यह अव्यवसायिक ब्लॉग/पत्रिका है तथा इसमें लेखक की मौलिक एवं स्वरचित रचनाएं प्रकाशित है. इन रचनाओं को अन्य कहीं प्रकाशन के लिए पूर्व अनुमति लेना जरूरी है. ब्लॉग लेखकों को यह ब्लॉग लिंक करने की अनुमति है पर अन्य व्यवसायिक प्रकाशनों को यहाँ प्रकाशित रचनाओं के लिए पूर्व सूचना देकर अनुमति लेना आवश्यक है. लेखक संपादक-दीपक भारतदीप,ग्वालियर
13 अक्टूबर 2008
क्या प्यार और जंग में कुछ भी करना ठीक है-आलेख
प्रेम में सिर्फ लाभ और लोभ का भाव है। स्त्री से प्रेम है तो केवल उसके शारीरिक सौन्दर्य के आकर्षण के कारण और पुरुष है तो उसके धन के कारण है-यही कहती है पश्चिम की धारणा। पर हमारा दर्शन कहता है कि इस जीवन में भौतिक आकर्षण क्षणिक है और उसे मानसिक संतोष नहीं प्राप्त होता अत: निस्वार्थ प्रेम करना चाहिए जिससे मन में विकार का भाव न आये और जिससे हम प्रेम करें उससे सात्विक रुप से देखें उसमे गुण देखे और अगर उसमें दोष दिखायी दें तो उसे सचेत करें। उसके प्रेम से हमारे मन को संतोष होना चाहिए न कि लोभ और लालच की भावना उत्पन्न हो जो अंतत: हमारे मन में विकार उत्पन्न करती है।
प्रेम और युद्ध में सब जायज मानना इस बात का प्रतीक है कि आदमी को एकदम स्वार्थी होना चाहिये और अगर सभी लोग इस रास्ते पर चलने लगें तो विश्व में सहकारिता, सदभाव और सदाचार की भावना ही खत्म हो जायेगी।
<,blockquote>यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिकालेखक संपादक-दीपक भारतदीप
12 अक्टूबर 2008
भारत की तरक्की चमत्कार नहीं है-आलेख
"द फाल ऑफ़ ए डायनेस्टी, दिल्ली १८५७" किताब के लेखक जाने-माने इतिहासकार विलियम डेरिम्पल के अनुसार पश्चिमी मीडिया के यह सोच ही गलत है कि भारत की तरक्की अपने आप में कोई 'चमत्कार' है। उनकी राय में तो यह एक बार फिर दुनिया भर के कारोबार की पुरानी परंपराओं पर लौटना मात्र है।
भारत में कुछ लोग अपने देश में भौतिक साधनों की बहुलता के चलते इतने भ्रमित हो गये हैं कि उन्हें विश्व के विकसित देशों की मुक़ाबले अपने देश का विकास अत्यंत नगण्य लगता है और कभी पहले सोवियत सोवियत संघ, जर्मनी और जापान जैसा अपने देश को बनाने का विचार आता था तो अब भारत को चीन और अमेरिका जैसा बनाने की बात चल रही है। सबसे बड़ी बात यह है जिन लोगों ने अंग्रेजी पढी है और लिखना भी सीख लिया है उन्हें अपना देश हमेशा अविकसित और पिछडा ही दिखाई देता है- उनके लिए विकास का अर्थ है केवल आर्थिक और भौतिक विकास ही है।
भारत की प्राचीन परंपराएं और संस्कार उनके लिए भोंदूपन का परिचायक है-ऐसे लोग यह जानने का प्रयास ही नहीं करते कि विश्व में भारत का सम्मान उसकी उन आध्यात्मिक और सांस्कृतिक मान्यताओं की वजह से है जिससे भौतिकता से उपजे तनाव में शांति की स्थापना होती है। भगवान् श्री राम और श्री कृष्ण के चरित्र पर आज भी विकसित राष्ट्रों में शोध चल रहे हैं और उनके संदेशों को नये संदर्भों में भी उतना उपयुक्त पाया गया है जितना प्राचीन समय में देखा जाता था। भगवान महावीर, बुद्ध और गुरूनानक जीं के संदेश आज भी उतने ही प्रासंगिक है, यह बात विदेश के विद्वान कह रहे है और हमारे देश के कुछ विद्वान लोगों को यहाँ अंधविश्वास, कुरीतिया और पिछडापन ही दिखाई देता है।
