28 सितंबर 2014

आकाश पाने की चाहत-हिन्दी कविता(akasha pane ki chahat-hindi poem)



पंछी की तरह
जिंदगी के आकाश में
उड़ने की चाहत
किस इंसान में नहीं होती।

पंख नहीं दिये प्रकृति ने
फिर भी आकाश से तारे
तोड़ने की ख्वाहिश
किस इंसान में नहीं होती।

कहें दीपक बापू शिखर पर
चढ़ जाते लोग उड़ने के लिये
गिर जायेंगे जमीन पर
टूट जायेंगे हाथ पांव,
हंसेगा पूरा गांव,
चाहतों के साथ
शरीर के टूट जाने की आशंका भी
किसी इंसान में नहीं होती।
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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

22 सितंबर 2014

पूर्ण स्वस्थ रहने का नियम-हिन्दी कविता(poorn swath rahane ka niyam-hindi poem)



हर इंसान में
दूसरे पर राज्य करने की
इच्छा हमेशा रहती है।

कोई नहीं देखता
अपनी सूरत आईने में
वह वास्तव में क्या कहती है।

सिंहासन का प्रस्ताव
अस्पताल में भर्ती मरीज के लिये
करता दवा का काम
मृत हो रहे हृदय में
नयी सांस बहती है।

कहें दीपक बापू पूर्ण स्वस्थ
रहने का नियम कहीं
माना  नहीं जाता,
जिसके पास ओहदा
उसके पास ढेर सारे
चिकित्सक होते
इलाज करने के लिये
डर के मारे बादशाहों को
मरीज का ताना दिया नहीं जाता,
इतिहास गवाह है
आम जनता हिटलर जैसे
विकट मनोविकारी का राज्य भी
खामोशी से सहती है।
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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

14 सितंबर 2014

व्यापार कभी हिन्दी भाषा का सहायक नहीं हो सकता-14 सितम्बर हिन्दी दिवस पर विशेष संपादकीय लेख(vyapa kabhe hindi bhasha ka sahayak nahin ho sakta--A Special editorial aritcle on 14 september on hindi day, hindi diwas ho hindi divas)



