हास्यकविता लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
हास्यकविता लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

25 मार्च 2018

बहीखाते कौन देखे पहरेदार अपनी नाकामी दर्द से छिपाने में जुटे हैं- दीपकबापूवाणी (BahiKhate Kuan dekhe-DeepakBapuWani)


दिखाने के लिये नाटक बहुत हैं,
सिखाने के लिये दाव बहुत हैं।
कहें दीपकबापू कमअक्लों से की यारी
लिखाने के लिये दर्द बहुत हैं।
----
भूत के भय से भीड़ बुला लेते,
झाड़फूंक का मंत्र बेचकर सुला देते।
-_-
आओ उनके इंतजाम पर तालियां बजायें,
डरकर हंसिये मन में चाहे गालियां सजायें।
अपनी पहचान से लुटे हैं-हिन्दी व्यंग्य कविता
------
इतिहास गवाह कि
आमजनों के खजाने
ताकत की दम पर लुटे हैं।
बहीखाते कौन देखे
पहरेदार अपनी नाकामी
दर्द से छिपाने में जुटे हैं।
कहें दीपकबापू 
बंद तहखानों में झांकने की
कोशिश बेकार
अंधेरों में स्वर्णिम सिक्के
अपनी पहचान से लुटे हैं।
----
सपने हसीन बहुत दिखाते,
सबका भला करना सिखाते।
कहें दीपकबापू स्वयं न होता कुछ
भीड़ की उंगली पर आसरा टिकाते।
----
नारों का पुलिंदा हुआ लोकतंत्र,
खोखले वादों का सजा हर मंत्र।
‘दीपकबापू’ तांत्रिक हुए आधुनिक
हवन के बदल चले विद्युतीय यंत्र।
---
सिंह खत्म हुए राजा अब सियार हैं।
रक्षक नाम पर कातिलों का यार है।
कहें दीपकबापू पत्थरों के वन में
दिल नहीं अब दौलत हथियार हैं।
--
बेबसों को रोज बेचो वह भरोसा लेंगे,
टूटा तो भाग्य कोसा करेंगे।
कहें दीपकबापू सेवा में जुटे मारीचि
न आलू होगा न समोसा भरेंगे।
---
शहीदों की याद अपने नाम दीप जलायें।
श्रद्धांजलि में अपने शब्द चलायें।
कहें दीपकबापू हमदर्द बने व्यापारी
दर्द की दवा में दुआ रस चलायें।
---
गरीब के सपने पर महल खड़े,
मिली मदद पर कागजों के ताले जड़े।
कहें दीपकबापू मूर्ख हैं वह
बाज़ार में ढूढें ईमानदार खड़े।
---
भलाई का वादा कर साथ मांगा था,
अब भूली यादों में उसे टांगा था।
कहें दीपकबापू हमारा जिस्म घोड़ा
उनका इरादा अपना तांगा था।
---


11 फ़रवरी 2018

सिंहासन पर बैठे उनकी हर बात मानो-दीपकबापूवाणी (Sinhasan par Baithe unki baat mano-DeepakBapuwani)


धोखा की कला चालाकी कहते,
मजाक के दौर गाली में बहते।
‘कहें दीपकबापू’ बेकार व्यंग या कविता
चिंतित लोग बिचारे तस्वीरों में रहते।
---
‘दीपकबापू’ भावनाओं का व्यापार करते, 
भक्त करें इष्ट के दूत होने का दावा, 
भक्तों को पाखंड पर इष्ट करे पछतावा।
‘दीपकबापू’ परोपकार में भी चले व्यापार,
सबके कल्याण क है बड़ा छलावा।।
---
क्या हुआ सड़कों पर गड्ढे पड़े हैं,
दोनों ओर सुंदर भवन भी तो खड़े हैं।
‘दीपकबापू’ ताजा हवा ढूंढते 
कई ठूंठ बरगद भी नाम के बड़े हैं।
---
सिंहासन पर बैठे उनकी हर बात मानो,
जब बोलें तब ही सुबह रात मानो।
कहें दीपकबापू वीर रस हुआ फीका
आनंद तो भक्ति रस के साथ मानो।
---
जिंदादिल अब मिलते नहीं है,
अपने दर्द पर भी हिलते नहीं है।
‘दीपकबापू’ फूल अब भी दे सुगंध
फिर भी लोगों के प्राण खिलते नहीं है।
---
घर भरे पर शहर में सन्नाटा-हिन्दी व्यंग्य कविता
------

