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1 जनवरी 2012

सन् 2011 में छाये रहे अन्ना हजारे और भ्रष्टाचार, नववर्ष में क्या होगा-हिन्दी लेख (varsh 2011 mein anna aur bhrashtacha chhaya raha, naye varsh mein kya hoga-hindi lekh or article)

             इस वर्ष अगर राजनीतिक और खबरों का आंकलन किया जाये तो यकीनन अन्ना हजारे और उनका भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन टीवी चैनलों, समाचार पत्रों तथा इंटरनेट पर छाया रहा। चूंकि प्रचार माध्यमों के प्रकाशनों और प्रसारणों में सब तरह का मसाला बनाकर प्रस्तुत किया जाता है। इसलिये कभी गंभीर चिंत्तन तो कभी तनाव पूर्ण विवाद तो कभी हास्य व्यंग्य का मिश्रण भी शामिल रहा। हालांकि ऐसे में हम लोगों के लिये केवल देश में व्याप्त भ्रष्टाचार ही चिंत्तन का विषय रहा। यह अलग बात है कि जो बहसें देखी उनमें केवल सतही सोच दिखाई दी। आक्षेपों और हास्य टिप्पणियों ने एक तरह से हमारा मन ही खट्टा किया। हम चाहते थे कि देश में व्याप्त भ्रष्टाचार पर गंभीर मंथन हो न कि व्यक्तिगत आक्षेपों या मजाक में समय बरबाद हो। मगर यह हम जैसे फोकटिया लेखकों के सोचने से क्या होता है? व्यवसायिक लोग जहां चाहे सार्वजनिक बहसों को ले जा सकते हैं।
                    वर्ष के आखिर में हमने इस पर दो लेख लिखे पर लगता नहीं है कि हम अपनी बात पूरी कह पाये। लोकपाल और जनलोकपाल के मध्य द्वंद्व भले ही चलता रहा हो पर हमारी नज़र इस बात पर अधिक रही है कि क्या वाकई समाज इस बात के लिये तैयार है कि वह भ्रष्टाचार व्यवस्था चाहता है। हमें लगता नहीं है कि समाज में कोई गंभीर हलचल है। राज्य व्यवस्था का हर कोई उपयोग अपने हित में करना चाहता है और यही भ्रष्टाचार की जड़ है और इससे आम जनमानस अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकता। जिस तरह पर बहस चल रही है उसमें हम जैसे चिंत्तक फिट भी नहीं बैठ सकते क्योंकि व्यवसायिक बुद्धिजीवियों का वर्ग केवल अपने तयशुदा विचार पर ही निर्णय करना चाहता है। नयी बात उसे मूर्खतापूर्ण या अप्रासंगिक लगती है। बहरहाल हमारे दोनों लेख यहां प्रस्तुत हैं।

