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1 जुलाई 2009

सच्चे इंसान की तस्वीर-हिंदी शायरी

कभी कोई आंखें कातर भाव से
तुम्हारी तरफ ताकती हैं
क्या उन पर रहम खाते हो?

उठते नहीं हाथ मांगने के लिये
पर उनकी छोटी चाहतें
तुम्हारे सामने खड़ी होती हंै
क्या उनको पूरा कर पाते हो?

उठा रहे हैं बरसों से
जो कंधे जमाने का बोझ
क्या उनकी पीठ सहलाते हो?

कोई थक गया है
लड़ते हुए उसूलों की जंग
क्या कभी उससे हमदर्दी दिखाते हो?

आदमी जिंदा बहुत हैं
पर जिंदादिल वही है
जो अपने मतलब की दुनियां से
बाहर निकल कर
पराया दर्द देख पाते हैं
बिना कहे किसी के
दूसरे का दर्द समझ पाते हैं
बिना मतलब के ही
बेबसों की मदद कर जाते हैं
क्या सच्चे इंसान की तस्वीर से
कभी अपना चेहरा मिलाते हो?

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6 अगस्त 2008

जीवन के उतर-चढाव के साथ चलता आदमी-हिन्दी शायरी

जीवन के उतार चढाव के साथ
चलता हुआ आदमी
कभी बेबस तो कभी दबंग हो जाता
सब कुछ जानने का भ्रम
उसमें जब जा जाता तब
अपने आपसे दूर हो जाता आदमी

दुख पहाड़ लगते
सुख लगता सिंहासन
खुली आँखों से देखता जीवन
मन की उथल-पुथल के साथ
उठता-बैठता
पर जीवन का सच समझ नहीं पाता
जब अपने से हटा लेता अपनी नजर तब
अपने आप से दूर हो जाता आदमी

मेलों में तलाशता अमन
सर्वशक्तिमान के द्वार पर
ढूँढता दिल के लिए अमन
दौलत के ढेर पर
सवारी करता शौहरत के शेर पर
अपने इर्द-गिर्द ढूँढता वफादार
अपने विश्वास का महल खडा करता
उन लोगों के सहारे
जिनका कोई नहीं होता आधार तब
अपने आपसे दूर हो जाता आदमी

जमीन से ऊपर अपने को देखता
अपनी असलियत से मुहँ फेरता
लाचार के लिए जिसके मन में दर्द नहीं
किसी को धोखा देने में कोई हर्ज नहीं
अपने काम के लिए किसी भी
राह पर चलने को तैयार होता है तब
अपने आपसे दूर हो जाता आदमी

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