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17 अगस्त 2008

रहीम के दोहे:कटहल कभी राई के सामान छोटा नहीं दिखाई देता

बड़े पेट के भरन को, है रहीम देख बाढि
यातें हाथी हहरि कै, दया दांत द्वे काढि

कविवर रहीम कहते हैं कि जो आदमी बड़ा है वह अपना दुख अधिक दिन तक नहीं छिपा सकता क्योंकि उसकी संपन्नता लोगों ने देखी होती है जब उसके रहन सहन में गिरावट आ जाती है तब लोगों को उसके दुख का पता लग जाता है। हाथी के दो दांत इसलिये बाहर निकल आये क्योंकि वह अपनी भूख सहन नहीं कर पाया।

बड़े बड़ाई नहिं तजैं, लघु रहीम इतराइ
राइ करौंदा होत है, कटहर होत न राइ

कविवर रहीम कहते हैं कि बड़े आदमी कभी अपने मुख से स्वयं अपनी बड़ाई नहीं करते जबकि छोटे लोग अहंकार दिखाते है। करौंदा पहले राई की तरह छोटा दिखाई देता है परंतु कटहल कभी भी राई के समान छोटा नजर नहीं आता।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-कहा जाता है कि धनाढ्य व्यक्ति इतना अहंकार नहीं दिखाता जितना नव धनाढ्य दिखाते हैं। होता यह है कि जो पहले से ही धनाढ्य हैं उनको स्वाभाविक रूप से समाज में सम्मान प्राप्त होता है जबकि नव धनाढ्य उससे वंचित होते हैं इसलिये वह अपना बखान कर अपनी प्रभुता का बखान करते हैं और अपनी संपत्ति को उपयोग इस तरह करते हैं जैसे कि किसी अन्य के पास न हो।

वैसे बड़ा आदमी तो उसी को ही माना जाता है कि जिसका आचरण समाज के हित श्रेयस्कर हो। इसके अलावा वह दूसरों की सहायता करता हो। लोग हृदय से उसी का सम्मान करते हैं जो उनके काम आता है पर धन, पद और बाहुबल से संपन्न लोगों को दिखावटी सम्मान भी मिल जाता है और वह उसे पाकर अहंकार में आ जाते हैं। आज तो सभी जगह यह हालत है कि धन और समाज के शिखर पर जो लोग बैठे हैं वह बौने चरित्र के हैं। वह इस योग्य नहीं है कि उस मायावी शिखर पर बैठें पर जब उस पर विराजमान होते हैं तो अपनी शक्ति का अहंकार उन्हें हो ही जाता है। जिन लोगों का चरित्र और व्यवसाय ईमानदारी का है वह कहीं भी पहुंच जायें उनको अहंकार नहीं आता क्योंकि उनको अपने गुणों के कारण वैसे भी सब जगह सम्मान मिलता है।
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लेखक संपादक-दीपक भारतदीप

28 जून 2008

रहीम के दोहे:कष्ट के समय बुरे वचन भी सहन करने पड़ते हैं


समय परे ओछे बचन, सब के सहे रहीम
सभा दुसासन पट गहे, गदा लिए रहे भीम


कविवर रहीम कहते हैं कि बुरा समय आने पर तुच्छ और नीच वचनों का सहना करना पड़ा। जैसे भरी सभा में देशासन ने द्रोपदी का चीर हरण किया और शक्तिशाली भीम अपनी गदा हाथ में लिए रहे पर द्रोपदी की रक्षा नहीं कर सके।

समय पाय फल होत है, समय पाय झरि जाय
सदा रहे नहिं एक सौ, का रहीम पछिताय


कविवर रहीम कहते हैं कि समय आने पर अपने अच्छे कर्मों के फल की प्राप्ति अवश्य होती है। वह सदा कभी एक जैसा नहीं रहता इसीलिये कभी बुरा समय आता है तो भयभीत या परेशान होने की आवश्यकता नहीं है।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-जीवन में सभी के पास कभी न कभी अच्छा समय आता है ऐसे में अपना काम करते रहने के अलावा और कोई चारा नहीं है। आजकल लोग जीवन में बहुत जल्दी सफलता हासिल करने को बहुत आतुर रहते हैं और कुछ को मिल भी जाती है पर सभी के लिये यह संभव नहीं है।
कई लोग जल्दी सफलता हासिल करने के लिये ऐसे मार्ग पर चले जाते हैं वहां उन्हें शुरूआत में बहुत अच्छा लगता है पर बाद में वह पछताते है।


यह सही है कि कुछ लोगों के लिये जीवन का संघर्ष बहुत लंबा होता है पर उन्हें अपना धीरज नहीं खोना चाहिए। कई बार ऐसा लगता है कि हमें जीवन में किसी क्षेत्र मे सफलता नहीं मिलेगी पर सत्य तो यह है कि आदमी को अपने अच्छे कर्मों का फल एक दिन अवश्य मिलता है।

22 जून 2008

रेल में किताबें बेच सकते हैं, ज्ञान नहीं-आलेख


वृंदावन की यात्रा कर हम दोनों पति-पत्नी दोनों ही खुश होते हैं। इस बार जब हम दोनों वहां पहुंचे तो बरसात हो रही थी और ठहरने के स्थान पर सामान रखकर हम सबसे अंग्रेजों के मंदिर में गये क्योंकि वह अधिक पास था। हमारे साथ के परिचित सज्जन तो नहीं चले पर उनकी दस वर्षीय बेटी हमारे साथ वहां चली।

वृंदावन में अनेक मंदिर हैं पर बांके बिहारी और अंग्रेजों (इस्कान) का मंदिर बहुत अधिक प्रसिद्ध हैं और हम दोनों भी वहां रहते हुए प्रतिदिन जाते हैं। अंग्रेजों के मंदिर में आरती के समय नाचते हुए लोगों का दृश्य भी अच्छा लगता है। हालांकि बरसों से जा रहे हैं पर अब वहां मैटल डिक्टेटर और अन्य कड़ी सुरक्षा सहित अन्य परिवर्तन देखकर हमें आश्चर्य होता है। वहां तमाम लोग आते हैं और ऐसा लगता है कि कुछ पिकनिक मनाने के लिए भी आते हैं तो कुछ केवल देखने भर के लिये चले आते हैं। कुछ लोग भक्ति भाव से आते हैं। अगर सीधे कहें तो वहां चारों तरह के भक्त आते हैं-आर्ती, अर्थाथी, जिज्ञासु और ज्ञानी। मैं तो वहां कर ध्यान लगाता हूं और मेरी पत्नी भीड़ में बैठकर तालियां बजाते हुए भजन गाती है।

