21 सितंबर 2013

गांवों में पहुंच गया बेदर्द शहर-हिन्दी व्यंग्य कविता (gaanvon mein pahunch gaya bedard shahar)



बंदर दे रहा था धर्म पर प्रवचन
उछलकूद करते हुए तमाशा भी
दिखा रहा था
यह सनसनीखेज खबर है
उसके मुखौटे के पीछे
इंसान का चेहरा है
आंखें देखती हैं पर पहचानती नहीं
कान सुनते है मगर समझ नहीं इतनी
बंदर के बोलों में इंसान का ही स्वर है।
कहें दीपक बापू
ज़माना बंटा है टुकड़ों में
कोई दौलत के नशे में मदहोश है,
कोई गरीबी के दर्द से बेहोश है,
जज़्बात सभी के घायल है,
ख्वाबी अफसानों के फिर भी कायल है
दिल के सौदागरों के अपनी चालाकी से
रोते को हंसाने के लिये
खुश इंसान के दिमाग में प्यास बढ़ाने के लिये
मचाया इस जहान  में विज्ञापनों का  कहर है।
देखते देखते
गांवों की खूबसूरती हो गयी लापता
नहीं रही वहां भी पुरानी अदा
घर घर पहुंच गया बेदर्द शहर है।
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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poet-Deepak raj kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर
poet, writer and editor-Deepak 'BharatDeep',Gwalior
‘दीपक भारतदीप की हिन्दी-पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
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12 सितंबर 2013

14 सितम्बर हिन्दी दिवस पर विशेष लेख-राष्ट्रीय एकता में राष्ट्रभाषा का महत्व समझना होगा(14 september hindi diwas-ekta mein rashtrabhasha ka mahatva samjhna hoga)



