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8 फ़रवरी 2011

बाज़ार और प्रचारकों को वनडे मातरम् तो कहना ही था-हिन्दी व्यंग्य (oneday matram and bazar'd prachar)

बड़ा अजीब लगता है जब एक टीवी चैनल में वनडे मातरम् शब्द देखकर हैरानी होती है। देश के स्वाधीनता संग्राम सेनानियों ने अपने अभियान में जमकर गया होगा ‘वंदे मातरम्’! भारत का राष्ट्रगान भी वंदेमातरम् शब्द से शोभायमान है। सच तो यह है कि वंदेमातरम् शब्द का उच्चारण ही मन ही मन में राष्ट्र के प्रति जान न्यौछावर करने वाले शहीदों की याद दिलाता है। देश के शहीदों को हार्दिक श्रद्धांजलि देते हुंए मन भर जाता है और मन गुनगुनाता है ‘वंदे मातरम्’!
आम मनुष्य और उसकी भावनाओं के दोहन करने के लिये उत्पाद करना बाज़ार और उनको खरीदने के लिये प्रेरित करना उसके प्रचार का काम है। अभी तक हम सुनते थे कि अमुक समाज के इष्ट का नाम बाज़ार ने अपने उत्पाद के लिये प्रयोग मेें किया तो विरोध हो गया या किसी पत्रिका ने किसी के धार्मिक संकेतक का व्यवसायिक उपयोग किया तो उस प्रतिबंध लग गया। अनेक प्रकार के जूते, जींस, तथा पत्रिकायें इस तरह के विरोध का सामना कर चुके हैं। धर्म, जाति, तथा भाषा के नाम पर समूह बनते हैं इसके लिये उसके प्रतीकों या इष्ट के नाम या नारे का उपयेाग बाज़ार के लिये अपने उत्पाद तथा प्रचार के लिये उपभोक्ता को क्रय करने के लिये प्रयुक्त करना कठिन होता है। मगर हमारे राष्ट्र का कोई अलग से समूह नहीं है बल्कि उपशीर्षकों में बंटे समाज उसकी पहचान हैं जिसे कुछ लोग गर्व से विभिन्न फूलों का गुलदस्ता कहते हुए गर्व से सीना फुला देते हैं।
यही कारण है कि वंदे मातरम अब बाज़ार के प्रचारकों के लिये वनडे मातरम् हो गया है। अगला विश्व क्रिकेट भारत में होना है। उसके लिये प्रचारकों ने-टीवी, रेडियो, तथा अखबार-ने अपना काम शुरु कर दिया है। कोई टीवी चैनल बल्ले बल्ले कर रहा है तो कोई वनडे मातरम् गा रहा है। इस श्रृंखला में वह लोग बीसीसीआई की टीम के विश्व कप के लिये चुनी गयी टीम के सदस्यों को महानायक बनाने पर तुले हैं। मैच में अधिक से अधिक लोग मैदान पर आयें यही काफी नहीं है बल्कि टीवी के सामने बैठकर आंखें फोड़ते हुए बाज़ार के उत्पादों का विज्ञापन प्रचार देखें इसके लिये जरूरी है कि लगातार उनका ध्यान विश्व कप क्रिकेट प्रतियोगिता की तरफ बनाये रखा जायें, इस उद्देश्य से बाज़ार तथा प्रचार प्रबंधक सक्रिय हैं।
प्रचारकों को पैसा चाहिये तो बाज़ार उत्पादकों को अपने उत्पाद के लिये उपभोक्ता। दोनों मिलकर भारतीय समाज में एक नया समाज बनाना चाहते हैं जिसमें क्रिकेट और फिल्म का शोर हो। लोग एक नंबर में देखें और दो नंबर में सट्टा खेलें। मज़़े की बात यह है कि प्रचार माध्यमों में युवाओं को प्रोत्साहन देने की बात की जाती है ताकि वह भ्रमित रहे होकर उनके बताये मार्ग का अनुकरण करते हुए केवल मनोरंजन में उलझे रहें या महानायक बनने का सपना देखते हुए अपना जीवन नष्ट कर लें।
