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22 अगस्त 2009

जिन्न, भिन्न और खिन्न-हास्य कविताएँ (jinna, bhinna aur khinna-hasya kavitaen)

लिखो कोई किताब
नायक बनाओ कोई जिन्न।
चाहे जो भाषा हो
चाहे जैसे शब्द हों
मतलब से परे हो सारी सामग्री
पर दिखना चाहिए कुछ भिन्न।
किसी के जख्म सहलाना
या दर्दनाक गीत गाना
अब हिट होने का फार्मूला नहीं रहा
जीत लो दुनियां अपने शब्दों से
करके लोगों का मन खिन्न।
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गढ़े हुए मुर्दे जमीन में खाक हो गये
कुछ जलकर राख हो गये
मगर फिर भी उनके नाम की
पट्टिका अपनी किताब पर लगाओ।
जिंदा आदमी पर लिखे शब्दों के लिये
आज का जमाना प्रमाण मांगता है
जिस पर लिखो
वह भी अपनी हांकता है
मरे हुए लोगों के नाम
अपने शब्दों में सजाकर सफल लेखक कहलाओ।
मुर्दे बोलते नहीं हैं
जज्बाती लोग भी उनका चरित्र तोलते नहीं है
इसलिये कोई मुर्दा नायक बनाओ।

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6 अगस्त 2009

इश्क गुरु की सलाह काम न आई-हास्य कविता (ishq guru aur chela-hasya kavita)

आशिक शिष्य ने अपने इश्क गुरु से कहा
‘‘आदरणीय
फिर एक माशुका मेरी जिंदगी में आई
पर उसने मेरा इश्क का मामला
मंजूर करने से पहले
सच बोलने वाली मशीन के सामने
साक्षात्कार की शर्त लगाई।
आपसे सलाह लेकर अपने इश्क के मसले
सुलझाने में पहले भी
मदद नहीं मिली
इसलिये इस बार इरादा नहीं था
आपके पास आने का
पर क्या करता जो यह
एकदम नई समस्या आई।’’

इश्क गुरु ने कहा
‘‘कमबख्त! हर बार पाठ पढ़ जाता है
नाकाम होकर फिर लौट आता है
मेरे कितने चेले इश्क में इतिहास बना चुके हैं
पर केवल तेरी वजह से
मुझे असफल इश्क गुरु कहा जाता है
इस बार तुम घबड़ाना नहीं
सच का सामना करने के लिये
मैदान पर उतर जा
रख दे माशुका से भी
सच का सामना करने की शर्त
उसकी असलियत की भी उधड़ेगी पर्त
वह घबड़ा जायेगी
अपनी शर्त भूल जायेगी
तुम्हारी अक्लमंदी देखकर कर लेगी
जल्दी सगाई।’’

कुछ दिन लौटकर चेला
गुरु के सामने आया
चेहरे से ऐसा लगा जैसे पूरे जमाने ने
उस अकेले को सताया
बोला दण्डवत होकर
‘’गुरु जी, आपका पाठ इस बार भी
काम न आया
माशुका सुनकर मेरा प्रस्ताव
कुछ न बोली
बाद में उसने यह संदेश भिजवाया कि
‘भले ही न करना था
सच की मशीन का सामना
कोई बात नहीं थी
पर मुझ पर मेरी शर्त थोपकर
तुमने मेरा विश्वास गंवाया
इसलिये तय किया कि
किसी दूसरे से सच का सामना
करने के लिये नहीं कहूंगी
पर तुमने शर्त नहीं मानी
इसलिये आगे तुम्हारे इश्क को
अब दर्द की तरह नहीं सहूंगी
कर ली मैंने
अपने माता पिता के चुने लड़के से ही सगाई’
अफसोस! इस बार भी गुरु की सलाह
काम न आई’’

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24 जुलाई 2009

दिल के खेल का हिट फार्मूला- हास्य कविता ( hasya kavita)

एक अभिनेत्री के स्वयंबर
धारावाहिक से प्रभावित होकर
निर्देशक ने अपने लेखक से कहा
‘अपनी फिल्म की अभिनेत्री के लिये
कोई स्वयंबर का दृश्य लिखकर लाओ
भले ही कहानी का हिस्सा नहीं है
पर तुम उसके लिये सपना या ख्वाब बनाओ
मगर याद रखना अपनी फिल्म का हीरो ही
वह स्वयंबर जीते
साथ ही उसमें एक गाना भी हो
जिसमें लोग नजर आयें शराब पीते
मैंने समझा दिया तुम अब दृश्य लिख लाओ।’

लेखक ने कहा-
‘स्वयंबर का दृश्य ख्वाब में भी लिख देता
पर यह अभिनेता और अभिनेत्री
असल जिंदगी और फिल्म दोनों में
आशिक माशुका का रिश्ता बनाये हुए हैं
इसलिये लोगों को नहीं जमेगा।
स्वयंबर का दृश्य तो
प्यार और विवाह से पहले लिखा जाता है
इस कहानी में नायक पहले ही
गुंडों से बचाकर
नायिका का दिल जीत चुका है,
बस उसका काम
माता पिता की अनुमति पर रुका है,
फिर आप किस चक्कर में पड़े हो
अपनी फिल्मों में
नायक द्वारा नायिका को
गुंडों से बचाने का दृश्य
कभी स्वयंबर से कम नहीं होता
स्वयंबर में तो टूटता है धनुष
या मछली की आंख फूटती है,
अपने फिल्मी स्वयंबर में तो
एक साथ अनेक खलनायकों की
टांग टूटती है,
दूसरे का खून बहते देखकर
जनता असल मजा लूटती है,
आपको मजा नहीं आ रहा तो
नायक द्वारा नायिका को बचाने के दृश्य में
कुछ गुंडों की संख्या बढ़ाओ
दिल के खेल में यही हिट फार्मूला है
कोई नया न आजमाओ।