बरसात बंद होने पर जो उमस का गुब्बार फूटा तो उसमें हम पसीना-पसीना हो गये थे। ग्यारस और अवकाश का दिन होने के कारण वहां भीड़ अधिक थी और मुझे ध्यान के लिये किसी अच्छी जगह की तलाश थी। मेरी पत्नी ने दीवार से रखे कूलर की तरफ इशारा किया और मैं वहां ध्यान लगाने बैठ गया और वह आगे बैठकर ताली बजाते हुए नाम जपने लगी। कुछ देर बाद हम बांके बिहारी के मंदिर जाने के लिये तैयार होकर बाहर निकलने लगे। वहां लगी दुकान पर किताबों का मैं निरीक्षण करने लगा। मेरी पत्नी किताबों में रुचि नहीं लेती वह फिर माला या कोई गले में डालने के लिये प्रतीकों के हार खरीदने के इरादे से खड़ी हो गयी।

मैं किताब की दुकान पर पहुंचा तो वहां धवल वस्त्र पहने एक सेल्समेन ने
मेरी तरफ चार पांच छोटी किताबों एक साथ आगे बढ़ाते हुए कहा-‘यह लीजिये सौ रुपये की हैं। दान समझकर लीजिये इससे आपको ज्ञान भी मिलेगा।’

मैंने उससे पूछा-‘क्या कबीर की रचनाओं का कोई अंग्रेजी संग्रह है?’

उसने तुरंत कहा-‘यहां तो केवल हमारी किताबें ही मिलती हैं।’

मैं वहां से चल पड़ा तो पत्नी ने कहा-‘जब आपको मालुम है तो फिर इन किताबोंे की दुकान पर जाते क्यों हैं?’
मैंने कहा-‘इस उम्मीद में शायद कोई किताब मिल जाये।’
वहां से बाहर निकलते हुए कम से कम तीन स्थानों पर ऐसी किताबें खरीदने के लिए हमारे समक्ष रखी गयी। अचानक मेरी पत्नी को याद आया कि कभी मैंने उससे इस्कान की श्रीगीता खरीदने की बात कही थी और उसने पूछा-‘आप खरीदते क्यों नहीं।’
मैंने उससे कहा-‘यह आज से पांच वर्ष पूर्व की बात है। तब तो मैंने अनेक संतों की व्याख्या वाली श्रीगीता खरीद ली थी, पर मेरे एक मित्र ने मुझसे कहा था कि गोरखपुर प्रेस की वही गीता पढ़ना जिसमें केवल संस्कृत श्लोक का अनुवाद हो। किसी द्वारा की गयी व्याख्या या महात्म्य वाली मत पढ़ना क्योंकि उससे भ्रमित हो जाओगे।’ वह तो मेरे पास थी।’
पत्नी ने पूछा-‘ पर उसने ऐसा क्यों कहा था?’
मैंने कहा-‘उसने मेरा लिखा पढ़ा था और वह जानता था कि मैं स्वयं भी अपना सृजन कर सकता हूं। वह मुझे और मेरे लेखन का प्रशंसक था और नहीं चाहता था कि मैं किसी दूसरे की सोच पर चलूं। वह मुझसे आज भी मौलिक सोच और सृजन की आशा करता हैं।’
पत्नी ने पूछा-‘वैसे इस तरह किताबों को इस तरह बेचना ठीक लगता है। अरे, जिसे खरीदना है वह खरीद लेगा।’
मैंने कहा-‘हां, मुझे भी लगता है कि किताबें तो बेची जा सकती हैं पर ज्ञान नहीं बेचा जा सकता है।’

रास्ते में एक जगह किताबों की दुकान पड़ी। वहां एक जगह हमारे साथ चल रही लड़की उसी दुकान के पास पानी पताशा खाने की जिद करने लगी तो मेरी पत्नी भी वहां रुक गयी। मैं पानी पताशा नहीं खाता इसलिये मेरी पत्नी ने उस किताब की दुकान की तरफ इशारा करते हुए बोली-‘आपको कोई किताब खरीदनी हो तो यहां देख लीजिये। आपकी पसंद की किताबें तो ऐसी ही दुकानों पर मिल पातीं हैं।’
मैं वहां जाकर किताबें देखने लगा। एक किताब ली। वहां से हम बांके बिहारी मंदिर में चले गये।

अगली सुबह हम वापस रवाना होने के लिये रेल्वे स्टेशन पर पहुंचे। वहां से हम एक ट्रेन में बैठे तो वहां इस्कान का ही एक गेहुंआ वस्त्र पहने व्यक्ति अपने हाथ में अपने संस्थान द्वारा प्रकाशित श्रीगीता और श्रीमद्भागवत सभी यात्रियों को दिखाकर उनको खरीदने के लिए प्रेरित करता हुआ हमारे पास आया। मेरे इंकार करने पर वह चला गया। मेरी पत्नी ने फिर हैरान होकर पूछा-‘यह क्या तरीका है?’
मैंने कहा-‘लगता है कि प्राईवेट कंपनियों की तरह इन पर भी टारगेट का बोझ है। शायद इन लोगों का अपने टारगेट पूरा करने पर ही आश्रमों मे बने रहने की छूट दी जाती होगी।