वनडे मातरम् यानि एक दिवसीय क्रिकेट मैच उनके लिये माता समान तो क्रिकेट खिलाड़ी पिता समान हो गये हैं क्योंकि वह उनके लिये धनार्जन का एक मात्र साधन हैं। इनसे फुरसत हो तो फिल्म अभिनेता तो गॉडफादर यानि धर्मपिता की भूमिका निभाते हैं। इसका उदाहरण एक टीवी चैनल पर देखने को मिला।
एक तेजगेंदबाज को घायल होने के बावजूद टीम में शामिल किया गया पर जब उसके अनफिट होने का चिकित्सीय प्रमाण पत्र मिला तो एक अन्य तेज गेंदबाज-जिसे केरल एक्सप्रेस कहा जाता है-को शामिल किया गया। केरल एक्सप्रेस को जब पहले टीम में शामिल से बाहर रखा गया तो उसके लिये सहानुभूति गीत गाये थे। अब जब उसे शामिल किया गया तो उसकी खबर और फोटो के साथ एक फिल्म अभिनेता के फोटो के साथ ही उसकी एक फिल्म का वाक्य‘जब अब हम किसी को बहुत चाहते हो तो कायनात उसके साथ हमें मिला ही देती है’, चलाया गया। दोनों में कोई तारतम्य नहीं है। ऐसे बहुत सारी फिल्मों में डायलाग मिल जायेंगे। ढेर सारे अभिनेताओं ने बोले होंगे मगर वह अभिनेता तो प्रचार माध्यमों का धर्म पिता है और जैसा कि स्पष्ट है कि विश्व कप तक क्रिकेट खिलाड़ी पिता हो गये हैं। दोनों को मिला कर बन गया बढ़िया कार्यक्रम।
इसलिये जब वनडे मातरम् नारा सुनते हैं तो कहना ही पड़ता है क्रिकेटर पितृम। मजा आता है जब नारों के जवाब में ऐसे नारे अपने दिमाग़ में आते हैं यह अलग बात है कि उनको नारे लगाने के पैसे मिलते हैं पर हमें फोकटिया लिखना होता है और मेहनत भी पड़ती है। न लिखें तो लगता है कि अपना मनोरंजन नहीं किया।
लेखक-दीपक भारतदीप,ग्वालियर 
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4 अप्रैल 2010

बाज़ार और प्रचार का प्रेम-हिन्दी व्यंग्य (love of bazar and prachar-hindi vyangya)

बचपन में एक गाना सुनते थे कि ‘ऐ, मेरे वतन के लोगों, जरा आंख में भर लो पानी, जो शहीद हुए उनकी याद करो कुर्बानीं।’ यह गाना सुनकर वास्तव में पूरी शरीर रोमांचित हो उठता था। आज भी जब यह गाना याद आता है तो उस रोमांच की याद आती है-आशय यह है कि अब पहले रोमांच नहीं होता।
आखिर ऐसा क्या हो गया कि अब लगता है कि उस समय यह जज़्बात पैदा करने वाले गीत, संगीत या फिल्में समाज में कोई जाग्रति या देशभक्ति के लिये नहीं   बनी बल्कि उनका दोहन कर कमाई करना ही उद्देश्य था।
फिर क्रिकेट में देशभक्ति का जज़्बात जागा। जब देश जीतता तो दिल खुश होता और हारता तो मन बैठ जाता था। अब वह भी नहीं रहा। अब स्थिति यह है कि जिसे पूरा देश भारतीय क्रिकेट टीम यानि अपना प्रतिनिधि मानता है उसे अनेक अब एक भारतीय क्रिकेट नियंत्रण बोर्ड नामक एक क्लब की टीम ही मानते हैं जो व्यवसायिक आधार पर अपनी टीम बनाती है और आर्थित तंत्र के शिखर पुरुष उसके प्रायोजक मसीहा हैं। इसका कारण यह है कि अब देशों की सीमायें तोड़कर विदेशों से खिलाड़ी यहां बुलाकर देश के कुछ शहरों और प्रदेशों के नाम से क्लब स्तरीय टीमें बनायी जाती हैं। देश क्रिकेट पर पैसा खर्च कर रहा है, तो इस पर सट्टे खेलने और खिलाने वालों के पकड़े जाने की खबरे आती हैं जिसमें अरबों रुपये का दाव लगने की बात कही जाती है। आखिर यह पैसा भी तो इसी देश का ही है।