विकास!बस विकास! देश में भौतिक साधनों के कबाडे को एकत्रित करना ही विकास का परिचायक नहीं हो सकता। कबाडा मैंने इसलिये कहा क्योंकि हर वस्तु का मोडल तीन माह में पुराना हो जाता है। एक साल में नयी तकनीकी आ जाती है और अपने घर में रखी चीज ही कबाड़ दिखाई देती है। लोग कहते हैं कि चीन ने बहुत विकास किया है और उसकी चीजें बहुत सस्ती हैं। मैं उस दिन अपने घर की सफाई कर रहा था तो मैंने देखा के अनेक चीनी वस्तुओं का कबाड़ उनमें भरा पडा था। उसकी कई चीजे जो मैं सस्ती और उपयोगी समझ कर ले आया था वह एक या दो दिन और अधिक से अधिक एक सप्ताह चलीं थीं। उससे आठ गुना महंगी भारतीय वस्तुएं आज भी अपनी काम दे रहीं है। तब मुझे लगता है कि वास्तव में विश्वसनीयता ही भारत की पहचान है और मुझे इस पर गर्व होता है।
आज जो भारत का स्वरूप है वह हमारी पुरानी पीढ़ियों के परिश्रम, तपस्या और मनोबल के कारण है न कि किसी विदेशी राष्ट्र की कृपा से है। यहाँ के लोगों ने शिक्षा प्राप्त कर विदेश में नाम कमाया है और उन देशों की सेवा की है पर क्या किसी देश ने हमें परमाणु, अन्तरिक्ष या किसी अन्य क्षेत्र में हमें तकनीकी ज्ञान दिया है? कतई नहीं। अनेक भारतीय वैज्ञानिक अमेरिका की सेवा कर रहे है यहाँ उनकी इस बात पर गर्व करते हैं पर क्या अमेरिका ने कभी हमें संयुक्त राष्ट्र में स्थाई सदस्यता दिलवाने का वादा किया है ? नहीं, वह ऐसा नहीं करेगा। अभी भी भारत का नाम इस मामले में प्रस्तावित नहीं है । अगर सदस्यता मिली भी तो बिना वीटो पॉवर के मिलेगी जो कि अभी भी बहुत दूर है। हालांकि संयुक्त राष्ट्र संघ अपनी महत्ता खो चूका है और वह अमेरिका की जेबी संस्था बन कर रह गया है।
विकास केवल भौतिक ही नहीं होता वरन मानसिक शांति और और आध्यात्मिक ज्ञान होना भी उसका एक भाग है-और इस विषय में भारत का एकाधिकार है यही वजह है कि भारत को विश्व में आध्यात्म गुरू कहा जाता है। अनेक भारतीयों ने पश्चिम में जाकर आर्थिक और वैज्ञानिक क्षेत्रों में भारी-भरकम उपलब्धि प्राप्त की है पर फिर भी इस देश की छबि उनके कारण नहीं वरन महात्मा गांधी, स्वामी विवेकानंद , रामकृष्ण परमहंस और महर्षि अरविंद जैसे मनीषियों और विद्वानों के संदेशों से है-पूरा विश्व उनके संदेशों को मान्यता देता है। भौतिक विकास एक सामयिक आवश्यकता होता है पर आध्यात्मिक और मानसिक शांति के बिना उसका कोई लाभ नहीं होता। जो लोग इस देश को पश्चिम की अवधारणाओं पर चलाना चाहते हैं उन्हें यह बात समझ लेना चाहिए कि गरीबी , अशिक्षा, भ्रष्टाचार और बेरोजगारी वहां भी हैं और इसी कारण कुछ पश्चिमी देशों में विदेशियों पर हमले भी होते हैं क्योंकि वहाँ के मूल निवासियों को लगता है कि उन लोगों ने उनके अधिकारों का हनन किया है।
वैसे भी अपने देश में कहा जाता है कि दूर के ढोल सुहावने-इस उक्ति को ध्यान में रखते हुए अपने देश को किसी पश्चिमी देश की स्वरूप में ढाँचे देखने की इच्छा करने की बजाये अपने ही आध्यात्मिक ज्ञान और संस्कारों के साथ प्राचीन विज्ञान को नये संदर्भों में व्याख्या करना चाहिऐ।
<,blockquote>यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिकालेखक संपादक-दीपक भारतदीप
समस्त ब्लॉग/पत्रिका का संकलन यहाँ पढ़ें-
दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका
हिंदी मित्र पत्रिका
संबद्ध विशिष्ट पत्रिकायें
-
राम का नाम लेते हुए महलों में कदम जमा लिये-दीपक बापू कहिन (ram nam japte mahalon mein kadam jama dtla-DeepakBapukahin) - *जिसमें थक जायें वह भक्ति नहीं है* *आंसुओं में कोई शक्ति नहीं है।* *कहें दीपकबापू मन के वीर वह* *जिनमें कोई आसक्ति नहीं है।* *---* *सड़क पर चलकर नहीं देखते...8 वर्ष पहले
-
रंक का नाम जापते भी राजा बन जाते-दीपक बापू कहिन (Rank ka naam jaapte bhi raja ban jate-DeepakBapuKahin) - *रंक का नाम जापते भी राजा बन जाते, भलाई के दावे से ही मजे बन आते।* *‘दीपकबापू’ जाने राम करें सबका भला, ठगों के महल भी मुफ्त में तन जाते।।* *-----* *रुपये से...8 वर्ष पहले