मुझे याद आ जब मैं छोटा था तब अपने माता पिता के साथ अंग्रेजों कें मंदिर में गया था उसके बाद उसमें बहुत विकास हुआ है। एक समय मैं सोचता था कि जो अंग्रेज भगवान श्रीकृष्ण के भक्त हैं वह शायद श्रीगीता को समझ पायें क्योंकि भारत में तो ऐसे लोग कम ही दिखते हैं। यहां तो ज्ञान का व्यापार होता। लगता है कि जाने अनजाने इस्कान के लोग भारतीय साधु संतों से अपने आपको बड़ा भक्त साबित करने के लिये ऐसा प्रयास कर रहे हैं जिनका कोई तार्किक आधार नहीं है। जहां तक किताबों का प्रश्न है जो जिज्ञासु और ज्ञानी भक्त हैं वह तो स्वयं ही खरीद लेते हैं पर अर्थाथी या आर्ती हैं उनकी इन किताबों में कोई दिलचस्पी नहीं होती। इस रेल्वे की बोगियों में इस तरह पवित्र ग्रंथों का ज्ञान बेचने वाले भक्त किस श्रेणी के हैं यह मेरे समझ से परे है? वैसे रेल की बोगी में ज्ञान और भक्ति की किताबें बेच सकते हैं पर ज्ञान और भक्ति भाव किसी में स्थापित करना मुश्किल है।

7 जून 2008

आज के गुरु-शिष्य प्राचीन काल जैसे नहीं-आलेख



भगवान श्रीराम ने गुरु वसिष्ठ से शिक्षा प्राप्त की और एक बार वहाँ से निकले तो फिर चल पड़े अपने जीवन पथ पर। फिर विश्वामित्र का सानिध्य प्राप्त किया और उनसे अनेक प्रकार का ज्ञान प्राप्त किया। फिर उन्होने अपना जीवन समाज के हित में लगा दिया न कि केवल गुरु के आश्रमों के चक्कर काटकर उसे व्यर्थ किया। भगवान श्री कृष्ण ने भी महर्षि संदीपनि से शिक्षा पाई और फिर धर्म की स्थापना के लिए उतरे तो वह कर दिखाया। न गुरु ने उन्हें अपने पास बाँध कर रखा न ही उन्होने हर ख़ास अवसर पर जाकर उनंके आश्रम पर कोई पिकनिक नहीं मनाई। अर्जुन ने अपने गुरु से शिक्षा पाई और अवसर आने पर अपने ही गुरु को परास्त भी किया। आशय यह है कि इस देश में गुरु-शिष्य की परंपरा ऐसी है जिसमें गुरु अपने शिष्य को अपना ज्ञान देकर विदा करता है और जब तक शिष्य उसके सानिध्य में है उसकी सेवा करता है। उसके बाद चल पड्ता है अपने जीवन पथ पर और अपने गुरु का नाम रोशन करता है।

भारत की इसी प्राचीनतम गुरु-शिष्य परंपरा का बखान करने वाले गुरु आज अपने शिष्यों को उस समय गुरु दीक्षा देते हैं जब उसकी शिक्षा प्राप्त करने की आयु निकल चुकी होती है और फिर उसे हर ख़ास मौके पर अपने दर्शन करने के लिए प्रेरित करते हैं। कई तथाकथित गुरु पूरे साल भर तमाम तरह के पर्वों के साथ अपने जन्मदिन भी मनाते हैं और उस पर अपने इर्द-गिर्द शिष्यों की भीड़ जमा कर अपनी आध्यात्मिक शक्ति का प्रदर्शन करते हैं. यहाँ इस बात का उल्लेख करना गलत नहीं होगा की भारतीय जीवन दर्शन में जन्मदिन मनाने की कोई ऐसी परंपरा नहीं है जिसका पालन यह लोग कर रहे हैं.

भारत में गुरु शिष्य की परंपरा एक बहुत रोमांचित करने वाली बात है, पूरे विश्व में इसकी गाथा गाई जाती है पर आजकल इसका दोहन कुछ धर्मचार्य अपने भक्तो का भावनात्मक शोषण कर रहे हैं वह उसका प्रतीक बिल्कुल नहीं है। हर व्यक्ति को जीवन में गुरु की आवश्यकता होती है और खासतौर से उस समय जब जीवन के शुरूआती दौर में एक छात्र होता है। अब गुरुकुल तो हैं नहीं और अँग्रेज़ी पद्धति पर आधारित शिक्षा में गुरु की शिक्षा केवल एक ही विषय तक सीमित रह गयी है-जैसे हिन्दी अँग्रेज़ी, इतिहास, भूगोल, विज्ञानआदि। शिक्षा के समय ही आदमी को चरित्र और जीवन के गूढ रहस्यों का ज्ञान दिया जाना चाहिए। यह देश के लोगों के खून में ही है कि आज के कुछ शिक्षक इसके बावजूद अपने विषयों से हटकर शिष्यों को गाहे-बगाहे अपनी तरफ से कई बार जीवन के संबंध में ज्ञान देते हैं पर उसे औपचारिक मान कर अनेक छात्र अनदेखा करते हैं पर कुछ समझदार छात्र उसे धारण भी करते हैं.

यही कारण है कि आज अपने विषयक ज्ञान में प्रवीण तो बहुत लोग हैं पर आचरण, नैतिकता और आध्यात्म ज्ञान की लोगों में कमी पाई जाती है। इस वजह से लोगों के दिमाग में तनाव होता है और उसको उससे मुक्ति दिलाने के लिए धर्मगुरू आगे आ जाते हैं। आज इस समय देश में धर्म गुरु कितने हैं और उनकी शक्ति किस तरह राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक क्षेत्र में फैली है यह बताने की ज़रूरत नहीं है। तमाम तरह के आयोजनों में आप भीड़ देखिए। कितनी भारी संख्या में लोग जाते हैं। इस पर एक प्रख्यात लेखक जो बहुत समय तक प्रगतिशील विचारधारा से जुडे थे का मैने एक लेख पढ़ा था तो उसमें उन्होने कहा था की ''हम इन धर्म गुरुओं की कितनी भी आलोचना करें पर यह एक वास्तविकता है कि वह कुछ देर के लिए अपने प्रवचनों से तनाव झेल रहे लोगों को मुक्त कर देते हैं।''

मतलब किसी धार्मिक विचारधारा के एकदम विरोधी उन जैसे लेखक को भी इनमें एक गुण नज़र आया। यह आज से पाँच छ:: वर्ष पूर्व मैने आलेख पढ़ा था और मुझे ताज्जुब हुआ-मेरा मानना था कि उन लेखक महोदय ने अगर भारतीय आध्यात्म का अध्ययन किया होता तो उनको पता लगता कि भारतीय आध्यात्म में वह अद्वितीय शक्ति है जिसके थोड़े से स्पर्श में ही आदमी का मन प्रूफुल्लित हो जाता है। मगर वह कुछ देर के लिए ही फिर निरंतर अभ्यास नो होने से फिर तनाव में आ जाते हैं।