यह देखकर लगता है कि हम तो ठगे गये। अपना कीमती वक्त फोकट में इस बाजार और उसकी मुनादी करने वालों-संगठित प्रचार माध्यम-के इशारों पर क्रिकेट पर गंवाते रहे।
अब हो क्या रहा है। विश्व उदारीकरण के चलते बाजार देशभक्ति के भाव को खत्म कर वैश्विक जज़्बात बनाना चाहता है। भारतीय बाजार पर स्पष्टतः बाहरी नियंत्रण है। अगर पश्चिम में उसे पैसा सुरक्षित चाहिये तो मध्य एशिया में उसे भारत में ही अपने को मजबूत बनाने वाल संपर्क भी रखने हैं। अब बात करें पाकिस्तान की। पाकिस्तान एक देश नहीं बल्कि एक उपनिवेश है जिस पर पश्चिमी और मध्य एशियों के समृद्धशाली देशों का संयुक्त नियंत्रण है। स्थिति यह है कि जब देश के हालत बिगड़ते हैं तो उसकी सरकार अपनी सेना के साथ बैठक ही मध्य एशिया के देश में करती है। अगर किसी गोरे देश की टीम पाकिस्तान नहीं जाना चाहती तो वह उसका कोटा मध्य एशिया के देश में खेलकर पूरा करती है। यह क्रिकेट एक और दो नंबर के व्यवसायियों के लिये अरबों रुपये का खेल हो गया है और अरब देश तेल के अलावा इस पर भी अपनी पकड़ रखते हैं। मध्य एशिया इस समय अवैध, अपराधिक तथा दो नंबर के धंधों का केंद्र बिन्दू हैं अलबत्ता कथित रूप से अपने यहां धर्म के नाम पर कठोर कानून लागू करने का दावा करते हैं पर यह केवल दिखावा है। अलबत्ता समय समय पर आम आदमी को इसका निशाना बनाते हैं। अभी दुबई में अवैध कारोबार में लगे 17 भारतीयों को इसलिये फांसी की सजा सुनाई गयी है क्योंकि उन पर एक पाकिस्तानी की हत्या का आरोप है। इसको लेकर भारत में जो प्रतिक्रिया हुई है वह ढोंग के अलावा कुछ नहीं दिखती। दुबई को भारतीय बाजार से ही ताकत मिलती है। उसके भोंपू-संगठित प्रचार माध्यम-उनको बचाने के लिये पहल कर रहे हैं। अगर वाकई भारतीय अमीर और उनके प्रचारक इतने संवदेनशील हैं तो वह दुबई की सरकार पर सीधे दबाव क्यों नहीं डालते? पीड़ितों को कानूनी मदद के नाम वहां की अदालतों में पेश होने से कोई लाभ नहीं होगा। हद से हद आजीवन कारावास हो जायेगा। अगर भारतीय प्रचार तंत्र में ताकत है तो वह क्यों नहीं पूछता कि ‘आखिर तुम्हारे यहां यह अवैध धंधा चल कैसे रहा था, तुम तो बड़े धर्मज्ञ बनते हो।’
प्रसंगवश याद आया कि एक स्वर्गीय प्रगतिशील नाटककार की पत्नी भी वहां नाटक पेश करने गयी थी। उसमें वहां के धर्म की आलोचना शामिल थी। इसके फलस्वरूप उसे पकड़ लिया गया। पता नहीं उसके बाद क्या हुआ? उस समय यहां के लोगों ने कोई दबाव नहंी डाला। उस प्रगतिशील नाटककारा से सैद्धांतिक रूप से सहमति न भी हो पर उसके साथ हुए इस व्यवहार की निंदा की जाना चाहिये थी पर ऐसा नहीं हुआ।
एक बात तय है कि भारतीय धनाढ्य एक हो जायें तो यह मध्य एशिया के देश घुटनों के बल चलकर आयेंगे। कभी सुना है कि किसी अमेरिकी या ब्रिटेनी को को मध्य एशिया में पकड़ा गया है। इसके विपरीत यहां की आर्थिक, सामाजिक तथा प्रचार शक्तियां तो मध्य एशिया देशों से खौफ खाती दिखती हैं। स्थित यह है कि उनको प्रसन्न करने के लिये उनके पाकिस्तान नामक उपनिवेश से भी दोस्ताना दिखाने लगी हैं।
