21 सितंबर 2011

दिल की दरार-हिन्दी कवितायें (dil ke darar or hurt of heart-hindi kavita or poem)

कितनी बार भी भूख लगी
खाने पर मिट गयी,
कितनी पर प्यास भी लगी
पानी मिलने पर मिट गयी,
मगर पड़ी जो दिल में दरारें
बनी रहीं चाहे पीढ़ी दर पीढ़ी मिट गयी।
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वह लोगों में
धरती पर जन्नत लाने का
सपना सजाते हैं,
वादों को बड़ी खूबसूरती से सजाते हैं,
एक बार जो चढ़ गये सिंहासन की सीढ़ी
फिर महलों से बाहर नहीं आते हैं।
दिल मिलाने की बातें भले ही करते
मगर दरारें चौड़ी ही किये जाते हैं।
लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर 
poet, writer and editor-Deepak 'BharatDeep',Gwalior

writer aur editor-Deepak 'Bharatdeep' Gwalior

11 सितंबर 2011

हिन्दी भाषा का महत्व उसके अध्यात्मिक ज्ञान से परिपूर्ण होने के कारण-हिन्दी दिवस पर लेख (hindi ka mahatva or importance and sanskrit-special article on hindi diwas or divas on 14 septembdar)

     संस्कृत देवभाषा कही गयी है जिसमें हमारे अध्यात्म दर्शन का बड़ा भारी खजाना जमा है। यह पता नहीं कि संस्कृत एक कठिन भाषा है इसलिये भारत में इसका विस्तार नहीं हुआ या अपने समय में इसे कुछ खास लोग ही लिखना पढ़ना जानते थे जो बिना इस परवाह किये अपने रचनाकर्म के आगे बढ़ते रहे कि आखिर उनकी बात समाज के पास पहुंच रही है इसलिये उन्होंने अपनी भाषा को आमजन का हिस्सा बनाने का प्रयास नहीं किया। संस्कृत के बारे में इतिहासकार क्या सोचते हैं यह एक अलग बात है पर हमारा मानना है कि किसी समय यह भाषा केवल रचनाकारों के लिये उपयुक्त मानी जाती रही होगी। आमजन की भाषा यह शायद ही कभी रही होगी। जब हम किसी समय के इतिहास को पढ़ते हैं तो उसमें वर्णित पात्रों के इर्दगिर्द ही हमारा ध्यान जाता है। उनसे जुड़े समाज या आमजन की वास्तविक स्थिति का आभास नहीं हो पाता। जब समाज या आमजन की एतिहासिक स्थिति जानना हो तो अपने वर्तमान को देखकर ही अनुमान किया जा सकता है। संस्कृत किस तरह इस देश में अपना स्थान बनाये रख सकी होगी इसका आज की हिन्दी तथा अन्य क्षेत्रीय भाषाओं की स्थिति को देखकर अनुमान लगाया जा सकता है।