                ईसवी संवत 2011 समाप्त  होकर  ही 2012 प्रारंभ हो गया  है। आमतौर से आधुनिक शिक्षा पद्धति से परे रहने वाले आम भारतीय जनमानस के लिये 31 दिसम्बर तथा 1 जनवरी यह पुराना साल समाप्त तथा नया साल प्रारंभ होने का समय नहीं होता। भारतीय संवत अप्रैल या मार्च में प्रारंभ होता है। इतना ही नही भारत के बजट का वर्ष भी 1 अप्रैल से 31 मार्च को होता है। अलबत्ता बाज़ार तथा प्रचार समूहो  ने अपनी कमाई के लिये 1 जनवरी से नववर्ष प्रारंभ होने के तिथि को इस तरह समाज में स्थापित कर लिया है कि पुरानी, मध्यम तथा नयी पीढ़ी की शहरी पीढ़ी इसके जाल में फंसी हुई है। पहले होता था ‘नववर्ष की बधाई’ और अब हो गया ‘हैप्पी न्यू ईयर’।
       बहरहाल पिछले साल की खबरें, फिल्में, गीत, और समाचारों का पुलिंदा लेकर प्रचार माध्यम हाजिर हैं। हमें यह सब नहीं दिखाई देता। हमें दिखाई देता है भ्रष्टाचार का भूत! इस भूत ने हमारे समाज का वर्ष में से नौ महीने तक पीछा किया है। लग रहा है कि अगले वर्ष का प्रारंभ भी नायक अन्ना हजारे और खलनायक भ्रष्टाचार ही करेगा। आखिर हमने यह दावा किस आधार पर किया। दरअसल हमारे बीस ब्लॉग पिछले छह वर्ष से चल रहे हैं पर भ्रष्टाचार शब्द से इस बार सर्च इंजिनों में जितने ढूंढे गये उतना पिछले सालों में नहीं दिखाई दिया। इतना ही नहीं अन्ना हजारे के नाम से लिखे गये शीर्षक वाले पाठों के ब्लॉगों ने भी अधिक से अधिक पाठक जुटाये। अप्रैल 2011 से पहले भ्रष्टाचार पर लिखी गयी कविताओं तथा लेखों ने इसयिल लोकप्रियता पायी। हम अगर अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन को एक वाक्य में सफल बताना चाहें तो वह यह कि उन्होंने भारत में फैले भ्रष्टाचार का अंतर्राष्ट्रीयकरण करने में योगदान दिया।
           अन्ना हजारे 74 वर्ष के हैं। आयु की दृष्टि से उनका सम्मान होना चाहिए पर अपने आंदोलन की वजह से उनको अपमान भी झेलना पड़ा। इसके लिये उनके विरोधियों को नहीं बल्कि उनके समर्थकों को भी कम दोषी नहीं माना जा सकता जिन्होंने उनकी आयु की आड़ में अपने स्वार्थों के तीर चलाने के प्रयास किये।
वर्ष के पूरे नौ महीने तक जो आदमी भारतीय जनमानस पर छाया रहा वह वास्तव में नायक कहने योग्य है। यह अलग बात है कि कह कोई नहीं रहा। वर्ष के सबसे बुरी तरह से फ्लाप फिल्म रावन का नायक रहा। यह बात भी कोई नहीं कह नहीं रहा।
           उस दिन हमारे हम अपने एक मित्र से पहुंचने उसके घर पहुंचे। हमारे मित्र का लड़का रावन पिक्चर देखने मॉल में जा रहा था। हमारे मित्र ने उससे कहा ‘‘तुम्हारे यह अंकल कह रहे हैं कि रावन फिल्म फ्लॉप हो गयी है। हमने भी अपनी जवानी में फिल्में देखी हैं पर वही जो हिट होती थीं। तुम क्यो फ्लॉप रावन फिल्म देखने जाकर अपने घर की परंपरा और इज्जत का फालूदा बना रहे हो?
         पुत्र ने पूछा-‘‘अभी फिल्म आये तीन दिन हुए है तो उसे फ्लाप कैसे कह सकते है?’’
हमारे मित्र ने कहा-’’अंकल इंटरनेट पर सक्रिय रहते हैं और वहां ऐसा ही आंकलन प्रस्तुत किया गया होगा। तभी तो कह रहे हैं!’’
        पुत्र ने उनकी बात नहीं सुनी। तीन दिन बार हमारे मित्र बता रहा था कि उसके पुत्र को हमारी बात न मानने का मलाल था।
        देश की आज़ादी से पहले से यहां ऐसा तंत्र विकसित हो गया था जो यहां के जनमानस को बहलाफुसला कर बाज़ार के अनुकूल चलाने का अभ्यस्त था और उसने प्रचारतंत्र को भी वैसा ही बनाया। इस तरह भारतीय जनमानस भले ही अंग्रेजों के राजतंत्र से मुक्त हो गया पर उनके स्थापित व्यवस्था तंत्र के पंजों में अभी तक है। इतना ही नहीं आधुनिक शिक्षा से प्रशिक्षित अनेक लोग संस्कार और ंसस्कृति के नाम पर समाज को बचाने की बात तो करते हैं पर व्यवस्था की कार्यशैली बदलने की बात वह भी नहीं सोच पाते।         
            देश में भ्रष्टाचार आजादी के बाद से तेजी से पनपा है। अनेक लोग इससे जूड़ते हुए तो अनेक शिकार होते हुए अपना जीवन गंवा चुके हैं। जिनके पास राज्य की हल्दी सी गांठ है वह चूहा भी अपने आपको राजा से कम नहीं समझता। जहां जनता को सुविधा देने की बात आती है वहां राज्य के अधिकारों की बात चली आती है। प्रजा के लिये सुविधा पाना अधिकार नहीं बल्कि वह दे या न दे राज्य के अधिकार की बात हो गयी है। आम आदमी की भ्रष्टाचार से जो पीड़ा है उसका बयान सभी करते हैं पर हल कोई नहीं जानता। भ्रष्टाचार की पीड़ा को अन्ना साहेब के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन पूरे विश्व के सामने जाहिर किया पर इससे वह कम नहीं हो गयी। यही कारण है कि इस वर्ष भ्रष्टाचार और अन्ना साहेब ने इंटरनेट पर ढेर सारी खोज पायी। रावन फिल्म फ्लाप हो गयी इसलिये उसे खोज में जगह अधिक नहीं मिली पर दीवाली पर रावन शब्द भी खूब खोजा जाता है। पुराने ईसवी संवत् की विदाई पर बस इतना ही।
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अन्ना हजारे (अण्णा हज़ारे) के लिये आत्ममंथन का समय-हिन्दी लेख (anna hazare ke liye atmamanthan sa samay-hindi lekh or article)

