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23 अक्टूबर 2011

लीबिया के गद्दाफी के नक्शे कदम पर चले अफगानिस्तान के हामिद करजई-हिन्दी लेख )ligiya ki gaddagi ki raah chale afaganistan ke hamid karjai-hindi lekh)

          गद्दाफी की मौत ने अमेरिका के मित्र राजनयिको को हक्का बक्का कर दिया है। भले ही गद्दाफी वर्तमान समय में अमेरिका का मित्र न रहा हो पर जिस तरह अपने अभियान के माध्यम से राजशाही को समाप्त कर लीबिया के राष्ट्रपति पद पर उसका आगमन हुआ उससे यह साफ लगता है कि विश्व में अपनी लोकतंत्र प्रतिबद्धताओं को दिखाने के लिये उसे पश्चिमी राष्ट्रों ने समर्थन दिया था। ऐसा लगता है कि फ्रांस के ज्यादा वह करीब था यही कारण संक्रमणकाल के दौरान उसके फ्रांस जाने की संभावनाऐं सामने आती थी। संभवत अपनी अकड़ और अति आत्मविश्वास के चलते उसने ऐसा नहीं किया । ऐसा लगता है कि उसका बहुत सारा धन इन पश्चिमी देशों रहा होगा जो अब उनको पच गया है। विश्व की मंदी का सामना कर रहे पश्चिमी देश अब इसी तरह धन का जुगाड़ करेंगे और जिन लोगों ने अपना धन उनके यहां रखा है उनके सामने अब संशय उपस्थित हो गया होगा। प्रत्यक्ष विश्व में कोई अधिक प्रतिक्रिया नहीं दिखाई दे रही पर इतना तय है कि अमेरिका को लेकर उसके मित्र राजनेताओं के हृदय में अनेक संशय चल रहे होंगे। मूल में वह धन है जो उन्होंने वहां की बैंकों और पूंजीपतियों को दिया है। हम पर्दे पर अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अनेक दृश्य देखते हैं पर उसके पीछे के खेल पहले तो दिखाई नहीं देते और जब उनका पता लगता है तो उनकी प्रासंगिकता समाप्त हो जाता है। इन सबके बीच एक बात तय हो गयी है कि अमेरिका से वैर करने वाला कोई राजनयिक अपने देश में आराम से नहंी बैठ सकता। ऐसे में अफगानिस्तान के राष्ट्रपति हामिद करजई ने अमेरिका और भारत से युद्ध होने पर पाकिस्तान का साथ देने की बात कहकर गद्दाफी के मार्ग पर कदम बढ़ा दिया है। उसका यह कदम इस बात का प्रमाण है कि उसे राजनीतिक ज्ञान नहीं है। वह घबड़ाया हुआ है और ऐसा अफलातूनी बातें कह रहा है जिसके दुष्परिणाम कभी भी उसके सामने आ सकते हैं।
        यह हैरानी की बात है कि जिन देशों के सहयोग से वह इस पद पर बैठा है उन्हें ही अपने शत्रुओ में गिन रहा है। इसका कारण शायद यह है कि अमेरिकी सेना अगले एक दो साल में वहां से हटने वाली है और करजई का वहां कोई जनाधार नहीं है। जब तक अमेरिकी सेना वहां है तब तक ही उसका राष्ट्रपति पद बरकरार है, उसके बाद वह भी नजीबुल्लाह की तरह फांसी  पर लटकाया जा सकता है। उसने किस सनक में आकर पाकिस्तान को मित्र बना लिया है यह तो पता नहीं पर इतना तय है कि वहां  की खुफिया संस्था आईएसआई अपने पुराने बदले निकाले बिना उसे छोड़ेगी नहीं। अगर वह इस तरह का बयान नहीं देता तो यकीनन अमेरिका नहीं तो कम से कम भारत उसकी चिंता अवश्य करता। भारत के रणनीतिकार पश्चिमी राष्ट्रों से अपने संपर्क के सहारे उसे राष्ट्रपति पद से हटने के बाद किसी दूसरे देश में पहुंचवा सकते थे पर लगता है कि पद के मोह ने उसे अंधा कर दिया है। अंततः यह उसके लिये घातक होना है।