अभी हाल ही में भारत की एक महिला टेनिस खिलाड़ी और पाकिस्तान के बदनामशुदा क्रिकेट खिलाड़ी की शादी को लेकर जिस तरह भारतीय प्रचार माध्यमों ने निष्पक्षता दिखाने की कोशिश की वह इस बात का सबसे बड़ा प्रमाण बनने जा रहा है कि भारतीय बाज़ार और उसके प्रचार माध्यमों के लिये देशभक्ति तथा आतंकवाद एक बेचने वाला मुद्दा है और उनके प्रसारणों को देखकर कभी जज़्बात में नहीं बहना चाहिये। पाकिस्तानी दूल्हे के बारे में किसी भी एक चैनल ने यह नहीं कहा कि वह दुश्मन देश का वासी है।
उस पर प्रेम का बखान! अगर भारतीय दर्शन की बात करें तो उसमें प्रेम तो केवल अनश्वर परमात्मा से ही हो सकता है। उसके बाद भी अगर उर्दू शायरों के शारीरिक इश्क को भी माने तो वह भी पहला ही आखिरी होता है। किसी ने शादी तोड़ी तो किसी ने मंगनी-उसमें प्रेम दिखाते यह प्रचार माध्यम अपनी अज्ञानता ही दिखा रहे हैं। वैसे इस शादी होने की भूमिका में बाजार और प्रचार से जुड़े अप्रत्यक्ष प्रबंधकों की क्या भूमिका है यह तो बाद में पता चलेगा। उनकी संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता क्योंकि क्रिकेट और विज्ञापनों का मामला जुड़ा है। फिर मध्य एशिया में उनके रहने की बात है। इधर एक चित्रकार भी भारत ये पलायन कर मध्य एशिया में चला गया है। कभी कभी तो लगता है कि मध्य एशिया के देश अपने यहां प्रतिभायें पैदा नहीं कर पाने की खिसियाहट भारत से लेकर अपने यहां बसाने के लिये तो लालायित नहीं है-हालांकि यह एक मजाक वाली बात है ।
एक बात दिलचस्प यह है कि क्रिकेट खिलाड़ियों को आस्ट्रेलिया में ही प्रेमिका क्यों मिलती है? क्या वहां कोई ऐसा तत्व या स्थान मौजूद है जो क्रिकेट खिलाड़ियों को प्रेमिकायें और पत्नी दिलवाता है-संभव है अन्य क्षेत्रों से जुड़े लोगों को इच्छित जीवन साथी भी वहां मिलता हो। इसका पता लगाना चाहिये। एक भारतीय खिलाड़ी को भी वहीं प्रेमिका मिली थी जिससे उसकी शादी संभावित है। अपने देश के महान स्पिनर ने भी वहीं एक युवती से विवाह किया था। इसकी जानकारी इसलिये भी जरूरी है कि भारत में अनेक लड़के इच्छित रूप वाली लड़की पाने के लिये तरस रहे हैं इसलिये कुंवारे घूम रहे हैं। इधर कुछ लोग कह रहे हैं कि छोटे मोटे विषयों पर पढ़ने के लिये आस्ट्रेलिया जाने की क्या जरूरत है? ऐसे युवकों वहां इस बजाने जाने का अवसर मिल सकता है कि वहां सुयोग्य वधु पाने की कामना पूरी हो सकती है।
