1 जनवरी 2012

सन् 2011 में छाये रहे अन्ना हजारे और भ्रष्टाचार, नववर्ष में क्या होगा-हिन्दी लेख (varsh 2011 mein anna aur bhrashtacha chhaya raha, naye varsh mein kya hoga-hindi lekh or article)

             इस वर्ष अगर राजनीतिक और खबरों का आंकलन किया जाये तो यकीनन अन्ना हजारे और उनका भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन टीवी चैनलों, समाचार पत्रों तथा इंटरनेट पर छाया रहा। चूंकि प्रचार माध्यमों के प्रकाशनों और प्रसारणों में सब तरह का मसाला बनाकर प्रस्तुत किया जाता है। इसलिये कभी गंभीर चिंत्तन तो कभी तनाव पूर्ण विवाद तो कभी हास्य व्यंग्य का मिश्रण भी शामिल रहा। हालांकि ऐसे में हम लोगों के लिये केवल देश में व्याप्त भ्रष्टाचार ही चिंत्तन का विषय रहा। यह अलग बात है कि जो बहसें देखी उनमें केवल सतही सोच दिखाई दी। आक्षेपों और हास्य टिप्पणियों ने एक तरह से हमारा मन ही खट्टा किया। हम चाहते थे कि देश में व्याप्त भ्रष्टाचार पर गंभीर मंथन हो न कि व्यक्तिगत आक्षेपों या मजाक में समय बरबाद हो। मगर यह हम जैसे फोकटिया लेखकों के सोचने से क्या होता है? व्यवसायिक लोग जहां चाहे सार्वजनिक बहसों को ले जा सकते हैं।
                    वर्ष के आखिर में हमने इस पर दो लेख लिखे पर लगता नहीं है कि हम अपनी बात पूरी कह पाये। लोकपाल और जनलोकपाल के मध्य द्वंद्व भले ही चलता रहा हो पर हमारी नज़र इस बात पर अधिक रही है कि क्या वाकई समाज इस बात के लिये तैयार है कि वह भ्रष्टाचार व्यवस्था चाहता है। हमें लगता नहीं है कि समाज में कोई गंभीर हलचल है। राज्य व्यवस्था का हर कोई उपयोग अपने हित में करना चाहता है और यही भ्रष्टाचार की जड़ है और इससे आम जनमानस अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकता। जिस तरह पर बहस चल रही है उसमें हम जैसे चिंत्तक फिट भी नहीं बैठ सकते क्योंकि व्यवसायिक बुद्धिजीवियों का वर्ग केवल अपने तयशुदा विचार पर ही निर्णय करना चाहता है। नयी बात उसे मूर्खतापूर्ण या अप्रासंगिक लगती है। बहरहाल हमारे दोनों लेख यहां प्रस्तुत हैं।

