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10 मार्च 2010

हंसी हो स्यापा-हिन्दी व्यंग्य कविता (hansi aur gum-hindi satire poem)

खुशी हो या ग़म
हंसी हो या स्यापा
अब बाजार में बिकता है,
कब क्या करना है
प्रचार में इशारा दिखता है।
कभी दिल को गुदगुदाना,
कभी आंखों में आंसु लाना,
सौदागरों का करना है जज़्बातों का सौदा
उनको नहीं मतलब इस बात से कि
किसका बसेगा
या किसका उजड़ेगा घरौंदा,
कलम का गुलाम
उनके पांव तले
उनकी उंगलियों के इशारे पर
हर पल की कहानी लिखता है।

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कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
http://anant-shabd.blogspot.com

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19 दिसंबर 2008

सौदागरों से ही खरीदेंगे-हिन्दी शायरी

इतनी सुरक्षा करेंगे
कि खरगोश क्या
शेर भी आ गया तो पकड़ लेंगे
मगर भेड़िया ही किला भेद जाता है
आदमी का शिकार चूहे के तरह कर जाता है
कभी उसके पीछे नहीं जाते शिकारी
दिखाने के लिए अपने किले जरूर घेर लेंगे
इंसानों का क्या
वह तो मनोरंजन के लिए ही देखेंगे और खेलेंगे
खाली मन लिए भटकते लोगों को
असल और नक़ल से वास्ता नहीं
शेर बकरी का हो
या चूहे बिल्ली का
या डंडा गिल्ली का
अपनी आँखें वीडियो गेम में ही पेलेंगे
जूता मारने का हो या गोली चलाने का दृश्य
हादसा हो या कामयाबी
सौदागर हर शय को बाज़ार में बेचेंगे
जज्बातों के मायने अब कोई नहीं है
इंसानों में अब जज्बा कहाँ
इसलिए सौदागरों से ही खरीदेंगे

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