          14 सितंबर 2014 को हिन्दी दिवस है यह बात मातृभाषा बोलने, लिखने तथा समझने वाले अधिकतर बुद्धिजीवियों को मालुम है।   इस लेखक ने अपने ब्लॉग पर अनेक लेख लिखे हैं इसलिये उन पर अनेक पाठक आ रहे है।  हिन्दी के महत्व शब्द से सर्च इंजिनों पर खोज अधिक होती दिखती है। हिन्दी के महत्व पर लिखे गये एक लेख पर अनेक प्रकार की प्रतिक्रियायें
प्राप्त हो रही हैं। उसमें पुराने लेख परक अक्सर एक शिकायत आती है कि उसमें आपने हिन्दी का महत्व तो बताया ही नहीं।  हमने उनको नजरअंदाज किया पर आज एक प्रतिक्रिंया मिली कि आप राष्ट्रीय एकता के परिप्रेक्ष्य में हिन्दी का महत्व बतायें तो अच्छा रहेगा।  उस पाठक की इस प्रतिकिया ने इस लेख को लिखने की प्रेरणा दी।
                        राष्ट्रीय एकता के संदर्भ में हिन्दी के महत्व का बखान बहुत लोगों ने किया है पर शायद ही कोई यह बता पाया हो कि आखिर राष्ट्रीय एकता की जरूरत किसे और क्यों है? इस एकता की जरूरत समाज को है या व्यक्ति को है? हमारा यह प्रश्न अटपटा जरूर लगता है पर चिंत्तन के संदर्भ में अत्यंत महतवपूर्ण है।  हमारे यह बुद्धिजीवियों का झुण्ड  अब राष्ट्र, प्रदेश, शहर, मोहल्ला, परिवार और व्यक्ति के क्रम में सोचता है और यही कारण है कि वह राजकीय संस्थाओं से ही हिन्दी के विकास का सपना देखता है।  हम व्यक्ति से राष्ट्र के क्रम में सोचते हैं। हमारा मानना है कि व्यक्ति मजबूत हो तो ही राष्ट्र मजबूत हो सकता है।  इस मजबूती को आधार  अपनी भूमि, भाव तथा भाषा के प्रति विश्वास दिखाने और उसे निभाने से ही मिल सकता है।  हम आज देश में अनेक प्रकार के राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक तथा धार्मिक संकटों के आक्रमण का सामना कर रहे हैं।  समाज डोलता दिख रहा है। यही स्थिति हमारी राष्ट्रभाषा की भी है।  हमारा मानना है कि इस संकट का कारण यही है कि हम अपनी भाषा के प्रति उदासीन रवैया अपनाये हुए हैं  हर कोई हिन्दी  के विकास की बात कर  रहा है पर पुरस्कारों तथा सम्मान का मोह ऐसा है कि लोग अपनी भाषा की सच्चाई के प्रति उदासीन है। आखिर हिन्दी के प्रति हमें सतर्क क्यों होना चाहिये। इसी उत्तर की खोज ही राष्ट्रीय एकता में हिन्दी का महत्व सिद्ध कर सकती है।
                        जब तक सरकारी नौकरी ही इस देश में मध्यम वर्ग का आधार था तब सरकारी कामकाज में अंग्रेजी भाषा का वर्चस्व था। उस समय इसकी आलोचना के जवाब में कहा जाता था कि हिन्दी को रोजगारमूलक बनाया जाना चाहिये।  कालांतर में  हिन्दी में कामकाज का प्रभाव बढ़ा। अब मध्यम वर्ग के लिये नोकरियां सरकारी क्षेत्र में कम हैं और निजी क्षेत्र इसके लिये आगे आता जा रहा है।  ले-देकर बात वहीं आकर अटकती है कि वहां हिन्दी वाले को कोई सफेद कॉलर वाली नौकरी नहंी मिल सकती।  यही कारण है कि आज की युवा पीढ़ी जो नौकरी का लक्ष्य लेकर पढ़ रही है वह अंगेजी के साथ आगे बढ़ रही है।  प्रश्न यह है कि क्या वह बिना हिन्दी के कितना आगे बढ़ पायेगी।  एक बात साफ कर दें कि नौकरी में योग्यता एक अलग मायने रखती है।  संभव है कि ग्यारहवीं पास अंग्रेजी न जानने वाला कहीं प्रबंधक बन जाये और उसके नीचे अंग्रेजीदां इंजीनियर काम करें।  प्रबंध कौशल अपने आप में एक अलग विधा है और जिनमें यह गुण है उनके लिये अंग्रेजी कोई मायने नहीं रखती। ऐसे में कहीं अगर किसी संस्थान में शक्ति का कें्रद्र किसी हिन्दी भाषी के पास रहा तो उसे अपनी भाषा में बातकर प्रभावित किया जा सकता हैं। सभी जानते हैं कि भारत में विकास के लिये कभी चाटुकारिता भी करनी होती है जो केवल हिन्दी में सहज हो सकती है।  ऐसे में व्यक्ति को अपनी विकास यात्रा के लिये हिन्दी भाषा न होने या अल्प होने से बाधा लगेगी तो वह क्या करेगा? अगर हिन्दी के सहारे कोई विकास करता है यकीनन वह राष्ट्र का ही कल्याण करेगा! उसका विकास अंततः कहीं न कहंी राष्ट्र के प्रति उसका आत्मविश्वास बढ़ाता है जिससे वह दूसरे लोगों के साथ एक होकर रहना चाहता है। 
                        दूसरी बात यह है कि हमारे देश में समय के साथ राष्ट्रीय स्तर पर इधर से उधर रोजगार के कारण पलायन बहुत  हुआ है। पहले हम अपने देश का मानसिक भूगोल समझें।  हमारा पूर्व क्षेत्र वन के साथ खनिज, पश्चिम उद्योग, उत्तर प्रकृति के साथ ही मनुष्य तथा दक्षिण बौद्धिक संपादा की दृष्टि अत्यंत संपन्न हैं। हम यहां उत्तर की  प्रकृति तथा मनुष्य संपदा की बात करेंगे। दरअसल हमारे उत्तरी मध्य क्षेत्र में कृषि संपदा है तो यहां जनसंख्या घनत्व भी अधिक है।  जहां जहां बौद्धिक रूप से श्रेष्ठता का प्रश्न हों वहां दक्षिणवासी लोगों का  कोई जवाब नहीं तो श्रम का प्रश्न हो तो उत्तर भारतीय लोगों को लोहा माना जाता है। खासतौर से बिहार, उत्तरप्रदेश, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान से श्रम शक्ति पूरे भारत में फैली है। जिस तरह भारत से बाहर गये श्रमशील मनुष्यों ने हिन्दी का विदेश में विस्तार किया वैसे ही इन हिन्दी भाषी श्रमिकों ने भारत के अंदर ही हिन्दी का विस्तार किया है।  यहां यह भी बता दें भारत के बाहर नौकरी के लिये ही अं्रेग्रेजी का महत्व है वरना व्यापार में केवल बुद्धि की ही आवश्यकता होती है।  भारत के अनेक लोग ऐसे भी हैं जो गुलामी के समय में  विदेशों में गये और अंग्रेजी न आने के बावजूद व्यापार किया।  वह सफल और बडे व्यापारी बने।  पंजाब से गये अनेक लोगों ने बिना अंग्रेजी के अपना काम किया। स्थिति यह है कि अनेक लोग तो यह कहने लगे हैं कि विदेशों में कई क्षेत्र ऐसे हैं जहां हिन्दी का प्रभाव साफ दिखता है।  इतना ही नहीं वहां आपसी संपर्क में हिन्दी का महत्वपूर्ण योगदान है।  हम भारत में भी यही देख सकते हैं।  अनेक गैर हिन्दी प्रदेशों में जाने पर वहां हिन्दी में वार्तालाप किया जा सकता है।  कहीं कहीं तो अंग्रेजी का ज्ञान न होने वालेे भी हैं पर हिन्दी में वहां भी काम हो जाता है। सबसे बड़ी बात यह है कि भले ही कोई हिन्दी न जानता हो पर उससे आप अपनी भाषा के कारण आत्मीय का व्यवहार तो पा ही सकते हो जो कि समय पड़ने पर अत्यंत आवश्यक होता है।
            हम देख रहे हैं कि भारत में कंपनियां अपना विस्तार सभी जगह कर रही है। वह चाहें या न चाहें उन्हें शारीरिक काम करने वाले लोगों  की आवश्यकता हो्रती है। तय बात है कि अंग्रेजी वालों में शारीरिक क्षमता अधिक नही हो्रती। अब सिथति यह भी हो सकती है कि कहीं प्रबंधक अंग्रेजीदां है तो बौद्धिक काम वालों को उसे प्रभावित करने के लिये अंग्रेजी का आवश्यकता पड़ सकती है पर अगर कहीं शारीरिक श्रम की बहुलता है तो  प्रबंधक को   भी श्रमिकों से काम लेने के लिये  हिन्दी पूर्णरूपेश आनी ही चाहिये। कहनें का मलब यही है कि पूंजी, श्रम और बुद्धि का तारतम्य अब इस देश में केवल हिन्दी भाषा से जम सकता है। औद्योगिक विकास के लिये तीनों की आवश्यकता होती है।  श्रम शक्ति पर निर्भर रहने वाले पढ़ाई नहीं करते या कम करते हैं उनसे काम लेने के लिये पूंजी और बौद्धिक वर्ग को उसकी भाषा आना चाहिये।
            हमारे कहने का अभिप्राय यह है कि हम जब कृषि पर निर्भर थे तब जितनी हिन्दी भाषा की आवश्यकता थी। उससे ज्यादा अब है।  पूजी, बुद्धि और श्रम का तारतम्य अब हिन्दी के बिना संभव नही है। तय बात है कि जब तीनों के बीच एकरूपता होगी तो उनसे जुड़े तीनों व्यक्तियों को भी उसका प्रतिफल मिलेगा।  तब उनमें स्वयमेव एकता होगी। अगर भाषा संबंधी परेशानी रही तो तो तीनों परेशान होंगे।  अतः उनमें हिन्दी भाषा ही एकता ला सकती है। यहां हम बता दें एकता से हमारा आशय व्यक्तियों की एकता से ही है। खालीपीली राष्ट्रीय एकता का नारा लगाने वालो  में हम नहीं है।  इससे ज्यादा हम राष्ट्रीय एकता पर हम क्या लिखें? वैसे हम लिख तो गये पर यह तय नहीं कर पाये कि हमने हिन्दी का महत्व पूरी तरह से बताया कि नहीं।

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
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7 सितंबर 2013

हिन्दी दिवस पर विशेष लेख-हिन्दी का महत्व हम कैसे समझायें (hindi diwas or hindi divas par vishesh lekh-hindi ka mahatva kaise samjhayen)