एक बात बिल्कुल दावे के साथ मैं कहता हूँ कि अगर किसी व्यक्ति में बचपन से ही आध्यात्म के बीज नहीं बोए गये तो उमरभर उसमें आ नहीं सकते और जिसमें आ गये उसका कोई धर्म के नाम पर शोषण नहीं कर सकता। मैं स्वयं ही इस बात का उदाहरण देता हूँ। तमाम तरह के आध्यात्म ग्रंथ मैने बचपन में ही पढ़े और आज भी बड़ी रूचि के साथ पढ्ता हूँ। जब मेरी उम्र आठ साल थी तबा पडोस में रहने वाले एक पन्डित जी की बहू से मेरी माताजी ने पढ़ने के लिए तुलसीदास जी की श्री राम चरितमानस ली थी। मैं भी उसे पढ़ने लगा। मैने उसे धार्मिक भावना से नहीं कहानी की दृष्टि से पढ़ा। उसे कई बार पढ़ा। एक दिन पन्डित जी ने अपनी बहू से वह माँगी तो उसने उनको बताया की ''वह पडोस का लड्का है न वह उसे पढता है।''
उन्होने मुझे बुलाया और कहा'जब पढ़ लो तो वापस कर देना, पर इसको आदर से रखना। तुम इससे बहुत कुछ सीखोगे।''

फिर कभी उन्होने वह मुझसे वापस नहीं माँगी और जब हमने वह मकान खाली किया तब मैं उनको वापस कर आया, पर तब तक मेरे अंदर वह बीज अनुकुरित हो चुका था जिसकी कल्पना भी मैंने नहीं की थी। फिर तो मैने वाल्मीकि रामायण को पढ़ना शुरू किया और अपने जेब खर्च से मैं वह सब धार्मिक किताबें ले आया जो भारतीय अध्यात्म का आधार स्तंभ हैं। आज जब मैं किसी आध्यात्म विषय पर लिखता या बोलता हूँ तो अधिकतर लोग विद्वान होने का अहसास पाल लेते हैं। अब यह मैं नहीं जानता की ऐसा है कि नहीं पर मुझे अपने तर्क भी गढने की आदत भी है और में भी कभी-कभी ऐसे सत्संगों में जाता हूँ पर कुछ नया सुनने से अधिक कोई विचार नहीं आता. कभी-कभी तो ऐसा लगता है कि इतना ज्ञान तो मैं किताबों में पड़ चुका हूँ पर फिर भी वहाँ जाना मुझे अच्छा लगता है। इसलिए जब आज कल के तथाकथित बाबा लोग भारत के प्राचीनतम परंपरा के महिमा की बात करते हैं तो ऐसा लगता है की कोई ग्राहकों का समूह उनके सामने खड़ा है जिसे वह भारतीय आध्यात्म- जिसका कोई पेटेंट नहीं है- उसे बेच रहे हैं। वह हमेशा ही शिष्य को सिखाते रहते हैं और वह सीखता नहीं है और हर ख़ास मौके पर उनके दर्शन करने चला जाता है और वहाँ हर कोई अपनी सामर्थ्य के अनुसार भेंट अपने धर्म का पालन करता है जिसका भारत की प्राचीन गुरु-परंपरा से कोई लेना-देना हो मुझे नहीं लगता। एक बात अपने निष्कर्ष के तौर पर कहना चाहता हूँ कि आज के तथाकथित गुरुओं को एकलव्य जैसा शिष्य चाहिऐ जो उनको आज के युग में अपना अंगूठा काटकर न भेंट करे-क्योंकि उससे उनकी आश्रम फाईव स्टार आश्रमों थोडे ही बन पायेगा- बल्कि दूसरों को अंगूठा दिखाकर जुटाए पैसे से उनको भेंट दे पर अर्जुन जैसा शिष्य नहीं चाहिए जो दुष्कर्म करने वालों का समर्थन करने पर उनका प्रतिवाद करे। इन संतो और भक्तों को पुरानी गुरु-शिष्य परंपरा का प्रतीक नहीं है भले ही कितना भी बखान कर लें. (क्रमश:)

1 जून 2008

मनु स्मृति:चारों आश्रमों में गृहस्थाश्रम श्रेष्ठ

1. वेद स्मृति के अनुसार चारों आश्रमों में गृहस्थाश्रम श्रेष्ठ है। इसका कारण यह है कि गृहस्थाश्रम में रहने वाला ही आदमी इन तीन आश्रमों में रहने वालों का पालन करता है।
2.वेद मंत्रों का जाप सभी को अभीष्ट फल प्रदान करता है, चाहे ज्ञानी करें या अज्ञानी, स्वर्ग के सुखों की इच्छा करने वाला करे अथवा मोक्ष की इच्छा करने वाला। संकलन कर्ता का अभिमत है यहाँ स्वर्ग के सुखों से आशय यह नहीं है जो मरने के बाद प्राप्त होते है वरन इस इहलोक में भी हम वह तमाम आनंद इन मंत्रों के हृदय से उच्चारण कर प्राप्त कर सकते हैं जो इस देह के लिए अभीष्ट होते हैं।
3. धर्म के दस लक्षण हैं १.धैर्य रखना २.क्षमा करना ३.मन पर नियंत्रण करना ४,चोरी नहीं करना ५.मन,वचन और कर्म करना ६.ज्ञानेद्रियाँ एवं कामेद्रियाँ अर्थात सभी इन्द्रियों पर नियंत्रण करना ७.शास्त्र का ज्ञान प्राप्त करना ८.ब्रह्म ज्ञान प्राप्त करना ९.सच बोलना १०.क्रोध नहीं करना।
4. आत्म साक्षात्कार कर लेने वाला योगी कर्मों के बंधनों में नहीं पड़ता। जो ब्रह्म के दर्शन नहीं कर पाता वही कर्तापन के अहंकार से अच्छे-बुरे कर्मों के परिणाम स्वरूप आवागमन के चक्र में पड़ता है।