     हिन्दी के बारे में कहा जाता है कि इसकी बोली हर पांच कोस पर बदल जाती है। अनेक भाषायें ऐसी हैं जिनको हिन्दी माना जाता है पर उनका आधार क्षेत्र विशेष है। अगर हम भक्ति काल का हिन्दी साहित्य देखें तो उसमे कहीं भी आधुनिक हिन्दी का बोध नहीं होता पर उनको हिस्सा तो हिन्दी साहित्य का ही माना गया। कहा जाता है कि देश की अनेक भाषायें संस्कृत से निकली हैं। हम हिन्दी को देखकर इसे नहीं मान सकते। उस समय भी संस्कृत ऐसे ही रही होगी जैसी आज हिन्दी! हर पांच कोस पर उसका रूप बदलता होगा। अगर हम आधुनिक हिन्दी की बात करें तो हमारा ग्रामीण समाज वैसी शुद्ध हिन्दी नहीं    बोलता। उसकी बोली में स्थानीय पुट रहता है।
     हमने शैक्षणिक काल के दौरान जिस हिन्दी का अध्ययन किया वैसी समाज में कम भी बोलती दिखी। जब लिखना शुरु किया तो प्रयास यह किया कि बोलचाल से प्रथक रचनाओं में कुछ साहित्यक पुट भाषा में दिखे। सच तो यह है कि जैसी हिन्दी प्रतिदिन बोलते हैं वैसी लिखते नहीं है। लेखक दिखने के लिये कुछ औपचारिकता आ ही जाती है और भाषा में कहीं न साहित्यक पुट स्वतः उत्पन्न होता है। जिन्होंने संस्कृत में रचनाऐं कीं उन्होंने अपने रचनाकर्म में  भाषा की मर्यादा रखी पर यह आवश्यक नहीं है कि वह बोलते भी वैसा ही हों जैसा लिखते थे। शायद इसी कारण ही संस्कृत को देव भाषा कहा गया। संस्कृत से देशी भाषायें निकली हैं यह कहना गलत लगता है पर उस समय यह देश के आमजन की भाषाओं की प्रतिनिधि भाषा रही होगी जैसी आज हिन्दी है। जब वाराणसी में संस्कृत लिखी जाती होगी तो वहां आमजन इसको बोलता होगा यह जरूरी नहीं है। उसी काल में तमिलनाडु या अन्य दक्षिण भारत में भी संस्कृत के वैसे ही विद्वान होंगे पर वहां कभी भाषा ऐसी रही होगी जिसमें स्थानीय भाषा के शब्द भी रहे होंगे। चूंकि पूर्व काल में संस्कृत भाषा को संस्थागत रूप से आगे बढ़ाने का प्रयास नहीं हुआ इसलिये यह आमजन में प्रचलित नहीं हुई। हिन्दी के विकास में संस्थागत प्रयासों ने बहुत कम किया है इसलिये शुद्ध हिन्दी का स्वरूप सभी जगह एक जैसा दिखाई देता है।
       समय के अनुसार भाषाओं के रूप बदले होंगे तो उनमें अन्य भाषाओं के शब्द भी शामिल होकर उसकी शोभा बढ़ाते होंगे। एक बात तय है कि संस्कृत एक समय इस देश की अकेली भाषा नहीं  रही होगी अलबत्ता नेतृत्व उसका रहा होगा। देश की भौगोलिक, सामाजिक, भाषाई, सांस्कृतिक तथा एतिहासिक विविधता को देखते हुए यह बात साफ लगती है कि यहां कोई एक भाषा अस्तित्व बनाये नहीं रख सकती है।