                        हिन्दी दिवस 14 नवंबर 2013 को है पर इस लेखक के बीस ब्लॉग इस विषय पर लिखे गये पाठों पर जमकर पढ़े जा रहे हैं।  पता नहीं कब हमने एक लेख लिख डाला था, जिसका शीर्षक था हिन्दी भाषा का का महत्व समाज कब समझेगा? उस समय इस इतने पाठक नहीं मिले थे जितने अब मिलने लगे हैं। इससे एक बात तो जाहिर होती है कि इंटरनेट पर लोगों का हिन्दी मे रुझान बढ़ गया है, दूसरी यह भी कि हिन्दी दिवस के मनाये जाने का महत्व कम नहीं हुआ है।  एक तीसरी बात भी सामने आने लगी है कि लोग हिन्दी विषय पर लिखने या बोलने के लिये किताबों से अधिक इंटरनेट पर सामग्री ढूंढने में अधिक सुविधाजनक स्थिति अनुभव करने लगे हैं।  मूलतः पहले विद्वान तथा युवा वर्ग किसी विषय पर बोूलने या लिखने के लिये किताब ढूंढते थे। इसके लिये लाइब्रेरी या फिर किसी किताब की दुकान पर जाने के अलावा उनके पास अन्य कोई चारा नहीं था।  इंटरनेट के आने के बाद बहुत समय तक लोगों का  हिन्दी के विषय को लेकर यह भ्रम था कि यहां हिन्दी पर लिखा हुआ मिल ही नहीं सकता।  अब जब लोगों को हिन्दी विषय पर लिखा सहजता से मिलने लगा है तो वह किताबों से अधिक यहां अपने विषय से संबंधित सामग्री ढूंढने  लगे हैं।  ऐसे में किसी खास पर्व या अवसर पर संबंधित विषयों पर लिखे गये पाठ जमकर पढ़े जाते हैं। कम से कम एक बात तय रही कि हिन्दी अब इंटरनेट पर अपने पांव फैलाने लगी है।
                        हिन्दी ब्लॉग पर पाठकों की भीड़ का मौसम 14 सितंबर हिन्दी दिवस के अवसर पर अधिक होता है।  ऐसे में पुराने लिखे गये पाठों को लोग पढ़ते हैं।  हमने हिन्दी दिवस बहुत पाठ लिखे हैं पर उस यह सभी उस दौर के हैं जब हमें लगता था कि यहंा पाठक अधिक नहीं है और जो सीमित पाठक हैं वह व्यंजना विधा में कही बात समझ लेते हैं।  उससे भी ज्यादा कम लिखी बात को भी अपनी विद्वता से अधिक समझ लेते हैं।  कहते हैं न कि समझदार को इशारा काफी है।  इनमें कई पाठ तो भारी तकलीफ से अंग्रेजी टाईप से यूनिकोड के माध्यम से  हिन्दी में लिखे गये।  अब तो हिन्दी टाईप के टूल हैं जिससे हमें लिखने में सुविधा होती है। लिखने के बाद संपादन करना भी मौज प्रदान करता है।
                        जिस दौर में अंग्रेजी टाईप करना होता था तब भी हमने बड़े लेख लिखे पर उस समय लिखने में विचारों का तारतम्य कहीं न कहंी टूटता था।  ऐसे में हिन्दी के महत्व पर लिखे गये लेख में हमने क्या लिखा यह अब हम भी नहंी याद कर पाते।  जो लिखा था उस पर टिप्पणियां यह  आती हैं कि आपने इसमें हिन्दी का महत्व तो लिखा ही नहीं।
                        यह टिप्पणी कई बार आयी पर हम आज तक यह नहीं समझ पाये कि हिन्दी का महत्व बताने की आवश्यकता क्या आ पड़ी है? क्या हम इस देश के नहीं है? क्या हमें पता नहीं देश में लोग किस तरह के हैं?
                        ऐसे में जब आप हिन्दी का महत्व बताने के लिये कह रहे हैं तो प्रश्न उठता है कि आपका मानस  अंतर्राष्ट्रीय स्तर की तरफ तो नहीं है।  आप यह जानना चाहते हैं कि हिन्दी में विशेषाधिकार होने पर आप विदेश में कैसे सम्माजनक स्थान मिल सकता है या नहीं? दूसरा यह भी हो सकता है कि आप देश के किसी बड़े शहर के रहने वाले हैं और आपको छोटे शहरों का ज्ञान नहीं है।  हिन्दी के महत्व को जानने की जरूरत उस व्यक्ति को कतई नहीं है जिसका वर्तमान तथा भावी सरोकार इस देश से रहने वाला है।  जिनकी आंखें यहां है पर दृष्टि अमेरिका की तरफ है, जिसका दिमाग यहां है पर सोचता कनाडा के बारे में है और जिसका दिल यहा है पर ं धड़कता इंग्लैंड के लिये है, उसे हिन्दी का महत्व जानने की जरूरत नहीं है क्योंकि इस भाषा से उसे वहां कोई सम्मान या प्रेम नहीं मिलने वाला।  जिनकी आवश्यकतायें देशी हैं उन्हें बताने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि वह जानते हैं कि इस देश में रहने के लिये हिन्दी का कार्यसाधक ज्ञान होना आवश्यक है।
                        पहले तो यह समझना जरूरी है कि इस देश में हिन्दी का प्रभाव ही रहना है।  भाषा का संबंध भूमि और भावना से होता है। भूमि और भावना का संबंध भूगोल से होता है। भाषाओं का निर्माण मनुष्य से नहीं वरन् भूमि और भावना से होता है। मनुष्य तो अपनी आवश्यकता के लिये भाषा का उपयोग करता है जिससे वह प्रचलन में बढ़ती है।  हम यह भी कहते हैं कि इंग्लैंड में कभी हिन्दी राज्य नहीं कर सकती क्योंकि वहां इसके लिये कोई भूगोल नहीं है।  जिन लोगों में मन में हिन्दी और इंग्लिश का संयुक्त मोह है वह हिंग्लििश का विस्तार करने के आधिकारिक प्रयासों में लगे हैं। इसमें दो प्रकार के लोग हैं। एक तो वह युवा वर्ग तथा उसके पालक जो चाहते हैं कि उनके बच्चे विदेश में जाकर रोजगार करें।  दूसरे वह लोग जिनके पास आर्थिक, राजनीतिक तथा सामाजिक शक्तियां हैं तथा वह इधर तथा उधर दोनों तरफ अपना वर्चस्व स्थापित करने की दृष्टि से भारत में स्थित  मानव श्रम का उपयोग अपने लिये करना चाहता है।  एक तीसरा वर्ग भी है जो किराये पर बौद्धिक चिंत्तन करता है और वह चाहता है कि भारत से कुछ मनुष्य विदेश जाते रहें ताकि देश का बोझ हल्का हो और उनके बौद्धिक कौशल का  विदेश में सम्मान हो।