         अमेरिकी सेना अफगानिस्तान से हटेगी पर वैकल्पिक व्यवस्था किये बिना उसकी वापसी होगी ऐसी संभावना नहीं है। इस समय अमेरिका तालिबानियों से बात कर रहा है। इस बातचीत से तालिबानी क्या पायेंगे यह पता नहीं पर अमेरिका धीरे धीरे उसमें से लोग तोड़कर नये तालिबानी बनाकर अपनी चरण पादुकाओं के रूप में अपने लोग स्थापित करने करने के साथ ही किसी न किसी रूप में सैन्य उपस्थिति बनाये रखेगा। अमेरिका दुश्मनों को छोड़ता नहीं है और जब तक स्वार्थ हैं मित्रों को भी नहीं तोड़ता। लगता है कि अमेरिका हामिद करजई का खेल समझ चुका है और उसके दोगलेपन से नाराज हो गया है। जिस पाकिस्तान से वह जुड़ रहा है उसका अपने ही तीन प्रदेशों में शासन नाम मात्र का है और वहां के बाशिंदे अपने ही देश से नफरत करते हैं। फिर जो क्षेत्र अफगानिस्तान से लगे हैं वहां के नागरिक तो अपने को राजनीतिक रूप से पंजाब का गुलाम समझते हैं। अगर पाकिस्तान को निपटाना अमेरिका के हित में रहा और उसने हमला किया तो वहीं के बाशिंदे अमेरिका के साथ हो लेंगे भले ही उनका जातीय समीकरण हामिद करजई से जमता हो। अमेरिका उसकी गीदड़ भभकी से डरेगा यह तो नहीं लगता पर भारत की खामोशी भी उसके लिये खतरनाक है। भारत ने संक्रमण काल में उसकी सहायता की थी। इस धमकी के बाद भारतीय जनमानस की नाखुशी को देखते हुए यहां के रणनीतिकारों के लिये उसे जारी रखना कठिन होगा। ऐसे में अफगानिस्तान में आर्थिक रूप से पैदा होने वाला संकट तथा उसके बाद वहां पैदा होने वाला विद्रोह करजाई को ले डूबेगा। वैसे यह भी लगता है कि पहले ही भारत समर्थक पूर्व राष्ट्राध्यक्षों की जिस तरह अफगानिस्तान में हत्या हुई है उसके चलते भी करजई ने यह बयान दिया हो। खासतौर से नजीबुल्लाह को फांसी देने के बाद भारत की रणनीतिक क्षमताओं पर अफगानिस्तान में संदेह पैदा हुआ है। इसका कारण शायद यह भी है कि भारत को वहां के राजनीतिक शिखर पुरुष केवल आर्थिक दान दाता के रूप में एक सीमित सहयोग देने वाला देश मानते हैं। सामरिक महत्व से भारत उनके लिये महत्वहीन है। इसके लिये यह जरूरी है कि एक बार भारतीय सेना वहां जाये। भारत को अगर सामरिक रूप से शक्तिशाली होना है तो उसे अपने सैन्य अड्डे अमेरिका की तरह दूसरे देशों में स्थापित करना चाहिए। खासतौर से मित्र पड़ौसी देशों के राष्ट्राध्यक्षों को सामरिक उपस्थिति के रूप में विश्वास दिलाना चाहिए कि उनकी रक्षा के लिये हम तत्पर हैं। यह मान लेना कि सेना की उपस्थिति रहना सम्राज्यवाद का विस्तार है गलत होगा। हमारे यहां कुछ विद्वान लोग इराक और अफगानिस्तान में अमेरिकी सुना को उपनिवेशवाद मानते हैं पर वह यह नहीं जानते कि अनेक छोटे राष्ट्र अर्थाभाव और कुप्रबंधन के कारण बाहर के ही नहीं वरन् आंतरिक खतरों से भी निपटने का सामर्थ्य नहीं रखते। वहां के राष्ट्राध्यक्षों को विदेशों पर निर्भर होना पड़ता है। ऐसे में वह विदेशी सहायक के मित्र बन जाते हैं। भारत का विश्व में कहीं कोई निकटस्थ मित्र केवल इसलिये नहीं है क्योंकि यहां की नीति ऐसी है जिसमें सैन्य उपस्थिति सम्राज्य का विस्तार माना जाता है। सच बात तो यह है आर्थिक रूप से शक्तिशाली होने का कोई मतलब नहीं है बल्कि सामरिक रूप से भी यह दिखाना आवश्यक है कि हम दूसरे की मदद कर सकते हैं तभी शायद हमारे लिये खतरे कम होंगे वरना तो हामिद करजई जैसे लोग चाहे जब साथ छोड़कर नंगे भूखे पाकिस्तानी शासकों के कदमों में जाकर बैठेंगे। यह बात अलग बात है कि ऐसे लोग अपना बुरा हश्र स्वयं तय करते हैं।
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लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर 
poet, writer and editor-Deepak 'BharatDeep',Gwalior

writer aur editor-Deepak 'Bharatdeep' Gwalior

30 अगस्त 2010

क्रिकेट मैच में हारने की कसम-हिन्दी व्यंग्य (cricket match men harne ki kasam-hindi vyangya)

पाकिस्तान के सात खिलाड़ी मैच फिक्सिंग के आरोपों में फंस गये हैं। फंसे भी क्रिकेट के जनक इंग्लैंड में हैं जहां पाकिस्तानी पहले से बदनाम हैं। यह खबरें तो उन्हीं प्रचार माध्यमों से ही मिल रही हैं जो उस बाज़ार के ही भौंपू हैं जिसके अनेक शिखर सौदागरों पर भूमिगत माफिया से संबंध रखने का आरोप है। कभी कभी ऐसी खबरें देखकर हैरानी होती है कि आखिर यह क्रिकेट जो इन प्रचार समाचार माध्यमों के रोजगार का आधार है क्योंकि इससे उनको प्रतिदिन आधे घंटे की सामग्री मिलती है तो कैसे उसे बदनाम करने पर तुल जाते हैं।