बहरहाल बाज़ार और उसके प्रचार माध्यमों का रवैया यह सिद्ध कर रहा है कि उनके देशभक्ति, समाज सेवा, धर्म और भाषा के संबंध में कोई स्पष्ट रवैया नहीं है और ऐसे में आम आदमी उनके अनुसार जरूर बहता रहे पर ज्ञानी लोग अपने हिसाब से मतलब ढूंढते रहेंगे। एक पाकिस्तानी दूल्हे को जिस तरह इस देश में मदद मिल रही है उससे आम लोगों में भी अनेक तरह के शक शुबहे उठेंगे। 26/11 को मुंबई में हुए हमलों में जिस तरह रेल्वे स्टेशन पर कत्लेआम किया गया उससे इस देश के लोगों का मन बहुत आहत हुआ। बाज़ार और उसके प्रचार माध्यम एक पाकिस्तानी दूल्हे पर जिस तरह फिदा हैं उससे नहीं लगता कि वह आम लोगों के जज़्बात समझ रहे हैं। कोई भारतीय लड़की किसी पाकिस्तानी से शादी करे, इसमें आपत्ति जैसा कुछ नहीं है पर जब ऐसी घटनायें हैं तब दोनों देशो में तनाव बढ़ेगा और इससे दोनों देशों के आम लोगों पर प्रभाव पड़ता है। अलबत्ता क्रिकेट और अन्य खेलों के विज्ञापन माडलों पर इसका कोई असर नहीं पड़ सकता क्योंकि उनको बाज़ार और प्रचार अपनी शक्ति से सहारा देता है। सीधे पाकिस्तान से नहीं तो मध्य एशिया के इधर से उधर यही बाज़ार करता है। पिछली बार जब पाकिस्तान से संबंध बिगड़े थे तब यही हुआ था। आम आदमी की ताकत नहीं थी पर अमीर लोग मध्य एशिया के रास्ते इधर से उधर आ जा रहे थे।
कहने का अभिप्राय यह है कि देशभक्ति जैसे भाव का इस बाज़ार और प्रचार तंत्र के लिये कोई तत्व नहीं है जब तक उससे उनका हित नहीं सधता हो।
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कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
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23 जनवरी 2010

बाजारू खेल में देशप्रेम ढूंढने का प्रयास-आलेख (cricket aur deshprem-hindi lekh)

भारत में चलने वाली एक क्लब स्तरीय प्रतियोगिता में पाकिस्तानी खिलाड़ियों को नीलामी में किसी ने नहीं खरीदा तो दोनों देशों में हो हल्ला मच गया है। किसी मनुष्य की नीलामी! बहुत आश्चर्य हो रहा है! यह तो गनीमत है कि इस देश में अधिकतर संख्या अभी भी अशिक्षित और अखबार न पढ़ने वाले लोगों की है वरना सारे देश मुंह खुला रह जाता और हर घर में चर्चा हो रही होती। कुछ लोग दुःखी होते तो कुछ खुश!
जब हम जैसा लेखक लिखता है तो अध्यात्म या धर्म की चर्चा न करे यह संभव नहीं हो पाता क्योंकि कहीं न कहीं लगता है कि एक तरफ लोग भारत के विश्व में अध्यात्मिक गुरु होने की बात करते हैं दूसरी तरफ अपने ही लोग जाते उल्टी दिशा में ही है। भारत से बाहर पनपी विचाराधाराओं के बारे में कहा जाता है कि वह मनुष्य को मनुष्य की गुलामी से बचाने के लिये प्रवाहित हुईं हैं। एक पश्चिमी देव पुरुष ने तो अपने कबीले के लोगों को गुलामी से मुक्ति के लिये संघर्ष किया। उसने गुलामी से अपने लोगों को मुक्त होने की प्रेरणा दी। उसकी जीवनी पर एक ंविदेशी हिन्दी टीवी चैनल ने ही कार्यक्रम दिखाया था जिसमें गुलामों की बकायदा नीलामी दिखाई जा रही थी। भारत में बंधुआ मजदूरी की परंपरा रही है पर उसमें कहीं ऐसी नीलामी की चर्चा नहीं होती जिसमें एक मालिक अपने गुलाम को दूसरे मालिक के हाथ बेचता है। कहने का तात्पर्य यह है कि जिस गुलामी और नीलामी की परंपरा का पश्चिमी सभ्यता ने करीब करीब त्याग दिया है उसी को भारतीय धनपतियों ने क्रिकेट के सहारे यहां जिंदा किया। धन्य है धन की महिमा!