           अन्ना हज़ारे ने अपना अनशन तथा जेलभरो आंदोलन फिलहाल स्थगित कर अच्छा ही किया है। जब हम अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन की बात करते हैं तो उसके राजनीतिक पक्ष की चर्चा अधिक होती है और सामाजिक पक्ष पीछे रह जाता है। हमने जब भी इस पर लिखा है सामाजिक पक्ष को अधिक छूने का प्रयास किया है। एक बात के लिये यह आंदोलन हमेशा याद रखा जायेगा कि इसने संपूर्ण देश के समस्त समाजों के सभी लोगों को चिंत्तन और मनन के विवश किया। मूल प्रश्न भ्रष्टाचार से जुड़ा होने के बावजूद ऐसे अनेक विषय हैं-जिनका संबंध कहीं न कहीं उससे है-जिन पर चर्चा हुई। जब हम भ्रष्टाचार की बात करते हैं तो आमतौर से सरकारी क्षेत्र के भ्रष्टाचार की बात होती है पर उद्योग, व्यापार, कला, तथा धर्म के क्षेत्र के कदाचार छिप जाता है। संभव है हम जैसे चिंतकों के इस मत से कम ही लोग सहमत होंगे कि हमारे समाज का यह सामान्य दृष्टिकोण ही ऐसे भ्रष्टाचार के लिये जिम्मेदार हैं जिसमें धन को सर्वाधिक महिमामय माना जाता है। सिद्धांतों की बात करना सभी को अच्छी लगती है पर जहां धन का मामला आये वहां सभी की आंख बंद हो जाती है।
             अपने आंदोलन के अकेले शीर्षक अन्ना साहेब हैं पर उनके विस्तार में अनेक प्रश्न चिन्ह थे। किसी पाठ में फड़कते शीर्षक के साथ बहुत सारे शब्द होते हैं जिनमें विषय से जुड़े सार का सार्थक होना आवश्यक है। इसके अभाव में शीर्षक एक नारा होकर रह जाता है। हम जैसे गीता साधकों के लिये यह आंदोलन अध्ययन और अनुसंधान के लिये बहुत महत्वपूर्ण रहा है। इस दौरान हमने केवल अन्ना के वाक्यों के साथ ही उनकी पर्दे पर दिख रही गतिविधियों को बहुत ध्यान से देखा। अन्ना के बारे में दूसरे लोग और दूसरे लोगों के बारे मे अन्ना क्या कह रहे हैं इसमें हमने दिलचस्पी नहीं रखी बल्कि अन्ना अपने इस आंदोलन से इस समाज के लिये क्या नया ढूंढ रहे हैं यह प्रश्न हमेशा हमारे लिये महत्वपूर्ण रहा है। अन्ना के स्वास्थ्य की चिंता हमेशा रही और हमारा मानना है कि ज्ञानी और ध्यानी अनशन जैसी हल्की गतिविधि से तब तक दूर रहें जब तक यह आवश्यक न हो। आंदोलनों और अभियानों का शांतितिपूर्ण प्रदर्शन करना ठीक है पर अनशन जैसी गतिविधि विचलित कर देती है।
               अन्ना ने जब अपना अनशन स्थगित किया तो प्रचार माध्यम उनका मखौल उड़ा रहे हैं। इन्हीं प्रचार माध्यमों ने उनके इसी आंदोलन पर अपने विज्ञापनों का समय पास कर कमाई की। टीवी चैनलों को इतने सारे दर्शक मिले होंगे कि वह कल्पनातीत होगा। हमारा मानना तो यह है कि यह आंदोलन ही आम जनमानस को भरमाने के लिये आर्थिक, सामाजिक तथा धार्मिक शिखर पुरुषों का एक योजनाबद्ध प्रयास था। टीवी चैनलों में शामिल हुए जिन बुद्धिजीवियों ने उनके मुंबई में कम भीड़ होने की जो बात कही है वह इसी का ही परिणाम है। लोकपाल या जनलोकपाल से इतर बहस इस पर चल रही है कि क्या अन्ना साहेब का जादू खत्म हो गया है। तो क्या यह जादू चल रहा था?