पहली बार पता चला कि नोबॉल भी फिक्स होती है। पाकिस्तान के क्रिकेट खिलाड़ियों ने गेंद फैंकते समय अपना पांव लाईन से इतना बाहर रखा था कि अंपायर के लिये यह संभव नहीं था कि वह उसकी अनदेखी करे। जब खिलाड़ी फिक्स हैं तो अंपायर भी फिक्स हो सकता है पर पाकिस्तानी खिलाड़ियों ने इतना पांव निकाला कि नोबॉल न देने के लिये फिक्स करने वाला अंपायर भी कैमरें की वजह से उसे संदेह का लाभ नहीं दे सकता था।
आरोप लगे हैं कि पाकिस्तानी खिलाड़ी औरतों, पैसे तथा मस्ती करने के शौकीन हैं। पाकिस्तानी खिलाड़ियों का चरित्र तो वहीं के लोग बयान करते हैं। कुछ पर तो मादक द्रव्य पदार्थों की तस्करी का भी आरोप है। जब पाकिस्तानी खिलाड़ी पकड़े जाते हैं तो उनकी एकाध प्रेमिका भी सामने आती है जो उनकी काली करतूतों का बयान करती है। एक चैनल के मुताबिक पाकिस्तान का एक गेंदबाज की प्रेमिका के अनुसार वह तो बिल्कुल अपराध प्रवृत्ति का और यह भी उसी ने बताया था कि ‘2010 में पाकिस्तानी कोई मैच जीतने वाला नहीं है, ऐसा तय कर लिया गया है। पिछले 82 मैचों से फिक्सिंग चल रही है। वगैरह वगैरह।
जिस बात पर हमारी नज़र अटकी वह थी कि ‘पाकिस्तान खिलाड़ियों ने 2010 में मैच न जीतने की कसम खा रखी है। संभवत आजकल उनको हारने के पैसे मिल रहे हैं। हां, यह क्रिकेट में होता है। श्रीलंका में हुए एक मैच में आस्ट्रेलिया और पाकिस्तान दोनों की टीमें मैच हारना चाहती थीं क्योंकि पर्दे के पीछे उनको अधिक पैसा मिलने वाला था। यानि जो जीतता वह कम पैसे पाता तोे बताईये पैसे के लिऐ खेलने वाले खिलाड़ी क्यों जीतना चाहेंगे। ऐसे आरोप टीवी चैनलों ने लगाये थे। बहरहाल पाकिस्तान टीम के खिलाड़ी अपनी आक्रामक छबि भुनाते हैं। उनके हाव भाव ऐसे हैं जैसे कि तूफान हो और इसलिये उनकी जीत पर अधिक पैसा लग जाता है। सट्टेबाज उसके हारने पर ही कमाते होंगे इसलिये ही शायद वह उनको हारने के लिये पैसा देते होंगे।
इधर अपने देश की बीसीसीआई की टीम भी लगातर जीतने में विश्वास नहंीं रखती। यकीनन इस टीम के कर्णधारों को पाकिस्तानी खिलाड़ियों की इस कसम का पता लगा होगा कि वह 2010 में जीतेंगे नहीं इसलिये उसके साथ न खेलने का फैसला किया होगा ।
बात अगर पाकिस्तान की हो तो अपने देश के सामाजिक, आर्थिक, खेल तथा कला जगत के शिखर पुरुषों के दोनों हाथों में लड्डू होते हैं। अगर संबंध अच्छे रखने हों तो कहना पड़ता है कि ‘इंसान सब कर सकता है पर पड़ौसी नहीं बदल सकता‘ या फिर ‘आम आदमी के आदमी से संपर्क करना चाहिऐ।’
अगर संबंध खराब करने हों तो आतंकवाद का मुद्दा एक पहले से ही तय हथियार है कहा जाता है कि ‘पहले पाकिस्तान अपने यहां आतंकवादी का खत्मा करे।
पिछली बार आईपीएल में पाकिस्तान के खिलाड़ियों को नहीं खरीदा गया था तो देश के तमाम लोगों ने भारी विलाप किया था। यहां तक कि इस विलाप में वह लोग भी शामिल थे जो प्रत्यक्षः इन टीमों के मालिक माने जाते हैं-इसका सीधा मतलब यही था कि यह मालिक तो मुखौटे हैं जबकि उनके पीछे अदृश्य आर्थिक शक्तियां हैं जो इस खेल का अपनी तरीके से संचालन करती हैं।
बाद में आईपीएल में फिक्सिंग के आरोप लगे थे। उसमें पाकिस्तान के खिलाड़ियों का न होना इस बात का प्रमाण था कि अकेले पाकिस्तानी ही ऐसा खेल नहीं खेलते बल्कि हर देश के कुछ खिलाड़ी शक के दायरे में हैं। यह अलग बात है कि पाकिस्तान बदनाम हैं तो उसके खिलाड़ियों को चाहे जब पकड़ कर यह दिखाया जाता है कि देखो बाकी जगह साफ काम चल रहा है। किसी अन्य देश का नाम नहीं आने दिया जाता क्योंकि उसकी बदनामी से मामला बिगड़ सकता है। पाकिस्तान के बारे में तो कोई भी कह देगा कि ‘वह तो देश ही ऐसा है।’ इससे प्रचार में मामला हल्का हो जाता है और प्रचार माध्यमों के लिये भी सनसनीखेज सामग्री बन जाती है।
