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8 अक्टूबर 2008

ख्याली पुलाव किसके लिए पकाना-हिन्दी शायरी


अब दिल नहीं भरता किसी की तस्वीर से
लड़ते लड़ते हार गये अब अपने तकदीर से
अपने दिल में मोहब्बत सजा कर रखी थी कई बरस
पर कभी उनको नहीं आया हमारी बक्रारे पर तरस
हर बार उनके इन्तजार के सन्देश लगे तीर से
लगता है अब तस्वीरों से क्या दिल लगाना
ख्याली पुलाव भला किसके लिए पकाना
इसलिए अपने लिए खुद ही बन जाते हैं पीर से

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4 अक्टूबर 2008

अपने अह्सास अकेले में ही सजाना अच्छा लग्ता है-हिंदी शायरी

अपने अह्सासों की धारा में
बह्ते जाना ही अच्छा लगता है
लोगों की मह्फ़िल में
अपने दर्द का हाल सुनाकर
उनका दिल बहलाने से
अपने दिलदिमाग में
उठती गिरती ख्यालों की लह्रों में
डूबना उतरना अच्छा लगता है
बयां करो जो अपने दिल का दर्द
बनता है हमदर्द सामने दिखाने के लिये
पूरा ज़माना
पर नज़रों से हटते ही
हंसता है हमारे हाल पर
इसलिये अकेले में ही
अपनी सोच और ख्याल में
अपने अह्सास सजाना
कही ज्यादा अच्छा लगता है

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29 जुलाई 2008

पहरेदारी अपने घर की किसे सौपे-हिन्दी शायरी


लुट जाने का खतरा अब
गैरो से नहीं सताता
अपनों को ही यह काम
अच्छी तरह करना आता

पहरेदारी अपने घर की किसे सौपे
यकीन किसी पर नहीं आता
जहां भी देखा है लुटते हुए लोगों को
अपनों का हाथ नजर आता
कई बाग उजड़ गये हैं
माली अब फूल नहीं लगाता
इंतजार रहता है उसे
कोई आकर लगा जाये पेड़ तो
वह उसे बेच आये बाजार में
इस तरह अपना घर सजाता
नाम के लिये करते हैं मोहब्बत
बेईमानी से उनकी है सोहबत
जमाने के भलाई का लगाते जो लोग नारा
लूट में उनको ही मजा आता
कहें भारतदीप
मन में है उथलपुथल तो
अमन कहां से आयेगा यहां
जिनके हाथ में बागडोर होती चमन की
किसी और से क्या खतरा होगा
वही उसका दुश्मन हो जाता
..................................

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