          अन्ना मूलतः अकेले थे पर उनके पीछे अनेक ज्ञात अज्ञात संगठन आये जिनके अपने अपने लक्ष्य थे। जनलोकपाल उनका नारा था जो संसद में लोकपाल का बिल पास होते ही फ्लाप हो गया। अन्ना के अनेक साथियों को लगा कि उनका नारा अब चलने वाला नहीं है। यकीनन अन्ना ने यह सब देखा होगा। अन्ना ने बहुत कुछ कहा पर हमें लगता है कि उन्होंने बहुत कुछ नहीं भी कहा। उनके सामने अनेक ऐसे सत्य अदृश्य रूप में प्रकट हुए होंगे जिनको देखकर वह आश्चर्यचकित हुए होंगे। वह उनको देखते होंगे पर उनका बयान करना उनके लिये कठिन रहा होगा। वह ऐसे सात्विक पुरुष हैं जो राजस पुरुषो के क्षेत्र में घुसकर उनको त्रास देता है। अभी तक उन्होंने राजस पुरुषों से जो द्वंद्व किया था उसमें भी उनके विरोधी राजस पुरुषों की सहायता लेते रहे होंगे। एक को परास्त किया तो दूसरा विजेता बना होगा। इस बार वह राजस पुरुषों के विशाल समूह से लोह लेने निकले थे और धीरे धीरे उनके इर्दगिर्द अपने राजसी वृत्ति के लोगों का आंकड़ा कम होता जा रहा था। राजस पुरुष पराक्रमी होते हैं जबकि सात्विक पुरुषों को पराक्रम की आवश्यकता नहीं होती। यदि राजस पुरुषों के विशाल समूह से सामना करना हो तो पहले अपने पराक्रम का भी परीक्षण करना चाहिए। अन्ना ने यह बात अब जाकर अनुभव की होगी। हम नहीं मानते कि अन्ना हारकर बैठ जायेंगे। दूसरी बात यह भी लगती है कि वह अपने वर्तमान राजस पुरुषों के साथ लेकर अपना अभियान चलने वाले भी नहीं है।
        हम जब अन्ना हजारे के अभियान से राजनीतिक पक्ष से हटकर उसका सामाजिक पक्ष देखते हैं तो लगता है कि अन्ना हजारे की त्यागी छवि जनमानस में है। इसलिये भविष्य में उनको समर्थन नहीं मिलेगा यह सोचना बेकार है। मुश्किल यह है कि अन्ना हजारे को बौद्धिक वर्ग का समर्थन अधिक नहीं मिला। इसका कारण यह है कि इस देश ने कई आंदोलन और उसके परिणाम देखे हैं जिससे निराशावादी दृष्टिकोण उभरता है। अन्ना हजारे के आंदोलन से जुड़े स्वयं सेवी और उनके संगठनों की निष्ठा को लेकर लोगों के मन में अनेक संदेह थे। देश के बौद्धिक समाज से जुड़े अनेक लोगों के लिये वह किसी भी दृष्टि से स्वयंसेवक नहीं थे। समाज सेवा में उनकी भूमिका धनपतियों और आमजनमानस के बीच उनकी भूमिका मध्यस्थ की थी। वैसे हमारा मानना है कि अन्ना को अपना अभियान राजनीति से जुड़े विषय से हटकर समाज में फैले अंधविश्वास, रूढ़िवादिता और भेदभाव मिटाने के लिये प्रारंभ करना चाहिए। हालांकि यह कहना कठिन है कि इसके लिये उनको प्रायोजक मिलेगा या नहीं। एक बात तय रही कि बिना प्रायोजन के ऐसे आंदोलन चल नहीं सकते।
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लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर 
poet, writer and editor-Deepak 'BharatDeep',Gwalior