                ईसवी संवत 2011 समाप्त  होकर  ही 2012 प्रारंभ हो गया  है। आमतौर से आधुनिक शिक्षा पद्धति से परे रहने वाले आम भारतीय जनमानस के लिये 31 दिसम्बर तथा 1 जनवरी यह पुराना साल समाप्त तथा नया साल प्रारंभ होने का समय नहीं होता। भारतीय संवत अप्रैल या मार्च में प्रारंभ होता है। इतना ही नही भारत के बजट का वर्ष भी 1 अप्रैल से 31 मार्च को होता है। अलबत्ता बाज़ार तथा प्रचार समूहो  ने अपनी कमाई के लिये 1 जनवरी से नववर्ष प्रारंभ होने के तिथि को इस तरह समाज में स्थापित कर लिया है कि पुरानी, मध्यम तथा नयी पीढ़ी की शहरी पीढ़ी इसके जाल में फंसी हुई है। पहले होता था ‘नववर्ष की बधाई’ और अब हो गया ‘हैप्पी न्यू ईयर’।
       बहरहाल पिछले साल की खबरें, फिल्में, गीत, और समाचारों का पुलिंदा लेकर प्रचार माध्यम हाजिर हैं। हमें यह सब नहीं दिखाई देता। हमें दिखाई देता है भ्रष्टाचार का भूत! इस भूत ने हमारे समाज का वर्ष में से नौ महीने तक पीछा किया है। लग रहा है कि अगले वर्ष का प्रारंभ भी नायक अन्ना हजारे और खलनायक भ्रष्टाचार ही करेगा। आखिर हमने यह दावा किस आधार पर किया। दरअसल हमारे बीस ब्लॉग पिछले छह वर्ष से चल रहे हैं पर भ्रष्टाचार शब्द से इस बार सर्च इंजिनों में जितने ढूंढे गये उतना पिछले सालों में नहीं दिखाई दिया। इतना ही नहीं अन्ना हजारे के नाम से लिखे गये शीर्षक वाले पाठों के ब्लॉगों ने भी अधिक से अधिक पाठक जुटाये। अप्रैल 2011 से पहले भ्रष्टाचार पर लिखी गयी कविताओं तथा लेखों ने इसयिल लोकप्रियता पायी। हम अगर अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन को एक वाक्य में सफल बताना चाहें तो वह यह कि उन्होंने भारत में फैले भ्रष्टाचार का अंतर्राष्ट्रीयकरण करने में योगदान दिया।
           अन्ना हजारे 74 वर्ष के हैं। आयु की दृष्टि से उनका सम्मान होना चाहिए पर अपने आंदोलन की वजह से उनको अपमान भी झेलना पड़ा। इसके लिये उनके विरोधियों को नहीं बल्कि उनके समर्थकों को भी कम दोषी नहीं माना जा सकता जिन्होंने उनकी आयु की आड़ में अपने स्वार्थों के तीर चलाने के प्रयास किये।
वर्ष के पूरे नौ महीने तक जो आदमी भारतीय जनमानस पर छाया रहा वह वास्तव में नायक कहने योग्य है। यह अलग बात है कि कह कोई नहीं रहा। वर्ष के सबसे बुरी तरह से फ्लाप फिल्म रावन का नायक रहा। यह बात भी कोई नहीं कह नहीं रहा।
           उस दिन हमारे हम अपने एक मित्र से पहुंचने उसके घर पहुंचे। हमारे मित्र का लड़का रावन पिक्चर देखने मॉल में जा रहा था। हमारे मित्र ने उससे कहा ‘‘तुम्हारे यह अंकल कह रहे हैं कि रावन फिल्म फ्लॉप हो गयी है। हमने भी अपनी जवानी में फिल्में देखी हैं पर वही जो हिट होती थीं। तुम क्यो फ्लॉप रावन फिल्म देखने जाकर अपने घर की परंपरा और इज्जत का फालूदा बना रहे हो?
         पुत्र ने पूछा-‘‘अभी फिल्म आये तीन दिन हुए है तो उसे फ्लाप कैसे कह सकते है?’’
हमारे मित्र ने कहा-’’अंकल इंटरनेट पर सक्रिय रहते हैं और वहां ऐसा ही आंकलन प्रस्तुत किया गया होगा। तभी तो कह रहे हैं!’’
        पुत्र ने उनकी बात नहीं सुनी। तीन दिन बार हमारे मित्र बता रहा था कि उसके पुत्र को हमारी बात न मानने का मलाल था।
        देश की आज़ादी से पहले से यहां ऐसा तंत्र विकसित हो गया था जो यहां के जनमानस को बहलाफुसला कर बाज़ार के अनुकूल चलाने का अभ्यस्त था और उसने प्रचारतंत्र को भी वैसा ही बनाया। इस तरह भारतीय जनमानस भले ही अंग्रेजों के राजतंत्र से मुक्त हो गया पर उनके स्थापित व्यवस्था तंत्र के पंजों में अभी तक है। इतना ही नहीं आधुनिक शिक्षा से प्रशिक्षित अनेक लोग संस्कार और ंसस्कृति के नाम पर समाज को बचाने की बात तो करते हैं पर व्यवस्था की कार्यशैली बदलने की बात वह भी नहीं सोच पाते।         
            देश में भ्रष्टाचार आजादी के बाद से तेजी से पनपा है। अनेक लोग इससे जूड़ते हुए तो अनेक शिकार होते हुए अपना जीवन गंवा चुके हैं। जिनके पास राज्य की हल्दी सी गांठ है वह चूहा भी अपने आपको राजा से कम नहीं समझता। जहां जनता को सुविधा देने की बात आती है वहां राज्य के अधिकारों की बात चली आती है। प्रजा के लिये सुविधा पाना अधिकार नहीं बल्कि वह दे या न दे राज्य के अधिकार की बात हो गयी है। आम आदमी की भ्रष्टाचार से जो पीड़ा है उसका बयान सभी करते हैं पर हल कोई नहीं जानता। भ्रष्टाचार की पीड़ा को अन्ना साहेब के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन पूरे विश्व के सामने जाहिर किया पर इससे वह कम नहीं हो गयी। यही कारण है कि इस वर्ष भ्रष्टाचार और अन्ना साहेब ने इंटरनेट पर ढेर सारी खोज पायी। रावन फिल्म फ्लाप हो गयी इसलिये उसे खोज में जगह अधिक नहीं मिली पर दीवाली पर रावन शब्द भी खूब खोजा जाता है। पुराने ईसवी संवत् की विदाई पर बस इतना ही।
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अन्ना हजारे (अण्णा हज़ारे) के लिये आत्ममंथन का समय-हिन्दी लेख (anna hazare ke liye atmamanthan sa samay-hindi lekh or article)