शहर के सुंदर घर भरे 
मगर सड़कों पर सन्नाटा है।
ताकतवर दीवारों ने चीखों को
बाहर आने से पहले ही काटा है।
कहें दीपकबापू आओ गर्व करें
अपनी सभ्यता में पलते संस्कारों पर
अंधविश्वास में छिपाते डर
जहां बेहरमी से
नयी तकदीर को बूढ़ी सोच से पाटा है।।
----

16 अगस्त 2017

अज्ञात के भय से अभयदान बिकता है-दीपकबापूवाणी (Agyat Bhay se abhaydan bikta hai-DeepakBapuWani)

मशहूर से ज्यादा बदनाम चलता है,
भले से ज्यादा बेईमान पलता है।
जवान सूरज जंग लड़ता है
शाम चमके जब सूरज ढलता है।
---

जिंदगी का आंनद रस
कभी ग्लास में भरकर
पीया नहीं जाता।
टुकड़ों में बंटा इंसान
एक लय में जिया नहीं जाता।
--
तुम पसंद करो या नहीं
हम कहने से बाज नहीं आयेंगे।
हमारी खामोशी में भी ताकत है
दिल्लगी का राज नहीं बतायेंगे।
--
अमीर अपनी दौलत
गरीब कौड़ी बचाने के लिये
जूझ रहा है।
वह कौन है जो 
ज़माने की पहेली बूझ रहा है।
--
तरक्की अकेला बना देती है,
इज्जत भी भय घना देती है।
आमों से लदा पेड़ अदब से झुका
एक मणि विषधर बना देती है।
--
अज्ञात के भय से अभयदान बिकता है,
पर्दे का शेर धरा पर नहीं टिकता है।
‘दीपकबापू’ कागज पर स्याही फैलाकर
कोई सिक्कों के लिये भ्रम लिखता है।।
--
क्या करें मन की बात
कान होते हुए लोग बहरे हैं।
किसे अपना दर्द बया करें
हमदर्दों के भी रोग गहरे हैं।
---
उनकी आंख कान पर क्या भरोसा
जो स्वयं विश्वास से टूटे हैं।
उनके साथ से क्या उम्मीद
जो अपनी स्वयं अपनी आस से रूठे हैं।
-
सड़क पर इंसान को
राम कृष्ण का नाम याद आता है।
महल में बैठते ही चिंत्तन से
भक्ति का काम बाद आता है।
---
पुराने यारों की अंतर्मन में
बहुत सारी यादें पाले हैं।
ज़माने के शोर में फंसा दिल
उनपर उदासीन जाले हैं।
--

20 मई 2017

बेईमानों ने ईमान लाने की मुहिम चलाई-दीपकबापूवाणी (baiimono ne iman laane ki muhim chalai-DeepakBapuWani(