writer aur editor-Deepak 'Bharatdeep' Gwalior

13 अक्टूबर 2008

क्या प्यार और जंग में कुछ भी करना ठीक है-आलेख

प्रेम और युद्ध में सब जायज है। क्या इस तर्क को सही मान लिया जाये? पूरी तरह यथार्थ मीवन जीने वाले लोग इसे अपना आदर्श वाक्य मानते हैं। याद रखने लायक बात यह है कि यह सिद्धांत पश्चिमी अवधारणा आधारित है, और हमारी भारतीय और हिंदू मान्यताओं के ठीक विपरीत है। हमारे यहाँ प्रेम में संयम और युद्ध में भी नियम माना जाता है। प्रेम के बारे में कहा जाता है वह निस्वार्थ होना चाहिए और युद्ध में पीठ दिखा रहे शत्रु और शरण में आये शत्रु देश के नागरिक पर भी कभी प्रहार नहीं करना चाहिऐ। जिस शत्रु ने हथियार डाल दिए हौं और जिसने आधीनता स्वीकार कर ली हो उसके प्रति मैत्री का भाव रखना चाहिऐ। पश्चिम की विचारधारा किसी नियम को नहीं मानती-क्योंकि वह केवल दैहिक और भौतिक सिद्धांतों परा आधारित है जबकि भारतीय विचारधारा अध्यात्म पर आधारित है।

प्रेम में सिर्फ लाभ और लोभ का भाव है। स्त्री से प्रेम है तो केवल उसके शारीरिक सौन्दर्य के आकर्षण के कारण और पुरुष है तो उसके धन के कारण है-यही कहती है पश्चिम की धारणा। पर हमारा दर्शन कहता है कि इस जीवन में भौतिक आकर्षण क्षणिक है और उसे मानसिक संतोष नहीं प्राप्त होता अत: निस्वार्थ प्रेम करना चाहिए जिससे मन में विकार का भाव न आये और जिससे हम प्रेम करें उससे सात्विक रुप से देखें उसमे गुण देखे और अगर उसमें दोष दिखायी दें तो उसे सचेत करें। उसके प्रेम से हमारे मन को संतोष होना चाहिए न कि लोभ और लालच की भावना उत्पन्न हो जो अंतत: हमारे मन में विकार उत्पन्न करती है।

प्रेम और युद्ध में सब जायज मानना इस बात का प्रतीक है कि आदमी को एकदम स्वार्थी होना चाहिये और अगर सभी लोग इस रास्ते पर चलने लगें तो विश्व में सहकारिता, सदभाव और सदाचार की भावना ही खत्म हो जायेगी।
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12 अक्टूबर 2008

भारत की तरक्की चमत्कार नहीं है-आलेख


"द फाल ऑफ़ ए डायनेस्टी, दिल्ली १८५७" किताब के लेखक जाने-माने इतिहासकार विलियम डेरिम्पल के अनुसार पश्चिमी मीडिया के यह सोच ही गलत है कि भारत की तरक्की अपने आप में कोई 'चमत्कार' है। उनकी राय में तो यह एक बार फिर दुनिया भर के कारोबार की पुरानी परंपराओं पर लौटना मात्र है।


भारत में कुछ लोग अपने देश में भौतिक साधनों की बहुलता के चलते इतने भ्रमित हो गये हैं कि उन्हें विश्व के विकसित देशों की मुक़ाबले अपने देश का विकास अत्यंत नगण्य लगता है और कभी पहले सोवियत सोवियत संघ, जर्मनी और जापान जैसा अपने देश को बनाने का विचार आता था तो अब भारत को चीन और अमेरिका जैसा बनाने की बात चल रही है। सबसे बड़ी बात यह है जिन लोगों ने अंग्रेजी पढी है और लिखना भी सीख लिया है उन्हें अपना देश हमेशा अविकसित और पिछडा ही दिखाई देता है- उनके लिए विकास का अर्थ है केवल आर्थिक और भौतिक विकास ही है।


भारत की प्राचीन परंपराएं और संस्कार उनके लिए भोंदूपन का परिचायक है-ऐसे लोग यह जानने का प्रयास ही नहीं करते कि विश्व में भारत का सम्मान उसकी उन आध्यात्मिक और सांस्कृतिक मान्यताओं की वजह से है जिससे भौतिकता से उपजे तनाव में शांति की स्थापना होती है। भगवान् श्री राम और श्री कृष्ण के चरित्र पर आज भी विकसित राष्ट्रों में शोध चल रहे हैं और उनके संदेशों को नये संदर्भों में भी उतना उपयुक्त पाया गया है जितना प्राचीन समय में देखा जाता था। भगवान महावीर, बुद्ध और गुरूनानक जीं के संदेश आज भी उतने ही प्रासंगिक है, यह बात विदेश के विद्वान कह रहे है और हमारे देश के कुछ विद्वान लोगों को यहाँ अंधविश्वास, कुरीतिया और पिछडापन ही दिखाई देता है।


