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8 फ़रवरी 2011

बाज़ार और प्रचारकों को वनडे मातरम् तो कहना ही था-हिन्दी व्यंग्य (oneday matram and bazar'd prachar)

बड़ा अजीब लगता है जब एक टीवी चैनल में वनडे मातरम् शब्द देखकर हैरानी होती है। देश के स्वाधीनता संग्राम सेनानियों ने अपने अभियान में जमकर गया होगा ‘वंदे मातरम्’! भारत का राष्ट्रगान भी वंदेमातरम् शब्द से शोभायमान है। सच तो यह है कि वंदेमातरम् शब्द का उच्चारण ही मन ही मन में राष्ट्र के प्रति जान न्यौछावर करने वाले शहीदों की याद दिलाता है। देश के शहीदों को हार्दिक श्रद्धांजलि देते हुंए मन भर जाता है और मन गुनगुनाता है ‘वंदे मातरम्’!
आम मनुष्य और उसकी भावनाओं के दोहन करने के लिये उत्पाद करना बाज़ार और उनको खरीदने के लिये प्रेरित करना उसके प्रचार का काम है। अभी तक हम सुनते थे कि अमुक समाज के इष्ट का नाम बाज़ार ने अपने उत्पाद के लिये प्रयोग मेें किया तो विरोध हो गया या किसी पत्रिका ने किसी के धार्मिक संकेतक का व्यवसायिक उपयोग किया तो उस प्रतिबंध लग गया। अनेक प्रकार के जूते, जींस, तथा पत्रिकायें इस तरह के विरोध का सामना कर चुके हैं। धर्म, जाति, तथा भाषा के नाम पर समूह बनते हैं इसके लिये उसके प्रतीकों या इष्ट के नाम या नारे का उपयेाग बाज़ार के लिये अपने उत्पाद तथा प्रचार के लिये उपभोक्ता को क्रय करने के लिये प्रयुक्त करना कठिन होता है। मगर हमारे राष्ट्र का कोई अलग से समूह नहीं है बल्कि उपशीर्षकों में बंटे समाज उसकी पहचान हैं जिसे कुछ लोग गर्व से विभिन्न फूलों का गुलदस्ता कहते हुए गर्व से सीना फुला देते हैं।
यही कारण है कि वंदे मातरम अब बाज़ार के प्रचारकों के लिये वनडे मातरम् हो गया है। अगला विश्व क्रिकेट भारत में होना है। उसके लिये प्रचारकों ने-टीवी, रेडियो, तथा अखबार-ने अपना काम शुरु कर दिया है। कोई टीवी चैनल बल्ले बल्ले कर रहा है तो कोई वनडे मातरम् गा रहा है। इस श्रृंखला में वह लोग बीसीसीआई की टीम के विश्व कप के लिये चुनी गयी टीम के सदस्यों को महानायक बनाने पर तुले हैं। मैच में अधिक से अधिक लोग मैदान पर आयें यही काफी नहीं है बल्कि टीवी के सामने बैठकर आंखें फोड़ते हुए बाज़ार के उत्पादों का विज्ञापन प्रचार देखें इसके लिये जरूरी है कि लगातार उनका ध्यान विश्व कप क्रिकेट प्रतियोगिता की तरफ बनाये रखा जायें, इस उद्देश्य से बाज़ार तथा प्रचार प्रबंधक सक्रिय हैं।
प्रचारकों को पैसा चाहिये तो बाज़ार उत्पादकों को अपने उत्पाद के लिये उपभोक्ता। दोनों मिलकर भारतीय समाज में एक नया समाज बनाना चाहते हैं जिसमें क्रिकेट और फिल्म का शोर हो। लोग एक नंबर में देखें और दो नंबर में सट्टा खेलें। मज़़े की बात यह है कि प्रचार माध्यमों में युवाओं को प्रोत्साहन देने की बात की जाती है ताकि वह भ्रमित रहे होकर उनके बताये मार्ग का अनुकरण करते हुए केवल मनोरंजन में उलझे रहें या महानायक बनने का सपना देखते हुए अपना जीवन नष्ट कर लें।
वनडे मातरम् यानि एक दिवसीय क्रिकेट मैच उनके लिये माता समान तो क्रिकेट खिलाड़ी पिता समान हो गये हैं क्योंकि वह उनके लिये धनार्जन का एक मात्र साधन हैं। इनसे फुरसत हो तो फिल्म अभिनेता तो गॉडफादर यानि धर्मपिता की भूमिका निभाते हैं। इसका उदाहरण एक टीवी चैनल पर देखने को मिला।
एक तेजगेंदबाज को घायल होने के बावजूद टीम में शामिल किया गया पर जब उसके अनफिट होने का चिकित्सीय प्रमाण पत्र मिला तो एक अन्य तेज गेंदबाज-जिसे केरल एक्सप्रेस कहा जाता है-को शामिल किया गया। केरल एक्सप्रेस को जब पहले टीम में शामिल से बाहर रखा गया तो उसके लिये सहानुभूति गीत गाये थे। अब जब उसे शामिल किया गया तो उसकी खबर और फोटो के साथ एक फिल्म अभिनेता के फोटो के साथ ही उसकी एक फिल्म का वाक्य‘जब अब हम किसी को बहुत चाहते हो तो कायनात उसके साथ हमें मिला ही देती है’, चलाया गया। दोनों में कोई तारतम्य नहीं है। ऐसे बहुत सारी फिल्मों में डायलाग मिल जायेंगे। ढेर सारे अभिनेताओं ने बोले होंगे मगर वह अभिनेता तो प्रचार माध्यमों का धर्म पिता है और जैसा कि स्पष्ट है कि विश्व कप तक क्रिकेट खिलाड़ी पिता हो गये हैं। दोनों को मिला कर बन गया बढ़िया कार्यक्रम।
इसलिये जब वनडे मातरम् नारा सुनते हैं तो कहना ही पड़ता है क्रिकेटर पितृम। मजा आता है जब नारों के जवाब में ऐसे नारे अपने दिमाग़ में आते हैं यह अलग बात है कि उनको नारे लगाने के पैसे मिलते हैं पर हमें फोकटिया लिखना होता है और मेहनत भी पड़ती है। न लिखें तो लगता है कि अपना मनोरंजन नहीं किया।
लेखक-दीपक भारतदीप,ग्वालियर 
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30 जनवरी 2011