आंखें देखें दिल चाहे न क्या फायदा, एक राह प्रेम चले यह नहीं कायदा।
‘दीपकबापू’ जुबां से चाहे जो शब्द बोलें, यकीन से दूर ही समझें वायदा।।
-
लक्ष्य सबका महल की सीढ़ियां चढ़ना है, कुचलकर पायदान आगे बढ़ना है।
‘दीपकबापू’ बादशाहों को देते सलामी, कौन उनकी नज़र में रोज पड़ना है।।
-
महंगा है सोना जो पेट न भर सके, सजते नकली फूल जो सुगंध न कर सके।
‘दीपकबापू’ बेजान प्रतिमा पर चढ़ाते फूल, जज़्बात कभी दिल में जो भर न सके।।
---
मिलावट से सामान पर भरोसा नहीं है, कौन कहे अशुद्ध खाना परोसा नहीं है।
‘दीपकबापू’ बीमारों की फौज में खड़े, किसने अपने पेट को कभी कोसा नहीं है।।
--
गुणीजन भी पराये के ढेर दोष बताते, पर अपना गुण दिखाने में लजाते।
‘दीपकबापू’ अपनी बड़ी रेखा खींचते नहीं, पहले खींची पर थूक लगाते।।
--
अपना काम निकालना सभी जाने, मतलब निकलते ही मुंह फेरें सयाने।
अनचाहे नेकी दरिया में ही जाती, ‘दीपकबापू’ लगते अपना पुण्य बताने।।
--
इंतजार है कि वह शहर अपना सजायेंगे, वरना फिर कोई नया सपना बतायेंगे।
‘दीपकबापू’ सच से रोज होता सामना, वादों के सौदागर महल अपना बनायेंगे।।
--
बेईमानों ने ईमान लाने की मुहिम चलाई, पानी का सौदा बेच चाटी मलाई।
‘दीपकबापू’ समाज सेवा का धंधा चलाते, मशाल जलाते लूटकर दियासलाई।।
-
रंकों की भीड़ में राजा पाये सम्मान, भिखारी खुश जब पाये रुपये का दान।
‘दीपकबापू’ रखें श्रद्धा फलहीन बुत में, फूल कैसे आकर दें सुगंध का वरदान।।
-
इंसान पटाने में उनके अपने गुणा भाग हैं, बोलने से अलग करने के राग हैं।
‘दीपकबापू’ चरित्रवान का लगाते हिसाब, वही जिस पर लगे काम दाग हैं।।
-
पहले नतीजा लिखकर तय कर लेते हैं, नाम खेल या जंग धर लेते हैं।
‘दीपकबापू’ पर्दे पर लगाये बैठे आंखें, कभी डरते कभी हंसी भर लेते हैं।।
--
ईंट पत्थर के शहर रंग से सजाये हैं, सड़क पर लोहे के पिंजरे भंग से चलाये हैं।
‘दीपकबापू’ चोर सेठ की पहचान खोकर, दोस्ती पाखंडियों के संग से सजाये हैं।।
---
ढूंढते रोज गम से बचने के नये बहाने, पर्दे पर डाले आखें कभी जायें मयखाने।
‘दीपकबापू’ चाहतों के बेलगाम घोड़े पर सवार, निकले घर से मन की शांति पाने।।
---
लोकतंत्र में लाश जिंदा भाव बिकती हैं, घृणा की आग पर चुपड़ी रोटी सिकती हैं।
‘दीपकबापू’ अंग्रेजी पढ़की हुई तंग बुद्धि, पर्दे का चलते दृश्य देखकर ही टिकती है।।
--
ईमानदारी का दावा लोग सभी करते है, बेईमानों से रिश्ते का दंभ भी भरते हैं।
‘दीपकबापू’ खोई लालच में अपनी पहचान, अपना गरीब नाम अमीर भी धरते हैं।।
--
चहुं ओर सौदागर सिंहासन पर सजे हैं, बैठने के लेते दाम बिना काम के मजे हैं।
‘दीपकबापू’ वाहन पर सवार खिलौने जैसे, नाम सेवक पर स्वामी जैसे स्वर बजे हैं।।
---
मुंह में राम नाम हाथ में सेवा का काम, पाखंडी गुरु भक्तों से वसूल करते दाम।
‘दीपकबापू’ बौरा जाते हैं इर्दगिर्द भीड़ देख, पैसे बटोरते हुए बुद्धि भी होती जाम।।
--

7 मई 2017

लफ्जों से चल रहा व्यापार आरपार की जंग क्यों लड़ेंगे-छोटी हिन्दी मुक्त कवितायें (LaFzon se chal raha Vyapar-Hindi poem)

बाज़ार के खेल में
नये चेहरे और नारे के साथ
उत्पाद सजाते हैं।
ठगी पर क्या रोयें
हम भी पुराना
कहते हुए लजाते हैं।
-
तख्त पर बैठकर
आम इंसान की
चिंता कौन करता है।
प्रहरी खड़े दर पर
सच के हमले से
कौन डरता है।
---
लफ्जों से चल रहा व्यापार
आरपार की जंग क्यों लड़ेंगे।
आमइंसान के सिर से भी कमाते
टीवी पर ही सौदागर यों लड़ेंगे।
कहें दीपकबापू भक्ति से भी कमाते
रक्तचाप में भी अपना दही जमाते
दौलत के गुलाम योद्धा की तरह
कभी मैदान में आगे नहीं बढ़ेंगे।।
-
चर्चे होते हमारे भी
अगर सबकी पसंद 
भाषा कहना आती।
भीड़ होती पीछे
अगर सबकी नीयत
ललचानी आती।
-
हम नहीं बदले यार
तुमने जगह बदली है।
साथ थे सिर आंखों पर
अब दूरी ने नज़र बदली है।
--
आंधियां कभी रास्ता नहीं पूछा करतीं
बस तबाही चस्पा कर चली जाती हैं।
........
बदले ज़माने में
पसीना बहाने वाले
अजीब लगते हैं।
नजरिया यह भी कि
केवल गरीब ठगते हैं।
----
कब पतंग कटे
लूटने वाले इंतजार में खड़े हैं।
मांझा कब साथ तोड़े
अनेक चक्षु उस पर पड़े हैं।
-
सामानों का बोझ उठाये
समंदर पार कर गये।
खड़े अकेले दूसरे किनारे
अपने बेबस यार डर गये।
-
दिल पर मत लेना यार
हमने मोहब्बत बंद कर दी है।
यकीन के साथ
अपनी सोहब्बत मंद कर दी है।
-