विकास!बस विकास! देश में भौतिक साधनों के कबाडे को एकत्रित करना ही विकास का परिचायक नहीं हो सकता। कबाडा मैंने इसलिये कहा क्योंकि हर वस्तु का मोडल तीन माह में पुराना हो जाता है। एक साल में नयी तकनीकी आ जाती है और अपने घर में रखी चीज ही कबाड़ दिखाई देती है। लोग कहते हैं कि चीन ने बहुत विकास किया है और उसकी चीजें बहुत सस्ती हैं। मैं उस दिन अपने घर की सफाई कर रहा था तो मैंने देखा के अनेक चीनी वस्तुओं का कबाड़ उनमें भरा पडा था। उसकी कई चीजे जो मैं सस्ती और उपयोगी समझ कर ले आया था वह एक या दो दिन और अधिक से अधिक एक सप्ताह चलीं थीं। उससे आठ गुना महंगी भारतीय वस्तुएं आज भी अपनी काम दे रहीं है। तब मुझे लगता है कि वास्तव में विश्वसनीयता ही भारत की पहचान है और मुझे इस पर गर्व होता है।


आज जो भारत का स्वरूप है वह हमारी पुरानी पीढ़ियों के परिश्रम, तपस्या और मनोबल के कारण है न कि किसी विदेशी राष्ट्र की कृपा से है। यहाँ के लोगों ने शिक्षा प्राप्त कर विदेश में नाम कमाया है और उन देशों की सेवा की है पर क्या किसी देश ने हमें परमाणु, अन्तरिक्ष या किसी अन्य क्षेत्र में हमें तकनीकी ज्ञान दिया है? कतई नहीं। अनेक भारतीय वैज्ञानिक अमेरिका की सेवा कर रहे है यहाँ उनकी इस बात पर गर्व करते हैं पर क्या अमेरिका ने कभी हमें संयुक्त राष्ट्र में स्थाई सदस्यता दिलवाने का वादा किया है ? नहीं, वह ऐसा नहीं करेगा। अभी भी भारत का नाम इस मामले में प्रस्तावित नहीं है । अगर सदस्यता मिली भी तो बिना वीटो पॉवर के मिलेगी जो कि अभी भी बहुत दूर है। हालांकि संयुक्त राष्ट्र संघ अपनी महत्ता खो चूका है और वह अमेरिका की जेबी संस्था बन कर रह गया है।


विकास केवल भौतिक ही नहीं होता वरन मानसिक शांति और और आध्यात्मिक ज्ञान होना भी उसका एक भाग है-और इस विषय में भारत का एकाधिकार है यही वजह है कि भारत को विश्व में आध्यात्म गुरू कहा जाता है। अनेक भारतीयों ने पश्चिम में जाकर आर्थिक और वैज्ञानिक क्षेत्रों में भारी-भरकम उपलब्धि प्राप्त की है पर फिर भी इस देश की छबि उनके कारण नहीं वरन महात्मा गांधी, स्वामी विवेकानंद , रामकृष्ण परमहंस और महर्षि अरविंद जैसे मनीषियों और विद्वानों के संदेशों से है-पूरा विश्व उनके संदेशों को मान्यता देता है। भौतिक विकास एक सामयिक आवश्यकता होता है पर आध्यात्मिक और मानसिक शांति के बिना उसका कोई लाभ नहीं होता। जो लोग इस देश को पश्चिम की अवधारणाओं पर चलाना चाहते हैं उन्हें यह बात समझ लेना चाहिए कि गरीबी , अशिक्षा, भ्रष्टाचार और बेरोजगारी वहां भी हैं और इसी कारण कुछ पश्चिमी देशों में विदेशियों पर हमले भी होते हैं क्योंकि वहाँ के मूल निवासियों को लगता है कि उन लोगों ने उनके अधिकारों का हनन किया है।


वैसे भी अपने देश में कहा जाता है कि दूर के ढोल सुहावने-इस उक्ति को ध्यान में रखते हुए अपने देश को किसी पश्चिमी देश की स्वरूप में ढाँचे देखने की इच्छा करने की बजाये अपने ही आध्यात्मिक ज्ञान और संस्कारों के साथ प्राचीन विज्ञान को नये संदर्भों में व्याख्या करना चाहिऐ।


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