           अन्ना हज़ारे ने अपना अनशन तथा जेलभरो आंदोलन फिलहाल स्थगित कर अच्छा ही किया है। जब हम अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन की बात करते हैं तो उसके राजनीतिक पक्ष की चर्चा अधिक होती है और सामाजिक पक्ष पीछे रह जाता है। हमने जब भी इस पर लिखा है सामाजिक पक्ष को अधिक छूने का प्रयास किया है। एक बात के लिये यह आंदोलन हमेशा याद रखा जायेगा कि इसने संपूर्ण देश के समस्त समाजों के सभी लोगों को चिंत्तन और मनन के विवश किया। मूल प्रश्न भ्रष्टाचार से जुड़ा होने के बावजूद ऐसे अनेक विषय हैं-जिनका संबंध कहीं न कहीं उससे है-जिन पर चर्चा हुई। जब हम भ्रष्टाचार की बात करते हैं तो आमतौर से सरकारी क्षेत्र के भ्रष्टाचार की बात होती है पर उद्योग, व्यापार, कला, तथा धर्म के क्षेत्र के कदाचार छिप जाता है। संभव है हम जैसे चिंतकों के इस मत से कम ही लोग सहमत होंगे कि हमारे समाज का यह सामान्य दृष्टिकोण ही ऐसे भ्रष्टाचार के लिये जिम्मेदार हैं जिसमें धन को सर्वाधिक महिमामय माना जाता है। सिद्धांतों की बात करना सभी को अच्छी लगती है पर जहां धन का मामला आये वहां सभी की आंख बंद हो जाती है।
             अपने आंदोलन के अकेले शीर्षक अन्ना साहेब हैं पर उनके विस्तार में अनेक प्रश्न चिन्ह थे। किसी पाठ में फड़कते शीर्षक के साथ बहुत सारे शब्द होते हैं जिनमें विषय से जुड़े सार का सार्थक होना आवश्यक है। इसके अभाव में शीर्षक एक नारा होकर रह जाता है। हम जैसे गीता साधकों के लिये यह आंदोलन अध्ययन और अनुसंधान के लिये बहुत महत्वपूर्ण रहा है। इस दौरान हमने केवल अन्ना के वाक्यों के साथ ही उनकी पर्दे पर दिख रही गतिविधियों को बहुत ध्यान से देखा। अन्ना के बारे में दूसरे लोग और दूसरे लोगों के बारे मे अन्ना क्या कह रहे हैं इसमें हमने दिलचस्पी नहीं रखी बल्कि अन्ना अपने इस आंदोलन से इस समाज के लिये क्या नया ढूंढ रहे हैं यह प्रश्न हमेशा हमारे लिये महत्वपूर्ण रहा है। अन्ना के स्वास्थ्य की चिंता हमेशा रही और हमारा मानना है कि ज्ञानी और ध्यानी अनशन जैसी हल्की गतिविधि से तब तक दूर रहें जब तक यह आवश्यक न हो। आंदोलनों और अभियानों का शांतितिपूर्ण प्रदर्शन करना ठीक है पर अनशन जैसी गतिविधि विचलित कर देती है।
               अन्ना ने जब अपना अनशन स्थगित किया तो प्रचार माध्यम उनका मखौल उड़ा रहे हैं। इन्हीं प्रचार माध्यमों ने उनके इसी आंदोलन पर अपने विज्ञापनों का समय पास कर कमाई की। टीवी चैनलों को इतने सारे दर्शक मिले होंगे कि वह कल्पनातीत होगा। हमारा मानना तो यह है कि यह आंदोलन ही आम जनमानस को भरमाने के लिये आर्थिक, सामाजिक तथा धार्मिक शिखर पुरुषों का एक योजनाबद्ध प्रयास था। टीवी चैनलों में शामिल हुए जिन बुद्धिजीवियों ने उनके मुंबई में कम भीड़ होने की जो बात कही है वह इसी का ही परिणाम है। लोकपाल या जनलोकपाल से इतर बहस इस पर चल रही है कि क्या अन्ना साहेब का जादू खत्म हो गया है। तो क्या यह जादू चल रहा था?
          अन्ना मूलतः अकेले थे पर उनके पीछे अनेक ज्ञात अज्ञात संगठन आये जिनके अपने अपने लक्ष्य थे। जनलोकपाल उनका नारा था जो संसद में लोकपाल का बिल पास होते ही फ्लाप हो गया। अन्ना के अनेक साथियों को लगा कि उनका नारा अब चलने वाला नहीं है। यकीनन अन्ना ने यह सब देखा होगा। अन्ना ने बहुत कुछ कहा पर हमें लगता है कि उन्होंने बहुत कुछ नहीं भी कहा। उनके सामने अनेक ऐसे सत्य अदृश्य रूप में प्रकट हुए होंगे जिनको देखकर वह आश्चर्यचकित हुए होंगे। वह उनको देखते होंगे पर उनका बयान करना उनके लिये कठिन रहा होगा। वह ऐसे सात्विक पुरुष हैं जो राजस पुरुषो के क्षेत्र में घुसकर उनको त्रास देता है। अभी तक उन्होंने राजस पुरुषों से जो द्वंद्व किया था उसमें भी उनके विरोधी राजस पुरुषों की सहायता लेते रहे होंगे। एक को परास्त किया तो दूसरा विजेता बना होगा। इस बार वह राजस पुरुषों के विशाल समूह से लोह लेने निकले थे और धीरे धीरे उनके इर्दगिर्द अपने राजसी वृत्ति के लोगों का आंकड़ा कम होता जा रहा था। राजस पुरुष पराक्रमी होते हैं जबकि सात्विक पुरुषों को पराक्रम की आवश्यकता नहीं होती। यदि राजस पुरुषों के विशाल समूह से सामना करना हो तो पहले अपने पराक्रम का भी परीक्षण करना चाहिए। अन्ना ने यह बात अब जाकर अनुभव की होगी। हम नहीं मानते कि अन्ना हारकर बैठ जायेंगे। दूसरी बात यह भी लगती है कि वह अपने वर्तमान राजस पुरुषों के साथ लेकर अपना अभियान चलने वाले भी नहीं है।
        हम जब अन्ना हजारे के अभियान से राजनीतिक पक्ष से हटकर उसका सामाजिक पक्ष देखते हैं तो लगता है कि अन्ना हजारे की त्यागी छवि जनमानस में है। इसलिये भविष्य में उनको समर्थन नहीं मिलेगा यह सोचना बेकार है। मुश्किल यह है कि अन्ना हजारे को बौद्धिक वर्ग का समर्थन अधिक नहीं मिला। इसका कारण यह है कि इस देश ने कई आंदोलन और उसके परिणाम देखे हैं जिससे निराशावादी दृष्टिकोण उभरता है। अन्ना हजारे के आंदोलन से जुड़े स्वयं सेवी और उनके संगठनों की निष्ठा को लेकर लोगों के मन में अनेक संदेह थे। देश के बौद्धिक समाज से जुड़े अनेक लोगों के लिये वह किसी भी दृष्टि से स्वयंसेवक नहीं थे। समाज सेवा में उनकी भूमिका धनपतियों और आमजनमानस के बीच उनकी भूमिका मध्यस्थ की थी। वैसे हमारा मानना है कि अन्ना को अपना अभियान राजनीति से जुड़े विषय से हटकर समाज में फैले अंधविश्वास, रूढ़िवादिता और भेदभाव मिटाने के लिये प्रारंभ करना चाहिए। हालांकि यह कहना कठिन है कि इसके लिये उनको प्रायोजक मिलेगा या नहीं। एक बात तय रही कि बिना प्रायोजन के ऐसे आंदोलन चल नहीं सकते।
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लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर 
poet, writer and editor-Deepak 'BharatDeep',Gwalior