मेहमानवाजी का विज्ञापन अमेरिका में दिखायें-हिन्दी लघु व्यंग्य (mehmanwaji aur america-hindi vyangya)

मुंबई फिल्मों के उस अभिनेता का वह विज्ञापन अंग्रेजी में अनुवाद कर अमेरिका में भी दिखाया जाना चाहिए क्योंकि उसकी जरूरत भारत में कम वहीं ज्यादा दिखती है जहां 1655 भारतीय छात्रों के पांव में रेडियो कालर बांध दिया गया है। वैसे ही रेडियो कालर जो भारत में संरक्षित वन्य क्षेत्रों में पशुओं की गतिविधियों पर नियंत्रण रखने के लिये पहनाये जाते हैं। टीवी पर मुंबईया फिल्मों के इस अभिनेता का विज्ञापन आता है जिसमें वह लोगों को समझाता है कि विदेश से आये लोगों को मेहमान मानकर उनकी इज्जत करना चाहिए। एक जगह तो वह यह भी बताता है कि यह तो हमारी रोजी रोटी का आधार हैं।’’
यह अभिनेता पिछले कई दिनों से अपनी फिल्में अमेरिका में ऑस्कर के लिये भेज रहा है मगर अभी तक उसे वह नहीं मिला। वैसे देखा जाये तो वह क्या सारे अभिनेता विभिन्न पूंजीपतियों के प्रथक प्रथक समूहों का मुखोटा है जो क्रिकेट हो या फिल्म उससे कहंी न कहीं जुड़ जाते हैं। अवसर मिले तो राजनीति में भी चले आते हैं।
ऐसे में उस अभिनेता के बारे में यह माना जा सकता है कि वह किसी पूंजीपतियों के समूह का मुख हैं जो अमेरिका को खुश करना चाहता है। हम ऐसे ही उसके अज्ञात समूह के रणनीतिकारों को यही सलाह देंगे कि उसका यह मेहमानवाजी का उपदेश अब अमेरिका में भी दिखायें। हां, हम यह नहीं कह सकते कि इससे उनके अमेरिकी आका कहीं नाराज न हो जायें, और अभी तक ऑस्कर से उस अभिनेता की फिल्म विचार के लिये अपने यहां आने देते हैं फिर संभव है कि यह सुविधा भी बंद कर दें।
किस्सा यह है कि आंध्र प्रदेश के 1655 छात्र अमेरिका में स्थापित के विश्व विद्यालय में पढ़ने के लिये गये। इसके लिये उनको वीजा दिया गया जो कि अमेरिकी सरकार के जिम्मेदारी अधिकारियों बिना मिलना संभव नहीं था। पता लगा कि वह विश्वविद्यालय या यूनिवर्सिटी फर्जी है-यह भी बताया गया कि उसका पंजीयन नहीं हुआ इसलिये छात्रों का वीजा रद्द कर दिया गया। अमेरिकी अधिकारियों फर्जी विश्वविद्यालय के लिये वीजा कैसे जारी किया, इसकी जानकारी अभी तक नहीं मिला पर यह तय है कि कहीं न कहीं भ्रष्टाचार हुआ है।