       इसमें कोई शक नहीं है कि हमारे देश का सांस्कृतिक आधार आज भी संस्कृत की रचनायें हैं। हिन्दी उसकी जगह ले सकती थी पर ऐसा नहीं हो सका। इसका कारण न केवल राजनीतिक और सामाजिक है बल्कि हिन्दी भाषी कर्णधारों का कमजोर रचनाकर्म भी है। भक्ति काल की रचनाओं के बाद ऐसी रचनायें नहीं आयी जो समाज को रास्ता दिखाती। हिन्दी रचनाकार अपनी रचनाओं के माध्यम से समाज की दिशा बदलना चाहते रहे पर वह पाठक या आमजन का नया लक्ष्य नहीं तय कर पाये। समाज को पश्चिम जैसा आधुनिक दिखने का संदेश देते रचनाकर्मी यह नहीं बता सके कि उससे क्या होना था? मुख्य बात यह कि आधुनिक हिन्दी रचनाकर्मी एक बात भूल गये कि भारतीय जनमानस अंततः अध्यात्म की तरफ जाता है। यह उसके खून में है। सबसे बड़ी बात यह कि हिन्दी में बड़ी बड़ी बातें लिखी जाती हैं। अनेक लोग तो तात्कालिक घटनाओं की विवेचना कर स्वनाम धन्य हो जाते हैं तो अनेक समाज की पीड़ा को बाहर लाकर उसके इलाज में लाचारी दिखाते हैं।
         वह स्वयं मुखर होते दिखना चाहते हैं पर भारतीय जानमानस बिना अध्यात्मिक तत्व के प्रभावित नहीं होता।
        ऐसा लगता है कि संस्कृत किसी समय में अध्यात्म की भाषा रही होगी। हिन्दी में महाकवि तुलसी को सबसे ऊंचा स्थान रामकथा के कारण ही मिला जिसे हम आज अपनी अध्यात्मिक धरोहर मानते हैं। इससे यह तो तय हो गया है कि संस्कृत की उतराधिकारिणी हिन्दी ही है। ऐसे में सभी हिन्दी लेखकों से यह अपेक्षा करना ठीक नहीं है कि सभी अध्यात्मिक ज्ञानी हो जायें पर भारतीय जनमानस को बदलना भी संभव नहीं है। संस्कृत से अनुवाद होकर ही भारतीय अध्यात्मिक रचनाऐं आम जनमानस का हिस्सा बनी। इस संबंध में गोरखपुर प्रेस की चर्चा करना आवश्यक है जिन्होंने अकेले ही संस्कृत की विरासत को हिन्दी में स्थापित कर दिया। इससे हिन्दी अध्यात्मिक भाषा ही बन गयी। सांसरिक या कल्पित विषय जनमानस को आज भी अधिक नहीं सुहाते। यही कारण है कि आजकल व्यवसायिक हिन्दी संस्थान, फिल्म और टीवी वाले हिन्दी में अंग्रेजी के शब्द शामिल कर उसे वैश्विक भाषा बनाने में जुटे हैं ताकि वह अपने व्यवसाय के लिये नये आधार बना सकें। इस तरह व्यवसायिक हिन्दी बन रही है। दरअसल जिनको हिन्दी से पैसा कमाना है वह सोचते हैं कि कुछ अंग्रेजी के शब्द शामिल कर आज की युवापीढ़ी को अपना प्रयोक्ता बनाये। वह दावा करते हैं कि इससे हिन्दी का विकास होगा। यह सरासर बेकार बात है।
      हम दोष उनको भी नहीं देते। सभी लोग अध्यात्मिक विषय नहीं बेच सकते। इसलिये वह भाषा को आकर्षक बनाये रखने के लिये ऐसे प्रयास करेंगे। कभी अंग्रेजी तो कभी उर्दू के शब्द शामिल कर उसे चमकायेंगे।