                        हिन्दी रोजगार की भाषा नहीं बन पायी न बनेगी।  हिन्दी लेखकों को दोयम दर्जे का माना जाता है और इसमें कोई सुधार होना संभव भी नहंी लगता।  जिन्हें लिखना है वह स्वांत सुखाय लिखें। हम यहां पर लिखते हैं तो दरअसल क्रिकेट, टीवी धारावाहिकों तथा फिल्मों से मिलने वाले मनोरंजन का वैकल्पिक उपाय ढूंढना ही उद्देश्य होता है।  एक बेकार धारावाहिक या फिल्म देखने से अच्छा यह लगता है कि उतने समय कोई लेख लिखा जाये।  हिन्दी हमारे जैसे योग तथा ज्ञान साधकों के लिये अध्यात्म की भाषा है। हम यहां लिखने का पूरा आनंद लेते हैं। पाठक उसका कितना आनंद उठाते हैं यह उनकी समस्या है।  ऐसे  फोकटिया लेखक है जो अपना साढ़े सात सौ रुपया इंटरनेट पर केवल इसलिये खर्च करता है कि उसके पास मनोरंजन का का दूसरा साधन नहीं है। बाज़ार और प्रचार समूहों के लिये हम हिन्दी के कोई आदर्श लेखक नही है क्योंकि मुफ्त में लिखने वाले हैं।  यह हमारी निराशा नहीं बल्कि अनुभव से निकला निष्कर्ष है। सीधी बात कहें तो हिन्दी का रोजगार की दृष्टि से कोई महत्व नहीं है अलबत्ता अध्यात्मिक दृष्टि से अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर इसी भाषा का ही महत्व रहने वाला है।
                        विश्व में भौतिकतवाद अपने चरम पर है। लोगों के पास धन, पद तथा प्रतिष्ठा का शिखर है पर फिर भी बेचैनी हैं। यही कारण है कि भारतीय अध्यात्मिक दर्शन का व्यापार करने वालों की बनकर आयी हैं।  विश्व के अनेक देशों में भारतीय या भारतीय मूल के लोगों ने विज्ञान, साहित्य, राजनीति, कला तथा व्यापार के क्षेत्र में भारी सफलता अर्जित की है और उनके नामों को लेकर हमारे प्रचार माध्यम उछलते भी है।ं पर सच यह है कि विदेशें में बसे प्रतिष्ठित भारती  हमारे देश की पहचान नहंी बन सके हैं।  प्रचार माध्यम तो उनके नामों उछालकर एक तरह से देश के युवाओं को यह संदेश देते हैं कि तुम्हारा यहां कोई भविष्य नहीं है बल्कि बाहर जाओ तभी कुछ होगा। लोगों को आत्मनिर्भर तथा स्वतंत्र जीवन जीने की बजाय उनको विदेशियों  चाकरी के लिये यहां उकसाया जाता है।  सबसे बड़ी बात यह कि आर्थिक उन्नति को ही जीवन का सवौच्च स्तर बताने वाले इन प्रचार माध्यमों से यह अपेक्षा नहीं की जानी चाहिये कि वह अध्यात्म के उच्च स्तर का पैमाना बता सकें।
                        यहीं से हिन्दी का मार्ग प्रारंभ होता है।  जिन युवाओं ने अंग्र्रेजी को अपने  भविष्य का माध्यम बनाया है उनके लिये अगर विदेश में जगह बनी तो ठीक, नहंी बनी तो क्या होगा? बन भी गयी तो क्या गारंटी है कि वह रोजगार पाकर भी खुश होगा।  अध्यात्म जिसे हम आत्मा कहते हैं वह मनुष्य से अलग नहीं है। जब वह पुकारता है तो आदमी बेचैन होने लगता है। आत्मा को मारकर जीने वाले भी बहुत है पर सभी ऐसा नहीं कर सकते।  सबसे बड़ी बात तो यह है कि जो लोग अंग्रेजी के मुरीद हैं वह सोचते किस भाषा में है और बोलते किस भाषा में है यह बात समझ में नहीं आयी। हमने सुना है कि कुछ विद्यालय ऐसे हैं जहां अंग्रेजी में न बोंलने पर छात्रों को प्रताड़ित किया जाता है।  अंग्रेजी में बोलना और लिखना उन विद्यालयों का नियम है। हमें इस बात पर एतराज नहीं है पर प्रश्न यह है कि वह छात्रों के सोचने पर प्रतिबंध नहीं लगा सकते। तय बात है कि छात्र पहले हिन्दी या अन्य क्षेत्रीय भाषा में सोचते और बाद में अंग्रेजी में बोलते होंगे।  जो छात्र अंग्रेंजी में ही सोचते हैं उन्हें हिन्दी भाषा को महत्व बताने की आवश्यकता ही नहीं है पर जो सोचते हैं उन्हें यह समझना होगा कि हिन्दी उनके अध्यात्म की भाषा है जिसके बिना उनका जीवन नारकीय होगा। अतः उन्हें हिन्दी के सत्साहित्य का अध्ययन करना चाहिये। मुंबईया फिल्मों या हिंग्लिश को प्रोत्साहित करने वाले पत्र पत्रिकायें उनकी अध्यात्मिक हिन्दी भाषा की संवाहक कतई नहीं है।  भौतिक विकास से सुख मिलने की एक सीमा है पर अध्यात्म के विकास बिना मनुष्य को अपने ही अंदर कभी कभी पशुओं की तरह लाचारी का अनुभव हो सकता है। अगर आत्मा को हमेशा सुप्तावस्था में रहने की कला आती हो तो फिर उन्हें ऐसी लाचारी अनुभव नहीं होगी। 
                        हिन्दी में टाईप आना हम जैसे लेखकों के लिये सौभाग्य की बात हो सकती है पर सभी के लिये यह संभव नहीं है कि वह इसे सीखें।  हम न केवल हिन्दी भाषा की शुद्धता की बात करते हैं वरन् हिन्दी टाईप आना भी महत्वपूर्ण मानते हैं।  यह जरूरी नही है कि हमारी बात कोई माने पर हम तो कहते ही रहेंगे।  हिन्दी भाषा जब अध्यात्म की भाषा होती है तब ऐसा आत्मविश्वास आ ही जाता है कि अपनी बात कहें पर कोई सुने या नहीं, हम लिखें कोई पढ़े या नहीं और हमारी सोच का कोई मखौल उड़ाया या प्रशंसा, इन पर सोचने से ही बेपरवाह हो जाते हैं। आखिरी बात यह कि हम हिन्दी के महत्व के रूप में क्या लिखें कि सभी संतुष्ट हों, यह अभी तक नहीं सोच पाये। इस हिन्दी दिवस के अवसर पर फिलहाल इतना ही।