पाकिस्तानी या तो चालाक नहीं है या लापरवाह हैं जो पकड़े जाते हैं। संभव है वह कमाई के लिये हल्के सूत्रों का इस्तेमाल करते हों। भारतीय प्रचार माध्यमों को तो सभी जानते हैं। निष्पक्ष दिखने के नाम पर तब इन खिलाड़ियों के कारनामों की चर्चा से बचते हैं जब यह भारत आते हैं। अभी पाकिस्तानी के एक खिलाड़ी ने एक भारतीय महिला खिलाड़ी से शादी की। वह भारत आया तो उसके लोगों ने ही उस पर आरोप लगाया था कि ‘वह तो फिक्सर है।’ मगर भारत की एक अन्य महिला ने जब उसी पाकिस्तानी खिलाड़ी से विवाह होने की बात कही और बिना तलाक दिये दूसरी शादी का विरोध किया तो यह प्रचार माध्यम एक बूढ़े अभिनेता को पाकिस्तानी खिलाड़ी के समर्थन में लाये। मामला सुलट गया और भारतीय खिलाड़िन से उस खिलाड़ी का विवाह हुआ। वह बूढ़े अभिनेता भी उस शादी में गया। आज तक एक बात समझ में नहीं आयी कि इन फिल्म वालों से क्रिकेट वालों रिश्ते बनते कैसे हैं। संभवत कहीं न कहीं धन के स्त्रोत एक जैसे ही होंगे।
इस देश में क्रिकेट खेल का आकर्षण अब उतना नहीं रहा जितना टीवी चैनल और अखबार दिखा रहे हैं। कभी कभी तो ऐसा लगता है कि उनके पास मज़बूरी है क्योंकि इसके अलावा वह कुछ नया कर ही नहीं सकते।
एक दो नहीं पूरे सात पाकिस्तनी खिलाड़ी ब्रिटेन से मैच हारना चाहते थे। हारे भी! इससे उनके धार्मिक लोग नाराज़ हो गये हैं। इसलिये नहीं कि पैसा खाकर हारे बल्कि धर्म का नाम नीचा किया। कट्टर लोग धमकियां दे रहे हैं। कोरी धमकियां ही हैं क्योंकि इन कट्टर धार्मिक लोगों को पैसा भी उन लोगों से मिलता है जो क्रिकेट में मैदान के बाहर से इशारों में खिलाड़ियों को नचाते हैं और फिर उनको रैम्प पर भी नाचने का अवसर प्रदान करते हैं।
बहरहाल पाकिस्तानी खिलाड़ियों ने 2010 में हारने की कसम खाई है। यह आरोपी सात खिलाड़ी हटे तो दूसरे नये लोग आकर भी उस कसम को निभायेंगे। इधर बीसीसीआई की टीम भी तब तक नहीं उनके साथ खेलेगी जब तक उनकी कसम खत्म की अवधि नहीं होती। आखिर बीसीसीआई के खिलाड़ी जीत कर थक जायेंगे तो उनको तो हराकर कर विश्राम कौन देगा। पाकिस्तानी खिलाड़ी यह अवसर देने को तैयार नहीं लगते। यही कारण है कि आतंक का मुद्दे की वजह से दोनों नहीं ख्ेाल रहे अब यह बात बड़े लोग कहते हैं तो माननी पड़ती है। 2011 में फिर मित्रता का नारा लगेगा क्योंकि तब पाकिस्तानी खिलाड़ियों की कसम की अवधि खत्म हो जायेगी। इधर आईपीएल की तैयारी भी चल रही है। लगता नहीं है कि पाकिस्तानी खिलाड़ियों को इस बार भी मौका मिलेगा। कहीं किसी क्लब को जीतने का आदेश हो और उसमें अपनी कसम से बंधे एक दो पाकिस्तानी खिलाड़ी हारने के लिए खेले तो.......अब तो उनके लिये 2011 में ही दरवाजे खुल सकते हैं।
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कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
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23 जनवरी 2010

बाजारू खेल में देशप्रेम ढूंढने का प्रयास-आलेख (cricket aur deshprem-hindi lekh)

भारत में चलने वाली एक क्लब स्तरीय प्रतियोगिता में पाकिस्तानी खिलाड़ियों को नीलामी में किसी ने नहीं खरीदा तो दोनों देशों में हो हल्ला मच गया है। किसी मनुष्य की नीलामी! बहुत आश्चर्य हो रहा है! यह तो गनीमत है कि इस देश में अधिकतर संख्या अभी भी अशिक्षित और अखबार न पढ़ने वाले लोगों की है वरना सारे देश मुंह खुला रह जाता और हर घर में चर्चा हो रही होती। कुछ लोग दुःखी होते तो कुछ खुश!