      इसके विपरीत अनेक अध्यात्मिक संस्थान अपनी पत्रिकायें निकाल रहे हैं। वह शुद्ध हिन्दी का उपयेाग कर रहे हैं। इसका कारण यह है कि उनको पाठकों में ग्राहक नहीं बल्कि भक्त ढूंढने होते हैं। ऐसे अध्यात्मिक संस्थान सफल भी हैं जो हिन्दी में पत्रिकायें निकाल रहे हैं। उनको भाषा में तोड़फोड़ करने की आवश्यकता इसलिये भी नही है क्योंकि उनका आधार अध्यात्मिक है जो यहां के जनमानस की मनोरंजन से पहले की पसंद है। शायद ही किसी ने इस बात को रेखांकित किया हो कि जितने बड़े पैमाने पर इन अध्यात्मिक संस्थानों की पत्रिकायें बिक रही हैं उसका मुकाबला शायद ही कोई व्यवसायिक पत्रिका कर पाये। इसलिये जब यह व्यवसायिक पत्रिकायें भाषा की तोड़फोड़ कर रही है तो चिंता नहीं रह जाती क्योंकि अंततः हिन्दी अध्यात्म की भाषा है और अध्यात्मिक संस्थान उसको बचा रहे हैं।
       मूल बात जो हम कह रहे है कि हिन्दी से दूर जाने का आशय होगा अपने आपसे दूर जाना। अंग्रेजी कभी इस देश में मुख्य स्थान नहीं बना पायेगी। फिर अब हमारे देश की स्थिति आज भी दिख रही है उसमें आज भी हमारा आधार ग्रामीण और श्रमशील समाज है। वह अंग्रेजी से दूर है। जिन लोगों को विदेश जाकर नौकरी करनी हो या देश में बड़ा चाटुकार बनना हो उसके लिये अंग्रेजी ठीक है पर जिसे आम जीवन गुजारना है उसकी भाषा हिन्दी वह भी शुद्ध होना जरूर है। अंग्रेजी भाषा जहां बहिर्मुखी और आक्रामक बनाती है वहीं हिन्दी अंतर्मुखी और सहज जीवन जीने में सहायक होती है। अंतर्मुखी और सहज भाव ही मनुष्य की अध्यात्मिक प्रवृत्तियों को बचाये रखने में सहायक होती हैं। जब हम हिन्दी भाषा के अध्यात्मिक होने की बात कह रहे हैं तो हमारा आशय उस भाषा से है जिसमें भले ही क्षेत्रीय भाषाओं को पुट तो हो पर अंग्रेजी और उर्दू के प्रचलित शब्द उसमें कतई शामिल न हों। इन दोनों भाषाओं का मूल भाव हिन्दी जैसा नहीं है यह बात याद रखने लायक हैं।
        संस्कृत को अनेक विद्वान बचाने का प्रयास कर रहे हैं पर चूंकि उसका समग्र साहित्य हिन्दी में आ गया है इसलिये उसे भी वैसा ही सम्मान मिल रहा है। हिन्दी का महत्व अगर बखान करना हो तो केवल एक ही पंक्ति ही पर्याप्त है कि यह भारत की ही नहीं विश्व की अध्यात्मिक भाषा है। अगर अध्यात्मिक ज्ञान का सुख हृदय में प्राप्त करना है तो सिवाय हिन्दी भाषा के मस्तिष्क में धारण किये बिना वह संभव नहीं है।
लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर 
poet, writer and editor-Deepak 'BharatDeep',Gwalior