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19 दिसंबर 2011

खास लोगों का फैसला-हिन्दी कविता (khas logon ka faisla-hindi kavita or poemor shayari))

वह चाहते हैं कि
हम सच के घोड़े पर सवारी करें,
स्वयं झूठ के महल में ऐश करते रहें,
जंग में मैदान में हम अपना खून बहायें
वह वातानुकूलित कक्ष में बैठकर
अपने पसीने से बचते रहें।
कहें दीपक बापू
जहान के दस्तूर अपने मतलब के लिये
बार बार बदल जाते है,
चतुर करें राज
सज्जन स्वार्थ की बलि चढ़ जाते हैं,
दौलत मंदों की हुकुमत रोज बढ़ती है,
ओहदेदारों की तकदीर हर कदम चढ़ती है,
इसलिये खास लोगों का फैसला है
आम इंसान हमेशा सस्ता रहे।
लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर 
poet, writer and editor-Deepak 'BharatDeep',Gwalior

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12 दिसंबर 2011

रविवार का दिन अध्यात्म के लिये महत्वपूर्ण-हिन्दी लेख (sanday for religionor adhyatma and music-hindi lekh and article

               इधर टीवी चैनलों ने अन्ना हजारे के एकदिवसीय अनशन को अपने पर्दे पर इस तरह सजा लिया था कि पूरे दिन कुछ नहीं दिखाना है तो मनोरंजन चैनलों ने पुराने कार्यक्रम दोबारा प्रसारित करने की तैयारी कर ली थी। तब हम एक सत्संग कार्यक्रम के लिये रवाना हो रहे थे। हमें पता था कि आज समाचार चैनलों पर सिवाय उसके कुछ दिखने वाला नहीं है। जहां तक मनोंरजन चैनलों की बात है तो वह सोमवार से शुक्रवार तक प्रसारित कार्यक्रमों का शनिवार तथा रविवार को पुनः प्रसारण करते हैं। ऐसे में रविवार और शनिवार टीवी चैनलों के कार्यकर्ताओं को अवकाश मिल जाता होगा पर आम दर्शक के लिये यह अमनोरंजक स्थिति होती है।
         सप्ताह में एक दिन किसी मंदिर या आश्रम में जाना अगले सप्ताह के लिये अपना मानसिक संतुलन बनाये रखने का एक अच्छा माध्यम बन सकता है बशर्ते कि उसकी अनुभूति करना भी आती हो। जिस तरह कहा जाता है कि पैसा कमाया जा सकता है पर सुख नहीं, उसी तरह आप चाहे मंदिर जायें या आश्रम जब तक आपके हृदय में अध्यात्म के प्रति गहरा रुझान नहीं है मन में उसका प्रभाव अनुभव नहीं कर सकते। जिनका अध्यात्म के प्रति झुकाव है वह आश्रमों या मंदिरों में जाकर मत्था टेकते हैं। वहां अगर भजन या प्रवचन सुनते हैं। इससे प्रतिदिन जो बोरियत से भरी दिनचर्या होती है, उससे विरक्त होकर जो सुख मिलता है वह केवल ज्ञानी ही जानते हैं। अज्ञानी लोग इससे ही तृप्त नहीं होते बल्कि वह मंदिरों, आश्रमों या देवस्थानों में कार्यरत महंतों, संतों तथा सेवकों की करीबी भी चाहते हैं। उनको लगता है कि इससे अधिक आत्मिक सुख मिलेगा। हमारा मानना है कि महंत, साधु, संत, या सेवकों का सानिध्य केवल मायावी व्यवहार है उसका अध्यात्म से कोई संबंध नहीं है।
        दानव को तो दूर से ही प्रणाम करना चाहिए पर देवता से भी दूरी रखना चाहिए। अग्नि देवता हैं, पूज्यनीय हैं पर हम उनका उपयोग अपनी वस्तुओं को पकाने के लिये करते हैं न कि उसमें घुसकर अपनी देह पकाते हैं। वायु देवता का सहज स्पर्श होता है पर हम उसे पकड़ते नहीं है। जल देवता है पर हम उसे पेट में डालते हैं न कि हाथ में पकड़कर प्यास बुझाते हैं। नहाते हैं तो फिर पौंछते हैं पानी का चिपका कर नहीं रखते। उसी तरह साधु, संतों, महंतों और सेवकों से भजन और प्रवचन सुनना चाहिए। उनके ज्ञान को धारण करने का प्रयास करें तो बहुत अच्छा, पर उनके निकट रहने का लोभ नहीं करना चाहिए। भजन, प्रवचन या सत्संग से आगे जाना भ्रष्टाचार को आमंत्रण देना है। तब हम भक्त से ग्राहक बन जाते हैं। ऐसे में अपने आपको दोहन के लिये प्रस्तुत करना अज्ञान का प्रमाण है।
            आश्रम से निकलकर हमारे मन में ख्याल आया कि आज मौसम अच्छा है तो कहां जायें? शहर में तानसेन समारोह चल रहा है। हमारे एक संगीतज्ञ मित्र ने हमसे कहा था कि शास्त्रीय संगीत में खूबी यह है कि अगर आप उसके जानकार नहीं है तो वह प्रारंभ में आपको प्रभावित नहीं करेगा पर जब धैर्य से सुनेंगे तो आपके अंदर वह ऐसा प्रभाव छोड़ेगा कि उसके मुरीद हो जायेंगे। तालाब के किनारे हमने वायलिन वादन सुना। आंखें बंदकर ध्यान से सुना। वाकई कुछ देर में अद्भुत आनंद देने लगा। ऐसा लगता था कि मस्तिष्क के अंदर कोई ब्रुश कचड़े की सफाई कर वहां सुंगध फैला रहा है। साजों से आ रही आवाज पूरी देह में एक उत्साह का संचार कर रही थीं। तब यह बात समझ में आयी कि संगीत की अपनी शक्ति है पर फिल्मों के गीतों को सुनते हुए हम लोगों की समझ कम हो गयी है। उसमें बेमतलब के शब्द लिखकर अनेक महान गीतकार हो गये हैं जबकि इसका सारा श्रेष्ठ संगीत को होना चाहिए।
         अभी महान कलाकार देवानंद का देहावसान हो गया। उनकी स्मृति में अनेक गाने टीवी पर देखने को मिले। अधिकतर किशोरकुमार की आवाज में थे। देवानंद साहब ने तो बस होंट भर हिलाये थे। महान गायक किशोरकुमार ने अनेक नायकों के अभिनय को अपनी आवाज से जीवंत बनाया। तय बात है कि अधिकतर फिल्में अपने गीतों की वजह से जानी गयी। उनमें संगीत की प्रधानता थी। अगर अकेले कोई गायक बिना साज के गाये तो आम आदमी जैसी चिल्लपों करते दिखता है।
         हाल ही में मशहुर हुए कोलिवरी डी गाने में क्या है? तमिल और अंग्रेजी के मिलेजुले शब्दों से भरे शब्दों को जो संगीत दिया गया है उसने उसे ऐसी प्रसिद्ध दिलाई कि उसने अनेक भाषाओं में डब किया जा रहा है। संगीत का प्रभाव ऐसा है कि हिन्दी धारावाहिकों में हर वाक्य के बाद संगीता बजता है। उसमें पात्रों के अभिनय और उनके संवादों को प्रभावी बनाने का यह प्रयास इस बात को दर्शाता है कि हमारे कथित निर्देशकों की क्षमतायें बहुत सीमित हैं।
         बहरहाल अध्यात्म और संगीत से रविवार बेहतर हो सकता है और उस समय हम अपनी सप्ताह भर की नियमित दिनचर्या से अलग होकर मन में नवीनता का आभास कर सकते हैं बहरहाल इस रविवार को बस इतना ही ।
लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर 
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2 दिसंबर 2011