जब हम जैसा लेखक लिखता है तो अध्यात्म या धर्म की चर्चा न करे यह संभव नहीं हो पाता क्योंकि कहीं न कहीं लगता है कि एक तरफ लोग भारत के विश्व में अध्यात्मिक गुरु होने की बात करते हैं दूसरी तरफ अपने ही लोग जाते उल्टी दिशा में ही है। भारत से बाहर पनपी विचाराधाराओं के बारे में कहा जाता है कि वह मनुष्य को मनुष्य की गुलामी से बचाने के लिये प्रवाहित हुईं हैं। एक पश्चिमी देव पुरुष ने तो अपने कबीले के लोगों को गुलामी से मुक्ति के लिये संघर्ष किया। उसने गुलामी से अपने लोगों को मुक्त होने की प्रेरणा दी। उसकी जीवनी पर एक ंविदेशी हिन्दी टीवी चैनल ने ही कार्यक्रम दिखाया था जिसमें गुलामों की बकायदा नीलामी दिखाई जा रही थी। भारत में बंधुआ मजदूरी की परंपरा रही है पर उसमें कहीं ऐसी नीलामी की चर्चा नहीं होती जिसमें एक मालिक अपने गुलाम को दूसरे मालिक के हाथ बेचता है। कहने का तात्पर्य यह है कि जिस गुलामी और नीलामी की परंपरा का पश्चिमी सभ्यता ने करीब करीब त्याग दिया है उसी को भारतीय धनपतियों ने क्रिकेट के सहारे यहां जिंदा किया। धन्य है धन की महिमा!
क्ल्ब स्तरीय प्रतियोगिता को कोई अधिक भावनात्मक महत्व नहीं है और इसके मैच क्रिकेट के वही समर्थक देखते हैं जिनको उस समय कोई कामकाज नहीं होता है-जिन लोगों को कामकाज होता है वह ऐसे मैच में समय खराब नहीं करते क्योंकि अंतर्राष्ट्रीय स्तर के मैच ही उनको इसके लिये उपयुक्त लगते हैं। कहने वाले तो यह भी कहते हैं कि यह मैच दर्शकों के नंबर एक धन के साथ ही उस पर दांव खेलने वालो मूर्खों के धन से भी चलते हैं। मैच फिक्सिंग की वजह से बदनाम क्रिकेट हुई है और अंतर्राष्ट्रीय स्तर के मैच जोखिम वाले हो गये हैं इसलिये इन क्लब स्तरीय मैचों को आयोजित किया जा रहा है क्योंकि इसमें राष्ट्रप्रेम जैसी कोई चीज नहीं होती और फिक्सिंग की बात सामने आने उसके आहत होने वाली कोई बात हो।
ऐसे में पाकिस्तानी खिलाड़ियों के लिये नीलाम बोली न लगाना कोई राष्ट्रीय विषय नहीं होना चाहिये था पर इसे बनाया गया। पाकिस्तान में मातम मन रहा है तो उसके लिये स्यापा करने वाले कुछ लोग यहां भी हैं। उससे अधिक हैरान होने वाली बात तो यह कि उस पर खुश होने वाले भी बहुत हैं। कुछ लोगों ने तो भारतीय नेताओं पर आक्षेप करते हुए धनपतियों को महान बता डाला तो कुछ ने पाकिस्तान को अपने यहां भी ऐसा आयोजन करने का मजाकिया संदेश दिया। लगता है कि लोग समझे ही नहीं। लोग इसे पाकिस्तान पर एक फतह समझ रहे हैं और भारतीय धनपतियों को नायक! बाजार, सौदागर और उसके बंधुआ प्रचार माध्यमों का खेल को अगर नहीं समझेंगे तो यह भ्रम बना रहेगा।
जब भारत में कुछ लोग पाकिस्तानी खिलाड़ियों के लिये नीलाम बोली न लगने का जश्न मना रहे थे तब उस क्लब स्तरीय आयोजकों की एक प्रवक्ता अभिनेत्री एक संवाद सम्मेलन में यह बता रही थी कि ‘पाकिस्तान के खिलाड़ियों को यहां के ही कुछ लोगों की धमकियों की वजह से यहां न बुलाया गया।’
यह होना ही था। भारत की फिल्म और क्रिकेट को आर्थिक रूप से प्रभावित करने वाली कुछ ताकतें पाकिस्तान में हैं या नहीं कहना कठिन है पर इतना तय है कि भारतीय धनपतियों का मायावी संसार मध्य एशिया पर बहुत निर्भर करता है। पूरा मध्य एशिया भारत को रोकने के लिये पाकिस्तान का उपयोग करता है। यह संभव नहीं है कि भारत की कुछ आर्थिक ताकतें पाकिस्तान की अवहेलना कर सकें। इनकी मुश्किल दूसरी भी है कि पश्चिम के बिना भी यह भारतीय आर्थिक ताकतें नहीं चल सकती क्योंकि अंततः उनके धन संरक्षण के स्त्रोत वहीं हैं। यही पश्चिम पाकिस्तान से बहुत चिढ़ा हुआ है। पहले इस निर्णय के द्वारा पश्चिमी देशों को भी पाकिस्तान से दूरी का संकेत भेजा गया और भारत के कुछ संगठनों की धमकी की बात कर पाकिस्तान पर मरहम लगाया गया। भारतीय धनपतियों के नायकत्व की पोल तो उनकी प्रवक्ता वालीवुड अभिनेत्री के बयान से खुल ही गयी। इस लेखक ने कल अपने एक लेख में पाकिस्तान प्रचार युद्ध में भारत से हारने पर अपने मध्य एशिया मित्रों की मदद लेने का जिक्र किया था। यही कारण है कि क्लब स्तरीय प्रतियोगिता के आयोजकों को यह सब कहना पड़ा कि ‘यहां के कुछ संगठनों की धमकियों की वजह से ऐसा किया गया।’