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15 अगस्त 2013

अथर्ववेद से संदेश-मातृभूमि हमें बुद्धि बल प्रदान करे (atharvvede se sandesh-matrabhoomi hamen buddhibal pradan karen)



         हमारे देश में मातृभूमि का अत्यंत महत्व दिया जाता है।  हमारा अध्यात्मिक दर्शन का स्पष्ट मानना है कि देहधारी मनुष्य की इस संसार में उपस्थिति माता पिता के साथ ही मातृभूमि के कारण भी है।  आधुनिककाल  में देशभक्ति के भाव से अनेक गीत तथा प्रार्थनायें लिखी गयी हैं पर उनमें केवल आर्तभाव है।  इसके विपरीत हमारा अध्यात्मिक दर्शन मातृभूमि की आराधना में शक्तिशाली भाव पैदा करने के लिये अनेक मंत्रों का प्रवर्तक है।  हमारे यहां साकार तथा सकाम भक्ति के  दो प्रकार होते हैं-एक तो है आरती दूसरा है मंत्र जाप।  आरती  अत्यंत स्पष्ट रूप से परमात्मा के इष्ट स्वरूप से याचना के भाव से गायी जाती है।  उसमें अपने अभावों तथा कमजोरियों का उल्लेख किया जाता है। यहां तक कि उसमें स्वयं को अत्यंत हेय जीव बताया जाता है। इसके विपरीत मंत्र में परमात्मा के इष्ट स्वरूप को आह्वान किया जाता है।  अपने हेय रूप की बजाय अपने तपरूप से परमात्मा को आकर्षित किया जता है।  आरती मेें आशा का तत्व होता है ताकि परमात्मा प्रसन्न होकर इच्छित फल प्रदान करें जबकि मंत्रजाप में यह विश्वास होता है कि परमात्मा निश्चय ही किसी विषय में सफलता या वस्तु प्राप्त करने की शक्ति प्रदान करेंगे।

अथर्ववेद में कहा गया है कि
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सा नो भूमिर्वि सृजता माता पुत्रय में पचः।
          हिन्दी में भावार्थ-जिस प्रकार माता पिता अपने बच्चों को पालते हैं उसी तरह भूमि हमें समस्त आवश्यक पदार्थ प्रदान करें।
ता नः प्रजाः सं दुहतां समग्रा वाचो मधु प्रथिवी धेहि महान्।
          हिन्दी में भावार्थ-हे मातृभूमि! हम तुम्हारी प्रजा एकत्र हों मधुर वाणी बोले। हमको मधुर वचन बोलने की शक्ति दे।
उदीराणा उतासीनास्तिष्ठन्तः प्रकामन्तः।
पद्मयां दक्षिणसव्याभ्यां मा यथिष्महि  भूम्याम्।
          हिन्दी में भावार्थ-चलते फिरते, उठते बैठते, दायें बायें पांव से टहलते हुए भूमि में हम किसी को दुःख न दें।
भूमे मातार्नि धेहि भा भद्रया सुप्रतिष्ठितम्।
संविदाना दिवा कवे श्रियां धेहि भूत्याम्।
        हिन्दी में भावार्थ-हे मात्ृभूमि! कल्याणकारी बुद्धि से हमें युक्त कर मुझको प्रतिदिन सब विषयों को ज्ञान कराओ ताकि प्रथ्वी की संपत्ति प्राप्त हो।

            हमारे देश में स्वतंत्रता के बाद जणगणमण के रूप में राष्ट्रीय गीत तथा गान के रूप में वंदेमातरम को मान्य किया गया।  जनमगमन में अधिनायक शब्द पर अनेक लोग चर्चा करते हुए उसमें तानाशाह की वृत्ति देखते हैं। उसी तरह वंदेमातरम में भी अनेक लोगों को अप्रसन्नता होती है।  इन दोनों से प्रथक कभी किसी अन्य गीत या प्रार्थना को अधिक महत्व नहीं दिया जाता हैै।  दरअसल मातृभूमि हमारे लिये इस देह की उसी तरह सहायक होती है जैसे निरंकार ब्रह्म सहायक होता है।  हमारी बुद्धि शुद्ध होने के साथ ही विचार पवित्र हों इसके लिये अगर किसी सुविधाजनक मंत्र का जाप किया जाये तो निश्चित रूप से कल्याण होगा। अथर्ववेद के मंत्रों में ऐसा भाव है जिससे लगता है कि उसके जाप से मनुष्य में शक्ति आवश्यक रूप से आयेगी।

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29 जुलाई 2013

कौन दर्द दूर कर पायेगा-हिन्दी कविता (kaun dard door ka paayega-hindi kavita)



यकीन करो

तुम्हारे दर्द की दवा करने

कोई फरिश्ता आकाश से नहीं आयेगा,

जमीन पर भी इलाज का दावा करने वाला

कोई इंसान बिना पैसे मरहम नहीं लगायेगा।

कहें दीपक बापू

कान से नारे सुनकर अनुसना कर देना,

लिखे वादे से भी आंख फेर लेना,

नुस्खे बनाये है सौदागरों ने

केवल अपने घर भरने के लिये,

दूसरे के घर की

रौशनी चुराकर जलाते अपने दिये,

आर्त होकर मत गाओ उनके गीत,

मतलब के हैं जो मीत,

कहीं रिश्ते नाम के रह जाते,

कहीं नाम से रिश्ते लोग बढ़ाते,

अपने सहने की ताकत बढ़ाओ

मुस्कराकर अपने गम घटाओ,

कोई नहीं है इस दुनियां में

लोग खरीद रहे खुद अपने लिये जख्म

इस ज़माने में आपसी  होड़ लगाकर

कौन किसका दर्द दूर कर पायेगा।

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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poet-Deepak raj kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
लेखक और संपादक-दीपक "भारतदीप",ग्वालियर
poet, writer and editor-Deepak 'BharatDeep',Gwalior
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9 जुलाई 2013

उम्रदराज का मनोविज्ञान-हिन्दी लेख (umradaraj ka manovigyan-hindi lekh)