रहीम के दोहे:कपट वाले स्थान से दूर रहें

रहिमन वहां न आइए, जहां कपट को हेत
हम तन ढारत ढेकुली, सींचत अपनो खेत

कविवर रहीम कहते हैं कि वहां कतई न जाईये जहां कपट होने की संभावना है। रात भर ढेंकली कोई किसान चलाता रहे पर कोई कपटी उसके खेत का पानी अपनी खेत की तरफ कर ले ऐसा भी होता है।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-छलकपट तो पहले भी था पर अब तो आधुनिक तरीके आ गये हैं और इस तरह छलकपट होता है कि कई बार पता भी नहीं चलता कि हमने क्या और क्यों गंवाया? पहले तो आमने-सामने ही कपट होता था पर अब तो मोबाइल और इंटरनेट के आने से तो वह व्यक्ति हमारी आंखों के सामने भी नहीं होता जो हमें ठगता है। खासतौर से उन युवक और युवतियों को सजग रहना चाहिए जो अपने लिये जीवन साथी ढूंढते है। यहंा तो इतना झूठ बोला जा सकता है कि जिसे पकड़ना संभव ही नहीं है। कोई छद्म नाम रखकर, किसी बड़े परिवार से संबंध बताकर या अपने को बहुत व्यक्ति के रूप में प्रस्तुत कर धोखा देना बहुत आसान है। एक की जगह दूसरे की फोटो भी रखी जा सकती है। ऐसे सैंकड़ों मामले हैं। अभी कई लोगों का यह पता भी नहीं होगा कि हिंदी में ब्लाग लिखे जाते हैं और वह इन कपटों की जानकारी बहुत अच्छी तरह रखते हैं। जो लोग इंटरनेट पर सक्रिय हैं उनको नित-प्रतिदिन हिंदी के ब्लाग पढ़ना चाहिए क्योंकि जिस तरह के धोखेबाजी की जानकारी यहां मिल जाती है अखबारों में भी नहीं मिल पाती।

इसीलिये कपट से बचने के लिए जितना हो सके सावधानीपूर्वक अपने संबंध बनाने चाहिए। नई तकनीकी ने आजकल धोखे के नये तरीकों को जन्म दिया है जिससे यह आसान हो गया है कि न नाम का पता चले न शहर की जानकारी हो और किसी से भी धोखे का शिकार जाये।

18 अप्रैल 2008

यह तो माया के विवाद हैं-चितन

सांई बाबा के नाम पर रायल्टी वसूलने की बात सुनकर मैं बिल्कुल नहीं चौंका क्योंकि अभी और भी चौंकाने वाली खबरें आऐंगी क्योंकि जैसे-जैसे लोगों की बुद्धि पर माया का आक्रमण होगा सत्य के निकट भारतीय अध्यात्म उनको याद आयेगा उसके लिए अपना धीरज बनाये रखना जरूरी है। मैं प्रतिदिन अंर्तजाल पर चाणक्य, विदुर, कबीर, रहीम और मनु के संदेश रखते समय एकदम निर्लिप्त भाव में रहता हूं ताकि जो लिख रहा हूं उसे समझ भी सकूं और धारण भी कर सकूं। सच माना जाये तो योगसाधना के बाद मेरा वह सर्वश्रेष्ठ समय होता है उसके बाद माया की रहा चला जाता हूं पर फिर भी वह समय मेरे साथ होता है और मेरा आगे का रास्ता प्रशस्त करता है।

मुझे अपने अध्यात्म में बचपन से ही लगाव रहा है पर कर्मकांडों और ढोंग पर एक फीसदी भी वास्ता रखने की इच्छा नहीं रखता। सांई बाबा के मंदिर पर हर गुरूवार को जाता हूं और मेरा तो एक ही काम है। चाहे जहां भी जाऊं ध्यान लगाकर बैठ जाता हूं। सांईबाबा के मंदिर में हजारों भक्त आते और जाते हैं और सब अपने विश्वास के साथ माथा टेक कर चले जाते हैं। सांई बाबा के बचपन में कई फोटो देखे थे तो उनके गुफा या आश्रम के बाहर एक पत्थर पर बैठे हुए दिखाए जाते थे। मतलब उनके आसपास कोई अन्य आकर्षक भवन या इमारत नहीं होती थी। आज सांईबाबा के मंदिर देखकर जब उन फोटो को याद करता हूं तो भ्रमित हो जाता हूं। फिर सोचता हूं कि मुझे इससे क्या लेना देना। सांई बाबा की भक्ति और मंदिर अलग-अलग विषय हैं और मंदिरों में जो नाटक देखता हूं तो हंसता हूं और सोचता हूं कि क्या कभी उन संतजी ने सोचा होगा कि उनके नाम पर लोग हास्य नाटक भी करेंगे। अपनी कारें और मोटर सायकलें वहां पुजवाने ले आते हैं। वहां के सेवक भी उस लोह लंगर की चीज की पूजा कर उसको सांईबाबा का आशीर्वाद दिलवाते हैं। इसका कारण यह भी है कि सांईबाबा को चमत्कारी संत माना जाता है और लोगों की इसी कारण उनमें आस्था भी है।

अधिक तो मैं नहीं जानता पर मुझे याद है कि मुझे शराब पीने की लत थी और एक दिन पत्नी की जिद पर उनके मंदिर गया तो उसके बाद शुरू हुआ विपत्ति को दौर। पत्नी की मां का स्वास्थ्य खराब था वह कोटा चलीं गयीं और इधर मैं उच्च रक्तचाप का शिकार हुआ। अपनी जिंदगी के उस बुरे दौर में मैं हनुमान जी के मंदिर भी एक साथी को ढूंढकर ले गया। आखिर मैं स्वयं भी कोटा गया क्योंकि यहां अकेले रहना कठिन लग रहा था। वहां सासुजी का देहांत हो गया।

उसके बाद लौटे तो फिर हर गुरूवार को मंदिर जाने लगे। इधर मेरी मानसिक स्थिति भी खराब होती जा रही थी। ऐसे में पांच वर्ष पूर्व (तब तक बाबा रामदेव की प्रसिद्धि इतनी नहीं थी)एक दिन भारतीय योग संस्थान का शिविर कालोनी में लगा। संयोगवश उसकी शूरूआत मैंने गुरूवार को ही की थी।

