
कहर का हथियार नहीं रखता अपने साथ
तो कौन मानता उसे
कई जगह उसका भी प्रवेश होता वर्जित
नाम लिया जाता
पर घुसने नहीं दिया जाता
नरक और स्वर्ग के दृश्य यहीं दिखते
फिर कौन ऊपर देख कर डरता
खडे रहते फ़रिश्ते नरक में
शैतानों के महल होते सब जगह
जो अब इतिहास के कूड़ेदान में शामिल हो गए
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चंद किताबों को पढ़कर
सबको वह सुनाते हैं
खुद चलते नहीं जिस रास्ते
वह दूसरे को बताते हैं
उपदेश देते हैं जो शांति और प्रेम का
पहले वह लोगों को लडाते हैं
फिर गुरु की भूमिका में आते हैं
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31 मार्च 2008

क्या वह ज्ञानी थे-हिन्दी कहानी

वह ज्ञानी थे और अभी प्रवचन कार्यक्रम कर लौटे थे। मेरे से उनकी मुलाकात उनके यजमान के घर पर जो कि मेरे मित्र थे के घर पर हुई जहां मै किसी काम से गया था।

मित्र ने मुझसे कहा कि ‘‘तुम प्रवचन कार्यक्रम में क्यों नहीं आये? आना चाहिए भई। यह ठीक है कि तुम आजकल योग साधना कर रहे हो पर कभी-कभी सत्संग भी सुना करो।’’

वह प्रवचनकर्ता कोई साधु संत नहीं थे बल्कि गृहस्थ थे पर ऐसे ही उनका नाम हो गया था तो लोग समय पास करने के लिये उनका बुला लेते थे। मैं मित्र की बात सुनकर हंस पड़ा तो वह सज्जन बोले-‘‘हां इस दुनियां में सुबह बहुत तेजी से सांस लेने वाले भी कई योगी न रहे। कबीरदास जी यही कहते हैं इसलिये भगवान भजन में मन लगाना चाहिये। योग साधना से क्या होता है।’’

मैं थोड़ा जोर से हंसा तो वह बोले-‘‘आप इसे मजाक मत समझिये मैं आपको सही ज्ञान की बात बता रहा हूं।’’

इसी बीच मेरे मित्र की पत्नी भी एक थाली में फल और मिठाई रखकर आ गयी तो वह उसे देखते हुए बोले-‘‘मिठाई तो अभी नहीं खाउंगा। एक सेव अभी खा लेता हूं बाकी थैले में रख दो घर ले जाता हूं।

मैं भी मुस्कराते हुए उन्हें देख रहा था। मेरा मित्र होम्योपैथी का डाक्टर था और अधिक प्रसिद्ध न होने के बावजूद उसका काम ठीक चल रहा था और अपने मोहल्ले की तरफ के वह इस कार्यक्रम का मुख्य कर्ताधर्ता था।

वह सेव खाते हुए उससे बोले-‘भाई, हमें कम से कम महीने भर की दवाई दे दो ताकि हमारी और पत्नी की डायबिटीज कंट्रोल में रहे।’’

मेरा मित्र दवाई लेने चला गया तो उसकी पत्नी भी वहंा से चली गयी। तब वह मुझसे बोले-योगसाधना से कोई सिद्ध नही होता। यह कहने की बात है। इसलिये आप भगवान में मन लगाया करो। उनकी भक्ति से सब ठीक हो जाता है।’’


मैने उनसे कहा-‘यह मेरा मित्र डाक्टर है और पोच वर्ष पूर्व उच्च रक्तचाप की शिकायत के कारण इलाज कराने आया था । तब इसने मुझे खूब डांटा था। इसके पास अब कभी मरीज का तरह दवाई नहीं लेने न आना पड़े इसलिये ही योगसाधना करता हूं। यकीन करिये केवल उसके बाद दो वर्ष पहले बुखार की शिकायत लेकर आया था यह अलग बात है कि यह उस दिन घर पर नहीं था तो इसके पोर्च में पलंग पर सो गया और मेरा बुखार चला गया। इससे बचने के लिये ही मैं योगसाधना, ध्यान और मंत्रजाप करता हूं।’’

तब तक मेरा मित्र कमरे के अंदर आ गया था और मैने उसके सामने ही कहा-‘‘एक डाक्टर के रूप में मुझे इसकी शक्ल पसंद नहीं है।’’

उनका मूंह उतरा हूआ था। उन्होंने अपना मिठाई और फल को थैला उठाया और वहंा से चले गये। जाते वक्त उन्होंने मेरे मित्र और उसकी पत्नी से बात की पर मेरी तरफ देखा भी नहीं। उनके जाने के बाद मैने अपने मित्र से पूछा-‘‘कौन सज्जन थे ये?’’