अपनी स्वार्थ साधना में लगे
परमार्थ नाम जपते हैं।
दुर्जन पायें शीतल हवा
सज्जन धूप में तपते हैं।
....
रोटी बेचने के लिये कहीं ठेला लगे
कहीं बांटने के लिये मेला लगे।
भूख की बेचारगी दाम और दान दोनों ही ठगे।
.....
उधार पर मिली जिंदगी
फिर हाथ क्यों फैलायें।
बेचता नहीं कोई सांस
अपनी भूख से आंख क्यों फैलायें।

जब तक पर्दा है
ईमानदार पर आंच नहीं आती।
बेईमानों की भीड़ लगी
बिचारी जांच कहीं नहीं जाती।

22 अप्रैल 2017

महल में बाहर दरबान के हाथ राजा का असला है। यही उसकी अकड़ का मसला है-छोटी हिन्दी मुक्त कवितायें (Sum Short Hindi Poem)

तस्वीर से दिल बहलाना

बुरा नहीं

गर दिल लगाते नहीं।

श्रृंगार रस में बहना बुरा नहीं

गर सपने जगाते नहीं।

-

जगह बदल बदलकर

देख रहे हैं कहीं

अपना अस्तित्व मिल जाये।

शायद कोई 

नया शब्द फूल खिल जाये।

-

महल में बाहर

दरबान के हाथ

राजा का असला है।

यही उसकी

अकड़ का मसला है।

-

दिल पर लगे घाव

मजबूरी में

दर्द पीना था।

हाथ में कलम थी

कविता से ही जीना था।

-

जब कातिलों के कसीदे

रिसालों में चाव से पढ़े जाते हैं।

तब शिकारों के कसूर

बड़े ताव से गढ़े जाते हैं।


हर चेहरे पर नकाब

किसे बेनकाब कर पहचाने।

नीयत बद मिलने का डर

 इसलिये रहते अनजाने।


मृफ्त में खाना है

तौंद भी महल में बसाना है।

बस एक बार

चुनाव जीत जाना है।

---

अमन की बहस

जंग में बदल जाती है।

शब्दों से धवल पट्टिका

काले रंग में बदल जाती है।

-

हम नहीं जानते

कौन पीठ पर वार करेगा।

यह भी मानते

कोई तो है

जो हमारी नाव पार करेगा।

-

दोस्तों से वफा की

नाउम्मीदी से डरे हुए हम।

यह कम नहीं

टूटे हौंसलों से

इतना भी लड़ जाते हम

-


बोलें तो बवाल मचेगा

मौन से सवाल बचेगा।

ढूंढते मसले का मंच

जहां शब्द ताल नचेगा।

-


नट के हाथ में डोर

इंसानी पुतलों को 

अपना खेल दिखाना है।

अपनी अदाओं से

गुलामी ही सिखाना है।

-

चेहरा उनका सुंदर 

पर हम नीयत नहीं पढ़ पाते।

शब्द भी अद्भुत

पर उनके अर्थ नहीं गढ़ पाते।

-


तस्वीर से ही

उनकी आंखें झांक लेती हैं।

तसल्ली है

दिल में प्रेमभाव हांक देती हैं।

-

मंडी में बड़े पैमाने की

चीज का दाम कम होता है।

इंसानों की भी भीड़ जमा

भेड़ जैसा मोल देख

दिल क्यों नम होतो है।

पुराने काम

नये नारों के साथ

बदस्तूर जारी है।

बदलाव से डरें नहीं

बस नये चेहरे की बारी है।

--

हंसी पलों में भी

अब लोग साथ

नहीं निभाते हैं।

दूसरे के दर्द ही

अब सभी को भाते हैं।

---

गिरेबान में झांककर

नहीं देखते 

अपने काम का किस्सा।

बाज़ार में सजाते नसीहतें

मांगते दाम का हिस्सा।

----------

अभी लोगों के सामने

सेवक की तरह

हाथ फैलाना है।

फिर तो स्वामी के सामने

लोगों को ही हाथ फैलाना है।

--

दिखाने के लिये

दबंगों के बीच

कायदे की जंग है।

सच यह कि

सभी की नीयत में

फायदे के अलग रंग हैं।

---


24 फ़रवरी 2017

सिंहासन पर एक नहीं तो दूजा चढ़ेगा-दीपकबापूवाणी (Singhasan par Ek nahin to dooja chadhega-DeepakBapuWani