यह संगठन कौन है? इशारा सभी समझ गये पर सच यह है कि ‘पाकिस्तानी खिलाड़ियों को यहां न बुलाने के लिये किसी ने बहुत बड़े संगठन ने धमकी दी हो ऐसा कहीं अखबारों में पढ़ने को नहीं मिला। इन संगठनों से लोगों को जरूर भारतीय धनपतियों का आभारी होना चाहिये जो उन्हें बैठे बिठाये इस तरह का श्रेय मिल गया।
हमें इन बातों पर यकीन नहीं है। कम से कम क्रिकेट में अब हमारे अंदर देशप्रेम जैसा कोई भाव नहीं है क्योंकि हमारे देश का राष्ट्रीय खेल तो हाकी है। इस निर्णय के पीछे दूसरा ही खेल नजर आ रहा है। इस तरह के फैसले में क्या छिपा हो सकता है? यह क्रमवार नीचे लिख रहे हैं।
1-सन् 2007 में पचास ओवरीय क्रिकेट प्रतियोगिता में भारत के हारने के बाद क्रिकेट की लोकप्रियता एकदम गिर गयी। तीन महान खिलाड़ियों के विज्ञापन तक टीवी चैनलों ने रोक दिये। एक वर्ष बाद हुई बीस ओवरीय प्रतियोगिता में विश्व कप में भारत जीता(!) तो फिर लोकप्रियता बहाल हुई। उसके बाद ही यह क्ल्ब स्तरीय प्रतियोगिता भी शुरु हुई और उसमें वही तीन महान खिलाड़ी भी शामिल होते हैं जिनको अभी तक भारत क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड की की बीस ओवरीय टीम के योग्य समझा नहीं जाता मगर बाजार के विज्ञापनों में उनकी उपस्थिति निरंतर रहती है। इन्हीं खिलाड़ियों की छवि भुनाने के लिये यह प्रतियोगिता आयोजित की जाती है इसमें पाकिस्तानी खिलाड़ियों का कोई अधिक महत्व नहीं है।
2-अंतिम बीस ओवरी प्रतियोगिता पाकिस्तान ने जीती और भारत का प्रदर्शन अत्यंत निराशाजनक रहा। इससे यकीनन क्रिकेट की लोकप्रियता गिरती लग रही है। कम से कम इस बीस ओवरीय प्रतियोगिता की लोकप्रियता अब संदिग्ध हो रही है। ऐसे में हो सकता है कि भारत के लोगों में राष्ट्रीय प्रेम और विजय का भाव पैदा कर इसके लिये उनमें आकर्षण पैदा करने का प्रयास हो सकता है। वैसे शुद्ध रूप से क्रिकेट प्रेमी अंतर्राट्रीय मैचों में दिलचस्पी लेते हैं पर ऐसे नवधनाढ्य लोगों के लिये यह क्लब स्तरीय मैच भी कम मजेदार नहीं होते। दूसरी बात यह है कि इन प्रतियोगिताओं में खेलने वालों को विज्ञापन के द्वारा भी धन दिलवाना पड़ता है। 26/11 के बाद भारत के जो स्थिति बनी है उसके बाद फिलहाल यह संभव नहीं है कि भारत में किसी पाकिस्तानी क्रिकेट खिलाड़ी का विज्ञापन देखने को लोग तैयार हों।
3-संदेह का कारण यह है कि अनेक देशों की टीमों के खिलाड़ियों की बोली नहीं लगी पर पाकिस्तान का जिक्र ही क्यों आया? अभिनेत्री प्रवक्ता आखिर यह क्यों कहा कि ‘यहां के कुछ लोगों की धमकी की वजह से ऐसा हुआ’, अन्य देशों की बात क्यों नहीं बतायी। संभव है कि यह प्रश्न ही प्रायोजित ढंग से किया गया हो। संदेह के घेरे में अनेक लोग हैं जो पाकिस्तान के लिये अपना प्रेम प्रदर्शन कर रहे हैं पर दूसरों के लिये खामोश हैं। दरअसल भारत में एक खास वर्ग है जो पाकिस्तान की चर्चा बनाये रखकर वहां के लोगों को खुश रखना चाहता है।
हमने पहले भी लिखा था कि भारत और पाकिस्तान का खास वर्ग आपस में मैत्री भाव बनाये रखता है और इस तरह उसका व्यवहार है कि दोनों देशों के आम नागरिक ही एक दूसरे के दुश्मन हैं। अभिनेत्री के बयान से यह सिद्ध तो हो गया कि कम से कम उसके अंदर पाकिस्तान के लिये शत्रुता का भाव नहीं है और पाकिस्तान क्रिके्रट खिलाड़ी भी भारत के मित्र हैं। इसका सीधा आशय यही है कि आम लोग ही पाकिस्तान के आम लोगों के शत्रु हैं।
कहने का अभिप्राय यह है कि पाकिस्तान के खिलाड़ियों की इस प्रतियोगिता में नीलाम बोली न लगना इस देश में राष्ट्रप्रेम के जज़्बात भुनाकर उसे अपने फायदे के लिये भी उपयोग करना हो सकता है। सबसे बड़ी बात यह है कि धनाढ्य वर्ग तो वैसे भी अपने व्यवसायिक हितों की वजह से नहीं लड़ता ऐसे आर्थिक उदारीकरण के इस युग में बाजार और सौदागर से एक बाजारु खेल में देशप्रेम की छवि दिखाने की आशा करना बेकार है। खासतौर से तब जब यहां का भारत का एक बहुत बड़ा तबका क्रिकेट को जानता नहीं है या फिर इसे अधिक महत्व नहीं देता। अलबत्ता बौद्धिक विलास में रत लोगों के लिये यह एक अच्छा विषय भी हो सकता है। एक आम लेखक के लिये यह संभव नहीं है कि वह कहीं से वास्तविक तथ्य जुटा सके। ऐसे में अखबारों और टीवी पर प्रसारित खबरों के आधार पर ही हम यह बातें लिख रहे हैं। सच क्या है! यह तो खास वर्ग के लोग ही जाने!