वह बोला-‘‘कोई अधिक प्रसिद्ध तो नहीं है मेरे मरीज है और मोहल्ले के लोगों ने कहा कि सत्संग कराना है। सो बुलवा लिया। वैसे बहुत ज्ञानी हैं।’’
तुम्हें कैसे लगे?’

मित्र और मेरे बीच अनेक बार अध्यात्म पर जोरदार बहसें सुन चुकी उसकी पत्नी को मेरे से इस उत्तर की आशा नहीं थी। इसलिये उसने हंसते हुए पूछा-‘‘क्या सोच बोल रहे हैं या हमारा मन रख रहे हैं।’’

वह गलत नहीं थी पर मैं मित्र द्वारा दिये गये महत्वपूर्ण कागज के लिफाफे को लेकर वहां से बाहर निकल गया। पीछे से मेरा मित्र मुझसे कह रहा था-सच बोलना। क्या तुंम हमारा दिल रखने के लिये मान रहे हो कि वह वास्तव में ज्ञानी हैं।’’

मैने पलटकर उसे मुस्कराते हुए देख और वहां से बिना उत्तर दिये चला आया।

22 मार्च 2008

होली पर्व पर के फालतू चिंतन-a hindi article

आज कुछ होली के अवसर पर जब कुछ ब्लोग देखे तो कुछ दुख और पछतावा हुआ की आखिर लोग कुछ ऊंचा और अलग क्यों नहीं सोचते. वही घिसे-पिटे डायलाग, व्यंग्य और विचार जो बरसों से सुन रहे हैं. वही क्रिकेट और फिल्म पर मजाक क्या कोई और नहीं सूझता.
वैसे अगर देखा जाये तो ब्लोगर पूरे वर्ष होली मनाते रहे हैं. कई बार जब चौपालों का भ्रमण करता हूँ तो हास्य का भाव अधिक दिखाई देता है. अगर आप कभी कभी भडास ब्लोग और उस पर लिखने वालों की तेवर को देखें तो घबडा जायेंगे कि पता नहीं अब क्या बवाल मचने वाला है पर थोडी देर बाद सब कुछ सामान्य. भड़ास के लोग नहीं जानते कि अगर वह अभद्र शब्द न भी लिखे तो भी उनके लिखे में ऐसा प्रभाव है कि लोग हंस भी सकते हैं और रो भी सकते हैं.
हुआ यूं कि भड़ास के मोडरेटर पर हमले की खबर उनके ब्लोग पर थी.मुझे भी बहुत चिंता हुई. ब्लोग पर धारावाहिक रूप से इसका प्रसारण हो रहा था. कुछ कमेन्ट लिखने वाले विचलित थे और हमलावर को कोस रहे थे. मोहल्ला वाले ने इस हमले की घोर निंदा की और लिख दिया कि उनके साथी अब उस ब्लोगर की मदद करें.
मगर अब देखिये एक भडासिया उखड गया'कौन साथी? क्या आप हमारे साथी नहीं है. आप यह कहिये हम-हम सब साथी-अब उसकी इस टिप्पणी ने मेरे अन्दर यह संशय पैदा किया कि क्या यह कोई प्रचार है या इसमे कोई दम है.