       भारतीय अध्यात्मिक दर्शन में स्त्री पुरुषों के संबंध में बहुत कुछ लिखा गया है।  मूल रूप से काम संबंध स्त्री पुरुष का ही माना गया है।  उसमें कहीं भी समलैंगिक संबंधों की चर्चा नहीं है।  आधुनिक समय में जिस तरह कुछ देश समलैंगिक संबंधों को कानूनी दर्जा दे रहे हैं उसके आधार पर हम कह सकते हैं कि हमारा दर्शन अपूर्ण है पर सच बात यह है कि स्त्री पुरुष के संबंधों से ही आगे के जीवन का निर्माण होता है इसलिये वही एक सात्विक प्राकृतिक अवस्था है।  ऐसे में अगर भारत में कोई समलैंगिक दुर्घटना होती है तब हायतौबा मच जाती है।  दरअसल हम यहां  उस घटना की बात कर रहे हैं जिसमें एक राजनेता पर एक युवक का दैहिक शोषण करने का आरोप लगने की बात  सामने आयी है जिसने देश के सामाजिक जगत को हैरान कर दिया है।  राजनेता की आयु अस्सी वर्ष है और उसकी प्रतिष्ठा का जो पतन हुआ है वह राजनीति में नैतिकता के हृास से अधिक समाज में बढ़ती विकृत मानसिकता का प्रमाण भी है।
             आमतौर से राज्य कर्म में लिप्त लोगों के पास अपना काम निकलवाने वालों की भारी भीड़ रहती है।  दूसरी बात यह कि राजकीय संरक्षण पाने का मोह लोगों में इतना होता है कि वह किसी भी हद तक जा सकते हैं।  ऐसे में उन राजसी पुरुषों को  जो प्रत्यक्ष राज्य कर्म में लिप्त हैं  अपना नैतिक आवरण बचाना कठिन कार्य होता है।  जैसा कि हम जानते हैं कि मनुष्य के तीन प्रकार के स्वाभाविक कर्म होते हैं-सात्विक, राजस और तामस।  सात्विक लोग अपने निज आवश्यकताओं तक राजस कर्म करते हैं। उनके लक्ष्य भी सीमित होते हैं इसलिये आमतौर से प्रत्यक्ष राज्य कर्म में उनकी भूमिका अधिक लंबी नहीं रह पाती।  अधिक रहे और प्रभावी भी  तो प्रजा का भाग्य ही समझिये।  तामसी प्रवृत्ति के लोगों को यदि राज्य कर्म में प्रत्यक्ष भूमिका मिल जाये तो समझ लीजिये कि हालातों को बिगड़ना ही है।  हां, अगर राजसी प्रवृत्ति के लोग अगर राज्य कर्म में सीधे हों तो एक बेहतर संभावना बनती है।  अगर राज्य कर्म राजसी प्रवृत्ति से किये जायें तो यकीनन प्रजा के लिये सुखदायक होता है।  यहां हम यह भी बता दें कि जिनकी मूल प्रवृत्ति सात्विक है उन्हें राज्य कर्म से बचना चाहिये क्योंकि भले ही वह अपने आचरण की वजह से कुछ समय तक प्रजा में लोकप्रिय रहें पर अपने अंदर छल, कपट, धोखा तथा चालाकी के गुणों के अभाव में कालांतर में उनका राज्य प्रजा के लिये फलदायी नहीं रहता।  राज्य कर्म में प्रजा हित के लिये अनेक बार शत्रु, विरोधी, अपराधी तथा अव्यवस्था फैलाने वाले के साथ इन्हीं गुणों की शक्ति पर ही निपटा जा सकता है।  बहरहाल हम राजसी प्रकृत्ति के लोगों से ही राज्य कर्म करने की बात तो करते हैं पर उनके आचरण सात्विक होने की आशा भी करते हैं। यही से समाज की कठिन यात्रा प्रारंभ होती है। 
      राजसी प्रवृत्ति के लोगों के लोभ, लालच, काम तथा अहंकार का भाव स्वाभाविक रूप से रहता है।  यही कारण है कि ज्ञानी लोग कभी भी राजसी लोगों के दरबार में जाने से कतराते हैं।  आज के लोकतांत्रिक युग में किसी का भी राजपद स्थाई नहीं है इसलिये यह सुविधा जरूर मिल जाती है कि जब तक आदमी पद पर उसे सम्मान देते रहो। जैसे ही हटे उसे पुराने हिसाब निकाल लो।
     यह जिस विषय पर बात हो रही है वह अस्सी वर्षीय राजनेता के एक युवक का दैहिक शोषण के आरोप से जुड़ा है।  वैसे तो पहले भी अनेक नेताओं पर इसी तरह के आरोप लगे हैं और उनकी आयु भी अस्सी के आसपास रही है पर समलैंगिकता की बात जो यह सामने आयी है उससे अच्छे खासे राजनेताओं को हतप्रभ कर दिया है।  अगर किसी युवा नेता का किसी युवती के साथ ऐसा व्यवहार होता तो संभवतः समझा जा सकता था।  राजनेता के संगी साथी तमाम तरह का प्रतिवाद कर सकते थे मगर इस प्रकरण में तो ऐसी स्थिति हो गयी है कि कोई क्या कहे?  हम अगर अपने अध्यात्म दर्शन की बात करें तो नारियों का दैहिक शोषण चाहे भले ही उनकी मर्जी से हो मगर दोष पूरा पुरुष की ही माना जाता है।  उसमें आप किसी नारी से यह प्रश्न नहीं पूछ सकते कि तुमने पहले क्यों नहीं बताया? इस प्रकरण में अनुचित उचित क्या है, फिलहाल कहना कठिन लगता है।