यही छात्र जब अमेरिकी अधिकारियों से शिकायत करने पहुंचे तो उनको रेडियो कॉलर पहना दिया गया कि ताकि उन पर नज़र रखी जा सके। यह अलग से चर्चा का विषय हो सकता है कि अमेरिका में छात्र गये क्यों? क्या वह शैक्षणिक वीजा की आड़ में वहां कोई अपने रहने का जुगाड़ करना चाहते थे?
एक सबसे बड़ी बात यह है कि इसमें अमेरिकी अधिकारी स्वयं शामिल हैं इसलिये वह अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकते। दूसरा यह भी कि जो लोग केवल भारतीयों को फर्जी काम करने वाला समझते हैं वह भी जान लें कि यह काम अमेरिकी भी करते है। 1655 भारतीय छात्रों के साथ पशुता का व्यवहार होने के लिये जहां भारत में अमेरिकी मोह तथा वहां के अधिकारियों के ईमानदार होने का भ्रम हो तो जिम्मेदार है पर साथ वहां के प्रशासन की पोल भी खोलता है।
भारत में विदेशी पर्यटकों को बड़ी हैरानी से देखा जाता है पर उतना दुर्व्यवहार नहीं होता जितना हमारे उन अभिनेता के विज्ञापन में दिखाया जाता है। यह अलग बात है कि सवारी आदि में उनसे पैसा ज्यादा ऐंठ लिया जाता हो पर यह दुर्व्यवहार की श्रेणी में नहीं आता। हम तो यहीं कहेंगे कि मेहमानवाजी के बारे में इस देश से ज्यादा विदेशियों को सिखाने की जरूरत है। यह भी स्पष्ट करें कि अमेरिका की अर्थव्यवस्था विदेशों पर आधारित है फिर भी वहां भारतीयों का सम्मान नहीं है जबकि भारत में केवल सभ्य तबके में ही अमेरिका के प्रति आकर्षण है पर अर्थव्यवस्था का आधार अभी भी यहां की कृषि ही है। मतलब यह कि अगर विदेशी सहारा न हो तो कई लोगों के कमीशन बंद हो जायेंगे। स्विस बैंकों के खाते भी खाली हो सकते हैं पर भारतीय बैंक अपने देश की दम पर टिके रहेंगे। ंफिर भी विदेशी सैलानियों या नागरिकों के साथ ऐसी वैसी बातें नगण्य ही होती हैं। ऐसे में उस अभिनेता के अभिनीत विज्ञापन को अमेरिका और आस्ट्रेलिया में भी दिखाया जाये तो कुछ बात बने।
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कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
http://anant-shabd.blogspot.com

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