writer aur editor-Deepak 'Bharatdeep' Gwalior

28 अगस्त 2011

अन्ना हजारे (अण्णा हज़ारे) का अनशन समाप्त होना स्वागतयोग्य-हिन्दी लेख (end of anna hazare fast and agitation-hindi lekh or article)

                 महाराष्ट्र के समाज सेवी अन्ना हजारे आज पूरे देश के जनमानस में ‘महानायक’ बन गये हैं। वजह साफ है कि देश में जन समस्यायें विकराल रूप ले चुकी हैं और इससे उपजा असंतोष उनके आंदोलन के लिये ऊर्जा का काम कर रहा है। पहले अप्रैल में उन्होंने अनशन किया और फिर अगस्त माह में उन्होंने अपने अनशन की घटना को दोहराया। जब अप्रेल   में उन्होंने अनशन आश्वासन समाप्त किया तब उनका मजाक उड़ाया गया था कि वह तो केवल प्रायोजित आंदोलन चला रहे हैं। अब की बार उन्होंने 12 दिन तक अनशन किया। इस अनशन से भारत ही नहीं बल्कि विश्व जनमानस पर पड़े प्रभावों का अध्ययन अभी किया जाना है क्योंकि इस प्रचार विदेशों तक हुआ है। फिर जिन लक्ष्यों को लेकर यह अनशन किया गया उनके पूरे होने की स्थिति अभी दूर दिखाई देती है मगर देश के चिंतकों के लिये इस समय उनकी उपेक्षा करना ही ठीक है। अन्ना हजारे के अनशन आंदोलित पूरे देश के लोगों ने उसकी समाप्ति पर विजयोन्माद का प्रदर्शन किया पर महानायक ने कहा‘‘यह जीत अभी अधूरी है और अभी मैंने अनशन स्थगित किया है समाप्त नहीं।’ इस बयान से एक बात तो समझ में आती है कि अन्ना साहेब में राजनीतिक चातुर्य कूट कूटकर भरा है।
              अन्ना साहेब के बारह दिनों तक चले अनशन में तमाम उतार चढ़ाव आये और अगर उनका उसे छोड़ना ही सफलता माना जाये तो कोई बुरी बात नहीं है। साथ ही लक्ष्य से संबंधित परिणामों पर दृष्टिपात न करना भी ठीक है। पूरे देश का जनमानस ही नहीं जनप्रतिनिधियों के मन में जो भारी तनाव इस दौरान दिखा वह चौंकाने वाला था। इसका कारण यह था कि हिन्दी प्रचार माध्यम निरंतर इससे जुड़े छोटे से छोटे से घटनाक्रम का प्रचार क्रिकेट मैच की तरह कर रहे थे गोया कि देश में अन्य कोई खबर नहीं हो।
            अगर हम तकनीकी दृष्टि से बात करें तो अन्ना साहेब के प्रस्तावित जनलोकपाल ने अभी एक इंच कदम ही बढ़ाया होगा पर अन्ना साहेब की गिरते स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से यह भारी सफलता है। हम तत्काल इस आंदोलन के परिणामों पर विचार कर सकते हैं पर ऐसे में हमारा चिंत्तन इसके दूरगामी प्रभावों को देख नहीं पायेगा।  इस आंदोलन के लेकर अनेक विवाद हैं पर यह तो इसके विरोधी भी स्वीकारते हैं कि इसके प्रभावों का अनदेखा करना ठीक नहीं है।
         प्रधानमंत्री श्रीमनमोहन सिंह की चिट्ठी मिलने के बाद श्री अन्ना साहेब न अनशन तोड़ा। अपने पत्र में प्रधानमंत्री श्री मनमोहन सिंह ने यह अच्छी बात कही है कि ‘संसद ने अपनी इच्छा व्यक्त कर दी है जो कि देश के लोगों की भी है।’’
           उनकी इस बात में कोई संदेह नहीं है और इस विषय पर संसद के शनिवार को अवकाश के दिन विशेष सत्र में सांसदों ने जिस तरह सोच समझ के साथ ही दलगत राजनीति से ऊपर उठकर अपने विचार जिस तरह दिये वह इसका प्रमाण भी है। संभव है विशेषाधिकार के कारण कुछ सांसदों के मन में अहंकार का भाव रहता हो पर कल सभी के चेहरे और वाणी से यही भाव दिखाई देता कि किस भी भी तरह इस 74 वर्षीय व्यक्ति का अनशन टूट जाये जो कि इस देश के जनमानस का ही भाव है। सच बात तो यह है कि इस बहस में आंदोलन से जुड़े संबंधित सभी तत्वों का सार दिखाई देता है। यही कारण है कि प्रचार माध्यमों के सहारे इस आंदोलन की सफलता की बात कही गयी। अनेक सांसदों ने इस आंदोलन के उन देशी विदेशी पूंजीपतियों से प्रायोजित होने की बात भी कही जो भारत की संसदीय प्रणाली पर नियंत्रण करना चाहते हैं। इसके बावजूद सभी ने श्री अन्ना हजारे के प्रति न केवल सभी ने सहानुभूति दिखाई बल्कि उनके चरित्र की महानता को स्वीकार भी किया। देश के जनमानस का अब ध्यान करना होगा यह बात कमोबेश सभी सांसदों  ने स्वीकार की और इस आंदोलन के अच्छे परिणाम के रूप में इसे माना जा सकता है।