       आम लोगों में कुछ लोग युवा नेता और युवती के बीच किसी प्रकार के विवादास्पद संबंधों पर नाखुश होने के बावजूद उसे अप्राकृतिक नहीं मानते। कोई भी ऐसा प्रकरण भले ही अपराधिक पृष्ठभूमि पर आधारित हो पर उसे समझा जा सकता है। दूसरी बात यह कि राजसी पुरुषों में कुछ ऐसे लोग होते ही है जो राजपद मिलने पर मदांध हो जाते हैं, इस सत्य को सभी जानते हैं। इसलिये पद की शक्ति पर नारियों के देह शोषण का प्रकरण हर स्थिति में तर्क की कसौटी पर प्रथक प्रथक रूप से देखा भी जा सकता है मगर जहां किसी पुरुष का दूसरे युवा पुरुष के साथ दबाव डालकर  अप्राकृतिक यौन संबंधों की बात हुई हो वह देश भी के सभ्य राजनेताओं का मुंह अगर खुला रह गया हो तो कौन सी बड़ी बात है?
      प्रचार माध्यमों पर राजनेता के कृत्य का समर्थन कोई नहीं कर रहा पर उसके पक्ष के लोग अपना बचाव यह कहकर कर रहे हैं कि हमने तो उससे मंत्र पद छीनकर  दल से निकाल दिया।  उस राजनेता के खिलाफ पुलिस में रिपोर्ट भी लिखने के बाद उसे गिरफ्तार कर जेल भी भेजा गया है।  इस आधुनिक लोकतंत्र की यह महिमा भी है कि मात्र एक सप्ताह पूर्व जो राजनेता इतना शक्तिशाली था कि उसके प्रदेश का अर्थतंत्र उसके पांव तले था वह अब जेल में पहुंच गया।  वह भी उस जेल में जिसके शुभारंभ के लिये फीता उसने स्वयं ही काटा था।  फिल्मी दुनियां के लेखकों  के लिये यह एक मनोरंजन कहानी हो सकती है पर समाज के लिये यह अत्यंत चिंता का विषय है कि उसके शिखर पुरुष यौन दुराचार नहीं वरन् यौन विकृत्ति का शिकार हो गया।
         समलैंगिकता का जुड़ाव न हो तो यह कोई पहला ऐसा प्रकरण नहीं है कि जब किसी वरिष्ठ राजनेता का ऐसा हश्र  हुआ हो।  दरअसल बुजुर्ग राजनेताओं का ऐसे प्रकरण में फंसना कोई आश्चर्य की बात नहीं  होना चाहिये पर एक बात कहनी पड़ती है कि इन लोगों ने धूप में अपने बाल सफेद किये।  अपने पद बनाये रखने में उन्होंने भले ही महारत हासिल किया पर बदलते जमाने को समझा नहीं।  आज जब प्रचार माध्यम इतने सक्रिय हो गये हैं और  हर हाथ में कैमरा है और उसका उपयोग करने के लिये सभी लालायित भी हैं।  अभी तक  कैमरा के पिंजरे में फंसने का शिकार अनेक राजनेता, अधिकारी और पत्रकार  हो चुके हों। जब इन बुजुर्गों को सतर्क रहना था तब यह शिकार बन गये।  इन महानुभावों ने आधुनिक तकीनीकी तंत्र को   समझा नहीं  और अपने कर्म जस की तस जारी रखे जिसमें  स्वयं भी फंस गये।  एक चैनल पर एक मनोचिकित्सक कह रहे थे कि इस तरह के राजनेता अपनी मानसिक विकृति का शिकार घटना के प्रकाश में आने के दिन ही नहीं होते बल्कि बीस यह तीस बरसों से उनको ऐसे दौर पड़ते रहे होंगे, इसलिये यह संभव नहीं है कि समर्थकों या विरोधियों को मालुम न हो।  आप इस प्रकरण में बहस के लिये चैनल पर मनोचिकित्सक को बुलाये जाने का यह अर्थ समझ सकते हैं कि कहीं न कहीं मनोविज्ञानिक रूप से भी इस घटना को  देखा जा रहा है। गुस्सा कम हैरानी अधिक हो रही है।
        अब यह प्रकरण तो कानून के दायरे में है पर हम इसका सामाजिक विश्लेषण तो कर ही सकते हैं। अस्सी वर्षीय राजनेता पर एक युवक ने यौनाचार का आरोप लगाया हो यह   तय बात है कि युवक का प्रकरण नारी शोषण की श्रेणी में नहीं आता।  यह अलग बात है कि कुछ बुद्धिमान बदहवासी में उस युवक की छवि में युवती जैसी मासूमियत भरने का प्रयास कर रहे हैं।  नारी का दैहिक शोषण जहां विश्व में भारत की छवि क्रूर बनाता है वह यह प्रकरण शर्मनाक स्थिति बना देगा।  ऐसा नहंी है कि विदेशों में इस तरह के प्रकरण नहीं होते पर हमारे देश के लिये अत्यंत शर्मनाक है।  इस देश में सभ्य राजनेताओं की कमी नहीं है पर आज के प्रचार माध्यमों के लिये सनसनी केवल असभ्यता ही निर्माण करती है।  यही कारण है कि सभी दलों के सभ्य राजनेता फूंकफुंककर अपने अपने हिसाब से बयानबाजी कर रहे हैं।  आखिरी बात राज्य कर्म में लिप्त सभी लोगों को यह कहना चाहेंगे कि पुराने ढर्रे पर यह सोचकर मत चलो कि हम कभी पकड़े नहीं जायेंगे। आंखें खोलो और देखो कि तुम्हारी किसी भी छवि को कभी भी कैमरे में कैद किया जा सकता है। यह केवल सलाह ही है इसे कोई मानेगा इसमें संशय है। जो सभ्य राजनेता है उन्हें इस सलाह की आवश्यकता नहीं है और जो मानसिक विकृति का शिकार है वह जब अपने दुर्भाव के चरम पर होते है तब उनको इसका ध्यान नहीं रहेगा।  उम्रदराज नेताओं का ऐसी घटनाओं में फंसना यही दर्शाता है। इतने उम्रदराज कि अगर सामान्य मनुष्य होते तो किसी ऐसे ही  अपराध में उन्हें बंदी बनाने से पहले दस बार सोचा जाता जबकि उन्हें तो उच्च पद पर होने के बावजूद इस   सुविधाजनक सोच का लाभ पाने के योग्य नहीं समझा गया।         