      14 सितम्बर हिन्दी दिवस के अवसर पर ऐसा पहली बार हुआ है जब हिन्दी टीवी चैनल इस पर उत्सव मनाकर अपने विज्ञापन प्रसारण का समय पार लगा रहे हैं।  एक टीवी चैनल ने तो अपना मंच फिल्मी अंदाज में तैयार कर हिन्दी भाषा के आधार पर व्यवसायिक करने वाले लोगों को आमंत्रित किया।  उसमें तमाम विद्वान अपने तर्क दे रहे थे।  एक विद्वान ने स्वीकार किया कि हिन्दी भाषा का आधार किसान और मजदूर हैं।  हम जैसे मौलिक लेखक मानते हैं कि हिन्दी सामान्य जनमानस की चहेती भाषा है और विशिष्ट लोगों के राष्ट्रभाषा या मातृभाषा बचाने के प्रयास दिखावटी हैं।  इस चर्चा में बाज़ार या व्यावसायिक क्षेत्रों में प्रचलित हिन्दी पर चर्चा हुई।  कुछ विद्वानों का मानना था कि बाज़ार हिन्दी का स्वरूप बिगाड़ रहा है तो अन्य की राय थी ऐसा कुछ नहीं है और हिन्दी भाषियों को उदार होना चाहिये।
      हिन्दी दिवस पर इस तरह की चर्चायें होती रहती हैं पर पहली बार ऐसी चर्चा टीवी चैनल पर हुई।  इसमें समाचार पत्र पत्रिकाओं में शीर्षकों तथा विषय सामग्रंी के साथ  में अंग्रेजी शब्दों के उपयोग पर भी विचार हुआ।  इस तरह की प्रवृत्ति ठीक है या नहीं यह एक अलग विषय है पर इसका पाठकों पर जो प्रभाव हो रहा है उस पर किसी ने ध्यान नहीं दिया। अक्सर लोग यह शिकायत करते हैं कि अंग्रेजी अखबार हिन्दी से अधिक महंगे हैं।  अगर हम इसके पीछे के कारण जाने तो समझ में आयेगा कि चूंकि लोग अखबारों को अंग्रेजी भाषा ज्ञान बनाये रखने के लिये पढ़ते हैं इसलिये उनकी प्रसार संख्या मांग से कम होती है।  मांग आपूर्ति के नियमानुसार  वह  महंगे दाम पर भी बिक जाते हैं। जबकि हिन्दी प्रकाशनों की संख्या अधिक है तो पाठक संभवत उस मात्रा में उपलब्ध नहीं है। एक समय हिन्दी समाचार पत्र पत्रिकायें लोकप्रिय थीं पर इसका कारण उनकी विषय सामग्री कम उसके अध्ययन से  हिन्दी भाषा को आत्मसात करने की प्रवृत्ति लोगों में अधिक थी।  लोग साहित्यक किताबों की बजाय समाचार पत्र पत्रिकाओं पर हिन्दी ज्ञान के लिये निर्भर रहना पंसद करे थे। अब अगर कोई व्यक्ति हिन्दी समाचार पत्र पत्रिकाओं के अध्ययन से हिन्दी भाषा आत्मसात करने की बात सोच भी नहीं सकता।  हिन्दी समाचार पत्र यह मानकर चल रहे हैं कि युवा वर्ग हिन्दी नहीं जानता इसलिये अपने विशिष्ट पृष्ठों में अंग्रेजी शब्दों का अनावश्यक  उपयोग करते हैं। हमें पता नहीं कि इसका उन्हें लाभ है या नहीं पर हम जैसे पाठक ऐसी सामग्री को पढ़ने में भारी असहजता अनुभव करते हैं।  हिन्दी समाचार पत्र पत्रिकाओं ने अपने पाठकों का मानस समझा नहीं जो कि अध्यात्म प्रवृत्ति का है। यही कारण है कि देश भर के प्रतिष्ठित धार्मिक संस्थाओं की पत्र पत्रिकायें आजकल लोगों के घरों में अधिक मिलती है और हिन्दी के व्यवसायिक प्रकाशनों को ग्राहक उसी तरह ढूंढने पर रहे हैं जैसे कि कपड़े वाला ढूंढता है। एक समय सामाजिक, राजनीतिक, महिला, बाल तथा मनोरंजन के विषयों वाली पत्रिकायें अक्सर लोगों के घर में मिल जाती थीं पर आजकल यह नहीं होता। कह सकते हैं कि इसके लिये आधुनिक संचार माध्यमों जिम्मेदार हैं पर सवाल उठता है कि आखिर अध्यात्मिक पत्र पत्रिकाओं पर यह नियम लागू क्यों नहीं होता? हिन्दी व्यवसायिक प्रकाशनों के प्रबंधकों को इसके लिये आत्म मंथन करना चाहिये कि इतना बड़ा जनसमूह होते हुए भी उनके प्रकाशनों से लोग क्यों मुंह मोड़ रहे हैं। कहीं यह भाषा के लिये आयी उनकी प्रतिबद्धता की कमी तो नहीं है?
      इतना ही नहीं यह प्रकाशन समूह देश में रचना के पठन पाठन तथा सृजन की नयी प्रवृत्तियों के संवाहक भी नहीं बन पाये और दूसरी भाषाओं के रचनाकारों तथा रचनाओं को हिन्दी में अनुवाद कर प्रस्तुत कर यह श्रेय तो लेते रहे हैं कि वह हिन्दी पाठक के लिये बेहतर विषय सामग्री प्रस्तुत की हैं पर आजादी के बाद एक भी लेखक का नाम इनके पास नहीं है जिसे उन्होंने अपने सहारे प्रतिष्ठा दिलाई हो।  क्या हिन्दी में बेहतर कहानियां नहीं लिखी जातीं या प्रभावी कविताओं की कमी है? यह सोच हिन्दी प्रकाशन समूहों के प्रबंधकों और संपादकों का हो सकता है पर यही उनके उस कम आत्मविश्वास का भी प्रमाण है जिसके कारण भारतीय जनमानस में हिन्दी प्रकाशनों की प्रतिष्ठा कम हुई है।
      आखिरी बात यह कि बाज़ार पर आक्षेप करना ठीक नहीं है। भाषा का संबंध भाव से और भाव का संबंध भूमि से होता है। भारत में हिन्दी ही सर्वोत्म भाषा है जो सहज चिंत्तन में सहायक होने के साथ ही उसके संवाद और उसके प्रेक्षण के लिये एक उचित माध्यम है। माने या माने पर इस सत्य से अलग जाकर हिन्दी के विकास पर बहस करना केवल औपचारिकत मात्र रह जाती है।


दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

5 सितंबर 2014

जब अंग्रेजी का भाव घट जाये-हिन्दी दिवस पर हास्य कविता(jab inglish ka bhav ghat jaye-hindi comedy poem on hindi diwas)



रास्ते में मिला फंदेबाज और बोला
‘‘दीपक बापू 14 सितंबर का दिन
आने वाला है,
हिन्दी का आकाश
ज़मीन पर छाने वाला है,
समाचारों पर नज़र रखना
शायद कोई सम्मान तुम्हारे लिये
कहीं से आ जाये,
तुम्हारे पर लगा फ्लॉप का
ठप्पा हट जाये।’’

सुनकर हंसे दीपक बापू और बोले
‘‘कभी साहित्य से तुमने दिल
लगाया नहीं,
मान सम्मान के विषय से
कभी दिमाग हटाया नहीं,
चाटुकारिता के कर्म का फल
उपाधियां और सम्मान है,
नहीं सोच सकते वह लेखक
इस बारे में
स्वांत सुखाय की
जिन्होंने  रखी ठान है,
एक कविता लिखकर
बहुत सारे चालाक
साहित्य बाज़ार में तर गये,
जिन्होंने नहीं दिखाया
बिकने का कौशल
उनके शब्द चौराहे पर आये
 फिर अपने घर गये,
हिन्दी अब हमें कहां सम्मान दिलायेगी,
उसका संघर्ष अब तोतली
हिंग्लिश भाषा से है
प्रश्न यह है कि वह स्वयं
अपनी जान कैसे बचायेगी,
भारतीय मुद्रा रुपया
डॉलर और पौंड से
सस्ता होता जा रहा है,
वैसे ही स्कूल का बस्ता
हिन्दी खोता जा रहा है,
पूर्व से उगता है सूरज
भारतीय समाज
पश्चिम में निहार रहा है,
पूर्व से कर ली पीठ
सत्य से हार रहा है,
जब हम जैसे लेखक
सम्मान देने वालों की
योग्यता पर सवाल उठायेंगे,
तक क्या पुरस्कार पायेंगे,
हिन्दी दिवस की हमें भी प्रतीक्षा है
14 सितंबर एक ही दिन होता
जब अंग्रेजी का भाव घट जाये।
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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

30 अगस्त 2014

युवा कंधे-हिन्दी कविता(yuva kandhe-hindi poem)




युवा कंधे अपने ऊपर
भविष्य के सपनों का
बोझ उठाये हैं।

फिसल गयी उम्र जिनकी
अपनी नाकाम जिंदगी  के आसरे
उन्हीं के दम पर जुटाये हैं।

नौनिहालों का लगा दिया
आकाश में उड़ने के
सपने देखनें में
स्वयं अपनी जिंदगी के पल
मौजमस्ती में लुंटाये हैं।

कहें दीपक बापू मार्गदर्शन का अभाव
हर पीढ़ी में दिखता
सभी बचते  परिवर्तन के युद्ध से
सौंपते हथियार नये योद्धा के हाथ
देकर बहादुरी दिखाने का संदेश
भले ही हवाओं के डर से भी
हमेशा अपना मुंह छुपाये हैं।
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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

22 अगस्त 2014

सांई भगवान के दर्शन में आम और विशिष्ट भक्त-हिन्दी व्यंग्य चिंत्तन(sai bhagwan ke darshan mein aam aur vishisht bhakt)