क्ल्ब स्तरीय प्रतियोगिता को कोई अधिक भावनात्मक महत्व नहीं है और इसके मैच क्रिकेट के वही समर्थक देखते हैं जिनको उस समय कोई कामकाज नहीं होता है-जिन लोगों को कामकाज होता है वह ऐसे मैच में समय खराब नहीं करते क्योंकि अंतर्राष्ट्रीय स्तर के मैच ही उनको इसके लिये उपयुक्त लगते हैं। कहने वाले तो यह भी कहते हैं कि यह मैच दर्शकों के नंबर एक धन के साथ ही उस पर दांव खेलने वालो मूर्खों के धन से भी चलते हैं। मैच फिक्सिंग की वजह से बदनाम क्रिकेट हुई है और अंतर्राष्ट्रीय स्तर के मैच जोखिम वाले हो गये हैं इसलिये इन क्लब स्तरीय मैचों को आयोजित किया जा रहा है क्योंकि इसमें राष्ट्रप्रेम जैसी कोई चीज नहीं होती और फिक्सिंग की बात सामने आने उसके आहत होने वाली कोई बात हो।
ऐसे में पाकिस्तानी खिलाड़ियों के लिये नीलाम बोली न लगाना कोई राष्ट्रीय विषय नहीं होना चाहिये था पर इसे बनाया गया। पाकिस्तान में मातम मन रहा है तो उसके लिये स्यापा करने वाले कुछ लोग यहां भी हैं। उससे अधिक हैरान होने वाली बात तो यह कि उस पर खुश होने वाले भी बहुत हैं। कुछ लोगों ने तो भारतीय नेताओं पर आक्षेप करते हुए धनपतियों को महान बता डाला तो कुछ ने पाकिस्तान को अपने यहां भी ऐसा आयोजन करने का मजाकिया संदेश दिया। लगता है कि लोग समझे ही नहीं। लोग इसे पाकिस्तान पर एक फतह समझ रहे हैं और भारतीय धनपतियों को नायक! बाजार, सौदागर और उसके बंधुआ प्रचार माध्यमों का खेल को अगर नहीं समझेंगे तो यह भ्रम बना रहेगा।
जब भारत में कुछ लोग पाकिस्तानी खिलाड़ियों के लिये नीलाम बोली न लगने का जश्न मना रहे थे तब उस क्लब स्तरीय आयोजकों की एक प्रवक्ता अभिनेत्री एक संवाद सम्मेलन में यह बता रही थी कि ‘पाकिस्तान के खिलाड़ियों को यहां के ही कुछ लोगों की धमकियों की वजह से यहां न बुलाया गया।’
यह होना ही था। भारत की फिल्म और क्रिकेट को आर्थिक रूप से प्रभावित करने वाली कुछ ताकतें पाकिस्तान में हैं या नहीं कहना कठिन है पर इतना तय है कि भारतीय धनपतियों का मायावी संसार मध्य एशिया पर बहुत निर्भर करता है। पूरा मध्य एशिया भारत को रोकने के लिये पाकिस्तान का उपयोग करता है। यह संभव नहीं है कि भारत की कुछ आर्थिक ताकतें पाकिस्तान की अवहेलना कर सकें। इनकी मुश्किल दूसरी भी है कि पश्चिम के बिना भी यह भारतीय आर्थिक ताकतें नहीं चल सकती क्योंकि अंततः उनके धन संरक्षण के स्त्रोत वहीं हैं। यही पश्चिम पाकिस्तान से बहुत चिढ़ा हुआ है। पहले इस निर्णय के द्वारा पश्चिमी देशों को भी पाकिस्तान से दूरी का संकेत भेजा गया और भारत के कुछ संगठनों की धमकी की बात कर पाकिस्तान पर मरहम लगाया गया। भारतीय धनपतियों के नायकत्व की पोल तो उनकी प्रवक्ता वालीवुड अभिनेत्री के बयान से खुल ही गयी। इस लेखक ने कल अपने एक लेख में पाकिस्तान प्रचार युद्ध में भारत से हारने पर अपने मध्य एशिया मित्रों की मदद लेने का जिक्र किया था। यही कारण है कि क्लब स्तरीय प्रतियोगिता के आयोजकों को यह सब कहना पड़ा कि ‘यहां के कुछ संगठनों की धमकियों की वजह से ऐसा किया गया।’