यह मेरे जीवन की दूसरी पारी है। जिन दिनों शराब पीता था तब भी मैं भगवान श्री विष्णु, श्री राम, श्री कृष्ण, श्री शिवजी, श्रीहनुमान और श्रीसांईबाबा के के मंदिर जाता रहा और बाल्मीकि रामायण का भी पाठ करता । योगसाधना शुरू करने के बाद श्रीगीता का दोबारा अध्ययन शुरू किया और देखते देखते अंतर्जाल पर लिखने भी आ गया। मतलब यह कि ओंकार के साथ निरंकार की ही आराधना करता हूं। अपना यह जिक्र मैंने इसलिये किया कि इसमें एक संक्षिप्त कहानी भी है जिसे लोग पढ़ लें तो क्या बुराई है।

असल बात तो मैं यह कहना चाहता हूं कि भारतीय अध्यात्म का मूल रहस्य श्रीगीता में है और इस समय पूरे विश्व में अध्यात्म के प्रति लोगों का रुझान बढ़ रहा है। ‘अध्यात्म’ यानि जो वह जीवात्मा जो हमारा संचालन करता है। उससे जुडे विषय को ही अध्यात्मिक कहा जाता है। कई लोग सहमत हों या नहीं पर यह एक कटु सत्य है कि हमारे प्राचीन मनीषियों ने आध्यात्म का रहस्य पूरी तरह जानकर लोगों के सामने प्रस्तुत किया और कहीं अन्य इसकी मिसाल नहीं है। भारत की ‘अध्यात्मिकता’ सत्य के निकट नहीं बल्कि स्वयं सत्य है। यह अलग बात है कि विदेशियों की क्या कहें देश के ही कई कथित साधु संतों ने इसकी व्याख्या अपने को पुजवाने के लिये की । दुनियों में श्रीगीता अकेली ऐसी पुस्तक है जिसमें ज्ञान सहित विज्ञान है और उसमें जो सत्य है उससे अलग कुछ नहीं है। लोग उल्टे हो जायें या सीधे चाहे खालीपीली नारे लगाते रहें, तलवारे चलाये या त्रिशूल, पत्थर उड़ाये या फूल पर सत्य के निकट नही जा सकते। अगर सत्य के निकट कोई ले जा सकता है तो बस श्रीगीता और भारतीय आध्यात्मिक ग्रंथ। अपने देश के लोग कहीं पत्थरमार होली खेलते हैं तो कहीं फूल चढ़ाते हैं तो कही पशु की बलि देने जाते है कही कही तो शराब चढ़ाने की भी परंपरा है। श्रीगीता को स्वय पढ़ने और अपने बच्चों को पढ़ाने से डरते है कहीं मन में सन्यास का ख्याल न आ जाये जबकि भगवान श्रीकृष्ण ने तो सांख्ययोग (सन्यास) को लगभग खारिज ही कर दिया है। हां उसे पढ़ने से निर्लिप्त भाव आता है और ढेर सारी माया देखकर भी आप प्रसन्न नहीं होते और यही सोचकर आदमी घबड़ाता है कि इतनी सारी माया का आनंद नही लिया तो क्या जीवन जिया। अभी मैंने श्रीगीता पर लिखना शुरू नहीं किया है और जब उसके श्लोकों की वर्तमान संदर्भ में व्याख्या करूंगा तो वह अत्यंत दिल्चस्प होगी। यकीन करिये वह ऐसी नहीं होगी जैसी आपने अभी तक सुनी। आजकल मैं हर बात हंसता हूं क्योंकि लोगों को ढोंग और पाखंड मुझे साफ दिखाई देते है। कहता इसलिये नहीं कि भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है कि भक्त के अलावा इस श्रीगीता का ज्ञान किसी को न दें।

मंदिरों मे भगवान का नाम लेने जरूर लोग जाते हैं पर मन में तो माया का ही रूप धारण किये जाते हैं। मन में भगवान है तो माया भी वहीं है उसी तरह मंदिर में भी है वहां भी आपके मन के अनुसार ही सब है। अपनी इच्छा की पूर्ति के लिये लोग वहां जाते हैं तो कुछ लोग दर्शन करने चले जाते हैं तो कुछ लोग ऐसे ही चले जाते है। खेलती माया है और आदमी को गलतफहमी यह कि मै खेल रहा हूं । काम कर रही इंद्रियां पर मनुष्य अपने आप को कर्ता समझता है।