फिर एक और पोस्ट और उस पर मोहल्ला ब्लोग वाले ने कमेन्ट में लिखा गया कि संतोष का विषय है कि लहुलाहान वाली स्थिति नही हैं. हमें में तसल्ली हुई पर आगे कमेन्ट देखा तो हैरान हो गए. एक भडासिए ने रोष जताया कि मोहल्ले वाले तो हमारा दुश्मन खुद ही कहलवाना चाहते हैं. हम क्या झूठ बोल रहे हैं कि हमारे साथी पर हमला हुआ है और वह बुरी तरह घायल है. इसका मतलब यह है कि मोहल्ले वालों की इसमें कोई कारिस्तानी है और इनके खिलाफ भी रिपोर्ट होनी चाहिए.
अब भडास के मोडरेटर पर हमले का विषय दूसरे नंबर पर था और मोहल्ले वाले के प्रतिक्रिया उनके गुस्से का विषय थी. हम आखिर कर क्या रहे थे दरअसल हम भडास के मोडरेटर की उस ब्लोग पर ठीक ठाक होने और पिक्चर पर जाने की घोषणा देखकर हैरान थे और उससे ऐसा लग रहा था कि उस पर हमला हुआ था. हम फिर पहले की पोस्टों को देखने लगे. हम शाम को देख रहे थे और उनका क्रम देखा तो समझने में देर नहीं लगी कि इन्होने आज खूब हिट्स लिए होंगे. उस दिन कम से कम दस बार तो हमने उनके ब्लोग को देखा होगा.हम सोच रहे थे कि इतना जबरदस्त भावपूर्ण लिखने वालों के लिखने की ताकत निश्चित बहुत होगी. एक बार हम यह भी भूल गए कि मोडरेटर के ठीक होने की जानकारी अब उस ब्लोग कि सबसे पहले पोस्ट थी.उनके लिखे का ऐसा प्रभाव है कि मैं अभी भी लिख रहा कि वह एक जबर्दास कामेडी थी. अगर नहीं थी तो फिर भड़ास वालों ने उस प्रसंग को आगे क्यों नहीं बढाया?
वह सच लिखते हैं या केवल कल्पना प्रस्तुत करते हैं पर यह वह जाने पर यह एक वास्तविकता है कि वह अन्य ब्लागरों को पठनीय सामग्री देते हैं ताकि उनके अन्दर दिलचस्पी बनी रहे. हमला दिल्ले में हुआ खबर मुंबई डे गयी. मुंबई वाले ने दिल्ली में किसी ब्लोगर को फोन कर मदद मांगी. कमेन्ट पर कमेन्ट लिखने वाले वही चार-पांच लोग. बहुत भावपूर्ण कमेन्ट. ऐसा लगता था कि कोई ब्लोग पर लिखा गया धारावाहिक हो. होली पर मुझे उनके कई घटनाएं याद आ रहीं है पर आज बस इतना ही.

15 मार्च 2008

जो लिखे वह मूर्ख, जो पढे वह समझदार-हास्य व्यंग्य

ब्लोगर अपने घर के बाहर पोर्च पर अपनी पत्नी के साथ खडा था। उसी समय दूसरा ब्लोग आकर दरवाजे पर खडा हो गया। पहला ब्लोगर इससे पहले कुछ कहता उसने अभिवादन के लिए हाथ उठा दिए-''नमस्ते भाभीजी।

पहला ब्लोगर उसकी इन हरकतों का इतना अभ्यस्त हो चुका था कि उसने अपनी उपेक्षा को अनदेखा कर दिया। वह कुछ उससे कहे गृहस्वामिनी ने उसका स्वागत करते हुए कहा-''आईये ब्लोगरश्री भाईसाहब। बहुत दिनों बाद आपका आना हुआ है।''

पहले ब्लोगर ने प्रतिवाद किया और कहा-''हाँ, अगर उस सम्मानपत्र की बात कर रही हो जो यह कहीं से छपवाकर लाया और तुमसे हस्ताक्षर कराकर ले गया था तो मैं बता दूं उससे यह तय करना मुश्किल है कि यह ब्लोगश्री है कि ब्लोगरश्री। अभी उस भ्रम का निवारण नहीं हुआ है। अभी इसके नाम के आगे किसी पदवी का उपयोग करना ठीक नहीं है।''

गृहस्वामिनी ने दरवाजा खोल दिया। दूसरा ब्लोगर अन्दर आते हुए बोला-''यार, आज तुमसे जरूरी काम पड़ गया इसलिए आया हूँ।''
पहले ब्लोगर ने कहा-''तुम कल आना। आज मुझे एक जरूरी पोस्ट लिखनी है।
गृहस्वामिनी ने बीच में हस्तक्षेप किया और कहा-''आप कंप्यूटर के पास बैठकर बात करिये। मैं तब तक चाय बनाकर लाती हूँ। घर आये मेहमान से ऐसे बात नहीं की जाती है। ''
पहले ब्लोगर को मजबूर होकर उसे अन्दर ले जाना पडा। दूसरे ब्लोगर ने कुर्सी पर बैठते हुए कहा--''मैं होली पर मूर्ख ब्लोगर सम्मेलन आयोजित करना चाहता हूँ। अपने शहर में तो बहुत कम लोग लिखते हैं कोई ऐसा शहर बताओ जहाँ लिखे वाले अधिक हों तो वहीं जाकर एक सम्मेलन कर लूंगा। तुम तो इंटरनेट पर लिखने वाले अधिकतर सभी ब्लोगरों को जानते हो.''
पहले ब्लोगर ने शुष्क स्वर में कहा-''हाँ, यहाँ तो तुम अकेले मूर्ख ब्लोगर हो। इसलिए कोई सम्मेलन नहीं हो सकता। किस शहर में मूर्ख ब्लोगर अधिक हैं मैं कैसे कह सकता हूँ।