    
      सांई बाबा के मंदिर में आम और विशिष्ट दर्शकों के वर्ग बन गये हैं।  जो दर्शक तीन सौ रुपये देंगे उन्हें आमजनों की तरह पंक्ति में नहीं लगना पड़ेगा और वह विशिष्ट भक्त होकर सांई के निकट जा सकेंगे।  सांई बाबा के स्थाई सेवक इसके पीछे दो तर्क दे रहे हैं-एक तो यह कि इससे प्राप्त आमदनी से मंदिर का रखरखाव होगा दूसरा यह कि इससे भीड़ पर नियंत्रण रखने में सुविधा होगी। दोनों ही तर्क समझ से परे हैं।  आमदनी से मंदिर के रखरखाव का जवाब यह है कि वहां चढ़ाव इतना आता रहा है कि सामान्य मंदिर अब भव्य बन गया है। दूसरी बात यह है कि सांईबाबा के अनेक शहरों में मंदिर हैं और वह चढ़ावे से ही चल रहे हैं।  कई भक्त अगर पैसा नहीं डालते तो कई सांई बाबा के चमत्कार का लाभ मिलने पर बहुत सारा धन दे ही देते हैं।  भीड़ नियंत्रण की बात हास्यास्पद ही है। इससे आमजनों की पंक्ति को बीच बीच में व्यवधान झेलना पड़ेगा।
      हम सांई बाबा के स्थाई सेवकों के फैसले का विरोध नहीं कर रहे। हम तो यह सलाह देंगे कि वह आम भक्तों से भी सौ रुपया लेने लगें।  इससे भीड़ कम हो जायेगी और आय भी बढ़ेगी।  मगर वह कभी नहीं मानेंगे।  वजह यही है कि यही फोकटिया भक्तों की भीड़ ही सांईबाबा की प्रचलित भक्ति की शक्ति है।  अगर आमजन कम हो गये तो विशिष्ट भक्त भी कम हो जायेंगे। हमारे यहां दिखावे की भक्ति कम नहीं है।  विशिष्ट भक्त दिखने की चाह कुछ ऐसे लोगों में ज्यादा होती है जो भक्ति कम अपनी शक्ति ज्यादा दिखाना चाहते हैं।  दौलत, शौहरत और ऊंचे ओहदे वालों को इस बात से चैन नहीं मिलता कि उनके पास शक्ति है। वह उसका भौतिक सत्यापन चाहते हैं और यह केवल भीड़ में अकेले चमकने से ही मिलता है।  वैसे तो हमारे यहां दक्षिण के एक दो मंदिर में भी यह पंरपरा रही है कि पैसा देकर विशिष्टता के साथ भगवान की मूर्ति के दर्शन किये जायें पर सांईबाबा मंदिर में इस तरह की नयी परंपरा थोड़ा चौंकाने वाली है।
      अभी हाल ही में एक महान ज्ञानी ने सांईबाबा को भगवान मानने को चुनौती दी थी।  इस पर लंबी बहस चली। निष्कर्ष न निकलना था न निकला। अलबत्ता इस बहस के बीच में विज्ञापन की धारा खूब चलती दिखाई।  हम जैसे योग तथा अध्यात्म साधकों के लिये ऐसी बहसों में कुछ नहीं होता और न ही पैसा देकर दर्शन करने के निर्णयों से कोई परेशानी होती है।  समस्या हम जैसे लोगों के साथ यह है कि भारतीय अध्यात्म ग्रंथों में कही गयी बातों को तोड़मरोड़ कर पेश करने पर थोड़ी निराशा होती है जो कि कुछ न कुल बोलने या लिखने को प्रेरित करती है।
      अगर हम श्रीमद्भागवत गीता का अध्ययन करें तो योग, तप और ध्यान एकांत में किये जाने वाली क्रियायें हैं और परमात्मा से आत्मा का संयोग न केवल वाणी वरन् समस्त इंद्रियों के  मौन से ही संभव है।  निष्काम तथा निराकार भक्ति का श्रेष्ठ रूप एकांत में ही दिख सकता है। भारतीय अध्यात्मिक ग्रंथ इस बात को मानते हैं पर साथ ही सकाम तथा भक्ति को भी स्वीकार करते है। सकाम तथा साकार भक्ति की आस्था का प्रवाह बाहर रहता है और धर्म के ठेकेदार इसी में अपने हाथ धोते हैं।