असल बात बहुत छोटी है। सांईबाबा संत थे और एक तरह से फक्कड़ थे। उनका रहनसहन और जीवन स्तर एकदम सामान्य था पर उनका नाम लेलेकर लोगों ने अपने घर भर लिये और अब अगर यह रायल्टी का मामला है तो भी है तो माया का ही मामला। कई जगह उनके मंदिर है और मैं अगर किसी दूसरे शहर में गुरूवार को होता हूं तो भी उनके मंदिर का पता कर वहां जरूर जाता हूं। मंदिरों में तो बचपन से जाने की आदत है पर मैं केवल इसलिये भगवान की भक्ति करता हूं कि मेरी बुद्धि स्थिर रहे और किसी पाप से बचूं। फिर तो सारे काम अपने आप होते है। कई मंदिरों पर संपत्ति के विवाद होते हैं और तो और वहां के सेवकों के कत्ल तक हो जाते हैं। यह सब माया का खेल है। अब अगर यह मामला बढ़ता है तो बहुत सारे विवाद होंगे। कुछ इधर बोलेंगे तो कुछ उधर। हम दृष्टा बनकर देखेंगे। वैसे भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान सोने की खदान है और कुछ लोग इसको बदनाम करने के लिये भी ऐसे मामले उठा सकते हैं जिससे यह धर्म और बदनाम हो कि देखो इस धर्म को मानने वाले कैसे हैं? जानते हैं क्यों? अध्यात्म और धर्म अलग-अलग विषय है और जिस तरह विश्व में लोग माया से त्रस्त हो रहे हैं वह इसी ज्ञान की तरफ या कहंे कि श्रीगीता के ज्ञान की तरफ बढ़ेंगे। उनको रोकना मुश्किल होगा। इसीलिये उनके मन में भारतीय लोगों की छबि खराब की जाये तो लोग समझें कि देखो अगर इनका ज्ञान इस सत्य के निकट है तो फिर यह ऐसे क्यों हैं?
मैं महापुरुषों के संदेश भी अपने विवेक से पढ़कर लिखता हूंे ताकि कल को कोई यह न कहे कि हमारे विचार चुरा रहा है। यकीन करिय एक दिन ऐसा भी आने वाला है जब लोग कहेंगे कि हमारा इन महापुरुषों के संदशों पर भी अधिकार है क्योंकि हमने ही उनको छापा है। यह गनीमत ही रही कि गीताप्रेस वालों ने भारत के समस्त ग्रंथों को हिंदी में छाप दिया नहीं तो शायद इनके अनुवाद पर भी झगड़े चलते और हर कोई अपनी रायल्टी का दावा करता। जिस तरह यह मायावी विवाद खड़े किये जा रहे हैं उसके वह आशय मै नहीं लेता जो लोग समझते हैं। मेरा मानना है कि ऐसे विवाद केवल भारत के आध्यात्मिक ज्ञान को बदनाम करने के लिये किये जाते है। मुख्य बात यह है कि इसके लिये प्रेरित कौन करता है? यह देखना चाहिए। पत्रकारिता के मेरे गुरू जिनको मैं अपना जीवन का गुरू मानता हूं ने मुझसे कहा था कि तस्वीर तो लोग दिखाते और देखते हैं पर तुम पीछे देखने की करना जो लोग छिपाते हैं। देखना है कि यह विवाद आखिर किस रूप में आगे बढ़ता है क्योंकि श्री सत्य सांई बाबा विश्व में असंख्य लोगों के विश्व के केंद्र में है और जिस तरह यह मामला चल रहा है लोगों को उनसे विरक्त करने के प्रयासों के अलावा कुछ नहीं कहा जा सकता।

14 अप्रैल 2008

मनु स्मृति:सुपात्र को दिया दान ही फलता है

न वार्यपि प्रयचछत्तु बैडालव्रतिके द्विजे
न बकव्रतिके विप्रे नावेदविदि धर्मवित्

धार्मिक वृत्ति के लोगों को चाहिए कि वह दूसरों को मूर्ख बनाकर लूटने वाले व्यक्ति या साघू का भेष धरकर ढोंग और पाखंड रचाने वाले तथा ब्रहम् ज्ञान से रहित व्यक्ति को पानी तक न पिलायें।

यथा प्लवेनौपलेन निमज्जत्युदके तरन्
तथा निमज्जतोऽधस्तादज्ञो दातृप्रतीच्छकौ


जिस तरह पानी में पत्थर की नाव पर सवार व्यक्ति नाव के साथ ही पानी में डूब जाता है वैसे ही दान लेने वाली कुपात्र और मूर्ख तथा उसे दान देने वाला दोनों ही नरक में जाते हैं।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-भारतीय अध्यात्म में दान की महिमा बहुत है पर इस आड़ में ढोंगी साधु और संतों ने आम लोगों को मूर्ख बनाकर लूटने का जो सिलसिला शुरू किया तो वह सदियों के बाद आज भी जारी है। हालांकि आज लोग पहले के मुकाबले अधिक शिक्षित हैं पर इसके बावजूद धर्म के नाम ढोंगी लोगों का दान देकर उनके भरण-भोषण कर अनजाने में पाप के भागी बन रहे हैं। कहने को तो कई लोग कहते हैं कि हमें क्या मतलब? हम तो शुद्ध मन से दान कर रहे है और हमारी नीयत तो साफ है।’

हमारे अध्यात्म के मनीषी मनु कहते हैं कि सुपात्र को दिया गया दान फलता है और कुपात्र को दिया गया दान पाप का भागी बना देता है। अगर हमने शुद्ध हृदय से दान दिया है और लेने वाला मूर्ख और दुष्ट है तो उसके द्वारा किया गया दुरुपयोग हमें भी पाप का भागी बना देता है अतः ऐसे दान से तो न करना अच्छा। अतः दान देते समय लेने वाले की पात्रता का भी विचार करना चाहिए।
मनु स्मृति:ढोंगी आदमी को पानी भी न पिलायें