कलम अब तो चाटुकारों के हाथ में है, गुलाम अर्थ मालिक के साथ में है।
दाम में हंसी न मिले आंसु बिके नहीं, ‘दीपकबापू’ दिल अपने हाथ में है।।

पाने की चाह नहीं थी मोती कहां पाते, लोभ न था दौड़कर कहां जाते।
‘दीपकबापू’ पा लिया मौन का समंदर, जली हुई प्यास लेकर कहां जाते।।
-----
मौन सदा गूढ़ वक्तव्य नहीं होता, भय से बंद शब्द भव्य नहीं होता।
‘दीपकबापू’ कलुषित भाव छिपे नहीं, शुद्ध हृदय दृश्यव्य नहीं होता।।
--
युद्ध देखना है या हाथ से करना है, ढूंढते कहां रक्त का झरना है।
‘दीपकबापू’ बुद्धि ने पाया हिंसक स्वाद, दूसरे के घाव से मन भरना है।।
---
सिंहासन पर एक नहीं तो दूजा चढ़ेगा, लालची मान का त्यागी शब्द पढ़ेगा।
‘दीपकबापू’ बिसात पर खेल रहे शतरंज, पिटा वजीर एक कदम नहीं बढ़ेगा।।
-
कभी यायावर होने का स्वांग रचते, फिर कभी मायावी महल में नचते।
‘दीपकबापू’ बहुरुपियों के बीच खड़े, अपने ही वास्तविक रूप से बचते।
------
अपने स्वाद के लिये लोग बहाने ढूंढते हैं, मन ऊबा नये तराने ढूंढते हैं।
‘दीपकबापू’ खिलौने जैसे सपने संभाले हैं, ज़माने के लिये ताने ढूंढते हैं।।
----------
दिल बिक जाये तो इंसान क्या चीज है, सभी में कम दौलत की खीज है।
‘दीपकबापू’ छोटा बड़ा नहीं देखते कभी, स्वार्थ का सभी में लगा बीज है।
--
बीते बिसारें नहीं आगे की बुहारें नहीं, सुधारक बने अपना चरित्र सुधारें नहीं।
‘दीपकबापू’ किताबों के शीर्षक रटे बैठे, नकली शब्दवीर रोयें कभी हुंकारें नहीं।।
---------


समस्त ब्लॉग/पत्रिका का संकलन यहाँ पढ़ें-

पाठकों ने सतत अपनी टिप्पणियों में यह बात लिखी है कि आपके अनेक पत्रिका/ब्लॉग हैं, इसलिए आपका नया पाठ ढूँढने में कठिनाई होती है. उनकी परेशानी को दृष्टिगत रखते हुए इस लेखक द्वारा अपने समस्त ब्लॉग/पत्रिकाओं का एक निजी संग्रहक बनाया गया है हिंद केसरी पत्रिका. अत: नियमित पाठक चाहें तो इस ब्लॉग संग्रहक का पता नोट कर लें. यहाँ नए पाठ वाला ब्लॉग सबसे ऊपर दिखाई देगा. इसके अलावा समस्त ब्लॉग/पत्रिका यहाँ एक साथ दिखाई देंगी.
दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका


हिंदी मित्र पत्रिका

यह ब्लाग/पत्रिका हिंदी मित्र पत्रिका अनेक ब्लाग का संकलक/संग्रहक है। जिन पाठकों को एक साथ अनेक विषयों पर पढ़ने की इच्छा है, वह यहां क्लिक करें। इसके अलावा जिन मित्रों को अपने ब्लाग यहां दिखाने हैं वह अपने ब्लाग यहां जोड़ सकते हैं। लेखक संपादक दीपक भारतदीप, ग्वालियर

संबद्ध विशिष्ट पत्रिकायें

लोकप्रिय पत्रिकाएँ

वर्डप्रेस की संबद्ध अन्य पत्रिकायें