उस्ताद, शागिर्द, चिमटा और मॉल-लघु हास्य व्यंग्य (ustad, shagird,chimta and mol-short hasya vyangya)

                उस्ताद ने शागिर्द से कहा-’‘चल आज शहर के किसी मशहूर मॉल में घूम कर आयें। हमने बहुत सुना है कि नयी पीढ़ी के लोग मॉल में घूमने और खरीदने जाते हैं। इधर अपनी दरबार यहां शगिर्दों का का अकाल पढ़ गया है। सभी हमारी तरह बूढ़े हो गये हैं। कई तो नौकरी और धंधे से रिटायर होकर खोपड़ी खाने आते हैं। पहले की तरह दान और चंदा मिलता नहीं है। बैठे बैठे बोरियत होने लगी है। अपनी कोशिशों से नयी पीढ़ी के शागिर्द बनायेंगे।
           शागिर्द ने कहा-‘‘ मॉल में जाकर करेंगे क्या? वहां नयी पीढ़ी के लोग खरीदने आते हैं तो बच्चे नये खेल खेलने के लिये माता पिता को साथ लाते हैं। आपको वहां नये चेले कदापि नहंी मिलेंगे। आज की पीढ़ी के लोगों को शहर में इश्क लड़ाने के लिये उद्यान या खाली मैदान मिलते नहीं है। ऐसे सैर के स्थान विकास की भेंट चढ़ गये हैं। इसलिये मॉल में खरीदने के जवान पीढ़ी के लोग बहाने इश्क लड़ाने आते हैं। आप वहां चलेंगे तो अजूबा लगेंगे।’’
           उस्ताद अपना चिमटा तीन चार बार बजाकर बोले-‘‘तू हमारी मजाक उड़ाता है। अरे, हम पहुंचे हुए सिद्ध हैं। वहां जाकर अपने लिये नये चेले तलाश करेंगे। यह चिमटा बजाकर लोगों को अपनी तरफ खीचेंगे। तुम हमारी सिद्धि का बयान करना। हो सकता है कुछ आशिक और माशुकाऐं अपने इश्क की कामयाबी का तरीका पूंछें। हम उनको उपाय बतायेंगे। कुछ का काम बनेगा कुछ का नहीं! जिनका बनेगा वह मनौती पूरी होने के एवज में हम पर चढ़ावा चढ़ायेंगे।
शागिर्द बोला-‘‘महाराज अगर चलना है तो फिर है चिमटा वगैरह छोड़ दीजिये। इस धोती और कुर्ते को छोड़कर जींस और शर्ट पहन लीजिये। अपनी दाढ़ी कटवा लीजिये। इस वेशभूषा में मॉल के प्रहरी अंदर घुसने नहीं देंगे।’’
         उस्ताद ने कहा-‘‘हम यह चिमटा नहीं छोड़ सकते क्योंकि यह हमारी पहचान है। वेशभूषा बदल देंगे, दाढ़ी कटवा देंगें और तुम कहो तो मूंछें भी मुड़वा देंगे। सफेद बालों को भी काला कर लेंगे, पर यह चिमटा नहीं छोड़ सकते। यह तो लेकर चलेंगे ही।
         शागिर्द बोला-‘महाराज, आप अपनी जिद छोड़ दें। यह चिमटा हथियार की तरह लगता है। प्रहरी अंदर नहीं जाने देगा।
           उस्ताद ने कहा-‘‘उसकी यह हिम्मत नहीं हो सकती। हम उसे समझायेंगे कि यह चिमटा है न कि हथियार, तब अंदर जाने देगा। कौनसे मॉल का कौनसा कायदा है कि चिमटा हथियार है जिसे लेकर अंदर नहीं जाया जा सकता।’’
शागिर्द बोला-‘‘नहीं है तो बन जायेगा। मॉल वाले कोई छोटे मोटे लोग नहीं होते। ऐसा कायदा आपके वहीं खड़े खड़े तत्काल बनवा भी देंगे कि चिमटा लेकर अंदर प्रवेश वर्जित है। इन दौलतमंदों के हाथ में सारा जमाना है। चलने, फिरने और उठने बैठने के इतने कायदे बन गये हैं कि आपको पता ही नहीं है। आप क्यों एक नया कायदा बनवाना चाहते हैं कि चिमटा लेकर मॉल में घुसना मना जाये? यह तय है कि चिमटा लेकर अंदर नहीं जाने दिया जायेगा। आप ज़माने पर एक कायदा लदवाने की बुराई अपने सिर क्यों लेना चाहते है? इससे आपके पुराने शगिर्द भी नाराज हो जायेंगे।’’
उस्ताद का चेहरा उतर गया और उन्होंने मॉल जाने का इरादा छोड़ दिया।
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लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर 
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21 नवंबर 2011

जब उत्तर प्रदेश का नाम गुम हो जायेगा-हिन्दी लेख (divisan aur partision of uttarprades,uttarpradesh ka nam gum jayega-hindi lekh or article)