13 अप्रैल 2008

सौम्यता, सहजता, सरलता और समभाव का प्रतीक हैं भगवान श्रीराम

सौम्यता, सहजता, सरलता और समभाव का प्रतीक हैं भगवान श्रीराम

आज पूरे देश में रामनवमी का त्यौहार मनाया जा रहा है। राम हमारे देश के लोगों के हृदय के नायक है। यह स्वाभाविक ही है कि लोग राम का नाम सुनते ही प्रफुल्लित हो उठते हैं। राम की महिमा यह कि जिस रूप में उन्हें माना जाये उसी रूप में आपके हृदय में स्थित हो जाते है। राम उनके भी जो उनको माने और राम उनके भी जो उन्हें भजें और वह उनके भी हैं जो उन्हें अपने हृदय में धारण करें।
मैं बचपन से भगवान विष्णू की उपासना करता आया हू। स्वाभाविक रूप से भगवान श्री राम के प्रति भक्तिभाव है। इसका एक कारण यह भी रहा है कि मैं मूर्ति तो भगवान विष्णू की रखता हूं पाठ बाल्मीकी रामायण का करता हूं। कुल मिलाकर भगवान विष्णू ही मेरे हृदय में राम की तरह स्थित हैं। मतलब यह मेरे लिये भगवान राम ही भगवान विष्णू है। यह समभाव की प्रवृति मुझे भगवान राम के चरित्र से मिलती है।
भगवान राम के प्रति केवल भारत में ही बल्कि विश्व में भी उनकी अनुयायियों की भारी संख्या है। मतलब यह कि भगवान श्रीराम का चरित्र केवल देश की सीमाओं में नहीे सुना और सुनाया जाता है वरन् देश के बाहर भी उनके प्रति लोगों के मन में भारी श्रद्धा है। जब मै आज भारत के अंदर चल रहे हालाते पर नजर डालता हूं तो लगता है लोग केवल नाम के लिये ही राम को जप रहे है। भगवान राम के चरित्र की व्याख्यायें बहुत लोग कर रहे है पर केवल लोगों में फौरी तौर पर भक्ति भाव जगाकर अपनी हित साधने तक ही उनकी कोशिश रहती है। मैं अक्सर जब परेशानी या तनाव में होता हूं तो उनका स्मरण करता हूं।
यकीन मानिए भगवान राम के मंदिर में जाकर कोई वस्तू या कार्यसिद्ध की मांग नहीं करता वरन् वह मेरे मन और बुद्धि में बने रहें इसीलिये उनके समक्ष नतमस्तक होता हूं। जब संकट में उन्हें याद करता हूं तो केवल इसीलिये कि मेरा घैर्य, आस्था और विश्वास बना रहे यही इच्छा मेरी होती है। थोड़ी देर बाद मुझे महसूस होता है कि वह शक्ति प्रदान कर रहे है।
भगवान श्रीराम का चरित्र कभी किसी अविश्वास और अकर्मणता का प्रेरक नहीं हो सकता। जो केवल इस उद्देश्य से भगवान राम को पूजते हैं कि उन पर कोई संकट न आये और उनके सारे कार्य सिद्ध हो जायें-वह राम का चरित्र न तो समझते है न उन्हें कभी अपने विश्वास को प्रमाणित करने का अवसर मिल पाता है।
भगवान श्री राम की कथा पढ़ना और सुनना अच्छी बात है पर उन्हें अपने हृदय में धारण कर ही जीवन में आनंद ले पाते है। ऐसे विरले ही होते है। भगवान राम के चरित्र में जो सौम्यता, सहजता, सहृदयता, समभाव और सदाशयता है वह विरले ही चरित्रों में मिल पाती है। यही कारण है कि भारत की सीमाओं के बाहर भी उनका चरित्र पढ़ा और सुना जाता है। अगर मनुष्य के रूप में की गयी उनकी लीलाओं का चर्चा की जाये तो वह कभी विचलित नहीं हुए। कैकयी द्वारा बनवास, सीताजी के हरण और रावण के साथ युद्ध में श्रीलक्ष्मण जी के बेहोश होने के समय उन्होंने जिस दृढ़ता का परिचय दिया वह विरलों में ही देखने को मिलती है। रावण के साथ युद्ध में एक ऐसा समय भी आया जब सभी राक्षसों को ऐसा लगा रहा था कि भगवान राम ही उनके साथ युद्ध कर रहे है। वह घबड़ा कर इधर उधर भाग रहे थे जहां जाते उन्हें राम देखते। मतलब यह कि राम केवल उनके ही नहीं है जो उनके पूजते बल्कि उनके भी है जो उन्हें नहीं पूजते-नहीं तो आखिर अपने शत्रूओं को दर्शन क्यों देते? यह उनके समभाव का प्रतीक है। क्या हम उन्हें मानने वाले ऐसा समभाव दिखा पाते है। कतई नहीं। यकीनन हमेें अब आत्ममंथन करना चाहिए कि क्या केवल भगवान श्रीराम की मूर्ति लगाकर उनके प्रति दिखावे की आस्था प्रकट करना ही काफी है। हमें उनके पूर्ण स्वरूप का स्मरण कर उसे अपने मन और बुद्धि में स्थापित करना चाहिए। याद रहे मनुष्य की पहचान उसकी बुद्धि से है। अगर आप अपनी बुद्धि में अपने इष्ट को स्थापित करेंगे तो धीरे धीरे उन जैसे होते जायेंगे। एक विद्वान का मानना है कि मूर्ति पूजा का प्रत्यक्ष रूप से लाभ कुछ नहीं होता पर उसका यह फायदा जरूर होता है आदमी जब भगवान की पूजा करता है तो उसके हृदय में उनके गुणों का एक स्वरूप स्थापित होता है जो आगे चलकर उसका स्थायी हिस्सा बन जाता है। शर्त यही है वह आदमी उस समय किसी अन्य भाव का स्थान न दे।
इस दुनिया में हमेशा मूर्तिपूजा का विरोध करने वालों की संख्या ज्यादा रही है। दरअसल वह इससे होने वाले मनोवैज्ञानिक फायदों को नहीं जानते। प्रत्यक्ष रूप से तो इसका फायदा नही होता दिखता पर अप्रत्यक्ष रूप से जो व्यक्ति में शांति और दृढ़मा आती है उसको किसी पैमाने से मापना कठिन है। मुख्य बात है अपने अंदर भाव उत्पन्न करना। आखिर कोई भी व्यक्ति काम करता है तो उसके पीछे उसके विचार, संकल्प और निश्चयों के साथ ही चलता है। जब उनमें दोष है तो किसी सार्थक कार्य के संपन्न होने की आशा करना ही व्यर्थ है। अब लोग किसी और को तो नहीं अपने आपको धोखा देते है। मंदिरों में जाकर वह भगवान के सामने नतमस्तक तो होते है पर स्वरूप के अंतर्मन में ध्यान करने की कला में कितने दक्ष है यह तो वही जाने। अलबत्ता सबसे बड़ी बात राम की भक्ति के साथ उन्हें मन और बुद्धि में धारण भी जरूरी है। मूर्तियां तो उनका वह स्वरूप है जो आखों से ग्रहण करने के लिए स्थापित किया जाता है ताकि उसे हम अपने अंतर्मन में ले जा सके।
भगवान राम का चरित्र कभी न भुलाये जाने वाला चरित्र है। उनके प्रति अपार श्रद्धा के साथ उनके संदेशों पर चलने की जरूरत भी है। उन्होंने नैतिक आचरण, समभाव, सहजता और सरल दृष्टिकोण से जीवन जीने का जो तरीका प्रचारित किया उस पर चलने की जरूरत है। हमें समूह नहीं एक व्यक्ति के रूप में यह विचार करना चाहिए कि क्या हम उनके द्वारा निर्मित पथ पर चले रहे है या नहीं। दूसरा व्यक्ति क्या कर रहा है यह हमें नहीं सोचना चाहिए। भगवान श्रीराम को अपने हृदय में धारण करन चाहिए जिससे केवल न हम स्वयं बल्कि समाज को भी संकट से उबारने की शक्ति अर्जित कर सकें।

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