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5 दिसंबर 2008

जंग के लिए मित्रों का जमावडा जरूरी -आलेख

1971 का भारत पाक युद्ध जिन लोगों ने देखा है वह यह बता सकते हैं कि उसमें इस देश ने क्या पाया और खोया? सच तो यह है कि वहां से इस देश के हालत बिगड़े तो फिर कभी संभले ही नहीं। भारतीय अर्थव्यवस्था में महंगाई और बेरोजगारी का दौर शुरू हुआ तो वह आज तक थमा ही नहीं है।

कुछ लोगों को लगता है कि देश का प्रबुद्ध वर्ग केवल बहस कर ही अपना काम चलाता है पर इसका कारण यह है कि 1971 के युद्ध की विजय का उन्माद जब थम गया तब उसके बाद जो हालत इस देश में हुए उसकी कल्पना नहीं की जा सकती। सच तो यह है कि युद्ध के बाद इस देश के आम और खास दोनों प्रकार कम आदमियों में नैतिक चरित्र का गिरावट का ही प्रमाण मिला। उस सयम अमेरिका सहित अनेक देशों ने भारत पर प्रतिबंध लगाये थे जिससे देश में खाद्य सामग्री के साथ ही मिट्टी के तेल का संकट भी शुरू हो गया था। उस समय बाजार में सामान्य ढंग से उपलब्ध गेहूं, चावल, शक्कर,डालडा घी, मिट्टी का तेल, लक्स और लाईफबाय साबुन बाजार से गायब हो गये और उनको राशन की दुकानों पर बेचा जाने लगा। वैसे उस समय कालाबाजार का दौर शुरू हो गया पर आम आदमी की अधीरता का परिचय दे रहा था। लोगों ने मिट्टी के तेल के कनस्तर भरकर घर में रख लिये जैसे कि एक दिन फिर वह मिलने वाला ही न हो। लाईफबाय और लक्स साबुन को वह लोग भी राशन से लेने लगे जो उसका उपयोग नहीं करते थे। उनको भी यह डर लगने लगा कि कहीं अन्य साबुन मिलना भी बाजार में बंद न हो जाये। जिन लोगों को अपने काम से फुरसत नहीं थी वह अपने बच्चों को इस काम में लगाने लगे। लोग उस समय आवश्यकता से अधिक संग्रह कर रहे थे गोया कि बाजार में प्रलय हो जायेगी। आशय यह है कि फिलहाल तो लोग युद्ध की बात कर रहे हैं पर क्या वह उसके समाप्त होने पर अपने भविष्य को लेकर धीरज रख पायेंगे?