             हमारे देश के राज्य पच्चीस हों या पचास यह महत्वपूर्ण नहीं है जितना यह कि यहां समाज कितना मजबूत और आत्मनिर्भर हो। पिछले कुछ समय देश में एक राज्य को दो भागों में बांटकर विकास करने का सपना दिखाया जा रहा है। उत्तर प्रदेश को तो चार भागों में बांटना प्रस्तावित किया गया है। सवाल यह है कि क्या हमारे देश के किसी प्रदेश का विकास केवल क्या इसी कारण अवरुद्ध हो रहा है यहां राज्य बड़े हैं? एक अर्थशास्त्र का विद्यार्थी शायद ही कभी इस बात को माने। जब हम देश में गरीबी, बेरोजगारी और भुखमरी की समस्यायें देखते हैं तो यह बात समझना चाहिए कि यह अर्थशास्त्र का विषय है। ऐसे में हम जब लोगों को आर्थिक विकास का सपना देख रहे हैं तो यह भी देखना चाहिए कि हमारी देश के संकटों और समस्याओं पर अर्थशास्त्रियों का क्या नजरिया है?
              देश में बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, सामाजिक विद्वेष और गरीबी बढ़ रही है। हम यह दावा करते रहते हैं कि भारत में शिक्षा अगर पूर्ण स्तर पहुंच जाये तो विकास सभी जगह परिलक्षित होगा मगर हम देख रहे हैं कि हमारे यहां शिक्षित वर्ग में बेरोजगारी का संकट सबसे अधिक भयावह है। सच से सभी ने मुंह फेर रखा है। अनेक अर्थशास्त्री और समाजशास्त्री हैं पर चलते है जो विचार तो पश्चिम के सिद्धांतों के आधार पर करते हैं पर जब देश की बात आती है तो उनका नजरिया एकदम जड़ हो जाता है। देश में सबसे बड़ी समस्या गरीबी है और जिसका सीधा संबंध अर्थशास्त्र से है। अगर हम अर्थशास्त्र की दृष्टि से देखें भारत के पिछड़ेपन का मुख्य कारण, अधिक जनसंख्या, खेती और उद्योगों के परंपरागत ढंग से करना, सामाजिक रूढ़िवादिता आर्थिक असमानता के साथ अकुशल प्रबंध है। अगर हम यह चाहते हैं कि हमारा देश सर्वांगीण विकास करे तो हमें इन्हीं समस्याओं से निजात पाना होगा।
            अधिक जनंसख्या, खेती और उद्योगों को परंपरागत ढंग से करना तथा सामाजिक रूढ़िवादिता का संबंध जहां आम जनमानस से है वहीं अकुशल प्रबंध के दायरे में राज्य भी आता है। यह अकुशल प्रबंध लापरवाही और भ्रष्टाचार के कारण है। राज्य चाहे छोटे हों या बड़े अगर उनका आर्थिक और प्रशासनिक प्रबंधन कुशल नहीं है तो चाहे जितना प्रयास किया जाये विकास नहीं हो सकता। उस पर भ्रष्टाचार जहां नस नस में समा गया हो वहां तो कहना ही क्या?
        हम यह भी देखें कि जिन राज्य को विभाजित किया गया तो उनका विकास कितना हुआ? यह सही है कि नवगठित राज्यों की राजधानी बने शहरों में उजाला हो गया पर बाकी हिस्से तो अंधेरे में ही डूबे हुए हैं। एक दिन फिर उन्हीं राज्यों में पुनः विभाजन की मांग उठेगी। तब उसे माना जाता है तो फिर कोई नया शहर राजधानी बनेगा तब वह भी रौशन हो उठेगा मगर बाकी हिस्से में अंधियारा राज्य करेगा। इस तरह तो हर बड़े शहर को राज्य बनाना पड़ेगा। तब हम फिर उसी रियासती युग में पहुंच जायेंगे। ऐसे में सवाल उठता है कि आजादी के बाद रियासते बनी रहने दी जाती और राजाओं की जगह सरकारी नुमाइंदे रखे जाते या फिर हर राज्य का प्रमुख जनता से चुना जाता है। हालांकि तब भी यह सुनने का अवसर पुराने लोगों से मिलता कि इससे तो राजशाही ठीक थी। आज भी अनेक पुराने लोग अंग्रेज राज्य को श्रेयस्कर मानते हैं।