यह संगठन कौन है? इशारा सभी समझ गये पर सच यह है कि ‘पाकिस्तानी खिलाड़ियों को यहां न बुलाने के लिये किसी ने बहुत बड़े संगठन ने धमकी दी हो ऐसा कहीं अखबारों में पढ़ने को नहीं मिला। इन संगठनों से लोगों को जरूर भारतीय धनपतियों का आभारी होना चाहिये जो उन्हें बैठे बिठाये इस तरह का श्रेय मिल गया।
हमें इन बातों पर यकीन नहीं है। कम से कम क्रिकेट में अब हमारे अंदर देशप्रेम जैसा कोई भाव नहीं है क्योंकि हमारे देश का राष्ट्रीय खेल तो हाकी है। इस निर्णय के पीछे दूसरा ही खेल नजर आ रहा है। इस तरह के फैसले में क्या छिपा हो सकता है? यह क्रमवार नीचे लिख रहे हैं।
1-सन् 2007 में पचास ओवरीय क्रिकेट प्रतियोगिता में भारत के हारने के बाद क्रिकेट की लोकप्रियता एकदम गिर गयी। तीन महान खिलाड़ियों के विज्ञापन तक टीवी चैनलों ने रोक दिये। एक वर्ष बाद हुई बीस ओवरीय प्रतियोगिता में विश्व कप में भारत जीता(!) तो फिर लोकप्रियता बहाल हुई। उसके बाद ही यह क्ल्ब स्तरीय प्रतियोगिता भी शुरु हुई और उसमें वही तीन महान खिलाड़ी भी शामिल होते हैं जिनको अभी तक भारत क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड की की बीस ओवरीय टीम के योग्य समझा नहीं जाता मगर बाजार के विज्ञापनों में उनकी उपस्थिति निरंतर रहती है। इन्हीं खिलाड़ियों की छवि भुनाने के लिये यह प्रतियोगिता आयोजित की जाती है इसमें पाकिस्तानी खिलाड़ियों का कोई अधिक महत्व नहीं है।
2-अंतिम बीस ओवरी प्रतियोगिता पाकिस्तान ने जीती और भारत का प्रदर्शन अत्यंत निराशाजनक रहा। इससे यकीनन क्रिकेट की लोकप्रियता गिरती लग रही है। कम से कम इस बीस ओवरीय प्रतियोगिता की लोकप्रियता अब संदिग्ध हो रही है। ऐसे में हो सकता है कि भारत के लोगों में राष्ट्रीय प्रेम और विजय का भाव पैदा कर इसके लिये उनमें आकर्षण पैदा करने का प्रयास हो सकता है। वैसे शुद्ध रूप से क्रिकेट प्रेमी अंतर्राट्रीय मैचों में दिलचस्पी लेते हैं पर ऐसे नवधनाढ्य लोगों के लिये यह क्लब स्तरीय मैच भी कम मजेदार नहीं होते। दूसरी बात यह है कि इन प्रतियोगिताओं में खेलने वालों को विज्ञापन के द्वारा भी धन दिलवाना पड़ता है। 26/11 के बाद भारत के जो स्थिति बनी है उसके बाद फिलहाल यह संभव नहीं है कि भारत में किसी पाकिस्तानी क्रिकेट खिलाड़ी का विज्ञापन देखने को लोग तैयार हों।
3-संदेह का कारण यह है कि अनेक देशों की टीमों के खिलाड़ियों की बोली नहीं लगी पर पाकिस्तान का जिक्र ही क्यों आया? अभिनेत्री प्रवक्ता आखिर यह क्यों कहा कि ‘यहां के कुछ लोगों की धमकी की वजह से ऐसा हुआ’, अन्य देशों की बात क्यों नहीं बतायी। संभव है कि यह प्रश्न ही प्रायोजित ढंग से किया गया हो। संदेह के घेरे में अनेक लोग हैं जो पाकिस्तान के लिये अपना प्रेम प्रदर्शन कर रहे हैं पर दूसरों के लिये खामोश हैं। दरअसल भारत में एक खास वर्ग है जो पाकिस्तान की चर्चा बनाये रखकर वहां के लोगों को खुश रखना चाहता है।