           देश के जिन रणनीतिकारों ने इस विषय पर संसद का विशेष सत्र आयोजित करने की योजना बनाई हो वह बधाई के पात्र हैं क्योंकि श्री अन्ना साहेब की वजह से देश के युवा वर्ग ने उसे देखा और यकीनन उसकी लोकतांत्रिक व्यवस्था में रुचि बढ़ेगी। देश के संासदों में अनेक ऐसे हैं जिन्होंने इस बात को अनुभव किया कि अन्ना साहेब की देश में एक महानायक की छवि है और उन पर आक्षेप करने का मतलब होगा देश की आंदोलित युवा पीढ़ी के दिमाग में अपने लिये खराब विचार करना इसलिये शब्दों के चयन में सभी ने गंभीरता दिखाई। बहरहाल कुछ सांसदों ने प्रचार माध्यमों पर आंदोलन को अनावश्यक प्रचार का आरोप लगाया पर उन्हें यह भी याद रखना होगा इसी विषय पर हुए विशेष सत्र के बहाने उन्होंने पूरे देश को संबोधित करने का अवसर पाया जिसे इन्हीं प्रचार माध्यमों ने अपने समाचारों में स्थान दिया। यह अलग बात है कि इस दौरान उनके विज्ञापन भी अपना काम करते रहे। वैसे तो संसद की कार्यवाही चलती रहेगी पर इस तरह पूरे राष्ट्र को संबोधित करने का अवसर सांसदों के पास बहुत समय बाद आया। उनको इस बात पर भी प्रसन्न होने चाहिए कि अभी तक प्रत्यक्ष रूप से राष्ट्र को संबोधित न करने के कारण जनप्रतिनिधियों पर देश के जनमानस की उपेक्षा का आरोप लगता है वह इस अवसर के कारण धुल गया क्योंकि उन्होंने देश की इच्छा को ही व्यक्त किया।
         हम जैसे आम लेखकों के पास इंटरनेट और प्रचार माध्यम ही है जिसके माध्यम से विचारणीय सामग्री मिलती है यह अलग बात है कि उसे छांटना पड़ता है। होता यह है कि समाचार पत्र और टीवी चैनल अपनी रोचकता का स्तर बनाये रखने के लिये किसी एक घटना में बहुत सारे पैंच बना देते हैं और फिर अलग अलग प्रस्तुति करने लगते हैं। सामग्री में दोहराव होता है और जब पाठकों और दर्शकों के अधिक जुड़ने की संभावना होती है तो उनके विज्ञापन भी बढ़ जाते हैं। समस्त प्रचार माध्यम धनपतियों के हाथ में और यही कारण है कि अन्ना साहेब के आंदोलन के प्रायोजन की शंका अनेक बुद्धिमान लोगों के दिमाग में आती है। इसमें कुछ अंश सच हो सकता है पर एक बात यह है अन्ना साहेब एक सशक्त चरित्र के स्वामी हैं।
             आखिरी बात यह है कि भोगी कितना भी बड़ा पद पा जाये वह बड़ा नहीं कहा जा सकता। बड़ा तो त्यागी ही कहलायेगा। यह नहीं भूलना चाहिए कि अन्ना साहेब ने अन्न का त्याग किया था। पूरे 12 दिन तक अन्न का त्याग करना आसान काम नहीं है। हम जैसे लोग तो कुछ ही घंटों में वायु विकार का शिकार हो जाते हैं। अन्ना साहेब ने एक ऐसे भारत की कल्पना लोगों के सामने प्रस्तुत की है जो अभी स्वप्न ही लगता है पर सबसे बड़ी बात वह अभी अपने प्रयास जारी रखने की बात भी कह रहे हैं। मुश्किल यह है कि वह अनशन शुरु कर देते हैं तब आदमी का हृदय कांपने लगता है। यही कारण है कि उनका अनशन टूटना भी ही लोगों में विजयोन्माद पैदा कर रहा है। उन्होंने जिस तरह आज की युवा पीढ़ी को वैचारिक रूप से सशक्त बनाया उसकी प्रशंसा तो की ही जाना चाहिए जो कि अंततः हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था के वाहक हैं।
लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर 
poet, writer and editor-Deepak 'BharatDeep',Gwalior