       कहने का अभिप्राय यह है कि जब तब हम अपने यहां कुशल प्रबंधन का गुण विकसित नहीं करते तब तक देश के किसी भी हिस्से को विकास का सपना दिखाना अपने आप को ही धोखा देना है। हैरानी तब होती है जब आम जनमानस इस तरह सपने दिखाने पर ही खुश हो जाता है। आखिरी बात यह कि उत्तर प्रदेश राजनीतिक रूप से बड़ा प्रदेश रहा है पर जैसा कि राजनीतिक स्थितियां सदैव समान नहीं रहती। अगर उत्तरप्रदेश का बंटावारे वाला प्रस्ताव साकार रूप लेता है तो भारतीय नक्शे से उसका नाम गायब हो जायेगा। उत्तर प्रदेश के करीब करीब सारे शहर बड़े और एतिहासिक हैं-जैसे आगरा, इलाहाबाद, वाराणसी, लखनऊ, गोरखपुर, मथुरा, कानपुर आदि। यह नक्शे में रहेंगे पर उत्तरप्रदेश गायब हो जायेगा। हम इसे अध्यात्मिक दृष्टि से देखें तो जमीन और लोग वहीं हैं और रहेंगे पर उन पर नियंत्रण करने वाला राजकीय स्वरूप बदल जायेगा। न कहीं से हमला न न क्रांति होगी पर उत्तर प्रदेश शब्द का पतन हो जायेगा। इंसानों के हाथ से बनाये नक्शे बदलते रहते हैं पर मानवीय प्रकृतियां यथावत रहती हैं। इन्हीं प्रकृतियों को जानना और समझना तत्व ज्ञान है। मथुरा के जन्मे और वृंदावन पले भगवान श्रीकृष्ण का तत्वज्ञान आज विश्व भर में फैला है। इस मथुरा और वृंदावन ने कई शासक देखे पर उनका अध्यात्मिक स्वरूप भगवान श्री कृष्ण की जन्म तथा बाललीलाओं के कारण हमेशा बना रहा। उत्तरप्रदेश के अनेक शहरों का भारतीय अध्यात्मिक दृष्टि से महत्व है और रहेगा। भले ही भारतीय नक्शे से उत्तर प्रदेश गायब हो जाये। एक आम लेखक और नागरिक के रूप में राज्य के छोटे या बड़े होने से हमारा कोई सरोकार नहीं है पर इतना जरूर कह सकते हैं कि उत्तरप्रदेश के नाम के पीछे उसके अनेक बड़े शहरों का एतिहासिक तथा अध्यात्मिक स्वरूप दब गया है और संभव है कि विभाजन के बाद उनकी प्रतिष्ठा अधिक बढ़े। यह कहना कठिन है कि यह बंटवारा कब तक होगा पर एक बार प्रस्ताव स्थापित हो गया है तो वह कभी न कभी प्रकट रूप लेगा ऐसी संभावना तो लगती है।
लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर 
poet, writer and editor-Deepak 'BharatDeep',Gwalior

writer aur editor-Deepak 'Bharatdeep' Gwalior

15 नवंबर 2011

इंसानों के वादे -हिन्दी शायरी (insano ke vaade-hindi shayari or poem)

आम इंसान हो या खास
चाहे जब वादे कर चले जाते हैं।
सबकी याद्दाश्त सिमटी है अपने मतलब तक,
फरिश्ता बनने कि ख्वाहिशें पाले सभी हैं
अपने पेट भरने के बाद सभी हैं जाते हैं थक,
फिर भी ताकत कोई है इस धरती पर
जो मझधार में फंसे लाचारों की नाव
वादा न करने वाले
अजनबी पार लगा जाते हैं।
लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर 
poet, writer and editor-Deepak 'BharatDeep',Gwalior

writer aur editor-Deepak 'Bharatdeep' Gwalior

10 नवंबर 2011

श्रीगुरूनानक जयंती/प्रकाशपर्व की सभी को हार्दिक बधाई-हिन्दी लेख (shri gurunanak jayanti/prakashparva ki badhai-hindi article or lekh