युद्ध के बाद बंग्लादेश की सहायता के लिये कर लगाया गया जो बहुत समय तक चला। अनेक चीजों में वह कर लगा था पर पता नहीं वह सभी सरकारी खजाने में जमा हुआ कि नहीं। आज के अनेक प्रबुद्ध लोगों ने यह दृश्य देखे हैं और इसलिये ही वह दोनों देशों के बीच बृहत युद्ध के विचार को खारिज करते हैं। अंतर्जाल पर अनेक ब्लाग लेखकों ने देश के खास वर्ग के लोगों के नैतिक चरित्र पर उंगली उठायी है पर उनको यहां के आम आदमी का चरित्र भी देखना चाहिये। 1971 का युद्ध जब तक चला खूब उन्माद था। लोग रातभर जागकर अपनी गलियों,मोहल्लों में पहरा देते थे कि कहीं दुश्मन का जासूस न आ जाये। जैसे ही युद्ध समाप्त हुआ सभी लोगे अपने स्वार्थ पूर्ति को लेकर अधीर हो गये और उसके बाद भारतीय अर्थव्यव्स्था में गरीब और अमीर के बीच का भेद बढ़ता ही गया और कालांतर में वह इतना विकराल रूप ले बैठा जिसे आज भी देश भुगत रहा है।
1971 में भारत ने जिस बंग्लादेश को आजाद कराया वह भी कोई पाकिस्तान से कम खतरनाक नहीं है। उसके यहां आतंकवादियों के अनेक शिविर है पर वह उनसे इंकार करता है। पूर्वांचल में चल रहा आतंक केवल उसी के सहारे चल रहा है और इस पर भी वह भारत को आंखें दिखाता है। सच बात तो यह है कि 1971 का विजय अपने आप में एक भ्रम साबित हुई है। ऐसे मेें 37 वर्ष बाद किसी ऐसे दूसरे युद्ध को बिना सोचे प्रारंभ करने का प्रबुद्ध लोग विरोध कर रहे हैं तो उनकी बात भी विचारणीय है पर इसका मतलब यह नहीं है कि कोई सीमित कार्यवाही नहीं की जानी चाहिये।

इसके लिये पाकिस्तान की अंदरूनी स्थिति का फायदा उठाना कोई मुश्किल काम नहीं है। पाकिस्तान में पंजाब प्रांत के प्रभाव का उसके तीन अन्य प्रांतों-सिंध, बलूचिस्तान और सीमा प्रांत में जमकर विरोध होता है। देखा जाये तो पाकिस्तान ने मजहब पर आधारित आतंकवाद को अपने देश में पनाह देकर अपने देश को एक ही किया यह अलग बात है कि अब यह आतंकी अपना खेल उसके इन्हीं क्षेत्रों में दिखाने लगे। आज भी पाकिस्तान का संविधान उसके एक बहुत बड़े भूभाग पर नहीं चलता। ऐसे ही भूभाग पर उसने विदेशी आतंकियों को स्थापित किया है जिनकी वजह से वहां के लोग उसके नियंत्रण में है।
अफगानिस्तान पर सोवियत संध के कब्जे के बाद जब अमेरिका ने उसके खिलाफ युद्ध शुरू किया तो बलूचिस्तान और सीमा प्रात में आतंकवादियों के अड्डे बनाये। सोवियत संघ के वहां से हटने के बाद अमेरिका ने भी उन आतंकियों से मूंह फेर दिया पर उन्होंने इसका बदला उसके यहां वर्डट्रेड सेंटर ध्वस्त कर लिया। उसके बाद अमेरिका ने आतंकवादियों के विरुद्ध जंग छेड़ ली और किसी न किसी स्तर पर भारत ने उसका समर्थन दिया।

अब अमेरिका के समर्थन की भारत को दरकरार है। सच तो यह है कि वह इस समय विश्व का सर्वाधिक संपन्न और शक्तिशाली राष्ट्र है पर वह भारत विरोधी आतंकियों के प्रति उसका रवैया उतना सख्त नहीं है। अब अगर वह भारत को समर्थन देकर आतंकियों के शिविरों को तहस नहस करने के लिये समर्थन देता है तभी कोई सीमित सैन्य कार्यवाही की जा सकती है। उसके बिना ऐसा करने पर बृहद युद्ध छिड़ जाने की आशंका भी बलवती हो सकती है। अब जो कूटनीतिक गतिविधियां विश्व के परिदृश्य पर उभर रही हैं उससे यह कहना आसान नहीं है कि भारत कोई सीमित कार्यवाही भी कर सकेगा। अमेरिका अगर यह मान लेता है कि भारत विरोधी आतंकी उसके भी दुश्मन है तो ठीक है। इसके विपरीत अगर वह अमेरिका को यह समझाने में सफल हो जाते हैं कि वह उसके विरोधी नहीं हैं तो शायद वह वैसा समर्थन नहीं दे। वैसे अमेरिका ने अभी पूरी तरह अपने पते नहीं खोले हैं पर इतना तय है कि वह पाकिस्तान के प्रति अभी झुका हुआ है पर उसे अब भारत के प्रति भी अपना समर्थन व्यक्त करना होगा क्योंकि यह तो वह भी मानता है आतंकवाद के विरुद्ध संघर्ष में भारत का उसे सहयोग मिलता रहा है। 1971 में भारत की विजय पर उसी ने ही प्रतिबंध लगाकर पानी फेरा था यह इस देश का प्रबुद्ध वर्ग जानता हैं। यह तब की बात है कि जब वह इतना शक्तिशाली नहीं था।
मगर यह सभी अनुमान है। आगे कैसा समय आने वाला है यह कहना कठिन है। अपने जन्म के बाद भारी मंदी से जूझ रहे अमेरिका को कई तरह से भारत की आवश्यकता है। ऐसे में यह भी संभव है कि वह कोई ऐसी योजना बना रहा हो जिससे कि सांप भी मर जाये और लाठी भी न टूटे। पाकिस्तान पर उसकी पकड़ स्पष्ट है और इसके बावजूद अगर वहां भारत विरोधी आतंकी मौजूद हैं तो शक के घेर में वह स्वयं भी आ जाता है। कुल मिलाकर मामला यह है कि भारत को विश्व के सभी देशों को साथ लेकर कोई कार्यवाही करनी होगी क्योंकि अकेले तो अमेरिका भी अभी आंतकवाद के विरुद्ध विजय प्राप्त नहीं कर सका है। किसी युद्ध में विजय अनिश्चित होती है इसलिये काफी विचार कर ही उसे शुरु करना चाहिये। युद्ध से पहले अपने मित्रों का जमावड़ा बड़ी संख्या में करना चाहिये ताकि समय आने पर वह मदद कर सकें।
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