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22 मई 2009

गुस्से ने हास्य कवि बनाया-हास्य कविता (hasya kavita)

हास्य कवि ढूंढ रहा था
कोई जोरदार कविता
मिल गयी पुरानी प्रेमिका
जिसका नाम भी था कविता।

उसे देखते ही चहकते हुए वह बोली
‘’अरे, कवि
तुम भी अब बुढ़ाने लगे हो
फिर भी बाज नहीं आते
हास्य कविता गुड़गुड़ाने लगे हो
शर्म नहीं आती
पर मुझे बहुत आती
जब पति के सामने
तुम्हारे पुराने प्रेम का किस्सा सुनाती
तब वह बिफर कर कहते हैं
‘क्या बेतुके हास्य कवि से इश्क लड़ाया
मेरा जीवन ही एक मजाक बनाया
कोई श्रृंगार रस वाला कवि नहीं मिला
जो ऐसे हास्य कवि से प्रेम रचाया
जिसका सभी जगह होता गिला
कहीं सड़े टमाटर फिकते हैं
तो कहीं अंड़े पड़ते दिखते हैं’
उनकी बात सुनकर दुःख होता है
सच यह है तुम्हारी वजह से
मैंने अपना पूरा जीवन ही नरक बनाया
फिर भी इस बात की खुशी है
कि मेरे प्यार ने एक आदमी को कवि बनाया’

उसकी बात सुनकर कवि ने कहा
‘मेरे बेतुके हास्य कवि होने पर
मेरी पत्नी को भी शर्म आती है
पर वह थी मेरी पांचवी प्रेमिका
जिसके मिलन ने ही मुझे हास्य कवि बनाया
प्रेम में गंभीर लगता है
पर मिलन मजाक है
यह बाद में समझ आया।
गलतफहमी में मत रहना कि
तुमने कवि बनाया।
तुम्हारे साथ अकेले नहीं
बल्कि पांच के साथ मैंने प्रेम रचाया।
तुम्हारी कद काठी देखकर लगता है कि
अच्छा हुआ तुमसे विरह पाया
कहीं हो जाता मिलन तो
शायद गमों में शायरी लिखता
जिंदगी का बोझ शेरों में ढोता दिखता।
भले ही घर में अपनी गोटी गलत फिट है
पर हास्य कविता कुछ हिट है
दहेज में मिला ढेर सारा सामान
साथ में मिला बहुत बड़ा मकान
जिसके किराये से घर चलता है
उसी पर अपना काव्य पलता है
तुमसे भागकर शादी की होती
तो मेरी जेब ही सारा बोझ ढोती
तब भला कौन सुनता गम की कविता
पांचवीं प्रेमिका और वर्तमान पत्नी भी
कम नहीं है
पर उसके गुस्से ने
मुझे हास्य कवि बनाया

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22 सितंबर 2008

कर्ज के मर्ज का इलाज कहीं नहीं मिलता है-हिंदी शायरी

बाजार अब केवल सड़क पर ही नहीं सजते
उनके बैंड तो अब घर घर बजते
विज्ञापन के युग का हुआ है यही असर
जेब में पैसा नहीं हो फिर भी
खरीददार तो कर्ज लेकर चीज लाने के लिये सजते
फिर तो आगे किश्तों की खाई है
उससे भला लोग कहां बचते
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किश्तों में खरीदने के लिये
कर्ज भी मिलता है
सच है मर्ज भी किश्तों में
शरीर को मिलता है
उसके इलाज के लिय भी कर्ज मिलता है
जब तब इंसान के जिस्म में खून है
उसे पीने के लिये
मच्छर तो हर जगह है मौजूद
रोज की कहानियों कोई न कोई
हादसा दर्ज होता
पर कर्ज के मर्ज का इलाज कहीं नहीं मिलता
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10 सितंबर 2008

महामशीन कैसे महादानव बन जायेगी-हास्य कविता mahamashin aur mahadanav

बहुत शोर सुना था
महामशीन बन जायेगी
महादानव और
पूरी धरती काले छेद में घुस जायेगी
ऐसा नहीं होना था, नहीं हुआ
क्योंकि हाड़मांस की दानव भी
भस्मासुर जैसे महादानव तभी बनते थे
जब करते थे भारी तपस्या
इंसानी फितरत से बने लोहे के ढांचे का क्या
जो दुनियां ढह जायेगी
देवता तो वह इंसान स्वयं नहीं बनता
महादानव की कल्पना भी भला
कैसे साकार हो पायेगी
यारों, शोर चाहे जितना मचा लो
तपस्या से ही बनता है महान
देवता हो या दानव
भूल जाता है यह बात मानव
बिना तप के केवल
कल्पना तो कल्पना ही रह जायेगी

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