आज पूरे विश्व में श्रीगुरुनानक देव का जन्मदिन मनाया जा रहा है। हालांकि अनेक लोग अब अपनी संकीर्ण मानसिकता के कारण उनको सिख धर्म के प्रवर्तक के रूप में मानते हैं जबकि ज्ञानी लोग उन्हें हिन्दू धर्म की आधुनिक विचाराधारा के प्रवाहक की तरह मान्यता देते हैं। कहा जाता है कि सिख धर्म का प्रादुर्भाव हिन्दू धर्म की रक्षा के लिये हुआ था। कालांतर में इसे प्रथक माना जाने लगा पर भारतीय अध्यात्म में श्रीगुरुनानक देव को भगवान स्वरूप माना जाता है और प्रत्येक भारतीय उनका नाम सम्मान से लेकर अपना जीवन धन्य समझता है। भारतीय जनमानस की यह धारणा है कि उसके ऊपर चाहे दैहिक संकट हो या मानसिक हर स्थिति में भगवान ही उससे रक्षा करते हैं। श्रीगुरुनानक जी ने उस समय भारतीय अध्यात्म को अपना योगदान दिया जब देश में वैचारिक संकट का ऐसा दौर था जिसमें समाज कुछ स्वेच्छा तो कुछ राजनीतिक दबाव के कारण परिवर्तन की तरफ बढ़ रहा था। एक तरफ भारतीय पौंगा पंडित अपने अंधविश्वासों के साथ भारी व्यय वाले कर्मकांडों का विस्तार कथित रूप से समाज की रक्षा के लिये कर रहे थे तो दूसरी तरफ बाहरी ताकतों से प्रभावित तत्व इस देश पर नियंत्रण करने के लिये विदेशी विचारों को अस्त्र शस्त्र का उपयोग करते हुए जूझ रहे थे। श्रीगुरुनानक जी ने दोनों को ही लक्ष्य कर भारतीय समाज में एक नयी विचाराधारा को प्रवाहित किया।
देखा जाये तो भारतीय दर्शन में यह माना गया है कि निरंकार और साकार भक्ति दोनों ही परमात्मा के प्रति ध्यान स्थापित करने से होती है। इसके अलावा निष्काम कर्म और सकाम कर्म को भी सहजता से स्वीकार किया गया है। इसके बावजूद ज्ञान और हार्दिक भक्ति को ही मनुष्य में श्रेष्ठ गुण स्थापित करने वाला तत्व माना जाता है। अगर हृदय स्वच्छ नहीं है तो फिर सारा धर्म कर्म बेकार है-ऐसा कहा जाता है। भारतीय समाज में ऐसे तत्व भी रहे हैं जो दूसरों को निष्काम रहने का उपदेश देते हैं पर इसके बदले स्वयं सकाम होकर उनसे फल चाहते हैं। गुरुनानक के काल में ऐसे ही गुरुओं का जमघट था। जिनका आशय यह था कि हमने तुंम्हें निष्काम होने का ज्ञान दिया और अब तुम हम पर निष्प्रयोजन दया करो। इस तरह मनुष्य के अंदर स्थित अध्यात्मिक प्रवृत्ति का धर्म के धंधेबाजों ने दोहन करने का हमेशा प्रयास किया है। कई लोग तो बड़ी बेशरमी से कहते हैं कि ‘सुपात्र को दान दो’, और जब आदमी देने के लिये हाथ उठाये तो वह अपना सिर आगे कर कहते हैं कि ‘हमीं सुपात्र हैं’।
ऐसे ही अंधविश्वासों और धार्मिक पाखंडों को श्रीगुरुनानक जी ने लक्ष्य कर उन्हें दूर करने का प्रयास किया उन्होंने मायावी संसार में सत्य की पहचान कराई। यही कारण है कि हमारे यहां अध्यात्मिक महापुरुषों में गुरु शब्द उनके ही नाम से जोड़ा जाता है।
श्री गुरुवाणी में कहा गया है
साहिब मेरा एको है।
एको है भाई एको है।।
‘‘एक औंकार (1ॐ ) शब्द के माध्यम से यह बताया गया है कि सर्वत्र एक ही ईश्वर व्याप्त है।"
आदि सब जुगादि सच।
है भी सच,
नानक होसी भी सच।।
"उसका नाम सत्य है।"
सचु पुराणा हौवे नाही
‘‘हर वस्तु यहां पुरानी हो जाती है पर सत्य पुराना नहीं होता।’’
श्रीगुरुनानक जी ने अपना जीवन मस्तमौला फकीर की तरह बिताया। उनका जन्म एक व्यवसायी परिवार में हुआ पर उन्होंने देश के लिये ऐसी ज्ञान संपत्ति का अर्जन किया जो हमेशा अक्षुण्ण रहेगी। भक्ति के माध्यम से भगवान को प्राप्त करने का जो उन्होंने मार्ग दिखाया वह अनुकरणीय है। ऐसे महापुरुष को हृदय से प्रणाम।
इस अवसर पर समस्त ब्लाग लेखक मित्रों तथा पाठकों को बधाई। इस संदेश के साथ कि वह भगवान श्रीगुरुनानक देव के मार्ग का अनुसरण कर अपना जीवन धन्य करें।
दीपक भारतदीप,लेखक संपादक

लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर 
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