हमने पहले भी लिखा था कि भारत और पाकिस्तान का खास वर्ग आपस में मैत्री भाव बनाये रखता है और इस तरह उसका व्यवहार है कि दोनों देशों के आम नागरिक ही एक दूसरे के दुश्मन हैं। अभिनेत्री के बयान से यह सिद्ध तो हो गया कि कम से कम उसके अंदर पाकिस्तान के लिये शत्रुता का भाव नहीं है और पाकिस्तान क्रिके्रट खिलाड़ी भी भारत के मित्र हैं। इसका सीधा आशय यही है कि आम लोग ही पाकिस्तान के आम लोगों के शत्रु हैं।
कहने का अभिप्राय यह है कि पाकिस्तान के खिलाड़ियों की इस प्रतियोगिता में नीलाम बोली न लगना इस देश में राष्ट्रप्रेम के जज़्बात भुनाकर उसे अपने फायदे के लिये भी उपयोग करना हो सकता है। सबसे बड़ी बात यह है कि धनाढ्य वर्ग तो वैसे भी अपने व्यवसायिक हितों की वजह से नहीं लड़ता ऐसे आर्थिक उदारीकरण के इस युग में बाजार और सौदागर से एक बाजारु खेल में देशप्रेम की छवि दिखाने की आशा करना बेकार है। खासतौर से तब जब यहां का भारत का एक बहुत बड़ा तबका क्रिकेट को जानता नहीं है या फिर इसे अधिक महत्व नहीं देता। अलबत्ता बौद्धिक विलास में रत लोगों के लिये यह एक अच्छा विषय भी हो सकता है। एक आम लेखक के लिये यह संभव नहीं है कि वह कहीं से वास्तविक तथ्य जुटा सके। ऐसे में अखबारों और टीवी पर प्रसारित खबरों के आधार पर ही हम यह बातें लिख रहे हैं। सच क्या है! यह तो खास वर्ग के लोग ही जाने!
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27 सितंबर 2009

मनोरंजन में खलल-हास्य व्यंग्य क्षणिकायें (manoranjan-hasya vyangya kavitaen)

इंसान के जज्ब़ात शर्त से
और समाज के सट्टे के भाव से
समझे जाते हैं।
नये जमाने में
जज़्बात एक शय है
जो खेल में होता बाल
व्यापार में तौल का माल
नासमझी बन गयी है
जज़्बात का सबूत
जो नहीं फंसते जाल में
वह समझदार शैतान समझे जाते हैं
............................
एक दोस्त ने फोन पर
दूसरे दोस्त से
‘क्या स्कोर चल रहा है
दूसरा बिना समझे तत्काल बोला
‘यार, ऐसा लगता है
मेरी जेब से आज फिर
दस हजार रुपया निकल रहा है।’
...................................
छायागृह में चलचित्र के
एक दृश्य में
नायक घायल हो गया तो
एक महिला दर्शक रोने लगी।
तब पास में बैठी दूसरी महिला बोली
‘अरे, घर पर रोना होता है
इसलिये मनोरंजन के लिये यहां हम आते हैं
पता नहीं तुम जैसे लोग
घर का रोना यहां क्यों लाते हैं
अब बताओ
क्या सास ने मारकर घर से निकाला है
या बहु से लड़कर तुम स्वयं भगी
जो हमारे मनोरंजन में खलल डालने के लिये
इस तरह जोर जोर से रोने लगी।’
.....................................




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