दूसरा ब्लोगर बोला-''मैंने तुमसे कहा नहीं पर हकीकत यह है कि मेरी नजर में तुम एक मूर्ख ब्लोगर हो। जो ब्लोगर लिखते हैं वह मूर्ख और जो पढ़ते हैं वह समझदार हैं। समझदार ब्लोगर पढ़कर कमेन्ट लगाते हैं और कभी-कभी नाम के लिए लिखते हैं।''
पहले ब्लोगर ने कहा-''ठीक है। फिर इस मूर्ख ब्लोगर के पास क्यों आये हो? अपना काम बता दिया अब निकल लो यहाँ से।

दूसरा ब्लोगर बोला-''यार, मैं तो मजाक कर रहा था। जैसे होली पर मूर्ख कवि सम्मेलन होता है उसमें भारी-भरकम कवि भी मूर्ख कहलाने को तैयार हो जाते हैं। वैसे ही मैं ब्लोगरों का सम्मेलन करना चाहता हूँ।तुम तो मजाक में कहीं बात का बुरा मान गए.''

इतने में गृहस्वामिनी चाय लेकर आ गए, साथ में प्लेट में बिस्किट भी थे।
दूसरा ब्लोगर बोला-''भाभीजी की मेहमाननवाजी का मैं कायल हूँ। बहुत समझदार हैं।
पहले ब्लोगर ने कहा-''हाँ, हम जैसे मूर्ख को संभाल रही हैं।''
दूसरा ब्लोगर ने कहा--''नहीं तुम भी बहुत समझदार हो। वर्ना इंटरनेट पर इतने सारे ब्लोग पर इतना लिख पाते। ''
वह चली गयी तो दूसरा ब्लोगर बोला-''देखो, तुम्हारी पत्नी के सामने तुम्हारी इज्जत रख ली।''
पहले ब्लोगर ने कहा--''मेरी कि अपनी। अगर तुम नहीं रखते तो अगली बार की चाय का इंतजाम कैसे होता।
दूसरे ब्लोगर ने कहा--''अब यह तो बताओं किस शहर में अधिक ब्लोगर हैं।
पहले ने कहा-''यहाँ कितने असली ब्लोगर हैं और कितने छद्म ब्लोगर पता कहाँ लगता है। ''
दूसरे ने कहा-''ठीक है मैं चलता हूँ। और हाँ इस ब्लोगर मीट पर एक रिपोर्ट जरूर लिख देना।तुम्हारे यहाँ आकर अगर कोई काम नहीं हुआ। मुझे मालुम था नहीं होगा पर सोचा चलो एक रिपोर्ट तो बन जायेगी।''
पहला ब्लोगर इससे पहले कुछ कहता, वह कप रखकर चला गया। गृहस्वामिनी अन्दर आयी और पूछा-''क्या बात हुई?''
पहले ब्लोगर ने कहा-''कह रहा था कि मूर्ख ब्लोगर लिखते हैं और समझदार पढ़ते हैं?''
गृहस्वामिनी ने पूछा-''इसका क्या मतलब?''
ब्लोगर कंधे उचकाते और हाथ फैलाते हुए कहा-''मैं खुद नहीं जानता। पर मैं उससे यह पूछना भूल गया कि इस ब्लोगर मीट पर हास्य कविता लिखनी है कि नहीं। अगली बार पूछ लूंगा।''

नोट-यह हास्य-व्यंग्य रचना काल्पनिक है और किसी घटना या व्यक्ति से इसका कोई संबंध नहीं है. अगर किसी से मेल हो जाये तो वही इसके लिए जिम्मेदार होगा. इसका रचयिता किसी दूसरे ब्लोबर से नहीं मिला है।

7 मार्च 2008

मेरा जमीर जिंदा है-हिन्दी शायरी

कभी यूं बिखर जाता हूँ कि
अपने को टुकड़े देख सहम जाता हूँ
फैला है चारों तरह जाल
पर कोई मैं अकेला नहीं फंसा
अपने साथ जमाने को फंसा पाता हूँ
लोग टू चलते हैं जालिमों के आगे सिर झुकाए
मेरा जमीर जिंदा है जो लड़ पाता हूँ
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1 मार्च 2008

अपनी-अपनी सोच-हिन्दी शायरी

यूं तो हर आदमी अपने लिए कुछ
ढूँढता है इस जीवन पथ पर
नाम नहीं जानता
पहचान नहीं पाता
हर चीज का कोई होता है
पर उसके उपयोग का कोई अंजाम नहीं जानता
बहुत अक्लमंदी दिखाता है
अपना अज्ञान छिपाने में
पर उसको आता है खुद सब नजर

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