-
पश्चिमी दबाव में धर्म और नाम बदलने वाले धर्मनिरपेक्षता का नाटक करते रहेंगे-हिन्दी लेख (Convrted Hindu Now will Drama As Secularism Presure of West society-Hindi Article on Conversion of Religion) - हम पुराने भक्त हैं। चिंत्तक भी हैं। भक्तों का राजनीतिक तथा कथित सामाजिक संगठन के लोगों से संपर्क रहा है। यह अलग बात है ...8 वर्ष पहले
लोकप्रिय पत्रिकाएँ
-
आनंद उठाने का सबसे अच्छी तरीका यह है कि आप एकांत में जाकर ध्यान लगायें-चिंत्तन (Anand Uthane ka tareeka-Chinttan) - रोकड़ संकट बढ़ाओ ताकि मुद्रा का सम्मान भी बढ़ सके। --- हम वृंदावन में अनेक संत देखते हैं जो भल...8 वर्ष पहले
-
पाकिस्तान को मोदी जी से डरना ही चाहिये-संदर्भःभारत पाक संबंध-सामायिक लेख - पाकिस्तानी भले ही परमाणु बम लेकर बरसों से भारतीय हमले से बेफिक्र हैं यह सोचकर कि हम एक दो तो भारत पर पटक ही ल...10 वर्ष पहले
-
धार्मिक ग्रंथ की बात पहले समझें फिर व्यक्त करें-हिन्दी लेख - अभी हाल ही में एक पत्रिका में वेदों के संदेशों के आधार पर यह संदेश प्रकाशित किया गया कि ‘गाय को मारने या मांस खाने वाले ...10 वर्ष पहले
-
हिन्दी दिवस पर दीपकबापू वाणी - हृदय धड़के मातृभाषा में, भाव परायी बाज़ार में मत खोलो। कहें दीपकबापू खुशी हो या गम, निज शब्द हिन्दी में बोलो।। ————— दिल के जज़्बात अपने हैं, अपनी जुबां हिन्...11 वर्ष पहले
वर्डप्रेस की संबद्ध अन्य पत्रिकायें
-
जयश्रीराम का राजनीतिकरण कौन कर रहा है-हिन्दी संपादकीय - जब देश में रामजन्मभूमि आंदोलन चल रहा था तब ‘जयश्रीराम’ नारे का जिस तरह चुनावी राजनीतिकरण हुआ उसकी अनेक मिसाल...9 वर्ष पहले
-
पाकिस्तान को मोदी जी से डरना ही चाहिये-संदर्भःभारत पाक संबंध-सामायिक लेख - पाकिस्तानी भले ही परमाणु बम लेकर बरसों से भारतीय हमले से बेफिक्र हैं यह सोचकर कि हम एक दो तो भारत पर पटक ही ल...10 वर्ष पहले
-
इंटरनेट पर हिन्दी लिखने वालों को साहित्यकार ही माने-हिन्दी लेख - प्रतिदिन कोई न कोई सम्मानीय अपना सम्मान पुराने सामान की तरह बाहर फैंक रहा है। इससे तो यही लगता है जितने साहित्यक सम्मान देश में बांटे गये ...10 वर्ष पहले
-
धार्मिक ग्रंथ की बात पहले समझें फिर व्यक्त करें-हिन्दी लेख - अभी हाल ही में एक पत्रिका में वेदों के संदेशों के आधार पर यह संदेश प्रकाशित किया गया कि ‘गाय को मारने या मांस खाने वाले ...10 वर्ष पहले
-
स्वर्ग व मोक्ष का दृश्यव्य रूप नहीं-हिन्दी लेख - हमारे देश में धर्म के नाम पर अनेक प्रकार के भ्रम फैलाये गये हैं। खासतौर से स्वर्ग और मोक्ष के नाम पर ऐसे प्रचारित किये ग...10 वर्ष पहले
-
मनोरंजन से अध्यात्मिक शांति बेचने का प्रयास-हिन्दी लेख - पूरे विश्व में प्रचार माध्यमों के बीच हर प्रकार के दर्शक और श्रोता को प्रभावित करने की होड़ चल पड़ी है। मनोरंजन के नाम पर अनेक तरह के कार्यक...10 वर्ष पहले
-
हिन्दी दिवस पर दीपकबापू वाणी - हृदय धड़के मातृभाषा में, भाव परायी बाज़ार में मत खोलो। कहें दीपकबापू खुशी हो या गम, निज शब्द हिन्दी में बोलो।। ————— दिल के जज़्बात अपने हैं, अपनी जुबां हिन्...11 वर्ष पहले
-
अधर्मी व्यक्ति की तरक्की देखकर विचलित न हो-मनुस्मृति के आधार पर चिंत्तन लेख - विश्व के अधिकतर देशों में जो राजनीतक, आर्थिक और सामाजिक व्यवस्थायें हैं उनमें सादगी, सदाचार तथा सिद्धांतों के साथ विकास करते हुए उच...12 वर्ष पहले