writer aur editor-Deepak 'Bharatdeep' Gwalior

15 अगस्त 2011

मजबूरी और बदलाव-हिन्दी शायरियां (mazboori aur badlav-hindi shayriyan)

जमाना बदल जाये
इस ख्वाहिश में
पूरी जिंदगी बीत जायेगी,
अगर खुद को बदल सको
बेहतर रहेगा,
नजरिया बदला तो
दुनियां बदली नजर आयेगी।
-------
तूफानों की ताकत बहुत है
मगर वह पेड़ उजाड़ते हैं
लगा नहीं सकते,
जिनके पास ताकत है जमाना बदलने की
पहले खुद बदलकर दिखाते हैं,
जिनमें कुब्बत नहीं है
वह मजबूरियों के नाम लिखाते हैं,
कमजोर लोग खाली शोर मचाकर नहीं थकते।
लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर 
poet, writer and editor-Deepak 'BharatDeep',Gwalior

writer aur editor-Deepak 'Bharatdeep' Gwalior

8 अगस्त 2011

जहां अमेरिका का नाम है-हिन्दी काव्य रचना

भारत आजाद देश
पर अर्थव्यवस्था गुलाम है,
कांपता है अमेरिका का डॉलर
बिगड़ता अपने रुपये का काम है,
जिनके हाथों में है दौलत की ताकत
उनकी आंखें ताक रहीं न्यूयार्क की तरफ
वाशिंगटन का बसा
उनके दिल में नाम है।
कहें दीपक बापू
अपनी आजादी अब भ्रम लगती है
जब धरती देती अन्न सोने की तरह,
आकाश बिखेरता जल मोती की तरह,
फिर भी गरीब और भूख मिटी नहीं
लॉस एंजिल्स के पर्दे पर
ऑस्कर लेकर भी पिटी नहीं,
भर गयी तिजोरियां
गरीबों की मदद करने वालों की
रुपया चेहरा बदलकर डॉलर हो गया,
रोटी से भरे पेट है जिनके
उनके हाथ में ही रहते व्हिस्की के जाम हैं,
सिगरेट के धूंए सरीखी हो गयी है
उनकी देशभक्ति,
देह यहां
पर बाहर बसी आसक्ति,
जुबान पर भारत का नाम
दिल की उड़ती दुआऐं बहती उस तरफ
जहां अमेरिका का नाम है।
लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर 
poet, writer and editor-Deepak 'BharatDeep',Gwalior

writer aur editor-Deepak 'Bharatdeep' Gwalior

7 अगस्त 2011

दोस्त और दोस्ती-हिन्दी शायरी (dost aur dosti-hindi shayari)

सुबह से शाम तक भटके शहर में 
कोई दोस्त न मिला,
मिले जो लोग 
उनको  अपना कहना मुश्किल था 
जिनसे कर आये थे वह वफ़ा का वादा 
कर रहे थे हमारे सामने उनकी गिला 
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दोस्त बहुत हैं 
मगर दोस्ती का मतलब समझ में न आया,
भीड़ में अजनबी भी अपना कहने लगे 
पर जब सहारे के लिए ताका इधर उधर
अपने को अकेला पाया

2 अगस्त 2011

स्वदेशी चिराग-हिन्दी कविता (swadeshi chirag-hindi kavita)

तरक्की के रास्ते पर
बस कार ही चलती है,
दूध की नदिया बहती थी जहां
पेट्रोल की धारा वहाँ मचलती है।
कहें दीपकबापू
विदेशी पेट्रोल की चाहत में
दूध, दही और खोवा हो गया नकली
अब स्वदेशी चिराग में
देश प्रेम की लौ मंद जलती है।
लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर 
poet, writer and editor-Deepak 'BharatDeep',Gwalior

writer aur editor-Deepak 'Bharatdeep' Gwalior

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