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
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16 जून 2013

रविवार कि व्यवसायिक प्रचार वार-हिन्दी व्यंग्य चिंत्तन (ravivar ki vyavasayik war-hindi vyangya chinttan)



       आधुनिक व्यापार और प्रचार जगत में रविवार एक तरह से व्यवसायिक वार बन गया है।  भले ही सरकारी और गैर सरकारी संस्थाओं के साथ ही अधिकतर संगठित व्यवसायिक तथा औद्योगिक  क्षेत्रों में रविवार को अवकाश रहता है पर उपभोक्ता वस्तुओं के विक्रय केंद्रों में इस दिन लोगों की भारी  भीड़ रहती है।  इसके साथ ही प्रचार माध्यमों पर भी दर्शकों का तांता लगा रहता है। घर में रखे टीवी हों या बाज़ार के फिल्म दर्शन केंद्र दर्शकों का समूह उनके पर्दों को निहारता है।  यही कारण है कि शनिवार शाम से लेकर रविवार रात्रि तक अपने व्यवसायिक  हित साधनो वाले व्यवसायी अपने उत्पादों तथा गतिविधियों को आम लोगों की आंखों में चमकाने के लिये प्रचार माध्यमों में अपने विज्ञापन प्रस्तुत करने के लिये आतुर रहते हैं। आम लोगोें की आंखों तथा कान के माध्यम से वह उनके दिमाग में प्रवेश कर उसकी जेब ढीली करने का प्रयास करते हैं।
     हमने यह भी देखा है कि यह काम केवल प्रत्यक्ष व्यवसायी ही नहीं करते बल्कि अप्रत्यक्ष रूप से आमलोगों की नज़रों में बने रखने के लिये ऐसे लोग भी करते हैं जिनका काम समाज सेवा करना है।  यह तो पता नहीं विदेशों में किस तरह इस रविवार का उपयोग प्रचार दिवस के रूप में होता है या नहीं पर भारत में इसका प्रयास अभी हाल ही में शुरु हुआ है।  राजनीतिक, आर्थिक, कला, पत्रकारिता तथा फिल्म के क्षेत्रों से जुड़े लोगों ने रविवार को आत्म प्रचार के लिये जिस तरह रविवार का दिन चुनना शुरु किया है वह अन्ना हजारे के आंदोलन के दौरान उनके प्रबंधकर्ताओं के कौशल से प्रेरित हुआ लगता है।  अन्ना हजारे ने लंबे समय तक अनशन किया पर शुक्रवार शाम से रविवार शाम तक उनके प्रबंधक इस तरह विषयों का संचालन करते थे कि उनका आंदोलन पूरे दो दिन तक टीवी के पर्दे पर छाया रहता था।  अन्ना हजारे साहब के आंदोलन का परिणाम क्या हुआ, यह अलग से विचार का विषय है पर प्रचार में बने रहने के लिये उनसे जुड़े प्रबंधकों ने जो कार्यशैली अपनाई उसका अनुकरण अब राजनीतिक, आर्थिक, तथा कला से जुड़े लोग कर रहे हैं।  आज का रविवार तो अत्यंत दिलचस्प निकला। एक साथ तीन तीन बड़े राजनीतिक दलों ने क्रम से पर्दे पर अपने अपने शिखर पुरुषों को इस तरह बनाये रखा कि उनके प्रसारण में आपसी टकराव न हो भले ही दलीय रूप से उनमें प्रतिद्वंद्वता हो। इस दौरान एक टीवी उद्घोषक ने इस बार पर हैरानी जताई कि आज रविवार के दिन ही क्या योजनापूर्वक यह सब किया जा रहा है?
  हमें उसके इस मासूम प्रश्न पर हंसी आ गयी। अभी यह प्रयास अधिक दिख रहे हों पर ऐसा पहले हो चुका है।  हालांकि लोकप्रियता के आधार पर अपना काम करने वाले सभी क्षेत्रों के लोगों के ऐसे  प्रयास भी पश्चिम से प्रेरित है।  हमने यह देखा है कि पश्चिमी देशों ने अनेक ऐसी घटनाओं को शनिवार और रविवार के दिन इस तरह प्रस्तुत किया जिससे उनका प्रचार अधिक हो।   भारत में संभवतः अन्ना हजारे के आंदोलन के बाद ही                                               
यह बड़ी शिद्दत के साथ शुरु हुआ। दरअसल जब अन्ना हजारे का आंदोलन थमता था तो प्रचार माध्यमों के प्रबंधकों के साथ समस्या आती थी कि इस तरह का कोई दूसरा घटनाक्रम कब आये जब उनके विज्ञापन का समय सहजता से लंबे समय तक बीत सके।  इधर यह भी देखने में आया कि कुछ संगठन अपने आंदोलनों का दिन भी शनिवार और रविवार को ही चुनते हैं। तय बात है कि जिन लोगों का स्वाभाविक कर्म ही प्रचार के सहारे हैं उन्हें भी यह प्रेरणा मिली होगी कि वह अपने घटनाक्रमों को शनिवार तथा रविवार के दिन योजनापूर्वक बनायें।  यह बुरा प्रयास नहीं है क्योंकि जागरुक लोगों को सामान्य दिनों में घर आकर टीवी खोलने से पहले आराम के दौर से निकलना पड़ता है।  अवकाश के दौरान वह निंरतर जुड़े रहते हैं जिससे उन्हें प्रभावित किया जा सकता है। 
      आज रविवार के दिन शिखर पुरुषों की तीन अलग अलग पत्रकार वार्ताओं के समय इस तरह चुने गये कि एक दूसरे के साथ टकरायें नहीं। देश में अभी लोकसभा चुनावों में एक वर्ष का समय है पर राजनीतिक वातावरण में गर्मी अभी से आ गयी है।  स्वाभाविक रूप से जिन लोगों को अगले चुनावों में सक्रिय भागीदारी करना है वह प्रचार में निरंतर बने रहने के लिये प्रयास करेंगे।  चुनाव लड़ना कोई सरल काम नहीं है।  अकेले पैसा खर्च कर भी चुनाव जीतना संभव नहीं है। इससे पहले आम लोगों में अपनी सक्रियता  दिखानी पड़ती है।  अपने आप को सभ्य तथा सतर्क व्यक्ति साबित करना होता है। यह काम प्रचार से ही संभव है। वह भी एक या दो दिन  बल्कि वर्ष दो वर्ष कभी तीन वर्ष भी इसमें लग सकते हैं।
          इधर हमने क्रिकेट मैचों में भी यह देखा है कि जब किसी प्रतियोगिता में बीसीसीआई की टीम तथा पाकिस्तान आमने सामने होते हैं तब दिन ऐसा ही चुना जाता है कि भारत में अवकाश हो।  यह माना जाता है बीसीसीआई की टीम तथा पाकिस्तान का मैच सबसे महंगा होता है।  अभी चैंपियन ट्राफी में दोनों का मैच शनिवार को हुआ।  इस मैच का महत्व एकदम खत्म हो चुका था। पाकिस्तान की टीम पहले ही अगले दौर से बाहर हो चुकी थी और बीसीसीआई की टीम सभी मैच जीतकर सेमीफायनल के लिये योग्यता प्राप्त कर चुकी थी।  टीवी चैनलों ने इसे महामुकाबला बताने का प्रयास भी नहीं किया।  इस पर बरसात के कारण टुकड़ो टुकड़ों में यह मैचा खेला गया।  मैच छोटा था बड़ा होता तो भी बीसीसीआई का दल ही  जीतता।  दरअसल पाकिस्तान की टीम जितने बुरे दौर में उतना ही आकर्षक रूप बीसीसीआई की टीम का है। बहरहाल मुकाबला आकर्षक नहीं था। खेल भी कोई आकर्षक नहीं हुआ।  जीत भी आकर्षक नहीं रही।  सच बात तो यह है कि पाकिस्तान की टीम का प्रदर्शन इस प्रतियोगिता में इतना निम्न स्तरीय रहा है कि बीसीसीआई की टीम अगर पाकिस्तान से हारती तो शक शुबहे में आ जाती।  वैसे इस प्रतियोगिता में जाने से पहले बीसीसीआई की टीम अत्यंत संदेहों के साथ लेकर गयी है जो निंरतर जीतों से दूर हो गया लगता है पर अगर पाकिस्तान से हारती तो फिर वहीं फिक्सिंग का भूत उसके सामने आ जाता। बहरहाल रविवार को व्यवसायिक वार बना दिया गया है तो उसे बुरा भी नहीं कहा जा सकता।

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