      सकाम तथा साकार भक्ति को इसलिये मान्य किया गया है क्योंकि सभी लोग एकांतवास का आनंद नहीं उठा सकते। श्रीमद्भागवत गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने इसे स्वीकार किया है कि हजार में कोई एक मुझे भजता है और उनमें भी हजार में से एक मुझे प्राप्त करता है।  उन्होंने संकेतों में सकाम भक्ति का रूप भी बताया है और यह माना कि अंततः वह भी वास्तव में उनके ही भक्त हैं।  इसका मतलब सीधा यह है कि श्रीमद्भागवत गीता के साधकों को कभी दूसरे की भक्ति पर आक्षेप नहीं करना चाहिये।  जो लोग श्रीमद्भागवत गीता में आस्था रखने का दावा करते हुए दूसरे की भक्ति पर आक्षेप करते हैं तो इसका आशय यह है कि वह कहीं न कहीं अज्ञान के अंधेरे में हैं।
      सकाम भक्ति का भाव बाहर आकर्षित रहता है यही कारण है कि मूर्तियों में भी भगवान का रुप देखा जाता है। दरअसल हमारा मन चंचल है। वह आकर्षण ढूंढता है और भगवान की मूर्तियां दिखने में आकर्षक होती है इसलिये वह मन का मोह लेती है। इस तरह भक्त का भाव मनोरंजन, आस्था तथा श्रद्धा की त्रिवेणी में नहा लेता है।  हमारे यहां रामलीला तथा कृष्ण रास के प्रदर्शन की परंपरा रही है। उनमें यह तीनों तत्व प्रवाहित रहे थे।  यह अलग बात है कि उनके कलाकार सीधे कभी दर्शकों से धन नहीं मांगते बल्कि आयोजक श्रद्धालू उनको दान दक्षिण देकर तृप्त कर देते हैं।
      सांईबाबा की मूतियों के दर्शन की धारा में भी यह तीन तत्व प्रवाहित हैं।  ऐसे में हम मनोरंजन तत्व का विचार आता हैं। जिस तरह सिनेमाघरों में दर्शकों के वर्ग होते हैं उसी तरह अब भगवान के दर्शन में भी बन रहे हैं तो इसके पीछे यही तत्व माना जा सकता है। हमें याद आ रहे हैं वह दिन जब हम फिल्में बॉलकनी का टिकट स्टूडेंट कंसेशन में लेकर देखते थे।  इतना ही नहीं मध्यांतर में भी हम बॉलकनी की ही कैंटीन में चाय पीते थे।  नीचे फर्स्ट या थर्ड क्लास वाली कैंटीन में जाने की सोचना भी उस समय स्तरहीनता लगती थी। कभी वह टिकट नहीं मिला तो नीचे भी फिल्म देखी पर जब ऊपर देखते थे तो मन में अहंकार आ ही जाता था।  उस समय हम उन दोस्तों पर अपना रौब झाड़ते थे जो इस सुविधा का लाभ उठाने योग्य नहीं थे-मतलब यह महाविद्यालयीन शिक्षा से परे थे।
      अब अंतर्जाल पर अध्यात्मिक साधना करते हुए इस अहंकार को पहचान लिया है।  इसलिये कहीं भी विशिष्ट व्यवहार मिले तो भी उसका प्रभाव हम पर नहीं पड़ता।  अलबत्ता गुण और कर्म विभाग के अध्ययन से हमें इस संसार और यहां के जीवों का व्यवहार समझ में आ गया है।  विशिष्ट भक्त, दर्शक या सहायक बनने का अवसर मिलने पर लोग फूल जाते हैं पर अंततः उनको नीचे उतरना ही पड़ता है। यह अलग बात है कि ऊंचाई पर जब वह रहते हैं तब लोग उनको बेचारगी के भाव से देखते हैं।  सांई बाबा के आम भक्तों के सामने भी यह भाव तब दिखाई देगा जब वह विशिष्ट भक्तों को अपने से प्रथक होकर दर्शक करते देखेंगे।


दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

15 अगस्त 2014

फेसबुक पर दिखने लगा है विचारधारा के लेखकों का युद्ध-चिंत्तन लेख(facebook par vichardhara ka lekhkon ka dwandwa-hindi thought article)



         भारत में हम जिन विचाराधाराओं के बीच द्वंद्व परंपरागत प्रचार माध्यमों में बरसों से देखते रहे थे वह अब अंतर्जाल पर भी दिखने लगा है। पिछले कुछ दिनों से लव जिहाद, धर्मांतरण कर विवाह, बलात्कार तथा  आतंकवाद को लेकर जिस तरह के पाठ आ रहे हैं उनको देखकर यह लगता है कि अंतर्जाल पर भी विचाराधाराओं के लेखक उसी तरह ही अपनी प्रतिबद्धता दिखा रहे हैं जैसे पंरपरागत साधनों पर दिखाते हैं।  खासतौर से धर्मनिरपेक्षता तथा राष्ट्रवाद के बीच यह द्वंद्व हम जैसे पाठकों को दिलचस्प लगता है।  अभी कुछ दिनों से पहले धर्मांतरण कर जबरन विवाह और बलात्कार के प्रसंग चल रहे थे। उन पर एक वर्ग अपनी प्रतिक्रियाओं के साथ सक्रिय था।  आज फेसबुक  पर एक पाठ के साथ जुड़े लिंक में  धर्मांतरण कर विवाह का समाचार देकर  अपनी सक्रियता दूसरे समुदाय के लिये दिखाई गयी।  यह समाचार पढ़कर सबसे पहले तो हमारे दिमाग में यह आया कि फेसबुक पर यह किसने डाला है।  पता लगा कि यह एक लिंक था जो उसी समुदाय पर कथित अनाचार को बताने वाले समाचार वाले पाठ से जुड़ा था। जिस लेखक का यह पाठ है वह पुराने ब्लॉग लेखक होने के साथ हमारे मित्र भी रहे हैं।  आजकल उनके तथा हमारे बीच संवाद नहीं होता पर जब था तब हम यह नहीं जानते थे कि वह भी किसी विचारधारा में प्रवाहित जीव हैं। 
      अंतर्जाल पर लिखते हुए हमें सात वर्ष हो गये।  भारत में प्रारंभिक दौर में ब्लॉग ही लोकप्रिय था। आज भी है पर फेसबुक ने उसका प्रभाव कम कर दिया हैं पुराने ब्लॉग लेखक आज भी लिख रहे हैं पर उनके दर्शन अब हम फेसबुक पर ही कर लेते हैं। पहले नारद और फिर ब्लॉगवाणी पर इन ब्लॉगलेखकों से आत्मीयता का भाव रहा पर अब वह समाप्त हो गया है।  इसमें कोई संदेह नहीं है सभी ब्लॉग लेखक अच्छे लेखक भी हैं पर अब उनका विचाराधाराओं से जुड़ा होना हमें हैरान करता है। दूसरी बात यह भी है कि अब अंतर्जाल पर हिन्दी लेखन ज्यादा हो रहा है तो इस भीड़ में लोगों को अपने साथ बनाये रखना संभव नहीं है।  यह भी सच है कि  उन्मुक्त विचारधारा को हमारे यहां अभी कोई सम्मान नहीं मिल पाया। इस पर हम हम जैसे फोकटिया लेखक को कोई क्यों साथ रखना चाहेगा।
      बहरहाल फेसबुक में अभी तक हम एक समुदाय के बारे में पढ़ रहे थे आज दूसरे समुदाय पर पढ़ा तो आश्चर्य हुआ।  लेखक का प्रमाणीकरण करने की तब इच्छा जाग्रत हुई। हमारा अनुमान है कि कम से कम दो वर्ष बाद उनके किसी पाठ को पढ़ने का अवसर आया।  विचारधारा से प्रतिबद्ध लेखकों के लिये प्रायोजक मिलना सहज होता है इसलिये इन लेखकों ने अपना लेखक सतत बनाये रखा है। हम जैसे फोकटिया लेखक के लिये लंबे समय तक स्वप्रेरणा से लिखते रहना केवल माता सरस्वती की कृपा से ही हो सकता है। प्रारंभिक दौर में हमें लगता था कि हमारा उल्लेख कहीं न कहीं होगा पर अब जल्दी यह लगा कि प्रायोजन के इस युग में हमारी स्थिति एक अंतर्जालीय प्रयोक्ता से अधिक नहीं रहने वाली है।  इसलिये टिप्पणियों की परवाह छोड़ ही दी है। अलबत्ता दूसरे लेखकों की रचनाओं का अध्ययन करते रहते हैं। पिछले लोकसभा चुनावों के दौरान इन विचाराधाराओं के लेखकों ने सतत द्वंद्वरत रहकर जिस तरह दिलचस्पी पैदा की वह हमारे लिये एक नया अनुभव था।   
दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
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